कोई तो अमीरों का भी गुरु हो? भाग–2 (—ओशो)

(अमेरिका में तथा विश्‍व भ्रमण के दौरान ओशो ने जगह-जगह विश्‍व के पत्रकारों के साथ वार्तालाप किया। ये सभी वार्तालाप ‘’दि लास्‍ट टैस्टामैंट’’ शीर्षक से उपलब्‍ध है। इसके छह भाग है लेकि अभी केवल एक भाग ही प्रकाशित हुआ है।)

ओशो

ओशो

ये पत्रकार वार्ताएं जुलाई 1985 और जनवरी 1986 के बीच संपन्‍न हुई।

(इस अंक में प्रकाशित अंश ओशो के अमेरिका प्रवास से है)

प्रश्‍न—आपके लोग लाल रंग की विविध छाया के वस्‍त्र क्‍यों पहनते है? वे अलग-अलग तरह के लाल रंग के कपड़े और माला क्‍यों पहनते है? Continue reading

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कोई तो अमीरों का भी गुरु हो?—ओशो

(अमेरिका में तथा विश्‍व भ्रमण के दौरान ओशो ने जगह-जगह विश्‍व के पत्रकारों के साथ वार्तालाप किया। ये सभी वार्तालाप ‘’दि लास्‍ट टैस्टामैंट’’ शीर्षक से उपलब्‍ध है। इसके छह भाग है लेकि अभी केवल एक भाग ही प्रकाशित हुआ है।)

  ओशो --कोई तो अमीरों का गुरू ?

ओशो --कोई तो अमीरों का गुरू ?

प्रश्न—ऐसी एक धारणा है कि आप और आपके धर्मावलंबी बहुत अमीर है। अगर यह सच है तो यह धन कहां से आता है?

उत्‍तर—जो लोग मेरे साथ है वे अमीर है। सच तो यह है कि केवल अमीर, शिक्षित, बुद्धिमान, सुसंस्‍कृत ही समझ सकते है जो मैं कह रहा हूं। भिखारी मेरे पास कभी नहीं आ सकता। निर्धन मेरे पास कभी नहीं आ सकते है। फासला बहुत बड़ा है, उनके और मेरे बीच में। वे मुझे सुन सकते है परंतु समझ नहीं सकते। इसलिए यह स्‍वाभाविक है मैं अमीरों का गुरु हूं। Continue reading

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एरिस्‍टोटल्‍स थियोरी ऑफ पोएट्री एंड फाइन आर्ट—(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

‘’कविता और कला के संबंध में एरिस्‍टोटल का सिद्धांत।‘’ यह शीर्षक ही विरोधाभासी मालूम होता है। कविता और कला दोनों ही सूक्ष्‍म तत्‍व है। वायवीय है, उनका सिद्धांत कैसे हो सकता है। और वह भी एरिस्‍टोटल जैसे तर्कशास्‍त्री द्वारा।

काव्‍य का शास्‍त्र लिखने की परंपरा नई नहीं है। और न ही केवल पश्‍चिम की है। भारत में भी कश्मीरी पंडित मम्‍मट ने काव्‍य शास्‍त्र लिखा था। वह संस्‍कृत भाषा में है। और बड़ा रसपूर्ण है, क्‍योंकि संक्षिप्‍त सूत्रों में गूंथा हुआ है। उसका पहला ही सूत्र है: ‘’रसों आत्‍मा काव्यत्व‘’ रस काव्‍य की आत्‍मा। इसकी तुलना में एरिस्‍टोटल का पोएटिक्‍स गंभीर है, लेकिन उसकी बारीक बुद्धि ने काव्‍य और नाटक की गहराई में प्रवेश कर उनके एक-एक पहलुओं को उजागर कर दिया है। उसकी यह कलाकारी अपने आप में एक सुंदर रचना शिल्‍प है। इस संबंध में हमें कुछ बातें ख्‍याल में लेनी चाहिए। Continue reading

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भारतीय संसद मंद बुद्धि है—ओशो

संसद की छवि गर्व करने लायक नहीं है:

osho--भारतीय संसद मंद बुद्धि है--ओशो

osho--भारतीय संसद मंद बुद्धि है--ओशो

–अटल बिहारी वाजपेयी

(प्रधानमंत्री ने का कि जनमानस में सदन की जो तस्‍वीर उभर रही है। वह ऐसी नहीं है जिस पर सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के नाते गर्व किया जा सके। वाजपेयी ने लोकसभा के मानसून सत्र के समापन संबोधन में (2001) यह बात कहीं।

ओशो-

‘’और क्‍योंकि मैंने अपने एक वक्‍तव्‍य में यह कहा कि भारतीय संसद करीब-करीब मंदबुद्धि है तो मुझे एक नोटिस थमा दिया गया, ‘’ आपने देश की महानतम संस्‍था का अपमान किया है………. Continue reading

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एनेलेक्‍टस ऑफ कन्फ्यूशियस—ओशो की प्रिय पुस्तकें

कन्फूशियस चीन के प्राचीन और प्रसिद्ध दार्शनिकों में से एक है। जैसा कि सभी प्राचीन पौर्वात्‍य व्‍यक्‍तियों के साथ हुआ है, इतिहास में उसके जन्‍म और मृत्‍यु की कोई सुनिश्‍चत तारीख दर्ज नहीं है। जो भी उपलब्‍ध है वह केवल अनुमान है। कन्‍फ्यूशियस का जीवन काल ईसा पूर्व 551-479 बताया जाता है। कुछ इतिहासविद् उससे सहमत है, कुछ नहीं। जो भी हो, उसके जैसे व्‍यक्‍तियों के वचन महत्‍वपूर्ण होते है, उनका इतिहास या भूगोल नहीं। उसके जीवन के संबंध में जो भी आंशिक जानकारी इधर-उधर उपलब्‍ध है उसे जोड़कर जो चित्र बनता है वह यह कि कन्‍फ्यूशियस सामान्‍य परिवार में पैदा हुआ, वह विवाहित था। जीते जी उसकी ख्‍याति एक विद्वान और सर्वज्ञ ऋषि के रूप में फैल चुकी थी। और वह लगातार उसका खंडन करता था। वह इसका इन्‍कार करता था कि वह उसके पास कोई विशेष ज्ञान है। उसके मुताबिक उसके पास जो असाधारण बात थी वह थी सत्तत सीखने की प्‍यास। सुदूर अतीत में जो दिव्‍य शास्‍ता थे उनके आगे वह स्‍वयं को नाकुछ मानता था। Continue reading

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पोनी एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा—(अध्‍याय—13)

जीवन की किरण उतरी

pony पोनी एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा--स्‍वामी आनंद प्रसाद

pony पोनी एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा--स्‍वामी आनंद प्रसाद

जीवन संघर्ष के वो दिन जीवन में कुछ ऐसे आयाम दे गये जिन आयामों को मैं बिना उनके अंदर से गूजरें हुए उन्‍हें वैसे कभी नहीं जान सकता था। उन्‍हीं दिनों मैंने जाना मनुष्‍य की उपलब्धि को, उसके प्रेम को, उसकी बौद्धिकता को, उसका स्‍नेह को, उसका अपनापन और लगाव मेरे अंतस के गहरे तक उतर गया। कैसे वो सामर्थ है अपने संगी साथी के सहयोग में। हम दूसरे प्राणी इस विषय में सोच भी नहीं सकते। वो पहली रात मेरे तन मन पर बहुत भारी गुजरी। मेरे पूरे शरीर मैं इतनी बेचैनी की में एक जगह बैठ ही नहीं सकता था। लगता था यहां से उठ कर कही दूर चला जाऊं। कितनी बार उठ-उठ कर में कमरे से बहार गया। एक अजीब सी बेचैनी थी मेरे शरीर में। डा0 ने तो मुझे देख कर ही कह दिया था कोई उम्‍मीद नहीं है। फिर भी मनुष्‍य उम्‍मीद नहीं छोड़ता। डा0 ने अपना जो अपना काम करना था वो कर दिया। शायद मेरे शरीर में पानी की कमी हो गई थी। ज्‍यादा उलटी और दस्‍त के कारण। उसको दूर करने के लिए उसने ग्लूकोज चढ़ाया। क्‍योंकि मेरा मुहँ तो खुलना ही बंद हो गया था। प्रकृति अपना काम पक्‍का करती है। मरने से पहले आपके मुहँ को बंद कर देगी। आपके जबड़े सख्‍त हो जायेगे। जिससे आप ठोस भोजन मुंह में डाल कर चबा नहीं सकते। क्‍योंकि वह तंत्र एक दम से बेजान हो जायेगा। बस आपके मुहर को सीधा खोल सकते है। प्रकृति अपना काम बड़ी सहजता और सरलता से करती है। आपके शरीर को मिटना है, अब उसमें ठोस जाना बंद होगा। दो या तीन दिन तक आपके मुख में तरल भी जाना बंद हो जायेगा। उस समय पूरा मुख अकड़ कर बंद हो जायेगा। दाँत जबरदस्‍ती बंद हो जायेगे उनके बीच से केवल आप पानी डाल सकते है। Continue reading

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दि बुक ऑफ ली तज़ु—(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

कन्‍फ्यूशियन दर्शन के बाद, ताओ वाद की बहुत बड़ी दार्शनिक परंपरा है। ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में ताओ दर्शन प्रौढ़ हुआ। और तभी से ताओ ग्रंथों में किसी ली तज़ु नाम के रहस्‍यदर्शी का उल्‍लेख पाया जाता है। जी तज़ु जो हवाओं पर सवार होकर यात्रा करता था। उसकी ऐतिहासिकता भी संदिग्‍ध है। पता नहीं उसका समय क्‍या था। कुछ सुत्रों के अनुसार वह ईसा पूर्व 600 में हुआ, और कुछ कहते है 400 में पैदा हुआ। ली तज़ु एक व्‍यक्‍ति भी है, और दर्शन भी। कहते है ली तज़ु पु-तिएन शहर में रहता था। और चालीस साल तक किसी ने उसकी दखल नहीं ली। और राज्‍य के उच्‍च पदस्‍थ और राजसी परिवार के लोग उसे सामान्‍य आदमी समझते थे। चेंग में सूखा पडा और ली तज़ु ने वेइ जाने का फैसला लिया। Continue reading

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प्रेम को रिश्‍ता मत बनाओ—उर्मिला मातोंडकर

‘’प्रेम संबंध ऐसी फैटेंसी है जहां आप जिस तरह भी जीना चाहें जी तो सकते है मगर खुश होने के बावजूद आप अंतत: दुःखी ही होते है।‘’

urmila ; उर्मिला मातोंडकर--ये क्‍या कहते है (ओशो)

urmila ; उर्मिला मातोंडकर--ये क्‍या कहते है (ओशो)

प्रसिद्ध फिल्‍म अभिनेत्री उर्मिला मातोंडकर

ओशो

‘’तथाकथित संबंध बहुत सुंदर और सतरंगी सपनों के साथ शुरू होते है। परंतु शीध्र ही वे अत्‍यंत दुःख और गहरे विषाद के साथ समाप्‍त होते है। इसीलिए नये मनुष्‍य के बारे में मेरी जो दृष्‍टि है उसमे बह दूसरों से जुड़ेगा तो सही परंतु किसी प्रकार का रिश्‍ता नहीं बनायेगा—भविष्‍य के लिए किसी तरह का वादा या कल के लिए कोई बंधन नहीं खड़ा करेगा। आज स्‍वयं में पूर्ण है, इसका भरपूर आनंद लो। यदि तुम कल भी एक दूसरे के साथ रहना चाहते हो तो बहुत अच्‍छा है। यदि तुम नहीं रहना चाहते हो तो एक दूसरे के प्रति अनुग्रह भाव के साथ अलग हो जाओ, क्‍योंकि एक दिन तुमने एक दूसरे को परम आनंद और ख़ुशियाँ दीं, और यह बढ़िया है कि इसके पहले कि चीजें कटु हों तुम्‍हें अलग हो जाना चाहिए। कम से कम तुम्‍हारी यादों में वे खुबसूरत क्षण हमेशा महकते जीवंत वह ताजा रहेगें।‘’

ओशो

दि गोल्डन फ़्यूचर

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ओशो के प्रवचन पेंटिंग्‍स है—एम एफ हुसैन

हर कोई ओशो के प्रवचनों में से कुछ चून लेता है। मुझे उनमें एक पेंटिंग्‍स बनती नजर आती है। बिना किसी बुश और कैनवास के।

ये क्‍या कहते है--ओशो

ये क्‍या कहते है--ओशो

कलाकार के लिए ओशो कहते है कि सारे तकनीक छोड़ दो और शुन्‍य चित दशा में कला का सृजन करो। इस बात से मैं सौ फीसदी सहमत हूं। इस स्‍थिति में ही कला में वह अनगढ़, शक्‍तिशाली तत्‍व आ सकेगा जो कि वास्‍तविक सृजन का स्‍त्रोत है।

इस बात को मैंने तब महसूस किया जब ओशो के प्रवचनों को चित्रित करने के लिए में बंबई गया था। सूफियों पर उनके प्रवचन चल रहे थे। अब सूफियों की रूहानी मोहब्‍बत पर ओशो जैसा आदमी बोल रहा हो तो यह मौका तो मैं छोड़ने वाला नहीं था। Continue reading

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मुल्‍ला नसरूद्दीन कौन था—(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

कई देश मुल्‍ला नसरूद्दीन को पैदा करने का दावा करते है। टिर्की में तो उसकी कब्र तक बनी हुई है। और हर साल वहां नसरूद्दीन उत्‍सव मनाया जाता है। उस उत्‍सव में मुल्‍ला जैसी पोशाक पहनकर लोग उसके क़िस्सों को अभिनीत करते है। एस्‍किशहर उसका जन्‍म गांव बताया जाता है।

ग्रीन लोग नसरूद्दीन के क़िस्सों को अपनी लोककथा का हिस्‍सा बनाते है। मध्‍ययुग में नसरूदीन के क़िस्सों का उपयोग तानाशाह अधिकारियों का मजाक उड़ाने के लिए किया जाता था। उसके बाद मुल्‍ला नसरूदीन सोवियत यूनियन का लोक नायक बना। एक फिल्‍म में उसे देश के दुष्‍ट पूंजीवादी शासकों के ऊपर बाजी मारते हुए दिखाया गया था।

मुल्‍ला मध्‍यपूर्व और उसके आसपास बसने वाली मनुष्‍य जाति के सामूहिक अवचेतन का हिस्‍सा बन गया। कभी वह बहुत बुद्धू बनकर सामने आता है तो कभी बहुत बुद्धिमान। उसके पास कई रहस्‍यों के भंडार है। सूफी दरवेश उसका उपयोग मनुष्‍य के मन के अजीबो गरीब पहलुओं को उजागर करने के लिए किया करते थे। Continue reading

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ट्रैक्‍टेटस लॉजिको—फिलोसफिकस (ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

विटगेंस्‍टीन ऑस्‍टिया के वियना शहर में एक रईस खानदान में पैदा हुआ। उसके पिता उद्योगपति थे उनके पास धन का अंबार था। अंत: विटगेंस्‍टीन को उसके सात भाई-बहनों के साथ उच्‍च कोटि की शिक्षा मिली। उसकी मां और पिता दोनों ही संगीतज्ञ थे और अत्‍यंत सुसंस्‍कृत थे।

इंजीनियरिंग तथा गणित को सीखने के लिए विटगेंस्‍टीन 1908 में इंग्‍लैड गया। वह बहुत ही मेधावी छात्र था और हर सिद्धांत का खुद प्रयोग करने में विश्‍वास रखता था। 1903 में बर्ट्रेंड रसेल की विख्‍यात किताब ‘’प्रिंसिपल ऑफ मैथेमेटिक्‍स’’ प्रकाशित हुई थी। तो विटगेंस्‍टीन सहज ही रसेल की और खिंचा चला आया। 1911 में वह केंब्रिज जाकर रहने लगा जो कि रसेल का ठिकाना था। विटगेंस्‍टीन रसेल का विद्यार्थी बन गया। सामान्‍यतया बर्ट्रेंड रसेल किसी विद्यार्थी से प्रभावित नहीं होता था—उसकी अपनी प्रतिभा इतनी बुलंद थी कि उसने सामने सभी बौने लगते थे। लेकिन विटगेंस्‍टीन के संबंध में उसने लिखा है, ‘’विटगेंस्‍टीन को पढ़ाना मेरे जीवन के सर्वाधिक रोमांचकारी बौद्धिक अभियानों में एक रहा है। इसकी आग, कुशाग्र बुद्धि और बुद्धि की निर्मलता असाधारण थी। मैं जो कुछ सिखा सकता था वह उसके शीध्र ही आत्‍मसात कर लिया।‘’ Continue reading

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चंदाभ की आभा—कथा यात्रा (ओशो)

राजगृह में चंदाभ नाम का एक ब्राह्मण रहता था। किसी पूर्व जन्‍म में भगवान कश्‍यप बुद्ध के चैत्‍य में चंदन लगाया करता था।

कुछ और बड़ा कृत्‍य नहीं था पीछे। लेकिन बड़े भाव से चंदन लगाया होगा कश्‍यप बुद्ध के चैत्‍य में, उनकी मूर्ति पर। असली सवाल भाव का है। बड़ी श्रद्धा से लगाया होगा। तब से ही उसमें एक तरह की आभा आ गयी थी। जहां श्रद्धा है, वहां आभा है। जहां श्रद्धा है, वहां जादू है। Continue reading

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आत्‍मा का अशरीरी रूप क्‍या होता है ?…………आपस में कोई डायलॉग की भी संभावना होती है ? भाग–3 (ओशो)

प्रश्न–परिचय नहीं हो सकता दो आत्‍माओं का? एक दूसरे की पहचान?

आत्‍मा का अशरीरी रूप...क्‍या ? ओशो

आत्‍मा का अशरीरी रूप...क्‍या ? ओशो

ओशो—परिचय की जहां तक बात है, दो प्रेतात्‍माएं भी अगर परिचित होना चाहें तो भी दो व्‍यक्‍तियों में प्रवेश करके ही परिचय हो सकती है। सीधी परिचय नहीं हो सकती। करीब-करीब ऐसी हालत है, जैसे हम बीस आदमी इस कमरे में सो जाएं। तो हम बीस रात भर यहीं रहेंगे। लेकिन परिचित नहीं हो सकते। हमारे जो परिचय है वह जागने के ही होंगे। जब हम जागेंगे तो फिर कंटी न्यू हो जायेंगे। लेकिन नींद में हम परिचित नहीं हो सकते। हमारा कोई संबंध नहीं हो सकता। हां, यह हो सकता है। कि एक आदमी जाग जाए, इसमें एक आदमी जाग जाए, वह सबको देख ले। Continue reading

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आत्‍मा का अशरीरी रूप क्‍या होता है ? वह स्‍थिर होती है या विचरण करती है ? अपनी परिचित दूसरी आत्‍माओं को पहचानती कैसे है ? और उस अवस्‍था में आपस में कोई डायलॉग की भी संभावना होती है ? (भाग–भाग–2)

आत्‍मा का अशरिरी रूप--भाग दो--ओशो

आत्‍मा का अशरिरी रूप--भाग दो--ओशो

दूसरी बात जब ये व्‍यक्‍तियों में प्रवेश कर जाएं तब ये वाणी का उपयोग कर सकते है। तब संवाद संभव है। इसलिए आज तक पृथ्‍वी पर कोई प्रेत या कोई देव प्रत्‍यक्ष और सीधा कुछ भी संवादित नहीं कर पाया है। लेकिन ऐसा नहीं है कि संवाद नहीं हुए है। संवाद हुए है। और देवलोक या प्रेतलोक के संबंध में, स्‍वर्ग और नरक के संबंध में जो भी हमारे पास सूचनाएं है वे काल्‍पनिक लोगों के द्वारा नहीं हे, वे इन लोको में रहने वाले लोगों के ही द्वारा है। लेकिन किसी के माध्‍यम से है। Continue reading

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आत्‍मा का अशरीरी रूप क्‍या होता है ? वह स्‍थिर होती है या विचरण करती है ? अपनी परिचित दूसरी आत्‍माओं को पहचानती कैसे है ? और उस अवस्‍था में आपस में कोई डायलॉग की भी संभावना होती है ?

ओशो—इस संबंध में दो बातें ख्‍याल में लेनी चाहिए। एक तो स्‍थिरता और गति दोनों ही वह नहीं होती। और इस लिए समझना बहुत कठिन होगा। हमें समझना आसान होता है कि गति न हो, तो स्‍थिरता होगी। स्‍थिरता न हो, तो गति होगी। क्‍योंकि हमारे ख्‍याल में गति और स्‍थिरता दो ही संभावनाएं है।

ध्‍यान के अनुभव--ओशो

ध्‍यान के अनुभव--ओशो

और एक न हो तो दूसरा अनिवार्य है। हम यह भी समझते है कि ये दोनों एक दूसरे से विरोधी है।

पहली तो बात गति और स्‍थिरता विरोधी नहीं है। गति और स्‍थिरता एक ही चीज की तारतम्‍यताएं है। जिसको हम स्‍थिरता कहते है। वह ऐसी गति है। जो हमारी पकड़ में नहीं आती। जिसको हम गति कहते है वह भी ऐसी स्‍थिरता है जो हमारे ख्‍याल में नहीं आती। तो पहली तो बात गति और स्‍थिरता दो विरोधी चीजें नहीं है। बहुत तीव्र गति हो तो भी स्‍थिर मालूम होगी। Continue reading

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दो जन्‍मों के बीच क्‍या है(भाग–2)—ओशो

एक्‍सीडेंट भी बिलकुल एक्‍सीडेंट नहीं है। उसकी बात करेंगे। कोई एक्‍सीडेंट बिलकुल एक्‍सीडेंट नहीं है। हमें लगता है, क्‍योंकि हमारी व्‍यवस्‍था के कुछ भीतर नहीं घटित होता। लेकिन कोई दुर्घटना सिर्फ दुर्घटना नहीं है। दुर्घटना भी सकारण है।

दो जन्‍मों के बीच क्‍या है (भाग--2)—ओशो

दो जन्‍मों के बीच क्‍या है (भाग--2)—ओशो

छह महीने पहले मौत की छाया पड़नी शुरू हो जाती है। तैयारी शुरू हो जाती है। जैसे रात नींद के एक घंटे पहले तैयारी शुरू हो जाती है। इसलिए सोने से पहले जो घंटे भर कर वक्‍त है, वह बहुत सजेस्‍टिबल है। उससे ज्‍यादा सजेस्‍टिबल कोई वक्‍त नहीं है। क्‍योंकि उस वक्‍त आपको शक होता है कि आप जागे हुए है। लेकिन आप पर नींद की छाया पड़नी शुरू हो जाती है। इसलिए सारे दुनिया के धर्मों ने सोने के वक्‍त घंटे भर और सुबह जागने के बाद घंटे भर प्रार्थना का समय तय किया है—संध्‍याकाल। Continue reading

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दो जन्‍मों के बीच क्‍या है—ओशो

प्रश्‍न’– आत्‍मा जब शरीर छोड़ देती है और दूसरा शरीर धारण नहीं करती है, उस बीच के समयातित अंतराल में जो घटित होता है उसका, तथा जहां वह विचरण करती है उस वातावरण के वर्णन की कोई संभावना हो सकती है? और इसके साथ जिस प्रसंग में आपने आत्‍मा का अपनी मर्जी से जन्‍म लेने की स्‍वतंत्रता का जिक्र किया

  दो जन्‍मों के बीच क्‍या है—ओशो

दो जन्‍मों के बीच क्‍या है—ओशो

है, तो क्‍या उसे जब चाहे शरीर छोड़ने अथवा न छोड़ने की भी स्‍वतंत्रता है?

ओशो—पहली तो बात शरीर छोड़ने के बाद और नया शरीर ग्रहण करने के पहले जो अंतराल का क्षण है, अंतराल का काल है, उसके संबंध में दो-तीन बातें समझें तो ही प्रश्‍न समझ में आ सकें।

एक तो कि उस क्षण जो भी अनुभव होते है वह स्‍वप्‍नवत है। ड्रीम लाइफ है। इसलिए जब होते है तब तो बिलकुल वास्‍तविक होते है, लेकि जब आप याद करते है तब सपने जैसे हो जाते है। स्‍वप्‍नवत इसलिए है वे अनुभव कि इंद्रियों का उपयोग नहीं होता। आपके यथार्थ का जो बोध है, यथार्थ की जो आपकी प्रतीति है, वह इंद्रियों के माध्‍यम से है, शरीर के माध्‍यम से नहीं। Continue reading

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लस्‍ट फॉर लाइफ—विंसेंट वैनगो–(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

यह कहानी है उत्‍तप्‍त भावोन्‍मेष की, सृजन के विवश करनेवाले विस्‍फोट की; प्रसिद्ध डच चित्रकार विंसेंट बैन गो की जो अपनी ही प्रतिभा की आग में जीवन भर जलता रहा और अंतत: उसी में जलकर भस्‍मसात हो गया।

अजीब किस्‍मत लेकिन पैदा हुआ यह प्रतिभाशाली, बदसूरत कलाकार। हॉलैंड के प्रतिष्‍ठित वैनगो परिवार में जन्‍मा वैनगो बंधु योरोप के उच्‍च वर्गीय, ख्‍यातिलब्‍ध चित्रों के सौदागर और प्रदर्शक थे। पूरे योरोप में उनकी अपनी आर्ट गैलरीज थी। छह भाईयों में से दो धर्मोपदेशक थे। उनमें से एक धर्मोपदेशक भाई की संतान थी विंसेंट और थियो। थियो विंसेंट से दो साल छोटा था। थियो समाजिक रस्मों रिवाज के मुताबिक चलने वाला, अपने व्‍यवसाय में सफल आर्ट डीलर था। विंसेंट उससे ठीक उलटा। समाज के तौर तरीके, शिष्‍टाचार उसे कभी रास नहीं आते थे। संभ्रांत व्‍यक्‍तियों दंभ और नकलीपन से बुरी तरह बौखला जाता था। और उसी समय प्रतिक्रिया करता। Continue reading

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प्रिंसिपिया एथिका—जी. इ. मूर—(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

आधुनिक दर्शन शास्‍त्र के विकास में जी. ई मूर का योगदान उतना ही महत्‍वपूर्ण है! जितना कि बर्ट्रेंड रसेल का। उसकी बहुत कम रचनाएं प्रकाशित हुई। और ‘’प्रिंसिपिया एथिका’’ उनमें से सर्वप्रथम और सर्वाधिक प्रसिद्ध किताब है।

अंग्रेजी साहित्‍य और चिंतन पर उसका प्रभाव विचारणीय है। बर्ट्रेंड रसेल ने इस किताब के बारे में लिखा, ‘’इसका हमारे ऊपर (कैम्ब्रिज में) जो प्रभाव पडा, और इसे लिखने से पहले और बाद में जो व्‍याख्‍यान हुआ उसने हर चीज को प्रभावित किया। हमारे लिए वह विचारों और मूल्यों का बहुत बड़ा स्‍त्रोत था। लॉर्ड केन्‍स का तो मानना था कि यह किताब प्लेटों से भी बेहतर है। Continue reading

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ध्‍यान में प्रथम अनुभूति–स्‍वामी आनंद प्रसाद

ध्‍यान की अनुभुति--

ध्‍यान की अनुभुति--

ध्‍यान के प्रथम कदम मनुष्‍य के एक नर्म मुलायम मिट्टी पर पड़ें कदमों की तरह होते है जो बहुत गहरी छाप छोड़ जाते है। फिर आप उसमें श्रद्धा की गुड़ाई की हो तो सोने पे सुहागा समझो। अगर उस भूमि में अपने बीज बो दिया तो वह बहुत गहरा और उँचा वृक्ष जरूर बनेगा। जिसे कोई भी मीलों दूर से भी देख सकेगें। इस लिए प्रथम अनुभूतियों को आज भी में अपने बिलकुल पास महसूस करता हूं, जैसे वो अभी कोरी और अनछुई है। ध्‍यान के पहले दिन ही चित मुझे अचेतन की उन गहराइयों में ले गया। जिस की अनुभूति आज मैं रोंए रेशे में मांस मज्‍जा बन कर समा गई है। कितनी मधुर और ठोस धरातल पर वह अनुभूति मुझे एक स्‍वप्‍न तुल्‍य लगती है। परन्‍तु मैं जानता हूं कि वह कोई कोरी कल्‍पना नहीं थी। और न ही वह एक स्‍वप्‍न। बस यूं समझो मेरे अंदर एक प्‍यास थी और सामने अमृत गागर मिल गया। और में डूब गया उस में, छोड़ अपने को पूरी तरह से बिना कुछ सोचे विचारे किये की क्‍या होगा और कैसे..;। Continue reading

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