चंदाभ की आभा—कथा यात्रा (ओशो)

राजगृह में चंदाभ नाम का एक ब्राह्मण रहता था। किसी पूर्व जन्‍म में भगवान कश्‍यप बुद्ध के चैत्‍य में चंदन लगाया करता था।

कुछ और बड़ा कृत्‍य नहीं था पीछे। लेकिन बड़े भाव से चंदन लगाया होगा कश्‍यप बुद्ध के चैत्‍य में, उनकी मूर्ति पर। असली सवाल भाव का है। बड़ी श्रद्धा से लगाया होगा। तब से ही उसमें एक तरह की आभा आ गयी थी। जहां श्रद्धा है, वहां आभा है। जहां श्रद्धा है, वहां जादू है। Continue reading

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आत्‍मा का अशरीरी रूप क्‍या होता है ?…………आपस में कोई डायलॉग की भी संभावना होती है ? भाग–3 (ओशो)

प्रश्न–परिचय नहीं हो सकता दो आत्‍माओं का? एक दूसरे की पहचान?

आत्‍मा का अशरीरी रूप...क्‍या ? ओशो

आत्‍मा का अशरीरी रूप...क्‍या ? ओशो

ओशो—परिचय की जहां तक बात है, दो प्रेतात्‍माएं भी अगर परिचित होना चाहें तो भी दो व्‍यक्‍तियों में प्रवेश करके ही परिचय हो सकती है। सीधी परिचय नहीं हो सकती। करीब-करीब ऐसी हालत है, जैसे हम बीस आदमी इस कमरे में सो जाएं। तो हम बीस रात भर यहीं रहेंगे। लेकिन परिचित नहीं हो सकते। हमारे जो परिचय है वह जागने के ही होंगे। जब हम जागेंगे तो फिर कंटी न्यू हो जायेंगे। लेकिन नींद में हम परिचित नहीं हो सकते। हमारा कोई संबंध नहीं हो सकता। हां, यह हो सकता है। कि एक आदमी जाग जाए, इसमें एक आदमी जाग जाए, वह सबको देख ले। Continue reading

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आत्‍मा का अशरीरी रूप क्‍या होता है ? वह स्‍थिर होती है या विचरण करती है ? अपनी परिचित दूसरी आत्‍माओं को पहचानती कैसे है ? और उस अवस्‍था में आपस में कोई डायलॉग की भी संभावना होती है ? (भाग–भाग–2)

आत्‍मा का अशरिरी रूप--भाग दो--ओशो

आत्‍मा का अशरिरी रूप--भाग दो--ओशो

दूसरी बात जब ये व्‍यक्‍तियों में प्रवेश कर जाएं तब ये वाणी का उपयोग कर सकते है। तब संवाद संभव है। इसलिए आज तक पृथ्‍वी पर कोई प्रेत या कोई देव प्रत्‍यक्ष और सीधा कुछ भी संवादित नहीं कर पाया है। लेकिन ऐसा नहीं है कि संवाद नहीं हुए है। संवाद हुए है। और देवलोक या प्रेतलोक के संबंध में, स्‍वर्ग और नरक के संबंध में जो भी हमारे पास सूचनाएं है वे काल्‍पनिक लोगों के द्वारा नहीं हे, वे इन लोको में रहने वाले लोगों के ही द्वारा है। लेकिन किसी के माध्‍यम से है। Continue reading

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आत्‍मा का अशरीरी रूप क्‍या होता है ? वह स्‍थिर होती है या विचरण करती है ? अपनी परिचित दूसरी आत्‍माओं को पहचानती कैसे है ? और उस अवस्‍था में आपस में कोई डायलॉग की भी संभावना होती है ?

ओशो—इस संबंध में दो बातें ख्‍याल में लेनी चाहिए। एक तो स्‍थिरता और गति दोनों ही वह नहीं होती। और इस लिए समझना बहुत कठिन होगा। हमें समझना आसान होता है कि गति न हो, तो स्‍थिरता होगी। स्‍थिरता न हो, तो गति होगी। क्‍योंकि हमारे ख्‍याल में गति और स्‍थिरता दो ही संभावनाएं है।

ध्‍यान के अनुभव--ओशो

ध्‍यान के अनुभव--ओशो

और एक न हो तो दूसरा अनिवार्य है। हम यह भी समझते है कि ये दोनों एक दूसरे से विरोधी है।

पहली तो बात गति और स्‍थिरता विरोधी नहीं है। गति और स्‍थिरता एक ही चीज की तारतम्‍यताएं है। जिसको हम स्‍थिरता कहते है। वह ऐसी गति है। जो हमारी पकड़ में नहीं आती। जिसको हम गति कहते है वह भी ऐसी स्‍थिरता है जो हमारे ख्‍याल में नहीं आती। तो पहली तो बात गति और स्‍थिरता दो विरोधी चीजें नहीं है। बहुत तीव्र गति हो तो भी स्‍थिर मालूम होगी। Continue reading

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दो जन्‍मों के बीच क्‍या है(भाग–2)—ओशो

एक्‍सीडेंट भी बिलकुल एक्‍सीडेंट नहीं है। उसकी बात करेंगे। कोई एक्‍सीडेंट बिलकुल एक्‍सीडेंट नहीं है। हमें लगता है, क्‍योंकि हमारी व्‍यवस्‍था के कुछ भीतर नहीं घटित होता। लेकिन कोई दुर्घटना सिर्फ दुर्घटना नहीं है। दुर्घटना भी सकारण है।

दो जन्‍मों के बीच क्‍या है (भाग--2)—ओशो

दो जन्‍मों के बीच क्‍या है (भाग--2)—ओशो

छह महीने पहले मौत की छाया पड़नी शुरू हो जाती है। तैयारी शुरू हो जाती है। जैसे रात नींद के एक घंटे पहले तैयारी शुरू हो जाती है। इसलिए सोने से पहले जो घंटे भर कर वक्‍त है, वह बहुत सजेस्‍टिबल है। उससे ज्‍यादा सजेस्‍टिबल कोई वक्‍त नहीं है। क्‍योंकि उस वक्‍त आपको शक होता है कि आप जागे हुए है। लेकिन आप पर नींद की छाया पड़नी शुरू हो जाती है। इसलिए सारे दुनिया के धर्मों ने सोने के वक्‍त घंटे भर और सुबह जागने के बाद घंटे भर प्रार्थना का समय तय किया है—संध्‍याकाल। Continue reading

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दो जन्‍मों के बीच क्‍या है—ओशो

प्रश्‍न’– आत्‍मा जब शरीर छोड़ देती है और दूसरा शरीर धारण नहीं करती है, उस बीच के समयातित अंतराल में जो घटित होता है उसका, तथा जहां वह विचरण करती है उस वातावरण के वर्णन की कोई संभावना हो सकती है? और इसके साथ जिस प्रसंग में आपने आत्‍मा का अपनी मर्जी से जन्‍म लेने की स्‍वतंत्रता का जिक्र किया

  दो जन्‍मों के बीच क्‍या है—ओशो

दो जन्‍मों के बीच क्‍या है—ओशो

है, तो क्‍या उसे जब चाहे शरीर छोड़ने अथवा न छोड़ने की भी स्‍वतंत्रता है?

ओशो—पहली तो बात शरीर छोड़ने के बाद और नया शरीर ग्रहण करने के पहले जो अंतराल का क्षण है, अंतराल का काल है, उसके संबंध में दो-तीन बातें समझें तो ही प्रश्‍न समझ में आ सकें।

एक तो कि उस क्षण जो भी अनुभव होते है वह स्‍वप्‍नवत है। ड्रीम लाइफ है। इसलिए जब होते है तब तो बिलकुल वास्‍तविक होते है, लेकि जब आप याद करते है तब सपने जैसे हो जाते है। स्‍वप्‍नवत इसलिए है वे अनुभव कि इंद्रियों का उपयोग नहीं होता। आपके यथार्थ का जो बोध है, यथार्थ की जो आपकी प्रतीति है, वह इंद्रियों के माध्‍यम से है, शरीर के माध्‍यम से नहीं। Continue reading

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लस्‍ट फॉर लाइफ—विंसेंट वैनगो–(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

यह कहानी है उत्‍तप्‍त भावोन्‍मेष की, सृजन के विवश करनेवाले विस्‍फोट की; प्रसिद्ध डच चित्रकार विंसेंट बैन गो की जो अपनी ही प्रतिभा की आग में जीवन भर जलता रहा और अंतत: उसी में जलकर भस्‍मसात हो गया।

अजीब किस्‍मत लेकिन पैदा हुआ यह प्रतिभाशाली, बदसूरत कलाकार। हॉलैंड के प्रतिष्‍ठित वैनगो परिवार में जन्‍मा वैनगो बंधु योरोप के उच्‍च वर्गीय, ख्‍यातिलब्‍ध चित्रों के सौदागर और प्रदर्शक थे। पूरे योरोप में उनकी अपनी आर्ट गैलरीज थी। छह भाईयों में से दो धर्मोपदेशक थे। उनमें से एक धर्मोपदेशक भाई की संतान थी विंसेंट और थियो। थियो विंसेंट से दो साल छोटा था। थियो समाजिक रस्मों रिवाज के मुताबिक चलने वाला, अपने व्‍यवसाय में सफल आर्ट डीलर था। विंसेंट उससे ठीक उलटा। समाज के तौर तरीके, शिष्‍टाचार उसे कभी रास नहीं आते थे। संभ्रांत व्‍यक्‍तियों दंभ और नकलीपन से बुरी तरह बौखला जाता था। और उसी समय प्रतिक्रिया करता। Continue reading

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