प्रश्न’– आत्मा जब शरीर छोड़ देती है और दूसरा शरीर धारण नहीं करती है, उस बीच के समयातित अंतराल में जो घटित होता है उसका, तथा जहां वह विचरण करती है उस वातावरण के वर्णन की कोई संभावना हो सकती है? और इसके साथ जिस प्रसंग में आपने आत्मा का अपनी मर्जी से जन्म लेने की स्वतंत्रता का जिक्र किया 
दो जन्मों के बीच क्या है—ओशो
है, तो क्या उसे जब चाहे शरीर छोड़ने अथवा न छोड़ने की भी स्वतंत्रता है?
ओशो—पहली तो बात शरीर छोड़ने के बाद और नया शरीर ग्रहण करने के पहले जो अंतराल का क्षण है, अंतराल का काल है, उसके संबंध में दो-तीन बातें समझें तो ही प्रश्न समझ में आ सकें।
एक तो कि उस क्षण जो भी अनुभव होते है वह स्वप्नवत है। ड्रीम लाइफ है। इसलिए जब होते है तब तो बिलकुल वास्तविक होते है, लेकि जब आप याद करते है तब सपने जैसे हो जाते है। स्वप्नवत इसलिए है वे अनुभव कि इंद्रियों का उपयोग नहीं होता। आपके यथार्थ का जो बोध है, यथार्थ की जो आपकी प्रतीति है, वह इंद्रियों के माध्यम से है, शरीर के माध्यम से नहीं। Continue reading →
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