काल बन कर निगल गई
उस काली परछाई को
हो गई जो समय के गर्त में दफ़न
जो समझता था अपने को काल का पर्यायवाची
कलंक-कलुषित जीवन
मिटा दिया उस काल ने फिर एक बार
कि शायद ले सके कोई सुंदर रूप
कोई मां भर से उस कुरूप चेहरे पर
फिर से एक नया रंगरूप Continue reading
काल बन कर निगल गई
उस काली परछाई को
हो गई जो समय के गर्त में दफ़न
जो समझता था अपने को काल का पर्यायवाची
कलंक-कलुषित जीवन
मिटा दिया उस काल ने फिर एक बार
कि शायद ले सके कोई सुंदर रूप
कोई मां भर से उस कुरूप चेहरे पर
फिर से एक नया रंगरूप Continue reading
मुल्ला जी—(आनंद मोहम्मद)
मुल्ला जी, हां ये नाम सुन का आप भी जरूर थोड़ा चोंकोगे। मैं भी उसे देख कर थोड़ी दे के लिए अवाक सा रह गया।
मन पर चल रहा विचारों का शोर थोड़ी देर के लिए थम गया था, वह पथ कुछ क्षण के लिए सूना हो गया था। मैं उसे अपलक देखा ही रह गया। सफेद नमाजी टोपी, चेहरे पर हल्की दाढ़ी, रंग का थोड़ा सांवला, मोटे होठ, और गहरी काली आंखे…..जो आपको कुछ क्षण के लिए किसी गहरे-शीतल एकांत में ले जायेंगे। जी हां, ‘’ओशो’’ का एक सन्यासी का नाम है, मुल्ला जी( आनंद मोहम्मद) जो एक कट्टर मुसलिम परिवार में पैदा हुआ। और अपने लड़क पन में ही बगावत कर ओशो से जूड़ गया। जिस उम्र में बच्चें को कुछ समझ नहीं होती, या यूं कह लो वह यार दोस्तों में मौज़ मस्ती कर के अपने जीवन को खत्म कर रहे होता है। उस समय यह अंजान और बेबूझी सी उस डगर वर बालक ओशो के उस अथाह समुद्र में कैसे गोते लगा गया, गोते ही नहीं लगाये, वह संन्यास ले कर उस में पूर्णता से डूब भी गया। Continue readingप्रश्न—भारतीय संस्कृति बड़ी सहिष्णु संस्कृति रही है। बुद्ध ईश्वर को नहीं मानते थे, पतंजलि ने भी ईश्वर को इंकार कर दिया था। जब आप अमेरिका में पाँच वर्ष रहे, तब क्या आपने इस फर्क को देखा?
ओशो—मैंने फर्क देखा है। फर्क यह है कि जहां तक चिंतन का सवाल है, भारत बहुत उदार और सहिष्णु है; लेकिन जहां सामाजिक आचरण का सवाल आता है, वहां वह बड़ा कठोर हो जाता है। सामाजिक जीवन के संबंध में अमेरिका बड़ा उदार है, लेकिन चिंतन आदि के बारे में बहुत हठी और अड़ियल है। उनके विचारों का स्तर देखा जाए, तो अमेरिका के सर्वाधिक शिक्षित लोगों को भारत के देहाती लोगों की तरह बात करते हुए पाया है। और उन्हें अपनी मूढ़ता दिखाई नहीं देती। Continue reading
कब तक खड़ा रहेगा ये उजाला
मेरे द्वारा पर और करता रहेगा
यूं तन्हा मेरा इंतजार…
पर मैं हूं कि आंखें बंद किये
उलझा हूं किन्हीं अंधेरी गलियों में
और ढूंढ रहा हूं, उन आस्था और विश्वासों में
कुछ वादे और गिले सिकवा
जो कभी के दफ़न हो गये है
नैतिकता और संस्कारों के तले Continue reading
ओशो—तुम्हारे चरित्र का एक ही अर्थ होता है, बस कि स्त्री पुरूष से बंधी रहे,
चाहे पुरूष कैसा ही गलत हो। हमारे शास्त्रों में इसकी बड़ी प्रशंसा की गई है। कि अगर कोई पत्नी अपने पति को—बूढ़े, मरते, सड़ते, कुष्ठ रोग से गलते पति को भी—कंधे पर रख कर वेश्या के घर पहुंचा दे तो हम कहते है: ‘’यह है चरित्र, देखो क्या चरित्र है। मरते पति ने इच्छा जाहिर की कि मुझे वेश्या के घर जाना है। और स्त्री इसको कंधों पर रख कर पहुंचा आयी।‘’ इसको गंगा जी में डूबा देना था, तो चरित्र होता। यह चरित्र नहीं है, सिर्फ गुलामी है, यह दासता है और कुछ भी नहीं। Continue readingओशो—एक बच्चा अपनी मां को प्रेम करता है। और मां खुश होगी कि बच्चा मा को प्रेम करता है। और वह बच्चे को कितना प्रेम करती है,
लेकिन बच्चे के मन में मां के प्रेम की जो तस्वीर बनती चली जायेगी, मां भी नहीं सोच सकती। बच्चा भी नहीं सोच सकता कि अंतत: यही प्रेम उसकी जिंदगी को भी उपद्रव में डाल सकता है। अगर बच्चे के मन में अपनी मां की तस्वीर पूरी तरह बैठ गयी तो वह जिंदगी भर पत्नी में अपनी मां को खोजेगा। जो नहीं मिल सकता है। और वही जिंदगी भर फ्रस्टेश्न में जिएगा। जिंदगी भर तनाव और परेशानी में रहेगा। क्योंकि खोज रहा है मां को। उसको मां जैसी पत्नी चाहिए वैसी पत्नी कहां मिल सकती है? वह एक ही औरत थी और मां को पत्नी बनाया नहीं जा सकता। उसका कोई उपाय नहीं है। अब वह अपनी मां को खोज रहा है, मां के गुण खोज रहा है। Continue readingप्रश्न—किसी ने ओशो से पूछा कि वह सेक्स से थक गया है।
ओशो—सेक्स थकान लाता है। इसलिए मैं तुमसे कहता हूं कि इसकी अवहेलना मत करो। जब तक तुम इसके पागलपन को नहीं जान लेते, तुम इससे छुटकारा नहीं पा सकते। जब तक तुम इसकी व्यर्थता को नहीं पहचान लेते तब तक बदलाव असंभव है। Continue reading
प्रश्न—मेरे बदन में बहुत काम-ऊर्जा है। जब मैं नाचती हूं, कभी-कभी में महसूस करती हूं कि मैं पूरी दुनिया को खत्म कर दूंगी और किसी स्थिति में इतना क्रोध और हिंसा मेरे भीतर उबलती है कि मैं अपनी ऊर्जा को ध्यान की तरफ नहीं ले जाती पाती हूं, यह मुझे पागल कर देती है। मैं काम-वासना में
नहीं जाना चाहती हूं परंतु हिंसक ऊर्जा ज्वालामुखी की तरह जल रही है। मेरे लिए यह बर्दाश्त के बाहर है और यह मुझे आत्महत्या करने जैसा लगता है। कृपया कर मुझे समझाए कि कैसे मैं अपनी ऊर्जा को सृजनात्मकता दूँ।ओशो—यह समस्या मन की बनाई हुई है। न कि ऊर्जा की। अपनी ऊर्जा की सुनो। यह सही दिशा दिखा रही है। यह काम-ऊर्जा नहीं है जो समस्या पैदा कर रही है। यह कभी जानवरों में, वृक्षों में, पक्षियों में किसी तरह की समस्या पैदा नहीं करती। ऊर्जा समस्या पैदा करती है क्योंकि तुम्हारे मन का ढंग गलत है। Continue reading
भोजन की टेबल आनंदपूर्ण होनी चाहिए: ओशो
जो हम खाते है, उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि हम उसे किस भाव-दशा में खाते है। उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। आप क्या खाते है। यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है। जितना यह महत्वपूर्ण है कि आप किस भाव-दिशा में खाते है। आप आनंदित खोते है, या दुखी खाते है, उदास खाते है, चिंता में खाते है, या क्रोध से भरे हुए खाते है, या मन मार कर खाते है। अगर आप चिंता में खाते है, तो श्रेष्ठतम भोजन के परिणाम भी पायजनस होंगे। ज़हरीले होंगे। और अगर आप अपने आनंद में खाते रहे है, तो कई बार संभावना भी है कि जहर भी आप पर पूरे परिणाम न ला पाये। बहुत संभावना है। आप कैसे खाते है। किस चित की दशा में खाते है? Continue reading
अल्बर्ट आइंस्टीन ने खोज की और निश्चित ही यह सही होगी, क्योंकि अंतरिक्ष के बारे में इस व्यक्ति ने बहुत कठोर परिश्रम किया था। उसकी खोज बहुत गजब की है। उसने स्वयं ने कई महीनों तक इस खोज को अपने मन में रखी और विज्ञान जगत को इसकी सूचना नहीं दी क्योंकि उसे भय था कि कोई उस पर विश्वास नहीं
करेगा। खोज ऐसी थी कि लोग सोचेंगे कि वह पागल हो गया है। परंतु खोज इतनी महत्वपूर्ण थी की उसने अपनी बदनामी की कीमत पर जग जाहिर करने का तय किया। Continue readingएक मात्र विकल्प: एक विश्व सरकार
(अमेरिका में तथा विश्व भ्रमण के दौरान ओशो ने जगह-जगह विश्व के पत्रकारों के साथ वार्तालाप किया। ये सभी वार्तालाप ‘’दि लास्ट टैस्टामैंट’’ शीर्षक से उपलब्ध है। इसके छह भाग है लेकि अभी केवल एक भाग ही प्रकाशित हुआ है।)
(डेर श्पीगल, जर्मन पत्रिका के साथ)
प्रश्न—अमेरिकन समाज प्रजातांत्रिक नहीं है?
ओशो—नहीं, कोई भी समाज अभी तक सभ्य नहीं हुआ है। Continue reading
गरीबी : जिम्मेदार कौन
(अमेरिका में तथा विश्व भ्रमण के दौरान ओशो ने जगह-जगह विश्व के पत्रकारों के साथ वार्तालाप किया। ये सभी वार्तालाप ‘’दि लास्ट टैस्टामैंट’’ शीर्षक से उपलब्ध है। इसके छह भाग है लेकि अभी केवल एक भाग ही प्रकाशित हुआ है।)
(डेर श्पीगल, जर्मन पत्रिका के साथ)
प्रश्न’—आप डच चित्रकार विन्सेंट वॉन गॉग के बहुत बड़े प्रशंसक है। जिसका एक ही कान था। आप कुछ इस तरह कहते है कि, ‘’उसने आत्महत्या कर ली क्योंकि जो कुछ वह चित्रित करना चाहता था, वह उसने चित्रित कर लिया था। तो पूरी दूनिया को यक आत्महत्या लगती है। परंतु मुझे नहीं। मुझे तो यह प्राकृतिक अंत लगता है। चित्र पूरा हुआ जीवन पूरा हुआ।
ओशो—हां, निश्चित ही। Continue reading
मरने की स्वतंत्रता होनी चाहिए–
(अमेरिका में तथा विश्व भ्रमण के दौरान ओशो ने जगह-जगह विश्व के पत्रकारों के साथ वार्तालाप किया। ये सभी वार्तालाप ‘’दि लास्ट टैस्टामैंट’’ शीर्षक से उपलब्ध है। इसके छह भाग है लेकि अभी केवल एक भाग ही प्रकाशित हुआ है।)
(डेर श्पीगल, जर्मन पत्रिका के साथ)
प्रश्न-–बस एक और प्रश्न उन लोगों के बारे में जो आपसे जुड़ रहे है। आपके साथ खड़े होने वालों के बारे में। मेरा ख्याल है कि सैद्धांतिक रूप से पश्चिम के हताश युवा आपके पास आ रहे है जो अधिक आज्ञाकारी है और जो बहुत से प्रश्न नहीं पूछते। क्योंकि भारतीय अधिक व्यावहारिक दिमाग के लोग नहीं है?
ओशो—क्या तुम सोचते हो कि तुम भारतीय हो? Continue reading
देश और धर्म: झूठी लकीरें—ओशो
(अमेरिका में तथा विश्व भ्रमण के दौरान ओशो ने जगह-जगह विश्व के पत्रकारों के साथ वार्तालाप किया। ये सभी वार्तालाप ‘’दि लास्ट टैस्टामैंट’’ शीर्षक से उपलब्ध है। इसके छह भाग है लेकि अभी केवल एक भाग ही प्रकाशित हुआ है।)
प्रश्न–युद्ध के अलावा, नैतिक व राजनैतिक दृष्टि से आप हिटलर के बारे में क्या सोचते है?
ओशो—नैतिक ढंग से वह महात्मा गांधी की तरह ही नैतिक था।
प्रश्न–महात्मा गांधी की तरह।
ओशो—हां, क्योंकि मैं दोनों को बहुत अनैतिक मानता हूं। सच तो यह है कि वह महात्मा गांधी से अधिक हिंदू था। Continue reading
अपनी खोज आप करो—ओशो
(अमेरिका में तथा विश्व भ्रमण के दौरान ओशो ने जगह-जगह विश्व के पत्रकारों के साथ वार्तालाप किया। ये सभी वार्तालाप ‘’दि लास्ट टैस्टामैंट’’ शीर्षक से उपलब्ध है। इसके छह भाग है लेकि अभी केवल एक भाग ही प्रकाशित हुआ है।)
गुड मोर्निंग एक बी सी नेटवर्क के साथ—
प्रश्न—मुझे उस विषय में पूछना है जो अभी एक क्षण पहले आपने कहा। आपने कहा कि आप लोगों को नियंत्रित करना नहीं चाहते है। आपका कोई नियंत्रण नहीं है। लेकिन क्या आपके 350,000 अनुयायियों पर आपका बहुत ज्यादा प्रभाव नहीं है? Continue reading
मेरा कोई जीवन-दर्शन नहीं है–ओशो
(अमेरिका में तथा विश्व भ्रमण के दौरान ओशो ने जगह-जगह विश्व के पत्रकारों के साथ वार्तालाप किया। ये सभी वार्तालाप ‘’दि लास्ट टैस्टामैंट’’ शीर्षक से उपलब्ध है। इसके छह भाग है लेकि अभी केवल एक भाग ही प्रकाशित हुआ है।)
दि लास्ट टेस्टामेंट
(गुड़ मोर्निंग अमेरिका, ए बी सी नेटवर्क के साथ)
प्रश्न—पहले तो आज रात हमारे साथ बात करने के लिए हम आपके आभारी है। कुछ वर्ष आपके मौन व्रत लिया हुआ था। हाल ही में आपने पुन: बोलने का निर्णय लिया है—अपने समर्थकों से, और आज हमसे आपने इस समय बोलने का निर्णय क्यों लिया? Continue reading
सारा विश्व एक पागलखाना बना हुआ है—ओशो
(अमेरिका में तथा विश्व भ्रमण के दौरान ओशो ने जगह-जगह विश्व के पत्रकारों के साथ वार्तालाप किया। ये सभी वार्तालाप ‘’दि लास्ट टैस्टामैंट’’ शीर्षक से उपलब्ध है। इसके छह भाग है लेकि अभी केवल एक भाग ही प्रकाशित हुआ है।)
ये पत्रकार वार्ताएं जुलाई 1985 और जनवरी 1986 के बीच संपन्न हुई।
(इस अंक में प्रकाशित अंश ओशो के अमेरिका प्रवास से है)
प्रश्न—ओशो, अब मैं एक विषय की और मुड़ता हूं। पुन:, आपके और आपके संन्यासियों के बारे में कहा या लिखा गया है उसे मद्देनज़र रखते हुए यह कि लोगों में भय पैदा होता है जब वे आपके अंग रक्षकों को हथियारों से लैस देखते है। और ऐसी अफवाह है कि इस रैंच पर कहीं हथियारों का बड़ा भंडार है। क्या यह सही है? यदि यह सही है तो ये हथियार यहां क्यों रखे जाते है?
ओशो—मैं कोई जीसस क्राइस्ट जैसा व्यक्ति नहीं हूं। मैं अपने कंधे पर सूली रख कर नहीं चलता। और मैं आत्म घाती भी नहीं हूं। जीसस आत्मघाती रहे होंगे। मुझे जीवन से प्रेम है, मेरे लोगों को जीवन से प्रेम है। मुझे मृत्यु का कोई भय नहीं है। मैं मृत्यु का भी उतना ही आनंद लुंगा जितना जीवन का लेता हूं। परंतु मेरे लोग नहीं चाहते की अभी मैं अपना शरीर छोड़ दूँ। और मेरी रक्षा का उन्हें पूरा अधिकार है। यदि कोई मेरी हत्या करना चाहेगा तो मैं उसे नहीं रोकूंगा। फिर मैं मेरे लोगों को मेरी रक्षा करने से क्यों रोकूं? Continue reading
मेरा जंगल में खो जाना–
धीरे-धीरे मेरा स्वास्थ ठीक हो रहा था। अब खाना भी हजम होने के साथ-साथ मुझे भूख भी लगने लगी। इसी लिए पापा जी मुझे रोज जंगल में घुमाने के लिए ले जाते थे। पर इतवार या किसी छुटटी के दिन के तो क्या कहने थे। जब पूरा परिवार जंगल में जाने की तैयारी करता तो मेरे सब्र का बाध टूट जाता। एक-एक पल मुझे युगों की तरह से लगता। पर मनुष्य को हमारी तरह से नहीं जीना उसे तो न जाने कितने काम होते है। ये सब में देखता पर क्या करू मुझे खुशी बरदाश्त होती ही नहीं थी। मेरे साथ बच्चे भी जूते कपड़े पहन कर तैयार हो जाते। पर ममि और मणि दीदी तो कछुवे की चाल से तैयार होती। मुझे लगता क्या जरूरत है इतना सब करने के लिए। कहीं खाना बनाया जाता। कहीं गंदे कपड़े साबुन एक बेग में भरे जाते। वरूण भैया अपना खेलने का सामन साथ ले कर चलते। कई बार तो पापा जी दूकान से भी आ जाते पर हमारी तैयारी पूरी नहीं होती। आखिर में रो-रो कर थक जाता। मेरे को दूध पीने के लिए कहा जाता पर मारे खुशी के दूध अंदर जाता ही नहीं था। लगता अभी पंख लग जाये और हम जंगल में पहुंच जाये। Continue reading
(अमेरिका में तथा विश्व भ्रमण के दौरान ओशो ने जगह-जगह विश्व के पत्रकारों के साथ वार्तालाप किया। ये सभी वार्तालाप ‘’दि लास्ट टैस्टामैंट’’ शीर्षक से उपलब्ध है। इसके छह भाग है लेकि अभी केवल एक भाग ही प्रकाशित हुआ है।)
दि लास्ट टैस्टामैंट—ए बी सी नेटवर्क के साथ वार्तालाप—ओशो
प्रभु का राज्य पाने को कौन नहीं चाहेगा? जीसस ने कहा है, एक ऊँट तक सूई की आँख में से निकल जाये, लेकिन एक अमीर आदमी कभी स्वर्ग के द्वार में प्रवेश नहीं कर सकता। अब यह आदमी जिम्मेदार है सारी दूनिया में फैली हुई गरीबी के लिए। वह समृद्धि की भत्र्सना कर रहा है। वह उस सृजनात्मकता की निंदा कर रहा है। जिससे सारा विश्व समृद्ध किया जा सकता है।
मैं सभी आयामों की समृद्धि के पक्ष में हूं, और मैं यह कभी नहीं कह सकता कि धन्य है गरीब। यही कार्ल मार्क्स ने कहा; ‘’धर्म लोगों की अफीम है। सुंदर शब्दों का प्रयोग करना आसान है, लेकिन यदि तुम उसमे छिपे हुए आशय को समझ सको तो ईसाई आज क्या कर रहे है, और पिछले हजार वर्षों में उन्होंने क्या किया?वे अनाथालय खोल लेंगे, वे संतति नियमन के विरोध में है। वे गर्भपात के विरोधी है। Continue reading
एक महान सम्राट अपने घोड़े पर बैठ कर हर दिन सुबह शहर में घूमता था। यह सुंदर अनुभव था कि कैसे शहर विकसित हो रहा है, कैसे उसकी राजधानी अधिक से अधिक सुंदर हो रही है।
उसका सपना था कि उसे पृथ्वी की सबसे सुंदर जगह बनाया जाए। वह हमेशा अपने घोड़े को रोकता और एक बूढ़े व्यक्ति को देखता, वह एक सौ बीस साल का बूढ़ा रहा होगा जो बग़ीचे में काम करता रहता, बीज बोता, वृक्षों को पानी देता—ऐसे वृक्ष जिनको बड़ा होने में सैंकड़ो साल लगेंगे। ऐसे वृक्ष जो चार हजार साल जीते है। Continue reading