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	<title>Osho Satsang.org/ओशो सत्‍संग</title>
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	<description>यदि मैं शरीर छोड़ भी दू तो भी मैं अपने संन्‍यायों को छोड़ने वाला नहीं हूं।--ओशो</description>
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		<title>Osho Satsang.org/ओशो सत्‍संग</title>
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		<title>एनेलेक्‍टस ऑफ कन्फ्यूशियस—ओशो की प्रिय पुस्तकें</title>
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		<pubDate>Fri, 24 Feb 2012 16:07:54 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[ओशो की प्रिय पूस्‍तके--]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

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		<description><![CDATA[कन्फूशियस चीन के प्राचीन और प्रसिद्ध दार्शनिकों में से एक है। जैसा कि सभी प्राचीन पौर्वात्‍य व्‍यक्‍तियों के साथ हुआ है, इतिहास में उसके जन्‍म और मृत्‍यु की कोई सुनिश्‍चत तारीख दर्ज नहीं है। जो भी उपलब्‍ध है वह केवल &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/02/24/%e0%a4%8f%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%95%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%9f%e0%a4%b8-%e0%a4%91%e0%a4%ab-%e0%a4%95%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%ab%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%82%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%af/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4403&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>कन्फूशियस चीन के प्राचीन और प्रसिद्ध दार्शनिकों में से एक है। जैसा कि सभी प्राचीन पौर्वात्‍य व्‍यक्‍तियों के साथ हुआ है, इतिहास में उसके जन्‍म और मृत्‍यु की कोई सुनिश्‍चत तारीख दर्ज नहीं है। जो भी उपलब्‍ध है वह केवल अनुमान है। कन्‍फ्यूशियस का जीवन काल ईसा पूर्व 551-479 बताया जाता है। कुछ इतिहासविद् उससे सहमत है, कुछ नहीं। जो भी हो, उसके जैसे व्‍यक्‍तियों के वचन महत्‍वपूर्ण होते है, उनका इतिहास या भूगोल नहीं। उसके जीवन के संबंध में जो भी आंशिक जानकारी इधर-उधर उपलब्‍ध है उसे जोड़कर जो चित्र बनता है वह यह कि कन्‍फ्यूशियस सामान्‍य परिवार में पैदा हुआ, वह विवाहित था। जीते जी उसकी ख्‍याति एक विद्वान और सर्वज्ञ ऋषि के रूप में फैल चुकी थी। और वह लगातार उसका खंडन करता था। वह इसका इन्‍कार करता था कि वह उसके पास कोई विशेष ज्ञान है। उसके मुताबिक उसके पास जो असाधारण बात थी वह थी सत्तत सीखने की प्‍यास। सुदूर अतीत में जो दिव्‍य शास्‍ता थे उनके आगे वह स्‍वयं को नाकुछ मानता था।<span id="more-4403"></span></p>
<p>      उसका काम सिर्फ इतना था कि प्राचीनतों के ज्ञान को वह हस्‍तांतरित करे। पुरातन में उसका विश्‍वास और निर्भरता अटूट थी।</p>
<p>      परंपरा के अनुसार कन्‍फ्यूशियस के 72 शिष्‍य थे और एनेलेक्टस में बीस शिष्‍यों के सूत्र है। एनेलेक्‍टस चीनी शब्‍द ‘’लून यू’’ का अनुवाद है। उसका अर्थ है। चुनिंदा वचन। इस किताब के बीस परिच्‍छेद है और इसकी सामग्री से पता चलता है कि ये कन्‍फ्यूशियस की मृत्‍यु के अरसे बाद लिखे गये है। कन्‍फ्यूशियस के शिष्‍यों की कई शाखाएं बन गई थी। उसके पट्टी शिष्य मास्‍टर त्‍सेंग की मृत्‍यु हो चुकी थी। इन बीस परिच्‍छेदों में से सिर्फ तीन से नौ तक परिच्‍छेद पुराने और कन्‍फ्यूशियस के मूल रूपेण मालूम होते है। 10 और 20 परिच्‍छेद का मूल सूत्रों से कोई संबंध नहीं है। दसवां परिच्‍छेद क्रिया कांडो के नियमों का संकलन है और बीसवें में शु चिंग  प्रणाली के वचन है। उन्‍नीसवें परिच्‍छेद में सिर्फ शिष्‍यों के वचन है। 18, 17 और 14 के परिच्‍छेदों में तो कन्‍फ्यूशियस के विरोधकों के वचन संग्रहीत है।</p>
<p>      मूल किताब का सर्वसंमत समय है ईसा पूर्व चौथी शताब्दी। लेकिन इस किताब में अलग-अलग लोगों के वचनों की जो खिचड़ी पकाई गई है उसे देखते हुए लगता है कि क्‍या कन्‍फ्यूशियस के कुछ असली सूत्र हमारे हाथ लगेंगे। इस संबंध में चीनी मुहावरों का चलन समझ लें तो हम रिलैक्‍स हो जायेंगे। चीन सदा से प्राचीन प्रज्ञा को मानता रहा है। और इसीलिए जो भी सूत्र वहां प्रचलित है वे प्राचीन समय में चले आ रहे है। कोई भी एक व्‍यक्‍ति  उनका लेखक नहीं है। कन्‍फ्यूशियस भी खुद को एक माध्‍यम मानता है, द्रष्‍टा नहीं।</p>
<p>      अब हम उन परिच्‍छेदों को देखें जो यकीनन कन्‍फ्यूशियस के माने जाते है। वे है तीन से लेकर नौ तक। इनकी आबोहवा, सोच, अभिव्‍यक्‍ति कन्‍फ्यूशियस दर्शन से मेल खाती है। उनके विषय है—क्रिया कांड, भलाई, शिष्‍यों का मूल्यांकन, कन्‍फ्यूशियस का स्‍वयं के संबंध में वक्तव्य और कुछ शिष्‍यों की कहानियां। कन्‍फ्यूशियस के वचन ‘’दि मास्‍टर सैड’’ इन शब्‍दों से शुरू होते है। अन्‍य शिष्‍यों को भी मास्‍टर कहा गया है। लेकिन आगे उनका नाम भी आता है।</p>
<p><strong>किताब की एक झलक:</strong></p>
<p>      मास्‍टर ने कहा: उच्च पद पर संकीर्ण दृष्‍टि के लोग, कोई भी धार्मिक क्रिया बिना आदर के साथ बिना दुःख के निभाई गई मृत्‍यु शोक की रस्‍में&#8211;इन्‍हें देख सकता ।</p>
<p>      मास्‍टर ने कहा: भलाई के बगैर आदमी लंबे समय तक विपदा नहीं झेल सकता। और न ही लंबे समय तक संपदा को भोग सकता है।</p>
<p>      मास्‍टर ने कहा: धन और पद हर व्‍यक्‍ति को चाहत होती है। लेकिन यदि वे उसके मार्ग में अवरोध बनते है तो उन्‍हें छोड़ देना चाहिए। गरीबी और अपनी पहचान नहीं होना, इससे हर कोई नफरत करता है। लेकिन यदि वे उसके मार्ग में बाधा नहीं बनते है तो उनका वरण करना चाहिए। जो सज्‍जन भलाई का दामन छोड़ते हों वे सज्‍जन कहलाने योग्‍य नहीं है। सज्‍जन भलाई की राह से कभी भटकते नहीं है। वे कभी इतने परेशान नहीं होते कि इसके आगे घुटने टेक दें। या कभी इतने बेहाल नहीं होते कि इसके आगे झक जाएं।</p>
<p>      मास्‍टर ने कहा: सुबह को मार्ग के संबंध में सुनो, सांझ संतुष्‍ट मर जाओ।</p>
<p>      मास्‍टर ने कहा: मेरे मार्ग पर एक ही धागा है जो उसके भीतर से बहता है।</p>
<p>      मास्‍टर चेंग ने कहा, ‘’हां’’</p>
<p>      जब मास्‍टर बाहर चले गये तब शिष्‍यों ने पूछा इसका क्‍या मतलब हुआ। मास्‍टर चेंग     ने कहा, ‘’हमारे मास्‍टर का मार्ग है: वफादारी है, सोच।‘’</p>
<p>      मास्‍टर ने कहा: भले आदमी की मौजूदगी में सतत सोचो कि तुम उसके जैसे कैसे हो सको। बुरे आदमी की मौजूदगी में अपनी आंखें भीतर मोड़ लो।</p>
<p>      मास्‍टर ने कहा: पुराने जमाने में व्‍यक्‍ति अपने शब्‍दों पर नियंत्रण रखता था क्‍योंकि उसे यह डर होता था कि अगर वह शब्‍दों को आचरण में न उतार सके तो उसकी कितनी बेइज्‍जती होगी।</p>
<p>      मास्‍टर ने कहा: सज्‍जन यह ख्‍याति चाहता है कि वह बोलने में धीमा है लेकिन काम करने में तेज है।</p>
<p>      मास्‍टर ने कहा: जान युंग भला है लेकिन बोलने में कमजोर है।‘’</p>
<p>      मास्‍टर ने कहा: उसे अच्‍छा वक्‍ता होने  की जरूरत क्‍या है?</p>
<p>            जो होशियारी के साथ दूसरों को नीचा दिखाते है वे कभी लोकप्रिय नहीं होते। वह भला है या नहीं। यह मैं नहीं जानता लेकिन उसे कुशल वक्‍ता बनने की कोई जरूरत नहीं है।‘’</p>
<p>      मास्‍टर ने कहा:  साइ यू दिन में सोता था। सड़ी हुई लकड़ी का शिल्‍प नहीं बन सकता। और न ही सूखे गोबर के कंडों से बनी दीवाल पर पलास्टर लग सकता है। में उसे डांट भी दूँ तो क्‍या फायदा।</p>
<p>      मास्‍टर ने कहा: एक समय था जग मैं लोगों की बातें बड़े गौर से सुनता था और मान लेता था कि वे उनके शब्‍दों पर अमल करेंगे। और अब ने केवल उनकी बातों को सुनता हूं वरन वे जो कहते है उस पर भी नजर रखता हूं। त्‍साई यु के साथ मेरा जो तजुर्बा था उसे यह बदलाहट आई है।</p>
<p>      मास्‍टर ने कहा: मुझे जो सिखाया गया था, उसे मैंने यथावत हस्‍तांतरित किया, उसमें अपनी और सक कुछ भी जोड़ा नहीं। मैं प्राचीनों के प्रति निष्‍ठावान था और उनसे प्रेम करता था। मैं मौन होकर सुनता रहा और जो कहा गया उसे आत्‍मसात करता गया। मैं सीखने से कभी थका नहीं और जो सीखा उसे दूसरों को सिखाने से भी निश्‍चय ही ये गुण है जिनका मैं दावा कर सकता हूं। ये ख्‍यालात मुझे उद्विग्‍न करते है कि मैंने अपनी नैतिक शक्‍ति की और ध्‍यान नहीं दिया, मेरी शिक्षा को पूरा नहीं किया, कि मैंने ईमानदार लोगों के बारे में सुना लेकिन मैं उनके पास नहीं गया,  मैंने दुर्जनों के बारे में सुना लेकिन मैं उन्‍हें सुधार नहीं सका।</p>
<p>      विश्राम के समय मास्‍टर का मिज़ाज सहज और मुक्‍त होता था। उनके भाव हमेशा प्रसन्‍न और सजग होते थे।</p>
<p><strong>ओशो का नज़रिया:</strong></p>
<p>      मुझे कन्‍फ्यूशियस बिलकुल पसंद नहीं है, और उसमें मुझे कोई अपराध भाव महसूस नहीं होता। मुझे बड़ा हल्‍का लग रहा है यह सोचकर अब यह किताब में दर्ज हो रहा है। कन्‍फ्यूशियस और लाओत्से समसामयिक थे। लाओत्से उम्र में थोड़ा बड़ा था। कन्फ्यूशियस लाओत्से से मिलने भी गया था। लेकिन कंपते हुए वापस आया। जड़ें हिल गई थीं, पसीना-पसीना हो गया था।</p>
<p>      उसके शिष्‍यों ने पूछा, ‘’क्‍या हुआ गुफा में? आप दोनों ही थे भीतर, और कोई नहीं था।‘’</p>
<p>      ‘’वह वास्‍तव में खतरनाक है।‘’</p>
<p>      कन्‍फ्यूशियस सच कह रहा था। लाओत्से जैसा आदमी तुम्‍हें मार सकता है। ताकि पुनरुज्जीवित कर सके। और जब तम तुम करने को तैयार नहीं होते तब तक तुम्‍हारा पुनर्जन्‍म नहीं हो सकता है। कन्‍फ्यूशियस अपने ही पूनर्जन्‍म से भाग खड़ा हुआ। मैंने लाओत्से को चुन लिया है। सदा के लिए। कन्‍फ्यूशियस बहुत साधारण, बहुत भौतिक जगत का हिस्‍सा है। ये बात दर्ज हो कि मैं उसे पसंद नहीं करता। वह पाखंडी है। आश्चर्य है कि वह इंग्‍लैंड में पैदा नहीं हुआ। लेकिन उन दिनों चीन इंग्‍लैंड जैसा ही था। उन दिनों इंग्‍लैंड जंगली था, वहशी था, वहां कुछ भी मूल्यवान नहीं था।</p>
<p>      कन्‍फ्यूशियस राजनैतिक था, धूर्त और चालाक था। लेकिन बहुत बुद्धिमान नहीं था। अन्‍यथा वह लाओत्से के चरणों में गिर जाता। भागता नहीं। वह सिर्फ लाओत्से से ही डरा नहीं था, वह मौत से भी डर गया था। क्‍योंकि लाओत्से और मौत एक ही है। लेकिन मैं कन्‍फ्यूशियस की कोई प्रसिद्ध किताब सम्‍मिलित करना चाहता था—सिर्फ उसे न्‍याय देने के लिए ‘’एनेलेक्टस’’ उसकी सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण किताब है। मेरे लिए वह एक वृक्ष की जड़ों की भांति है। कुरूप लेकिन आवश्‍यक—जिसे तुम आवश्‍यक अशुभ कहते हो। एनेलेक्टस एक आवश्‍यक अशुभ है। उसमे वह संसार और सांसरिक विषयों के संबंध में, राजनीति और तमाम चीजों के संबंध में बात करता है।</p>
<p>      एक शिष्‍य ने पूछा, ‘’मास्‍टर मौन के बारे में क्‍या? वह चिढ़ गया, चिल्‍लाया। चीख कर उसने कहा, खामोश, मौन&#8230;. ? मौन का अनुभव तुम कब्र में करोगे। जीवन में उसकी कोई जरूरत नहीं है। बहुत सी महत्‍वपूर्ण चीजें है करने के लिए।‘’</p>
<p>      तुम समझ सकते हो मैं उसे पसंद क्‍यों नहीं करता। उस पर दया आती है। भला आदमी था लेकिन दुर्भाग्‍य श्रेष्‍ठतम व्‍यक्‍ति के, लाओत्से के करीब आकर चूक गया। मैं उसके लिए आंसू गिरा सकता हूं</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>बुक्‍स आय हैव लव्‍ड</strong></p>
<p>( लाओत्से से जब कन्फ्यूशियस मिला और, पहला सवाल यह किया कि धर्म क्‍या है। तब लाओत्से ने उसे कहा था। जिसे तू धर्म कहता है, वह धर्म के जूते तो है ही नहीं, उन जूतों के निशान भी नहीं है। तब कफ्यूशियस इतना डर गया कि उसे बहार आकर अपने शिष्‍यों से कहा इस आदमी की परछाई से भी दूर रहना इसके पास कभी मत जाना।)</p>
<p><strong>स्‍वामी आनंद प्रसाद</strong></p>
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		<title>पोनी एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा—(अध्‍याय—13)</title>
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		<pubDate>Thu, 23 Feb 2012 12:09:55 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[पोनी--एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा]]></category>
		<category><![CDATA[मनसा]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

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		<description><![CDATA[जीवन की किरण उतरी जीवन संघर्ष के वो दिन जीवन में कुछ ऐसे आयाम दे गये जिन आयामों को मैं बिना उनके अंदर से गूजरें हुए उन्‍हें वैसे कभी नहीं जान सकता था। उन्‍हीं दिनों मैंने जाना मनुष्‍य की उपलब्धि &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/02/23/%e0%a4%aa%e0%a5%8b%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%95-3/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4399&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जीवन की किरण उतरी</strong><div id="attachment_4400" class="wp-caption alignright" style="width: 310px"><a href="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/02/dsc00302.jpg"><img src="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/02/dsc00302.jpg?w=300&#038;h=225" alt="pony पोनी एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा--स्‍वामी आनंद प्रसाद" title="pony पोनी एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा--स्‍वामी आनंद प्रसाद" width="300" height="225" class="size-medium wp-image-4400" /></a><p class="wp-caption-text">pony पोनी एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा--स्‍वामी आनंद प्रसाद</p></div></p>
<p>     जीवन संघर्ष के वो दिन जीवन में कुछ ऐसे आयाम दे गये जिन आयामों को मैं बिना उनके अंदर से गूजरें हुए उन्‍हें वैसे कभी नहीं जान सकता था। उन्‍हीं दिनों मैंने जाना मनुष्‍य की उपलब्धि को, उसके प्रेम को, उसकी बौद्धिकता को, उसका स्‍नेह को, उसका अपनापन और लगाव मेरे अंतस के गहरे तक उतर गया। कैसे वो सामर्थ है अपने संगी साथी के सहयोग में। हम दूसरे प्राणी इस विषय में सोच भी नहीं सकते। वो पहली रात मेरे तन मन पर बहुत भारी गुजरी। मेरे पूरे शरीर मैं इतनी बेचैनी की में एक जगह बैठ ही नहीं सकता था। लगता था यहां से उठ कर कही दूर चला जाऊं। कितनी बार उठ-उठ कर में कमरे से बहार गया। एक अजीब सी बेचैनी थी मेरे शरीर में। डा0 ने तो मुझे देख कर ही कह दिया था कोई उम्‍मीद नहीं है। फिर भी मनुष्‍य उम्‍मीद नहीं छोड़ता।  डा0 ने अपना जो अपना काम करना था वो कर दिया। शायद मेरे शरीर में पानी की कमी हो गई थी। ज्‍यादा उलटी और दस्‍त के कारण। उसको दूर करने के लिए उसने ग्लूकोज चढ़ाया। क्‍योंकि मेरा मुहँ तो खुलना ही बंद हो गया था। प्रकृति अपना काम पक्‍का करती है। मरने से पहले आपके मुहँ को बंद कर देगी। आपके जबड़े सख्‍त हो जायेगे। जिससे आप ठोस भोजन मुंह में डाल कर चबा नहीं सकते। क्‍योंकि वह तंत्र एक दम से बेजान हो जायेगा। बस आपके मुहर को सीधा खोल सकते है। प्रकृति अपना काम बड़ी सहजता और सरलता से करती है। आपके शरीर को मिटना है, अब उसमें ठोस जाना बंद होगा। दो या तीन दिन तक आपके मुख में तरल भी जाना बंद हो जायेगा। उस समय पूरा मुख अकड़ कर बंद हो जायेगा। दाँत जबरदस्‍ती बंद हो  जायेगे उनके बीच से केवल आप पानी डाल सकते है।<span id="more-4399"></span> पानी शरीर उसे आखरी वक्‍त तक गृहण करता रहता है। मरने के कुछ क्षण तक भी आप मरीज को पानी पीला सकते हो जूस या दूसरा तरल नहीं। पर मेरा तो मुख ही सुख गया था। जो डा. ने दवाई दी थी वह भी पापा जी बड़े जतन और  जबरदस्‍ती से किसी ड्रोपर में डाल कर मुझे पीला रहे थे। आधी अधूरी ही अंदर जा पाती थी। मुख की अकड़न के कारण मैं उसे घूमा नहीं सकता था। में जानता था पापा जी जो कर रहे है, ये सब मेरी भलाई के लिए ही कर रहे है। पर मैं क्‍या करूं ये सब जो हो रहा था मेरा इस पर कोई जोर है। मेरी पूरे शरीर में एक छटपटाहट एक बेचैनी फेल गई थी। और मुझे कुछ भी अच्‍छा नहीं लग रहा था। ग्लूकोज चढ़ने के बाद मेरे शरीर में कुछ चेन मिला। थोड़ी देर की लिए ठंडक महसूस हुई। और मुझे नींद आने लगी। करीब दो घंटे तक मैं खुब सोया। तीसरे दिन फिर मुझे डा0के यहां जब ले जाया गया तब तक भी मेरी हालत वैसी ही थी। बस मेरे प्राण नहीं निकले थे। साँसे चल रही थी। डा0 को भी बड़ा अचरज हुआ की तीन दिन से मैं जीवन ओर मृत्‍यु से कैसे संघर्ष कर रहा हूं। इस बात का उसे यकीन नहीं हो रहा था। उनको शायद नहीं पता की मुझे मोत भी पापा जी के संग से नहीं छीन पा रही। पापा जी की सेवा और प्रेम मुझे मरने नहीं दे रहा था। वे घंटो मेरे शरीर को अपनी गोद में ले कर मुझे सहलाते रहते।  शायद उनके संग ओर सेवा का ही फल था की मैं नहीं मरा।</p>
<p>      चौथे दिन श्‍याम को अचानक मैं देख रहा हूं मेरा शरीर उस दवाई को अपने अंदर सहजता से जाने दे रहा है। शायद मौत भी पापा जी के प्रेम के आगे हार गयी। और मुझे अपने संग नहीं ले जा सकी। पापा जी दवाई दे रहे है में उन्‍हें डूबती आंखों से देख रहा हूं,  जैसे ही मेंने दवाई को चाटा, पापा जी की आंखों में प्रेम और करूण आंसू बन बहने लगी।  पर उस समय  भी मैं होश में  नहीं था एक नशा और एक मादकता ने मुझे घेर रखा था। लगता था बस आँख बंद कर के सो जाऊं। एक सुखद गहरी नींद। कोई मुझे छेड़े ना। क्‍या मोत में इतना सुख और आनंद है। फिर क्‍यों हम इससे डरते है। शायद किसी अंजान भय के कारण ही हमें पीड़ा होती है। ग्लूकोज का पानी मेरे मुहँ में डाला। मैं पी गया। उन्‍हें कुछ उम्‍मीद दिखलाई दी। क्‍यों डा0 ने तो पहले कह दिया था कि अभी कोई उम्‍मीद नहीं है। क्‍योंकि मेरा मुंह अकड़ कर एक दम से बंद हो गया था। आंखे भी वह बहुत गहरे में चली गई थी। पर इतना भर था कि मेरी श्‍वास चल रही थी। पर ग्लूकोज का पानी मेरे मुख में अंदर जाने से एक उम्‍मीद की किरण जगी। कुछ घंटो बाद पापा जी मेरे लिए आइस क्रीम लेकर आये। उन्‍होंने जबरदस्‍ती मुख खोल कर मेरे मुख में चम्मच से उसे डाली। मैं खाना नहीं चाहता था। कुछ तो बहार गिर गई। कुछ जो  मुख में रह गई। उस के कारण मैने धीरे-धीरे अपने मुख को हिलाया। अभी भी मुख काफी अकड़ा हुआ था। पर अंदर का हिस्‍सा कुछ मुलायम हो गया था। मैने जीभ से आस पास लगी आइसक्रीम को चाटनें की कोशिश की। शायद यह चार पाँच दिन बाद मेरे शरीर ने कोई खाद्य पदार्थ ग्रहण किया था। उसके बाद में थोड़ा चला। शरीर एक दम सुख कर पंजर हो गया था। चलने में भी मुझे चक्‍कर आ रहे थे। मैं अपने आप को किसी ऊँचाई पर चलता हुआ महसूस कर रहा था। जैसे की अभी गरी और तभी गिरा। सारी चीजें हिलती डुलती नजर आ रहा था। पर अंदर से लगता था दो कदम चलू। चार पाँच कदम के बाद में रूक कर इधर उधर देखने लगा। एक दो गहरी सांस ली। पापा जी ने मेरे सर और पूरे शरीर पर प्रेम से हाथ फेरा। मेरे अंदर एक नई उर्जा का संचार हुआ और में बहार दस-पंदरह कदम चल कर वापस आकर बिस्‍तरे पर लेटे गया। इतना चलने पर ही मैं थक गया। और मैंने आंखे बंद कर ली। कुछ देर इस तरह आँख बंद किये लेटे रहना अच्‍छा लग रहा था। लेटे रहने और दवाई के कारण मेरे शरीर में कुछ जीवंतता सी महसूस हुई।</p>
<p>      कुछ देर बाद जब मेंने आंखे खोली तो मेरी पेट की आंतें कुछ काम करने लगी। इतने दिन से तो पेट का कुछ पता ही नहीं था। अब लगा शरीर ने काम करना शुरू कर दिया। दो-तीन मिनट में इधर उधर देखता रहा। कि मैं कहां पर हूं। सामने ग्लूकोज का पानी भरा था मुझे अंदर से प्‍यास लगी थी।  मैं उठ और उठ कर अपने आप ही उस कटोरे से पानी पीने लगा। पानी मैंने गले से होकर पेट तक जा रहा था। इससे पहले ऐसा कभी महसूस नहीं हुआ था। कितनी ही बार मैंने पानी पिया था। मैंने जी भर कर पानी पिया। उस का स्‍वाद कुछ अकबका सा था। पानी पीने के बाद में फिर बहार चला गया। लगा शु-शु कर लू। कुछ ही बुंदे सूसू की टपकी शायद सारे शरीर का पानी उलटी और दस्‍त के सहारे बह गया था।। मैं वापस आकर बिस्‍तरे पर बैठ गया। पाप जी वो आइसक्रीम का कप ले कर आये और मुझे चटाने लगे। मुझे वह ठंडी और मीठी बहुत अच्‍छी लग रही थी। में पापा के चेहरे पर उतरती तृप्ति को देख रहा था। कि मुझे खाता देख कर उनकी आँखो में एक खास तरह की खुशी है। जो हम पशु कभी महसूस कर सकते। शायद हम बंधे है किसी पास में। और मनुष्‍य मुक्‍त हो गया। हम केवल अपने पेट के लिए जीते है। और मनुष्‍य प्रेम और तृप्‍ति के सहारे उसके पार चला गया है।</p>
<p>      अगले दिन फिर मुझे डा0 के यहां ले जाया गया। और जब मुझे सुई लगाई गई तो में बहुत डर गया और लगा छटपटाने। आज मुझे पहली बार वहां पर लेटना अच्‍छा नहीं लग रहा था लग रहा था कि किसी कैद में फंस गया हूं। काफी देर तक मुझे जबरदस्‍ती वहां पर लिटा दिया गया। मैने बार-बार अपने को छुड़ाने की कोशिश की। पर मेरा मुंह एक पटी से बाँध रखा था और मुझे चारों और से पकड़ रखा उस समय मुझे बहुत भय लग रहा था। अब मेरी समझ आया की न जाने ये लोग मेरा क्‍या करने वाले हे। कोई प्राणी कभी किसी पर भरोसा नहीं करता। न जानें वो खुद को सबसे ज्‍यादा समझ दार समझता है। काफी देर तक उस पर लेटे रहने से मैं बेचैन हो गया। जब छोड़ा गया तो चेन की सांस ली और जब मेरा मुख से पट्टी खोल दि गई तब मैं सब को भौंकने लगा। की तुम ने मुझे क्‍यों बाँध दिया, तुम सब बेकार हो&#8230;मुझे सता रहे हो&#8230;.इत्‍यादि—इत्‍यादि।</p>
<p>      मेरी इस हरकत पर सब लोग बड़ी जोर से हंसने लगे। तब मुझे और भी अजीब लगा की मैं तो गुस्‍सा कर रहा हूं और ये सब हंस रहे है। तब पापा जी ने वहां से एक बिस्कुट का एक बड़ा डिब्‍बा लिया और मेरे लिए एक लाल रंग का बजने वालो खिलौना। जो मेरे पास करीब दो साल तक रहा। मैं बहुत बड़ा होकर भी उस खिलौने से खेलता था। उसे कोई भी उठा लेता तो मैं परेशान हो जाता। सब परिवार के लोग मेरी इस हरकत पर हंसते की बूढ़ा लोग हो गया अब</p>
<p>भी खिलौनों से खेलता है। एक तो वो एक्‍टोपस और एक जिराफ़ मुझे अंत तक बहुत प्‍यारे रहे। मैं बड़ा होने के बाद भी जब उन खिलौनों  से खलता तो मुझे अपने बचपन की याद ही नहीं आती में वहां खुद चला ही जाता। मेरा बचपन मेरे अंदर से निकल कर बहार आ कर मेरे साथ खेलने लग जाता था।</p>
<p>      इस बीच मुझे नींद बहुत आती थी। मैं थोड़ी देर खेलता और थक कर सो जाता। शायद ये शरीर की अपनी प्रकिया है। वो नींद में अपना इलाज करता है। और नींद में अपना विकास करता है। पर मुझे ठीक होने मैं ज्‍यादा दिन नहीं लगे। दस-बारह दिन में काफी ठीक हो गया। इतना की मैं दौड़ कर जंगल जाने के लिए भी तैयार था। अब जैसे-जैसे मेरे शरीर में ताकत आ रही थी, तब  मुझे लगता की मैं भागू-दौडू और खेलूँ। मेरा बहुत मन करता की मैं जंगल में जाऊँ और उस नरम मुलायम रेत में दौड़ लगाऊं। आखिर मेरे मन की बात पापा जी ने सुन ही और एक सुबह जंगल जाने की तैयारी करने लगे। क्‍योंकि जंगल जाने के लिए पापा जी दूसरे जूते पहनते, हाथ में डंडा लेते। मेरी चेन उनके हाथ में होती। तब में एक दम से समझ जाता की अब मजा आयेगा। मैं और पापा जी कभी-कभी अकेले भी जंगल चले जाते थे। क्‍योंकि बच्‍चों को तो स्‍कूल जाना होता था। इस लिए वह तो छुट्टी के दिन ही जा सकते थे। पापा जी ने मुझे अपनी गोद में उठा लिया। और मैं इधर-उधर चारों और देखता हुआ गोद में बैठा बड़ा गर्व महसूस कर रहा था। हमारी दूकान रास्‍ते में ही पड़ती थी। जब हम दुकान पर पहुँचे तब मेंने देखा वहाँ पर ममि जी थी। ममि जी ने मुझे अपनी गोद में लेना चाहा पर। मैं पापा जी से चिपट गया। मुझे लगा की ममि जी मुझे अपने पास रख लेगी और मेरा जंगल जाना टल जायेगा। मेरी इस हरकत पर ममि-पापा जोर से हंसे की देखो कितना बेईमान है। जब खाना लेना होता तो कैसे ममि के पीछे-पीछे दौड़ता है। और अब ऐसा करता है। जैसे ममि को जानता ही नहीं। हम हंसी खुशी जंगल की और चल दिये।</p>
<p>      गांव की सीमा खत्‍म होने के बाद पाप जी ने मुझे जमीन पर उतार दिया। कच्‍ची मिट्टी ने जैसे ही मेरे पैरो को छुआ। मेरे मन को पंख लग गये। में बेतहाशा दौड़ा। पापा जी भी मेरे साथ-साथ दौड़ें और मुझसे आगे निकल गये। मेरे छोटे-छोटे पेर और पापा जी के इतने बड़े पैरो और कदम कहां था हमारा मुकाबला और मैं कैसे कर सकते है। पर हार जीत की परवाह किसे थे। और किसे मेड़ल चाहिए था। यहां तो केवल दौड़ना भर और आनंद था। पाप जी दो पैरो से खड़ा होकर दौड़ते थे जबकि मैं चार पैरों से दौड़ लगा रहा था। मुझे नहीं पता था कि जब में बड़ा हो जाऊँगा तो पापा जी को पीछे छोड़ दूँगा। इस बात की तो मैं कभी कलपना ही नहीं था। एक दिन जंगल जाते हुए जब मैंने वरूण भैया को पीछे छोड़ा तो मुझे यकीन ही नहीं हुआ। फिर तो में पल में वरूण दीदी, हिमांशु भैया को भी पीछे छोडने लगा। हाँ पापा को पीछे छोड़ने के लिए मुझे काफी समय लगा। पर जब एक बार मुझे भरोसा हो गया कि में सब को पीछे छोड़ सकता हूं। तब तो मेरे अंहकार के कहना ही क्‍या था। उस मुलायम रेत पर पैर रखते ही मानों मुझे पंख लग जाते थे। बस फिर कोई पकड़ता या गोद में उठाता तो मुझे अच्‍छा नहीं लगता था। पर थोड़ी ही दूर दौड़ने के कारण मेरी साँसे फूल गई। मेरा सारा शरीर पसीना-पसीना हो गया। अंदर से जी मिचलाने लगा। और मुझे चक्र आने लगे। में वहीं बैठ कर पापा जी का इंतजार करने लगा। कुछ ही देर में पापा जी आते दिखाई दिये। पर ये क्‍या मुझे पूरी पृथ्‍वी घूमती हुई नजर आ रही थी। में समझ गया था कि अभी में ठीक नहीं हुआ हूं। पापा जी ने पास आ कर मुझे गोद में उठाया। मेरे बदन को सहलाया। मुझे कुछ आराम मिला। मैंने आंखे बद कर ली। थोड़ी ही देर में मुझे लगा की मैं फिर नीचे उतरू जाऊं, और में कुं&#8230;कुं&#8230;कुं.. कर के रोने लगा और नीचे उतरने कि ज़िद करने लगा। पापा जी ने मुझे फिर से नीचे उतार दीया।</p>
<p>      अब की बार मैं तेज नहीं दौड़ा। अब अपनी कानूनी करवाई। करता हुआ चला। एक झाड़ी से मुझे कुछ जानी पहचानी सी खुशबु आई। मैं गर्दन डाल कर सूँघने लगा। इतनी देर में दो तीतर निकल कर फुर्र&#8230;.से उड़ गये। मैंने भी डर के मारे पा यूं&#8230;.की आवाज की और पीछे की और भागा। बाद मैं मैने देखा अरे ये तो तीतर थे जो मुझे से डर कर उड़ गये थे। इतनी देर में आगे खाली चोंडा मैदान आ गया। सामने ही तीन चार गाय की तरह से दिखने वाले कुछ पशु चर रहे थे। पापा जी कुछ पीछे थे। में उस खुले मैदान में नरम घास में उछल-उछल कर उन की और दौड़ने लगा। क्‍योंकि न तो वह गाय लग रही थी। और ने ही घोड़ा। उनके पैरो के निशान को सूंघकर भी मेरी समझ में नही आ रहा था कि ये कौन सा जानवर हे। अब भला आप भी कहेंगे। नाहक परेशानी अपने सर मोल ले रहा हूं। मुझे क्‍या लेना देना। शायद इसी बात के कारण मनुष्‍य गहरी तमस में चला गय। वह आस पास की हर वस्‍तु को जो उसके काम की न हो उसे छोड़ता चला जाता है। पर हम तो नहीं छोड़ सकते हम जीवित कैसे रहेगें। आस पास के खतरे का जब तक हमे भान न हो। अब उन के पैरों के निशान घोड़ की तरह थे। गाये, बकरी, भेस&#8230;आदि के पैर आगे से दो हिस्‍सों में बटे होते है। जिसके कारण ही शायद वह घोड़ और खच्‍चर के कारण तेज नहीं दौड़ पाती है। क्‍योंकि उनके पैरो की दो फाड़ उनकी आधी उर्जा को दो हिस्‍सों में बांट देती है। और उनकी चौडाई जमीन को छू कर अधिक हो जाती है। जबकि घोड़े के पैर नीचे से छोटे होते है। इसी कारण वह कम जमीन को घेरते है। और गुरूत्व शक्ति को जल्‍दी तोड़ कर उठ जाते है। पर इनके पैर भी गाय तरह से न हो कर घोड़ों की तरह से थे।</p>
<p>      उन गाये जैसे दिखने वाले जानवरों का मेरी और अधिक ध्‍यान नहीं गया। एक तो शायद में छोटा था दूसरा में घास में छुप-छुप कर जा रहा था। मैं बिलकुल उनके नजदीक पहुंच गया। तब उनमें से एक ने मुझे देखा। और अपनी पूछ खड़ी कर ली। और मुझे गोर से देखने लगी। तब जाकर मुझे एहसास हुआ की में खतरे में हूं। क्‍यों कि अगर ये मुझे पर हमला कर देती तो मैं भाग भी नहीं सकता था। बीमारी के कारण मैं कमजोर था। दूसरा घास में इतना तेज दोड ही नहीं सकता था। अब वह गाये जैसी दिखने वाला पशु मेरी और बढ़ा। मैं वही पर कान बोच कर बैठ गया। वह मेरी और अपने पैने सींग कर आगे बढ़ी। इतनी देर में सब पशुओं का ध्‍यान मेरी और हुआ। अब तो में समझ गया मैंने अपनी शामत नाहक ही बुलवाई। पर अचानक सब के कान खड़ हुए और फुर&#8230;.मय..मय..कर के इतनी तेज गति से छोड़ी की मैं देखता ही रह गया। इतनी तेज दौड़ना वाला पशु मैंने अभी तक जीवन में नहीं देखा था। इतना बड़ा घास का वह मैदान वह पलक झपकते ही पार कर पेड़ो के झुरमुट में गायब हो गई। तब मेरी समझ में आया की अचानक क्‍या हुआ था। उन्‍होंने पापा जी को आते देख लिया था। और मानव से सभी पशु-पक्षी डरते है। पापा जी को में जब तक दिखाई नहीं दिया था। वह जोर-जोर से मुझे आवाज मार-मार कर बुला रहे थे। पोनी&#8230;..पोनी&#8230;&#8230;.पोनी&#8230; अब ये शब्‍द तो मेरी समझ में नहीं आते थे। के मैं आपने नाम के पुकारने को पहचान सकूँ। पर उन शब्दों से जो ध्वनि बनती थी। मैं उस से पहचान करता था। जैसे, पानी, पोनी,  खाना, दूध&#8230;.धीरे धीरे मेरे मस्‍तिष्‍क  में और–और शब्‍दों पहचाने की शमता बढ़ती जा रही थी। और ये कार्य पूरे जीवन भर चलता रहा। मैं अपने डर को भूल कर पापा जी आवाज की और तेज गति से दौड़ा। पर चार कदम दौड़ा ही था कि लगा मैं मरा। मेरा पूरा शरीर मोत की लहर सी दौड़ गई, पूरा शरीर पसीन से तर बतर हो गया।  मैं और जितनी तेज गति से उछल सकता था उतना ही उछला। मेरे मुख से प्याऊ की भी आवाज नहीं निकली। एक सांप के आकार की उसकी केंचुली फैली हुई थी। जल्‍द बाजी और डर के कारण मैंने उसे सांप समझ लिया। सांप की केंचुली को देख कर मैं इतना क्‍यों डर गया। अब ये सब हमारे अचेतन में कहीं बसा होगा। वरना तो इस जन्‍म में मैंने अभी तक सांप क्‍या होता वह तो कभी जाना ही नहीं था। और नहीं ये विकास मुझे पीढ़ी दर पीढ़ी ही मिला क्‍यों मैं अपनी मां के साथ एक महीने भर भी नहीं रह सका। इस छोटी सी उम्र में कितना सीख पाया होऊंगा। पर ये प्रकृति का विशाल खेल है। मनुष्‍य ने तो जो जाना है। वह अपनी अगली पीढ़ी को सिखाता है बताता है।</p>
<p>      खैर वहां से हम गहरे नाले की और चल दिये। पानी और पेड़ो की अधिकता के कारण वहां पर हवा में कुछ अधिक ठंडक थी। मेरे शरीर में इतने पसीने आने के बावजूद भी मुझे वह ठड़ का अहसास हुआ। नाले के आस पास उगी डाब बहुत ही उँची थी उसकी कोमल मुलायम पत्तों को देख कर मेरा खाने को मन हुआ। पर वह मेरी पकड़ के बहार थे। क्‍यों अंदर पेट में कुछ अजीब सी बेचैनी हो रही थी। लगता था। कुछ बहार निकलना चाहता है। मैंने वहां खड़ा हो कर उस घास को सूंघा और अगले पैरो पर खड़े हो कर तोड़ने की कोशिश की। ये सब पापा जी देख रहे थे। वह समझ गये की मेरा क्‍या मन कर रहा है। वह हंसे और घास की मुलायम पत्‍तियां तोड़ कर मुझे खिलाने लगे। मैंने पूछ हिला कर उन्‍हें चबा कर अंदर करने लगा। पर ज्‍यादा पत्‍ते अंदर नहीं ले जा पाया। पेट ने जवाब दे दिया। अब में नीचे की और भागा। नरम मुलायम ठंडी रेत में घसीटता चला गया। नाला बहुत ही गहरा था। उसके अंदर की शांति बड़ी अजीब थी। बरसात के दिनों में जब यह भर कर चलता था तो इसे पार करना मौत को दावत देने जैसे है। इसका बहाव बहुत ही तेज और खतरनाक होता है। पूरी जंगली पहाड़ी का पानी इतनी बेग से बहता है की जंगल को यह नाला दो हिस्सों में बांट देता है। जो उधर रह गया। उसे घंटो इंतजार करना होता है। पानी के कम होने का। कितनी ही गर्मी हो इसमें आपको हमेशा सीतल जल मिलेगा ही। मैं भी भाग कर नीचे उतरा एक बार पीछे मुड़ कर देख भी लेता था कि पापा जी आ रहे है या नहीं। क्‍यों सच बताऊ इस नाले की शांति और गहराई के कारण मुझे बहुत ही डर लगता है। लगता है को आस पास की झाड़ियों से निकलेगा और मुझे दबोच लगा। मैंने घुटनों तक पानी में घुस कर खुब पानी पिया। पेट एक दम टिड्डा हो गया। और मैं दौड़ता हुआ उस पानी को पार कर गया। और भाग कर उपर की और चढ़ने लगा। नाले के आस पास उगे उचे वृक्षों के और गहराई के कारण वहां दिन में भी बहुत कम धूप आती थी। सूरज की रोशनी उपर की फुनंगियों पर ही अटक कर रह जाती था। उपर चढ़ते ही मेरे पेट में उमड़-घुमड़ हुई और मुझे जोर से उलटी आ गई। पर यह पहले जैसी उलटी नहीं थी। इसमें मेरी खाई हुई घास के साथ पीत का  पीला पानी था। इससे मुझे बहुत ही अच्‍छा लगा। कुछ देर तो सर और आंखे भारी हुई पर थोड़ी ही देर में मैं ठीक महसूस करने लगा। जंगल में आना मेरे लिए वरदान जैसा ही था। क्‍योंकि मां के पास मैं क्‍या कुछ सीख पाया। जंगल में प्रकृति का विकास बहुत सरलता और सहजता से होता है। मनुष्‍य के साथ रह कर मुझे वो सब सीखना पड़ रहा है जिस की हम कल्‍पना भी नहीं कर सकते। उसके शब्‍द तो मेरी पहचान में नहीं आते पर बार-बार उच्‍चारण करने के कारण उनकी ध्वनि मैं समझने लगा था। अब मैंने रहना मनुष्‍य के संग साथ  है। उसके आदर्श उसकी नैतिकता के बिना वहां पर रहना ना मुमकिन ही समझो। अब सामने खाने की कोई वस्‍तु रखी है। हमें अपने स्‍वभाव को दबा कर उसे नहीं खाना। कितनी मुश्‍किल से ये आदत मैने सीखी है। सामने खाना हो और उसे छोड़ दिया जाये तो आप बच लिए। पर मनुष्‍य के संग ऐसा नहीं है। सामने खाना हो आप ने खा लिया तो आपकी शामत आई। बहुत कुछ वह मैंने और मेरी जाति के अनेक साथियों ने ये सब सिखा है। और इस सब के कारण हम मनुष्‍य के ह्रदय के अंदर तक आ बसे है। जंगल में जा कर मैं स्‍वछंद हो जाता था। वहां सूंघकर देखता और हर चीज को समझने की कोशिश करता। कभी किसी तितली के पीछे भागता। कभी किसी खरगोश के पीछे, कभी कसी जंगली मुर्गी-या तीतर को पकड़ने की नाकाम कोशिश करता। मैं सोच रहा था की अगर मुझे यहां पर जीना होता तो मैं कैसे जीता। कौन मुझे भोजन देता। बहुत जीवट परिवर्ती के ही प्राणी जंगल में जीवित रह सकते है। कुदरत हमारे साथ ही नहीं सभी प्राणियों के साथ कुरूर है। और दूसरी तरफ से देखे तो करूणा वान भी क्‍योंकि हमारे प्रकृतिक विकास में बहुत जल्‍दी करती है। वरना अगर मेरी कुदरती विकास प्रकृति ने मेरे अचेतन में न संजोया होता तो। कितनी गड़बड़ हो जाती। मनुष्‍य को ही देखिये इसकी प्रौढ़ता कितनी देर में आती है। हमारी प्रौढ़ता की तरह से अगर इसे छोड़ दिया जाये तो इसका जीना मुश्किल ही नहीं असंभव है।</p>
<p>      अब एक चीज और समझने की है। हजारों पशु पक्षियों में क्‍यों हम मनुष्‍य के इतने करीब आ गये। कि डाइनिंग रूम ही नहीं हम किचन और बेड़ रूम में भी उसके साथ। सोने लगे। अगर दूसरे प्राणी ये देखे तो यकीन नहीं होगा। पर उसके लिए हमने आने स्‍वभाव में अनगिनत  बदलाव करने पड़े। मनुष्‍य के अनुरूप ढालना पडा। खोया भी बहुत पर उसके बदले पाया भी बहुत। पर जंगल में आकर में अपने छूटे स्‍वभाव के करीब आ कर उसे जी लेता था। उससे अचेतन में एक खास किस्म की तृप्‍ति महसूस होती थी। लेकिन देखना आज नहीं कल जंगली जानवरों का आस्‍तित्‍व ही खतरे में नहीं है। हमारा भी आस्‍तित्‍व खतरे में है। शायद जंगली जानवर तो एक प्रतिशत बच भी जाये पर हमें सबसे पहले विलुप्‍त होना होगा। बढ़ते शहरी करण और गाड़ियों की तादाद से न हमारी जाती के लिए रहने की जगह नहीं बची। और ही प्रजनन के लिए कोई स्‍थान बचा। अगर सौ पैदा होते है तो मेरे हिसाब से केवल दस ही बच पाते है। कब तक ढो सकेंगे इस अनुपात को। सड़क पर आते जाते वाहनों को पार करना, एक पूरे जीवन का सबक है। अगर आप बच गये तो नया अनुभव देखने को मिलेगा। वरना तो सब पहले ही अनुभव मे खत्‍म। जीवन बहुत कठिन होता जा रहा है। फिर कुदरती ही मार ही नहीं, मनुष्‍य भी बदल रहा है। उसकी संवेदनशीलता कम होने से हमारा पुश्तैनी राज सिंहासन भैरव के गण वाली बात लोप होती जा रही है। लोगो के मन में दया कम हो गई, पेट भरना दूबर होता जा रहा है। पर हम पालतू के लिए ये सब सोचने की जरूरत नहीं है। क्‍योंकि कोई भी दयावान ही हम अपने घर में स्‍थान देगा। और रही कंजूसियत की बात तो लाख टके की बात ही इसे समझो की अगर कोई कंजूस है तो वह अगर अपनी कंजूसी तोड़ना चाहता है। तो वह एक कुत्‍ता पाल ले। बस टूट गई पल में। पर कंजूस आदमी हमें पालते ही नहीं। वही लोग हमें पालते है। जिनके ह्रदय में प्रेम और दया है। और एक राज की बात आज आप से कह रहा हूं इसे मेरा अंहकार मत समझना। आप मेरी हर बात को जीवन का एक नीचोड़ ही समझों। अगर आपके घर में प्रेम नहीं है तो आप एक कुत्‍ते को पाल लो। वह कदम-कदम आपके घर में प्रेम फैला देगा। और दूसरी बात कहीं भी कोई पागल बच्‍चा हो या बुढ़ा, वह जब भी हम कुत्‍तो को देखेगा तो लगेगा मारने। जो हमे मार रहा हो&#8230;उसे मारता देख कर ही आप समझ सकते है। या तो वह पागल है, या आने वाले किसी जन्‍म में पागल पन की और बढ़ रहा है। मैं तो इतना दावे के साथ कहता हूं कि किसी पागल को अगर हमारे साथ रख दिया जाये तो चंद दिनों में स्‍वास्‍थ हो जायेगा। हम उसके पागल पन का हरण कर लेगे। पर ऐसा हो नहीं सकता। क्‍योंकि पागल आदमी हमारे पास आयेगा ही नहीं&#8230;.फिर कौन सड़क के आवारा और असहायों पर ही दया करेगा। जिन से हमें कोई डर नहीं। हर पल गलियों में किसी की लात&#8230;.किसी कि घुडक खाकर जीते जो रहे है। देखो कब तक&#8230;.</p>
<p>      आप भी सोचते होगें। में बहुत चिंतन मनन करता हूं। पर क्‍या करूं संग साथ का प्रभाव तो होता ही है। दूसरे कुत्तों की बनस्‍पत मेरा मस्‍तिष्‍क कुछ अलग तरह से काम कर रहा हे। खाली उर्जा दर्शन शास्त्र ही बन जाती है। भोग से ही कविता का जन्‍म होता है। मजदूरी में कहीं कविता फूटती देखी है।</p>
<p><strong>स्‍वामी आनंद प्रसाद ‘’मनसा’’</p>
<p>(पोनी एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा)</strong></p>
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			<media:title type="html">pony पोनी एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा--स्‍वामी आनंद प्रसाद</media:title>
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		<title>दि बुक ऑफ ली तज़ु—(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)</title>
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		<pubDate>Wed, 22 Feb 2012 12:10:57 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[ओशो की प्रिय पूस्‍तके--]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

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			<content:encoded><![CDATA[<p>कन्‍फ्यूशियन दर्शन के बाद, ताओ वाद की बहुत बड़ी दार्शनिक परंपरा है। ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में ताओ दर्शन प्रौढ़ हुआ। और तभी से ताओ ग्रंथों में किसी ली तज़ु नाम के रहस्‍यदर्शी का उल्‍लेख पाया जाता है। जी तज़ु जो हवाओं पर सवार होकर यात्रा करता था। उसकी ऐतिहासिकता भी संदिग्‍ध है। पता नहीं उसका समय क्‍या था। कुछ सुत्रों के अनुसार वह ईसा पूर्व 600 में हुआ, और कुछ कहते है 400 में पैदा हुआ। ली तज़ु एक व्‍यक्‍ति भी है, और दर्शन भी। कहते है ली तज़ु पु-तिएन शहर में रहता था। और चालीस साल तक किसी ने उसकी दखल नहीं ली। और राज्‍य के उच्‍च पदस्‍थ और राजसी परिवार के लोग उसे सामान्‍य आदमी समझते थे। चेंग में सूखा पडा और ली तज़ु ने वेइ जाने का फैसला लिया।<span id="more-4394"></span></p>
<p>      उसके नाम से जो किताब प्रचलित है वह कहानियों, निबंधों और कहावतों का संकलन है। किताब के आठ परिच्‍छेद है। उनमें से ‘’याँग चु’’ शीर्षक से जो परिच्‍छेद है वह सुखवाद का समर्थन करता है। बाकी सात परिच्‍छेदों का संकलन ताओ तेह किंग और च्‍वांग तज़ु के बाद सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण किताब बन गई है। चीनी विद्वानों के मुताबिक यह किताब 300 ईसवी में संकलित की गई थी। यह ताओ वाद का दूसरा सृजनात्‍मक काल था।</p>
<p>      ताओ अर्थात मार्ग, या कहें वह नियम जिससे आस्‍तित्‍व की हर चीज संचालित होती है। आकाश, पृथ्‍वी और उनके बीच की असंख्‍य वस्‍तुएं जो एक नियम से जीती है—रात और दिन, ऋतुऐ विकास और विनाश जन्‍म मृत्‍यु। सिर्फ मनुष्‍य को ही उसके नियम की जानकारी नहीं है। प्राचीन समय के ऋषि जीने का सही ढंग जानते थे और राज करते थे।</p>
<p>      ताओ वाद बनने के लिए दार्शनिक होने की आवश्‍यकता नहीं है। उसे बौद्धिक तर्क-वितर्क में पड़ने की जरूरत नहीं है। वह लोगों को सूत्रों, कहानियों और कविताओं के द्वारा मार्ग दर्शन करता है। ली तज़ु की ताकत उसकी जीवंत अद्भुत हास्‍यपूर्ण कहानियों में है। पश्‍चिम के बुद्धिवाद मस्‍तिष्‍क के लिए ताओ कुछ ज्‍यादा ही साधारण और बेबूझ लगता है। ताओ वाद इसी विश्‍व में रहते है लेकिन उन्‍हें वह इतना निराशा जनक नहीं लगता जितना पाश्‍चात्‍य लोगों का लगता है।</p>
<p>      ली तज़ु के इस परिच्‍छेद में ताओ वाद का दृष्‍टिकोण झलकता है। तुम्‍हारा अपना शरीर तुम्‍हारी मलकियत नहीं है। यह एक आकार है जो तुम्‍हें धरती और आकाश ने दिया है। तुम्‍हारे जीवन पर तुम्‍हारा कोई अधिकार नहीं है, वह तुम्‍हारी ऊजाओं के बीच हुआ मेल है जो धरती और आकाश ने कुछ समय के लिए दिया है। तुम्‍हारा स्‍वभाव और तुम्‍हारी तकदीर तुम्‍हारी अपनी नहीं है, वह एक मार्ग है धरती और आकाश द्वारा बनाया हुआ। तुम्‍हारे बच्‍चे और पोते तुम्‍हारे नहीं है। धरती और आकाश ने तुम्‍हारे शरीर से पैदा किया है। जैसे कीड़े अपनी चमड़ी को छोड़ देते है। तुम धरती और आकाश की श्‍वास हो जो बाहर भीतर जाती है। तुम उस पर मलकियत कैसे कर सकते हो।</p>
<p>      चीनी दर्शन में ची या प्राण आस्‍तित्‍व का बुनियादी तत्‍व है जिससे विश्‍व बना है। शुन्‍य में से ची प्रगट हुआ। अपने स्‍त्रोत पर वि विशुद्ध और हल्‍का था। लेकिन सधन होते-होते उसके दो हिस्‍से बने। जो हल्‍का था वह आकाश बना और जो भारी था वह पृथ्‍वी बना।</p>
<p>      ली तज़ु या चीनी दर्शन बहुत विधायक है, उसे सर्व स्‍वीकार है। उसके बुनियादी तत्‍व है:</p>
<p>      1—जो विपरीत है वे एक दूसरे के परि पूर्वक है। और एक के बिना दूसरा संभव नहीं है।</p>
<p>      2—व्‍यक्‍ति का होना भ्रांति है। व्‍यक्‍ति का जन्‍म और मृत्‍यु ची के अंतहीन रूपांतरण में घटने वाली घटनाएं है।</p>
<p>      3—शून्‍यता, जिससे हम आये है, हमारा असली घर है। उससे हम ज्‍यादा देर भाग नहीं सकते है।</p>
<p>      4—मृत्‍यु कैसी होती है इसकी हम कल्‍पना भी नहीं कर सकते इसलिए डरने का कोई सवाल ही नहीं है। शायद मृत्‍यु का हम जीवन से अधिक मजा ले सकते है।</p>
<p>      ली तज़ु का आदर्श सब कुछ त्यागना नहीं है। वरन बहुत पैनी संवेदनशीलता को जगाना और प्रतिसंवेदन करने की क्षमता है। ‘’मेरे शरीर का मेरे मन के साथ तालमेल है, मेरे मन का ऊर्जाओं के साथ मेरी ऊर्जा का आत्मा के साथ और आत्‍मा का शून्‍य के साथ तालमेल है।</p>
<p>      ‘’जब सूक्ष्‍म से सूक्ष्‍म चीज या हल्‍की सी ध्‍वनि मुझे प्रभावित करती है तो चाहे वह सुदूर आठ सीमाओं के पार हो या मरी भौहों और पलकों के बीच हो। मैं उसे जान जाता हूं। हालांकि मुझे यह पता नहीं है कि मैं उसे सिर के साथ छेदों द्वारा जानता हूं। या मेरे चार अंगों द्वारा या मेरे ह्रदय या पेट के द्वारा। वह केवल आत्‍मज्ञान है।</p>
<p>      ‘’जब मेरे भीतर और बाहर सब समाप्‍त हो गया, मेरी आंखें मेरे कानों जैसी हो गई। मेरे कान नाक जैसे, मेरी नाक मुंह जैसी हो गई। तब सब एक हो गया।</p>
<p>      ‘’ मेरा मन एकाग्र हुआ और शरीर शिथिल अस्‍थियां और मांस धुल मिल गया। मुझे ख्‍याल नहीं आया कि मेरा शरीर किस पर टिका है और पैर कहां जा रहे है। मैं हवा की मानिंद पूरब पश्‍चिम बहता रहा। मानो सूखा हुआ पत्‍ता या घास हो। और मैं कभी जान नहीं सका कि हवा मुझे पर सवार है या हवा पर।‘’</p>
<p>      अगर तुम्‍हारे भीतर कुछ भी सख्‍त नहीं हो</p>
<p>      तो बहार की चीजें स्‍वयं ही प्रगट कर देंगी</p>
<p>      गति करो तो पानी जैसे बहो</p>
<p>      प्रतिध्‍वनि जैसे प्रतिसंवेदित होओ</p>
<p>      ली तज़ु और पूरा चीनी दर्शन मृत्‍यु के अहसास से भरा है। उसकी बहुत सी कहानियां मृत्‍यु के संबंध में है।</p>
<p>      ताओ दर्शन में एक तरह की निर्दोषिता है जो बच्‍चों की सी सरलता से अद्भत लोक, रोमांच और किवदंतियों में विश्‍वास करती है। जैसे, उनकी कहानियों में सम्राट मरते समय आकाश में उड़ जाता है। यह हकीकत तो नहीं हो सकती। लेकिन यह आस्‍था कि दृश्‍य जगत के पार कुछ है जो अज्ञात है, ताओ वाद की संवेदना का महत्‍वपूर्ण हिस्‍सा है। प्राचीन चीन में अल्‍केमिस्‍टों का एक संप्रदाय शारीरिक अमरता में विश्‍वास रखता था और उस दिशा में रसायनों की खोज करता था। लेकिन वे ताओ वाद की मुख्‍य धारा का हिस्‍सा कभी नहीं बने।</p>
<p>      ली तज़ु का दर्शन भी कहानियों से बना हुआ है। ये छोटी-छोटी कहानियां वह सब कह देती है जो बड़े-बड़े दर्शन शास्‍त्र नहीं कह पाते।</p>
<p><strong>ली तज़ु की कहानियां</strong></p>
<p>      ली तज़ु      ची जा रहा था लेकिन आधे रास्‍ते से वापस लौट आया। रास्‍ते में उसे पो हुन वू जेन मिला। उसने पूछा कि वह बीच में ही क्‍यों लौट आया?</p>
<p>      ‘’मैं किसी बात से चौंक गया, सावधान हुआ।‘’</p>
<p>      ‘’किस बात से?’’</p>
<p>      ‘’मैंने देस होटलों में खाना खाया और पाँच होटलों में उन्‍होंने मुझे पहले परोसा।‘’</p>
<p>      ‘’ अगर इतनी सी बात है तो तुम चौंक क्‍यों गये?’’</p>
<p>      ‘’जब व्‍यक्‍ति की आंतरिक एकात्मता दृढ़ नहीं होती तो उसके शरीर से कुछ रिसता है और उसके आभा मंडल में प्रविष्‍ट होता है। और वह बाहरी तल पर लोगों को उसे सम्‍मान देने के लिए विवश करता है। उससे वरिष्ठ और श्रेष्‍ठ लोगों की बजाएं। और उससे वह मुश्‍किल में पड़ जाता है।</p>
<p>      होटल वाले का एकमात्र मकसद उसके चावल और दाल बेचकर पैसा कमाना होता है। उसका लाभ बहुत थोड़ा है। अगर ऐसे लोग जिनको मेरे से इतना थोड़ा लाभ होना है, एक ग्राहक के नाते मेरी इतनी इज्‍जत करते है तो दस हजार रथों का मालिक, जिसके राजकाज में अपना शरीर जर्जर कर लिया है और अपना ज्ञान खाली कर लिया है। उसके साथ यह घटना और भी बदतर नहीं होगी? ची का राजकुमार मुझे किसी पर नियुक्‍त करेगा और आग्रह करेगा कि मैं कुशलता से काम करूं। इससे मैं सावधान हो गया।‘’</p>
<p>      बहुत बढ़िया नजरिया है। लेकिन तुम यहां रह गए तो बाकी लोग तुम पर जिम्‍मेदारी डालेंगे।‘’</p>
<p>      थोड़े ही समय बाद, जब पो-हुन बू-जेन ली तज़ु से मिलने गया तो ली तज़ु का बरामदा अतिथियों के जूतों से भरा हुआ था। पो-हुन-बू जेन उत्‍तर की और अभिमुख होकर खड़ा हुआ। (ली तज़ु गुरु के आसन पर दक्षिण की और अभिमुख था।) वहां कुछ देर खड़े रहने के बाद कुछ कहे बगैर वह चल दिया। द्वारपाल ने ली तज़ु को खबर की। ली तज़ु जूते हाथ में लेकर नंगे पाँव दौड़ पडा और द्वार के पास उसे पकड़ा।</p>
<p>      ‘’अब चुंकी आप आ गये। है महाराज क्‍या मुझे मेरी औषधि नहीं देंगे?’’</p>
<p>      ‘’पो-हुन-वू-जेन बोला, ‘’बहुत हो गया। मैंने तुझे विश्‍वास पूर्वक कहा था कि लोग तेरे ऊपर जिम्‍मेदारी डालेंगे। और उन्‍होंने डाल दी। ऐसा नहीं है कि तुम उन्‍हें रोकने में सक्षम नहीं हो। लोगों पर ऐसा प्रभाव पड़ने से तुम्‍हें क्‍या मिलता है। जो तुम्‍हारी अपनी शांति को भंग करता है? अगर तुम दूसरों को प्रभावित करना ही चाहते हो तो वह तुम्‍हारे बुनियादी केंद्र को विचलित कर देगा।‘’</p>
<p>   ****                 ****                      ****</p>
<p>      त्‍झु कुंम पढ़ाई कर-करके थक गया। उसने कन्‍फ्यूशियस से कहा, ‘’मुझे विश्राम खोजना है।‘’</p>
<p>      ‘’जिंदा लोगों के लिए विश्राम नहीं है।‘’</p>
<p>      ‘’तो क्‍या मैं उसे कभी नहीं पा सकूंगा।‘’</p>
<p>      ‘’पाओगे। तुम्‍हारी कब्र के विशाल, गुंबद समान टीले की प्रतीक्षा करो, और जान लो कि तुम्‍हें विश्राम कहां मिलेगा।‘’</p>
<p>      ‘’मौत महान है। भद्र जनों को उसमे विश्राम मिलता है और क्षुद्र आदमी उसमे पनाह ढूँढता है।‘’</p>
<p>      त्झु कुंम, तुम समझ गये। सभी लोग जीवन की खुशी को समझते है। उसके दुःख को नहीं। बुढ़ापे की थकान को जानते है। उसकी सहजता को नहीं। मृत्‍यु की कुरूपता को जानते है। उसके विश्राम को नहीं।‘’</p>
<p> ****              ****            ****</p>
<p>      ली तज़ु हु तज़ु के साथ पढ़ाई कर रहा था। हु तज़ु ने उससे कहा, ‘’जब तुम पीछे रहना जानोंगे तब मैं तुम्‍हें सिखाना शुरू करूंगा कि कैसा आचरण हो।‘’</p>
<p>      ‘’कृपया कर मुझे पीछे रहना सिखाये।‘’</p>
<p>      ‘’तुम्‍हारी छाया को देखो और तुम समझ जाओगे।‘’</p>
<p>      ली तज़ु ने पीछे मुड़कर अपनी छाया का निरीक्षण किया। जब उसका शरीर झुका तब उसकी छाया तिरछी था। जब उसका शरीर सीधा था, तब छाया सीधी थी। तो झुकना या सीधे खड़े रहना शरीर पर निर्भर करता है न कि छाया पर। और हम सक्रिय हों या निष्‍क्रिय यह दूसरों पर निर्भर करता है, न कि स्‍वयं पर।</p>
<p>      ‘’पीछे रहकर आगे रहने का यहीं मतलब है।‘’</p>
<p>****              ****               ****</p>
<p>      कुआन मिन न ली तज़ु से कहां, ‘’यदि तुम्‍हारे शब्‍द सुंदर या असुंदर है तो वैसी ही उसकी प्रतिध्वनि होगी। यदि तुम्‍हारी आकृति छोटी या लंबी हो तो वैसी ही उसी छाया होगी। शोहरत प्रतिध्‍वनि है। आचरण छाया है। इसलिए कहते है:</p>
<p>      अपने शब्‍दों के प्रति सावधान रहना।</p>
<p>      क्‍योंकि कोई न कोई उनसे सहमत होगा।</p>
<p>      अपने आचरण की फ्रिक करना</p>
<p>      कोई न कोई उसकी नकल करेगा।</p>
<p>****            ****                ****</p>
<p>      कन्‍फूशियस लू-लियांग जलप्रपात को देख रहा था। पानी सौ फीट छलांग लगा रहा था। और तीस मील तक उसका फेन उछल रहा था। वह ऐसी जगह थी जहां मछलियाँ, कछुए और मगरमच्‍छ नहीं तैर सकते थे। लेकिन वहां उसने एक आदमी को तैरते हुए देखा। यह सोचकर कि कोई किस्‍मत का मारा अपनी जान देने पर उतारू है। उसने एक शिष्‍य को उस आदमी को बचाने के लिए भेजा। लेकि कुछ दूरी तक तैरने के बाद वह आदमी बाहर आया। और गुनगुनाता हुआ किनारे पर चलने लगा।</p>
<p>      कन्‍फूशियस ने उससे पूछा, ‘’मैंने सोचा तुम कोई भूत-प्रेत हो लेकिन तुम तो आदमी दिखाई देते हो। क्‍या मैं पूछ सकता हूं कि पानी से गुजरने का कोई तिलिस्‍म तुम्‍हें आता है।‘’</p>
<p>      ‘’नहीं कोई तिलस्‍म नहीं आता। मेरे लिए तो जन्‍म जाता है, उससे मैंने शुरू आत की है। जो नैसर्गिक है उसमे मैं पला और नियति पर श्रद्धा कर मैं प्रौढ़ हुआ। मैं भीतर आनेवाले के प्रवाह के साथ भँवर में उतरता हूं और बहार जानेवाले प्रवाह के साथ बाहर निकलता हूं। पानी पर अपने स्‍वभाव को थोपने की बजाये मैं पानी के स्‍वभाव के पीछे चलता हूं। इस प्रकार मैं पानी से संबंधित होता है।‘’</p>
<p>      ‘’क्‍या मतलब है तुम्‍हारा? थोड़ा स्‍पष्‍ट करोगे?’’</p>
<p>      ‘’मैं जमीन पर पैदा हुआ, इस लिए जमीन पर सुरक्षित हूं—यह जन्‍मजात है। मैं पानी पर पला इसलिए पानी में सुरक्षित हूं—ये नैसर्गिक है। और मैं बिना यह जाने उसे कहता हूं कि मैं यह कैसे करता हूं—यह नियति में श्रद्धा करना हुआ।‘’</p>
<p>****              ****               ****</p>
<p>      ली तज़ु जरूरतमंद था। उसके चेहरे पर खाली पेट होने के निशान थे। एक अतिथि ने चेंग के मुख्‍य मंत्रि झु याँग से यह बात कही, ‘’ली तज़ु मार्ग को जानेवाला, ज्ञानी व्‍यक्‍ति है। अगर आपके राज्‍य में रहते हुए वह भूखा रहता है तो यह सोचा जायेगा कि आप उदार शास्‍ता नहीं है।‘’</p>
<p>      झु याँग ने फौरन आदेश देकर उसे भेंट स्‍वरूप आनाज भिजवाया। ली तज़ु उसके संदेश वाहक से मिलने बाहर आया। दो बार झुक कर धन्‍यवाद दिया और भेंट अस्‍वीकार कर दी।</p>
<p>      जब संदेशवाहक चला गया और ली तज़ु घर में आया तो उसकी पत्‍नी आंखे तरेरकर उसे देखने लगी और कहा, मैंने सुना है कि मार्ग को जाननेवाले ज्ञानियों के पत्‍नी और बच्‍चे आराम से रहते है। लेकिन अब, जबकि भुखमरी हमारे चेहरों पर लिखी हुई है, और मंत्रि आपको भोजन भेज रहा है, आप उसे लेने से इंकार कर रहे है। लगता है हमारे भाग्‍य में दुःख ही लिख हुआ है।‘’</p>
<p>      ली तज़ु ने मुस्‍कराते हुए कहा, ‘’ऐसा नहीं है कि मंत्रि मुझे निजी तौर पर जानता है, उसने किसी और के कहने पर मुझे अनाज भेजा है। मतलब, कभी वह मेरी निंदा भी करना चाहे तो वह दूसरे के कहने पर करेगा। इसलिए मैंने स्‍वीकार नहीं किया।‘’</p>
<p><strong>ओशो का नजरिया:</strong></p>
<p>      ली तज़ु पराकाष्‍ठा है ताओ त्‍ज़ु और च्‍वांग त्‍ज़ु की उसकी किताब अपरिसीम रूप से सुंदर है इसलिए मैं उसे अपनी सूची में सम्‍मिलित करता हूं।</p>
<p><strong>ली तज़ु कौन था?</strong></p>
<p>      पश्‍चिम के विद्वान ली तज़ु के बारे में परेशान रहे है—ऐसा कोई व्‍यक्‍ति हुआ भी या नहीं। यह काफी विवादास्‍पद है। उन्‍होंने इस पर कड़ी मेहनत की है कि ऐसा कोई व्‍यक्‍ति सचमुच में हुआ है। पूरब के लिए यह पूरी विद्वता मूर्खतापूर्ण है। यह कोई अर्थ नहीं रखता है कि ऐसा कोई व्‍यक्‍ति हुआ या नहीं। यदि तुम मुझसे पूछे कि वह हुआ या नहीं, मेरे लिए दोनों बराबर है। जिसने भी ये सुंदर कहानियां लिखी है, वह ली तज़ु है—कोई भी। एक बात तय है कि किसी ने ये सुंदर कहानियां लिखी है। इतना तो पक्‍का है। क्‍योंकि कहानियां है।</p>
<p>      अब, कहानियां ली तज़ु नाम के व्‍यक्‍ति ने लिखी है या किसी दूसरे नाम के व्यक्ति ने, उससे क्‍या फर्क पड़ता है? उससे कहानियों में कुछ जुड़ेगा नहीं, वे पूर्ण है। उससे कहानियां से कुछ कम नहीं होगा। ली तज़ु ऐतिहासिक व्‍यक्‍ति है या नहीं। यह इन कहानियों को कैसे प्रभावित कर सकता है? ये कहानियां इतनी सुंदर है, उनका अंतनिर्हित मूल्‍य है। एक बात तय है कि किसी ने उनको लिखा है—पर उसका नाम क्‍या था, इसे लेकिन परेशान क्‍यों हो, वह ली तज़ु था या कोई ओर?</p>
<p>      यह हो सकता है कि ये कई लोगों द्वारा लिखी गई हो, तब भी कोई समस्‍या नहीं है। जिसने भी ये कहानियां लिख है उसने ताओ की चेतना को जीया है। इसके बिना यह लिखी नहीं जा सकती। एक व्‍यक्‍ति ने लिखा हो या अनेक व्‍यक्‍तियों ने, परंतु जब भी ये कहानियां लिखी गई है कोई ताओ चेतना के गहरे में उतरा है, किसी ने जीवन का अर्थ जाना है। किसी के पास दर्शन है।</p>
<p>      ली तज़ु संदेहास्‍पद है। वह किसी भी तरह से ऐतिहासिक व्‍यक्‍ति नहीं है। उसने कोई पदचिह्न नहीं छोड़ा है। या तो वह कोई ऐतिहासिक व्‍यक्‍ति नहीं था। या कोई महान घोड़ा था। मेरे लिए ये गैर महत्‍वपूर्ण है। वह महान घोड़ा था जिसने कभी धूल नहीं उड़ाई और अपने पीछे कोई राह नहीं छोड़ी।</p>
<p>      उसने अपने आपको पूरी तरह से भुला दिया। मात्र यह छोटी-सी पुस्तक है—‘’दि बुक ऑफ ली तज़ु’’ इन छोटी सी कथाओं के साथ। यह ली तज़ु के बारे में कुछ नहीं कहती है।</p>
<p>      ली तज़ु हो सकता है। कि कोई स्‍त्री हो। वह हो सकता है कि आदमी हो। कौन जानता है? वह चीनी हो सकता है, वह तिब्‍बती हो सकता है। कौन जानता है? हो सकता है वह हुआ ही नहीं हो। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। परंतु इन कथाओं का मूल्‍य है। ये कथाएं द्वार है।</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>ताओ, दी पाथलेस पाथ, भाग—2</strong></p>
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		<title>प्रेम को रिश्‍ता मत बनाओ—उर्मिला मातोंडकर</title>
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		<pubDate>Sun, 19 Feb 2012 12:45:57 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
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<p><strong>प्रसिद्ध फिल्‍म अभिनेत्री उर्मिला मातोंडकर</strong></p>
<p><strong>ओशो</strong></p>
<p>      ‘’तथाकथित संबंध बहुत सुंदर और सतरंगी सपनों के साथ शुरू होते है। परंतु शीध्र ही वे अत्‍यंत दुःख और गहरे विषाद के साथ समाप्‍त होते है। इसीलिए नये मनुष्‍य के बारे में मेरी जो दृष्‍टि है उसमे बह दूसरों से जुड़ेगा तो सही परंतु किसी प्रकार का रिश्‍ता नहीं बनायेगा—भविष्‍य के लिए किसी तरह का वादा या कल के लिए कोई बंधन नहीं खड़ा करेगा। आज स्‍वयं में पूर्ण है, इसका भरपूर आनंद लो। यदि तुम कल भी एक दूसरे के साथ रहना चाहते हो तो बहुत अच्‍छा है। यदि तुम नहीं रहना चाहते हो तो एक दूसरे के प्रति अनुग्रह भाव के साथ अलग हो जाओ, क्‍योंकि एक दिन तुमने एक दूसरे को परम आनंद और ख़ुशियाँ दीं, और यह बढ़िया है कि इसके पहले कि चीजें कटु हों तुम्‍हें अलग हो जाना चाहिए। कम से कम तुम्‍हारी यादों में वे खुबसूरत क्षण हमेशा महकते जीवंत वह ताजा रहेगें।‘’</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>दि गोल्डन फ़्यूचर</strong></p>
<br />Filed under: <a href='http://oshosatsang.org/category/%e0%a4%af%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a5%88/'>ये क्‍या कहते है ?</a> Tagged: <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/'>ओशो</a>, <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6/'>स्‍वामी आनंद प्रसाद</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/oshosatsang.wordpress.com/4391/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/oshosatsang.wordpress.com/4391/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/oshosatsang.wordpress.com/4391/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/oshosatsang.wordpress.com/4391/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/oshosatsang.wordpress.com/4391/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/oshosatsang.wordpress.com/4391/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/oshosatsang.wordpress.com/4391/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/oshosatsang.wordpress.com/4391/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/oshosatsang.wordpress.com/4391/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/oshosatsang.wordpress.com/4391/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/oshosatsang.wordpress.com/4391/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/oshosatsang.wordpress.com/4391/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/oshosatsang.wordpress.com/4391/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/oshosatsang.wordpress.com/4391/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4391&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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			<media:title type="html">urmila ; उर्मिला मातोंडकर--ये क्‍या कहते है (ओशो)</media:title>
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		<title>ओशो के प्रवचन पेंटिंग्‍स है—एम एफ हुसैन</title>
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		<pubDate>Sun, 19 Feb 2012 11:48:21 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[ये क्‍या कहते है ?]]></category>

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		<description><![CDATA[हर कोई ओशो के प्रवचनों में से कुछ चून लेता है। मुझे उनमें एक पेंटिंग्‍स बनती नजर आती है। बिना किसी बुश और कैनवास के। कलाकार के लिए ओशो कहते है कि सारे तकनीक छोड़ दो और शुन्‍य चित दशा &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/02/19/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%9a%e0%a4%a8-%e0%a4%aa%e0%a5%87%e0%a4%82%e0%a4%9f%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b8/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4386&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>हर कोई ओशो के प्रवचनों में से कुछ चून लेता है। मुझे उनमें एक पेंटिंग्‍स बनती नजर आती है। बिना किसी बुश और कैनवास के।<div id="attachment_4387" class="wp-caption alignright" style="width: 310px"><a href="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/02/mf-hussain-01-090611_073318.jpg"><img src="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/02/mf-hussain-01-090611_073318.jpg?w=300&#038;h=222" alt="ये क्‍या कहते है--ओशो" title="mf-hussain-ये क्‍या कहते है--ओशो" width="300" height="222" class="size-medium wp-image-4387" /></a><p class="wp-caption-text">ये क्‍या कहते है--ओशो</p></div></p>
<p>      कलाकार के लिए ओशो कहते है कि सारे तकनीक छोड़ दो और शुन्‍य चित दशा में कला का सृजन करो। इस बात से मैं सौ फीसदी सहमत हूं। इस स्‍थिति में ही कला में वह अनगढ़, शक्‍तिशाली तत्‍व आ सकेगा जो कि वास्‍तविक सृजन का स्‍त्रोत है।</p>
<p>      इस बात को मैंने तब महसूस किया जब ओशो के प्रवचनों को चित्रित करने के लिए में बंबई गया था। सूफियों पर उनके प्रवचन चल रहे थे। अब सूफियों की रूहानी मोहब्‍बत पर ओशो जैसा आदमी बोल रहा हो तो यह मौका तो मैं छोड़ने वाला नहीं था।<span id="more-4386"></span> म्यूज़िशियन के लाइव म्‍यूजिक को पेंटिंग्‍स में उतारने का मेरा सिलसिला शुरू हो चुका था। सो सोचा कि सूफियों पर ओशो के प्रवचनों को भी पेंटिंग्‍स में जरूर उतारूंगा। ओशो की और से भी इजाज़त मिल गई। मुझे याद है कि जब ओशो  का प्रवचन शुरू हुआ तो दिमाग तो न जाने कहां काफूर हो गया। दिल को कभी लगे कि यह आवाज़ म्‍यूजिक है, कभी लगे कि कोई डांस कर रहा है। और कभी अहसास हो कि कोई पेंटिंग सजाई जा रही है। बस कैनवास पर क्‍या उतरता चला गया, मालूम नहीं। न कोई तकनीक, सिर्फ एक शून्‍य चित दशा। उस समय मैं अपने सृजन के स्‍त्रोत को रूबरू था।</p>
<p>      1977-78 में मैं फिर पूना आया और ओशो के प्रवचन सुने। जैसे हर कोई ओशो के प्रवचनों में से कुछ न कुछ चुन लेता है। मुझे उनमें हमेशा एक पेंटिंग बनती नजर आई। बिना किसी ब्रश और कैनवास के। उनके प्रवचन एक पेंटिंग है जिनमें हम जितनी बार उतरें उतनी बार नए रंग खिलते चले जाएंगे।</p>
<p><strong>एम एफ हुसैन</p>
<p>विख्‍यात चित्रकार  </strong></p>
<br />Filed under: <a href='http://oshosatsang.org/category/%e0%a4%af%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a5%88/'>ये क्‍या कहते है ?</a>  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/oshosatsang.wordpress.com/4386/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/oshosatsang.wordpress.com/4386/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/oshosatsang.wordpress.com/4386/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/oshosatsang.wordpress.com/4386/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/oshosatsang.wordpress.com/4386/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/oshosatsang.wordpress.com/4386/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/oshosatsang.wordpress.com/4386/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/oshosatsang.wordpress.com/4386/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/oshosatsang.wordpress.com/4386/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/oshosatsang.wordpress.com/4386/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/oshosatsang.wordpress.com/4386/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/oshosatsang.wordpress.com/4386/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/oshosatsang.wordpress.com/4386/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/oshosatsang.wordpress.com/4386/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4386&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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	</item>
		<item>
		<title>मुल्‍ला नसरूद्दीन कौन था—(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)</title>
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		<pubDate>Sat, 18 Feb 2012 13:29:54 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[ओशो की प्रिय पूस्‍तके--]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

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		<description><![CDATA[कई देश मुल्‍ला नसरूद्दीन को पैदा करने का दावा करते है। टिर्की में तो उसकी कब्र तक बनी हुई है। और हर साल वहां नसरूद्दीन उत्‍सव मनाया जाता है। उस उत्‍सव में मुल्‍ला जैसी पोशाक पहनकर लोग उसके क़िस्सों को &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/02/18/%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%80%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%8c%e0%a4%a8-%e0%a4%a5%e0%a4%be/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4384&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>कई देश मुल्‍ला नसरूद्दीन को पैदा करने का दावा करते है। टिर्की में तो उसकी कब्र तक बनी हुई है। और हर साल वहां नसरूद्दीन उत्‍सव मनाया जाता है। उस उत्‍सव में मुल्‍ला जैसी पोशाक पहनकर लोग उसके क़िस्सों को अभिनीत करते है। एस्‍किशहर उसका जन्‍म गांव बताया जाता है।</p>
<p>      ग्रीन लोग नसरूद्दीन के क़िस्सों को अपनी लोककथा का हिस्‍सा बनाते है। मध्‍ययुग में नसरूदीन के क़िस्सों का उपयोग तानाशाह अधिकारियों का मजाक उड़ाने के लिए किया जाता था। उसके बाद मुल्‍ला नसरूदीन सोवियत यूनियन का लोक नायक बना। एक फिल्‍म में उसे देश के दुष्‍ट पूंजीवादी शासकों के ऊपर बाजी मारते हुए दिखाया गया था।</p>
<p>      मुल्‍ला मध्‍यपूर्व और उसके आसपास बसने वाली मनुष्‍य जाति के सामूहिक अवचेतन का हिस्‍सा बन गया। कभी वह बहुत बुद्धू बनकर सामने आता है तो कभी बहुत बुद्धिमान। उसके पास कई रहस्‍यों के भंडार है। सूफी दरवेश उसका उपयोग मनुष्‍य के मन के अजीबो गरीब पहलुओं को उजागर करने के लिए किया करते थे।<span id="more-4384"></span></p>
<p>      विद्वानों की कलम की बहुत सी स्‍याही नसरूद्दीन को कागज पर उतारने पर खर्च हुई है। जबकि नसरूदीन के पास उनके लिए कोई वक्‍त नहीं है। सूफी, जो कि विश्‍वास रखते है कि गहरी अंत: प्रज्ञा ज्ञान की पथप्रदर्शक है, इन कहानियों को ध्‍यान विधियों की तरह इस्‍तेमाल करते है। वे साधकों से कहते है कि इनमें कुछ मनपसंद कहानियों को चुनकर उन पर मनन करो और उन्‍हें जज़्ब करो। इस तरह उच्‍चतर प्रज्ञा में तुम्‍हारा प्रवेश होगा।</p>
<p>      मुल्‍ला नसरूदीन को ऐतिहासिक व्‍यक्‍ति मानने की गलती न करें तो ही इसके मिथक को समझा जा सकता है। मुल्‍ला की लोकप्रियता का राज रही है। कि वह हर इंसान के भीतर बसता है। वह मानवीय मन का ही एक साकार रूप है। मुल्‍ला के लतीफ़ों को समझने के लिए कोई बड़ी दार्शनिक विद्वता नहीं चाहिए। एक ही बात आवश्‍यक है—अपने आप पर हंसने की क्षमता।</p>
<p>      मुल्‍ला: दरवेशों का मुखिया और परिपूर्ण सदगुरू था। कई लोग कहते है, मैंने सीखना चाहा लेकिन यहां मुझे सिर्फ पागलपन मिला। फिर भी गहरी समझ को कहीं और खोजेंगे तो पायेंगे।</p>
<p><strong>नसरूद्दीन और ज्ञानी&#8211;</strong></p>
<p>      दरबार में नसरूद्दीन के खिलाफ मुकदमा चल रहा था। दार्शनिक, तर्कशास्‍त्री और कानून के विद्वानों को नसरूदीन की जांच करने के लिए बुलाया गया था। मामला संगीन था। क्‍योंकि नसरूदीन ने कबूल किया था कि वह गांव-गांव घूमकर कहता था कि तथा कथित ज्ञानी लोग अज्ञानी, अनिश्‍चय में जीन वाले और संभ्रमित होते है।</p>
<p>      उस पर इल्‍जाम लगाया गया कि वह राज्‍य की सुरक्षा का सम्‍मान नहीं कर रहा है।</p>
<p>      सम्राट ने कहा, ‘’तुम पहले बोलों।‘’</p>
<p>      मुल्‍ला ने कहा, ‘’पहले कागज और कलम ले आओ।‘’</p>
<p>      कागज और कलम मंगवाये गये।</p>
<p>      ‘’इनमें से सात लोगों को ये दे दो और उनसे कहो कि वे सब एक सवाल का जवाब लिखें, ‘’रोटी क्‍या है?’’</p>
<p>      उन सबने अपने-अपने कागज पर लिखा। वे कागज सम्राट को दिये गये और उसने उन्‍हें पढ़कर सुनाया:</p>
<p>      पहले ने लिखा—रोटी एक भोजन है।</p>
<p>      दूसरे ने लिखा—वह आटा और पानी है।</p>
<p>      तीसरे ने लिखा—खुदा की भेट है।</p>
<p>      चौथे ने लिखा—सींका हुआ आटा है।</p>
<p>      पांचवें ने लिखा—आप किस चीज को रोटी कहते है इस पर निर्भर है।</p>
<p>      छठे ने लिखा—एक पोषक तत्‍व।</p>
<p>      सांतवे ने लिखा—कोई नहीं जानता कि रोटी क्‍या है।</p>
<p>      नसरूद्दीन ने कहा: ‘’जब वे सब मिलकर यह तय नहीं कर पाये कि रोटी क्‍या है तब बाकी चीजों के बारे में निर्णय ले सकेंगे। जैसे मैं सही हूं या गलत। क्‍या आप किसी की जांच परख या मूल्‍यांकन करने का काम ऐसे लोगों को सौंप सकते है। क्‍या अजीब नहीं है कि उस चीज के बारे में एक मत नहीं हो सकता जिसे वे रोज खाते है। और फिर भी मुझे काफिर सिद्ध करने में सभी राज़ी हो गए। उनकी राय का क्‍या मूल्‍य है?</p>
<p><strong>तस्‍करी&#8211;</strong></p>
<p>      नसरूदीन गधे पर बैठ कर पर्शिया से ग्रीस बार-बार जाता था। और हर बार वह घास की गठरियां ले जाता था। सरहद के संतरी घास को उघाड़ कर बारीकी से छानबीन करते लेकिन उसमे कुछ भी नहीं मिलता। लौटते समय वह खाली हाथ लौटता।</p>
<p>      संतरी पूछते, ‘’तुम क्‍या ले जा रहे हो नसरूदीन।‘’</p>
<p>      ‘’मैं एक तस्‍कर हूं।‘’</p>
<p>      नसरूदीन की अमीरी बढ़ती गई और वह ईजिप्‍त जाकर बस गया। वर्षों बाद कस्‍टम का एक अधिकारी उसे मिला और उसने पूछा :’’मुल्ला अब जबकि तुम ग्रीस और पर्शिया के इलाके से बहार हो, इतनी शान औ शौकत से रह रहे हो। तुम क्‍या चुराकर ले जाते थे जिसे हम कभी पकड़ नहीं पाये।</p>
<p>      गधे, नसरूदीन ने कहा।</p>
<p><strong>मैं उसे अच्छी तरह जानता हूं&#8211;</strong></p>
<p>      एक दिन लोग दौड़ते हुए मुल्‍ला नसरूदीन के पास आये। उन्‍होंने हांफते हुए कहा, ‘’मुल्‍ला तुम्‍हारी सास नदी में गिर गई। और वहां बहाव तेज है, वह समुंदर में बह जायेगी।</p>
<p>      पलक झपकते ही नसरूदीन नदी में कूद पडा और बहाव से उल्‍टे तैरने लका।</p>
<p>      लोग चिल्‍लाए, ‘’नहीं-नहीं, मुल्‍ला नीचे की और। व्‍यक्‍ति यहां से नीचे की और ही बह सकता है।</p>
<p>      मुल्‍ला ने कहा: ‘’सुनो मैं अपनी सास को अच्‍छी तरह से जानता हूं, अगर हम कोई नीचे की और बहता हो तो मेरी सास को ऊपर की और खोजना पड़ेगा।‘’</p>
<p><strong>राज दरबार में&#8211;</strong></p>
<p>      एक बार जगमगाती हुई पगड़ी पहन कर नसरूदीन दरबार में दाखिल हुआ। वह जानता था कि राजा उसे पसंद करेगा। और वह पगड़ी को उसे बेचने में सफल हो सकता है।</p>
<p>      ‘’मुल्‍ला, तुमने इस शानदार पगड़ी की क्‍या कीमत चुकाई।</p>
<p>      ‘’हजार स्‍वर्ण मुद्राएं सरकार।‘’</p>
<p>      वजीर मुल्‍ला की चाल को समझते हुए राजा के कान में फुसफुसाया: कोई बुद्धू ही इस पगड़ी की इतनी कीमत दे सकता है।</p>
<p>      तुमने इतनी ज्‍यादा कीमत क्‍योंकर चुकाई। हजार स्‍वर्ण मुद्राओं की पगड़ी कभी सूनी नहीं।</p>
<p>      बादशाह सलामत मैंने इसलिए दीं क्‍योंकि मैं जानता था पूरी दुनियां में एक ही बादशाह है, जो इसकी कीमत दे सकता है।</p>
<p>      राजा ने उसकी प्रशंसा से प्रसन्‍न होकर नसरूदीन को दो हजार स्‍वर्ण मुद्राएं दे दी।</p>
<p>      बाद में मुल्‍ला ने वज़ीर को बताया: ‘’तुम्‍हें पगडियों की कीमत पता होगी लेकिन मुझे राजाओं की कमजोरी पता है।‘’</p>
<p><strong>खाने की चीज और पढ़ने की चीज&#8211;</strong></p>
<p>      नसरूदीन बाजार से एक कलेजा खरीदा और वह उसे ले जा रहा था। दूसरे हाथ में उसे पकाने की विधि लिखा हुआ कागज था जिसे एक मित्र के पास से लाया था।</p>
<p>      अचानक चील ने झपट्टा मारा और उसके हाथ से कलेजा लेकर उड़ गई।</p>
<p>      नसरूदीन ने चिल्‍लाकर कहा, ‘’अरे मूरख, मांस ले गई तो ले जा, लेकिन उसे बनाने की विधि तो मेरे पास ही है।‘’</p>
<p><strong>किसी और की चिट्ठी&#8211;</strong></p>
<p>      नसरूदीन की लिखावट अच्‍छी नहीं थी। उसकी पढ़ने की क्षमता और भी खराब थी। लेकिन गांव के बाकी लोगों की अपेक्षा वह ज्‍यादा पढ़ा लिखा था। एक दिन एक आदमी का उसके भाई को संबोधित पत्र लिखने के लिए नसरूदीन तैयार हो गया।</p>
<p>      उस आदमी ने कहा, ‘’तुमने जो लिखा है उसे पढ़कर सुनाओ, मैं यह पक्‍का करना चाहता हूं कि कुछ रह तो नहीं गया।</p>
<p>      मुल्‍ला ने अपनी लिखाई पर नजर डाली। ‘’मेरे प्‍यारे भाई’’ से आगे वह पढ़ ही नहीं पाया। तब उसे इधर उधर देख कर कहां की कुछ समझ नहीं आ रहा की क्‍या लिखा है आगे।</p>
<p>      उस आदमी ने कहा, गजब है, तुम ने अभी-अभी आपने ही हाथ से सब लिखा है, और खुद तुम ही नहीं पढ़ पा रहे हो, फिर भला दूसरा इसे कैसे पढ़ सकता है।</p>
<p>      नसरूदीन ने कहा, पर भाई ये मेरी समस्‍या नहीं है। मेरा काम है, लिखना, सो मैंने लिख दिया। अब आगे वाले पढ़े या न पढ़े मैं क्‍या कर सकता हूं।</p>
<p>      वह गांव का आदमी मान गया। उसने कहा, ‘’और फिर चिट्ठी तुम्‍हारे लिए भी तो नहीं है।‘’</p>
<p><strong>ओशो का नजरिया&#8211;</strong></p>
<p>      मुल्‍ला नसरूद्दीन काल्‍पनिक चरित्र नहीं है। वह सूफी था। और उसकी मजार अभी तक है। लेकिन वह ऐसा आदमी था कि अपनी कब्र में जाकर भी उसने मज़ाक करना न छोड़ा। उसने ऐसी वसीयत लिखवाई कि उसकी कब्र का पत्‍थर मात्र एक दरवाजा हो, जिसपर ताला लगा हो। और चाबियां समुंदर में फेंक दी हों।</p>
<p>      अब यह अजीब है। लोग उसकी कब्र देखने जाते है। और उस दरवाजे के चारों और घूमते है। क्‍योंकि दीवालें है ही नहीं, सिर्फ द्वार खड़ा है बिना दीवालों के। और द्वार पर ताला पडा है। मुल्‍ला कब्र में पडा हंसता होगा।</p>
<p>      मैंने नसरूदीन से जितना प्रेम किया है उतना किसी से नहीं किया होगा। वह उन लोगों में से एक है जिन्‍होंने धर्म और हास्‍य को एक किया। नहीं तो वे हमेशा एक दूसरे की और पीठ किये हुए खड़े है। नसरूदीन ने उनकी पुरानी शत्रुता छोड़ने के लिए उन्‍हें विवश किया। जब धर्म और हास्‍य मिलते है। जब ध्‍यान हंसता है और हंसना ध्‍यान बन जाता है तब चमत्‍कार घटता है—चमत्‍कारों का चमत्‍कार।</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>बुक्‍स आय हैव लव्‍ड</strong></p>
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		<title>ट्रैक्‍टेटस लॉजिको—फिलोसफिकस (ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)</title>
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		<pubDate>Fri, 17 Feb 2012 11:53:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[ओशो की प्रिय पूस्‍तके--]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

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		<description><![CDATA[विटगेंस्‍टीन ऑस्‍टिया के वियना शहर में एक रईस खानदान में पैदा हुआ। उसके पिता उद्योगपति थे उनके पास धन का अंबार था। अंत: विटगेंस्‍टीन को उसके सात भाई-बहनों के साथ उच्‍च कोटि की शिक्षा मिली। उसकी मां और पिता दोनों &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/02/17/%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%88%e0%a4%95%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%9f%e0%a5%87%e0%a4%9f%e0%a4%b8-%e0%a4%b2%e0%a5%89%e0%a4%9c%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8b/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4381&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>विटगेंस्‍टीन ऑस्‍टिया के वियना शहर में एक रईस खानदान में पैदा हुआ। उसके पिता उद्योगपति थे उनके पास धन का अंबार था। अंत: विटगेंस्‍टीन को उसके सात भाई-बहनों के साथ उच्‍च कोटि की शिक्षा मिली। उसकी मां और पिता दोनों ही संगीतज्ञ थे और अत्‍यंत सुसंस्‍कृत थे।</p>
<p>      इंजीनियरिंग तथा गणित को सीखने के लिए विटगेंस्‍टीन 1908 में इंग्‍लैड गया। वह बहुत ही मेधावी छात्र था और हर सिद्धांत का खुद प्रयोग करने में विश्‍वास रखता था। 1903 में बर्ट्रेंड रसेल की विख्‍यात किताब ‘’प्रिंसिपल ऑफ मैथेमेटिक्‍स’’ प्रकाशित हुई थी। तो विटगेंस्‍टीन सहज ही रसेल की और खिंचा चला आया। 1911 में वह केंब्रिज जाकर रहने लगा जो कि रसेल का ठिकाना था। विटगेंस्‍टीन रसेल का विद्यार्थी बन गया। सामान्‍यतया बर्ट्रेंड रसेल किसी विद्यार्थी से प्रभावित नहीं होता था—उसकी अपनी प्रतिभा इतनी बुलंद थी कि उसने सामने सभी बौने लगते थे। लेकिन विटगेंस्‍टीन के संबंध में उसने लिखा है, ‘’विटगेंस्‍टीन को पढ़ाना मेरे जीवन के सर्वाधिक रोमांचकारी बौद्धिक अभियानों में एक रहा है। इसकी आग, कुशाग्र बुद्धि और बुद्धि की निर्मलता असाधारण थी। मैं जो कुछ सिखा सकता था वह उसके शीध्र ही आत्‍मसात कर लिया।‘’<span id="more-4381"></span></p>
<p>      1912 तक रसेल को यह सुनिश्‍चित हो गया कि विटगेंस्‍टीन एक जीनियस है और उसकी प्रतिभा को गणित के दर्शन की दिशा में मोड़ना जरूरी है। विटगेंस्‍टीन गणित और तर्क के सवालों का अध्‍ययन करने में डूब गया लेकिन उसके लिए उसे केंब्रिज छोड़कर नार्वे जाकर एकांत में रहना पडा क्‍योंकि केंब्रिज के बुद्धिजीवी सिर्फ चर्चा करने में उत्‍सुक थे। उनकी बातचीत में कोई गहराई नहीं थी।</p>
<p>      1914 में पहला विश्‍वयुद्ध शुरू हुआ और विटगेंस्‍टीन स्वदेश ऑस्‍ट्रिया जाकर सेना में भर्ती हुआ। सेना में वह एक बहादुर सैनिक साबित हुआ और वीरता के लिए मैडल भी मिला। मजे की बात, युद्ध की इस धमा चौकड़ी के बीच भी उसने किताब लिखी। जिसकी एक झलक हम यहां देख रहे है। इटली में वह बंदी बनाया गया और उसके थैले में ‘’ट्रैक्‍टेटस फिलोसफस’’ की पांडुलिपि मिली। इटालियन सरकार ने मेहरबानी की और इस पांडुलिपि को बर्ट्रेंड रसेल के पास भिजवानें की अनुमति दी।</p>
<p>      1919 में विटगेंस्‍टीन आजाद किया गया। इसी समय उसे बहुत बड़ी पारिवारिक विरासत मिली। लेकिन विटगेंस्‍टीन ने उसे दान कर दिया क्‍योंकि उसका मानना था कि दार्शनिक को अमीर नहीं होना चाहिए। विटगेंस्‍टीन ऐसे कई इरछे-तिरछे विचार पालता जो आम आदमी से हटकर होते। ‘’ट्रैक्‍टेक्‍स’’ उसकी एक मात्र रचना है जो उसके रहते प्रकाशित हुई। इसका एक यह था कि वह अपने लेखन से कभी संतुष्‍ट नहीं होता था। उसमें निरंतर सुधार करता रहता।</p>
<p>      वह जब कक्षा में पढ़ता था तो कभी नोटस लेकिर नहीं जाता। उसने किसी दोस्‍त से कहा था कि जब भी वह अपना व्‍याखान लिखकर ले जाता तो कागज पर लिख हुए शब्‍द उसे मुद्रा शरीर की भांति लगते। इसलिए कक्षा में जब वह पढ़ाता था तो वे विचार सहजस्फूर्त होते थे। उनमें विलक्षण ऊर्जा होती थी। विद्यार्थी उसे सुनते मंत्रमुग्‍ध हो जाते थे।</p>
<p>      फिर भी विटगेंस्‍टीन की अपनी मान्‍यता थी कि उसके विद्यार्थियों के मानसिक विकास के लिए उसका प्रभाव हानिकारक था। और  इसमें सचाई थी। उसके विचार सुदूर आकाश के पंछियों की तरह कहीं से उड़कर आते थे। और विद्यार्थियों के सिर के ऊपर से गुजर जाते थे। उन्‍हें समझना कठिन था ही, लेकिन उन्‍हें पचाना और भी कठिन था। लेकिन इसके बावजूद, विटगेंस्‍टीन के व्‍यक्‍तित्‍व का सम्‍मोहन उसकी आवाज की सांगतिक लयकारी उसके श्रोताओं को बांधकर रखती थी।</p>
<p>      सभी प्रतिभाशालियों की जो नियति होती है वह विटगेंस्‍टीन की भी थी; निहायत अकेलापन। उसे एक बेचैन ख्‍याल हमेशा कुरेदता रहता था कि वह इस संसार के लिए लायक नहीं है। हकीकत यह थी कि वह इस संसार के लायक नहीं था। वह अपना मत या प्रणाली बनाना नहीं चाहता था। क्‍योंकि वह अपने आपको छोटा बनाना नहीं चाहता था। 1947 में उसने केंब्रिज से अवकाश ले लिया। और आयरलैंड में एक छोटे से मकान में अकेला रहने लगा। 1949 में पता चला कि उसका एक साथी है, और वह है कैंसर। लेकिन वह साथी उसे पूरी तरह से स्‍वीकृत था क्‍योंकि विटगेंस्‍टीन और जीना नहीं चाहता था। 1951 में उसकी मृत्‍यु हुई। लेकिन अंत तक उसका चिंतन और बौद्धिक अनुसंधान जारी था। उसकी प्रतिभा की रोशनी जरा भी कम नहीं हुई थी।</p>
<p>       यह किताब सबसे पहले 1921 में लंदन में प्रकाशित हुई। यह विटगेंस्‍टीन की एकमात्र दार्शनिक रचना है जो उसकी हयात में प्रकाशित हुई। यह किताब जि अंदाज में लिखी गई है—छोटे-छोटे परिच्‍छेद जिनके क्रमांक दिये गये है। और सूत्र मय, सारगार्भित शैली में लिखे हुए विचार—उस वजह से छपते ही यह बुद्धिजीवियों के बीच में चर्चा का विषय बन गई। इस किताब का अनूठापन इसकी विषय वस्‍तु में है; और वह है, भाषा का दर्शन शास्‍त्र।</p>
<p>      भाषा का उपयोग हम सभी करते है लेकिन वह उपयोग हम यंत्रवत करते है। आदतवश करते है। जब हम शब्‍दों का प्रयोग करते है तो उस समय हमारे मन की क्‍या स्‍थिति होती है। हमारे मस्‍तिष्‍क पर क्‍या प्रभाव पड़ता है इस बारे में हम कभी नहीं सोचते। लेकिन विटगेंस्‍टीन की प्रतिभा इसकी गहराई में प्रवेश कर गई और उसने भाषा के कई अनजाने पहलू उजागर किये। सिर्फ भाषा के विभिन्‍न पहलूओं पर कोई दार्शनिक किताब लिख सकता है। यह बात ही असाधारण है। इसलिए पहले तो पाठक चौंक जाता है। उसकी रीढ़ सीधी हो जाती है।</p>
<p>      दूसरी बात, किताब की भूमिका रसेल ने लिखी है। यह भूमिका कुछ लंबी है और इसकी शैली विटगेंस्टीन की शैली से ठीक उलटी है। विटगेंस्‍टीन जितना संक्षेप में लिखता है उतना ही रसेल लंबे-लंबे वाक्‍यों में अपने विचार व्‍यक्‍त करता है। लेकिन रसेल के वक्‍तव्‍य भी काफी रोचक है। यह लिखता है:</p>
<p>      ‘’दूसरी समस्‍या : विचार, शब्‍द और वाक्‍य, इनका आपसी संबंध क्‍या है? और ये तीनों जिस अर्थ को प्रगट करते है उसका इन तीनों से क्‍या रिश्‍ता है? यह समस्‍या बौद्धिक है।</p>
<p>      ‘’तीसरी बात, वाक्‍यों का प्रयोग सत्‍य कहने के लिए किया जाता है। झूठ के लिए नहीं। यह समस्‍या विशिष्‍ट विज्ञान की है।</p>
<p>      चौथी एक वाक्‍य का दूसरे वाक्‍य के साथ क्‍या संबंध हो जिससे कि वह दूसरे के लिए एक प्रतीक बने? यह सवाल तर्क का है। और विटगेंस्‍टीन का पूरा प्रयास यह है कि तर्क की दृष्‍टि से परिपूर्ण भाषा कैसे बने।</p>
<p>      भाषा का बुनियादी फर्ज है तथ्‍यों को स्‍वीकार तथा अस्‍वीकार करना। हम बोलते या लिखते क्‍यों है? क्‍योंकि हमें कुछ कहना होता है। इसका मतलब हुआ, हम जिन शब्‍दों का प्रयोग करते है वह अर्थ से लबालब होते है। क्‍या ऐसी भाषा की कल्‍पना की जा सकती है जिसमे कोई अर्थ न हो, आशय न हो, वह जिबरिश होगी, भाषा नहीं।</p>
<p>      यदि शब्‍दों की गहराई में उतरें तो शब्‍द क्‍या है? मात्र आकृतियां प्रतीक। इन प्रतीकों के बारे में विटगेंस्‍टीन ने बहुत गहराई से सोचा है। उसकी दृष्‍टि में शब्‍द जो है वे तथ्‍यों के चित्र है। उदाहरण के लिए आम का फल है, उसका कोई नाम नहीं है। लेकिन हम जब उसे एक नाम देते है, ‘’आम’’ तो हमने अक्षरों के ज़रिये एक चित्र बनाया जिसे यह भाष न आती हो उसके लिए ‘’आम’’ शब्‍द सिर्फ एक चित्र है। तथ्‍य का चित्र।</p>
<p>      भाषा के एक-एक अंग को लेकिर उसका बारीक से बारीक विश्‍लेषण करना विटगेंस्‍टीन या रसेल जैसे असाधारण प्रतिभाशाली विचारकों के लिए एक बौद्धिक खेल होगा लेकिन सामान्‍य आदमी भाषा की इतनी बारीकियों पर सोचने लगे तो उसका सर चकराने लगेगा। और वह सोचेगा कि इस तरह सोच-विचार बोलने से अच्‍छा है चुप रह जाओ।</p>
<p>      खुद विटगेंस्‍टीन भी इससे नावाकिफ नहीं है। उसने अपनी किताब की भूमिका में लिखा है&#8211;</p>
<p>      ‘’शायद यह किताब वही व्‍यक्‍ति समझ सकेगा जिसके ऐसे विचार है जो इस किताब में लिखे है। तो टेक्स्ट बुक नहीं है। यदि कोई एक व्‍यक्‍ति भी इसे पढ़ेगा और समझ लेगा तो किताब का उद्देश्‍य सफल हुआ।</p>
<p>      ‘’इस किताब में दर्शन शास्‍त्र की समस्‍याओं की चर्चा है। किताब यह दिखाती है कि ये समस्‍याएं इसलिए खड़ी होती है क्‍योंकि हमारी भाषा का तर्क शास्‍त्र नहीं समझा जाता है। पूरी किताब का सारांश इन शब्‍दों में समा सकता है; जो कहा जा सकता है उसे साफ कहा जा सकता है। और जिसके बारे में हम चर्चा नहीं कर सकते उसके करीब से हम मौन में गुजर जायें।</p>
<p>      तो किताब का लक्ष्‍य है, विचारों की सीमा बनाना; या फिर विचारों की नहीं, विचारों की अभिव्‍यक्‍ति की। क्‍योंकि विचारों की सीमा बनाने के लिए हमें दोनों छोर पर सोचने को खोज लेना चाहिए।</p>
<p>      तो केवल भाषा में ही सीमा बनायी जा सकती है। और सीमा  के दूसरे छोर पर सिर्फ अर्थहीनता शेष रहेगी।</p>
<p>      9मैं इसकी निर्णय नहीं कर पाऊंगा। कि मेरे प्रयास अनय दार्शनिकों से कितना मेल खायेंगे। और मेरा यह दावा नहीं है कि मैंने जो लिखा है वह बिलकुल नया है। और मैंने किन्‍हीं किताबों के नाम इसलिए नहीं दिए क्‍योंकि मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मेरे विचार किसी और के दिमाग में आये थे।</p>
<p>      ‘’मैं इतना जरूर कहूंगा कि मैं फ्रेज के महान ग्रंथों का आभारी रहूंगा और मेरे मित्र बर्ट्रेंड रसेल की रचनाओं से मैने बहुत प्रेरणा पायी है। अगर इस रचना का कोई कीमत है तो वह दो बातों में: एक, इसमें विचार प्रगट किये है—और जितने विचार प्रगट किये गये है उतने तीन निशाने पर लगे है। यहां मैं कमजोर सिद्ध हुआ हूं। क्‍योंकि मैं इस काम को सफलता पूर्वक करने में सक्षम नहीं हूं। दूसरे लोग आयें और इसे हासिल करें।</p>
<p>      दूसरी तरफ इन विचारों में निहित सत्‍य सुनिश्‍चित अनयुजेबल है। इसलिए मुझे हर तरफ से इस समस्‍या का समाधान मिल गया है। और अगर मैं गलत न होऊं तो इस किताब से यह साबित होता है कि समस्‍या का समाधान होने के बाद भी कितना कम हासिल होता है।</p>
<p><strong>किताब की एक झलक:</strong></p>
<p>जो भी है वह यह जगत है।</p>
<p>जगत तथ्‍यों की समग्रता है, वस्‍तुओं की नहीं।</p>
<p>जगत तथ्‍यों के द्वारा निर्धारित होता है, और इससे कि वे सभी तथ्‍य है।</p>
<p>संसार में चीजें जैसी है, उन्‍हें किसी श्रेष्‍ठतर से कोई मतलब नहीं है। ईश्‍वर संसार में स्‍वयं को प्रगट नहीं करता।</p>
<p>सभी तथ्‍य समस्‍या को बनाने में योगदान देते है। उसे हल करने में नहीं।</p>
<p>संसार में चीजें जैसी है वैसी वे रहस्‍यपूर्ण नहीं है वरन वे ‘’है’’ यही रहस्‍य है।</p>
<p>जब उत्‍तर को शब्‍दों में नहीं कहा जा सकता तब प्रश्‍न को भी शब्‍दों में नहीं कहा जा सकता।</p>
<p>पहली है ही नहीं।</p>
<p>अगर प्रश्‍न को बनाना संभव हो तो उसका उत्‍तर देना भी संभव होगा।</p>
<p>संदेशवाद को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन वह ज़ाहिर रूप से मूढ़ता पूर्ण होता है। जब वह वहां संदेह करता है जहां प्रश्न भी पूछा नहीं जा सकता।</p>
<p>क्‍योंकि संदेह तभी हो सकता है जब प्रश्‍न होता है। प्रश्न तब होता है जब उत्‍तर होता है। और उत्‍तर तब होता है जब कुछ कहा जा सकता है।</p>
<p>हमे लगता है कि अगर सभी वैज्ञानिक प्रश्नों के उत्‍तर दिये जाएं तब भी जीवन की समस्‍याएं पूरी तरह से अछूती रह जाती है। उस समय कोई प्रश्‍न नहीं बचते, और यही अपने आपमें उत्‍तर है।</p>
<p>जीवन की समस्‍या का समाधान उसके विलीन होने में देखा जाता है।</p>
<p>मेरे सिद्धांत इस प्रकार मार्गदर्शक बनते है: जो मुझे समझता है वह अंतत: उनकी व्‍यर्थता को समझ लेता है। जब वह सीढ़ीयों  की मानिंद उनका उपयोग करता है—उन पर चढ़कर उनके पार जाने के लिए। जब वह ऊपर चढ़ जाता है तब सीढ़ी को फेंक दे।</p>
<p>उसे इन सिद्धांतों के पार जाना होगा, तभी वह संसार को सम्‍यक् देख पायेगा।</p>
<p>हम जिसके संबंध में बात नहीं कर सकते वहां से चुपचाप गुजर जाना चाहिए।</p>
<p><strong>ओशो का नजरिया:</strong></p>
<p>तीसरी किताब फिर एक जर्मन की है—लुडविग विटगेंस्‍टीन। जरा इसका शीर्षक सुनो: ट्रैक्‍टेटस लॉजिको फिलोसफिकस। हम इसे सिर्फ ट्रैक्‍टेटस कहेंगे। इस वक्‍त जो भी किताबें है उनमें यह सबसे मुश्किल किताबों में से एक है। जी. ई. मूर जैसा आदमी, जो कि बहुत बड़ा अंग्रेज दार्शनिक है, और बर्ट्रेंड रसेल—एक और महान दार्शनिक, न केवल इंग्‍लैंड की बल्‍कि पूरी दूनिया का—दोनों सहमत थे कि विटगेंस्‍टीन उनसे कई गुना श्रेष्‍ठ था।</p>
<p>      लुडविग विटगेंस्‍टीन वाकई प्‍यारा आदमी था। मैं उससे नफरत नहीं करता और नापसंद भी नहीं करता। मैं उसे पसंद करता हूं। उससे प्रेम भी करता हूं, लेकिन उसकी किताब से नहीं। उसकी किताबें सिर्फ एक कवायद है। सिर्फ कभी-कभार, पन्‍नों पर पन्‍ने गुजरने के बाद कोई वाक्‍य मिलता है जो रोशन होता है। जैसे, ‘’जिसे कहा नहीं जा सकता उसे नहीं कहना चाहिए। उसके संबंध में मौन रहना चाहिए।‘’ अब यह एक खूबसूरत वक्‍तव्‍य है। संत, रहस्‍यदर्शी, कवि इन सबको इससे बहुत सीखना चाहिए। जिसे कहा नहीं जा सकता उसे नहीं  कहना चाहिए।</p>
<p>      विटगेंस्‍टीन गणित की शैली में लिखता था—छोटे-छोटे वाक्‍य। परिच्‍छेद भी नहीं, सिर्फ सूत्र, लेकिन आज के विकसित विक्षिप्‍त आदमी के लिए इस किताब से बहुत मदद मिल सकती है। वह ठीक आत्‍मा पर चोट कर सकती है। मस्‍तिष्‍क पर नहीं।</p>
<p>      कील की तरह वह उसके अंतरतम में प्रवेश कर सकती है। वह उसे दु:स्‍वप्‍न  से जगा सकती है।</p>
<p>      लुडविग विटगेंस्‍टीन प्‍यारा आदमी था। उसे ऑक्‍सफर्ड जैसे पद के लिए निमंत्रित किया गया था जिसे सभी चाहते है। लेकिन उसने इंकार कर दिया। मुझे उसकी यही बात पसंद है। वह किसान और मछुआरा बनने गया। यही उसकी प्‍यारी बात है। ज्‍यां पाल सार्त्र से यह अधिक अस्‍तित्‍वगत है। हालांकि विटगेंस्‍टीन ने अस्‍तित्‍वाद के बारे में कभी बात नहीं की। आस्‍तित्‍ववाद के बारे में कुछ चर्चा नहीं की जा सकती, उसे जीना होता है और कोई उपाय नहीं है।</p>
<p>      यह किताब उस समय लिखी गई जब विटगेंस्‍टीन जी ई मूर तथा, बर्ट्रड के मार्ग दर्शन में पढ़ रहा था। इंग्‍लैंड के दो महान दार्शनिक और साथ में एक जर्मन—‘’ट्रैक्‍टेटस लॉजिको फिलोसफिकस’’  लिखने के लिए वह काफी है। इसका अनुवादित रूप होगा: विटगेंस्‍टीन, मूर, रसेल। मैं विटगेंस्‍टीन को गुर्जिएफ के मार्ग दर्शन में पढ़ाना अधिक पसंद करता। बजाएं मूर और रसेल के। उसके लिए वह सही जगह थी मगर वह चूक गया। शायद अगली बार, मेरा मतलब है अगले जन्‍म में&#8230;&#8230;..उसके लिए कह रहा हूं, मेरे लिए नहीं। मेरे लिए यह काफी है। यह आखरी है। लेकिन उसके लिए, कम से कम एक बार उसे च्‍वांगत्‍सु, गुर्जिएफ या बोधिधर्म जैसे की संगत में रहना जरूरी है। लेकिन मूर, रसेल और व्‍हाइटहेज नहीं। वह इन लोगों के साथ था। गलत लोगों के साथ। गलत लोगों के साथ सही आदमी। यही उसे ले डूबा।</p>
<p>      मेरा अनुभव यह है कि सही संगत से गलत आदमी भी सही हो जाता है। और इससे उल्‍टा भी सच है—गलत संगत में सही  आदमी भी गलत हो जाता है। लेकिन यह सिर्फ अज्ञानी पर लागू होता है। ज्ञानी आदमी प्रभावित नहीं होता। इसीलिए मैंने जो कहा वह सिर्फ साधारण मानवता पर लागू होता है, जो जाग गये है उन पर नहीं।</p>
<p>      विटगेंस्‍टीन जाग सकता था, वह इसी जीवन में जाग सकता था। लेकिन वह गलत संगत में पड़ गया। लेकिन उसकी किताब उन लोगों के काम आ सकती है जो तीसरे दर्जे के पागल है। यदि यह उनकी समझ में आ जाए तो वक पुन: स्‍वस्‍थ हो जायेंगे।</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>बुक्‍स आय हैव लव्‍ड</strong></p>
<br />Filed under: <a href='http://oshosatsang.org/category/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%af-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%a4%e0%a4%95%e0%a5%87/'>ओशो की प्रिय पूस्‍तके--</a> Tagged: <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/'>ओशो</a>, <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6/'>स्‍वामी आनंद प्रसाद</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/oshosatsang.wordpress.com/4381/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/oshosatsang.wordpress.com/4381/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/oshosatsang.wordpress.com/4381/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/oshosatsang.wordpress.com/4381/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/oshosatsang.wordpress.com/4381/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/oshosatsang.wordpress.com/4381/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/oshosatsang.wordpress.com/4381/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/oshosatsang.wordpress.com/4381/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/oshosatsang.wordpress.com/4381/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/oshosatsang.wordpress.com/4381/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/oshosatsang.wordpress.com/4381/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/oshosatsang.wordpress.com/4381/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/oshosatsang.wordpress.com/4381/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/oshosatsang.wordpress.com/4381/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4381&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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		<title>चंदाभ की आभा—कथा यात्रा (ओशो)</title>
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		<pubDate>Wed, 15 Feb 2012 14:08:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[कथा--यात्रा]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

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		<description><![CDATA[राजगृह में चंदाभ नाम का एक ब्राह्मण रहता था। किसी पूर्व जन्‍म में भगवान कश्‍यप बुद्ध के चैत्‍य में चंदन लगाया करता था। कुछ और बड़ा कृत्‍य नहीं था पीछे। लेकिन बड़े भाव से चंदन लगाया होगा कश्‍यप बुद्ध के &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/02/15/%e0%a4%9a%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%ad-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%ad%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%93/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4379&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>राजगृह में चंदाभ नाम का एक ब्राह्मण रहता था। किसी पूर्व जन्‍म में भगवान कश्‍यप बुद्ध के चैत्‍य में चंदन लगाया करता था।</p>
<p>      कुछ और बड़ा कृत्‍य नहीं था पीछे। लेकिन बड़े भाव से चंदन लगाया होगा कश्‍यप बुद्ध के चैत्‍य में, उनकी मूर्ति पर। असली सवाल भाव का है। बड़ी श्रद्धा से लगाया होगा। तब से ही उसमें एक तरह की आभा आ गयी थी। जहां श्रद्धा है, वहां आभा है। जहां श्रद्धा है, वहां जादू है।<span id="more-4379"></span></p>
<p>      उस पुण्‍य के कारण, वह जो कश्‍यप बुद्ध के मंदिर में चंदन लगाने का जो पुण्‍य था, वह जो आनंद से इसने चंदन लगाया था, वह जो आनंद से नाचा होगा। पूजा की होगी, प्रार्थना की होगी। वह इसके भीतर आभा बन गयी थी। ज्‍योतिर्मय हो कर इसके भीतर जग गयी थी।</p>
<p>      कुछ पाखंडी ब्राह्मण उसे साथ लेकर नगर-नगर घूमते थे। क्‍योंकि वह बड़ा चमत्‍कारी आदमी था। उसकी नाभि से रोशनी निकलती थी। वे कपड़ा उघाड़ कर लोगों को उसकी नाभि दिखाते थे। नाभि देखकर लोग हैरान हो जाते थे। और उन्‍होंने इसमें एक धंधा बना रखा था। वे कहते थे। जो इसके शरीर को स्‍पर्श करता है, वह चाहे जो पाता है। और जब तक लोग बहुत धन दान न करते वह उसका शरीर स्‍पर्श नहीं करने देते थे। ऐसे वह काफी लोगों को लूट रहे थे।</p>
<p>      भगवान जेतवन में विहरते थे। तब वे उसे लिए हुए श्रावस्‍ती पहुंचे। जेतवन श्रावस्‍ती में था। संध्‍या समय था। और सारा नगर भगवान के दर्शन और धर्म श्रवण के लिए जेतवन की और जा रहा था। उन ब्राह्मणों ने लोगों को रोककर चंदाभ का चमत्‍कार दिखाना चाहा। लेकिन कोई रूकना नहीं चाहता था।</p>
<p>      जिसने भगवान को देखा हो, जिसने किसी बुद्ध पुरूष को देखा हो। उसके लिए सारी दुनिया के चमत्‍कार फीके हो जाते है। जिसने साक्षात प्रकाश को देखा हो, उसके लिए किसी की नाभि से थोड़ी सी रोशनी निकल रही हो। इसका कोई अर्थ नहीं है। इस तरह की बातों में बच्‍चे ही उत्‍सुक ही हो सकते है।</p>
<p>      कोई रुका नहीं। ये देख कर ब्राह्मण बहुत हैरान हुए। ऐसा तो कभी हुआ नहीं था। उनके अनुभव में न आया था। जहां गए थे। वहीं भीड़ लग जाती थी। तो उन्‍हें लगा कि जरूर इससे भी बड़ा चमत्‍कार कहीं बुद्ध में घट रहा होगा। तभी लोग भागे जा रहे है। तो बुद्ध का अनुभाव देखने के लिए—कि कौन है यह बुद्ध। और क्‍या इसका प्रभाव है। क्‍या इसके चमत्‍कार है। वे ब्राह्मण चंदाभ को लेकर बुद्ध के पास पहुँचे। भगवान के सामने जाते ही चंदाभ की आभा लुप्‍त हो गयी।</p>
<p>      हो ही जायेगी, हो ही जानी चाहिए। वह ऐसी ही थी जैसे कोई दीया जलाएं सूरज के सामने आ जाए। सूरज के सामने दीए की रोशनी खो जाए, इसमे आश्‍चर्य क्‍या है।</p>
<p>      दीए की तो बात और, सुबह सूरज निकलता है, आकाश के तारे खो जाते है। अंधेरे में चमकते है; रोशनी में खो जाते है। सूरज की विराट रोशनी तारों की रोशनी छीन लेती है। तारे कहीं जाते नहीं; जहां है, वहीं है। मगर दिन में दिखायी नहीं पड़ने लगेंगे।</p>
<p>      यह चंदाभ की जो आभा थी। मिट्टी का छोटा सा दीया था। बुद्ध की जो आभा थी, जैसे महा सूर्य की आभा।</p>
<p>      लेकिन चंदाभ तो बेचारा यही समझा कि जरूर कोई मंत्र जानते होंगे। मेरी आभा को मिटा दिया। वह दुःखी हुआ। चमत्‍कृत भी। उसने कहा: हे गौतम, मुझे भी आभा को लुप्‍त करने का मंत्र दीजिए। और उस मंत्र को काटने की विधि भी बताइए। तो मैं सदा-सदा के लिए आपका दास हो जाऊँगा। आपकी गुलामी करूंगा।</p>
<p>      बुद्ध कभी मौका नहीं चूकते। कोई भी मौका मिले किसी भी बहाने मौका मिले, संन्‍यास का प्रसाद अगर बांटने का अवसर हो, तो वे जरूर बांटते थे। बुद्ध ने यही मौका पकड़ लिया। इसी निमित चलो।</p>
<p>      उन्‍होंने कहा: देख, मंत्र दूँगा—मंत्र-वंत्र है नहीं कुछ। पर पहले तू सन्‍यासी हो जा।</p>
<p>      मंत्र के लोभ वह आदमी संन्‍यास ले लेता है। लेकिन बुद्ध ने देखा होगा कि इस आदमी में क्षमता तो पड़ी है। बीज तो पडा है। वह जो कश्‍यप बुद्ध के मंदिर में चंदन लगाया था। वह जो भाव दशा इसकी सधन थी। वह आज भी मौजूद है। तड़फती है, मुक्‍त होने को। उस पर ही दया की होगी।</p>
<p>      यह आदमी ऊपर से तो भूल गया है। किस जन्‍म की बात है। कहां की बात है। किसको याद रहता है। इस आदमी की बुद्धि में तो कुछ भी नहीं है। सब भूल-भाल गया है। इसकी स्‍मृति नहीं है। लेकिन इसके भीतर ज्‍योति पड़ी है।</p>
<p>      कल एक युवक नार्वे से आया। मैंने लाख उपाय किया कि वह संन्यस्त हो जाए। क्‍योंकि उसके ह्रदय को देखू तो मुझे लगे कि उसे संन्‍यस्‍त हो ही जाना चाहिए। और उसके विचारों को देखू, तो लगे कि उसकी अभी हिम्‍मत नहीं है। सब तरह समझाया-बुझाया उसे कि वह संन्‍यस्‍त हो जाए। तरंग उसमे भी आ जाती थी। बीच-बीच में लगने लगता था कि ठीक। ह्रदय जोर मारने लगता ; बुद्धि थोड़ी क्षीण हो जाती। लेकिन फिर वह चौंक जाता।</p>
<p>      दो हिस्‍सों में बंटा है। सिर कुछ कह रहा है। ह्रदय कुछ कह रहा है। मुश्‍किल से सुनायी पड़ती है। क्‍योंकि आवाज धीमी होती है। हमने सदियों से सूनी नहीं है वह आवाज। तो सुनाई कैसे पड़े। आदत चूक गयी है। खोपड़ी में जो चलता है वह हमें साफ दिखाई देता है। हम वहीं सब गए है। हमने ह्रदय में जाना छोड़ दिया है।</p>
<p>      तो यह आदमी तो चाहता था मंत्र। मंत्र के लोभ में संन्‍यस्‍त हो गया। इसे पता नहीं था कि बुद्ध के हाथों में जरा सी उँगली दी नहीं कि गया हाथ। और वे पकड़ लेंगे पहुंचा। पकड़े गये तो पकड़े गये। फिर छूटना मुश्‍किल है।</p>
<p>      बुद्ध ने उसको समझाया होगा कि तू ध्‍यान कर। ऐसे धीरे-धीरे कदम-कदम उसे समाधि में पहुंचा दिया। जब वह समाधिस्थ हो गया तो वह तो भूल ही गया मंत्र की बात। कौन न भूल जाएगा। महामंत्र मिल गया था। अब तो उसे खूद ही दिखाई पड़ गया होगा की यह बात मूढ़ता कि थी। कि मैं मंत्र मांग रहा था। न तो उन्‍होंने काटा था और न ही कोई मंत्र था। बड़ी रोशनी के सामने आकर छोटी रोशनी अपने आप लुप्‍त हो जाती है। किसी ने कुछ नहीं किया था। बुद्ध कुछ करते भी नहीं। बुद्ध कोई मदारी नहीं होते है।</p>
<p>      जब ब्राह्मण उसे लेने के लिए आये। तो वह हंसा और बोला कि तुम लोग जाओ। मैं तो अब नहीं जाने वाला। मैं तो ऐसी जगह ठहर गया हूं, जहां से जाना इत्‍यादि होता ही नहीं। मैं समाधिस्‍थ हो गया हूं।</p>
<p>      जाना कैसा हो? जाना तो विचारों के घोड़े पर होता है। जाना तो वासनाओं पर होता है। जाना तो तृष्‍णाओं के सहारे होता है। वे सब तो गए सहारे। अब मेरी कोई दौड़ नहीं है। क्‍योंकि मेरी कोई चाह नहीं है? अब मुझे कहीं जाना नहीं है। न कही पहुंचना है, जहां पहुंचना था वहां को दौड़ खत्‍म हो गई। मैं पहूंच गया आपने घर। मेरा तो अब न कोई आन है, न कोई जाना। सब मिट गया। मेरा आवा गमन मिट गया है। तुम कहां की बातें कर रहे हो। अब तो इस जमीन पर भी लौट कर आने वाला नहीं हूं। मुझे अब महामंत्र मिल गया।</p>
<p>      ब्राह्मण तो चोंके ह चोंके कि यह क्‍या हो गया। लेकिन भिक्षु भी चोंके, जो ज्‍यादा सोचने जैसी बात है। आदमी इतना राजनैतिक प्राणी है। वह बर्दाश्त नहीं कर सकता। धार्मिक आदमी भी, भिक्षु भी ईर्ष्‍या से भर गए होंगे कि यह अभी-अभी तो आया चंदाभ; और अभी-अभी ज्ञान का उपलब्‍ध हो गया। और हम इतने दिन से बैठे है। हम कपास ही ओट रहे है। और यह आए देर नहीं हुई; अभी नया-नया सिक्‍खड़ सिद्ध होने का दावा कर रहा है।</p>
<p>      उन्‍होंने जाकर बुद्ध को कहा कि भंते। चंदाभ भिक्षु अर्हत होने का दावा कर रहा है। और इस तरह झूठ बोल रहा है। आप उसे चेतनाएं।</p>
<p>      लेकिन बुद्ध ने चंदाभ को नहीं चेताया। चेताया उन भिक्षुओं को, कि भिक्षुओं, तुम चेतो। तुम ईर्ष्‍या से भरे हो। तुम देख नहीं रहे हो जो घट रहा है। तुम अहंकार से भरे हो। मेरे पुत्र की तृष्‍णा क्षीण हो गई है। और वह जा कह रहा है। पूर्णत: सत्‍य है। वह ब्राह्मणत्‍व को उपल्‍बध हो गया है।</p>
<p>      उसने मनुष्‍यों के ही बंधन नहीं छोड़ दिए है, उसने दिव्‍यता से भी बंधन छोड़ दिए है। आया था मंत्र मांगने, अब वह कुछ नहीं मांगता, मोक्ष भी नहीं मांगता।</p>
<p>      सभी बंधनों से जो विमुक्‍त है, उसे में ब्राह्मण कहता हूं।</p>
<p>      और अब उसे याद आ गया है। वह जो आभा उसी नाभि से निकलती थी। क्‍या थी? उसे याद आ गई। कश्‍यप बुद्ध  के चैत्‍य में चंदन लगाया था। वह आनंद, वह श्रद्धा, इतनी छोटी सी बात भी इतना बड़ा फल ला सकती है। उसे याद आ गये पिछले सभी जन्‍म। क्‍योंकि उसे याद आ गयी है, इसलिए अब उसके आगे के सब रास्‍ते बंद हो गये है।</p>
<p>      अब उसने देख लिया है कि व्‍यर्थ भटकता हूं। बहार जो भटकता है, व्‍यर्थ भटकता है। जन्‍मों–जन्‍मों यही वासनाएं, यही कामनाए, यहीं तृष्‍णाएं, और इन्‍हीं के सहारे दौड़ता रहा और कहीं नहीं पहुंचा।</p>
<p>      अब मेरा पुत्र पहूंच गया है। अब वह वहां पहुंच गया है। जहां जन्‍म–मरण शांत हो जाते है। उसने स्‍वर्ग नर्क का सब रहस्‍य जान लिया है। उसका पूर्व जन्‍म क्षीण हो गया है। अब वह दुबारा नहीं आयेगा। वह अनागामी हो गया है।</p>
<p>    <strong>  ‘’जिसकी प्रज्ञा पूर्ण हो चुकी है, जिसने अपना सब कुछ पूरा कर लिया है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूं।‘’</strong></p>
<p>      बुद्ध ने ब्राह्मण की जो परिभाषा की, वहीं भगवत्‍ता की परिभाषा है। बुद्ध ने ब्राह्मण को जैसी ऊँचाई दी, वैसी किसी ने कभी नहीं दी थी। ब्राह्मणों ने भी नहीं। ब्राह्मणों ने तो ब्राह्मण शब्‍द को बहुत क्षुद्र कर दिया था। उसे जन्‍म से जोड़ दिया। बुद्ध ने उसे आत्‍म अनुभव से जोड़ा।</p>
<p>      वह जो मुक्‍त है। वह जो शुन्‍य है। वह जो खो गया है बूंद की तरह सागर में। और सागर ही हो गया है। उसे मैं ब्राह्मण कहता हूं।</p>
<p>      मैंने तुम से कहा की सभी शुद्र की तरह पैदा होते है, और दुर्भाग्य से अधिक लोग शुद्र की तरह ही मर जाते है। ध्‍यान रखना दोबार दोहराता हूं। सभी लोग शुद्र की तरह पैदा होते है। ब्राह्मण की तरह कोई पैदा नहीं होता। ब्राह्मणत्‍व साधना का फल है।</p>
<p>      शुद्र की तरह सब पैदा होते है, क्‍योंकि सभी शरीर के साथ तादात्म्य में जुड़े पैदा होते है। शूद्र है। इसीलिए पैदा होते है। नहीं तो पैदा हो ही क्‍यों। शूद्रता के कारण तो पैदा होते है। क्‍योंकि अभी शरीर से मोह नहीं गया। इसलिए पुराना शरीर छूट गया, तत्‍क्षण जल्‍दी से नया शरीर ले लिया। राग बना है, मोह बना है, तृष्‍णा बनी है। फिर नये गर्भ में प्रवेश हो गए। फिर से पैदा हो गये।</p>
<p>      तुम्‍हें कोई पैदा नहीं कर रहा। तुम अपनी ही वासना से पैदा होते हो। मरते वक्‍त जब तुम घबराये होते हो, और जोर से पकड़ते हो अपने शरीर को। और चीखते हो, चिल्‍लाते हो, कहते हो; बचाओ मुझे। थोड़ी देर बचा लो। तब तुम नये जन्‍म का इंतजार कर रहे होते हो।</p>
<p>      जो मरते वक्‍त निशिंचत मर जाता है। जो कहता है। धन्‍य है। यह जीवन समाप्‍त हुआ। धन्‍य—कि इस शरीर से मुक्ति हुई। धन्‍य—कि इस क्षणभंगुर से छूटे। जो इस विश्राम में विदा हो जाता है, उसका फिर कोई जन्‍म नहीं है।</p>
<p>      तुम जन्‍म का बीज अपनी मृत्‍यु में बोते हो। जब तुम मरते हो, तब तुम नए जन्‍म का बीज बोते हो। और तुम जिस तरह की वासना करते हो। उस तरह के जन्‍म का बीज बोते हो। तुम्‍हारी वासना ही देह धरती है। तुम्‍हारी वासना ही गर्भ लेती है।</p>
<p>      बुद्ध ने कहा है: तुम नहीं जन्‍मते, तुम्‍हारी वासना जन्‍मती है। तो जब वासना नहीं तब तुम्‍हारा जन्‍म समाप्‍त हो जाता है।</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>एस धम्मो सनंतनो भाग—12</p>
<p>प्रवचन-9, संस्‍करण—1991</strong></p>
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		<title>आत्‍मा का अशरीरी रूप क्‍या होता है ?&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;आपस में कोई डायलॉग की भी संभावना होती है ? भाग&#8211;3 (ओशो)</title>
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		<pubDate>Sat, 11 Feb 2012 11:50:10 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[प्रशन चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

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		<description><![CDATA[प्रश्न&#8211;परिचय नहीं हो सकता दो आत्‍माओं का? एक दूसरे की पहचान? ओशो—परिचय की जहां तक बात है, दो प्रेतात्‍माएं भी अगर परिचित होना चाहें तो भी दो व्‍यक्‍तियों में प्रवेश करके ही परिचय हो सकती है। सीधी परिचय नहीं हो &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/02/11/%e0%a4%86%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%aa-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%af-3/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4370&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>प्रश्न&#8211;परिचय नहीं हो सकता दो आत्‍माओं का? एक दूसरे की पहचान?</strong><div id="attachment_4371" class="wp-caption alignright" style="width: 163px"><a href="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/02/03-02-kissofdawn.jpg"><img src="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/02/03-02-kissofdawn.jpg?w=153&#038;h=300" alt="आत्‍मा का अशरीरी रूप...क्‍या ? ओशो" title="आत्‍मा का अशरीरी रूप...क्‍या ? ओशो" width="153" height="300" class="size-medium wp-image-4371" /></a><p class="wp-caption-text">आत्‍मा का अशरीरी रूप...क्‍या ? ओशो</p></div></p>
<p><strong>ओशो—</strong>परिचय की जहां तक बात है, दो प्रेतात्‍माएं भी अगर परिचित होना चाहें तो भी दो व्‍यक्‍तियों में प्रवेश करके ही परिचय हो सकती है। सीधी परिचय नहीं हो सकती। करीब-करीब ऐसी हालत है, जैसे हम बीस आदमी इस कमरे में सो जाएं। तो हम बीस रात भर यहीं रहेंगे। लेकिन परिचित नहीं हो सकते। हमारे जो परिचय है वह जागने के ही होंगे। जब हम जागेंगे तो फिर कंटी न्यू हो जायेंगे। लेकिन नींद में हम परिचित नहीं हो सकते। हमारा कोई संबंध नहीं हो सकता। हां, यह हो सकता है। कि एक आदमी जाग जाए, इसमें एक आदमी जाग जाए, वह सबको देख ले।<span id="more-4370"></span></p>
<p>      इसका मतलब यह है कि अगर एक आत्‍मा किसी के शरीर में प्रवेश कर जाए, तो वह आत्‍मा इन सारी आत्‍माओं को देख सकती है। फिर भी वे आत्माएं उसे नहीं देखेगी। और अगर एक आत्‍मा किसी के शरीर में प्रवेश कर जाए तो वह दूसरी आत्माओं को जो कि अशरीरी है, उनके बाबत कुछ जान सकती है। लेकिन वे आत्माएं उसके बाबत कुछ भी नहीं जान सकती।</p>
<p>      असल में जानना जो है, परिचय जो है, वह भी जिस मस्‍तिष्‍क से संभव होता है वह भी शरीर के साथ ही विदा हो जाता है। हां कुछ संभावनाएं फिर भी शेष रह जाती है जो कि हो सकती है। जैसे अगर किसी व्‍यक्‍ति ने जीते जी मस्‍तिष्‍क मुक्‍त टेलीपैथी या कलैरवांयस के संबंध निर्मित किए हों, किसी व्‍यक्‍ति ने जीते जी मस्‍तिष्‍क के बिना जानने के मार्ग निर्मित कर लिए हों, तो वह प्रेत या देव योनि में भी जान सकेगा। पर ऐसे तो बहुत कम लोग है, इसलिए जिन आत्‍माओं ने कुछ खबरें दी है उस लोक की आत्‍माओं के बाबत वे इस तरह की आत्‍माएं है।</p>
<p>      यह करीब-करीब स्‍थिति ऐसी है कि जैसे बीस आदमी शराब पी लें, सब बेहोश हो जाएं। लेकिन एक आदमी ने शराब पीने का इतना अभ्‍यास किया हो कि वह कितनी ही शराब पी ले और बेहोश न हो, तो वह शराब पीकर भी होश में बना रहे। और जो व्‍यक्‍ति शराब पीकर भी होश में बना रह सकता है, वह शराब के अनुभव के संबंध में कुछ कह सकता है। जो बेहोश रहने वाले नहीं कह सकते। कभी नहीं कह सकते। क्‍योंकि वह जानने के पहले ही बेहोश हो गए होते है।</p>
<p>      तो इस तरह के भी छोटे-मोटे संगठन काम करते है। दुनिया में जो कुछ लोगों को तैयार करते है कि वे मरने के बाद जा लोक होगा, उस लोक के संबंध में कुछ जानकारी दें। जैसे लंदन में एक छोटी सी संस्‍था थी। जिसके कुछ बड़े-बड़े लोग—ऑलिवर लाज जैसे लोग सदस्‍य थे। जिन्‍होंने पूरी कोशिश की, ऑलिवर लाज मरा, तो उन्‍होंने पूरी चेष्‍टा की कि मरने के बाद वह खबर दे सके।</p>
<p>      लेकिन बीस साल तक मेहनत करने पर भी कोई खबर न मिल सकी। ऐसी संभावना मालूम होती है कि ऑलिवर लाज ने बहुत कोशिश की, क्‍योंकि कुछ और आत्‍माओं ने खबर दी कि ऑलिवर लाज पूरी कोशिश कर रहा है। लेकिन कोई टुयुनिंग नहीं बैठ पाई। बीस साल निरंतर, बहुत दफा ऑलिवर लाज ने खटखटाया उन लोगों को, जिनसे उसने वादा किया था। कि मैं खबर दूँगा। मैं मरते ही पहला काम यह करूंगा कि कुछ खबर दे दूँ। उसकी सारी तैयारी करवाई गई थी कि वह खबर दे सकेगा। जैसे नींद में सोए हुए आदमी  को वह—हड़बड़ा कर, घबरा कर उसका साथी बैठ जाएगा। उसे लगेगा कि ऑलिवर लाज कही पास में है। और फिर बात खत्‍म हो जाएगी।</p>
<p>      टुयुनिंग नहीं बैठ पाई। ऑलिवर लाज तैयार गया, लेकिन कोई दूसरा आदमी तैयार नहीं था इस योग्‍य, जो ऑलिवर लाज कुछ कहे तो उसे पकड़ लें। बीस साल तक निरंतर चेष्‍टा करता रहा। न मालूम कितनी दफे रास्‍ते में अकेले में कोई जा रहा है, एक दम कंधे पर हाथ रख दें। मित्र जो कि ऑलिवर लाज के हाथ का स्‍पर्श जानते थे। वे एकदम चौंक कर कहते की लाज। लेकिन सब बात खत्‍म हो जाती। बीस साल, उसके साथी तो घबरा गये। और परेशान हो गए कि यह क्‍या हो रहा है। लेकिन कोई संदेश नहीं आया। एक भी संदेश नहीं दिया जा सका। संदेश कुछ नहीं हो सका, हालाकि उसने द्वार बहुत खटखटाएं।</p>
<p>      दोहरी तैयारी चाहिए। अगर टेलीपैथी का ठीक अनुभव हुआ हो जीते जी, बिना शब्‍द के बोलने की क्षमता आई हो। बिना आँख के देखने की क्षमता आई हो। तो फिर उस योनि में भी उस तरह का व्‍यक्‍ति बहुत चीजें जान सकेगा। जानना भी सिर्फ हमारे होने पर निर्भर नहीं होता।</p>
<p>      जैसे हम एक बग़ीचे में जाएं, और एक वनस्‍पति शास्‍त्री भी उस बग़ीचे में जाए, और एक कवि भी उस बग़ीचे में जाए। एक दुकानदार भी उस बग़ीचे में जाये। एक छोटा बच्‍चा भी उस बग़ीचे में जाए। वे सब एक ही बग़ीचे में है। लेकिन एक ही बग़ीचे में नहीं होते। दुकानदार बैठ कर अपनी दूकान की बातें सोचने लगेगा। कवि अपनी कल्‍पना में खो जायेगा। वनस्पति शास्‍त्री कुछ जानता है जिसकी उसकी ट्रेनिंग है भारी—पचास साल या बीस साल या तीस साल उसने वनस्‍पति की जो जानकारी ली है। वह उससे बोलना शुरू कर देगा। वह एक-एक जड़, एक-एक पत्‍ते और एक-एक फूल में उसे दिखाई पड़ने लगता है, बहुत कुछ, जो इनमें से किसी को दिखाई नहीं पड़ सकता है।</p>
<p>      तो उस लोक में, जो ऐसे ही मर जाते है इस जीवन में शरीर के अतिरिक्‍त बिना कुछ जाने, उनका तो कोई परिचय, कोई संबंध, कुछ नहीं हो पाता। वे तो एक कोमा में, एक गहरी तंद्रा में पड़े रह कर नये जन्‍म की प्रतीक्षा करते है। लेकिन जो कुछ तैयारी करके जाते है।</p>
<p>      इसकी तैयारी के भी शास्‍त्र है। और मरने के पहले अगर कोई वैज्ञानिक ढंग से मरे, विज्ञान पूर्वक मरे, और मरने की पूरी तैयारी करके मरे, पूरा पाथेय लेकर, मरने के बाद के पूरे सूत्र लेकि कि क्‍या–क्‍या करेगा। तो बहुत काम कर सकता है। विराट अनुभव की संभावनाएं वहां है। लेकिन साधारणत: नहीं। साधारणत: आदमी मरा, अभी जन्‍म जाए कि वर्षों बाद जन्‍मे। वह इस बीच से कुछ भी लेकिन कुछ भी करके नहीं आता है। और सीधे संवाद की कोई संभावना नहीं है। कोई संभावना नहीं है।</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>मैं कहता आंखन देखी,</p>
<p>प्रवचन—4</p>
<p>(संस्‍करण-1996)</strong></p>
<br />Filed under: <a href='http://oshosatsang.org/category/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b6%e0%a4%a8-%e0%a4%9a%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9a%e0%a4%be/'>प्रशन चर्चा</a> Tagged: <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/'>ओशो</a>, <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6/'>स्‍वामी आनंद प्रसाद</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/oshosatsang.wordpress.com/4370/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/oshosatsang.wordpress.com/4370/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/oshosatsang.wordpress.com/4370/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/oshosatsang.wordpress.com/4370/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/oshosatsang.wordpress.com/4370/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/oshosatsang.wordpress.com/4370/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/oshosatsang.wordpress.com/4370/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/oshosatsang.wordpress.com/4370/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/oshosatsang.wordpress.com/4370/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/oshosatsang.wordpress.com/4370/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/oshosatsang.wordpress.com/4370/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/oshosatsang.wordpress.com/4370/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/oshosatsang.wordpress.com/4370/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/oshosatsang.wordpress.com/4370/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4370&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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			<media:title type="html">आत्‍मा का अशरीरी रूप...क्‍या ? ओशो</media:title>
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		<item>
		<title>आत्‍मा का अशरीरी रूप क्‍या होता है ?  वह स्‍थिर होती है या विचरण करती है ?  अपनी परिचित दूसरी आत्‍माओं को पहचानती कैसे है ?  और उस अवस्‍था में आपस में कोई डायलॉग की भी संभावना होती है ? (भाग&#8211;भाग&#8211;2)</title>
		<link>http://oshosatsang.org/2012/02/09/%e0%a4%86%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%aa-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%af-2/</link>
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		<pubDate>Thu, 09 Feb 2012 13:24:40 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[प्रशन चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

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		<description><![CDATA[दूसरी बात जब ये व्‍यक्‍तियों में प्रवेश कर जाएं तब ये वाणी का उपयोग कर सकते है। तब संवाद संभव है। इसलिए आज तक पृथ्‍वी पर कोई प्रेत या कोई देव प्रत्‍यक्ष और सीधा कुछ भी संवादित नहीं कर पाया &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/02/09/%e0%a4%86%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%aa-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%af-2/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4365&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><div id="attachment_4366" class="wp-caption alignright" style="width: 310px"><a href="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/02/03-14-joyvibrations.jpg"><img src="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/02/03-14-joyvibrations.jpg?w=300&#038;h=300" alt="आत्‍मा का अशरिरी रूप--भाग दो--ओशो" title="आत्‍मा का अशरिरी रूप--भाग दो--ओशो" width="300" height="300" class="size-medium wp-image-4366" /></a><p class="wp-caption-text">आत्‍मा का अशरिरी रूप--भाग दो--ओशो</p></div>दूसरी बात जब ये व्‍यक्‍तियों में प्रवेश कर जाएं तब ये वाणी का उपयोग कर सकते है। तब संवाद संभव है। इसलिए आज तक पृथ्‍वी पर कोई प्रेत या कोई देव प्रत्‍यक्ष और सीधा कुछ भी संवादित नहीं कर पाया है। लेकिन ऐसा नहीं है कि संवाद नहीं हुए है। संवाद हुए है। और देवलोक या प्रेतलोक के संबंध में, स्‍वर्ग और नरक के संबंध में जो भी हमारे पास सूचनाएं है वे काल्‍पनिक लोगों के द्वारा नहीं हे, वे इन लोको में रहने वाले लोगों के ही द्वारा है। लेकिन किसी के माध्‍यम से है।<span id="more-4365"></span></p>
<p>      इसलिए बहुत पुराने दिनों में जो व्‍यवस्‍था थी वह यह थी—जैसे कि वेद है—तो वेद का कोई ऋषि नहीं कहेगा कि हम इनके लेखक है। वे है भी नहीं। इसमें कोई विनम्रता कारण नहीं है, कि हम लेखक नहीं है। इसमे तथ्‍य है। ये जो-जो कही गई है बातें, ये उनहोंने कही नहीं है। किसी आत्‍मा ने उनके द्वारा कहल वाई है। और ये अनुभव इतना साफ होता है, जब कोई और आत्‍मा तुम्‍हारे भीतर प्रवेश करके बोलेगी तब यह अनुभव इतना साफ है, क्‍योंकि तुम पूरी तरह से जानते हो, कि तुम अलग बैठे हो, और तुम बोल ही  नहीं रहे हो, और कोई और ही बोल रहा है। तुम भी सुनने वाले हो। बोलने वाले नहीं हो। बाहर से तो पता चलाना मुश्‍किल है, लेकिन बहार से भी जो लोग ठीक से कोशिश करें तो पता चल जायेगा। क्‍योंकि आवाज का ढंग बदल जायेगा। टोन बदल जायेगी। शैली बादल जायेगी। भाषा भी बदल सकती है। और उस व्‍यक्‍ति को भी भीतर बहुत ही साफ मालूम पड़ेगा।</p>
<p>      अगर प्रेत आत्‍मा प्रवेश की है तो शायद वह इतना भयभीत हो जाए कि मूर्च्‍छित हो जाए। लेकिन अगर देव आत्‍मा प्रवेश की है तो वह इतना जागरूक होगा जितना कि कभी भी नहीं था। और तब स्‍थिति बहुत साफ उसे दिखाई पड़ेगी। तो जिनमें प्रेतात्‍माएं प्रवेश करेंगी। वे तो प्रेतात्‍माओं के जाने के बाद ही कह सकेंगे कि कोई हमारे में प्रवेश कर गया था। वे इतने भयभीत हो जायेंगे  कि मूर्च्‍छित हो जाएंगे। लेकिन जिनमे दिव्‍य आत्‍मा प्रवेश करेगी, वे उसी क्षण भी कह सकेंगे कि यह कोई और बोल रहा है। यह मैं नहीं बोल रहा। ये दो आवाजें एक ही उपकरण उपयोग करेगी। जैसे एक ही माइक्रोफोन का दो आदमी एक साथ उपयोग कर रहे हो। एक चुप खड़ा रह जाए और दूसरा बोलना शुरू कर दें।</p>
<p>      तो शरीर की इंद्रियों का ऐसा उपयोग हो तब संवाद हो पाता है। इसलिए देवताओं के, प्रेतों के संबंध में जो भी उपलब्‍ध है जगत में , वह संवादित है, वह कहा गया है। और जो जानने का कोई उपाय नहीं है। जानने का वहीं उपाय है। और इन सबके पूरे के पूरे विज्ञान निर्मित हो गए थे। और जब विज्ञान पूरा होता है तो बड़ी आसानी हो जाती है। तब हम चीजों को समझ-बूझ पूर्वक उपयोग कर सकते है। जब विज्ञान नहीं होता तो समझ-बूझ पूर्व उपयोग नहीं कर सकते। कभी घटनाएं घटती है। तो इनका ठीक विज्ञान तय हो गया था। जैसे एक व्‍यक्‍ति प्रवेश कर गया, कोई दिव्‍य आत्‍मा किसी में प्रवेश कर गई। आकस्‍मिक रूप से, तो धीरे-धीरे इसका विज्ञान निर्मित कर लिया गया कि किन परिस्‍थितियों में वह दिव्‍य आत्‍मा प्रवेश करती है। वे परिस्‍थितियां अगर पैदा कर दी  जाये तो। क्‍या आत्‍मा फिर से प्रवेश कर सकेगी।</p>
<p>      अब जैसे की मुसलमान लोबान जलाएंगे। वह किन्‍हीं विशेष दिव्‍य आत्‍माओं के प्रवेश करने के लिए सुगंध के द्वारा वातावरण निर्मित करना है। या हिन्दू धूप जलाएंगे, या घी का दीपक जलाएंगे। ये सिर्फ औपचारिक है। लेकिन कभी इसके कारण थे। एक विशेष मंत्र बोलेंगे। विशेष मंत्र इनवोकेशन बन जाता है। इसलिए जरूरी नहीं है कि मंत्र में कोई अर्थ हो। अक्‍सर उसका अर्थ नहीं होता। क्‍योंकि अर्थ वाले मंत्र विकृत हो जाते है। अर्थहीन मंत्र विकृत नहीं होते। अर्थ में आप कुछ और भी प्रवेश कर सकत है। समय के अनुसार उसका अर्थ बदल जाता है। लेकिन अर्थहीन मंत्र में आप कुछ भी प्रवेश नहीं कर सकते। समय के अनुसार कोई अर्थ नहीं बदलता।</p>
<p>      इसलिए जितने गहरे मंत्र है वे अर्थहीन है। मीनिंगलेस है। उसमे कोई अर्थ नहीं है। जिसमे कि युग के अनुसार कोई फर्क पड़ेगा। सिर्फ घ्वनियां है। और ध्‍वनि उच्‍चारण की एक विशेष व्यवस्था है, उसी ढंग से उसका उच्‍चारण होना चाहिए। उतनी चोट, उतनी ही तीव्रता, उतना उतार, उतना चढ़ाव, उतनी चोट होने पर वह आत्‍मा तत्‍काल प्रवेश कर जायेगी। यह वह आत्‍मा खो गई होगी तो उस जैसी कोई आत्‍मा प्रवेश कर सकती है।</p>
<p>      सारी दूनिया के धर्मों के जो मंत्र है, जैसे कह जैनों का नमो कार ह, उसके पाँच हिस्‍से है, और प्रत्‍येक हिस्‍से पर जो इनवोकेशन है, जो आह्वान है, वह गहरा होता जाता है। प्रत्‍येक पद पर आह्वान गहना होता जाता है। और गहरी आत्‍माओं के लिए होता चला जाता है। और साधारण: जैसा लोग समझते है, जैसा आज चलता है कि पूरे नमो कार को पढ़ेंगे—वह ठीक स्‍थिति नहीं है। जैसे पहले पद से संबंध जोड़ना है। उसको पहले पर को ही दोहराना चाहिए। बाकी चार को बीच में लाने की जरूरत नहीं है। उस पर ही जोर देना चाहिए। क्‍योंकि उस पद से संबंधित आत्‍माएं बिलकुल अलग है।</p>
<p>      जैसे नमो अरिहंताणम्। उसमें अरिहंत के लिए नमस्‍कार। अब ‘’अरिहंत’’ विशेष रूप से जैनों का शब्‍द है। जिसने अपने समस्‍त शत्रुओं को नष्‍ट कर दिया हो। अरिहंत का अर्थ है। ‘’अरि’’ का अर्थ है, शत्रु और हंत का अर्थ है जिसने मार डाला। तो वह ऐसी आत्‍मा के लिए पुकार है जो अपनी इंद्रियों को बिलकुल ही समाप्‍त करके विदा हुई है। यह उस आत्‍मा के लिए पुकार है जिसका सिर्फ एक ही जन्‍म हो सकता है। यह एक ही पर दोहराना है एक विशेष ध्‍वनि और चोट के साथ।</p>
<p>      यह बहुत स्‍पेसिफिक पुकार है। विशेष पुकार है। इस पुकार के द्वारा इतर जैन दिव्‍य आत्‍मा से संबंध नहीं होगा। वह एक पारिभाषिक शब्‍द है, जो सिर्फ जैन दिव्‍य आत्‍मा से संबंध जुड़ा पाएंगे। इसमें क्राइस्‍ट से संबंध नहीं हो सकता है। इसमे आकांशा नहीं है। इसमें बुद्ध से संबंध नहीं हो सकता। यह पारिभाषिक शब्‍द है। और यह पारिभाषिक आत्‍मा के लिए पुकार है। ठीक ऐसे ही, अलग-अलग पूरे पाँच हिस्‍सों में पाँच अलग तरह की आत्‍माओं के लिए पूकार है। अंतिम जो पुकार है। नमो लोए, सव्‍व हसहूणं, वह समस्‍त साधुओं को नमस्‍कार है। उसमें विशेष पुकार नहीं है। उसमे साधु आत्‍मा मात्र के लिए आह्वान है। उसमे जैन और इतन जैन का प्रश्‍न नहीं है। उसमे कोई भी साधु आत्‍मा से संबंध जोड़ने की आकांशा है। वह बड़ी जनरालाइज्‍ड पुकार है। कोई विशेष निमंत्रण नहीं है उसमें।</p>
<p>      सारी दुनिया के धर्मों के पास ऐसे मंत्र है जिनसे संबंध जोड़ा जाता रहा है। अब तक वे शक्‍ति मंत्र बन गये है। और बड़ी उनकी बीज-महता हो गई। वे नाम की तरह है। जैसे आपका नाम रख दिया राम। फिर राम की आवाज दी तो आप चौकन्‍ने हो गए। ऐसे ही सारे मंत्र है। प्रेतात्‍माओं के लिए भी वैसे ही मंत्र है। और दोनों का अपना शास्‍त्र है। व्‍यक्‍ति तो खोते चले जाएंगे। आत्‍माएं बदलती चली जाएंगी, लेकिन तालमेल खाती आत्‍माएं सदा उपलब्‍ध होती रहेगी। जिनसे संबंध जोड़ा जा सके। इस स्‍थिति में संवाद हो सकता है।</p>
<p>      अब जैसे मोहम्‍मद को&#8230;&#8230;इसलिए मोहम्‍मद ने कभी नहीं कहा, मोहम्‍मद ने सदा यही कहा कि मैं सिर्फ पैगंबर हूं&#8230;.सिर्फ पैगाम दे रहा हूं। मैसेंजर। क्‍योंकि मोहम्‍मद को कभी ऐसा नहीं लगा। कि जो वे दे रहे है वह उनका है। इतनी साफ आवाज ऊपर से आई। जिसे, मुसलमान इलहाम कहते है, रिवील हुआ—कि कोई और भीतर प्रवेश कर गया और बोल रहा है। खुद मोहम्‍मद को भरोसा नहीं आया कि यह जो मैं बोल रहा हूं, कोई मेरी मानेगा। क्‍योंकि कभी मैं यह बोला नहीं। मेरा कोई परिचय नहीं है लोगों से ऐसा। लोग जानते नहीं है, कि मैं इस तरह से बात बोल सकता हूं। इसलिए कोई मेरा मानने वाला नहीं है।</p>
<p>      इसलिए मोहम्‍मद डरे हुए घर लौटे। और रास्‍ते में बचे हुए घर आए कि कहीं किसी से बोल न दें, अन्‍यथा अविश्‍वास के सिवाय कुछ भी नहीं होगा। क्‍योंकि पीछे कोई भी तो आधार नहीं है। पृष्‍ठ भूमि नहीं है। तो जाकर पहले सिर्फ अपनी पत्‍नी को कहा। और उससे भी कहा कि तुम भरोसा हो तो करना, नहीं भरोसा हो तो मत करना। और तुम भरोसा आ जाए तो फिर मैं किसी और को कहूं। अन्‍यथा मैं  न कहूं। क्‍योंकि जो हुआ है, जो आया है। वह ऊपर से आया है। वह कोई बोल गया है। वह मेरी नहीं है आवाज। सिर्फ शब्‍द मेरे है, बोल कोई और रहा है। पत्‍नी को भरोसा आया। तो फिर और निकट के किसी को कहा।</p>
<p>      मूसा के साथ भी ठीक ऐसा ही हुआ। वाणी उतरी। यह जो वाणियों का उतरना है, वह किसी और बड़ी दिव्‍य आत्‍मा के द्वारा किसी का प्रयोग करना है। हर किसी का प्रयोग नहीं हो सकता। उसी का प्रयोग हो सकता है जो इतना वैहिकल, वाहन बनने की पवित्रता तो चाहिए ही, उतनी पवित्रता चाहिए, तब संवाद हुआ है। संवाद तो हो सकता है। लेकिन तब दूसरे के शरीर का उपयोग करना पड़ता है।</p>
<p>      अभी इस तरह की कोशिश कृष्णामूर्ति के साथ चली, जो कि असफल हुई।</p>
<p>      बुद्ध का एक अवतार होने की बात है—मैत्रेय। बुद्ध ने कहा है कि मैं मैत्रेय के नाम से एक बार और लौटूंगा। पर बहुत वक्‍त हो गया, ढाई हजार साल हो गए है। और ऐसी प्रतीति है कि कोई योग्‍य गर्भ उपलब्‍ध नहीं हो रहा है। और मैत्रेय जन्‍म लेना चाहता है। लेकिन कोई योग्‍य गर्भ उपलब्‍ध नहीं है। तब एक दूसरी कोशिश करने की व्‍यवस्‍था कि गई कि गर्भ अगर नहीं मिल सकता है तो कोई व्‍यक्‍ति को विकसित किया जाए और उस व्‍यक्‍ति के माध्‍यम से वह बोल डाले।</p>
<p>      तो इसके लिए बड़ा आयोजन चला। सारी थियोसाफी का पूरा का पूरा आंदोलन सिर्फ एक काम के लिए निर्मित हुआ कि वह इतना काम कर दे, पूरा आंदोलन, कि एक व्‍यक्‍ति को खोज कर तैयार कर दे सब तरह से कि वह वैहिकल बन जाए।</p>
<p>      मोहम्‍मद से जो आत्‍मा संदेश देना चाहती थी। उसको यह तकलीफ नहीं हुई। वैहिकल बनाना नहीं पडा। तैयार मिला। मूसा से जिस आत्‍मा ने संदेश देना था उसको वाहन मिल गय। वे बहुत सरल युग थे। वाहन मिलना कठिन नहीं था। अहंकार इतना कम था कि कोई दूसरा उसका उपयोग कर सकता है। वह अपने शरीर से हट जाए बिलकुल ऐसे जैसे है ही नहीं। अब यह असंभव हो गया है। इंडीवीजुअलटी प्रगाढ़ है। व्‍यक्‍ति अहंकार भारी है। कोई इंच भर नहीं हट सकता। तो कठिन है मामला। तो व्‍यक्‍ति तैयार कर लिए जाए।</p>
<p>      तो थायोसोफिस्ट ने तीन-चार छोटे बच्‍चों को चुना, क्‍योंकि पक्‍का भरोसा नहीं है कि किस बच्‍चे का भविष्‍य क्‍या हो जाए। उसमे कृष्‍ण मूर्ति को चुना, उसके एक भाई नित्या नंद को चुना गया, कृष्‍ण मेनन को भी पीछ चूना गया। एक और व्‍यक्‍ति जार्ज अरंडेल को भी चूना। नित्या नंद की तो मृत्‍यु हुई अति चेष्‍टा करने से , दुर्घटना हुई। नित्या नंद पर इतनी चेष्‍टा की गई—कृष्‍ण मूर्ति के भाई पर। कि वह ठीक माध्‍यम बन जाए मैत्रेय का संदेश देने का। उस चेष्‍टा में ही उसकी मृत्‍यु हो गई। उसकी मृत्‍यु से भी कृष्‍ण मूर्ति को इतना धक्‍का पहुंचा कि उनके भी माध्‍यम बनने में बाधा पड़ी। उसकी मृत्‍यु उस पूरे प्रयोग में हुई।</p>
<p>      कृष्‍ण मूर्ति को नौ साल की उम्र में ऐनि बेसेंट और लीट बिटर ने लिया। लेकिन यह मजे का खेल है, जगत एक बड़ा ड्रामा है। और छोटी शक्‍तियों का खेल नहीं। बड़ी शक्तियां खेल रही है। और जब मैत्रेय की आत्‍मा की संभावना बढ़ने लगी कि हो सकता है कृष्णामूर्ति से उतर जाएं, तो जिस आत्‍मा ने, देवदत्‍त नाम के व्‍यक्‍ति ने, जिसने बुद्ध का जीवन भर विरोध किया, बुद्ध के जीवन में बुद्ध की हत्‍या की अनेक कोशिश की। बुद्ध का चचेरा भाई था, उसकी आत्‍मा कृष्‍ण मूर्ति के पिता पर हावी हो गई। और एक मुकदमा चला जो प्रिवी कौंसिल तक गया।</p>
<p>      यह बात कभी नहीं कही गई। यह मैं पहली दफा कहा रहा हूं। कृष्‍ण मूर्ति के पिता के द्वारा यह दावा करवाया गया कि उसके बच्‍चे को जबरदस्ती इन लोगों ने कब्‍जा कर लिया है और वह वापस चाहते है। नाबालिग बच्चा है। एनी बेसेंट ने जी-जान लगा कर वह संघर्ष किया। फिर भी नियमानुसार वह जी नहीं सकती थी। क्‍योंकि नाबालिग बच्चे ते और बाप का हक था। अगर बच्‍चे भी कहें तो भी कोई बात नहीं थी। क्‍योंकि वे नाबालिग थे। उनकी बात का कोई मतलब नहीं हो सकता था।</p>
<p>      इसलिए कृष्‍ण मूर्ति को लेकिर हिंदुस्तान के बाहर भाग जाना पडा। इधर मुकदमा चलाया गया, उधर लेकर भाग गए। इधर मुकदमा चला, इधर से हारी एनी बेसेंट। लेकिन तब तक कृष्‍ण मूर्ति को बाहर निकाल लिया गया। फिर वह सुप्रीम कोर्ट में चला, वहां से भी एनी बेसेंट हारी। क्‍योंकि वह तो कानूनी मामला था। देवदत्‍त के हाथ में ज्‍यादा ताकत थी। और अक्‍सर ऐसा होता है, बुरे आदमियों के हाथ में कानून अक्‍सर सहयोगी हो जाता है। क्‍योंकि अच्‍छे आदमी को कानून की बहुत फिक्र नहीं होती। बुरे आदमी कानून का पहले इंतजाम कर लेते है। फिर वह प्रिवी कौंसिल में गया। लेकिन प्रिवी कौंसिल ने, सब कानून को तोड़ कर निर्णय दिया  कि वह एनी बेसेंट के पार रहे। इसके लिए कोई प्रिसीडेंट नहीं था। यह बिलकुल ही न्‍यायोचित नहीं थी घटना। इसके लिए कोई नियम नहीं था। यह बिलकुल ही गैर कानूनी था फैसला। लेकिन प्रिवी कौंसिल के ऊपर तो कोई उपाय नहीं थ।</p>
<p>      यह निर्णय भी मैत्रेय की आत्‍मा के द्वारा ही  संभव हुआ। नहीं तो संभव नहीं हो सकता था। और इसीलिए छोटी कोर्ट में इसकी कोशिश नहीं की गई क्‍योंकि उनके ऊपर बड़ी कोर्ट थी। आखिरी कोर्ट में ही उपयोग किया गया। छोटी अदालतों में इसका उपयोग करना बेकार था। क्‍योंकि बड़ी अदालत से वह फिर हार हो जाती। इसलिए आखिरी आदलत के लिए रोक कर रखा गया।</p>
<p>      यह नीचे के तल पर तो एक खेल था, जो इधर दिखाई पड़ रहा था, अखबारों में चल रहा था, अदालतों में  मुकदमा लड़ा जा रहा था। लेकिन ऊपर के तल पर भी शक्तियों का एक संघर्ष था। फिर कृष्णामूर्ति पर जितनी मेहनत की गई, इतनी शायद ही कभी किसी व्‍यक्‍ति पर की गई है। व्‍यक्‍तियों ने खुद की है अपने ऊपर, इससे भी ज्‍यादा मेहनत की है। लेकिन दूसरे लोगों ने किसी पर इतनी मेहनत की हो, ऐस कभी नहीं हुआ। पर सारी मेहनत के बावजूद भी बात बिगड़ गई। और ऐन वक्‍त पर।</p>
<p>      जिस दिन थायोसोफिस्ट ने सारी दुनिया से छह हजार लोगों को हॉलैंड में इक्ट्ठा कर रखा था। और जिस दिन घोषणा होने वाली थी। कि कृष्‍ण मूर्ति उस दिन अपने व्‍यक्‍तित्‍व को छोड़ देंगे और मैत्रेय के व्‍यक्‍तित्‍व को स्‍वीकार कर लेंगे। सारी तैयारियाँ हो गई थी। आखिरी इंच की घोषणा थी, एक बिंदु की बात थी,  कि मंच‍ पर खड़े होकर वह कहेंगे कि अब मैं कृष्णामूर्ति नहीं हूं। बस इतनी सी घोषणा थी। सारी भीतरी तैयारी हो चुकी थी। कृष्‍ण मूर्ति अपने व्‍यक्‍तित्‍व को इंकार कर देंगे और खाली बैठ जायेंगे। ताकि मैत्रेय की आत्‍मा प्रवेश हो जाए और बोलना शुरू कर दे।</p>
<p>      सारी दुनियां से छह हजार लोग जो समझते थे और उत्‍सुक थे और प्‍यासे थे। वे इकट्ठे हुए थे। दूर-दूर से आकर घटना को देखने के लिए—मैत्रेय की आवाज को सुनने के लिए। वह बहुत अनूठी घटना होने वाली थी। लेकिन ऐन वक्‍त पर कुछ नहीं हुआ। और कृष्‍ण मूर्ति ने इनकार कर दिया। देवदत्त फिर धक्‍का दिया। और वह जो प्रिवी कौंसिल में नहीं हो सका था वह अंतत: आखिरी अदालत में हार गया मामला। देवदत्त फिर धक्‍का दिया और ऐन वक्‍त पर इनकार कर दिया। कि मैं शिक्षक नहीं हूं। में कोई जगतगुरू नहीं हूं। किसी कि आत्‍मा से मुझे कुछ लेना देना नहीं है। मैं केवल मैं हूं, और जो मुझे कहना थ वह कह दिया।</p>
<p>      बहुत बड़ा प्रयोग असफल हुआ। पर एक अर्थ में पहला ही प्रयोग था उस तरह का और असफल होने की ही ज्‍यादा संभावना थी। उस तल पर आत्माएं संवाद नहीं कर सकती।  जब तक वे किसी के शरीर को न ग्रहण कर लें। और बीच में उनकी कोई प्रगति नहीं होती। इसीलिए मनुष्‍य जन्‍म फिर अनिवार्य है। आज कोई मरा और सौ साल तक वह अशरीरी हालत में रहे, तो इस सौ साल में किसी तरह का विकास नहीं होता। वह जहां मरा था पिछले जन्‍म में, ठीक वही से नये जन्‍म में प्रवेश करेगा। चाहे कितने ही समय बाद प्रवेश करे। वह विकास का काल नहीं है। ठीक वैसे ही जैसे रात जहां आप सोते है, सुबह आप वहीं उठते है। नींद कोई विकास का काल नहीं है।</p>
<p>      इसलिए अगर बहुत से धर्म नींद के खिलाफ हो गये तो उसका कारण था, और उसको कम करने में लग गए। क्‍योंकि वह विकास का काल नहीं है। उसमें कोई विकास नहीं होता। जहां आप थे सुबह वहीं उठते है। ऐसे ही दो शरीरों के बीच में, जहां से आप मरे थे, वहीं आप जन्‍मते है। आपकी स्‍थिती में कोई अंतर नहीं आता। बिलकुल ऐसे जैसे हमने एक घड़ी बंद कर दी अभी और जब हम दुबारा शुरू करेंगे तो वह वहीं से शुरू हो जाएंगी। जहां हमनें बंद की थी। बीच में सब विकास अवरूद्ध है।</p>
<p>      इसलिए कोई भी देव-योनि से मोक्ष नहीं जा सकता है। देव-योनि से मोक्ष न जाने का कुछ कारण इतना है कि देव-योनि में कोई कर्म योनि नहीं है। आप कुछ कर नहीं सकते। कुछ हो नहीं सकता। सपने देख सकते है। अंतहीन सपने देख सकते है। तो मनुष्‍य होने लौटना ही पड़े।</p>
<p>क्रमश: अगले अंक में&#8230;&#8230;..</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>मैं कहता हूं आंखन देखी,</p>
<p>प्रवचन—4</p>
<p>(संस्‍करण-1996)</strong></p>
<br />Filed under: <a href='http://oshosatsang.org/category/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b6%e0%a4%a8-%e0%a4%9a%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9a%e0%a4%be/'>प्रशन चर्चा</a> Tagged: <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/'>ओशो</a>, <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6/'>स्‍वामी आनंद प्रसाद</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/oshosatsang.wordpress.com/4365/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/oshosatsang.wordpress.com/4365/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/oshosatsang.wordpress.com/4365/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/oshosatsang.wordpress.com/4365/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/oshosatsang.wordpress.com/4365/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/oshosatsang.wordpress.com/4365/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/oshosatsang.wordpress.com/4365/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/oshosatsang.wordpress.com/4365/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/oshosatsang.wordpress.com/4365/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/oshosatsang.wordpress.com/4365/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/oshosatsang.wordpress.com/4365/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/oshosatsang.wordpress.com/4365/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/oshosatsang.wordpress.com/4365/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/oshosatsang.wordpress.com/4365/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4365&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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			<media:title type="html">आत्‍मा का अशरिरी रूप--भाग दो--ओशो</media:title>
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		<title>आत्‍मा का अशरीरी रूप क्‍या होता है ?  वह स्‍थिर होती है या विचरण करती है ?  अपनी परिचित दूसरी आत्‍माओं को पहचानती कैसे है ?  और उस अवस्‍था में आपस में कोई डायलॉग की भी संभावना होती है ?</title>
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		<comments>http://oshosatsang.org/2012/02/05/%e0%a4%86%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%aa-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%af/#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 05 Feb 2012 14:33:59 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[प्रशन चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://oshosatsang.org/?p=4359</guid>
		<description><![CDATA[ओशो—इस संबंध में दो बातें ख्‍याल में लेनी चाहिए। एक तो स्‍थिरता और गति दोनों ही वह नहीं होती। और इस लिए समझना बहुत कठिन होगा। हमें समझना आसान होता है कि गति न हो, तो स्‍थिरता होगी। स्‍थिरता न &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/02/05/%e0%a4%86%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%aa-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%af/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4359&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>ओशो—इस संबंध में दो बातें ख्‍याल में लेनी चाहिए। एक तो स्‍थिरता और गति दोनों ही वह नहीं होती। और इस लिए समझना बहुत कठिन होगा। हमें समझना आसान होता है कि गति न हो, तो स्‍थिरता होगी। स्‍थिरता न हो, तो गति होगी। क्‍योंकि हमारे ख्‍याल में गति और स्‍थिरता दो ही संभावनाएं है। <div id="attachment_4360" class="wp-caption alignright" style="width: 234px"><a href="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/02/03-08-europa.jpg"><img src="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/02/03-08-europa.jpg?w=224&#038;h=300" alt="ध्‍यान के अनुभव--ओशो" title="ध्‍यान के अनुभव--ओशो" width="224" height="300" class="size-medium wp-image-4360" /></a><p class="wp-caption-text">ध्‍यान के अनुभव--ओशो</p></div>और एक न हो तो दूसरा अनिवार्य है। हम यह भी समझते है कि ये दोनों एक दूसरे से विरोधी है।</p>
<p>      पहली तो बात गति और स्‍थिरता विरोधी नहीं है। गति और स्‍थिरता एक ही चीज की तारतम्‍यताएं है। जिसको हम स्‍थिरता कहते है। वह ऐसी गति है। जो हमारी पकड़ में नहीं आती। जिसको हम गति कहते है वह भी ऐसी स्‍थिरता है जो हमारे ख्‍याल में नहीं आती। तो पहली तो बात गति और स्‍थिरता दो विरोधी चीजें नहीं है। बहुत तीव्र गति हो तो भी स्‍थिर मालूम होगी।<span id="more-4359"></span></p>
<p>      यह ऊपर पंखा है, यह तेज गति से चलता हो तो इसकी तीन पंखुडियां दिखाई नहीं देंगे। बहुत तेज चले तो संभावना ही नहीं है, अनुमान करने की कि कितनी पंखुडियां है। क्‍योंकि बीच की जो खाली जगह है तीन पंखुड़ियों के, इसके पहले कि वह हमें दिखाई पड़ें, पंखुडी उस जगह को भर देती है। वह पंखा इतनी तेज चल सकता है कि हम इसके आर पार किसी चीज को भी न निकाल सकें। यह इतना तेज भी चल सकता है कि हम इसका छुएँ और इसकी गति न मालूम पड़े। जब हम किसी चीज को हाथ से छूत है, बीच का वो खाली हिस्‍सा है जो हमारे हाथ के स्‍पर्श के पकड़ने से पहले दुसरी पंखुडी फिर नीचे आ जाए तो हमें पता नहीं चल सकेगा। इस लिए विज्ञान कहता है इस लिए जो चीज हमे थिर मालूम पड़ती है, वह सब गति मान है। पर गति बहुत तीव्र है, हमारी पकड़ के बाहर है। तो गति और थिर होना दो चीजें नहीं है। और एक ही चीज की डिग्रीज़ है।</p>
<p>      उस जगत में जहां शरीर नहीं है। दोनों नहीं होंगी। क्‍योंकि जहां शरीर नहीं है वहां स्‍पेस भी नहीं है। टाइम भी नहीं है। जैसा हम जानते है, ऐसा कोई स्‍थान भी नहीं है। कोई समय भी नहीं है। समय और स्‍थान के बाहर किसी भी चीज को सोचना हमें अति कठिन है। क्‍योंकि हम ऐसी कोई चीज नहीं जानते जो समय और स्‍थान के बाहर हो।</p>
<p>      तो वहां क्‍या होगा अगर दोनों नहीं है तो?</p>
<p>      तो हमारे पास कोई शब्‍द नहीं है, जो कहे कि वहां क्‍या होगा। जब पहली दफा धर्म के अनुभव में उस स्‍थिति की खबरें आनी शुरू हुई तब भी यह कठिनाई खड़ी हुई। कहें क्‍या? ऐसे ठीक समानांतर उदाहरण विज्ञान के पास भी है। जहां कठिनाई खड़ी हो गई है कि क्‍या कहें? जब भी हमारी धारणाओं से भिन्‍न कोई स्‍थिति का अनुभव होता है तो बडी कठिनाई खड़ी होती है।</p>
<p>      जेसे कि पिछले साठ-सत्‍तर साल पहले जब पहली दफा इलैक्ट्रा का अनुभव विज्ञान को हुआ तो सवाल उठा कि इलेक्ट्रॉन कण है या तरंग? और बड़ी कठिनाई खड़ी हो गई। क्‍योंकि न तो उसे कण कह सकते , कण तो ठहरा हुआ होता है, तरंग गतिमान होती है। वह दोनों एक साथ है। तब सिर घूम जाता है, क्‍योंकि हमारी समझ में इन दोनों में से एक ही हो सकता है। और इलैक्ट्रा दोनों एक साथ है—कण भी ओ तरंग भी। कभी हमारी पकड़ में आता है कि वह कण है। कभी हमारी पकड़ में आता है कि वह तरंग है। और तब शब्‍द ही नहीं था। दुनिया की किसी भाषा में। और तब वैज्ञानिको ने कहा ये तो कण तरंग दोनों है। लेकिन उनके लिए भी कंसीवेब़ल नहीं रहा है। रहस्‍य हो गई बात। और जब आइंस्‍टीन से लोगों ने कहा कि आप दोनों बातें एक साथ कहते है जो कि तर्क में नहीं आती है; ये तो बड़ी रहस्‍य की बातें हो गई। तो आइंस्‍टीन ने कहा कि हम तर्क को माने कि तथ्‍य को मानें। तथ्‍य यही है कि वह दोनों है। एक साथ और तर्क यही कहता है कि दो में एक ही हो सकता है।</p>
<p>      अब एक आदमी खड़ा हुआ है या चल रहा है। तर्क कहेगा, दो में से एक ही हो सकता है। आप कहें कि वह खड़ा भी है और चल भी रहा है—एक साथ। तर्क नहीं मानेगा, तर्क के पास ऐसी कोई धारणा नहीं हे। लेकिन इलेक्ट्रॉन के अनुभव ने वैज्ञानिकों को कहा कि अब तर्क की फिक्र छोड़ देनी पड़ेगी। क्‍योंकि या तो तथ्‍य को झुठलाओ, सारे प्रयोग कहते है कि वह दोनों है। यह मैनें उदाहरण के लिए आपको कहा।</p>
<p>      सारे धार्मिक लोगों के अनुभव कहते है कि वह स्‍थिति दोनों नहीं है—न ठहरी हुई है, न गतिमान है। लेकिन जो भी यह कहेगा कि दोनों नहीं है अंतराल का क्षण , एक शरीर से छूटने और दूसरा शरीर के मिलने के बीच के क्षण में दोनों नहीं है। वह समझ के बाहर की बात है। इसलिए कुछ धर्मों ने तय किया है वे कहेंगे कि वह थिर है। कुछ धर्मों ने तय किया है कि वह  कहेंगें की वह गतिमान है। लेकिन वह सिर्फ समझाने की कठिनाई का परिणाम है। अन्‍यथा कोई इस बात के लिए राज़ी नहीं है कि वहां स्‍थिति  को स्‍थिति कहे की गति कहे। दोनों नहीं कहे जा सकते। क्‍योंकि जिस परिवेश में स्‍थिति और गति घटित होती है। वह परिवेश ही वहां नहीं है। स्‍थिति और गति दोनों के लिए शरीर चाहिए। शरीर के बिना गति नहीं हो सकती। और शरीर के बीना स्‍थिति भी नहीं हो सकती। उसी के माध्‍यम से गति हो सकती है।</p>
<p>      अब जैसे यह हाथ है मेरा, मैं इसे हिला रहा हूं या इसे ठहराए हुए हूं। कोई मुझसे पूछ सकता है कि इस हाथ के भीतर जो मेरी आत्‍मा है, जब हाथ नहीं रहेगा तो वह आत्‍मा ठहरी हुई रहेगी की गति में रहेगी। दोनों बातें व्‍यर्थ है। क्‍योंकि इस हाथ के बिना न वह गति कर सकती है और न ठहरी हुई हो सकती है। ठहराना और गति दोनों ही शरीर के गुण है। शरीर के बाहर ठहरने और गति का कोई भी अर्थ नहीं है।</p>
<p>      ठीक यही बात समस्‍त द्वंद्वों पर लागू होगी। बोलने या मौन होने पर शरीर के बीना न तो बोला जा सकता है और न मौन हुआ जा सकता है। आमतौर से हमारी समझ में आ जाएगी यह बात कि शरीर के बिना बोला नहीं जा सकता। लेकिन मौन भी नहीं हुआ जा सकता। यह समझ में आनी कठिन पड़ेगी। क्‍योंकि हम सोचते है शरीर के लिए मौन&#8230;&#8230;। लेकिन असली बात यह है कि जिस माध्‍यम से बाला जा सकता है उसी माध्‍यम से मौन हुआ जा सकता है। क्‍योंकि मौन होना भी बोलने का एक ढंग है। मौन होना बोलने की ही एक अवस्‍था है। न बोलने की है, लेकिन है बोलने की ही।</p>
<p>      जैसे उदाहरण के लिए, एक आदमी अंधा है। तो हमे ख्‍याल होता है कि शायद उसको अँधेरा दिखाई देता होगा। वह हमारी भ्रांति है। अँधेरा देखने के लिए भी आँख जरूरी है। आँख के बिना अँधेरा भी दिखाई नहीं पड़ता। पर हम आँख बंद करके सोचते है तो हम गलत है। क्‍योंकि आँख बंद करके भी आँख है, आप अंधे नहीं है। और अगर एक दफा आपके पास आँख है, आप अंधे नहीं है। और अगर एक आपके पास आँख रही हो और आप अंधे हो जाए, तो भी आपको अंधेरे का ख्‍याल रहेगा। जो कि झूठा है। जो कि जन्‍म से अंधे आदमी को नहीं है। क्‍यों कि अँधेरा जो है वह आँख का ही अनुभव है। जिससे प्रकाश का अनुभव होता है। उसी से अंधकार का भी अनुभव होता है। तो जो जन्‍मांध है, उसे अंधेरे का भी कोई पता नहीं होता। अँधेरा भी जानेगा कैसे?</p>
<p>      कान से आप सुनते है। भाषा से ठीक लगता है कि जिसके पास कान नहीं है, हम कहेंगे कि तुम मत कहो, वह नहीं सुन रहा। लेकिन नहीं सुनने की घटना भी नहीं घटती है। बहरे के लिए। नहीं सुनने की जो प्रतीति है, वह कान वाले कि प्रतीति है। कभी ऐसा होता है कि आप नहीं सुनते है। पर वह कान उसके लिए भी जरूरी है। कान के बिना ‘’नहीं सुनने’’ का भी कोई पता नहीं चल सकता है। वह अंधेरे की तरह है।</p>
<p>      तो जिस इंद्रिय से गति होती है। उसी इंद्रिय से ठहराव होता है। और दो में से एक भी चीज नहीं है। तो दूसरी भी नहीं होगी। तो वैसी अवस्‍था में आत्‍मा बोलती है या चुप रहती है। दोनों ही बातें संभव नहीं है। उपकरण ही नहीं है। बोलने का या चुप रहने का। ये सब उपकरण निर्भर घटनाएं है। इन दोनों के लिए उपकरण चाहिए। जगत के समस्‍त अनुभव के लिए उपकरण चाहिए। साधन चाहिए, इंद्रिय चाहिए।</p>
<p>      जहां भी शरीर नहीं हे। वहां शरीर से संबंधित समस्‍त अनुभव तिरोहित हो जाते है। फिर वहां कुछ बचेगा? अगर आपके जीवन में कोई भी शरीर के भीतर रहते हुए अशरीरी अनुभव हुआ हो, तो बचेगा। अन्‍यथा कुछ भी नहीं बचेगा। अगर आप के जीते जी, शरीर के रहते हुए कोई भी अनुभव हुआ हो जिसके लिए शरीर माध्‍यम नहीं था, वह बचेगा।</p>
<p>      ध्‍यान के कोई भी अनुभव हों गहरे, तो बचेंगे। साधारण अनुभव नहीं। ध्‍यान में आपको प्रकाश दिखाई पडा, वह नहीं बचेगा। लेकिन ध्‍यान में कोई ऐसा अनुभव हुआ हो जिससे शरीर ने कोई माध्‍यम का काम नहीं किया था। आप कह सकते थे कि शरीर था या नहीं यह भी मुझे कोई संबंध नहीं रह गया था। तो बच जाएगा। पर ऐसे अनुभव के लिए कोई भाषा नहीं है। शरीर रहते हुए भी हो, तो भी भाषा नहीं है। ये सारी कठिनाइयां है।</p>
<p>      फिर भी इसका यह मतलब नहीं है कि वैसी आत्‍मा मोक्ष में पहुंच गई, क्‍योंकि वे दोनों विवरण एक जैसे लगेंगे। फिर मोक्ष में और दो शरीरों के बीच में जो अंतराल है, इसमें क्‍या भेद रहा। भेद पोटेंशियलिटी के, बीज के रहेंगे, वास्‍तविकता के नहीं रहेंगे। दो शरीरों के बीच में जो अशरीरी व्‍यवधान है बीच का। उसमें आपके जीतने संस्कार है समस्‍त जन्‍मों के, वे बीज-रूप में सब मौजूद रहेंगे। शरीर के मिलते ही वह फिर से सक्रिय हो जायेंगे। जैसे एक आदमी के पैर हमने काट दिए, तो भी उसके दौड़ने के जो अनुभव है वे विदा नहीं हो जाएंगे। दौड़ नहीं सकता, रूक भी नहीं सकता, क्‍योंकि दौड़ नहीं सकता तो रुकेगा कैसे। लेकिन अगर पैर मिल जाएं तो दौड़ने की समस्‍त संस्‍कार धारा पुन: सक्रिय हो जाएगी।</p>
<p>      जैसे एक आदमी कार चलाता है। लेकिन कार छीन ली। तो अब कार नहीं चला सकता, ऐक्सलरेटर नहीं दबा सकता।  लेकिन ब्रेक भी नहीं लगा सकता। कार रोक भी नहीं सकता। वे दोनों ही कार के अनुभव थे। अब वह कार के बाहर है। लेकिन कार के चलाने का जो भी अनुभव है, वह सब बीज रूप में मौजूद है। वर्षों बाद, ऐक्सलरेटर पर पैर रखेगा, कार चला सकता है।</p>
<p>      मोक्ष में संस्‍कार-रहित हो जाता है। दो शरीरों के बीच में सिर्फ इंद्रिय-रहित होता है। मोक्ष में समस्‍त अनुभव, समस्‍त अनुभवजन्‍य संस्‍कार, सब कर्म, सब तिरोहित हो जाते है। उनकी निर्जरा हो जाती है। इस बीच और मोक्ष की अवस्‍था में एक समानता है—दोनों में शरीर नहीं होता। एक असमानता है—मोक्ष में शरीर नहीं होता, शरीर से संबंधित अनुभवों का जाल भी नहीं होता। यहां शरीर से संबंधित अनुभवों की सब सूक्ष्‍म तरंगें बीज रूप से मौजूद होती है। जो कभी भी सक्रिय हो सकती है। और इस बीच जो-जो अनुभव होंगे। वह शरीर जहां नहीं था, वैसे अनुभव होंगे। जैसे मैंने कहा कि ध्‍यान के अनुभव होंगे।</p>
<p>     <strong> लेकिन ध्‍यान के अनुभव तो बहुत कम लोगों के है। कभी करोड़ में किसी एक आदमी को ध्‍यान का अनुभव होता है। शेष का क्‍या कोई अनुभव नहीं होगा?</strong></p>
<p>      अनुभव होगा—स्‍वप्‍न के अनुभव। स्‍वप्‍न में शरीर की कोई इंद्रियाँ काम नहीं करती। इस बात की संभावना है कि हम एक आदमी को जो स्वप्न में हो, और उसे स्‍वप्‍न में ही रखे हुए उसके सारे शरीर को काट कर अलग कर दें, तो आवश्‍यक नहीं है कि उसके स्‍वप्‍न में जरा सा भी भंग पड़े। कठिनाई है कि उसकी नींद टूट जाएगी। काश, हम उसे नींद में रख सके। और हम उसके एक-एक अंग को अलग करते चले जाए। तो उसका स्‍वप्‍न जरा भी भंग नहीं होगा। क्‍योंकि शरीर का कोई हिस्‍सा उसके स्‍वप्‍न में अनिवार्य नहीं है। स्‍वप्‍न में शरीर बिलकुल सक्रिय नहीं है। शरीर का कोई उपयोग नहीं हो रहा है। स्‍वप्‍न के अनुभव आपके शेष रहेंगे। बल्‍कि आपके समस्‍त अनुभव स्‍वप्‍न का ही रूप लेकिन शेष रहेंगे।</p>
<p>      अगर कोई आपसे पूछे कि स्‍वप्‍न में आप थिर होते है कि गतिमान होत है? तो कठिनाई होगी, स्‍वप्‍न में थिर होते है कि गतिमान होत है? स्‍वप्‍न से जाग कर तो यह अनुभव होता है कि अपनी जगह पड़े है, थिर, स्‍वप्‍न के भीतर। लेकिन स्‍वप्‍न के बहार आकर पता चला की स्‍वप्‍न की भीतर तो गति थी। स्‍वप्‍न में गति भी नहीं होती। अगर बहुत ठीक से समझें तो स्‍वप्‍न में आप भागीदार भी नहीं होते। बहुत गहरे में केवल आप साक्षी होते है। इसलिए स्‍वप्‍न में आपने को मरता हुआ भी देख सकते है। और स्‍वप्‍न में आपने आप को चलता हुआ भी देख सकते है। स्‍वप्‍न में अपनी ला      श को पड़े हुए भी देख सकते है। और स्‍वप्‍न में अगर आप अपने को चलता भी देखते है, तो भी जिसे आप चलता देखते है वह सिर्फ स्‍वप्‍न होता है। आप तो देखने वाल ही होते है। स्‍वप्‍न को अगर ठीक से समझें तो आप सिर्फ विटनेस होते है स्‍वप्‍न में।</p>
<p>      इसीलिए धर्म ने एक सूत्र खोज निकाला कि जो व्‍यक्‍ति जगत को स्‍वप्‍न की भांति देखने लगे, वह परम अनुभूति को उपलब्‍ध हो जाएगा। इसलिए जगत को माया और स्‍वप्‍न कहने वाली चेतनाएं पैदा हुई। राज उनका यही है कि अगर जगत को हम सपने की भांति देखने लगें तो हम साक्षी हो जाएंगे। सपने में कभी भी कोई पार्टिसिपेंट नहीं होता। हमेशा विटनेस होता है, कभी भी किसी भी स्‍थिति में आप सपने में पात्र नहीं होते। भला आपको पात्र दिखाई पड़ें आप; लेकिन आप तो वही है जिसका दिखाई पड़ता है। आप हमेशा ही देखने वाले होते है। दर्शक होत है।</p>
<p>      तो जितने अनुभव होंगे। बीज होंगे। शरीर रहित होंगे। स्‍वप्‍न जैसे होंगे। जिनके अनुभव दुःख को निर्मित किए है वे नरक के स्‍वप्‍न देखेंगे, नाईटमेयर्स देखेंगे। जिनके अनुभव सुख को अर्जित किए है, वे स्‍वर्ग देखते रहेंगे। सुखद होंगे सपने उनके। लेकिन वे सब सपने जैसे अनुभव होंगे।</p>
<p>      कभी-कभी इसमें और भी घटनाएं घटेगी। उन घटनाओं के अनुभव में भेद पड़ेगा। कभी-कभी ऐसा होगा कि ये जो आत्माएं न गतिमान है, न चलित है, ये आत्माएं कभी-कभी किन्‍हीं शरीरों में प्रवेश कर जाएंगी। अब यह भाषा की ही भूल है, कि वे प्रवेश कर जाएंगी। उचित होगा ऐसा कहना कि कभी-कभी कोई शरीर इनको अपने में प्रवेश दे देगा।</p>
<p>      इन आत्‍माओं का लोक कुछ इससे भिन्‍न नहीं है। ठीक हमारे निकट और पड़ोस में है। ठीक हम एक ही जगत में अस्‍तित्‍ववान है। यहां इंच-इंच जगह भी आत्‍माओं से भरी है। यहां जो हमें खाली जगह दिखाई पड़ती है। वह भी भरी हुई है।</p>
<p>      अगर कोई भी शरीर किसी गहरी रिसेप्‍टिव हालत में हो, और दो तरह से शरीर-दूसरे लोगों के शरीर-ग्राहक अवस्‍था में होते है। या तो बहुत भयभीत अवस्‍था में। जितना भयभीत व्‍यक्‍ति होगा, उसकी खुद की आत्‍मा उसके शरीर में भीतर सुकड़ जाती है। मतलब शरीर के बहुत से हिस्‍सों को छोड़ देती है खाली। उन खाली जगहों में पास-पड़ोस की कोई भी आत्‍मा ऐसे गह सकती है जैसे गड्ढे में पानी बह जाता है। तब इसको जो अनुभव होते है वे ठीक वैसे ही हो जाते है जैसे शरीर धारी आत्‍मा को होते है। या बहुत गहरी प्रार्थना के क्षण में कोई आत्‍मा प्रवेश कर सकती है। बहुत गहरी प्रार्थना के क्षण में भी आत्‍मा सिकुड़ जाती है।</p>
<p>      लेकिन भय कि अवस्‍था में केवल वे ही आत्‍माएं सरक कर भीतर प्रवेश कर सकती है जो दुःख-स्‍वप्‍न देख रही हो। जिन्‍हें हम बुरी आत्‍माएं कहें। वे प्रवेश कर सकती है। क्‍योंकि भयभीत व्‍यक्‍ति बहुत ही कुरूप और गंदी स्‍थिति में है। उसमें कोई श्रेष्‍ठ आत्‍मा प्रवेश नहीं कर सकती। और भयभीत व्‍यक्‍ति गड़े की भांति है। जिसमें नीचे उतरने वाली आत्‍माएं ही प्रवेश कर सकती है।</p>
<p>      प्रार्थना से भरा हुआ व्‍यक्‍ति शिखर की भांति है, जिसमें सिर्फ ऊपर चढ़ने वाली आत्‍माएं प्रवेश कर सकती है। और प्रार्थना से भरा हुआ व्‍यक्‍ति इतनी आंतरिक सुगंध से और सौंदर्य से भरा हुआ होता है कि उनका रस तो केवल बहुत श्रेष्‍ठ आत्‍माएं को हो सकता है। वे भी निकट में है। तो जिनको इनवोकेशन कहते है, आह्वान कहते है। प्रार्थना कहते है। उसमे भी प्रवेश होता है। लेकिन श्रेष्‍ठतम आत्‍माएं का। उस समय अनुभव ठीक वैसे ही हो जाते है जैसे कि शरीर में हुए, इन दोनों अवस्‍थाओं में।</p>
<p>      तो जिनको देवताओं का आह्वान कहा जाता है, उसका पूरा विज्ञान है। वे देवता कही आकाश से नहीं आते। जिन्‍हें भूत-प्रेत कहा जाता है वे कही नरक से नहीं आते। किसी प्रेत लोक से नहीं आते। वे सब मौजूद है, यहीं, असल में एक ही स्‍थान पर मल्‍टी-डायमेंशनल एक्‍झिस्‍टेंस है। एक ही बिंदु पर बहुआयामी आस्‍तित्‍व है1 अब जैसे यह कमरा है, यहां हम बैठे है। हवा भी है यहां। यहां कोई घूप जला दे तो सुगंध भी भर जाएगी। यहां कोई गीत गाने लगे तो ध्‍वनि तरंगें भी भर जाएंगी। धूप का कोई कण ध्‍वनि तरंग के किसी कण से नहीं टकरायेगा। इस कमरे में संगीत भी भर सकता है। प्रकाश भी भर सकता है। लेकिन प्रकाश की कोई तरंग संगीत की किसी तरंग से टकराएँगीं नहीं। और न ही संगीत के भरने से प्रकाश की तरंगों को बहार निकलना पड़ेगा। कि तुम थोड़ी जगह खाली करो।</p>
<p>      असल में इसी स्‍थान को ध्वनि की तरंगें एक आयाम में भरती है। और प्रकाश की तरंगें दूसरे आयाम में। वायु की तरंगें तीसरे आयाम में भरती है। और इस तरह से हजारों आयाम इस कमरे को हजार तरह सक भरते है। एक दूसरे में कोई बाधा नहीं पड़ती। एक दूसरे को एक दूसरे के लिए कोई स्‍थान खाली नहीं करना होता। इसलिए स्‍पेस जो है वह मल्‍टी-डायमेंशनल है।</p>
<p>      यहां हमने एक टेबल रखी है। अब दूसरी टेबल नहीं रख सकते इस जगह। क्‍योंकि एक टेबल और दूसरी टेबल एक ही आयाम की है। तो इस टेबल को रख दिया तो इस स्‍थान पर—इस टेबल के स्‍थान पर—इस टेबल के स्‍थान पर दूसरी टेबल नहीं रख सकते। वह इसी आयाम की है। लेकिन दूसरे आयाम का आस्‍तित्‍व इस टेबल को कोई बाधा नहीं डालेगा।</p>
<p>      ये सारी आत्‍माएं ठीक हमारे निकट है। और कभी भी इनका प्रवेश हो सकता है। जब इनका प्रवेश होंगे तब जो इनके अनुभव होंगे वे ठीक वैसे ही हो जाएंगे जैसे शरीर में प्रवेश पर होते है।</p>
<p>क्रमश: अगले पाठ में&#8230;&#8230;&#8230;..</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>मैं कहता हूं आंखन देखी,</p>
<p>प्रवचन—4</p>
<p>संस्‍करण—1996</strong></p>
<br />Filed under: <a href='http://oshosatsang.org/category/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b6%e0%a4%a8-%e0%a4%9a%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9a%e0%a4%be/'>प्रशन चर्चा</a> Tagged: <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/'>ओशो</a>, <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6/'>स्‍वामी आनंद प्रसाद</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/oshosatsang.wordpress.com/4359/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/oshosatsang.wordpress.com/4359/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/oshosatsang.wordpress.com/4359/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/oshosatsang.wordpress.com/4359/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/oshosatsang.wordpress.com/4359/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/oshosatsang.wordpress.com/4359/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/oshosatsang.wordpress.com/4359/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/oshosatsang.wordpress.com/4359/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/oshosatsang.wordpress.com/4359/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/oshosatsang.wordpress.com/4359/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/oshosatsang.wordpress.com/4359/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/oshosatsang.wordpress.com/4359/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/oshosatsang.wordpress.com/4359/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/oshosatsang.wordpress.com/4359/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4359&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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			<media:title type="html">ध्‍यान के अनुभव--ओशो</media:title>
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		<title>दो जन्‍मों के बीच क्‍या है(भाग&#8211;2)—ओशो</title>
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		<pubDate>Sat, 04 Feb 2012 02:21:55 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[प्रशन चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

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		<description><![CDATA[एक्‍सीडेंट भी बिलकुल एक्‍सीडेंट नहीं है। उसकी बात करेंगे। कोई एक्‍सीडेंट बिलकुल एक्‍सीडेंट नहीं है। हमें लगता है, क्‍योंकि हमारी व्‍यवस्‍था के कुछ भीतर नहीं घटित होता। लेकिन कोई दुर्घटना सिर्फ दुर्घटना नहीं है। दुर्घटना भी सकारण है। छह महीने &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/02/04/%e0%a4%a6%e0%a5%8b-%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%ae%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%9a-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%88-2/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4352&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>एक्‍सीडेंट भी बिलकुल एक्‍सीडेंट नहीं है। उसकी बात करेंगे। कोई एक्‍सीडेंट बिलकुल एक्‍सीडेंट नहीं है। हमें लगता है, क्‍योंकि हमारी व्‍यवस्‍था के कुछ भीतर नहीं घटित होता। लेकिन कोई दुर्घटना सिर्फ दुर्घटना नहीं है। दुर्घटना भी सकारण है।<div id="attachment_4353" class="wp-caption alignright" style="width: 310px"><a href="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/02/196742_10150121252209114_634724113_6305704_858142_n.jpg"><img src="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/02/196742_10150121252209114_634724113_6305704_858142_n.jpg?w=300&#038;h=252" alt="दो जन्‍मों के बीच क्‍या है (भाग--2)—ओशो   " title="दो जन्‍मों के बीच क्‍या है (भाग--2)—ओशो   " width="300" height="252" class="size-medium wp-image-4353" /></a><p class="wp-caption-text">दो जन्‍मों के बीच क्‍या है (भाग--2)—ओशो   </p></div></p>
<p>      छह महीने पहले मौत की छाया पड़नी शुरू हो जाती है। तैयारी शुरू हो जाती है। जैसे रात नींद के एक घंटे पहले तैयारी शुरू हो जाती है। इसलिए सोने से पहले जो घंटे भर कर वक्‍त है, वह बहुत सजेस्‍टिबल है। उससे ज्‍यादा सजेस्‍टिबल कोई वक्‍त नहीं है। क्‍योंकि उस वक्‍त आपको शक होता है कि आप जागे हुए है। लेकिन आप पर नींद की छाया पड़नी शुरू हो जाती है। इसलिए सारे दुनिया के धर्मों ने सोने के वक्‍त घंटे भर और सुबह जागने के बाद घंटे भर प्रार्थना का समय तय किया है—संध्‍याकाल।<span id="more-4352"></span></p>
<p>      संध्‍याकाल का मतलब सूरज जब डूबता है, उगता है, तब नहीं। संध्‍याकाल का मतलब है सोने से जब आप नींद में जाते है, बीच का समय। सुबह जब आप नींद में टूट कर और जागने में आते है। तब बीच की संध्‍या। वह जो मिडिल पीरियड है, उसका नाम है संध्‍या। सूरज से कोई लेना देना नहीं है। वह तो बंध गया सूरज के साथ इसलिए कि एक जमाना ऐसा था कि सूरज का डूबना ही हमारा नींद का वक्‍त था। और सूरज का उगना ही हमारे जागने का वक्‍त था। तो एसोसिएशन हो गया और ख्‍याल में आ गया कि सूरज जब डूब रहा है तो संध्‍या और सुबह जब सूरज उग रहा है तब संध्‍या।</p>
<p>       लेकिन अब संध्‍या का यह ख्‍याल छोड़ देना चाहिए। क्‍योंकि अब कोई सूरज के डूबने के साथ सोता नहीं और उगने के साथ उठता नहीं। जब आप सोते है उसके घंटे भर पहले संध्‍या और जब आप उठते है उसके घंटे भर बाद संध्‍या। संध्‍या का मतलब धुंधला क्षण—दो स्‍थितियों के बीच।</p>
<p>      कबीर ने अपनी भाषा को संध्‍या-भाषा कहा है। कबीर कहते है कि न तो हम सोए हुए बोल रहे है, न हम जागे हुए बोल रहे है। हम बीच में है। हम ऐसी मुसीबत में है कि हम तुम्‍हारे बीच से भी नहीं बोल रहे, हम तुम्‍हारे बाहर से भी नहीं बोल रहे। हम बीच में खड़े है। वहां, जहां से हमें वह दिखाई पड़ता है जो आंखों से दिखाई नहीं पड़ता और जहां से हमें वह भी दिखाई पड़ रहा है जो आंखों से दिखाई पड़ता है। देहरी पर खड़े है। तो हम जो बोल रहे है उसमे वह भी है जो नहीं बोला जा सकता और वह भी है जो बोला जा सकता है। इसलिए हमारी भाषा संध्‍या भाषा है। इसके अर्थ तुम जरा सम्‍हाल कर निकालना।</p>
<p>      यह जो सुबह का एक घंटे का वक्‍त है। और सांझ सोने के पहले जो घंटे भर का वक्‍त है। यह बहुत मूल्‍यवान है। ठीक ऐसे ही छह महीने जन्‍म के बाद का वक्‍त है और छह महीने मरने के पहले का समय है। लेकिन जो लोग रात के घंटे भर के समय का उपयोग नहीं जानते, वे छह महीने के शुरू का और छह महीने के बाद का भी उपयोग नहीं कर सकते। जब संस्‍कृतियां बहुत समझदार थी। इस मामले में तो पहले छह महीने बड़े महत्‍वपूर्ण थे। बच्चे को पहले छह महीने में ही सब कुछ दिया जा सकता है। फिर बहुत कठिन हो जाएगा। क्‍योंकि उस वक्‍त वह संध्‍याकाल में है। सजेस्‍टिबल है। लेकिन हम चूकि बोल कर कुछ नहीं समझा सकते उसको। और चूंकि बोलने के सिवाय हमें और कुछ रास्‍ता नहीं है, कहने का, इसलिए अड़चन है।</p>
<p>      और ऐसे ही मरने के पले का छह महीने का वक्‍त बहुत कीमती है। लेकिन बच्‍चे को हम समझा नहीं पाते, छह महीने तो हमें पता होते है कि यह रहे। और बूढ़े के हमें छह महीने पता नहीं होते कि कब छह महीने है। इसलिए दोनों मौके चूक जाते है। लेकिन जो आदमी सुबह के घंटे भर का उपयोग करे और रात के घंटे भर ठीक उपयोग करे। वह अपने इस बार मरने के छह महीने पहले उसे पक्‍का पता चल जाएगा। कि वह मरने वाला है। क्‍योंकि जो आदमी रात सोने के पहले घंटे भर प्रार्थना में व्‍यतीत कर दे उसे स्‍पष्‍ट बोध होने लगेगा कि संध्‍या का काल क्‍या है। वह इतना बारीक और सूक्ष्‍म अनुभव है उसकी भिन्‍नता का, न तो वह जागने जैसा है, न सोने जैसा। वह इतना बारीक और अलग है कि अगर उसकी प्रतीति होने शुरू हो गई तो मरने के छह महीने पहले आपको पता लगेगा कि अब वह प्रतीति रोज दिन भर रहने लगी। वह प्रतीति, जो घंटे भर रात सोते वक्‍त आपके भीतर आती है। वह मरने के पहले छह महीने स्‍थिर हो जायेगी।</p>
<p>      इस लिए मरने के पहले के छह महीने तो पूरी साधना में डूबा देने है। वही छह महीने बारदो के लिए उपयोग किए जाते है। जिसमे वे ड्रीम ट्रेनिंग देते है कि अब अगली यात्रा में तुम</p>
<p>क्‍या करोगे। वह कोई ठीक मरते वक्‍त नहीं दी जा सकती। एकदम। उसके लिए तैयारी छह महीने की चाहिए। और जो आदमी इस छह महीने में तैयार हुआ हो, उसी आदमी को उसके अगले जन्‍म के पहले छह महीने में ट्रेनिंग दी जा सकती है। अन्‍यथा नहीं दी जा सकती। क्‍योंकि इस छह महीने में वे सारे सूत्र उसे सिखा दिए जाते है। जिन सूत्रों के आधार पर उसके अगले छह महीने में उसको ट्रेनिंग दी जा सकेगी।</p>
<p>      अब इस सब की पूरी की पूरी अपनी वैज्ञानिकता है। और उस सके अपने सूत्र और राज है। और सारी चीजें तय की जा सकती है। वे जो अनुभव है उस बीच के, जो आदमी सारी प्रक्रिया से गुजरा हो, वह छह महीने के बाद भी याद रख सकता है। लेकिन याददाश्त सपने की रह जाती है, यथार्थ की नहीं होती। स्‍वर्ग नरक दोनों ही सपने की याददाश्त हो जाते है। विवरण दिए जा सकते है। उन्‍ही विवरणों के आधार पर सारी दुनिया में स्‍वर्ग-नरक का लेखा जोखा है। लेकिन विवरण अलग-अलग होंगे। क्‍योंकि स्‍वर्ग-नरक कोई स्‍थान नहीं है। मानिसक दशाएं है। इसलिए जब ईसाई स्‍वर्ग का वर्णन करते है तो वह और तरह का है। वह और तरह का इसलिए है कि जिन्‍होंने वर्णन किया है उन पर निर्भर है। भारतीय जब वर्णन करते है तो और तरह का होगा; जैन और तरह का करेंगे; बौद्ध और तरह का करेंगे। असल में हर आदमी और तरह की खबर लाएगा।</p>
<p>      करीब-करीब स्‍थिति ऐसी है जैसे हम सारे लोग इस कमरे में आज सो जाएं और कल सुबह उठ कर अपने-अपने सपनों की चर्चा करें। हम एक ही जगह सोए थे। हम सब यही थे। फिर भी हमारे सपने अलग-अलग है। वे हम पर निर्भर करता है। इसलिए लिए स्‍वर्ग और नरक बिलकुल वैयक्‍तिक घटना है। लेकिन मोटे हिसाब बांधे जा सकते है—कि स्‍वर्ग में सुख होगा, और नरक में दुख होगा। कि दुख का क्‍या रूप होगा और सूख का क्‍या रूप होगा। ये मोटे हिसाब बांटे जा सकते है। ये सारे ब्‍योरे जो भी दिये गए है, अब तक वह सभी सही है चित दशाओं की भांति।</p>
<p>      और पूछा है कि जन्‍म को चुन सकता है व्‍यक्‍ति तो क्‍या अपनी मृत्‍यु को चुन सकता है? इसमे भी दो तीन बातें ख्‍याल में लेनी पड़ेगी। एक जन्‍म को चुन सकने का मतलब यह है कि चाहे तो जन्‍म ले। यह तो पहली स्‍वतंत्रता है, ज्ञान को उपल्‍बध व्‍यक्‍ति को—चाहे तो जन्‍म ले। लेकिन जैसे ही हमने कोई चीज चाही कि चाह के साथ परतंत्रताएं आनी शुरू हो जाती है।</p>
<p>      मैं मकान के बहार खड़ा था मुझे स्‍वतंत्रता थी कि चाहूं तो मकान के भीतर जाऊं। मकान के भीतर में आया। लेकिन मकान के भीतर आते ही से मकान की सीमाएं और मकान की परतंत्रताएं तत्‍काल शुरू हो जाती है। तो जन्‍म लेने की स्‍वतंत्रता जितनी बड़ी है। उतनी मरने की स्‍वतंत्रता उतनी बड़ी नहीं है। उतनी बड़ी नहीं है। रहेगी। साधारण आदमी को तो मरने की कोई स्‍वतंत्रता नहीं है, क्‍योंकि उसने जन्‍म को ही कभी नहीं चुना। लेकिन फिर भी जन्‍म को स्‍वतंत्रता बहुत बड़ी है। टोटल है एक अर्थ में, कि वह चाहे तो इनकार भी कर दे, न चुने। लेकिन चुनने के साथ ही बहुत सी परतंत्रताएं शुरू हो जाती है। क्‍योंकि अब वह सीमाएं चुनता है। वह विराट जगह को छोड़ कर संकरी जगह में प्रवेश करता है। अब संकरी जगह की अपनी सीमाएं होंगी।</p>
<p>      अब वह एक गर्भ चुनता है। साधारणत: तो हम गर्भ नहीं चुनते। इसलिए कोई बात नहीं है। लेकिन वैसा आदमी गर्भ चुनता है। उसके सामने लाखों गर्भ होते है। उनमें से वह एक गर्भ चुनता है। हर गर्भ के चुनाव के साथ वह परतंत्रता की दुनिया में प्रवेश कर रहा है। क्‍योंकि गर्भ की अपनी सीमाएं है। उसने एक मां चूनी, एक पिता चूना। उन मां और पिता के वीर्याणुओं की जितनी आयु हो सकती है वह उसने चुन ली। यह चुनाव हो गया। अब इस शरीर का उसे उपयोग करना पड़ेगा। अब बाजार में एक मशीन खरीदने गए है, एक दस साल की गारंटी की मशीन आपने चुन ली। अब सीमा आ गई एक। पर यह वह जान कर ही चुन रहा है। इसलिए परतंत्रता उसे नहीं मालूम पड़ेगी। परतंत्रता हो जाएगी, लेकिन वह जान कर ही चुन रहा है। आप यह नहीं कह सकते की मैने यह मशीन खरीदी। तो अब मैं गुलाम हो गया। आपने ही चूनी थी। दस साल चलेगी यह जान कर चुनी थी। बात खत्‍म हो गई। इसमे कही कोई पीड़ा नहीं है। इसमें कहीं कोई दंश नहीं है। यद्यपि वह जानता है कि यह शरीर कब समाप्‍त हो जाएगा। और इसलिए इस शरीर के समाप्‍त होने का जो बोध है, वह उसे होगा। वह जानता है, कब समाप्‍त हो जाएगा। इसलिए इस तरह के आदमी में एक तरह की व्‍यग्रता होगी, जो साधारण आदमी में नहीं होगी।</p>
<p>      अगर हम जीसस की बातें पढ़ें तो ऐस लगता है वे बहुत व्‍यग्र है। अभी कुछ होने वाला है, अभी कुछ हो जाने वाला हे। उनकी तकलीफ वे लोग नहीं समझ सकते। क्‍योंकि उनके लिए मृत्‍यु का कोई   सवाल नहीं है और जीसस आपसे कह रहे है कि यह काम कर लो, आप कहते है कल कर लेंगे। अब जीसस की कठिनाई है कि वह जानता है कि कल वह कहने को नहीं होगा। </p>
<p>      तो चाहे महावीर हों, चाहे बुद्ध हो, चाहे जीसस हो, इनकी व्‍यग्रता बहुत ज्‍यादा है। बहुत तीव्रता से भाग रहे है। क्‍योंकि वे सारे मुर्दों के बीच में ऐसे व्‍यक्‍ति है जिन्‍हें पता है। बाकी सब तो बिलकुल निशिंचत है; कोई जल्‍दी नहीं है। ओर कितनी ही उम्र हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह सौ साल जाएगा कि दो सौ साल जिएगा। सारा समय ही छोटा है, वह तो हमे समय छोटा नहीं मालूम पड़ता, क्‍योंकि वह कब खत्‍म होगा, यह हमे कुछ पता नहीं है। खत्‍म भी होगा यह भी हम भुलाए रखते है।</p>
<p>      तो जन्‍म की स्‍वतंत्रता तो बहुत ज्‍यादा है। लेकिन जन्‍म कारागृह में प्रवेश है, तो कारागृह की अपनी परतंत्रताएं है, वे स्‍वीकार कर लेनी पड़ेगी।</p>
<p>      और ऐसा व्‍यक्‍ति सहजता से स्‍वीकार करता है, क्‍योंकि वह चुन रहा है। अगर वह कारागृह में आया है तो वह लाया नहीं गया है। वह आया है। इसलिए वह हाथ बढ़ाकर ज़ंजीरें डलवा लेता है। इन ज़ंजीरों में कोई दंश नहीं है। इनमें कोई पीड़ा नहीं है। वह अंधेरी दीवारों के पास सो जाता है। इससे उसको अड़चन नहीं है। क्‍योंकि किसी ने उसे कहा नही था कि वह भीतर जाए। वह खुले आकाश के नीचे रह सकता था। अपनी ही मर्जी से आया है, यह उसका चुनाव है।</p>
<p>      जब परतंत्रता भी चुनी जाती है तो वह स्‍वतंत्रता है। और स्‍वतंत्रता भी बिना चुनी मिलती है तो वह परतंत्रता है। स्‍वतंत्रता-परतंत्रता इतनी सीधी बंटी हुई चीजें नहीं है। अगर हमने परतंत्रता भी स्‍वंय चुनी है तो वह स्‍वतंत्रता है। और अगर हमें स्‍वतंत्रता भी जबरदस्‍ती दे दी गई है तो वह परतंत्रता ही होती है। उसमे कोई स्‍वतंत्रता नहीं है।</p>
<p>      फिर भी ऐसे व्‍यक्‍ति के लिए सी बातें साफ होती है। इसलिए वह चीजों को तय कर सकता है। जैसे उसे पता है कि वह सत्‍तर साल में चला जाएगा तो वह चीजों का तय कर पता है। जो उसे करना है, वह साफ कर लेता है। चीजों को उलझाता नहीं। जो सत्‍तर साल में सुलझ जाए ऐसा ही काम करता है। जो कल पूरा हो सकेगा, वह निपटा देता है। वह इतने जाल नहीं फैलाता जो की कल के बाहर चले जाएं। इसलिए वह कभी चिंता में नहीं होता। वह जैसे जीता है वैसे ही मरने की भी सारी तैयारी करता रहता है। मौत भी उसके लिए एक प्रिपरेशन है, एक तैयारी है।</p>
<p>      एक अर्थ में वह बहुत जल्‍दी में होता है, जहां तक दूसरों का संबंध है। जहां तक खुद का संबंध है, उसकी कोई जल्‍दी नहीं होती। क्‍योंकि कुछ करने को उसे बचा नहीं होता है। फिर भी इस मृत्‍यु को, वह कैसे घटित हो, इसका चुनाव कर सकता है। सीमाओं के भीतर। सत्‍तर साल उसका शरीर चलना है तो सीमाओं के भीतर वह सत्‍तर साल में ठीक मोमेंट दे सकता है मरने का। कि वह कब मरे, कैसे मेरे, किस व्‍यवस्‍था और किस ढंग से मेरे।</p>
<p>      एक झेन फकीर औरत हुई। उसने कोई छह महीने पहले अपने मरने की खबर दी। उसने अपनी चिता तैयार करवाई। फिर वह चिता पर सवार हो गई। फिर उसने सबको नमस्‍कार किया। सारे मित्रों ने आग लगा दी। तब एक साधु, जो देख रहा था, खड़ा हुआ उसने जोर से पूछा—जब आग की लपटें लग गई और वह जलने के करीब होने लगी—उसने पूछा उससे कि वहां भीतर गर्मी तो बहुत मालूम होती होगी। तो वह फकीर औरत हंसी और उसने कहा कि तुम मूढ़ हो। अभी भी इस तरह के सवाल उठाए जा रहे हो, मतलब और तुम्‍हें कोई काम नहीं। कोई काम की बात पूछने का भी ख्‍याल तुम्‍हारे दिमाग में नहीं आया। अब यह तो तुम्‍हें दिखाई ही पड़ रहा है कि आग में बैठूंगीं तो गर्मी तो लगेगी ही। ये बात भी कोई पूछने की थी।</p>
<p>      पर यह चूना हुआ है। वह हंसते हुए जल जाती है। वह अपनी मृत्‍यु के क्षण को चुनती है। और उसके जो हजारों शिष्‍य जो इकट्ठे हुए थे उनको वह दिखा देना चाहती थी कि हंसते हुए मरा जा सकता है। जिनके लिए हंसते हुए जीना मुश्‍किल है उनके लिए यह संदेश बड़े काम का है। जिनके लिए हंसते हुए जीना भी बहुत कठिन है। कि कैसे हंसते हुए मरा जा सकता है।</p>
<p>      तो मृत्‍यु को नियोजित किया जा सकता है। वह व्‍यक्‍ति पर निर्भर करेगा कि वह कैसा चुनाव करता है। लेकिन सीमाओं के भीतर सारी बात होगी। असीम नहीं है। मामला सीमाओं के भीतर वह कुछ तय करेगा। इस कमरे के भीतर हो रहना पड़ेगा मुझे, लेकिन मैं किस कोने में बैठूं यह मैं तय कर सकता हूं। बांए सोऊं कि दाएं सोऊं, यह मैं तय कर सकता हूं। ऐसी स्‍वतंत्रताएं होंगी।</p>
<p>      और ऐसे व्‍यक्‍ति अपनी मृत्‍यु का निश्‍चित ही उपयोग करते है। कई बार प्रकट दिखाई पड़ता है उपयोग, कई बार प्रगट दिखाई नहीं पड़ता। लेकिन ऐसे व्‍यक्‍ति अपने जीवन की प्रत्‍येक चीज का उपयोग करते है, वे मृत्‍यु का भी उपयोग करते है। असल में वे आते ही अब किसी उपयोग के लिए है। उनका अपना कोई प्रयोजन नहीं रह गया। अब उनका आना कुछ किसी के काम पड़ जाने के लिए है। तो वे जीवन की प्रत्‍येक चीज का उपयोग कर लेते है।</p>
<p>      पर बड़ा कठिन है, बड़ा कठिन है कि हम उनके प्रयोग को समझ पाएँ। जरूरी नहीं है। अक्‍सर हम नहीं समझ पाते। क्‍योंकि जो भी वे कुछ कर रहे है, हमें तो कुछ पता नहीं होता। और हमे पता करवा कर किया भी किया नहीं जा सकता है।</p>
<p>      अब जैसे बुद्ध जैसा आदमी नहीं कहेगा कि मैं कल मर जाने वाला हूं। क्‍योंकि कल मरना है यह आज कह देने का मतलब होगा कि कल तक जो भी जीवन का उपयोग होने वाला था वह मुश्‍किल हो जायेगा। ये लोग आज से ही रोना-धोना, चिल्‍लाना शुरू कर देंगे। ये चौबीस घंटे का जो उपयोग हो सकता था वह भी नहीं हो सकेगा। तो कई बार चुपचाप रह कर वैसा व्‍यक्‍ति ठीक समझेगा तो करेगा, कई दफे घोषणा भी करेगा—जैसी तत्‍काल परिस्‍थिति। पर इतनी सीमा तक वह तय करता है।</p>
<p>      और ज्ञान के बाद का जन्‍म, जन्‍म से लेकिन मृत्‍यु तक पूरा ही पूरा शिक्षण है। खुद के लिए नहीं। एक अनुशासन है, खुद के लिए नहीं। और हर बार स्‍ट्रेजी पुरानी बदलनी पड़ती है। क्‍योंकि सब बोथली हो जाती है। और लोगों को समझने में मुश्‍किल पड़ जाती है।</p>
<p>      अब गुरजिएफ था अभी। महावीर कभी पैसा नहीं छुएंगे; गुरजिएफ से आप एक सवाल पूछेंगे तो वह कहेगा, सौ रूपये पहले रख दें। सौ रूपये बिना रखे वह सवाल भी स्‍वीकार नहीं करेगा। सौ रूपये रखवा लेगा। तब एक सवाल का जवाब देगा। हो सकता है एक वाक्‍य बोले, हो सकता है दो वाक्‍य बोले। फिर दूसरी बात पूछनी है तो फिर सौ रूपये रख दें।</p>
<p>      अनेक बार लोगों ने उससे कहा कि आप यह क्‍या करते है? और जो उसे जानते थे वे हैरान होते थे, क्‍योंकि ये रूपये यहां आए और यहां वे बंट जाने वाले है। कुछ भी होने वाला है उनका। कोई गुरजिएफ उनको  रखने वाला है एक क्षण को, ऐसा भी नहीं है; वे इधर-उधर बंट जाने वाले है। फिर किस लिए ये सौ रूपये मांग लिए है?</p>
<p>      गुरजिएफ ने कभी कहा कि जिन लोगों के मन में सिर्फ रूपये का मूल्‍य है उन्‍हें परमात्‍मा के संबंध में मुफ्त कहना गलत है—एकदम गलत है। क्‍योंकि उनकी जिंदगी में मुफ्त चीज का कोई मुल्‍य नहीं है। और गुरजिएफ कहता है कि हर चीज के लिए चुकाना पड़ेगा कुछ। जो चुकाने की तैयारी नहीं रखता कुछ भी चुकाने की तैयारी नहीं रखता, उनको पाने का हक नहीं है।</p>
<p>       लेकिन लोग समझते थे कि गुरजिएफ को पैसे पर बड़ी पकड़ है। जो दूर से ही देखते है उनको तो लगता है कि पैसे की बड़ी पकड़ है। बिना पैसे के सवाल का जवाब भी नहीं देते।</p>
<p>      पर मैं मानता हूं कि जिस जगह वह था, पश्‍चिम में, वहां पैसा एकमात्र मूल्‍य हो गया, वहाँ उसी तरह के शिक्षक की जरूरत थी। एक-एक शब्‍द का मूल्‍य ले लेना। क्‍योंकि वह जानता है जिस शब्‍द के लिए तुमने सौ रूपये दिए है, तुमने सौ रूपये देने की तैयारी दिखाई है जिस शब्‍द के लिए तुम उसको ही ले जाओगे, बाकी तुम कुछ ले जाने वाले नहीं हो।</p>
<p>      गुरूजिएफ बहुत से ऐसे काम करेगा जो बिलकुल ही कठिन मालूम पड़ेंगे। उसके शिष्‍य बहुत मुश्‍किल में पड़ जायेंगे, वे कहेंगे, यह आप ने करते तो अच्‍छा था। और वह जान कर करेगा। वह बैठा है, आप उससे मिलने गए है। वह ऐसी शक्‍ल बना लेगा कि ऐसा लगे कि जैसे ठीक गंडा-बदमाश है। साधु तो बिलकुल नहीं है। बहुत दिन तक सूफी प्रयोग करने की वजह से आंखों के कोण को वह तत्‍काल कैसा भी बदल सकता था। और आंखों के कोण के बदलने से पूरी शक्‍ल बदल जाती है। एक गुंडे में और साधु में आँख के अलावा और कोई फर्क नहीं होता। बाकी तो सब एक सा ही होता है। पर आँख का कोण जरा ही बदला कि सब साधु गुंडा हो जाते है। गुंडा साधु हो जाता है। आंखे उसकी बिलकुल ढीली थी दोनों। आंखों को वह कैसा ही, उसकी पुतलियाँ कैसे ही कोण ले सकती थी। वह एक सेकेंड में, इसके लिए कुछ करना नहीं पड़ता था। वह बगल वाले काक पता ही नहीं चलेगा कि उसने दूसरे को गुंडा दिखा दिया है। वह बगल वाले को पता ही नहीं चलेगा की उसने एक आदमी को घबरा दिया है। और बगल वाला आदमी घबरा गया कि ये आदमी कैसा है, मैं कहां आ गया।</p>
<p>      उसके मित्रों ने जब धीरे-धीरे पकड़ा कि वह इस तरह कई लोगों को परेशान करता है तो उन्‍होंने कहा कि आप यह क्‍या करते है? हमे पता ही नहीं चलता कि वह बेचारा आया था, और आपने उसे ऐसा&#8230;&#8230;..।</p>
<p>      तो गुरजिएफ कहता कि वह आदमी, अगर मैं साधु भी होता तो मुझ में गुंडा खोज लेता। थोड़ी देर लगती। मैंने उसका वक्‍त  जाया नहीं करवाया। मैंने कहा, तू ले, तू जा। क्‍योंकि तू नाहक दो चार दिन चक्‍कर लगाएगा, खोजेगा तू यही। मैं तुझे खुद ही सौंपे देता  हूं। अगर वह इसके बाद भी रूक जाता तो मैं उसके साथ मेहनत करता।</p>
<p>      इसलिए बहुत मुश्‍किल मामला है। जो गुरजिएफ को गुंडा समझ कर चला गया है, अब कभी दोबारा नहीं आयेगा। लेकिन गुरजिएफ का जानना गहरा है। वह ठीक कह रहा है। वह कह रहा है, यह आदमी यही खोज लेना। इसको खुद मेहनत करना पड़ती। वह काम मैंने हल कर दिया। इसके चार दिन खराब होते, इसके चार दिन बच गए। अगर ये सच में ही किसी खोज में आया था, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था, यह फिर भी रुकता। यह मेरे बावजूद रुके तो ही रुका, मेरी वजह से रुके तो मैं इसको रूकना नहीं कहूंगा। यह खोजने आया हो तो रुके, धैर्य रखे, थोड़ी जल्दी न करे। इतने जल्‍दी नतीजे लेगा कि मेरी आँख जरा ऐसी हो गई तो इसने समझा की आदमी गड़बड़ है। इतने जल्‍दी नतीजे लेगा तो मुझमें कुछ न  कुछ इसे मिल जाएगा जिसमें वह नतीजे लेकिर चला जाए।</p>
<p>      अब यह एक-एक शिक्षक के साथ होगा कि वह क्‍या करता है, कैसे करता है। बहुत बार तो जिंदगी भर पता नहीं चलता है कि उसके करने की व्‍यवस्‍था क्‍या है। पर वह जिंदगी से प्रत्‍येक क्षण का उपयोग करता है—जन्‍म से लेकिर मृत्‍यु तक। एक भी क्षण व्‍यर्थ नहीं है। उसकी कोई गहरी, सार्थकता है, किसी बड़े प्रयोजन और किसी बड़ी नियति में उपयोग है।</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>मैं कहता हूं आंखन देखी,</p>
<p>प्रवचन—3</p>
<p>(संस्करण:1996)</strong></p>
<br />Filed under: <a href='http://oshosatsang.org/category/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b6%e0%a4%a8-%e0%a4%9a%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9a%e0%a4%be/'>प्रशन चर्चा</a> Tagged: <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/'>ओशो</a>, <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6/'>स्‍वामी आनंद प्रसाद</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/oshosatsang.wordpress.com/4352/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/oshosatsang.wordpress.com/4352/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/oshosatsang.wordpress.com/4352/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/oshosatsang.wordpress.com/4352/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/oshosatsang.wordpress.com/4352/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/oshosatsang.wordpress.com/4352/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/oshosatsang.wordpress.com/4352/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/oshosatsang.wordpress.com/4352/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/oshosatsang.wordpress.com/4352/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/oshosatsang.wordpress.com/4352/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/oshosatsang.wordpress.com/4352/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/oshosatsang.wordpress.com/4352/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/oshosatsang.wordpress.com/4352/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/oshosatsang.wordpress.com/4352/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4352&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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			<media:title type="html">दो जन्‍मों के बीच क्‍या है (भाग--2)—ओशो   </media:title>
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		<title>दो जन्‍मों के बीच क्‍या है—ओशो</title>
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		<pubDate>Fri, 03 Feb 2012 01:38:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[प्रशन चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

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		<description><![CDATA[प्रश्‍न’&#8211; आत्‍मा जब शरीर छोड़ देती है और दूसरा शरीर धारण नहीं करती है, उस बीच के समयातित अंतराल में जो घटित होता है उसका, तथा जहां वह विचरण करती है उस वातावरण के वर्णन की कोई संभावना हो सकती &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/02/03/%e0%a4%a6%e0%a5%8b-%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%ae%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%9a-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%88/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4348&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>प्रश्‍न’&#8211;   आत्‍मा जब शरीर छोड़ देती है और दूसरा शरीर धारण नहीं करती है, उस बीच के समयातित अंतराल में जो घटित होता है उसका, तथा जहां वह विचरण करती है उस वातावरण के वर्णन की कोई संभावना हो सकती है? और इसके साथ जिस प्रसंग में आपने आत्‍मा का अपनी मर्जी से जन्‍म लेने की स्‍वतंत्रता का जिक्र किया <div id="attachment_4349" class="wp-caption alignright" style="width: 310px"><a href="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/02/185282_10150281752264114_634724113_7528931_6651898_n.jpg"><img src="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/02/185282_10150281752264114_634724113_7528931_6651898_n.jpg?w=300&#038;h=295" alt="  दो जन्‍मों के बीच क्‍या है—ओशो " title="  दो जन्‍मों के बीच क्‍या है—ओशो " width="300" height="295" class="size-medium wp-image-4349" /></a><p class="wp-caption-text">  दो जन्‍मों के बीच क्‍या है—ओशो </p></div>है, तो क्‍या उसे जब चाहे शरीर छोड़ने अथवा न छोड़ने की भी स्‍वतंत्रता है?</strong></p>
<p><strong>ओशो—</strong>पहली तो बात शरीर छोड़ने के बाद और नया शरीर ग्रहण करने के पहले जो अंतराल का क्षण है, अंतराल का काल है, उसके संबंध में दो-तीन बातें समझें तो ही प्रश्‍न समझ में आ सकें।</p>
<p>      एक तो कि उस क्षण जो भी अनुभव होते है वह स्‍वप्‍नवत है। ड्रीम लाइफ है। इसलिए जब होते है तब तो बिलकुल वास्‍तविक होते है, लेकि जब आप याद करते है तब सपने जैसे हो जाते है। स्‍वप्‍नवत इसलिए है वे अनुभव कि इंद्रियों का उपयोग नहीं होता। आपके यथार्थ का जो बोध है, यथार्थ की जो आपकी प्रतीति है, वह इंद्रियों के माध्‍यम से है, शरीर के माध्‍यम से नहीं।<span id="more-4348"></span></p>
<p>      अगर मैं देखता हूं कि आप दिखाई पड़ते है, और छूता हूं और छूने में नहीं आते। तो मैं कहता हूं कि फैंटम है। है नहीं आदमी। वह टेबल में छूता हूं, और छूने में नहीं आती। और मेरा हाथ उसके आर पार चला जाता है। तो मैं कहता हूं कि सब झूठ है। मैं किसी भ्रम में पड़ गया हूं, कोई हैलूसिनेशन है। आपके यथार्थ की कसौटी आपकी इंद्रियों के प्रमाण है। तो एक शरीर छोड़ने के गाद और दूसरा शरीर लेने के बीच इंद्रियाँ तो आपके पास नहीं होती।  शरीर आपके पास नहीं होता। तो जो भी आपको प्रतीतियां होती है। वे बिलकुल स्‍वप्‍नवत है—जैसे आप स्‍वप्‍न देख रहे है।</p>
<p>      जब आप स्‍वप्‍न देखते है तो स्‍वप्‍न बिलकुल ही यथार्थ मालूम होता है, स्‍वप्‍न में कभी संदेह नहीं होता। यह बहुत मजे की बात है। यथार्थ में कभी-कभी संदेह हो जाता है। स्‍वप्‍न में कभी संदेह नहीं होता। स्‍वप्‍न बहुत श्रद्धावान है। यथार्थ में कभी-कभी ऐसा होता है। जो दिखाई पड़ता है, वह सच में है या नहीं। लेकिन स्‍वप्‍न में ऐसा कभी नहीं होता कि जो दिखाई पड़ रहा है वह सच में है या नहीं। क्‍यों? क्‍योंकि स्‍वप्‍न इतने से संदेह को सह न पाएगा, वह टूट जाएगा, बिखर जाएगा।</p>
<p>      स्‍वप्‍न इतनी नाजुम घटना है कि इतना सा संदेह भी मौत के लिए काफी है। इतना ही ख्‍याल आ गया कि कहीं यह स्‍वप्‍न तो नहीं है। कि स्‍वप्‍न टूट गया। या आप समझिए कि आप जाग गए। तो स्‍वप्‍न के होने के लिए अनिवार्य है कि संदेह तो कण भर भी न हो। कण भर संदेह भी बड़े से बड़े प्रगाढ़ स्‍वप्‍न को छिन-भिन्‍न कर सकता है। तिरोहित कर देगा।</p>
<p>      तो स्‍वप्‍न को कभी पता नहीं चलता कि जो हो रहा है, वह हो रहा है। बिलकुल हो रहा है। इसका यह भी मतलब हुआ कि स्‍वप्‍न जब होता है तब यथार्थ से ज्‍यादा यथार्थ मालूम पड़ता है। यथार्थ कभी इतना यथार्थ नहीं मालूम पड़ता। क्‍योंकि यथार्थ में संदेह की सुविधा  है। स्‍वप्‍न तो अति यथार्थ होता है। इतना अति यथार्थ होता है कि स्‍वप्‍न के दो यथार्थ में विरोध भी हो, तो विरोध दिखाई नहीं पड़ता।</p>
<p>      एक आदमी चला आ रहा है, अचानक कुत्‍ता हो जाता है, और आपने मन में यह भी ख्‍याल नहीं आता कि यह कैसे हो सकता है। यह आदमी था, कुत्‍ता कैसे हो गया। नहीं, यह ख्‍याल नहीं आ सकता, संदेह जरा भी नहीं। संदेह उठा नहीं की स्‍वप्‍न खत्‍म। जागने  के बाद आप सोच सकते है कि यह क्‍या गड़बड़ झाला है। लेकिन स्‍वप्‍न में कभी नहीं सोच सकते। स्‍वप्‍न में यह बिलकुल ही रीज़नेबल है, इसमें कहीं कोई असंगति नहीं है। बिलकुल ठीक है। एक आदमी अभी मित्र और एकदम से वहीं आदमी बंदूक तान कर खड़ा हो गया। तो आपके मन में कहीं ऐसा सपने में नहीं आता है कि अरे, मित्र होकर और बंदूक तान रहे हो।</p>
<p>      स्‍वप्‍न में असंगति होती ही नहीं, स्‍वप्‍न में सब असंगत भी संगत है। क्‍योंकि जरा सा शक, कि स्‍वप्‍न बिखर जाएगा। लेकिन जागने के बाद, सब खो जायेगा। कभी ख्‍याल न किया होगा कि जाग कर ज्‍यादा से ज्‍यादा घंटे भर के बीच सपना याद किया जा सकता है। इससे ज्‍यादा नहीं। आमतौर से तो पाँच-सात मिनट में खोने लगता है। लेकिन ज्‍यादा से ज्‍यादा, बहुत जो कल्‍पनाशील है वे भी एक घंटे से ज्‍यादा स्‍वप्‍न की स्‍मृति को नहीं रख सकते। नहीं तो आपके पास सपने की ही स्‍मृति इतनी हो जायेगी। कि आप जी नहीं सकेगें। घंटे भर के बाद जागने के भीतर स्‍वप्‍न तिरोहित हो जाते है। आपका मन स्‍वप्‍न के धुएँ से बिलकुल मुक्‍त हो जाता है।</p>
<p>      ठीक ऐसे ही दो शरीरों के बीच का जो अंतराल का क्षण है, जब होता है तब तो भी होता है वह बिलकुल ही यथार्थ है—इतना यथार्थ, जितना हमारी आंखों और इंद्रियों से कभी हम नहीं जानते। इसलिए देवताओं के सुख का कोई अंत नहीं। क्‍योंकि अप्‍सराएं जैसी यथार्थ उन्‍हें होती है, इंद्रियों में स्‍त्रियां वैसी यथार्थ कभी नहीं होती। इसलिए प्रेतों के दुःख का अंत नहीं। क्‍योंकि जैसे दुःख उन टूटते है ऐसे दूःख आप पर कभी टूट नहीं सकते। तो नरक और स्‍वर्ग जो है वे बहुत प्रगाढ़ स्‍वप्‍न अवस्‍थाएं है—बहुत प्रगाढ़ तो जैसी आग नरक में जलती है, उतनी यथार्थ में कभी नहीं जला सकती। हालांकि बड़ी इनकंसिस्‍टेंट आग है।</p>
<p>      कभी आपने देखा कि नरक की आग का जो-जो वर्णन है, उसमे यह बात है कि आग में जलाएं जाते है, लेकिन जलते नहीं। मगर यह इनकंसिस्‍टेंसी ख्‍याल में नहीं आती कि आग में जलाया जा रहा है, आग भयंकर है, तपन सही नहीं जाती और जल बिलकुल भी नहीं रहा हूं। मकर यह इनकंसिस्‍टेंसी बाद में ख्‍याल आ सकती हे। उस वक्‍त ख्‍याल नहीं आ सकती।</p>
<p>      तो दो शरीरों के बीच का जो अंतराल है उसमें दो तरह की आत्माएं है। एक तो वे बहुत बुरी आत्‍माएं, जिनके लिए गर्भ मिलने में वक्‍त लगेगा। उनको में प्रेत कहता हूं। दूसरी वे भली आत्‍माएं जिन्‍हें गर्भ मिलने में देर लगेगी। उनके योग्‍य गर्भ चाहिए। उन्‍हें में देव आत्‍माएं कहता हूं। इन दोनों में बुनियादी कोई भेद नहीं है—व्‍यक्‍तित्‍व भेद है, चरित्र गत भेद है। चितगत भेद है। योनि में कोई भेद नहीं है। अनुभव दोनों के भिन्‍न है। बुरी आत्‍माएं बीच के इस अंतराल से दुखद अनुभव लेकिर लौटेंगी। और उनकी ही स्‍मृति का फल नरक है। जो-जो उस स्‍मृति को दे सके है लौट कर, उन्‍होंने ही नरक की स्‍थिति साफ करवाई। नरक बिलकुल ड्रीमलैंड है, कहीं है नहीं। लेकिन जो उससे आया है वह मान नहीं सकता। क्‍योंकि आप जो दिखा रहे हे, यह उसके सामने कुछ भी नहीं है। वह कहता है, आग बहुत ठंडी है, उसके मुकाबले जो मैंने देखी है, यहां  जो घृणा और हिंसा है वह कुछ भी नहीं। जो मैं देख कर चला आ  रहा हूं। वह जो स्‍वर्ग का अनुभव है, वह भी ऐसा ही अनुभव है। सुखद सपनों का और दुखद सपनों का भेद है। वह पूरा का पूरा ड्रीम पीरियड है।</p>
<p>      अब यह तो बहुत तात्‍विक समझने की बात है कि वह बिलकुल ही स्वप्न है। हम समझ सकते है, क्‍योंकि हम भी रोज सपना देख रहे हे। सपना आप तभी देखते है जब आपके शरीर की इंद्रियाँ शिथिल हो जाती हे। एक गहरे अर्थ में आपका संबंध टूट जाता हे। सपने भी रोज ही दो तरह के देखते है—स्‍वर्ग और नरक के। या तो मिश्रित होते है। कभी स्‍वर्ग के कभी नरक के। या कुछ लोग नरक ही देखते है। कुछ लोग स्‍वर्ग ही देखते है। कभी सोचें कि आपका सपना रात आठ घंटे आपने देखा। अगर उस को आठ साल कर दिया जाये तो आपको कभी भी पता नहीं चलेगा। क्‍योंकि टाईम का बोध नहीं रह पाता। समय का कोई बोध नहीं रह जाता। उस घड़ी का बोध पिछले जन्‍म के शरीर और इस जन्‍म के शरीर के बीच पड़े हुए परिवर्तनों से नापा जात सकता है। पर वह अनुमान है। खुद उसके भीतर समय का कोई बोध नहीं है।</p>
<p>      और इसीलिए जैसे क्रिशिचएनिटी ने कहा है कि नरक सदा के लिए है। वह भी ऐसे लोगों की स्‍मृति के आधार पर है जिन्‍होंने बड़ा लंबा सपना देखा। इतना लंबा सपना कि जब वे लौटे तो उन्‍हें पिछले अपने शरीर के और इस शरीर के बीच कोई संबंध स्‍मरण न रहा। इतना लंबा हो गया। लगा कि वह तो अनंत है, उसमे से निकलना बहुत मुश्किल है।</p>
<p>      अच्‍छी आत्‍माएं सुखद सपने देखती है, बुरी आत्‍माएं दुखद सपने देखती हे। सपनों से ही पीडित और दुःखी होती है। तिब्‍बत में आदमी मरता है तो वे उसको मरते वक्‍त जो सूत्र देते है वह इसी के लिए है, ड्रीम सीक्‍वेंस पैदा करने के लिए है। आदमी मर रहा है तो वे उसको कहते है, कि अब तुम यह-यह देखना शुरू कर। सारा का सारा वातावरण तैयार करते है।</p>
<p>      अब यह मजे की बात है, लेकिन वैज्ञानिक है—कि सपने बाहर से पैदा करवाए जा सकते है। रात आप सो रहे है। आपके पैर के पार अगर गीला पानी, भीगा हुआ कपड़ा आपके पैर के पास घुमाया जाए तो आप में एक तरह का सपना पैदा होगा। हीटर से थोड़ी पैर में गर्मी दी जाए तो दूसरे तरह का स्‍वप्‍न पैदा होगा। अगर ठंडक दी जाये तो आप सपने में देखेंगे की वर्षा हो रही है, और बर्फ गिर रही है। गर्मी अगर दी जाये तो आप देखेंगे की रेगिस्‍तान की जलती हुई रेत पर आप चल रहे हे। सूरज जल रहा है, आप पसीने-पसीने हो रहे है। आपके बाहर से सपने पैदा किये जा सकते है। और बहुत से सपने आपके बहार से ही पैदा होते है। रात छाती पर हाथ रख गया जोर से तो सपना आता है कि कोई आपकी छाती पर चढ़ा हुआ है। है आपका हाथ ही।</p>
<p>      ठीक एक शरीर छोड़ते वक्‍त, वह जो सपने का लंबा काल आ रहा है—जिसमे आत्‍मा नये शरीर में शायद जाए, न जाए—जो वक्‍त बीतेगा बीच में, उसका सीक्‍वेंस पैदा करवाने की सिर्फ तिब्‍बत में साधना विकसित की गई। उसको वक बारदो कहते है। वे पूरा इंतजाम करेंगे उसका सपना पैदा करने का। उसमें जो-जो शुभ है, जो-जो वृतियां है, उसने जीवन में कुछ अच्‍छा किया है, वे उन सब को उभारेगें। और जिंदगी भर भी उनकी व्‍यवस्‍था करने की कोशिश करेंगे कि मरते वक्‍त वे उभारी जा सकें।</p>
<p>      जैसा मैंने कहा कि सुबह उठ कर घंटे भर तक आपको सपना याद रहता है। ऐसा ही नये जन्‍म पर कोई छह महीने तक, छह महीने की उम्र तक करीब-करीब सब याद रहता है। फिर धीरे-धीरे वह खोता चला जाता है। जो बहुत कल्‍पनाशील है या बहुत संवेदनशील है, वे कुछ थोड़ा ज्‍यादा रख लेते है। जिन्‍होंने अगर कोई तरह की जागरूकता के प्रयोग किए है पिछले जन्‍म में, तो वह बहुत देर तक रख ले सकते है।</p>
<p>      जैसे सुबह एक घंटे तक सपना याददाश्‍त में घूमता रहता है, धुएँ की तरह आपके आस-पास मँडराता रहता है। ऐसे ही रात सोने के घंटे भर पहले भी आपके ऊपर स्वप्न की छाया पड़नी शुरू हो जाती है। ऐसे ही मरने के भी छह महीने पहले आपके ऊपर मौत की छाया पड़नी शुरू हो जाती है। इस लिए छह महीने के भीतर मौत प्रेडिक्‍टेबल है।</p>
<p><strong>अगले पाठ में &#8230;&#8230;&#8230;..क्रमश:</strong></p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>मैं कहता हूं आंखन देखी,</p>
<p>प्रवचन—3, संस्‍करण:1988</strong></p>
<br />Filed under: <a href='http://oshosatsang.org/category/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b6%e0%a4%a8-%e0%a4%9a%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9a%e0%a4%be/'>प्रशन चर्चा</a> Tagged: <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/'>ओशो</a>, <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6/'>स्‍वामी आनंद प्रसाद</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/oshosatsang.wordpress.com/4348/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/oshosatsang.wordpress.com/4348/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/oshosatsang.wordpress.com/4348/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/oshosatsang.wordpress.com/4348/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/oshosatsang.wordpress.com/4348/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/oshosatsang.wordpress.com/4348/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/oshosatsang.wordpress.com/4348/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/oshosatsang.wordpress.com/4348/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/oshosatsang.wordpress.com/4348/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/oshosatsang.wordpress.com/4348/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/oshosatsang.wordpress.com/4348/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/oshosatsang.wordpress.com/4348/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/oshosatsang.wordpress.com/4348/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/oshosatsang.wordpress.com/4348/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4348&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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			<media:title type="html">  दो जन्‍मों के बीच क्‍या है—ओशो </media:title>
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		<title>लस्‍ट फॉर लाइफ—विंसेंट वैनगो&#8211;(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)</title>
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		<pubDate>Wed, 01 Feb 2012 13:05:42 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[ओशो की प्रिय पूस्‍तके--]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

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		<description><![CDATA[यह कहानी है उत्‍तप्‍त भावोन्‍मेष की, सृजन के विवश करनेवाले विस्‍फोट की; प्रसिद्ध डच चित्रकार विंसेंट बैन गो की जो अपनी ही प्रतिभा की आग में जीवन भर जलता रहा और अंतत: उसी में जलकर भस्‍मसात हो गया। अजीब किस्‍मत &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/02/01/%e0%a4%b2%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%9f-%e0%a4%ab%e0%a5%89%e0%a4%b0-%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%ab-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a5%87%e0%a4%82%e0%a4%9f-%e0%a4%b5/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4345&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>यह कहानी है उत्‍तप्‍त भावोन्‍मेष की, सृजन के विवश करनेवाले विस्‍फोट की; प्रसिद्ध डच चित्रकार विंसेंट बैन गो की जो अपनी ही प्रतिभा की आग में जीवन भर जलता रहा और अंतत: उसी में  जलकर भस्‍मसात हो गया।</strong></p>
<p>     अजीब किस्‍मत लेकिन पैदा हुआ यह प्रतिभाशाली, बदसूरत कलाकार। हॉलैंड के प्रतिष्‍ठित वैनगो परिवार में जन्‍मा वैनगो बंधु योरोप के उच्‍च वर्गीय, ख्‍यातिलब्‍ध चित्रों के सौदागर और प्रदर्शक थे। पूरे योरोप में उनकी अपनी आर्ट गैलरीज थी। छह भाईयों में से दो धर्मोपदेशक थे। उनमें से एक धर्मोपदेशक भाई की संतान थी विंसेंट और थियो। थियो विंसेंट से दो साल छोटा था। थियो समाजिक रस्मों रिवाज के मुताबिक चलने वाला, अपने व्‍यवसाय में सफल आर्ट डीलर था। विंसेंट उससे ठीक उलटा। समाज के तौर तरीके, शिष्‍टाचार उसे कभी रास नहीं आते थे। संभ्रांत व्‍यक्‍तियों दंभ और नकलीपन से बुरी तरह बौखला जाता था। और उसी समय प्रतिक्रिया करता।<span id="more-4345"></span></p>
<p>      घर से बुज़ुर्गों ने उसके लिए धर्मोपदेशक का रास्‍ता चुना। विंसेंट को समाज के गरीब तबके से बहुत हमदर्दी थी। उसने सोचा इस काम में वह उन लोगों की मदद कर सकेगा। विंसेंट का प्रशिक्षण शुरू हुआ। वह दिन रात धर्मग्रंथों का अध्‍ययन करने लगा। लेकिन उसकी एक बहुत बड़ी कमजोरी थी। वह व्‍याख्‍यान नहीं दे पाता था। किसी प्रकार का शाब्‍दिक संप्रेषण उसके लिए संभव नहीं था। और धर्मोपदेशक की पूरी ताकत ही उसकी वाणी होती है। आखिर परीक्षा में वि उत्‍तीर्ण नहीं हो पाया। लेकिन उसके एक शिक्षक उससे हमदर्दी रखते थे। उन्‍होंने कहां, दक्षिण बेल्‍जियम में बॉरिनेज नाम का एक गांव है। वहां कोयले की खदानें है।  पूरी बस्‍ती ही खदान में काम करती है। वहां के हालत बड़े बदतर है। कि कोई पादरी वहां जाने को तैयार नहीं है। विंसेंट खुश से वहां गया। लेकिन वहां के लोगों की जिंदगी देखकर उसे बड़ा धक्‍का लगा। सारे मजदूर तेरह घंटे जमीन के नीचे 700मीटर की गहराई पर अंधेरे में बिताते थे। उनके बच्‍चे बिबियाँ हमेशा बीमार, भूखे और अर्धनग्‍न हुआ करते थे। उन्‍हें विंसेंट कौन सा धर्म सिखाये? उनके दिल में आपने लिए विश्‍वास जगाने की खातिर। विंसेंट उनके जैसा भूखा, चिथड़ों में लिपटा और बीमार रहने लगा। उसने अपने कपड़े मजदूरों में बांट दिये, बदन पर कोयले की कालिख पोत ली। वहां चर्च में यह खबर पहुंचते ही दो विशप बॉरिनेज आये और उन्‍होंने ईसाइयत की तौहीन करने के जुर्म में विंसेंट को निकाल दिया।</p>
<p>      विंसेंट अपने माथे पर दो लकीरें बहुत गहरी खुदवाकर लाया था। गरीबी और लोगों की नफरत। वह जिस परिवार में जन्‍मा था उस स्‍तर पर कभी नहीं जी पाया, हमेशा गरीबी में झुलसता रहा। भोजन का अभाव और बुखार उसके सदा के दोस्‍त थे। दूसरा अभिशाप—किसी स्‍त्री का प्रेम उसे कभी नहीं मिल पाया। ऊंचे खानदान की दो स्‍त्रियों से उसने पागलपन की हद तक प्रेम किया। लेकिन दोनों से उसे नफरत ही मिली। और जिन दो स्‍त्रियों ने उसे प्रेम की थोड़ी सी उष्‍मा दी वे दोनों वेश्‍याएं थी। बाजारू औरतें थी। अंत: उनके प्रेम से उसे सदमा अधिक मिला, पोषण कम।</p>
<p>      धर्मोपदेशक के काम से छुट्टी मिलने पर अचानक विंसेंट को अपने भीतर की चित्रकला का पता चला। बॉरिनेज की एक झोपड़ी में बैठे-बैठे उसने पेंसिल से और कोयले से चित्र बनाना शुरू किया। अकस्‍मात उसके भीतर कोई द्वार खुल गया। कोई सोई हुई चेतना जाग उठी। और वह घंटो चित्र बनाने में डूबा रहने लगा। खदान के मजदूर उनके बच्‍चे राहगीर हर किसी को वह विषय बनाने लगा। लेकिन चित्र बनाकर पेट तो नहीं भरता था। भूख पेट और शरीर कब तक सहन करता। विंसेंट बहुत बीमार हो गया। उसके भाई थियो को खबर मिली और वह आकर उसे हॉलैंड अपने मां-बाप के पास ले गया।</p>
<p>      मां बाप उससे परेशान थे। यह जवान लड़का, न पैसे कमाता है, न कोई काम करता है, बस कागज पर लकीरों से खेलता रहता है। लेकिन विंसेंट से बहस करने का मतलब था की वह फिर घर छोड़ कर चला जाये। उसके गांव के लोग भी उसका तिरस्‍कार करते थे। क्‍योंकि वह सुबह-सुबह ईजेल और रंगों का बक्‍सा लेकर खेतों में चला जाता और दिन भर किसानों के चित्र बनाता रहता। सुख-सुविधा विंसेंट को रास नहीं आती थी। कुछ वक्‍त बीता नहीं की फिर उसे एक झोंका आता और वह अपनी बोरिया-बिस्‍तर लेकर चल पड़ता।</p>
<p>      विंसेंट ने कभी पैसे नहीं कमाये। वह हमेशा थियो के पैसों पर जीता रहा। थियो दोनों के गुज़ारे के लिए पैसे कमाता। थियो छाया की तरह विंसेंट का साथ निभाता और उसे भरोसा दिलाता। थियो को यकीन था एक दिन जरूर विंसेंट के चित्रों की लोग कदर करेंगे जो आज उनका मजाक उड़ाते है। विंसेंट के चित्र उसी के जैसे थे। अनगढ़, ग्रामीण, माटी से नाता जोड़ते हुए। उस समय जो अन्‍य चित्रकार थे उन्‍हें विंसेंट अपने चित्र दिखाता। सभी निराशा में गर्दन हिला देते। कहते, ये चित्र बड़े भद्दे और अजीब है। उनमें अनुपात नहीं है। रेखाओं की सुघडता नहीं है। लोग उसे सलाह देते। किसी विद्यालय में जाओ और ठीक से सींखो। लेकिन किसी भी तरह की व्‍यवस्‍था या प्रशिक्षण विंसेंट के आजाद मिज़ाज के अनुकूल नहीं था।</p>
<p>      चित्र बनाना विंसेंट की विवशता थी। कोई ऊर्जा उसके भीतर से ज्‍वालामुखी की तरह फूट पड़ती थी और वह उसे कैनवास पर अभिव्‍यक्‍त करता। कुदरत को देखने की उसकी अपनी आँख थी। वह अनेकता में एकता देखता था। अगर खेतों में काम करने वाले किसान के चित्र बना रहा है तो पता नहीं चलता कहां किसानों के शरीर खत्‍म हुए ओर कहां मिट्टी शुरू हुई। क्‍योंकि वह कहता दोनों एक ही मिट्टी से बने है। यदि थियो उसे पैसे और चित्रकला का सामान न भेजता रहता तो विंसेंट कभी का मर चुका होता। और संसार एक अद्भुत चित्रकार से वंचित रह जाता।</p>
<p>      थियो पेरिस की आर्ट गैलरी ‘’गुपिल्‍स’’ का संचालक था। वह विंसेंट को पेरिस ले आया। वहां पहली बार विंसेंट ने चित्रकला में हुए परिवर्तन को देखा, इंप्रेशानिज्‍म से परिचित हुआ। उस समय के अन्‍य प्रतिभाशाली चित्रकारों से मिला। पेरिस में कला अपने पूरे वैभव में थी। पेरिस कला नगरी बन गई थी। पॉल गोगां, लोत्रेक, मॅनेट, देगास जैसे कई चित्रकार वहां रहते थे। उनके मिलना-जुलना, उनके साथ विचारों का आदान-प्रदान करना, इस सब से विंसेंट की कला में नया मोड़ आ गया। इंप्रेशानिज्म के बीज उसके भीतर थे ही। वे जोर से अंकुरित हुए। लेकिन एक जगह बसना विंसेंट की किस्‍मत में नहीं लिखा था। उसकी आवारगी ने फिर सिर उठाया। पेरिस का माहौल, चित्रकारों के साथ बातचीत, उनका ओछापन, इससे विंसेंट बुरी तरह ऊब गया। फिर उसने अपना सामान समेटा और दक्षिण की और आर्ल्‍स गया।</p>
<p>      आर्ल्‍स भूमध्‍य सागर के किनारे बसा गांव था। विंसेंट को अब सूरज की तलाश थी। प्रखर तपता हुआ सूरज और उसकी रोशनी में खिले हुए कुदरत के लाल, हरे, पीले नीले रंग&#8230;.इन रंगों को कैनवास पर उतारने के लिए वह तड़प रहा था। थियो ने फिर एक बार उसका साथ निभाया, उसे सहारा दिया। आर्ल्‍स में विंसेंट का दिन क्रम वही था—सुबह अपना साजो सामान उठाकर खेतों में जाना और शाम ढलने तक चित्र बनाना। उसके कैनवासों के ढेर पर ढेर बनते जा रहे थे। उन्‍हें रखने के लिए अलग कमरे की जरूरत पड़ती। लेकिन अब तक उसका एक भी चित्र बिका नहीं था। जिसके चित्र बाद में  लाखों डालर में बिकते थे और योरोप ही हर आर्ट गैलरी में खान से टंगे रहते थे उन्‍हें देखने के लिए भी लोग तैयार नहीं थे। और उनके जन्‍मदाता को दो वक्‍त का खाना भी नसीब नहीं हुआ।</p>
<p>      आर्ल्‍स के लोग विंसेंट को फाऊ-राऊ कहते थे। ‘’फाऊ-राऊ’’ पागल चित्रकार। विंसेंट कभी-कभी वेश्‍या घरों में जाता था। वहां एक लड़की थी रेशोल, वह विंसेंट से प्‍यार करती थी। वह मजाक में विंसेंट से कहती मुझे तुम्‍हारा कान काटकर दो। तुम्‍हारा कान मुझे बहुत अच्‍छा लगता है। एक दिन पागलपन के दौर में विंसेंट ने सचमुच अपना दायां कान काटकर उसे भेट कर दिया।</p>
<p>      यह विंसेंट के पागलपन की शुरूआत थी। इसके बाद हर तीन महीने में फिट पड़ने लगे। उस दौर में वह कुछ भी कर बैठता। इसलिए उसे पागल खाने भरती किया गया। थियो को खबर मिली, वह आकर उसे पेरिस ले गया। दो दौरों के बीच विंसेंट बिलकुल ठीक रहता। अब विंसेंट के चित्रों पर लोगों की नजर पड़ने लगी। कुछ पत्रिकाओं में उसके चित्रों की प्रशंसा में लेख भी छापने शुरू किये। लेकि अब विंसेंट इन बातों से अछूता था। जुलाई के महीने में जब उसे दौरा पड़ने वाला था। विंसेंट के हाथों में एक पिस्‍तौल आ गई। खेतों में चित्र बनाने के लिए गया था, वहीं उसने अपने आपको गोली मार ली।</p>
<p>      उसके ठीक छह महीने बाद थियो ने शरीर छोड़ दिया।</p>
<p>      कभी-कभार ऐसा भी होता है कि कोई व्‍यक्‍ति इसलिए आत्‍महत्‍या कर लेता है कि वह जीने के लिए समझौता करते-करते थक चूका है। वैनगो ने इसीलिए आत्‍महत्‍या की—वह एक अनूठा आदमी था। महान चित्र कार। लेकिन जीवन में कदम-कदम पर उसे समझौता करना पडा। उन सब समझौतों से वह थक चूका था। अब वह भीड़ की मानसिकता का हिस्‍सा बने रहना वह और नहीं सक सकता था। अपनी निजता पाने के लिए उसने आत्‍महत्‍या कर ली। वह वर्षों से सूर्योदय का चित्र बनाना चाहता था। और जिस दिन उसने वह चित्र पूरा किया उसने सोचा कि अब और कोई समझौता करने की जरूरत नहीं है। जो उसे जीवन को देना था। वह उसने दे दिया। यदि वह पूर्व में हुआ होता तो उसके पास एक विकल्‍प था। सन्‍यास, क्‍योंकि वह पश्‍चिम में हुआ इसलिए इस विकल्‍प से चूक गया।</p>
<p><strong>ओशो</strong></p>
<p><strong>किताब की एक झलक&#8211;</strong></p>
<p>      ‘’क्‍या मैं पागल खाने में हूं? विंसेंट लड़खड़ाता हुआ कोने में रखी हुई एकमात्र कुर्सी पर बैठा और उसने आंखे मिलीं। बारह साल की उम्र से उसने गहरे और धुँधले चित्र देखे थे। उन चित्रों में ब्रश का कान नजर नहीं आता था। कैनवास का हर तफ़सील सही और पूरा होता था और सपाट रंग धीरे से एक दूसरे में धुल जाते थे।</p>
<p>      ये चित्र जो दीवालों पर टंगे थे, उसकी हंसी उड़ा रहे थे। वे उनके साथ जरा भी मेल नहीं खाते थे जो उसने देखे थे या जिनकी कल्‍पना की थी। बारीक सपाट सतहों का कहीं पता ह नहीं था। और न ही उस भावुक सादगी का। विदा हो गई वह ब्राइन तरलता जिसमें योरोप ने सदियों तक अपने चित्रों को डूब गया था। यहां खड़े थे वे चित्र जो पागलों की तरह सूरज के साथ रंगरलियां कर रहे थे। उनमें रोशनी थी, जीवन था और धड़कते हुए प्राण थे। बैले नर्तकियों के चित्र मंच के पीछे बने हुए थे। उनमें आदिम लाल, हरे और नीले रंग धृष्‍टता के साथ  एक दूसरे के साथ मिलाये गये थे। उसने हस्‍ताक्षर देखे—देगास।</p>
<p>       नदी तट पर बनाए हुए कुछ नैसर्गिक दृश्‍य भी थे। जिनमे ग्रीष्‍म ऋतु का परिपक्‍व, रसीला रंग और माथे पर चमकता हुआ सूरज झलक रहा था। चित्रकार का नाम था: मॉनेट। अब तक विंसेंट ने हजारों कैनवास देखे होंगे लेकिन उनमें वह आभा, श्‍वास का स्‍पंदन और सुगंध न थी। जो इन आलोकिक चित्रों में थी। मॉनेट ने जो सबसे गहरा रंग इस्‍तेमाल किया था वह हॉलैंड के चित्रालयों में पाये जाने वाले सबसे फीके रंग से भी फिका था। ब्रश का काम सिर उठाकर मानों देख रहा हो। और आपने जरा उसे छुआ नहीं की वह सिहर जायेगे&#8230;.सुकड़ जायेगा। कैसे बिना किसी शर्म हया के हर रेखा सुस्‍पष्‍ट, थी। बुश का प्रत्‍येक स्‍पर्श प्रकृति की लय में प्रवेश करता हुआ नजर आ रहा था। ऐसे रंग और सजीव चित्र विंसेंट देख कर दंग रह गया।</p>
<p>       विंसेंट एक चित्र के सामने खड़ा हुआ था। एक आदमी ऊनी बनियान पहने अपनी बोट की पतवार हाथ में लिए खड़ा था। वह फ्रैंच आदमी का प्रतीक था जो रविवार की दोपहर का मजा ले रहा था। उसकी पत्‍नी चुपचाप नीचे बैठी हुई थी। विंसेंट ने चित्रकार का नाम देखा; मॉनेट। कमाल है। उसके बाह्य दृश्‍यों में जरा भी समानता नहीं। उसने गौर से देखा। नाम मॉनेट नहीं; मॅनेट था।</p>
<p>      पता नहीं क्‍यों, मॅनेट के चित्र एमिल झोला के पुस्‍तकों की याद दिला रहे थे। उनमें सत्‍य की वही तीव्र खोज थी, वही निर्भीक पैनापन, वही अहसास कि चरित्र सुंदरता है; फिर वह कितना ही गंदा क्‍यों न प्रतीत हो। उसने उसकी तकनीक को ध्‍यान से देखा। उसे दिखाई दिया कि मॅनेट बुनियादी रंग, बिना किसी फर्क के, एक-दूसरे के करीब रखता है। कई तफसिलों की सिर्फ आहट थी। रंग, रेखाएं, प्रकाश और छायाएं, इन सबकी कोई सुनिश्चत सीमा नहीं थी। बल्‍कि वे एक दूसरे में पिघल रहे थे।</p>
<p>      विंसेंट बोल उठा, ठीक वैसे ही जैसे आँख उन्‍हें प्रकृति में पिघलता हुआ दिखती है।</p>
<p>      उसने कानों में मॉव की आवाज गूँजी; विंसेंट क्‍या किसी रेखा के बारे में निश्‍चित वक्‍तव्‍य देना तुम्‍हारे लिए सर्वथा असंभव है?</p>
<p>            वह फिर से बैठ गया और उसने चित्रों को भीतर उतरने दिया। कुछ समय बाद वह युक्‍ति उसकी समझ में आयी जिसकी वजह से चित्रकला में आमूल क्रांति घटी थी। ये चित्रकार अपने चित्रों की वायु को पूरा भर देते थे। और वह जीवंत बहती हुई, भरपूर वायु उन बीजों को साथ कुछ करती थी जिन्‍हें उसमें देखा जा सकता था। विंसेंट जानता था कि सैद्धांतिक लोगों के लिए वायु होती ही नहीं। उनके लिए यह सिर्फ एक खाली अवकाश है जिसमें वे ठोस वस्‍तुएं रखते है।</p>
<p>      लेकिन ये नये मनुष्‍य, इन लोगों ने वायु खोज ली थी। उन्‍होंने प्रकाश और सांस वातास और सूरज को खोज लिया था। और उन्‍होंने उस स्‍पंदित तरलता में बसने वाली अनगिनत तरंगायित ऊर्जाओं से छनती हुई चीजों को देख लिया था। विंसेंट जान गया था, अब चित्रकला पहले जैसी नहीं रहेगी। कैमरा और सिद्धांतों में उलझे लोग चीजों की सही प्रति छवि बनायेगे। और चित्रकार हर चीज को उनकी अपनी प्रकृति से और सूरज से आंदोलित वायु में से छनता हुआ देखेंगे। ऐसा लगता था जैसे इन लोगों ने एक नवीन कला को जन्‍म दिया है।</p>
<p>      वह लड़खड़ाता हुआ सीढ़ियों से उतरा। थियो मुख्‍य कक्ष में था। वह मुड़ा। उसके होंठों पर मुस्‍कुराहट थी। और आंखे उत्‍सुकता से अपने भाई के चेहरे को खोज रही थी।</p>
<p>      ‘’क्‍या हुआ विंसेंट? उसने पूछा।</p>
<p>      आह थियो। विंसेंट ने आह भरकर कहा। उसने कुछ कहने की कोशिश की लेकिन असफल रहा। उसने ऊपर की और देखा और चित्रालय की इमारत के बाहर दौड़ गया।</p>
<p>      बेलों से ढ़ंके चौड़े रास्‍ते पर चलते हुए वह ऑपेरा तक पहुंचा। पत्‍थर की इमारतों के बीच से उसे पुल दिखाई दिया और वह नदी की और चल पडा। वह पानी की सतह तक पहुंचा और उसने सीन नदी में अपनी उंगलियां डुबोई। फिर वहां से उठकर वह निरूद्देश्‍य पेरिस की सड़कों पर घूमता रहा। बिना इसकी फिक्र किये कि वह कहां जा रहा है। बड़े-बड़े साफ सुथरे सायादार मार्गों पर भव्‍य दुकानें, फिर सड़ी सी गलियाँ, फिर प्रतिष्‍ठित रास्‍ते और उन अंतहीन शराब की दुकानें&#8230;.।</p>
<p>      आखिर जब दोपहर ढलने लगी तब उसे रू लावल, उसके रहने का स्‍थान मिला। उसके भीतर का हलका सा दर्द उसकी थकान ने दबा दिया था।  वह सीधे वहां गया जहां उसके चित्र गठरियों बंधे थे। उसने उन सबको फर्श पर बिछाया। वहाँ अपने कैनवासों को ध्‍यान से देखता रहा। हे भगवान। वे अँधियारे और रूखे-सूखे थे। बड़े बोझिल, निष्‍प्राण और मुद्रा। वह अनजाने में बीती हुई सदी के चित्र बना रहा था।</p>
<p>      थियो घर आया। उसने अपने भाई को जमीन पर उदास बैठा हुआ पाया। वह नीचे उसके पास बैठ गया। प्रकाश की आखिरी किरण कमरे से विदा हो गई। कुछ देर थियो खामोश रहा।</p>
<p>      विंसेंट, मैं जानता हूं, तुम पर क्‍या गुजर रही है। तुम अवाक हो गये हो, अभिभूत करने वाली बात है। है न? चित्रकला ने आज तक जो-जो पवित्र माना है उसे सबको यहां पर फेंक दिया गया है।</p>
<p>      विंसेंट की छोटी-छोटी आंखे थियो की आँखो से चार हुई। थियो, तुमने मुझे क्‍यों नहीं बताया? मुझे क्‍यों नहीं पता चला? तुम मुझे उससे पहले यहां क्‍यों नहीं ले आये? मेरे छह लंबे वर्ष बरबाद हो गये।</p>
<p>      बरबाद हुए? कतई नहीं, ‘’थियो ने जोर से कहा, ‘’तुमने तुम्‍हारी कलाकारी को निर्मित किया है। तुम विंसेंट वैनगो की तरह चित्र बनाते हो, संसार में और कोई तुम्‍हारी तरह चित्र नहीं बना सकता। अगर तुम अपना ढांचा बनाने से पहले यहां आ जाते तो पेरिस तुम्‍हें अपने ढाँचे में ढाल लेता।</p>
<p>      ‘’लेकिन मुझे क्या करना होगा? इस कचरे को देखता रहूँ? वैनगो ने एक बड़े कैनवास को ठोर मारते हुए कहा, ‘’यह मरा हुआ है, थियो, और दो कौड़ी का।</p>
<p>      ‘’तुमने मुझे पूछा कि तुम्‍हें क्‍या करना होगा। मैं बताता हूं, तुम्‍हें इंप्रेशनिस्‍ट (प्रभाव वादी) चित्रकारी से प्रकाश और रंग के विषय में सीखना होगा। तुम्‍हें उनमें केवल उतना भर लेना होगा। उससे अधिक नहीं। तुम्‍हें नकल नहीं करनी। उनके साथ वह मत जाओ। पेरिस कही तुम्‍हें दबोच न ले।</p>
<p>      लेकिन थियो, मुझे सब कुछ अ. ब. स. से सीखना है। मैं जो भी करता हूं, गलत है।</p>
<p>      तुम जो भी करते हो वह सब सही है। सिर्फ तुम्‍हारे प्रकाश और रंग को छोड़कर। जिस दिन तुमने बॉरिनेज से पेंसिल उठायी उस दिन से तुम इंप्रेशनिस्‍ट हो। तुम्‍हारे रेखांकन को देखो। तुम्‍हारे ब्रश के काम को देखो। मॅनेट से पहले किसी ने इस तरह का काम नहीं किया। तुमने जो चेहरे बनाये है, तुम्‍हारे वृक्ष, खेत में काम करती हुई आकृतियां&#8230;..ये सब तुम्‍हारे इंप्रैशन, तुम्‍हारे प्रभाव है।  वे अनगढ़ है, अधूरे है, तुम्‍हारे व्‍यक्‍तित्‍व से झर कर आते है। तुम्‍हारी रेखाओं को देखकर लगता है कि तुम कभी भी निश्‍चित वक्‍तव्‍य नहीं देते। इंप्रेशनिस्‍ट होने का यही अर्थ है—दूसरों की तरह चित्र नहीं बनाना; नियम और क़ायदों के गुलाम नहीं बनना। तुम तुम्‍हारे युग के प्रतिनिधि हो विंसेंट। और तुम इंप्रेशनिस्‍ट हो; तुम्‍हें अच्‍छा लगे या बुरा।</p>
<p>      ‘’थियो मुझे पुलक हो रही है।‘’</p>
<p>      ‘’पेरिस  के युवा चित्रकारों में तुम्‍हारा नाम हो चुका है। मेरा मतलब उनसे नहीं जिनके चित्र बिकते है। मेरा मतलब उनसे है जो महत्‍वपूर्ण प्रयोग कर रहे है। वे तुमसे परिचित होना चाहते है। तुम उनसे बढ़िया चीजें सीखोंगे?</p>
<p>      वे मेरा काम जानते है? युवा इंप्रेशनिस्‍ट चित्रकारों ने मेरा काम देखा है?</p>
<p>      विंसेंट घुटनों के बल बैठ गया ताकि वह थियो को अच्‍छी तरह से देख सके। थियो को झुंडर्ट के पुराने दिन याद आये जब वे नर्सरी के फर्श पर एक साथ खेलते थे।</p>
<p>      ‘’निश्‍चित ही इतने साल मैं पेरिस में क्‍या करता रहा? वे सोचते है कि तुम्‍हारे पास पैनी नजर है, और है ड्राफ्ट्समैन की पकड़। अब तुम्‍हें कुछ इतना ही करना है कि तुम्‍हारे रंगों को हलका करके जीवंत, आलोकित हवा को चित्रित करना सीखना है। विंसेंट, क्‍या उस दौर में जीना एक वरदान नहीं है जब इतनी महत्‍वपूर्ण घटनाएं घट रही हो।‘’</p>
<p>      ‘’थियो शैतान कहीं है, शानदार शैतान।‘’   </p>
<p>      ‘’चलो, उठकर खड़े हो जाओ। दीया जलाओ, आओ।‘’</p>
<p>      ‘’ सुंदर कपडे पहनो और खाना खाने बाहर चलें। मैं तुम्‍हें ब्रेसरी यूनिवर्सल ले चलता हूं। वहां पेरिस के सबसे स्‍वादिष्‍ट चेतोब्रां मिलते है। मैं तुम्‍हें असली भौज का जायका देता हूं। शैंपेन की बोतल के साथ। आज के महान दिवस का जश्‍न मनाऐंगे, प्‍यारे, जब पेरिस और विंसेंट वैनगो को मिलन हुआ था।‘’</p>
<p><strong>ओशो का नज़रिया&#8211;</strong></p>
<p>      आज की पहली किताब है: अरविंग स्‍टोन की ‘’लस्‍ट फॉर लाइफ’’। प्रसिद्ध डच चित्रकार विंसेंट वैनगो के जीवन पर आधारित उपन्‍यास है। स्‍टोन ने इतना अद्भुत काम किया है कि मैं नहीं सोचता कि किसी और ने इस तरह का काम किया है। किसी ने किसी दूसरे व्‍यक्‍ति के बारे में इतनी घनिष्‍ठता से नहीं लिखा। जैसे वह अपने अंतरतम के बारे में लिख रहा हो।</p>
<p>      ‘’लस्‍ट ऑफ लाईफ’’ सिर्फ उपन्‍यास नहीं है। एक आध्‍यात्‍मिक किताब है। जिसे में आध्‍यात्‍मिक कहता हूं, उन अर्थों में आध्‍यात्‍मिक। मेरी दृष्‍टि में, जीवन के सभी आयाम एक संश्‍लेषण में समाहित करने चाहिए। तभी व्‍यक्‍ति आध्‍यात्‍मिक बनता है। इस किताब को अरविंग स्‍टोन ने इतनी खूबसूरती से लिखा है कि वह खुद अपना अतिक्रमण करे इसकी संभावना कम है।</p>
<p>      इस किताब के बाद उसने बहुत सी किताबें लिखी। आज की मेरी दूसरी किताब भी अरविंग स्‍टोन की ही है। मैं उसे दूसरी कहता हूं क्‍योंकि वह गौण है। वह ‘’लस्‍ट फॉर लाईफ’’ की कोट की नहीं है। यह किताब ‘’अॅगनी एंड दि एक्‍स्‍टसी’’ यह भी उसी प्रकार की है। एक और कलाकार की जीवनी। शायद स्‍टोन सोच रहा होगा कि वह ‘’लस्‍ट ऑफ लाईफ’’ की छवि बनाये, लेकिन वह असफल रहा। यद्यपि वह असफल हुआ। किताब दूसरे नंबर पर है; किसी दूसरे की तुलना में नहीं, उसकी अपनी ही तुलना में। कलाकार, कवि, चित्रकार, इनके जीवन पर लिखे हुए सैकड़ों उपन्‍यास है लेकिन उनमें से कोई इस दूसरी किताब की भी ऊँचाई छू नहीं सकता। फिर पहली की तो बात ही क्‍या करनी। दोनों ही सुंदर है लेकिन पहली की सुंदरता श्रेष्‍ठतम है।</p>
<p>      दूसरी किताब थोड़ी कनिष्‍ठ है लेकिन इसमे अरविंग स्‍टोन की गलती नहीं है। जब तुम ‘’लस्‍ट ऑफ लाइफ’’ जैसी किताब लिखते हो, तो साधारण मानवीय प्रवृति यही होती है कि उसकी नकल करें; उसी प्रकार की कोई  और रचना करे। लेकिन जब तुम नकल करते हो, तब वह उस जैसी नहीं रहती। जब उसने लस्‍ट&#8230;&#8230;लिखी तब वह नकल नहीं कर रहा था। वह क्वाँरा द्वीप था। जब उसने ‘’अॅगनी एंड दि एक्‍स्‍टसी’’ लिखी तब वह नकल कर रहा था। और यह बिलकुल घटिया नकल है।  अपने बाथरुम में हर कोई करता है। जब वह आईने में देखता है। दूसरी किताब के बारे में ऐसा ही लगता है। लेकिन मैं कहता हूं, यद्यपि यह आईने का प्रतिबिंब है, यह यथार्थ को झलकाता है। इसलिए मैं उसे सम्‍मिलित करता हूं।</p>
<p>      यह किताब माइकेल एंजेलो के जीवन के बारे में है। महान जीवन। स्‍टोन बहुत कुछ चूक गया है। यदि ‘’गोगां’’ (फ्रैंच चित्रकार) के बारे में होता तो ठीक था, लेकिन यदि माइकेल एंजेलो के बारे में है तो मैं उसे माफ नहीं कर सकता। लेकिन वह बहुत खूबसूरती से लिखता है। उसका गद्य पद्य जैसा है।</p>
<p>      हालांकि दूसरी किताब ‘’लस्‍ट फॉर लाइफ’’ जैसी नहीं है। हो नहीं सकती। सिर्फ इसलिए क्‍योंकि विंसेंट वैनगो जैसा दूसरा आदमी नहीं हुआ। वह डच आदमी अतुलनीय था। वह अद्वितीय है। सितारों से भरे हुए पूर आकाश में वह अकेला चमकता है—बिलकुल अलग, अनूठा अपने आप में असाधारण। उस पर उत्‍कृष्‍ठ किताब लिखना सरल था। माइकेल एंजेलो के बारे में भी यही हो सकता था लेकिन उसने खुद की नकल करने की कोशिश की, इस लिए चुक गया।</p>
<p>      कभी नकल मत करना। किसी के पीछे मत चलना—स्‍वयं के भी।</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>बुक्‍स आय हैव लव्‍ड</strong></p>
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		<title>प्रिंसिपिया एथिका—जी. इ. मूर—(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)</title>
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		<pubDate>Tue, 31 Jan 2012 12:52:35 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[ओशो की प्रिय पूस्‍तके--]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

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		<description><![CDATA[आधुनिक दर्शन शास्‍त्र के विकास में जी. ई मूर का योगदान उतना ही महत्‍वपूर्ण है! जितना कि बर्ट्रेंड रसेल का। उसकी बहुत कम रचनाएं प्रकाशित हुई। और ‘’प्रिंसिपिया एथिका’’ उनमें से सर्वप्रथम और सर्वाधिक प्रसिद्ध किताब है। अंग्रेजी साहित्‍य और &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/01/31/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%aa%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%8f%e0%a4%a5%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a5%80-%e0%a4%87-%e0%a4%ae/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4343&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>आधुनिक दर्शन शास्‍त्र के विकास में जी. ई मूर का योगदान उतना ही महत्‍वपूर्ण है! जितना कि बर्ट्रेंड रसेल का। उसकी बहुत कम रचनाएं प्रकाशित हुई। और ‘’प्रिंसिपिया एथिका’’ उनमें से सर्वप्रथम और सर्वाधिक प्रसिद्ध किताब है।</p>
<p>      अंग्रेजी साहित्‍य और चिंतन पर उसका प्रभाव विचारणीय है। बर्ट्रेंड रसेल ने इस किताब के बारे में लिखा, ‘’इसका हमारे ऊपर (कैम्ब्रिज में) जो प्रभाव पडा, और इसे लिखने से पहले और बाद में जो व्‍याख्‍यान हुआ उसने हर चीज को प्रभावित किया। हमारे लिए वह विचारों और मूल्यों का बहुत बड़ा स्‍त्रोत था। लॉर्ड केन्‍स का तो मानना था कि यह किताब प्लेटों से भी बेहतर है।<span id="more-4343"></span></p>
<p>      ‘’यह किताब नैतिक तर्क सारणी के दो मूलभूत सिद्धांतों की मीमांसा करती है। इसमें दो प्रश्‍न अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण  मालूम होते है; वे कौन सी चीजें है जो अपने आप में शुभ है, और हम किस तरह के कृत्‍य करें? नीतिशास्‍त्र के चिंतन में मूर के लेखन की सरलता, स्‍पष्‍टता और कॉमन सेंस ताजा प्राण फूंक देते है। उसकी बौद्धिक प्रामाणिकता और ओज इस किताब पर श्रेष्‍ठता की मुहर लगाते है।</p>
<p>      यह किताब उस मानसिकता और बौद्धिक स्‍थिति के लिए लिखी गई है। जो आज से पचास साल पहले निति और नैतिकता का आचरण में बहुत विश्‍वास रखती थी। बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में मनुष्‍य के मन पर नीति की जबरदस्‍त पकड़ थी। यहां तक कि सभी धर्म नैतिक आचरण बनकर रह गये थे। आज की तारीख में इस किताब का महत्‍व समझ में आना बहुत मुशिकल है। क्‍योंकि आज नीति की धज्‍जियां उड़ गई है। हम मानसिक तौर पर एक अलग ही समय में जी रहे है।</p>
<p>      बहरहाल जिस समय यह किताब लिखी गई उस समय यह क्रांतिकारी साबित हुई। क्‍योंकि उसने नीति नियमों की बुनियाद को हिला दिया। अच्‍छा-बुरा, सही-गलत, पाप-पूण्‍य, इसकी सामाजिक परिभाषा पत्‍थर की लकीर जैसी स्‍थिर होती है, मजबूत होती है। उसके आधार पर न्‍याय, अदालत, पुलिस, धर्म इत्‍यादि बनाये जाते है। और यहां मूर मौलिक सवाल उठाता है कि जिसे हम शुभ कहते है वह क्‍या है? क्‍या वह किसी वस्‍तु की आंतरिक गुणवता है या कि एक खास तरह के आचरण का मापदंड है? क्‍या अस्‍तित्‍व में लिखा है कि फलां चीज शुभ है और फलां चीज अशुभ? यह आचरण सही है और यह गलत? इसे आदमी ही तय करता है, अस्‍तित्‍व नहीं।</p>
<p>      ये सारे प्रश्‍न नीतिशास्‍त्र के अंतर्गत आते है, किताब की भूमिका में मर ने यह बात स्‍पष्‍ट की है, ‘’जब हम कहते है, फलां आदमी अच्‍छा है या वह शख्‍स दुर्जन है। जब हम पूछते है, मुझे क्‍या करना चाहिए? या क्‍या ऐसा करना गलत होगा? तो यह नीतिशास्‍त्र का अधिकार है कि वह इस तरह के प्रश्‍नों की चर्चा करे। अधिकार जब हम इन शब्‍दों का प्रयोग करते है, ‘’शुभ, अशुभ, कर्तव्‍य, अधिकार, अच्‍छा, बुरा तब हम नैतिक मूल्यांकन कर रहे होते है।</p>
<p>      अधिकांश नीतिवादी दार्शनिक अच्‍छाई को अच्‍छे आचरण से जोड़ते है। क्‍योंकि एक आदमी अच्‍छा है कि नहीं यह कैसे पता चलेगा? उसके आचरण से ही न? जब हम कहते है नशे में धुत होना बुरा है तो हम मानकर चलते है कि मदहोश होना बुरा कृत्‍य है।</p>
<p>      मूर की विशिष्‍टता यह है कि वह आचरण को गुणवत्‍ता से अलग करता है। पहले गुणवत्‍ता, बाद में आचरण।  और उसका मुद्दा सटीक है। कोई व्‍यक्‍ति अच्‍छा है। इसीलिए अच्‍छा आचरण कर सकता है। बुरा आदमी अच्‍छा आचरण कर सकता है। बुरा आदमी अच्‍छा आचरण कैसे कर सकता है। इसका मतलब है, अच्‍छाई अपने आप में कोई गुण है, मूल्‍य है।</p>
<p>      अच्‍छाई की परिभाषा क्‍या है? मूर कहता है अच्‍छाई को परिभाषित करना असंभव है। ठीक वैसे ही जैसे पीले रंग ने देखा हो उसे समझाना मुश्‍किल है कि पीला रंग क्‍या है।</p>
<p>      एक बार यह  स्‍थापित कर कि अच्‍छाई का विश्‍लेषण और चर्चा करना नीतिशास्‍त्र को तीन हिस्‍सों में बांटा है। एक नैसर्गिक नीतिशास्‍त्र, दूसरा आध्‍यात्‍मिक नीतिशास्‍त्र और तीसरा सुखवाद (हिडोनिज्‍म) इससे पहले कि मनोविज्ञान एक स्‍वतंत्र विज्ञान की तरह विकसित हुआ, अध्‍यात्‍म, विज्ञान और गुह्म विज्ञान, ये सब ‘’नैचुरल साइंस’’ नैसर्गिक विज्ञान कहलाते थे। नैसर्गिक विज्ञान मानता है कि ‘’शुभ’’ वस्‍तुएं न हो तो क्‍या समय में कहीं भी केवल अच्‍छाई हो सकती है? क्‍या ‘’शुभ’’ एक अनुभूति है या कि वह वस्‍तुओं का अंग है जिससे कि वे बनी है? यदि वह उनका मूल द्रव्‍य है तो उसे निकाल लेने पर वह बचेगी ही नहीं।</p>
<p>      ‘’सुखवाद’’ पर एक पूरा परिच्‍छेद है। सुखवाद सुप्रसिद्ध दार्शनिक मिल का सिद्धांत है जो बीसवीं सदी के प्रारंभ में बहुत लोकप्रिय था। और आज यह सिद्धांत मात्र दर्शन नहीं, मनुष्‍य की जीवन चर्या बन चुका है। यह सिद्धांत मनुष्‍य की हर इच्‍छा और हर कृत्‍य के पीछे एक ही प्रेरणा को मानता है। और वह है सुख पाने की आकांशा इसलिए सुखवाद के अनुसार शुभ की परिभाषा है सुख। जो भी सुखद है उसे हम शुभ या अच्‍छा कहते है। सुखवादी दार्शनिक सुख को सर्वोपरि मानते है, सुख के अलावा जो भी है, फिर वह पूण्‍य हो या ज्ञान, जीवन हो या प्रकृति, या सौंदर्य, ये सब सुख प्राप्‍त करने के साधन की तरह अच्‍छे है। ये अपने आप में साध्‍य नहीं है। मिल ने लिखा है: ‘’सुख, और दुःख से मुक्‍ति ये ही अपने आपे साध्‍य हो सकते है।‘’</p>
<p>      नीतिशास्त्र का एक और तल है आध्‍यात्‍मिक नीतिशास्‍त्र। मूर की दृष्‍टि में यही नीतिशास्‍त्र शुभ की परिभाषा कर सकता है। क्‍योंकि यह नैसर्गिक नीतिशास्त्रियों या सुखवादियों की तरह शुभ को किसी वस्‍तु का गुण नहीं मानता।</p>
<p>      ‘’आध्‍यात्‍मवादी लोगों की यह बहुत बड़ी योग्‍यता है कि वे ज्ञान को सिर्फ उन वस्‍तुओं तक सीमित नहीं मानते जिन्‍हें हम छू सकते है। देख सकते है, या महसूस कर सकते है। आध्यात्मवादी मानिसक तल पर जो वस्‍तुएं है उनके बारे में तो सोचते ही है, साथ में वस्‍तुओं के उस वर्ग के बारे में भी चिंतन करते है जो समय में नहीं होती, समय का अंग नहीं है, न ही प्रकृति का अंग है। सच तो यह है कि वह होती ही नहीं। यह जो वर्ग है ये शुभ को एक विशेषण की तरह समझ सकते है। यह ‘’गुडनेस’’ याने अच्‍छाई नहीं है, वरन वे वस्‍तुएं और गुणवत्‍ताएं है जो समय के भीतर हो सकती है। जिनकी एक अवधि होती है। और जो होती है और विदा भी हो सकती है। ये हमारे जानने के विषय हो सकते है।   </p>
<p>      ‘’इस वर्ग के सबसे अहम उदाहरण है, अंक अर्थात नंबर। यह तो निश्‍चित है कि दो प्राकृतिक चीजें है; और यह भी उतना ही सुनिश्‍चित है कि ‘’दो’’ का अपना कोई अस्‍तित्‍व नहीं होता, और न ही हो सकता है। दो और दो चार जरूर हो सकते है। लेकिन अस्‍तित्‍व में न तो दो होते है और न चार होते है। और फिर भी उसमे कोई अर्थ तो होता है। तो एक अर्थ में दो है भी, और नहीं भी। जिसे सामान्‍य सत्‍य कहा जाता है, मसलन धरती पर कहीं भी कोई भी दो चीजें जुडकर चार होती है, वह वस्‍तुत: चार होती ही नहीं। इसे सामान्‍य सत्‍य माना जाता है। और प्लेटों के समय से लेकर आज तक इन ‘’सामान्‍य सत्‍यों‘’ ने दार्शनिकों के चिंतन में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई है।</p>
<p>      मूर के अनुसार, आध्‍यात्‍मिक नीति शास्त्री ‘’सुप्रीम गुड’’ ‘’ आत्‍यंतिक शुभ’’ को मानते है लेकिन वह समय के बारे में अंत: वह प्रकृति का हिस्‍सा नहीं होता है। प्रकृति और सभी प्राकृतिक वस्‍तुएं समय में जीती है।</p>
<p>      इसके बाद मर ने नीतिशास्‍त्र और आचरण का संबंध स्‍थापित किया है। नीतिशास्‍त्र के लिए शुभ की अवधारणा को मानना बहुत आवश्‍यक है क्‍योंकि उनका पूरा भवन ही उस पर खड़ा है।</p>
<p>      जब हम किसी बात को या वस्‍तु को ‘’अच्‍छा’’ कहते है तो क्‍यों कहते है? इसे तय करना नीति शास्‍त्र का काम है।</p>
<p>      इसी से जुड़ा हुआ दूसरा पहलू है या अच्‍छा भाव से किये हुए हर कृत्‍य का परिणाम अच्‍छा होता है। अगर हां, तो किसके लिए अच्‍छा है? खुद के लिए या सबके लिए? क्या कोई ऐसा कृत्‍य हो सकता है जो सब के लिए अच्‍छे परिणाम लाये?</p>
<p>      किताब का अंतिम परिच्‍छेद है: ‘’दि आइडियल, आदर्श’’ इससे पहले वाक्‍य से ही मूर अपनी भूमिका स्‍पष्‍ट करता है—‘’ इस परिच्‍छेद का शीर्षक संदिग्‍ध है। जब हम किसी अवस्‍था को आदर्श कहते है तो हम तीन अलग-अलग बातें करना चाह सकते है। जब हम किसी चीज को अच्‍छा कहते है तो हो सकता है। कि हम न केवल अच्‍छा मानते है। वरन अन्‍य सभी चीजों से उसे बेहतर समझते है।‘’</p>
<p>      ‘’आदर्श का अर्थ है वस्‍तुओं की सर्वश्रेष्‍ठ अवस्‍था, आत्यंतिक शुभ का सार निचोड़। इस अर्थ में स्‍वर्ग की सम्‍यक कल्‍पना आदर्श की सम्‍यक धारण होगी। तथापि वैयक्‍तिक शुभ के पार एक सामूहिक और सार्वत्रिक शुभ की भी संकल्‍पना है। इसे ही दर्शन शास्‍त्र में मानवता का शुभ कहते है। यह वह अंतिम लक्ष्‍य है जिसके लिए हम काम करें। इस अर्थ में युटोपिया आदर्श है। युटोपिया की मन ही मन कल्‍पना करने वाले अपने ख़्यालों में कई चीजों को संभव मान सकते है। जो कि यथार्थ में असंभव हो सकते है।‘’</p>
<p>      क्‍या ऐसा कोई शुभ है जो अपने आपमें सत्‍य हो सकता है। हो सकता है यह जो आत्‍यंतिक शुभ है उसकी कुछ ऐसी गुणवत्‍ताएं हों जिनकी हम कल्‍पना भी कर सकते हो। क्‍या कोई ऐसा खालिस शुभ है जिस पर अशुभ की बिलकुल छाया न हो? यदि सुख शुभ नहीं हो सकता, सौंदर्य शुभ नहीं हो सकता, ज्ञान शुभ नहीं हो सकता—क्‍योंकि प्रत्‍येक का विपरीत उसमे समाया हुआ है—तो फिर परम शुभ क्‍या है।</p>
<p>      दो सौ पच्‍चीस पृष्ठों की यह खोज अंतत: शुभ तक नहीं पहुँचती अपितु पाठक को अधर में ही लटका देती है। जिस प्रश्‍न को लेकर शुरूआत की थी, ‘’वॉट इज़ गुड’’ ‘’शुभ क्‍या है। उसका उत्‍तर मिलना तो दूर, प्रश्‍न और विराट हो जाता है। तो फिर सवाल उठता है हम किस मुंह से इस अथाह जीवन के नीतिशास्‍त्र, कानून, अदालतें, किस लिए? यदि यह किताब किसी को इतना भी डांवाडोल कर देती है तो क्‍या चाहिए जी इ मूर सफल हुआ।</p>
<p><strong>ओशो का नज़रिया&#8211;</strong></p>
<p>      जी. इ. मूर एक महान समसामयिक लेखक, न एक किताब लिखी है: ‘’प्रिंसिपिया एथिका’’ और पूरे इतिहास में संभवत: वह एकमात्र व्‍यक्‍ति है जिसने शुभ को परिभाषित करने के लिए इतनी गहराई से सोचा हो। शुभ की परिभाषा किए बगैर कोई नीतिशास्‍त्र कोई नैतिकता नहीं हो सकती। अगर तुम्‍हें यही पता नहीं हे कि शुभ क्‍या तो तुम कैसे जानोंगे क्‍या नैतिक है, क्‍या अनैतिक ; क्‍या सही है, क्‍या गलत।</p>
<p>      उसने एक बुनियादी सवाल को उठाया और बगैर यह जानते हुए कि यह आखिरी सवाल है। और वह मुसीबत में फंस गया। आज की दुनियां के सर्वाधिक बुद्धिमान लोगों में एक था वह। वह इस सवाल को हर दृष्‍टि कोण से देखकर लगभग ढाई सौ पन्‍नों तक खोज करता है: ‘’शुभ क्‍या है?’’ और इतने सरल से शब्‍द की परिभाषा करने में वह बुरी तरह असफल रहा। हर कोई जानता है कि अच्‍छा क्‍या है, हर कोई जानता है बुरा क्‍या है। हर कोई जानता है सुंदर क्‍या है। हर कोई जानता है बुरा क्‍या है? हर कोई जानता है सुंदर क्‍या है? लेकिन उसकी परिभाषा करोगे तो तुम उसी मुसीबत में पड़ोगे।</p>
<p>      उसने सोचा होगा कि हर कोई जानता है कि शुभ क्‍या है, सिर्फ थोड़ा सा राज जानने की बात है। ताकि उसकी परिभाषा की जा सके। लेकिन ढाई सौ पन्‍नों के बारीक तर्क के बाद, गहन चिंतन और बौद्धिक विश्‍लेषण के बाद वह इस नतीजे पर पहुंचता है कि शुभ अव्‍याख्‍येय है।</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>बोधिधर्म: दि ग्रे टेस्ट झेन मास्‍टर</strong></p>
<p>जी. इ. मूर की ‘’प्रिंसिपिया एथिका’’ मुझे यह किताब बहुत पसंद है। यह तर्क की महान सरणी है। यह दो सौ से अधिक पृष्‍ठ एक ही प्रश्‍न के ऊहापोह में बिताता है: शुभ क्‍या है। और अंतत: इस निष्‍कर्ष पर पहुंचता है कि शुभ अव्‍याख्‍येय है। अद्भुत लेकिन उसने अपना गुह्म पाठ बखूबी किया। उसने जल्‍दी से निर्णय नहीं ले लिया जैसे कि रहस्‍यदर्शी लेते है। वह दार्शनिक था। वह आहिस्‍ता-आहिस्‍ता कदम-दर-कदम बढ़ता गया। शुभ अव्‍याख्‍येय है जैसे कि सौंदर्य है या भगवत्‍ता है। वस्‍तुत: जो भी मूल्‍यवान है वह अव्‍याख्‍येय है। ध्‍यान रहे, जिसकी भी परिभाषा की जा सके वह दो कौड़ी का है। जब तक कि तुम अव्याख्येय तक नहीं पहु्ंचो, तुम किसी मूल्‍यवान के करीब आये ही नहीं।</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>बुक्‍स आय हैव लव्‍ड </strong></p>
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		<title>ध्‍यान में प्रथम अनुभूति&#8211;स्‍वामी आनंद प्रसाद</title>
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		<pubDate>Mon, 30 Jan 2012 16:20:37 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[मार्ग की मधुर अनुभूतियां—]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

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			<content:encoded><![CDATA[<p><div id="attachment_4340" class="wp-caption alignright" style="width: 206px"><a href="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/01/scan0025.jpg"><img src="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/01/scan0025.jpg?w=196&#038;h=300" alt="ध्‍यान की अनुभुति--" title="ध्‍यान की अनुभुति--" width="196" height="300" class="size-medium wp-image-4340" /></a><p class="wp-caption-text">ध्‍यान की अनुभुति--</p></div>ध्‍यान के प्रथम कदम मनुष्‍य के एक नर्म मुलायम मिट्टी पर पड़ें कदमों की तरह होते है जो बहुत गहरी छाप छोड़ जाते है। फिर आप उसमें श्रद्धा की गुड़ाई की हो तो सोने पे सुहागा समझो। अगर उस भूमि में अपने बीज बो दिया तो वह बहुत गहरा और उँचा वृक्ष जरूर बनेगा। जिसे कोई भी मीलों दूर से भी देख सकेगें। इस लिए प्रथम अनुभूतियों को आज भी में अपने बिलकुल पास महसूस करता हूं, जैसे वो अभी कोरी और अनछुई है। ध्‍यान के पहले दिन ही चित मुझे अचेतन की उन गहराइयों में ले गया। जिस की अनुभूति आज मैं रोंए रेशे में मांस मज्‍जा बन कर समा गई है। कितनी मधुर और ठोस धरातल पर वह अनुभूति मुझे एक स्‍वप्‍न तुल्‍य लगती है। परन्‍तु मैं जानता हूं कि वह कोई कोरी कल्‍पना नहीं थी। और न ही वह एक स्‍वप्‍न। बस यूं समझो मेरे अंदर एक प्‍यास थी और सामने अमृत गागर मिल गया। और में डूब गया उस में, छोड़ अपने को पूरी तरह से बिना कुछ सोचे विचारे किये की क्‍या होगा और कैसे..;। <span id="more-4339"></span>डूबने वाले को क्‍या पता क्‍या किनारा और क्‍या गहराई। मैंने तो बस छलांग लगा दी और छोड़ दिया आस्‍तित्‍व के हाथ में। वैसे मुझे में लाख खराबियां थी पर एक संकल्प और साहस की कमी नहीं थी। मैं बचपन से जो भी काम करता, उस के अंदर पूर्णता से डूब जाता था। शायद यही सोच और संकल्प मुझे ध्‍यान की धारा में ले गई। जब भी में ध्‍यान करने  जाता था तो झोक देता था पूरी ताकत और अपने आप को। पूरे शरीर की उर्जा लगा देता, और  चूकने का इंतजार करता की कहां पर वह खत्‍म होती है। पर ऐसा दिन कभी नहीं आया आज तक, वह कभी नहीं चुकी, कभी-कभी ध्‍यान करते हुए मन यह कल्‍पना या भय जरूरी दिखाता की अगर अभी एक भी हूं&#8230;हूं&#8230;और किया तो हूं के साथ प्राण निकल जायेगे। परन्‍तु मैंने एक नहीं हजार किये&#8230;.लेकिन कभी कुछ नहीं हुआ। ये सब मन का खेल होता है। मन को जब लगता है कि मैं मरा। वह लाख बहाने बाजी करता है। यही उसके बच निकलने का एक मात्र उपाय है, जिस में वो कभी-कभी कामयाब हो जाता है। परन्‍तु मैंने उसकी एक नहीं चलने दि और फिर वह बेचारा लाचार एक कोने में दूबक कर बैठ गया। उसकी बंदर वाली उछल कूद कुछ ही महीनों में थक हार गई।</p>
<p>      ध्‍यान करते समय किसी अनुभव या कल्‍पना पर मेरा कोई जोर या विश्‍वास नहीं था। क्‍योंकि ओशो ने साफ कहां था, ‘’ये सब मार्ग के दृश्‍य है इन्‍हें देखो पर रुको मत।‘’ पहले दिन जब में ध्‍यान करने के लिए गया तो, किसी ने कुछ नहीं बताया कि ध्‍यान क्‍या है और कैसे करना है। मैंने चोगा पहना और अंदर चला गया ध्‍यान केन्‍द्र में। वहां और मित्र भी ध्‍यान के लिए आये हुए थे। ध्‍यान का संगीत चालू हुआ। मुझे मजबूरन देखना पडा की ये सब क्‍या हो रहा है और कैसे करना है। परन्‍तु आँख खोल कर किसी को देखा शोभा दाई बात नहीं होती। परन्‍तु यह मेरी मजबूर या असह्यता समझो। क्‍योंकि क्‍या करना है मुझे कुछ भी पता नहीं था। वैसे अकसर ध्‍यान में जाने से पहले नये मित्र को ध्‍यान कराने वाला बता देता है कि किसी तरह से ध्‍यान करना है। पर होना कुछ और ही था&#8230;.जो मेरे लिए विस्मयकारी ही था। लेकिन एक बार सब देखने के बाद मैनें आंखें बंद कर ली और प्रथम चरण के संगीत खत्‍म होने तक मैं वह क्रिया करता रहा। अब दूसरा नृत्‍य कर चरण आया। तब भी मैंने आंखें खोल कर देखा और कुछ झिझक के साथ नाचने लगा। कुंडलिनी का संगीत चमत्कारी है। ओशो के दिशानिर्देश पर तैयार संगीत किसी और ही लोक का लगता है। आज भी उसे हजारों बार सून कर ऐसा लगता वह एक दम नया और अनछुआ है। जबकि आप किसी भी संगीत को दस-पाँच बार सुनने के बाद बोर हो जाते हो। और ये मेरा अकेले का अनुभव नहीं है। लाखों करोड़ो&#8230;.जो 30-35 साल से रोज इस संगीत पर ध्‍यान करते है। पूना आश्रम में साय चार बज कर पंद्रह मिनट पर।</p>
<p>सालों से ये ध्‍यान नित नियम से हो रहा है।     </p>
<p>      नृत्‍य ने मेरे पूरे शरीर को एक दम हलका और भार रहित कर दिया। तोड़ दिया मैंने सारे बंधन जो सालों से कही दबे हुए थे। क्‍योंकि वहां पर सब मौज से नाच रहे थे, न वहां कोई देखने वाला ही था, सब ही तो नृत्‍य में डूबे हुई थे। फिर आप को क्‍या झिझक और शर्म। ये अनुभव मुझे तीसरे चरण में हुआ। जब ध्‍यान के लिए एक खास संगीत बजने लगा। इस चरण में आप को बैठ कर या खड़े रह कर संगीत तो सुनना होता है। घंटियों हजार-हजार ध्‍वनि के साथ और भी बाद यत्र बज रहे थे। जो हमारे सुनने की पूर्णता पर चोट कर रहे थे। हजारों लाखों घ्वनियां इधर उधर से आ रही थी और वह सब मेरी नाभि में डूब रही थी। और मुझे ऐसा लग रहा था, जैसे मेरा पूरा शरीर कान बन गया है। और घ्वनियां मुझे में से होकर गुजर रही है। कुछ देर में मेरा शरीर मानों मिट गया। शरीर का एक भार जो हमेशा महसूस करते है हम, अचानक गायब हो गया। कितना हल्‍कापन पहली बार मुझे लगा आपको बात नहीं सकता।</p>
<p>      मैं आंखें बंद किये&#8230;थिर खड़ा था। शरीर की सभी प्रकार की हलचल समाप्‍त हो गयी थी। या यूं कह सकते है की में शरीर को हीला-झूला पाने की स्‍थिति में नहीं था। मानों पहली बार शरीर ने में मेरी आज्ञा माननी बंद कर दी। मैने एक दो बार हाथ हिलाने की कोशिश की पर मैं कामयाब नहीं हो सका। मरना क्‍या होता है&#8230;..शरीर का मिटना क्‍या होता है, उसे पहले बार मैने जाना। हम नाहक मोत से डरते है। सच ही मुझे उस मिटने पर जरा भी डर नहीं लगा क्‍योंकि मैं देख रहा था अपने को पूरा का पूरा।  और मेरी स्‍वास भी चल रही थी, पर वो कही दूर थी। जिन पर मनुष्‍य का वैसे भी कोई नियंत्रण नहीं है। और हम नियंत्रण करने को योग आसन मानते है कैसा विरोधा भास है। जो स्‍वय चल रही है, अविरल। धीरे-धीर मुझे लगने लगा की मेरे शरीर ने एक वृक्ष का रूप ले लिया है। एक पहाड़ी ढलान पर खड़ा मैं नीचे खाई की और झांक रहा हूं। दूर दराज तक बर्फ ही बर्फ है। और नरम मुलायम बर्फ मेरे तनों और टहनियों पर अब भी गिर रही थी। वहां हवा का एक झोंका भी नहीं था। आस पास के छोटे मोटे पेड़ों को में निहार रहा था। दूर पहाड़ियों पर बादल तैर रहे थे। मेरे आप पास जो छोटे-छोटे पेड़ पौधे थे। मैं उन पर ज़मीं बर्फ को देख रहा था। पूरा रास्‍ता एक दम सून-सान था। केवल बर्फ की सफेद चादर पर हल्‍की-हल्‍की सूर्य की रोशनी पड़ने के कारण वह चाँदी के समान चमक रही थी। मैं बहुत विशाल और ऊँचा था। परंतु मैं देख रहा था, मेरे टहनियों पर कोई पत्‍ते नहीं थे। जिसके कारण मैं देख नहीं पाया की मैं कौन सा वृक्ष था। रूई की तरह गिरती बर्फ के साथ एक प्राणी जो ऊदबिलाव की तरह दिखाई दे रहा था। धीरे-धीरे मेरे उपर चढ़ रहा था। उस समय मेरे मन कि अवस्‍था कैसी थी, एक हलका पन&#8230;.ऐसा जिसे इससे पहले मैंने कभी महसूस नहीं किया था। बोझ रहित&#8230;..जहां पर विचारों की दौड़ नहीं थी। एक दम सूना पथ। मीलों दूर तक कोई विचार नहीं।  सब कुछ खाली हो गया हो जैसे शायद वृक्षों के जगत में विचार नहीं होते केवल भाव होते है। न वहां कोई तरंग थी, न कोई विचार, न कोई शब्‍द&#8230;&#8230;.ओर न ही थी वहां कोई उत्‍तेजना। कितना सुखद लग रहा था वह क्षण&#8230;.</p>
<p>      वह प्राणी जो मेरे उपर चढ़ रहा था शायद इस बर्फ और ठंड में किसी आश्रय की आस में था। उसका छूना, उसका रेंगना। मुझे बहुत भला लग रहा था। जैसे कोई मेहमान हमारे घर आये और हम आनंद और उत्‍साह से भर जाये। वह प्रेम ऐसा था, मातृत्‍व लिये, आपका पूरा शरीर प्रेम की तरंगों से तरंगाइत हो रहा हो। मैं अपने को पूर्ण प्रेम की छूआन से लबरेज होता हुआ महसूस कर रहा था। ऐसा शायद कोई मनुष्‍य के शरीर में कभी अनुभव नहीं कर सकता।  क्‍यों मनुष्‍य के शरीर में हमारा मन कार्य करने लगा है। यहां पर विचारों ने उत्पत्ति शुरू हो जाती है। मनुष्‍य के ऊपर लाखों सालों की यात्रा ने विकास का एक जाल फैला लिया है। आज भी हम आपने जीवन में इसे देख सकते है। जब भी आप किसी को कुछ समझाना चाहते हो तो आप बात करते हो विचारों से और सुनने वाला उन्‍हें लेता है आपने भाव से। आ डांट रह रहे है उसकी भलाई के लिए और वो कहता है तुमने मेरे दिल को ठेस पहुँचाई। कहीं कोई तालमेल नहीं। तब हम कहते फिरते है कि मुझे कोई समझ नहीं रहा &#8230;&#8230;सभी को ऐसा लगा है। वो शायद भाव का लोक है, जो विचारों के ठीक नीचे बह रह है। जिसे कभी कोई प्रेम में गोता मार कर महसूस कर लेता है। प्रत्‍येक मनुष्‍य अपने भाव देखता है और दूसरे के विचार। विचार मन और बुद्धि के जगत के है। और भाव ह्रदय के जगत का। पहली बार विचारों के भार रहित मन में जो हलका पन होता है उसे मैंने महसूस किया। उसे शब्दों में नहीं कहा जा सकता। उस स्‍थिति के बाद घंटो किसी से बात करने या मिलने को मेरा मन नहीं किया। मैं दूर एक एकांत में किसी वृक्ष से टेक लगा कर बैठ गया। कब मेरी आँख लगी और कितना समय बिता मुझे कुछ पता नहीं चला। जब आंख उठा कर सामने देखा तो आसमान पर पूरा चाँद चमक रहा था। इतना खुबसूरत चाँद मेंने पहले कभी नहीं देखा। आस पास झींगुरों की आवाज मानों मन को गुदगुदा रही थी। चाँद की छांव में पेड़ों की पड़ती परछाई झूम रही थी। घंटो बाद भी तन भार रहित&#8230;..अपने हल्‍के पन को लिए रहा। और मैं एक अद्भुत सिहरन सी महसूस करता रहा था। एक खामोशी मेरे दामन पर मानों लिपट गई थी। जो मेरे अंदर से गुद-गुदा हट से भर रही थी। कितनी देर में तो मुझे महसूस हुआ की मैं कौन हूं और यहां पर क्‍या कर रहा हूं&#8230;मस्‍तिष्‍क को ये सब ताल मेल बिठाने में बहुत देर लगी। जैसे हमें कभी-कभार स्‍वप्‍न से बहार आने पर पता नहीं चलता की हम कहां पर है। पर वह स्‍थिति बहुत सुनंद थी।</p>
<p>      दूसरी अनुभूति को मैं ‘’मांग’’ ही कहूंगा। वैसे मैंने ध्‍यान के इन 21 वर्षो में केवल दो ही मांग रखी थी। जो दोनों ही पूर्ण हो गई। दूसरी का जिक्र आगे करूंगा आज पहली मांग की बारी है। ध्‍यान शुरू किये करीब 6 महीने हो गये थे। पर एक बात मुझे बहुत चुभती थी। जब भी में आँख बंद कर के बैठता। तो मेरी आंखों की पुतलियाँ हिलती रहती और हरकत करती थी। और अंदर देखने में जो गहरा मटियाला गाढ़ा अँधेरा साफ नहीं दिखाई देता था। जब भी मैं आँख बंद कर के उसे देखता तो वह हमेशा हिलती रहता। हमारी आंखों की पुतलियों कि हलचल हमारे बेचैन मन का प्रतीक है। मन जितना बेचैन होगा पुतलियाँ उतनी ही अधिक हिलती रहेगी। वह अजीब काला मटियाला अंधकार, एक धुएँ और समुद्र की लहरों को तरह अंदर हिलोरे ले रहा था । कुछ ऐसा अजीब सा था जैसे कि कोई अंधकार से भरा समुद्र हिलोरे मार रहा है। मेरे मन में अचानक एक कल्‍पना आई कि काश ऐसा हो जाता की मेरी आँखो की पुतलियाँ हिलना बंद कर दे।  तब इस अंधकार को देखना कितना सुखद लगेगा भला लगेगा।  पर ये सब मेरे बस की बात नहीं थी। मैं चाहता था मेरी आँख एक दम से जड़ वत हो जाये। एक पत्‍थर की आँख बन जाए। जो मात्र हो वहां उसमें कोई हलचल न हो। क्‍या फिर भी वह अंधकार इस तरह से हिलेगा। या उस मैं जब थिर आंखों से देखूँगा तो वह मुझे कैसा लगेगा।</p>
<p>      इस बात को मैं जानता था, मांग हमेशा मन की होती है, और वह ध्‍यान में बाधा डालने के लिए मन की ही एक कल्‍पना होती है, या उसे कहे लालच, कहीं&#8230;.किसी मांग&#8230;..पर मैं रूक न जाऊं या अपने-आप को रोक नहीं लूं। पर लाख जतन कर उस वासना को मैं दबा नहीं पा रहा था। सच तो यह था की वह मेरी पकड़ से बहार हो गई थी। इस तरह से पुतलियों का हिलना प्रत्‍येक साधक की पहली बाधा होता होगा। क्‍योंकि लाखों सालों से उर्जा आँखो के द्वारा से लगातार बाहर बहती रही है। जब हम आँख बंद करते है। तो उर्जा लगातार आंखों की पुतलियों से टकराती है। उर्जा कभी थिर रह सकती। तब वह वहां मार्ग न पा कर वह वापस लोटती है। और उस उर्जा को संभालने के लिए आंखों की पुतलियों को हलचल करनी होती है। क्‍योंकि तीसरी आँख उस समय तक सोई होती है। उसके द्वार बंद होते है। वैसे तो वह आँख ध्‍यान के लिए हमेशा प्‍यासी रहती है। पर शायद साधक को उर्जा इन आंखों से उस आँख तक हस्तांतरण करने में कुछ समय लगता है। फिर तो वह तीसर आँख यह कार्य खुद-ब-खुद कर लेती है। इसमे साधक को कुछ भी नहीं करना होता। उसके बाद तो आपको केवल ध्‍यान को तीसरी आँख पर केंद्रित करना है और वह चूस लगी सारी उर्जा को अपने अंदर। क्‍यों तब तक आपकी आंखे जड़वत थिर हो चुकी होती है।</p>
<p>      इस सब को महसूस करेने के लिए मुझे तीन महीने का समय लगा। अचानक एक दिन जैसे ही मैं ध्‍यान के चरण में खड़ा हुआ। तो क्‍या देखता हूं मेरी दोनों आंखे आपस में चिपक गई। न तो बाहर की तरफ हलचल थी और न अंदर की तरफ। कितना अभूतपूर्व क्षण था। उस समय आंखों से देखना। चाहें वहां प्रकाश नहीं था। पर हम उस अंधकार को भी कहां देख पाते है। मैं देखता रहा उस काले-मटमैले अंधकार को। जो लहरों की भाति हिलडूल रहा था। मानों अंदर एक अंधकार का समुद्र लहरा रहा है। वहां अंदर अब केवल अंधकार में हलचल थी। पर में केवल देख रहा था। वो हिलती छाया&#8230;..कितनी सौम्य और सुखद लग रही थी। अंदर तक सब शांत हो गया। शायद वहीं दर्व है जिसे विज्ञान कोई नाम दे रहा है। मैटर या और कुछ। पर यह मानने की बात है, हम प्रकाश करते है। तब भी अंधकार होता है। और प्रकाश को बुझा देते है तब भी। प्रकाश आता जाता है। परन्‍तु अंधकार न आता है जाता। जो आता नहीं वह जा भी कैसे सकता है। अब ध्‍यानियों ने परमात्‍मा को प्रकाश रूप कहा है। और कितने ही धर्म अपनी साधना के पहले चरण में ही प्रकाश की साधना से शुरू करते है। परन्‍तु मेरा तो पहला साक्षात्कार एक अंधकार से होता है। वह भी महीनों हिलते-डुलती आंखों से आज पहली बार में उन थिर आंखों के बाद में देख पा रहा था, उस तरल अंधकार को जो जम गया था बर्फ की तरह&#8230;&#8230;</p>
<p><strong>ओशो ने एक जगह कहां है&#8230;</strong></p>
<p>      ‘’जब भी कोई साधक भीतर प्रविष्‍ट होता है, तो प्रकाश से उसकी सीधी मुलाकात कभी नहीं होती। होगी भी नहीं, क्‍योंकि प्रकाश तो बहुत गहरे में छिपा है। हमारे और हमारे ही प्रकाश के बीच अंधकार की गहरी पर्त है। तो पहले तो भीतर आँख बंद करते ही अंधकार हो जाता है। इस अंधकार से भयभीत मत होना। और इस अंधकार में काई कल्‍पित अंधकार निर्मित मत करना। इस अंधकार में प्रवेश करते ही जाना&#8230;.कल्‍पित प्रकाश भी हम निर्मित कर सकते है। लेकिन इस कल्‍पित प्रकाश के कारण असली प्रकाश का कोई पता नहीं चलेगा।</p>
<p>      बहुत सी साधनाएं, जो प्रकाश की कल्‍पना से शुरू होती है; वे साधनाएं इस अंधकार के पार नहीं ले जाती। &#8230;&#8230;.बंद आँख करके हम उस प्रकाश को देखने की कोशिश भी कर सकते है। और कोशिश की तो सफल भी होगें। क्‍योंकि वह प्रकाश हमारी कल्‍पना ने निर्मित किया है। वह आपके ही मन की उत्पती है। वह आपकी ही संतति है। उससे ये अंधकार नहीं कटेगा।</p>
<p>      हां वहां एक और भी प्रकाश है; जब हम अंधेरे में प्रवेश करते चले जाते है। तब वह एक दिन उपल्‍बध होगा। जिसे हमने सोच और चाह कर निर्मित नहीं किया। लेकिन अंधकार में डूबते-डूबते एक दिन अंधेरे की वह पर्त टूट जाती है। और हम प्रकाश के लोक में प्रवेश कर जाते है।</p>
<p>      पहली मुलाकात वास्‍तविक साधक को अंधकार से होगी&#8230;.झूठे साधक को प्रकाश से भी हो सकती है।&#8230;</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>समाधि के सप्त द्वार</p>
<p>प्रवचन पहला ध्‍यान शिविर, अंबर नाथ</p>
<p>रात्रि 9 फरवरी 1973</strong></p>
<p>      वो दिन था और उसके बाद मेरी आंखों की पुतलियाँ थिर हो गई। अब कभी भी कहीं पर भी आंखें जैसे बंद करता हूं मेरी आँख चिपक जाती है।&#8230;ओर दोनों आँखों के बीच&#8230;..माथे के अंदर एक अजीब सा चुंबकीय खिचाव महसूस होता है। एक मधुर सुगंध मुझे घेर लेती है। और चारों और थिरता का कोहरा फैल जाता है। मन के परदे पर आते जाता विचारों का रेला&#8230;रुकता चलता रहता है। जब होश बढ़ता है तब विचार गायब हो जाते ह। मार्ग मीलों तक सूनसान। कोई मुसाफिर नहीं&#8230;ओर जैसे ही होश इधर उधर होता है। विचार अपनी दौड़ शुरू कर देते है। मार्ग कितना ही लंबा क्‍यों न हो&#8230;ओर एक हिसाब से होना भी चाहिए। ताकि मार्ग में चलने का आनंद मिल सके। वहां का सौंदर्य&#8230;वहां की सीतलता&#8230;वहां गीत&#8230;वहां सुगंध और सरसता में एक प्रकार की मादकता है। लगता ही नहीं हम चर रहे है। कोई अंजान सी शक्‍ति हमे बहाए लिए चली जा रही है। परन्‍तु एक बात है इसके बदले में हम कुछ मेहनत नहीं करनी पड़ रही है। जैसे संसार में हमेशा जीने के लिए जद्दो जहद मारा मारी करनी होती है। ये मार्ग कितना आराम दाई है सरल है। शायद ध्‍यान दुनियां का सबसे सरल क्रत्‍य है। और सबसे कठिन भी। क्‍योंकि सबसे सरल जिसके लिए कुछ भी नहीं करना होता। परन्‍तु हमारा मन तो कार्य को करने में विश्‍वास रखता है। इस लिए उसे न कुछ करना अति जटिल लगता है।</p>
<p>      नहीं करता मैं मंजिल का इंतजार&#8230;.चलना ही इतना मधुर है। मार्ग ही इतना आनंद दाई है। फिर क्‍यों रूकने के बार में सोचें।</p>
<p>बस चलना ही है लक्ष्‍य मेरा</p>
<p>फिर तूफ़ानों से क्‍या डरना</p>
<p>कांटों की झोली भर ली जब</p>
<p>अब फूलों से भी क्‍या डरना</p>
<p>इस सुने अनंत पथ पर चल कर</p>
<p>पलकों से कांटों को चून कर</p>
<p>है झूल रहा अंब्‍बर नित दिन</p>
<p>आनंद की झोली है भर कर</p>
<p>वो नदिया हो या हो सरिता</p>
<p>फिर खोने से अब क्‍या डरना&#8230;.</p>
<p>है राग वहीं और सुर भी वहीं</p>
<p>पर तान बदलनी पड़ती है</p>
<p>उस आंगन के वो थिर जो कदम</p>
<p>अब झूम-झूम इठलाते है</p>
<p>मन मार मगन हो जाता है</p>
<p>है मधुरस तान लगाते है</p>
<p>आलाप वही, है स्‍थाई वहीं</p>
<p>पर सूर खरज बन जाते है</p>
<p>उन गहरे जाती बंदिश के</p>
<p>गाने से भी अब क्‍या डरना&#8230;.</p>
<p><strong>स्‍वामी आनंद प्रसाद ‘’मनसा’’</p>
<p>(मार्ग की अनुभूति)</strong></p>
<br />Filed under: <a href='http://oshosatsang.org/category/%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a4%a7%e0%a5%81%e0%a4%b0-%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a5%81%e0%a4%ad%e0%a5%82%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%82/'>मार्ग की मधुर अनुभूतियां—</a> Tagged: <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6/'>स्‍वामी आनंद प्रसाद</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/oshosatsang.wordpress.com/4339/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/oshosatsang.wordpress.com/4339/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/oshosatsang.wordpress.com/4339/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/oshosatsang.wordpress.com/4339/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/oshosatsang.wordpress.com/4339/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/oshosatsang.wordpress.com/4339/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/oshosatsang.wordpress.com/4339/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/oshosatsang.wordpress.com/4339/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/oshosatsang.wordpress.com/4339/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/oshosatsang.wordpress.com/4339/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/oshosatsang.wordpress.com/4339/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/oshosatsang.wordpress.com/4339/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/oshosatsang.wordpress.com/4339/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/oshosatsang.wordpress.com/4339/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4339&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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		<title>बीइंग एंड टाईम-मार्टिन हाइडेगर—(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)</title>
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		<pubDate>Mon, 30 Jan 2012 11:01:46 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[ओशो की प्रिय पूस्‍तके--]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

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			<content:encoded><![CDATA[<p>कभी-कभार कोई ऐसी किताब प्रकाशित होती है। जो बुद्धिजीवियों की जमात पर टाइम-बम का काम करती है। पहले तो उसकी अपेक्षा की जाती है लेकिन जैसे-जैसे मत बदलते है वह लोगों का ध्‍यान आकर्षित करने लगती है। ऐसी किताब है जर्मन दार्शनिक मार्टिन हाइडेगर द्वारा लिखित ‘’बीइंग एंड टाईम’’<span id="more-4334"></span></p>
<p>      इसका प्रभाव न केवल यूरोप और अमेरिका के दर्शन पर हुआ बल्‍कि वहां के साहित्‍य और मनोविज्ञान पर भी हुआ। इसके प्रशंसक तो यहां तक कहते है कि उसने आधुनिक विश्‍व का बौद्धिक नक्‍शा बदल दिया। सार्त्र, मार्टिन वूबर, और कामू जैसे अस्‍तित्‍ववादी दार्शनिक हाइडेगर से बहुत प्रभावित थे। यह किताब पहली बार 1927 में प्रकाशित हुई। चूंकि हाइडेगर जर्मन लोगों के लिए बेबूझ था। इस लिए इसका अनुवाद करना लगभग असंभव था। लेकिन हाइडेगर के प्रभाव शाली शिष्‍य जॉन मैकेरी और एडवर्ड रॉबिन्‍सन ने बड़ी मेहनत से यह किताब अंग्रेजी में उपलब्‍ध कराई। हाइडेगर की खूबी यह है कि वह प्रचलित शब्‍दों का सामान्‍य अर्थों में प्रयोग नहीं करता, वरन उन्‍हें अपने आशय देता है। इस करके उसका लेखन बेहद तरोताजा होता है। पाठक को पुलकित करता है लेकिन अनुवाद के लिए चुनौती बनता है। कभी-कभी वह शब्‍दों के पुराने धातुओं में जाकर उनके नए अर्थ गढ़ता है। हाइडेगर की प्रतिभा भाषा के साथ अभिसार करती है। यह किताब वाकई अनुवाद तथा पाठक, दोनों के लिए बुद्धि की कवायद है। न केवल इसकी भाषा बल्‍कि इसका विषय ‘’अंतस और समय’’ भी बड़ा ही दुर्बोध और अगम है। और इसे सुबोध करने में हाइडेगर की लेखनी कहीं भी सहयोग नहीं करती।</p>
<p>      पूरी किताब जीवन के दो बुनियादी गहन बिंदुओं का ऊहापोह है—स्‍वयं का होना और समय। और सचमुच गहराई से देखें तो मनुष्‍य को जीवन के ये ही दो प्रश्‍न बहुत परेशान करते है। मैं कौन हूं? और समय क्‍या है? हाइडेगर लिखता है कि हम जो कि समझते थे कि हम जानते है, कि अपना होना, बीइंग क्‍या है, अब बिबूचन में  पड़ गया है। क्‍या हमारे पास इसका कोई उत्‍तर है। कि बीइंग का वास्‍तविक अर्थ क्‍या है? जरा भी नहीं। इस ग्रंथ में हम इसका अनुसंधान करेंगे। कि बीइंग अर्थात होना क्‍या है? और इसका समय के साथ क्‍या रिश्‍ता है?</p>
<p>      अपने होने के भिन्‍न-भिन्‍न पहलूओं का बारीक विश्‍लेषण हाइडेगर इतनी प्रवीणता से करता है कि पढ़ने वाले को अपने-आप पर संदेह होने लगाता है। क्‍या सचमुच हम वह है जैसा कि हम मानते है? क्‍या यह विश्‍व वास्‍तव में है या हमने इसे मान लिया है? इस मोटी किताब का (488 पृष्‍ठ) तीसर परिच्‍छेद है: ‘’दि वर्ल्ड हुड ऑफ दि वर्ल्‍ड’’ विश्‍व का विश्‍वता। विश्‍व के संदर्भ में अपने होने का मतलब समझना हो तो पहले यह समझना जरूरी है कि यह विश्‍व क्‍या है। सतही तौर पर माना जायेगा कि विश्‍व को समझने की क्‍या जरूरत है? यह तो है ही। नहीं, हाइडेगर की नजरों से देखें तो आप जानेंगे कि आपने कभी विश्‍व को समझा ही नहीं है। क्‍या विश्‍व वे सारी वस्तुएँ है जो उसके भीतर है? जैसे मकान, लोग, वृक्ष पर्वत, सितारे&#8230;.. ? यदि इन वस्‍तुओं का हटा लें तो विश्‍व क्‍या होगा? होगा या नहीं होगा? क्‍या बीइंग भी एक वस्‍तु है या वस्‍तुओं से पहले की घटना है? क्‍या वस्‍तुओं का अपना मूल्‍य है या वह मूल्‍य उनमें हमने डाला हुआ है? हमने—याने किसने?</p>
<p>      &#8230;..फंस गए न भंवर में। इसी भँवर का ना है मार्टिन हाइडेगर। बीसवीं सदी का मूर्धन्‍य अस्‍तित्‍ववादी दार्शनिक। ओशो ने इसकी किताब को अपनी मनपसंद किताबों में शामिल तो किया है लेकिन साथ में यह भी कहा है कि जो तीसरे दर्जे के पागल है वह ही इसे पढ़े।</p>
<p>      फिर भी, चल पड़े है तो थोड़ी दूर तो चलना चाहिए।</p>
<p>      मृत्‍यु के संबंध में हाइडेगर का चिंतन भी असामान्‍य है।</p>
<p><strong>किताब की एक झलक&#8211;</strong></p>
<p>      हम एक दूसरे के साथ रोजमर्रा की जिंदगी में जिस प्रकार की सार्वजनिकता में है उसमे मृत्‍यु को एक ऐसी दुर्घटना माना जाता है जो निरंतर घट रही है। कोई न कोई ‘’मरता’’ है—चाहे पड़ोसी हो या अजनबी। लोग, जिनका हमसे कोई परिचय नहीं है वे मर रहे है—प्रतिदिन, प्रति घंटे। मृत्‍यु एक जानी मानी घटना है जो विश्‍व के भीतर घटती है। लोगों ने  इस घटना की व्‍याख्‍या अपनी सुविधा के लिए की हुई है। जिसका सार इस प्रकार है&#8230;.’’कभी न कभी हमें मरना होगा, अंत में, लेकिर अभी हमारा इससे कोई लेना देना नहीं है।‘’</p>
<p>      ‘’व्‍यक्‍ति मरता है’’ इस वाक्‍य का विश्‍लेषण असंदिग्‍ध रूप से ऐसा होने को प्रगट करता है जो मृत्‍यु की और उन्‍मुख है। इस प्रकार की वार्ता में मृत्‍यु को कुछ ऐसी अनिश्‍चिता समझा जाता है जो प्राथमिक रूप से अभी करीब नहीं है। और इसलिए उससे कोई खतरा नहीं है। यह वक्‍तव्‍य यह ख्‍याल प्रसारित करता है कि मृत्‍यु जिन तक पहूंचती है वे दूसरे लोग है। बीइंग या अपना ‘’होना’’ कभी यह नहीं सोच सकता की मरनेवालों में मैं भी शामिल है।</p>
<p>      सभी जीनियसों की तरह हाइडेगर भी रूढिवादिता और पिटी-पिटाई धारणाओं से संतुष्‍ट नहीं है। वह हर मान्‍यता  की जड़ तर उतरता है। और अंतिम छोर तक पहुंचने के बाद उसे पता चलता है कि वह एक बेबूझ पहली है। सभी गहन चिंतक उस ‘’डेड एंड’’ पर पहुंचते है जो रहस्‍य का द्वार होता है। उसके आगे सोच-विचार संभव नहीं है। अज्ञेय और छलांग ही काम आती है।</p>
<p>      इस विशाल किताब का अंत दो प्रश्‍न वाचक वाक्‍यों से होता है—‘’क्‍या कोई रास्‍ता है जो आदिम समय से निकल कर बीइंग के, होने के अर्थ तक पहुँचाता है? क्‍या समय स्‍वयं को होने के क्षितिज पर प्रकट करता है?</p>
<p>      मार्टिन हाइडेगर जर्मनी में 1989 में पैदा हुआ। फ्रेबर्ग विश्‍वविद्यालय में वह प्राध्‍यापक रहा। हाइडेगर के माता-पिता निम्न 8मध्येवर्गीय परिवार के थे। उसकी मां किसान की बेटी थी। और पिता मजदूर थे। लेकिन वह खुद बहुत मेधावी था इसलिए शिष्‍य वृति पाकर उच्‍च शिक्षा ले सका। उसके जीते जी उसके जीवन का एक पहलू अज्ञात रहा। जो 1987 में उसके एक विद्यार्थी ने उजागर किया। वह पहलू यह था कि हाइडेगर नाझी पार्टी का सदस्‍य था। 1933 में वह नाझी पार्टी में शामिल हुआ। वह हिटलर से इतना प्रभावित कि फ्रेबर्ग विश्‍वविद्यालय में वह नाझी वाद की नीतियों का लागू करना चाहता था। न जाने कैसे, अब तक उसका यह हिटलर प्रेम दुनिया की नजरों से छिपा रहा। मन की जटिलता का कोई क्‍या कहे। हो सकता है हिटलर की और आकर्षित होने का कारण उसका गरीब, सुकड़ता बचपन रहा हो।</p>
<p>      जो भी हो, इस काली छाया के बावजूद या हो सकता है इसकी वजह से, हाइडेगर का मौलिक योगदान दर्शन के क्षितिज पर चंद्रमा की तरह चमकता है। वह बीसवीं सदी की पाश्‍चात्‍य दर्शन धाराओं की गंगोत्री था। 1976 में उसका देहांत हुआ और तब तक वह बीइंग एंड टाइम’’ का दूसरा भाग प्रकाशित न कर सका।</p>
<p><strong>ओशो का नज़रिया&#8211;</strong></p>
<p>      दूसरी किताब है, मार्टिन हाइडेगर की ‘’बीइंग एंड टाइम’’ मुझे यह आदमी बिलकुल पसंद नहीं है। वह न केवल कम्युनिस्ट था बल्‍कि फासिस्‍ट भी था। एडोल्फ हिटलर को मानने वाला। जर्मन लोग क्‍या कर सकते है। उस पर भरोसा नहीं होता। वह इतना प्रतिभाशाली आदमी था, जीनियस था, और फिर भी उस विक्षिप्‍त, मूढ़ एडोल्फ हिटलर का समर्थक था। मैं वाकई हैरान हूं।</p>
<p>      लेकिन उसकी किताब अच्‍छी है—मेरे शिष्‍यों के लिए नहीं वरन जो अपने पागलपन में बहुत आगे निकल गये है उनके लिए। यदि तुम्‍हारा पागलपन बहुत बढ़ चुका है तो बीइंग एंड टाइम पढ़ो। यह समझने से बिलकुल परे है। वह तुम्‍हारे सिर पर हथौड़े की तरह चोट करेगी। लेकिन उसमें कुछ सुदंर झलकें है। जब कोई तुम्‍हारे सिर के ऊपर हथौड़े से चोट करता है तो दिन में तारे नजर आते है। यह किताब ऐसी ही है, उसमे कुछ तारे है।</p>
<p>      यह किताब अधूरी है। मार्टिन हाइडेगर ने दूसरा भाग प्रकाशित करने का वादा किया था। वह जिंदगी भर, बार-बार दूसरा भाग प्रकाशित करने का वादा करता रहा लेकिन कभी उसने उसे लिख नहीं। शुक्र है। मैं सोचता हूं कि उसे खुद समझ में नहीं आया होगा कि उसने क्‍या लिखा है? तो आगे क्‍या लिखता? दूसरा भाग कैसे छापता? और दूसरा भाग उसके दर्शन की पराकाष्‍ठा होने वाली थी। उसे न लिखना ही बेहतर था। कम से कम मज़ाक का विषय तो न बना।  वह दूसरा भाग लिखे बगैर ही मर गया। लेकिन पहला भी  अंतिम दर्जे के पागलों के लिए अच्‍छा है। और ऐसे कई लोग है। इसलिए मैं इन किताबों पर बोल कर उन्‍हें अपनी सूची में सम्‍मिलित कर रहा हूं।</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>बुक्‍स आय हैव लव्‍ड</strong></p>
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		<title>पुनर्जन्‍म की बात—ओशो</title>
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		<pubDate>Sat, 28 Jan 2012 15:51:28 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[प्रशन चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

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		<description><![CDATA[प्रश्‍न—कुछ धर्म पुनर्जन्‍म में विश्‍वास करते है और कुछ नहीं करते। आप अपने बारे में कैसे जान सकते है कि आपने भी जीवन जिया है और पुन: जीएंगे? ओशो—सिद्धांतों में मेरा विश्‍वास नहीं हे। मैं एक साधारण आदमी हूं कोई &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/01/28/%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a4-%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4329&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>प्रश्‍न</strong>—कुछ धर्म पुनर्जन्‍म में विश्‍वास करते है और कुछ नहीं करते। आप अपने बारे में कैसे जान सकते है कि आपने भी जीवन जिया है और पुन: जीएंगे?</p>
<p><strong>ओशो—</strong>सिद्धांतों में मेरा विश्‍वास नहीं हे। मैं एक साधारण आदमी हूं कोई सिद्धांतवादी नहीं। सिद्धांतवादी तो महान विचारक होते है। वह यथार्थ के बारे में कुछ भी नहीं जानते, मगर वह इसके बारे में सिद्धांत गढ़ता रहते है। उसकी पूरा जीवन घूमता ही रहता है। और सत्‍य, यर्थाथ तो बस केंद्र में ही रह जाता है। किंतु सिद्धांतवादी इधर-उधर की हांकने में माहिर होता है।<span id="more-4329"></span></p>
<p>      जिस क्षण तुम किसी दूसरे पर भरोसा करने लगते हो, तो अपनी व्‍यक्‍तिगत खोज बंद कर देते हो। और मैं नहीं चाहूंगा। कि तुम अपनी व्‍यक्‍तिगत खोज बंद करों। हजारों वर्ष से व्‍यक्‍ति को इसी तरह छला गया और उसका शोषण किया गया है। मैं इस पूरी रणनीति को समूल नष्‍ट कर देना चाहता हूं। केवल अपने अनुभव पर भरोसा रखो। मैं हां कहूं या न, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। अंतर इस बात से पड़ता है कि तुमने इसका अनुभव किया या नहीं। वहीं निर्णायक होगा। उससे तुम्‍हारे जीवन में निश्‍चय ही परिवर्तन आ जाएगा।</p>
<p>      तीन धर्म है—यहूदी, ईसाइयत, इसलाम, जिनका पूनर्जन्‍म के सिद्धांत पर नकारात्‍मक रूख रहा है। वे कहते है कि यह सच नहीं है। यह एक नकारात्‍मक विश्‍वास है। इन तीनों धर्मों के समानांतर—हिंदू, बौद्ध और जैन, तीन धर्म है जिनका सकारात्‍मक दृष्‍टिकोण है। वे कहते है, पुनर्जन्‍म एक वास्‍तविकता है। किंतु वह भी एक विश्‍वास है; एक सकारात्‍मक विश्‍वास।</p>
<p>      मेरी मान्‍यता तीसरी है, जिसे अभी आजमाया नहीं गया है। मैं कहता हूं, इस सिद्धांत को परिकल्‍पना मान कर स्‍वीकार करो, न तो हां कहो और न ना। परिकल्‍पना मान कर स्‍वीकार करने का अर्थ है: ‘’मैं इसके बारे में किसी सकारात्‍मक अथवा नकारात्‍मक पूर्वाग्रह के बिना इसी जांच-पड़ताल करने के लिए तैयार हूं। मैं इसकी सच्‍चाई जानने के लिए किसी पूर्व कल्‍पित विचार के बिना इसकी गहराई में जाऊँगा।</p>
<p>      धर्मों ने परिकल्‍पना शब्‍द का प्रयोग किया ही नहीं है। तुम या तो विश्‍वास करे या अविश्‍वास। अविश्‍वासी भी विश्‍वासी होता है। केवल नकारात्‍मक ढंग से। उनमें कोई गुणात्‍मक भिन्‍नता नहीं है। वे एक तरह के लोग है। जब तुम्‍हारा कोई नकारात्‍मक विश्‍वास या कोई सकारात्‍मक विश्‍वास होता है, तो तुम्‍हारे मन ने यह निर्णय कर लिया होता है कि सच्‍चाई क्‍या है। इसे मैं अप्रामाणिक, बेईमान कहता हूं। और तुम किसी वस्‍तु को नकारात्‍मक अथवा सकारात्‍मक दृष्‍टि से स्‍वीकार कर लेते हो। तो मन की यह क्षमता है कि वह उस तरह का भ्रम पैदा कर देता है।</p>
<p>      इसलाम में, ईसाइयों में, यहूदियों में तुम्‍हें ऐसे बच्‍चे नहीं मिलेंगे जिन्‍हें अपने पूर्वजन्‍म की याद हो। किंतु हिंदू, बौद्ध, और जैन धर्मों में लगभग प्रत्‍येक दिन कहीं ने कहीं किसी बच्‍चे को अपने पूर्व जन्‍मों की याद आती है। लोगों ने यह समझने का प्रयत्‍न किया है कह उसकी स्‍मृति में कोई तथ्‍य होता है या यह मात्र कल्‍पना होती है। और ऐसे बहुत से मामले मिले है जिनमे तथ्‍य इसका स्‍पष्‍ट रूप से समर्थन करते है।</p>
<p>      भारत में तो ऐसा हर दिन होता रहता है—एक स्‍थान में, दूसरे स्‍थान में, किसी ने किसी बच्‍चे को इसकी स्‍मृति होती है। और हिंदू, जैन और बौद्ध धर्म कोई भी इसकी जांच-पड़ताल नहीं करता। क्‍योंकि वे इस बात से भयभीत होते है कि उनका सिद्धांत गलत न सिद्ध हो जाये। मगर तुम किसी ईसाई देश में, यहूदी समुदाय में, किसी इस्‍लामिक भूमि में ऐसा नहीं कर सकते, क्‍योंकि उन्‍होंने इस बात को स्‍वीकार कर लिया है कि इस तरह की चीज पूर्ण रूप से असत्‍य है।</p>
<p>      जहां तक मेरा संबंध है, पुनर्जन्‍म एक सच्‍चाई है। यह मेरा अपना अनुभव है। किंतु जो मेरे लिए सत्‍य है, तुम्‍हारे लिए वह सिद्धांत हो जाता है। और मैं अपने सत्‍य को तुम्‍हारा सिद्धांत नहीं बनाना चाहता। इसीलिए मैंने कहा: ‘’मेरा सिद्धांतों में, विश्‍वासों से कुछ लेना-देना नहीं है। सत्‍य मेरा व्‍यवसाय है।‘’</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>फ्रॉम पर्सनैलिटी टु इंडीवीजुअलटी</strong></p>
<p><strong>प्रश्न</strong>&#8211;आप पुनर्जन्‍म की बात करते है। मुझे तो इसका अनुभव नहीं है और जिसका मुझे अनुभव नहीं होता है, ऐसी किसी वस्‍तु में मैं विश्‍वास नहीं करना चाहता। मुझे क्‍या करना चाहिए?</p>
<p><strong>ओशो</strong>—पुनर्जन्‍म में विश्‍वास करने के लिए तुम्‍हें कौन कह रहा है? और तुम इसके बारे में कुछ करने के लिए चिंतित क्‍यों हो? लगता है तुम्‍हारे भीतर कहीं पडा हुआ विश्‍वास है। यदि तुम पुनर्जन्‍म में विश्‍वास नहीं करते हो तो वही पूर्ण विराम है। कुछ करने की चिंता क्‍यों करते हो?</p>
<p>      पुनर्जन्‍म में विश्‍वास मत करो, बस यह जन्‍म जीओं, और तुम्‍हें अनुभव होगा कि पुनर्जन्‍म कोई सिद्धांत नहीं; यह एक सच्‍चाई है। क्‍या तुम इस जन्‍म में  विश्‍वास करते हो। या नहीं करते? पुनर्जन्‍म या तो अतीत में है अथवा भविष्‍य में, किंतु तुम यहां हो, जीवित, तुममें जीवन का स्‍पंदन हो रहा है।</p>
<p>      मैं जानता हूं कि पूनर्जन्‍म सत्‍य है। किंतु मैं यह नहीं कह रहा हूं कि तुम इसमें इसलिए विश्‍वास करो क्‍योंकि मैं ऐसा कह रहा हूं। किसी दूसरे के अनुभव पर कभी विश्‍वास न करो। यह एक बाधा है। मैं तुम से केवल यही कह सकता हूं कि बस, इसी जन्‍म को ही जीते रहो। उससे द्वार खुलेगा और तुम पीछे की और देखने में समर्थ हो सकोगे, तुम इसमें इसमे विश्‍वास करो या न करो। फिर ये तुम्‍हारे उपर निर्भर है। तब तुम इस पर विश्‍वास कर सकते हो। या नहीं कर सकते। इसे एक अनुभव बन जाने दो।</p>
<p>      सभी धर्म विश्‍वास पद्धतियों पर ही आधारित होते है। में तुम्‍हें खोज करने की, संदेह करने की पूर्ण स्‍वतंत्रता देता हूं क्‍योंकि तुम्‍हारे अनुभव-अनुभव लेने का यही एकमात्र तरीका है। स्‍वयं अनुभव लो। विश्‍वास करने का कोई महत्‍व नहीं है।</p>
<p>      तुम मुझे प्रेम करते हो। स्‍वाभाविक ही, यदि मैं कहता हूं कि पुनर्जन्‍म होता है। वह एक सत्‍य है। तुम्‍हारे प्रेम के कारण तुम मुझ पर विश्‍वास करोगे। तुम कैसे कल्‍पना कर सकते हो कि मैं तुमसे कुछ झूठ बोलूगा। तुम मुझ पर भरोसा करते हो&#8230;.ओर इसी भरोसे का लाखों वर्षों से शोषण हो रहा है। प्रत्‍येक धर्म द्वारा इस प्रेम का शोषण हो रहा है। मैं किसी तरह से शोषण तो नहीं करने जा रहा हूं, जो कुछ भी मुझे ज्ञात है इसके बारे में मैं अपना ह्रदय तुम्‍हारे सामने खोल सकता हूं, किंतु याद रखो, विश्‍वास के जाल में न गिरना। प्रेम अच्‍छा  है, भरोसा अच्‍छा है—किंतु विश्‍वास जहर है।</p>
<p>      मैं चाहता हूं कि तुम जानने वाले बनो। यदि तुम मुझे प्रेम करते हो और मुझ पर भरोसा करते हो, तब तो जांच-पड़ताल करते रहो, खोज-ढूंढ करते रहो। जब तक तुम्‍हें निष्‍कर्ष नहीं मिल जाता। कभी विश्‍वास न करना। मैं यह इतना निश्चय पूर्वक कह सकता हूं क्‍योंकि में जानता हूं कि यदि तुम जांच पड़ताल करोगे तो तुम्‍हें यह मिल जाएगा। यह वही है। मेरे एक भी शब्‍द पर विश्‍वास न किया जाए। किंतु अनुभव किया जाए। मैं तुम्‍हें इसका अनुभव लेने की विधि दे रहा हूं, अधिक ध्‍यानस्‍थ हो जाओ। पुनर्जन्म और परमात्‍मा, स्‍वर्ग-नरक से कोई अंतर नहीं पड़ता। जिससे अंतर पड़ता है, वह तुम्‍हारा सजग हो जाना है। ध्‍यान से तुम जाग्रत हो जाते हो। तुम्‍हें आंखे मिल जाती है। तब तो तुम जो कुछ भी देखते हो, तुम अस्‍वीकार नहीं कर सकते।</p>
<p>      जहां तक मेरा संबंध है, पुनर्जन्‍म एक सत्‍य है। क्‍योंकि आस्‍तित्‍व में कुछ भी मरता नहीं। चिकित्‍सक भी कहेंगे कि कुछ भी मरता नहीं है। तुम हिरोशिमा और नागासाकी को नष्‍ट कर सकते हो। विज्ञान ने चिंपाजी राजनीतिज्ञों को इतनी शक्‍ति दे दी है—किंतु तुम पानी की एक बूंद भी नष्‍ट नहीं कर सकते।</p>
<p>      तुम नष्‍ट नहीं कर सकते हो। चिकित्‍सक लोग इस असंभावना के प्रति सावधान हो गये है। तुम जो कुछ भी करते हो। केवल रूप परिवर्तित हो जाता है। तुम ओस की एक बूंद मिटा नहीं सकते। और वहां हाइड्रोजन व आक्‍सीजन है; वे इसके घटक है। तुम हाइड्रोजन व आक्‍सीजन को नष्‍ट नी कर सकते हो। यदि तुम प्रयत्‍न भी करते हो, तो तुम अणुओं से परमाणु तक आ जाते हो। यदि तुम परमाणु को नष्‍ट करते हो, तो तुम इलेक्ट्रॉन के पास आ जाते हो। हम अभी तक तो नहीं जानते कि हम इलेक्ट्रॉन को भी नष्‍ट कर सकते है। या तो तुम इसे नष्‍ट कर सकते &#8230;यह वास्‍तविकता का चरम वस्‍तुपरक घटक है। या यदि तुम इसे नष्‍ट कर सकते हो, तब तो तुम्‍हें कुछ और मिल जायेगा। किंतु इस वस्‍तुपरक जगत में कुछ भी नष्‍ट नहीं हो सकता।</p>
<p>      यही जीवन चेतना के, जीवन के जगत के बारे में सत्‍य है। वहां कोई मृत्‍यु नहीं है। मृत्‍यु  तो एक आकार से दूसरे आकार में एक परिवर्तन मात्र है। और अंतत: आकार एक प्रकार की कारा है। जब तक तुम आकारहीन नहीं हो जाते, तब तक तुम दुःख, ईर्ष्‍या, क्रोध, धृणा, लोभ, भय से मुक्‍त नहीं हो सकते। क्‍योंकि ये तुम्‍हारे आकार से संबंधित है। जब तुम आकार हीन हो जाते हो तब हानि पहुंचाने के लिए तुम्‍हारे पास कुछ नहीं होता। और अब खोने के लिए कुछ भी नहीं है तुम्‍हारे पास। ऐसा कुछ भी नहीं होता जो तुम्‍हारे पास बढ़ सके। तुम चरम अनुभूति तक पहूंच जाते हो। वहां कुछ भी नहीं है, मात्र एक होना है।</p>
<p>      अस्‍तित्‍व प्रत्‍येक स्‍तर पर जीवित होता है। कुछ भी मृत नहीं है। एक पत्‍थर भी&#8230;जिसे तुम पूर्ण रूप से मृत समझते हो। वह मृत नहीं है। तुम देख नहीं सकते, किंतु वे सब सजीव होते है। इलैक्ट्रा तुम्‍हारी तरह ही सजीव होते है। संपूर्ण अस्‍तित्‍व जीवन का ही पर्याय होता है। वस्‍तुएं एक आकार से दूसरे आकार में तब तक परिवर्तित होती रहती है जब तक वे पर्याप्‍त रूप से परिपक्‍व नहीं हो जाती। जिससे उन्‍हें पुन: स्‍कूल जाने की आवश्‍यकता नहीं होती। तब वे आकारहीन जीवन की और चलती है; तब वे स्‍वयं महासागर में एकाकार हो जाती है।</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>फ्रॉम पर्सनैलिटी टू इंडीवीजुअलटी</p>
<p>पिछले जन्‍मों का क्‍या महत्‍व होता है, उसकी क्‍या उपयोगिता है?</p>
<p>क्‍या उन्‍हें याद करना लाभ दायी होगा?</strong></p>
<p><strong>ओशो—</strong>इस जन्‍म का भी तो कोई महत्‍व नहीं है; और वे बीते हुए जन्‍म भी एक ही चीज की बार-बार पुनरावृति के आलावा और कुछ नहीं था। उनका क्‍या महत्‍व हो सकता है। इस जीवन के स्‍वप्‍न को देख लो, तो तुमने वे सारे स्‍वप्‍न देख लिए जिन्‍हें तुमने पहले जीया है। स्‍वप्‍नों का कोई महत्‍व नहीं होता।</p>
<p>      पाश्‍चात्‍य मनोविश्‍लेषण का बड़ा आग्रह है कि स्‍वप्‍नों का महत्‍व होता है। पूरब के देशों में, हम कहते है कि स्‍वप्‍नों को कोई महत्‍व नहीं होता। केवल स्‍वप्‍न द्रष्‍टा महत्‍वपूर्ण है। स्‍वप्‍न विषय है, उन्‍हें देखने वाला तुम्‍हारी आत्म परकता है। स्‍वप्‍न परिवर्तित होते रहे है। स्‍वप्‍न द्रष्‍टा वहीं रहता है। विज्ञान परिवर्तित होता रहता है। किंतु दृष्‍टा वहीं रहता है। दृष्‍टा का महत्‍व है। यही पर पाश्‍चात्‍य मनोविज्ञान और पूर्वीय मनोविज्ञान में भेद। पूरब के रहस्‍यवादी के लिए वे सारे खोल जो मनोविश्‍लेषण, उनकी शाखाएं वे उनके संस्‍थापक खेलते है, मात्र पहेली है। मनोविश्‍लेषण एक सुंदर खेल है। तुम खेलते रह सकते हो, मगर तुम पूर्ण रूप से वही रहते हो।</p>
<p>      वास्‍तविक चीज तो परिवर्तन है, चेतना को स्‍वप्‍न से हटा कर स्‍वप्‍न द्रष्‍टा में ले जाना है। पूरे गेस्‍टाल्‍ट का परिवर्तन—वस्‍तु की और नहीं देखना बल्‍कि देखने वाले को देखना है। तब फिर सब कुछ सपना हो जाता है।</p>
<p>      पुनर्जन्‍म, जन्‍म, और मृत्‍यु, अच्‍छा और बुरा। तुम सम्राट हो या भिखारी, तुम हत्‍यारे हो या महात्‍मा—सब कुछ सपना है।</p>
<p>      लेकिन एक बात तय है कि सपने के लिए साक्षी की जरूरत नहीं है। साक्षित्‍व सत्‍य है। उस साक्षित्‍व को जान लेना अपने बुद्ध स्‍वभाव को जान लेना है</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>टेक इट ईजी </strong>   </p>
<br />Filed under: <a href='http://oshosatsang.org/category/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b6%e0%a4%a8-%e0%a4%9a%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9a%e0%a4%be/'>प्रशन चर्चा</a> Tagged: <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/'>ओशो</a>, <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6/'>स्‍वामी आनंद प्रसाद</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/oshosatsang.wordpress.com/4329/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/oshosatsang.wordpress.com/4329/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/oshosatsang.wordpress.com/4329/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/oshosatsang.wordpress.com/4329/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/oshosatsang.wordpress.com/4329/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/oshosatsang.wordpress.com/4329/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/oshosatsang.wordpress.com/4329/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/oshosatsang.wordpress.com/4329/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/oshosatsang.wordpress.com/4329/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/oshosatsang.wordpress.com/4329/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/oshosatsang.wordpress.com/4329/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/oshosatsang.wordpress.com/4329/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/oshosatsang.wordpress.com/4329/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/oshosatsang.wordpress.com/4329/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4329&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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		<title>धर्म के नाम पर इतना गोरख धंधा क्‍यों? ( ओशो)</title>
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		<pubDate>Sat, 28 Jan 2012 05:51:39 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[प्रशन चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

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		<description><![CDATA[धर्मों के कारण ही। धर्मों का विवाद इतना है, धर्मों की एक दूसरे के साथ इतनी छीना-झपटी है। धर्मों का एक दूसरे के प्रति विद्वेष इतना है कि धर्म-धर्म ही नहीं रहे। उन पर श्रद्धा सिर्फ वे ही कर सकते &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/01/28/%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%87%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%97%e0%a5%8b%e0%a4%b0%e0%a4%96-%e0%a4%a7%e0%a4%82/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4325&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>धर्मों के कारण ही। धर्मों का विवाद इतना है, धर्मों की एक दूसरे के साथ इतनी छीना-झपटी है। धर्मों का एक दूसरे के प्रति विद्वेष इतना है कि धर्म-धर्म ही नहीं रहे। उन पर श्रद्धा सिर्फ वे ही कर सकते है जिनमें बुद्धि नाममात्र को नहीं है। अस सिर्फ मूढ़ ही पाए जाते है मंदिरों में, मसजिदों में। जिसमें थोड़ा भी सोच विचार है, वहां से कभी का विदा <div id="attachment_4326" class="wp-caption alignright" style="width: 206px"><a href="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/01/scan0033.jpg"><img src="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/01/scan0033.jpg?w=196&#038;h=300" alt="धर्म के नाम पर गोरख धंधा--ओशो" title="ओशो तिर्थि--1995" width="196" height="300" class="size-medium wp-image-4326" /></a><p class="wp-caption-text">धर्म के नाम पर गोरख धंधा--ओशो</p></div>हो चुका है। क्‍योंकि जिसमें थोड़ा-सोचविचार है, उसे दिखाई पड़ेगा कि धर्म ने नाम से जो चल रहा है वह धर्म नहीं, राजनीति है। कुछ और है।<span id="more-4325"></span></p>
<p>      जीसस चले जब जमीन पर तो धर्म चला; पोप जब चलते है तो धर्म नहीं चलता, कुछ और चलता है। बुद्ध जब चले तो धर्म चला; अब पंडित है, पुजारी है, पुरोहित है, वे चलते है। उनके चलने में वह प्रसाद नहीं। उनकी वाणी में अनुभव की गंध नहीं। उनके व्‍यक्‍तित्‍व में वह कमल नहीं खिला जो प्रतीक है धर्म का उनके ह्रदय बंद है और उतनी ही कालिख से भरे है जितने किसी और के शायद थोड़े ज्‍यादा ही।</p>
<p>      धर्म के नाम पर वैमनस्‍य है, ईप्सा है, हिंसा है। खून ख़राबा है। मस्‍जिद और मंदिर ने इतना लड़वाया है कि कोई भरोसा भी करना चाहे तो कैसे करे। और शास्‍त्र आज नहीं कल झूठे हो जाते है। सत्‍य तो शास्‍ता है, शास्‍त्रों में नहीं। सत्‍य तो बुद्ध है। धम्म पद में नहीं; मोहम्‍मद में है, कुरान में नहीं। यद्यपि कुरान मोहम्‍मद से पैदा हुई है। तो जब तक कुरान मोहम्‍मद के होंठों पर थी, तब तक उसमें मोहम्‍मद की श्‍वास थी। मोहम्‍मद की प्राण उर्जा थी। प्रतिफलित होती थी। जैसे ही शब्‍द मोहम्‍मद के होठो से हटे, मुर्दा हो गये। स्‍त्रोत से टूटे, कुछ के कुछ हो गये। फिर तुम्‍हारे हाथ में पड़े, तुमने उन्‍हें वह अर्थ दिया जो तुम दे सकते हो। तुम वह अर्थ तो कैसे दोगे जो मोहम्‍मद देना चाहते थे। मोहम्‍मद हुए बिना वह अर्थ नहीं दिया जा सकता। वह अर्थ मोहम्‍मद के होने में है। तुमने अपने अर्थ दिए। तुम्‍हारे अर्थ किसी प्रयोजन के नहीं। लाभ तो नहीं हो सकता, हानि सुनिश्चत होगी।</p>
<p>      अनातोले फ्रांस का प्रसिद्ध वचन है कि कोई बंदर अगर दर्पण में झांकेगा तो बंदर ही नजर आयेगा।</p>
<p>      दर्पण में वही दिखाई पड़ता है, जो तुम हो। शास्त्रों में भी वहीं दिखाई पड़ता है जो तुम हो। जिसके हाथ ते शास्‍त्र पडा उसका ही हो गया। मोहम्‍मद के हाथ में जब तक था, तब तक कुरान थी; तुम्‍हारे हाथ में जब तक आया कुछ का कुछ हो गया। और फिर तुम्‍हारे हाथ से भी चलती रही, हजारों साल बीत गये, एक हाथ से दूसरे हाथ में बदलते हुए। किताबें गंदी हो गई है। तुम्‍हारे हाथ की मैल उन पर जम गई है। कौन उन्‍हें झाड़े और साफ करे। वही तुम्‍हारा सबसे बड़ा दुश्मन।</p>
<p>      ध्‍यान रहे, इस जगत में प्रत्‍येक चीज का जन्‍म होता है और प्रत्‍येक चीज की मृत्‍यु होती है। धर्म तो शाश्‍वत है। लेकिन कौन सा धर्म? वह धर्म जो जीवन को धारण किए है। वह शाश्‍वत है। लेकिन बुद्ध ने जब कहा, कहा शाश्‍वत को ही, लेकिन जब विचार में बांधा तो शाश्‍वत समय में उतरा। और समय के भीतर कोई भी चीज शाश्‍वत नहीं हो सकती। समय के भीतर तो पैदा हुई है, मरेगी। जन्‍मदिन होगा, मृत्‍यु दिन भी आयेगा। जब कोई सत्‍य शब्‍द में रूपायित होता है तो सबसे पहले लोग उसका विरोध करते है। क्‍यों? क्‍योंकि उनकी पुरानी मानी हुई किताबों के खिलाफ पड़ता है। खिलाफ न पड़े तो कम से कम भिन्‍न तो पड़ता है। लोग विरोध करते है।</p>
<p>      सत्‍य का पहला स्‍वागत विरोध से होता है—पत्‍थरों से, गलियों से। सत्‍य पहले विद्रोह की तरह मालूम होता है। खतरनाक मालूम होता है। बहुत सूलियां चढ़नी पड़ती है सत्‍य को, तब कहीं स्‍वीकार होता है। लेकिन वे सूलियां चढ़ने में ही समय बीत जाता है और सत्‍य जो संदेश लाया थ वह धूमिल हो चुका होता है। जब तक तुम सत्‍य को स्‍वीकार करते हो, तब तक वह सत्‍य ही नहीं रह जाता। इतनी देर लगा देते हो स्‍वीकार करने में; लड़ने-झगड़ने में, विवाद में इतना समय गंवा देते हो कि तब तक सत्‍य पर बहुत धूल जम जाती है। धूल जाती है तब तुम स्‍वीकार करते हो। क्‍योंकि तब सत्‍य तुम्‍हारे शास्‍त्र जैसा मालूम होने लगाता है। तुम्‍हारे शास्‍त्र पर भी धूल जमी है बहुत।</p>
<p>      जब समय की धूल जम जाती है शास्‍त्रों पर, तो वह परंपरा बन जाता है। जब शास्‍त्र सत्‍य को जन्माता नहीं। सत्‍य की कब्र बन जाता है। तब तुम स्‍वीकार करते हो—इसीलिए तुम स्‍वीकार करते हो। कब्रें-कब्रें सब एक जैसी होती है। क़ब्रों में तो सिर्फ नाम का ही फर्क होता है। जिंदा आदमियों में फर्क होता है। कब्र किस की है, पत्‍थर पर लिखा होता है। बस इतना ही फर्क होता है। और तो कोई फर्क नहीं होता। धम्म पद जब कब्र बन जाता है तो गीता की कब्र और कुरान की कब्र और वेद उपनिषद या बाइबल की कब्र में कुछ फर्क नहीं रह जाता है। तब तुम स्‍वागत करते हो। तुम पुराने का स्‍वागत करते हो।</p>
<p>      सत्‍य जब नया होता है तब सत्‍य होता है। जितना नया होता है उतना ही सत्‍य होता है। क्‍योंकि उतना ही ताजा-ताजा परमात्‍मा से आया होता है। जैसे गंगा गंगोत्री में जैसी स्‍वच्‍छ है, फिर वैसी काशी में थोड़ी ही होगी। हालांकि तुम काशी जाते हो पूजने। काशी तक तो बहुत गंदी हो चुकी, बहुत नदी नाले गीर चूके, बहुत अर्थ मिश्रित हो चूका, न जाने कितने मुर्दे बहाये जा चूके। काशी तक आते-आते तो गंगा अपवित्र हो गई। कितनी ही पवित्र रही हो गंगोत्री में। जैसे वर्षा होती है, तो जब तक पानी की बूंद न जमीन नहीं छुई, तब तक वह परम शुद्ध होती है; जैसे ही जमीन छुई, कीचड़ हो गई। कीचड़ के साथ एक हो गई।</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>अथातो भक्‍ति जिज्ञासा, भाग—1</strong></p>
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		<title>उमर ख्‍याम की रूबाइयां—ओशो की प्रिय पुस्‍तकें</title>
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		<pubDate>Sat, 28 Jan 2012 00:53:01 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[ओशो की प्रिय पूस्‍तके--]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

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		<description><![CDATA[उमर ख्‍याम सुंदरी, शराबी, इश्‍क के बारे में लिखता है। उसे पढ़कर लगता है, यह आदमी बड़े से बड़ा सुखवादी होगा। उसकी कविता का सौंदर्य अद्वितीय है। लेकिन वह आदमी ब्रह्मचारी था। उसने कभी शादी नहीं की, उसका कभी किसी &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/01/28/%e0%a4%89%e0%a4%ae%e0%a4%b0-%e0%a4%96%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%82-%e0%a4%93/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4319&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>उमर ख्‍याम  सुंदरी, शराबी, इश्‍क के बारे में लिखता है। उसे पढ़कर लगता है, यह आदमी बड़े से बड़ा सुखवादी होगा। उसकी कविता का सौंदर्य अद्वितीय है। लेकिन वह आदमी ब्रह्मचारी था। उसने कभी शादी नहीं की, उसका कभी किसी से प्रेम नहीं हुआ। वह कवि भी नहीं था। गणितज्ञ था। वह सूफी था। जब वह सौंदर्य के संबंध में लिखता तो ऐसा लगता कि वह स्त्री के सौंदर्य के बारे में लिख रहा है। नहीं, वह परमात्‍मा के सौंदर्य का बखान कर रहा है।<span id="more-4319"></span></p>
<p>      &#8230;..पर्शियन भाषा में उसकी किताबों में चित्र बनाये हुए है और अल्‍लाह को साकी के रूप में चित्रित किया गया है—एक सुंदर स्‍त्री हाथ में सुराही लेकिर शराब ढाल रही है। सूफी शराब को प्रतीक की तरह इस्‍तेमाल करते है। जो इंसान अल्‍लाह से इश्‍क करता है उसे अल्‍लाह एक तरह की मस्‍ती देता है जो उसे बेहोश नहीं करती बल्‍कि होश में लाती है। एक मदहोशी जो उसे नींद से जगाती है।</p>
<p>      फिट्जरल्‍ड को इन प्रतीकों की कोई जानकारी नहीं थी। वह सीधा सरल पार्थिव कवि था। और वस्‍तुत: उमर ख्‍याम से बेहतर कवि था। जब उसने अनुवाद किया तो उसने यही समझा कि स्‍त्री यानी स्‍त्री, शराब यानी शराब। प्रेम यानी प्रेम। उसके लिए प्रतीक नहीं थे। फिट्जरल्‍ड ने अपनी गलतफहमी के द्वारा उमर ख्‍याम को विश्‍व विख्‍यात कर दिया। अगर तुम उमर ख्‍याम को समझने की कोशिश करोगे तो दोनों में इतना अंतर दिखाई देगा कि तुम हैरान होओगे कि फिट्जरल्‍ड ने उमर ख्‍याम के गणितिक मस्‍तिष्‍क से इतनी सुंदर कविता कैसे निर्मित की।</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>फ्रॉम मिज़री टू इनलाइटमेंट</strong></p>
<p><strong>किताब की झलक&#8211;</strong></p>
<p>     जागों मित्र, भरों प्‍याला, लो वह देखो प्राची की और</p>
<p>      राज अटारी पर चढ़ता रवि फेंक अरूण किरणों की डोर</p>
<p>      नभ के प्‍याले में दिन मणि को माणिक-सुधा ढालते देख</p>
<p>      कलियां अधर पुटों को खोले ललक रही आनंद-विभोर।</p>
<p>     पौ फटते ही मधुशाला में, गुंजा शब्‍द निराला एक,</p>
<p>      मधुशाला से हंस कर यों कहता था, मतवाला एक&#8211;</p>
<p>      स्‍वांग बहुत है रात रही पर थोड़ी, ढालों-ढालों शीध्र</p>
<p>      जीवन ढल जाने के पहिले ढालों मधु का प्‍याला एक।</p>
<p>      और कान में भनक पड़ी जब ऊधा मैं पीर कर दो चार</p>
<p>      कोई कहता था पुकार कर, ‘’मधुशाला का खोलों द्वार</p>
<p>      केवल चार घड़ी रहना है हम को, क्‍यों करते हो देर?</p>
<p>      एक बार के गये हुए न लौटेंगे न दूजी बार।</p>
<p>      लो फिर आई है वसंत ऋतु, हरी हुई फिर मन की आस</p>
<p>      व्‍यथित ह्रदय कहता है चल कर करें कही एकांत-निवास</p>
<p>      जहां लता-तरुणों के पत्‍ते हिलते ज्‍यों मूसा का हाथ</p>
<p>      और सुगंध सुमन-माला की उठती ज्‍यों ईसा की श्‍वास।</p>
<p>      देखो आज खिले है सुख के लाखों मधु-कलियों के गात&#8211;</p>
<p>      किंतु कहो तो कल इन में से कितने फेर खिलेंगे ताता,</p>
<p>      बूंद-बूंद टपका जाता हो, जीवन का मधु रस ख्याम,</p>
<p>      एक-एक कर झड़ते जा रहे पक-पक कर जीवन पात।</p>
<p>      कैकोवाद, कैखुसरो, दारा, रूस्तम और सिकंदर वीर&#8211;</p>
<p>      क्‍या जानें अब कहां छिपे वे बड़े-बड़े योद्धा रणधीर,</p>
<p>      किंतु आज भी विमल वारुण में जगती मणिक की ज्‍योति</p>
<p>      और चित को चंचल करता अब भी वन का स्‍निग्‍ध समीर</p>
<p>      अब भी, झुकी लदी गुच्‍छों से, अंगूरों की डाली देख&#8211;</p>
<p>      फूली, छकी, ओस की धोई नव गुलाब की प्‍याली देख</p>
<p>      भूली, अमी-अधखिली कलियों की चितवन की लाली देख</p>
<p>      पीओ-पीओ कहती फिरती है बुलबुल मतवाली देख।</p>
<p>      ला, ला, साकी। और-और ला; फिर प्‍याले पर प्‍याला ढाल,</p>
<p>      घर रख, गूढ-ज्ञान गाथा को, व्रत-विवेक चूल्हे में डाल।</p>
<p>      सिखला रहा ‘’त्‍याग’’ की पट्टी—कैसा ज्ञानी है तू मित्र।</p>
<p>      नहीं सूझता क्‍या तुझको वह यौवन यह मधु, यह मधुकाल?</p>
<p>      यों तो मैं भी नित्‍य सोचता हूं अब खाऊंगा सौगंध—</p>
<p>      इस प्‍याले का मोह तजूंगा, पानी कर दूँगा अब बंद।</p>
<p>      किंतु आज तो प्रकृति-प्रिया है आई सज फूलों का साज</p>
<p>      आज वसंतोत्‍सव है प्रियतम, आज न पीऊँ तो सौगंध।</p>
<p>      आज वसंतोत्‍सव है प्रियतम फूलों में फूटा रसराज</p>
<p>      मन की कसर निकालूंगा सब, तज कर लोक-लीक की लाज&#8211;</p>
<p>      पहिला प्‍याला पी, कर दूँगा बांझ बुद्धि बुढ़ियाँ का त्‍याग</p>
<p>      चढ़ा दूसरा, वरण करूंगा, वरूण नन्‍दिनी को फिर आज।</p>
<p>      कोई स्‍वर्ग लोक से सुख को कहता है अतोल, अनमोल,</p>
<p>      कोई राजपाट के ऊपर करता है मन डांवाडोल,</p>
<p>      गांठ बाँध ले मूर्ख नकद ने नौ, तेरह उधर के छोड़&#8211;</p>
<p>      यों तो लगते है, सुहावनें सब को सदा देर के ढोल।</p>
<p>      गांठ-बाँध लें मूर्ख नकद के, फिर की आशा पर मल भूल,</p>
<p>      सुन तो सही कह रहा है क्‍या हंस-हंस कर गुलाब का फूल&#8211;     </p>
<p>      जो सु-वर्ण लाता हूं जग में चलने से पहिले ही, मित्र।</p>
<p>      उपवन में बिखेर जाता हूं, रत्‍ती-रत्‍ती झाड़ दुकूल।</p>
<p>      हाँ, मिट्टी में मिल जाती है आशा सभी हमारी, तात।</p>
<p>      कभी खिली भी तो बस जैसे दो दिन की उँजियारी रात।</p>
<p>      हीरा-मोती लाल, धरा-धन-धाम-संपदा जितनी, हाय।</p>
<p>      क्षणिक मरुस्थल के तुषार सी उड़ जाती है सारी तात।</p>
<p>      और, मरुस्थल यह जीवन है, लेना सतर्कता से काम,</p>
<p>      काल-क़जाक़ प्राण हरने की घात लगाता आठों याम।</p>
<p>      सूख का प्‍यासा मृग-अबोध-मन, रखना इसको खूब संभाल</p>
<p>      स्‍वर्ग-नरक की मृग-तृष्‍णा में बहक न कही जाए ख्याम।</p>
<p><strong>ओशो का नजरिया&#8211;</strong></p>
<p>      उमर ख्‍याम, महान पर्शियन कवि था। उसने अपनी रूबाइयात में लिखा है&#8230;..रूबाइयात याने जैसे—जैसे में हाइकु होते है वैसे सूफियों में रूबाइयात होते है। एक रुबाई में वह कहता है:</p>
<p>      गुनाह क्‍या न किए, क्‍या खुदा रही न था,</p>
<p>      फिट्जरल्‍ड ने इसका अंग्रेजी में अनुवाद कर उसे विश्‍व विख्‍यात कर दिया।</p>
<p><strong>ओशो</strong></p>
<p>      मैं ‘’रूबाइयात’’ को भूल गया। मेरी आँख में आंसू आ रहे है। मैं और कुछ भी भूल जाऊं तो माफी मांग सकता हूं, लेकिन ‘’रूबाइयात’’ के विषय में नहीं। उस के विषय में मैं केवल आंसू बहा सकता हूं। आंसुओं के द्वारा क्षमा मांग सकता हूं। शब्‍द काफी नहीं होंगे। ‘’रूबाइयात’’ ऐसी किताब है जो संसार में सबसे अधिक पढ़ी गई। और सबसे कम समझी गई। उसका अनुवाद समझा गया है लेकिन उसकी आत्‍मा बिलकुल नहीं समझी गई। अनुवादक अपने शब्‍दों में आत्‍मा को नहीं उड़ेल सकता। ‘रूबाइयात’’ प्रतीकात्‍मक है, और अनुवादक सीधा-सादा अंग्रेज था—अमेरिका में उसे ‘’स्कवेअर’’ कहेंगे; कोई गोलाई नहीं। ‘’रूबाइयात’’ को समझने के लिए तुममें थोड़ी गोलाई चाहिए।</p>
<p>      ‘’रूबाइयात’’ सिर्फ मदिरा और महिषाक्षी के बारे में बातें करती है। और कुछ नहीं। बस शराब और सुंदरियों के गीत गाता रहता है। उसके अनुसार जो कि अनेक अनुवादक, जो कि अनेक है, सभी गलत है। ऐसा होना ही था क्‍योंकि उमर ख्‍याम सूफी था। तसव्वुफ़ का आदमी था—जो जानता है। सूफी अल्‍लाह को इसी तरह बुलाते है। महबूब&#8230;.ओ मेरे महबूब&#8230;.ओर वे अल्‍लाह के लिए स्त्रीलिंग वाचक शब्‍दों का उपयोग करते है। विश्‍व में और किसी ने, मनुष्‍य जाति और चेतना के पूरे इतिहास में, परमात्‍मा को स्‍त्री  की तरह संबोधित नहीं किया है। सिर्फ सूफी ही परमात्‍मा को महबूब कहते है।</p>
<p>      और शराब वह है जो आशिक माशूका के बीच घटती है, उसका अंगूरों से कोई लेना देना नहीं है। प्रेमी और प्रेमिका के बीच, शिष्‍य और गुरु के बीच, भक्‍त और भगवान के बीच जो रसायन, जो अल्‍केमी घटती है, जो रूपांतरण होता है। वह शराब है। ‘’रूबाइयात’’ को इतना गलत समझा गया है&#8230;.शायद इसीलिए मैं उसे भूल गया।</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>बुक्‍स आई हैव लव्‍ड </strong></p>
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