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	<title>Osho Satsang.org/ओशो सत्‍संग</title>
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	<description>यदि मैं शरीर छोड़ भी दू तो भी मैं अपने संन्‍यायों को छोड़ने वाला नहीं हूं।--ओशो</description>
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		<title>Osho Satsang.org/ओशो सत्‍संग</title>
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		<title>तंत्र-सूत्र—विधि-08</title>
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		<pubDate>Fri, 25 May 2012 01:15:27 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[विज्ञान भैरव तंत्र--भाग-1]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

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		<description><![CDATA[आठवीं श्‍वास विधि: आत्‍यंतिक भक्‍ति पूर्वक श्‍वास के दो संधि-स्‍थलों पर केंद्रित होकर ज्ञाता को जान लो। इन विधियों के बीच जरा-जरा से है, तो भी तुम्‍हारे लिए वे भेद बहुत हो सकते है। एक अकेला शब्‍द बहुत फर्क पैदा &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/05/25/%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a5%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a7%e0%a4%bf-08/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&#038;blog=12293864&#038;post=4597&#038;subd=oshosatsang&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>आठवीं श्‍वास विधि:</p>
<p>आत्‍यंतिक भक्‍ति पूर्वक श्‍वास के दो संधि-स्‍थलों पर केंद्रित होकर ज्ञाता को जान लो।</strong><div id="attachment_4598" class="wp-caption alignright" style="width: 291px"><a href="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/05/lord-shiva-photo.jpg"><img src="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/05/lord-shiva-photo.jpg?w=281&h=300" alt="Lord Shiva  तंत्र-सूत्र--ओशो" title="Lord Shiva  तंत्र-सूत्र--ओशो" width="281" height="300" class="size-medium wp-image-4598" /></a><p class="wp-caption-text">Lord Shiva  तंत्र-सूत्र&#8211;ओशो</p></div></p>
<p>     इन विधियों के बीच जरा-जरा से है, तो भी तुम्‍हारे लिए वे भेद बहुत हो सकते है। एक अकेला शब्‍द बहुत फर्क पैदा करता है।</p>
<p>     <strong> ‘’आत्‍यंतिक भक्‍ति पूर्वक श्‍वास के दो संधि-स्‍थलों पर केंद्रित होकर&#8230;..।‘’</strong></p>
<p>      भीतर आने वाली श्‍वास को एक संधि स्‍थल है। जहां वह मुड़ती है। इन दो संधि-स्‍थलों—जिसकी चर्चा हम कर चुके है—के साथ यहां जरा सा भेद किया गया है। हालांकि यह भेद विधि में तो जरा सा ही है, लेकिन साधक के लिए बड़ा भेद हो सकता है। केवल एक शर्त जोड़ दी गई है—‘’आत्‍यंतिक भक्‍ति पूर्वक’’, और पूरी विधि बदल गयी।</p>
<p>      इसके प्रथम रूप में भक्‍ति का सवाल नहीं था। वह मात्र वैज्ञानिक विधि थी। तुम प्रयोग करो और वह काम करेगी। लेकिन लोग है जो ऐसी शुष्‍क वैज्ञानिक विधियों पर काम नहीं करेंगे। इसलिए जो ह्रदय की और झुके है। जो भक्‍ति  के जगत के है, उनके लिए जरा सा भेद किया गया है: आत्‍यंतिक भक्‍ति पूर्वक श्‍वास के दो संधि-स्‍थलों पर केंद्रित होकर ज्ञाता को जान लो।‘’</p>
<p>      अगर तुम वैज्ञानिक रुझान के नहीं हो, अगर तुम्‍हारा मन वैज्ञानिक नहीं है, तो तुम इस विधि को प्रयोग में लाओ।</p>
<p>      आत्‍यंतिक भक्‍ति पूर्वक—प्रेम श्रद्धा के साथ—श्‍वास के दो संधि स्‍थलों पर केंद्रित होकर ज्ञाता को जान लो।‘’</p>
<p>      यह कैसे संभव होगा।</p>
<p>      भक्‍ति तो किसी के प्रति होती है। चाहे वे कृष्‍ण हों या क्राइस्‍ट। लेकिन तुम्‍हारे स्‍वयं के प्रति, श्‍वास के दो संधि-स्‍थलों के प्रति भक्‍ति कैसी होगी। यह तत्‍व तो गैर भक्‍ति वाला है।  लेकिन व्‍यक्‍ति-व्‍यक्‍ति पर निर्भर है।</p>
<p>      तंत्र का कहना है कि शरीर मंदिर है। तुम्‍हारा शरीर परमात्‍मा का मंदिर है, उसका निवास स्‍थान है। इसलिए इसे मात्र अपना शरीर या एक वस्‍तु न मानो। यह पवित्र है, धार्मिक है। जब तुम एक श्‍वास भीतर ले रहे हो तब तुम ही श्‍वास नहीं ले रहे हो, तुम्‍हारे भीतर परमात्‍मा भी श्‍वास ले रहा है। तुम चलते फिरते हो—इसे इस तरह देखो—तुम नहीं, स्‍वयं परमात्‍मा तुममें चल रहा है। तब सब चीजें पूरी तरह भक्‍ति हो जाती है।</p>
<p>      अनेक संतों के बारे में कहा जाता है कि वे अपने शरीर को प्रेम करते थे, वे उसके साथ ऐसा व्‍यवहार करते थे। मानो वे शरीर उनकी प्रेमिकाओं के रहे हों।</p>
<p>      तुम भी अपने शरीर को यह व्‍यवहार दे सकते हो। उसके साथ यंत्रवत व्‍यवहार भी कर सकते हो। वह भी एक रूझान है, एक दृष्‍टि है। तुम इसे अपराधपूर्ण पाप भरा और गंदा भी मान सकते हो। और इसे चमत्‍कार भी समझ सकते हो, परमात्‍मा का घर भी समझ सकते है, यह तुम पर निर्भर है।</p>
<p>      यदि तुम अपने शरीर को मंदिर मान सको तो यह विधि तुम्‍हारे काम आ सकती है, ‘’आत्‍यंतिक भक्‍ति पूर्वक&#8230;.।‘’ इसका प्रयोग करो। जब तुम भोजन कर रहे हो तब इसका प्रयोग करो। यह न सोचो कि तुम भोजन कर रहे हो, सोचो कि परमात्‍मा तुममें भोजन कर रहा है। और तब परिवर्तन को देखो। तुम वही चीज खा रहे हो। लेकिन तुरंत सब कुछ बदल जाता है। अब तुम परमात्‍मा को भोजन दे रहे हो। तुम स्‍नान कर रहे हो। कितना मामूली सा काम है। लेकिन दृष्‍टि बदल दो, अनुभव करो कि तुम अपने में परमात्‍मा को स्‍नान करा रहे हो, तब यह विधि आसान होगी।</p>
<p>      ‘’आत्‍यंतिक भक्‍ति पूर्वक श्‍वास के दो संधि स्‍थलों पर केंद्रित होकर ज्ञाता को जान लो।</p>
<p> <strong>ओशो</p>
<p>विज्ञान भैरव तंत्र</p>
<p>(तंत्र-सूत्र—भाग-1)</p>
<p>प्रवचन-5</strong></p>
<br />Filed under: <a href='http://oshosatsang.org/category/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%ad%e0%a5%88%e0%a4%b0%e0%a4%b5-%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%97-1/'>विज्ञान भैरव तंत्र--भाग-1</a> Tagged: <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/'>ओशो</a>, <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6/'>स्‍वामी आनंद प्रसाद</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/oshosatsang.wordpress.com/4597/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/oshosatsang.wordpress.com/4597/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/oshosatsang.wordpress.com/4597/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/oshosatsang.wordpress.com/4597/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/oshosatsang.wordpress.com/4597/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/oshosatsang.wordpress.com/4597/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/oshosatsang.wordpress.com/4597/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/oshosatsang.wordpress.com/4597/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/oshosatsang.wordpress.com/4597/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/oshosatsang.wordpress.com/4597/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/oshosatsang.wordpress.com/4597/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/oshosatsang.wordpress.com/4597/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/oshosatsang.wordpress.com/4597/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/oshosatsang.wordpress.com/4597/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&#038;blog=12293864&#038;post=4597&#038;subd=oshosatsang&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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		<title>तंत्र-सूत्र—विधि-07</title>
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		<pubDate>Wed, 23 May 2012 01:40:17 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[विज्ञान भैरव तंत्र--भाग-1]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[मनसा]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

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		<description><![CDATA[सातवीं श्‍वास विधि: ललाट के मध्‍य में सूक्ष्‍म श्‍वास (प्राण) को टिकाओ। जब वह सोने के क्षण में ह्रदय तक पहुंचेगा तब स्‍वप्‍न और स्‍वयं मृत्‍यु पर अधिकार हो जाएगा। तुम अधिकारिक गहरी पर्तों में प्रवेश कर रहे हो। ‘’ललाट &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/05/23/%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a5%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a7%e0%a4%bf-07/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&#038;blog=12293864&#038;post=4594&#038;subd=oshosatsang&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>सातवीं श्‍वास विधि:<div id="attachment_4595" class="wp-caption alignright" style="width: 310px"><a href="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/05/shira48.jpg"><img src="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/05/shira48.jpg?w=300&h=235" alt="shira तंत्र-सूत्र—विधि-07 --ओशो" title="shira तंत्र-सूत्र—विधि-07 --ओशो" width="300" height="235" class="size-medium wp-image-4595" /></a><p class="wp-caption-text">shira तंत्र-सूत्र—विधि-07 &#8211;ओशो</p></div></p>
<p>     ललाट के मध्‍य में सूक्ष्‍म श्‍वास (प्राण) को टिकाओ। जब वह सोने के क्षण में ह्रदय तक पहुंचेगा तब स्‍वप्‍न और स्‍वयं मृत्‍यु पर अधिकार हो जाएगा।</strong></p>
<p>     तुम अधिकारिक गहरी पर्तों में प्रवेश कर रहे हो।</p>
<p>      ‘’ललाट के मध्‍य में सूक्ष्‍म श्‍वास (प्राण) को टिकाओ।‘’</p>
<p>      अगर तुम तीसरी आँख को जान गए हो तो तुम ललाट के मध्‍य में स्‍थिर सूक्ष्‍म श्‍वास को, अदृश्‍य प्राण को जान गए, और तुम यह भी जान गए कि वह उर्जा, वह प्रकाश बरसता है।</p>
<p>      ‘’जब वह सोन के क्षण में ह्रदय तक पहुंचेगा—जब वह वर्षा तुम्‍हारे ह्रदय तक पहुँचेगी—‘’तब स्‍वप्‍न और स्‍वयं मृत्‍यु पर अधिकार हो जाएगा।‘’<span id="more-4594"></span></p>
<p>      इस विधि को तीन हिस्‍सों में लो। एक, श्‍वास के भीतर जो प्राण है, जो उसका सूक्ष्‍म, अदृष्‍य, अपार्थिव अंश है, उसे तुमको अनुभव करना होगा। यह तब होता है, जब तुम भृकुटियों के बीच अवधान को थिर रखते हो। तब यह आसानी से घटित होता है। अगर तुम अवधान को अंतराल में टिकाते हो, तो भी घटित होता है, मगर उतनी आसानी से नहीं। यदि तुम नाभि केंद्र के प्रति सजग हो, जहां श्‍वास आती है। और छूकर चली जाती है। तो भी यह घटित होता है, पर कम आसानी से। उस सूक्ष्‍म प्राण को जानने का सबसे सुगम मार्ग है, तीसरी आँख में थिर होना। वैसे तुम जहां भी केंद्रित होगें। वह घटित होगा। तुम प्राण को प्रभावित होते अनुभव करोगे।</p>
<p>      यदि तुम प्राण को अपने भीतर प्रवाहित होता अनुभव कर सको तो तुम यह भी जान सकते हो कि कब तुम्‍हारी मृत्‍यु होगी। यदि तुम सूक्ष्‍म श्‍वास को, प्राण को महसूस करने लगे। तो मरने के छह महीने पहले से तुम अपनी आसन्‍न मृत्‍यु को जानने लगते हो। कैसे इतने संत अपनी मृत्‍यु की तिथि बना देते है? यह आसान है। क्‍योंकि यदि तुम प्राण के प्रवाह को जानते हो तो जब उसकी गति उलट जाएगी। तब उसको भी तुम जान लोगे। मृत्‍यु के छह महीने पहले प्रक्रिया उलट जाती है। प्राण तुम्‍हारी बाहर जाने लगता है। तब श्‍वास इसे भीतर नहीं ले जाती, बल्‍कि उलटे बाहर ले जाने लगती है—वह श्‍वास।</p>
<p>      तुम इसे जान पाते हो, क्योंकि तुम उसके अदृश्‍य भाग को नहीं देखते, केवल वाहन को ही देखते हो। और वाहन तो एक ही रहेगा। अभी श्‍वास प्राण को भीतर ले जाती है और वहां छोड़ देती है। फिर वाहन बाहर खाली वापस जाता है। और प्राण से पुन: भरकर भीतर जाता है। इसलिए याद रखो कि भीतर आने वाली श्‍वास और बाहर जाने वाली श्‍वास, दोनों एक नहीं है। वाहन के रूप में तो पूरक श्‍वास और रेचक श्‍वास एक ही है, लेकिन जहां पूरक प्राण से भरा होता है। वहीं रेचक उससे रिक्‍त रहता है। तुमने प्राण को पी लिया और श्‍वास खाली हो गई।</p>
<p>      जब तुम मृत्‍यु के करीब होते हो, तब उलटी प्रक्रिया चालू होती है। भीतर आने वाली श्‍वास प्राण विहीन आती है। रिक्‍त आती है। क्‍योंकि तुम्‍हारा शरीर अस्‍तित्‍व से प्राण को ग्रहण करने में असमर्थ हो जाता है। तुम मरने वाले हो, तुम्‍हारी जरूरत न रही। पूरी प्रक्रिया  उलट जाती है। अब जब श्‍वास बाहर जाती है, जब प्राण को साथ लिए बाहर जाती है।</p>
<p>      इसलिए जिसने सूक्ष्‍म प्राण को जान लिए वह अपनी मृत्‍यु का दिन भी तुरंत जान सकता है। छह महीने पहले प्रक्रिया उलटी हो जाती है।</p>
<p>      यह सूत्र बहुत-बहुत महत्‍वपूर्ण है।</p>
<p>      ‘’ललाट के मध्‍य में सूक्ष्‍म श्‍वास (प्राण) को टिकाओ। जब सोने के क्षण में वह ह्रदय तक पहुंचेगा। तब स्‍वप्‍न और स्‍वयं मृत्‍यु पर अधिकार हो जाएगा।‘’</p>
<p>      जब तुम नींद में उतर रहे हो, तभी इस विधि को साधना है, अन्‍य समय में नहीं। ठीक सोने का समय इस विधि के अभ्‍यास के लिए उपयुक्‍त समय है।</p>
<p>      तुम नींद में उतर रहे हो, धीरे-धीर नींद तुम पर हावी हो रही है। कुछ ही क्षणों में भीतर तुम्‍हारी चेतना लुप्‍त होगी। तुम अचेत हो जाओगे। उस क्षण के आने के पहले तुम अपनी श्‍वास और उसके सूक्ष्‍म अंश प्राण के प्रति सजग हो जाओ। और उसे ह्रदय तक जाते हुए अनुभव करो। अनुभव करते जाओ कि वह ह्रदय तक आ रहा है। ह्रदय तक आ रहा है। प्राण ह्रदय से होकर तुम्‍हारे शरीर में प्रवेश करता है, इसलिए यह अनुभव करते ही जाओ। कि प्राण ह्रदय तक आ रहा है। और इस निरंतर अनुभव के बीच ही नींद को आने दो। तुम अनुभव करते जाओ और नींद को आने दो; नींद को तुमको अपने में समेट लेने दो।</p>
<p>      यदि यह संभव हो जाए कि तुम अदृश्‍य प्राण को ह्रदय तक जाते देखो और नींद को भी, तो तुम अपने सपनों के प्रति भी सजग हो जाओगे। तब तुमको बोध रहेगा कि तुम सपना देखते हो तो तुम समझते हो कि यह यथार्थ ही है। वह भी तीसरी आँख के कारण ही संभव होता है। क्‍या तुमने किसी को नींद में देखा है। उसकी आंखे ऊपर चली जाती है, और तीसरी आँख में स्‍थिर हो जाती है। यदि नहीं देखा तो देखो।</p>
<p>      तुम्‍हारा बच्‍चा सोया है, उसकी आंखे खोलकर देखो कि उसकी आंखे कहां है। उसकी आँख की पुतलियाँ ऊपर को चढ़ी है। और त्रिनेत्र पर केंद्रित है। मैं कहता हूं कि बच्‍चों को देखो, सयानों को नहीं। सयाने भरोसे योग्‍य नहीं है। क्‍योंकि उनकी नींद गहरी नहीं है। वे सोचते भर है कि सोये है। बच्‍चों को देखो। उनकी आंखें ऊपर को चढ़ जाती है।</p>
<p>      इसी तीसरी आँख में थिरता के कारण तुम अपने सपनों को सच मानते हो। तुम यह नहीं समझ सकते की वे सपने है। वह तुम तब जानोंगे, जब सुबह जागोगे। तब तुम जानोंगे कि यह स्‍वप्‍न है। यदि समझ जाओ तो दो तल हो गए—स्‍वप्‍न है और तुम सजग हो, जागरूक हो। जो नींद में स्‍वप्‍न के प्रति जाग सके, उसके लिए यह सूत्र चमत्‍कारिक है।</p>
<p>      यह सूत्र कहता है: ‘’स्‍वप्‍न पर और स्‍वयं मृत्‍यु पर अधिकार हो जाएगा।‘’</p>
<p>      यदि तुम स्‍वप्‍न के प्रति जागरूक हो जाओ तो तुम दो काम कर सकते हो। एक कि तुम स्‍वप्‍न पैदा कर सकते हो। आमतौर से तुम स्‍वप्‍न नहीं पैदा कर सकते। आदमी कितना नपुंसक है। तुम स्‍वप्‍न भी नहीं पैदा कर सकते। अगर तुम कोई खास स्‍वप्‍न देखना चाहो तो नहीं देख सकते; यह तुम्‍हारे हाथ में नहीं है। मनुष्‍य कितना शक्‍तिहीन है। स्‍वप्‍न भी उससे नहीं निर्मित किए जा सकते। तुम स्‍वप्‍नों के शिकार भर हो। उनके स्‍त्रष्‍टा नहीं। स्‍वप्‍न तुम में घटित होता है। तुम कुछ नहीं कर सकते हो। न तुम उसे रोक सकते हो, न उसे पैदा कर सकते हो।</p>
<p>      लेकिन अगर तुम यह देखते हुए नींद में उतरो कि ह्रदय प्राण से भर रहा है। निरंतर हर श्‍वास में प्राण से स्‍पर्शित हो रहा है तो तुम अपने स्‍वप्‍नों के मालिक हो जाओगे। और यह मलकियत बहुत अनूठी है, दुर्लभ है। तब तुम जो भी स्‍वप्‍न देखना चाहते हो, तुम वह स्‍वप्‍न देख सकते हो। और सोत समय कहो कि मैं फलां स्‍वप्‍न देखना चाहता हूं और वह स्‍वप्‍न कभी तुम्‍हारे मन में प्रवेश नहीं कर सकेगा।</p>
<p>      लेकिन अपने स्‍वप्‍नों के मालिक बनने का क्‍या प्रयोजन है। क्‍या यह व्‍यर्थ नहीं है? नहीं, यह व्‍यर्थ नहीं है। एक बार तुम स्‍वप्‍न के मालिक हो गए तो दुबारा तुम कभी स्‍वप्‍न नहीं देखोगें। वह व्‍यर्थ हो गया। जरूरत नहीं रही। जैसे ही तुम अपने स्‍वप्‍नों के मालिक होते हो, स्‍वप्‍न बंद हो जाते है। उनकी जरूरत नहीं रहती। और जब स्‍वप्‍न बंद हो जाते है, तब तुम्‍हारी नींद का गुण धर्म ही और होता है। वह गुणधर्म वही है, जो मृत्‍यु का है।</p>
<p>      मृत्‍यु गहन नींद है। अगर तुम्‍हारी नींद मृत्‍यु की तरह गहरी हो जाए तो उसका अर्थ है कि सपने विदा हो गए। सपने नींद को उथला करते है। सपनों के चलते तुम सतह पर ही घूमते रहते हो। सपनों में उलझे रहने के कारण तुम्‍हारी नींद उथली हो जाती है। और जब सपने नहीं रहते, तब तुम नींद के सागर में उतर जाते हो। उसकी गहराई छू लेते है। वही मृत्‍यु है।</p>
<p>      इसलिए भारत न सदा कहा है कि नींद छोटी मृत्‍यु है। और मृत्‍यु लंबी नींद है। गुणात्‍मक रूप से दोनों समान है। नींद दिन-दिन की मृत्‍यु है, मृत्‍यु जीवन-जीवन की नींद है। प्रतिदिन तुम थक जाते हो, तुम सो जाते हो, और दूसरी सुबह तुम फिर अपनी शक्‍ति और अपनी जीवंतता को वापस पा लेते हो। तुम मानो फिर से जन्‍म लेते हो। वैसे ही सत्‍तर या अस्‍सी वर्ष के जीवन के बाद तुम पूरी तरह थक जाते हो। अब छोटी अविधि की मृत्‍यु से काम नहीं चलेगा, अब तुमको बड़ी मृत्‍यु की जरूरत है। उस बड़ी मृत्‍यु या नींद  के बाद तुम बिलकुल नए शरीर के साथ पुनर्जन्‍म लेते हो।</p>
<p>      और एक बार यदि तुम स्‍वप्‍न-शुन्‍य नींद को जान जाओ और उसमे बोध पूर्वक रहो तो फिर मृत्‍यु का भय जाता रहता है। कोई कभी नहीं मर सकता। मृत्‍यु असंभव है, अभी एक दिन पहले मैं कहता था कि केवल मृत्‍यु निश्‍चित है। और अब कहता हूं कि मृत्‍यु असंभव है। कोई कभी नहीं मरा है। कोई कभी मर नहीं सकता। संसार में यदि कुछ असंभव है तो वह मृत्‍यु है। क्‍योंकि अस्‍तित्‍व जीवन है। तुम फिर-फिर जन्‍मते हो। लेकिन नींद ऐसी गहरी है कि पुरानी पहचान भूल जाते हो। तुम्‍हारे मन से स्‍मृतियां पोंछ दी जाती है।</p>
<p>      इसे इस तरह सोचो। मान लो कि आज तुम सोने जा रहे हो, और कोई ऐसा यंत्र बन गया है—शीध्र ही बनने वाला है—जो कि जैसे टेपरिकार्डर के फीते से आवाज पोंछ दी जाती है, वैसे ही मन से स्‍मृति को पोंछ डालता है। क्‍योंकि स्‍मृति भी एक गहरी रिकार्डिंग है। देर-अबेर हम ऐसा यंत्र निकाल लेंगे। जो तुम्‍हारे फिर में लगा दिया जाएगा। और जो तुम्‍हारे दिमाग को पोंछकर बिलकुल साफ कर देगा। तो कल सुबह तुम वही आदमी नहीं रहोगे जो सोने गया था। क्‍योंकि तुमको याद नहीं रहेगा कि कौन सोने गया था। तब तुम्‍हारी नींद मृत्‍यु जैसी हो जाएगी। एक गैप आ जाएगा। तुमको याद नहीं रहेगा। कि कौन सोया था। यही चीज स्‍वाभाविक ढंग से घट रही है। जब तुम मरते हो ओर फिर जन्‍म लेते हो तब तुमको याद नहीं रहता है कि कौन मरा। तुम फिर से शुरू करते हो।</p>
<p>      इस विधि के द्वारा पहले तो तुम स्‍वप्‍नों के मालिक हो जाओगे। उसका अर्थ हुआ कि सपने आना बंद हो जाएंगे। या यदि तुम खुद सपने देखना चाहोगे तो सपना देख भी सकते हो। लेकिन तब वह ऐच्‍छिक सपना होगा। वह अनिवार्य नहीं रहेगा। वह तुम पर लादा नहीं जाएगा। तुम उसके शिकार नहीं होंगे। और तब तुम्‍हारी नींद का गुणधर्म ठीक मृत्‍यु जैसा हो जाएगा। तब तुम जानोगे कि मृत्‍यु भी नींद है।</p>
<p>      इसलिए यह सूत्र कहता है: ‘’स्‍वप्‍न और स्‍वयं मृत्‍यु पर अधिकार हो जाएगा।‘’</p>
<p>      तब तुम जानोंगे कि मृत्‍यु एक लंबी नींद है—और सहयोगी है, और सुंदर है। क्‍योंकि वह तुमको नव जीवन देती है। वह तुमको सब कुछ नया देती है, फिर तो मृत्‍यु भी समाप्‍त हो जाती है। स्‍वप्‍न के शेष होते ही मृत्‍यु समाप्‍त हो जाती है।</p>
<p>      मृत्‍यु पर नियंत्रण पाने, अधिकार पाने का दूसरा अर्थ भी है। अगर तुम समझ लो कि मृत्‍यु नींद है तो तुम उसको दिशा दे सकते हो। अगर तुम अपने सपनों को दिशा दे सकते हो। तो मृत्‍यु को भी दे सकते हो। तब तुम चुनाव कर सकते हो, कि कहां पैदा हो? कब पैदा हो, किससे पैदा हो, और किस रूप में पैदा हो, तब तुम अपने जीवन के मालिक होते हो।</p>
<p>      बुद्ध की मृत्‍यु हुई, मैं उनके अंतिम जन्‍म के पूर्व के जन्‍म की चर्चा कर रहा हूं। जब वे बुद्ध नहीं थे। मरने के पूर्व उन्‍होंने कहा: ‘’मैं अमुक मां बाप से पैदा होऊंगा, ऐसी मेरी मां होगी, ऐसे मेरे पिता होंगे, और मेरी मां मेरे जन्‍म के बाद ही मर जायेगी। और जब मैं जनमुगां तो मेरी मां ऐसे-ऐसे सपने देखेगी। न तुमको सिर्फ अपने सपनों पर अधिकार होगा दूसरे के स्‍वप्‍नों पर भी अधिकार हो जायेगा। सो बुद्ध ने उदाहरण के तौर पर बताया कि जब मैं मां के पेट में होऊंगा, तब मेरी मां ये-ये स्‍वप्‍न देखेगी। और जब कोई इस क्रम से इन स्‍वप्‍नों को देखे, तब तुम समझ जाना की मैं जन्‍म लेने वाला हूं।</p>
<p>      और ऐसा ही हुआ। बुद्ध की माता ने उसी क्रम से सपने देखे। वह क्रम सारे भारत को पता था। विशेषकर उनको जो धर्म में, जीवन की गहन चीजों में और उसके गुह्म पथों में उत्‍सुक थे। पता था, इसलिए उन स्‍वप्‍नों की व्‍याख्‍या हुई। स्‍वप्‍नों की व्‍याख्‍या करने वाला पहला आदमी फ्रायड नहीं था। और न उसकी व्‍याख्‍या में गहराई थी। पला वह केवल पश्‍चिम के लिए था।</p>
<p>      तो बुद्ध के पिता ने स्‍वप्‍नों के व्‍याख्‍याकारों को, उस जमाने के फ्रायडों और जुंगों को तुरंत बुलवाया और उनसे पूछा, इस क्रम का क्‍या अर्थ है। मुझे डर लगता है, ये सपने अद्भुत है। और एक ही क्रम से आ रहे है, एक ही तरह के सपने, बारी-बारी से आ रहे है। मानों कोई एक ही फिल्‍म को बार-बार देखता हो। क्‍या हो रहा है।</p>
<p>      और व्‍याख्‍याकारों ने बताया कि आप एक महान आत्‍मा के पिता होने जा रहे है। वह बुद्ध होने वाला है। लेकिन आपकी पत्‍नी को संकट है। क्‍योंकि जब ऐसे बुद्ध जन्‍म लेते है, तब मां का जीना कठिन हो जाता है। बुद्ध के पिता ने कारण पूछा। व्‍याख्‍याकारों ने कहा कि हम यह नहीं बता सकते। लेकिन जो आत्‍मा पैदा होने वाली है, उसका ही वक्‍तव्‍य है कि उसके जन्‍म लेने पर उसकी मां की मृत्‍यु हो जायेगी।</p>
<p>      बाद में बुद्ध से पूछा गया कि आपकी माता की मृत्‍यु तुरंत क्‍यो हुई? उन्‍होंने कहा कि एक बुद्ध को जन्‍म देना इतनी बड़ी घटना है कि उसके बाद और सब कुछ व्‍यर्थ हो जाता है। इसलिए मां जीवित नहीं रह सकती। उसे नया जीवन शुरू करने के लिए फिर से जन्‍म लेना होगा। एक बुद्ध को जन्‍म देना परम अनुभव है। ऐसा शिखर है कि मां उसके बाद नहीं बची रह सकती। इसलिए मां की मृत्‍यु हुई।</p>
<p>      बुद्ध ने अपने पिछले जन्‍म में कहा था कि मैं उस समय जन्‍म लूंगा, जब मेरी मां एक ताड़ वृक्ष के नीचे खड़ी होगी। और वही हुआ। बुद्ध का जब जन्‍म हुआ तब उनका मां ताड़ वृक्ष के नीचे खड़ी थी। और बुद्ध ने यह भी कहां की। जन्‍म लेने के बाद में तुरंत सात कदम चलूंगा। यह-यह पहचान होगी। जो बताए देता हूं, ताकि तुम जान सको कि बुद्ध का जन्‍म हो गया। और बुद्ध ने सब कुछ का इंगित किया।</p>
<p>      और यह केवल बुद्ध के लिए ही सही नहीं है। यही जीसस के लिए सही है, यही महावीर के लिए सही है। यही और भी कई अन्‍यों के लिए सही है। प्रत्‍येक जैन तीर्थंकर ने अपने पिछले जन्‍म में भविष्‍यवाणी की थी कि उनका जन्‍म किस तरह होगा। उन्‍होंने भी स्‍वप्‍नों के क्रम बताए थे। उन्‍होंने भी प्रतीक बताए थे, और कहा था कि किस तरह सब कुछ घटित होने वाला है।</p>
<p>      तुम दिशा दे सकते हो, एक बार तुम अपने स्‍वप्‍नों को दिशा देने लगो तो सब कुछ को दिशा दे सकते हो। क्‍योंकि यह संसार स्‍वप्‍नों का ही बना हुआ है। और स्‍वप्‍नों का ही यह जीवन बना है। इसलिए जब तुम्‍हारा अधिकार सपने पर हुआ तब सब कुछ पर हो गया।</p>
<p>      यह सूत्र कहता है: ‘’स्‍वयं मृत्‍यु पर।‘’</p>
<p>      तब कोई व्‍यक्‍ति अपने को एक विशेष तरह का जन्‍म भी दे सकता है। विशेष तरह का जीवन भी दे सकता है।</p>
<p>      हम लोग तो शिकार है। हम नहीं जानते है कि क्‍यों जन्‍मते है, क्‍यों मरते है। कौन हमें चलाता है और क्‍यों? काई कारण नहीं दिखाई देता है। सब कुछ अराजकता, संयोग जैसा है। ऐसा इसलिए है कि हम मालिक नहीं है। एक बार मालिक हो जाएं तो फिर ऐसा नहीं रहेगा।</p>
<p><strong> ओशो</p>
<p>विज्ञान भैरव तंत्र</p>
<p>(तंत्र-सूत्र—भाग-1)</p>
<p>प्रवचन-5</strong></p>
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		<title>तंत्र-सूत्र—विधि-06</title>
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		<pubDate>Mon, 21 May 2012 01:32:05 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[पोनी--एक आत्‍म कथा]]></category>
		<category><![CDATA[विज्ञान भैरव तंत्र--भाग-1]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

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		<description><![CDATA[सांसरिक कामों में लगे हुए, अवधान को दो श्‍वासों के बीच टिकाओ। इस अभ्‍यास से थोड़े ही दिन में नया जन्‍म होगा। ‘’सांसरिक कामों में लगे हुए, अवधान को दो श्‍वासों के बीच टिकाओ&#8230;।‘’ श्‍वासों को भूल जाओं और उनके &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/05/21/%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a5%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a7%e0%a4%bf-06/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&#038;blog=12293864&#038;post=4591&#038;subd=oshosatsang&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>सांसरिक कामों में लगे हुए, अवधान को दो श्‍वासों के बीच टिकाओ। इस अभ्‍यास से थोड़े ही दिन में नया जन्‍म होगा।</strong><div id="attachment_4592" class="wp-caption alignright" style="width: 310px"><a href="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/05/thumbnail3.jpg"><img src="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/05/thumbnail3.jpg?w=640" alt=" विज्ञान भैरव तंत्र  (तंत्र-सूत्र—भाग-1)osho" title=" विज्ञान भैरव तंत्र  (तंत्र-सूत्र—भाग-1) osho"   class="size-full wp-image-4592" /></a><p class="wp-caption-text">विधि-6 विज्ञान भैरव तंत्र  (तंत्र-सूत्र—भाग-1)osho</p></div></p>
<p>     ‘’सांसरिक कामों में लगे हुए, अवधान को दो श्‍वासों के बीच टिकाओ&#8230;।‘’</p>
<p>      श्‍वासों को भूल जाओं और उनके बीच में अवधान को लगाओ। एक श्‍वास भी तर आती है। इसके पहले कि वह लौट जाए, उसे बाहर छोड़ा जाए, वहां एक अंतराल होता है।</p>
<p>      ‘’सांसारिक कामों में लगे हुए।‘’ यह छठी विधि निरंतर करने की है। इसलिए कहा गया है, ‘’सांसारिक कामों में लगे हुए&#8230;.’’ जो भी तुम कर रहे हो, उसमे अवधान को दो श्‍वासों के अंतराल में थिर रखो। लेकिन काम-काज में लगे हुए ही इसे साधना है।<span id="more-4591"></span></p>
<p>      ठीक ऐसी ही एक दूसरी विधि की चर्चा हम कर चुके है। अब फर्क इतना है कि इसे सांसारिक कामों में लगे हुए ही करना है। उससे अलग होकर इसे मत करो। यह साधना ही तब करो जब तुम कुछ और काम कर रहे हो।</p>
<p>      तुम भोजन कर रहे हो, भोजन करते जाओ और अंतराल पर अवधान रखो। तुम चल रहे हो, चलते जाओ और अवधान को अंतराल पर टिकाओ। तुम सोने जा रहे हो, लेटो और नींद को आने दो। लेकिन तुम अंतराल के प्रति सजग रहो।</p>
<p>      पर काम-काज में क्‍यों? क्‍योंकि काम-काज मन को डांवाडोल करता है। काम-काज में तुम्‍हारे अवधान को बार-बार भुलाना पड़ता है। तो डांवाडोल न हों; अंतराल में थिर रहें। काम-काज भी न रूके, चलता रहे। तब तुम्‍हारे अस्‍तित्‍व के दो तल हो जाएंगे। करना ओर होना। अस्‍तित्‍व के दो तल ओ गए; एक करने का जगत और दूसरा होने का जगत। एक परिधि है और दूसरा केंद्र। परिधि पर काम करते रहो, रूको नहीं; लेकिन केंद्र पर भी सावधानी से काम करते रहो। क्‍या होगा?</p>
<p>      तुम्‍हारा काम-काज तब अभिनय हो जाएगा। मानों तुम कोई पार्ट अदा कर रहे हो। उदाहरण के लिए, तुम किसी नाटक म पार्ट कर रहे हो। तुम राम बने हो या क्राइस्‍ट बने हो। यद्यपि तुम राम या क्राइस्‍ट का अभिनय करते हो, तो भी तुम स्‍वयं बने रहते हो। केंद्र पर तुम जानते हो कि तुम कौन हो और परिधि पर तुम राम या क्राइस्‍ट का या किसी का पार्ट अदा करते हो। तुम जानते हो कि तुम राम नहीं हो, राम का अभिनय भर कर रहे हो। तुम कौन हो तुमको मालूम है। तुम्‍हारा अवधान तुममें केंद्रिय है। और तुम्‍हारा काम परिधि पर जारी है।</p>
<p>      यदि इस विधि का अभ्‍यास हो तो पूरा जीवन एक लंबा नाटक बन जाएगा। तुम एक अभिनेता होगें। अभिनय भी करोगे और सदा अंतराल में केंद्रित रहोगे। जब तुम अंतराल को भूल जाओगे, तब तुम अभिनेता नहीं रहोगे, तब तुम कर्ता हो जाओगे। तब वह नाटक नहीं रहेगा। उसे तुम भूल से जीवन समझ लोगे।</p>
<p>      यही हम सबने किया है। हर आदमी सोचता है कि वह जीवन जी रहा है। यह जीवन नहीं है। यह तो एक रोल है, एक पार्ट है, जो समाज ने, परिस्‍थितियों ने, संस्‍कृति ने, देश की परंपरा ने तुमको थमा दिया है। और तुम अभिनय कर रहे हो। और तुम इस अभिनय के साथ तादात्‍म्‍य भी कर बैठे हो। उसी तादात्‍म्‍य को तोड़ने के लिए यह विधि है।</p>
<p>      कृष्‍ण के अनेक नाम है, कृष्‍ण सबसे कुशल अभिनेताओं में से एक है। वे सदा अपने में थिर है और खेल कर रहे है। लीला कर रहे है, बिलकुल गैर-गंभीर है। गंभीरता तादात्‍म्‍य से पैदा होती है।</p>
<p>      यदि नाटक में तुम सच ही राम हो जाओ तो अवश्‍य समस्‍याएं खड़ी होगी। जब-जब सीता की चोरी होगी, तो तुमको दिल का दौरा पड़ सकता है। और पूरा नाटक बंद हो जाना भी निश्‍चित है। लेकिन अगर तुम बस अभिनय कर रहे हो तो सीता की चोरी से तुमको कुछ भी नहीं होता है। तुम अपने घर लौटोगे। और चैन से सो जाओगे। सपने में भी ख्‍याल न आएगा। की सीता की चोरी हुई।</p>
<p>      जब सचमुच सीता चोरी गई थी तब राम स्‍वयं रो रहे थे। चीख रहे थे और वृक्षों से पूछ रहे थे कि सीता कहां है? कौन उसे ले गया? लेकिन यह समझने जैसी बात है। अगर राम सच में रो रहे है और पेड़ों से पूछ रहे है, तब तो वे तादाम्‍तयता कर बैठे , तब वे राम न रहे, ईश्‍वर न रहे, अवतार न रहे। यह स्‍मरण रखना चाहिए। कि राम के लिए उनका वास्‍तविक जीवन भी अभिनय ही था। जैसे दूसरे अभिनेताओं को तुमने राम का अभिनय करते देखा है, वैसे ही राम भी अभिनय कर रहे थे—नि:संदेह एक बड़े रंग मंच पर।</p>
<p>      इस संबंध में भारत के पास एक खुबसूरत कथा है। मेरी  दृष्‍टि में यह कथा अद्भुत है। संसार के किसी भी भाग में ऐसी कथा नहीं  मिलेगी। कहते है कि वाल्‍मीकि ने राम के जन्‍म से पहले ही रामायण लिख दी। राम को केवल उसका अनुगमन करना था। इसलिए वास्‍तव में राम का पहला कृत्‍य भी अभिनय ही था। उनके जन्‍म के पहले ही कथा लिख दी गई थी, इसलिए उन्‍हें केवल उसका अनुगमन करना पडा। वे और क्‍या कर सकते थे। वाल्‍मीकि जैसा व्‍यक्‍ति जब कथा लिखता है, तब राम को अनुगमन करना होगा। इसलिए एक तरह से सब कुछ नियम था। सीता की चोरी होनी थी। और युद्ध का लड़ा जाना था।</p>
<p>      यदि यह तुम समझ सको  तो भाग्‍य के सिद्धांत को भी समझ सकते हो। इसका बड़ा गहरा अर्थ है। और अर्थ यह है कि यदि तुम समझ जाते हो कि तुम्‍हारे लिए यह सब कुछ नियम है तो जीवन नाटक हो जाता है। अब यदि तुमको राम का अभिनय करना है। तो तुम कैसे बदल सकते हो। सब कुछ नियत है, यहां तक कि तुम्‍हारा संवाद भी, डायलाग भी। अगर तुम सीता से कुछ कहते हो तो वह किसी नीयत वचन का दोहराना भर है।</p>
<p>      यदि जीवन नियत है, तो तुम उसे बदल नहीं सकते। उदाहरण के लिए, एक विशेष दिन को तुम्‍हारी मृत्‍यु होने वाली है। यह नियत है। और तुम जब मरोगे तब रो रहे होगें; यह भी निश्‍चित है। और फलां-फलां लोग तुम्‍हारे पास होंगे। यह भी तय है। और यदि सब कुछ नीयत है, तय है, तब सब कुछ नाटक हो जाता है। यदि सब कुछ निश्‍चित है तो उसका अर्थ हुआ कि तुम केवल उसे अंजाम देने वाले हो। तुमको उसे जीना नहीं है। उसका अभिनय करना है।</p>
<p>      यह विधि, छठी विधि , तुमको एक साइकोड्रामा, एक खेल बना देती है। तुम दो श्‍वासों के अंतराल में थिर हो और जीवन परिधि पर चल रहा है। यदि तुम्‍हारा अवधान केंद्र पर है, तो तुम्‍हारा अवधान परिधि पर नहीं है। परिधि पर जो है वह उपावधान है, वह कहीं तुम्‍हारे अवधान के पास घटित होता है। तुम उसे अनुभव कर सकते हो, उसे जान सकते हो, पर वह महत्‍वपूर्ण नहीं है। यह ऐसा है जैसे तुमको नहीं घटित हो रहा है।</p>
<p>      मैं इसे दोहराता हूं, यदि तुम इस छठी विधि की साधना करो तो तुम्‍हारा समूचा जीवन ऐसा हो जाएगा जैसे वह तुमको न घटित होकर किसी दूसरे व्‍यक्‍ति को घटित हो रहा है।</p>
<p><strong> ओशो</p>
<p>विज्ञान भैरव तंत्र</p>
<p>(तंत्र-सूत्र—भाग-1)</p>
<p>प्रवचन-5</strong></p>
<br />Filed under: <a href='http://oshosatsang.org/category/%e0%a4%aa%e0%a5%8b%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%86%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a4%a5%e0%a4%be/'>पोनी--एक आत्‍म कथा</a>, <a href='http://oshosatsang.org/category/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%ad%e0%a5%88%e0%a4%b0%e0%a4%b5-%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%97-1/'>विज्ञान भैरव तंत्र--भाग-1</a> Tagged: <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/'>ओशो</a>, <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6/'>स्‍वामी आनंद प्रसाद</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/oshosatsang.wordpress.com/4591/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/oshosatsang.wordpress.com/4591/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/oshosatsang.wordpress.com/4591/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/oshosatsang.wordpress.com/4591/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/oshosatsang.wordpress.com/4591/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/oshosatsang.wordpress.com/4591/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/oshosatsang.wordpress.com/4591/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/oshosatsang.wordpress.com/4591/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/oshosatsang.wordpress.com/4591/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/oshosatsang.wordpress.com/4591/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/oshosatsang.wordpress.com/4591/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/oshosatsang.wordpress.com/4591/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/oshosatsang.wordpress.com/4591/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/oshosatsang.wordpress.com/4591/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&#038;blog=12293864&#038;post=4591&#038;subd=oshosatsang&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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			<media:title type="html"> विज्ञान भैरव तंत्र  (तंत्र-सूत्र—भाग-1) osho</media:title>
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		<title>तंत्र-सूत्र—विधि-05</title>
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		<pubDate>Sun, 20 May 2012 12:21:18 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[विज्ञान भैरव तंत्र--भाग-1]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

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		<description><![CDATA[भृकुटियों के बीच अवधान को स्‍थिर कर विचार को मन के सामने करो। फिर सहस्‍त्रार तक रूप को श्‍वास-तत्‍व से, प्राण से भरने दो। वहां वह प्रकाश की तरह बरसेगा। यह विधि पाइथागोरस को दी गई थी। पाइथागोरस इसे लेकर &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/05/20/%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a5%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a7%e0%a4%bf-05/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&#038;blog=12293864&#038;post=4588&#038;subd=oshosatsang&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>भृकुटियों के बीच अवधान को स्‍थिर कर विचार को मन के सामने करो। फिर सहस्‍त्रार तक रूप को श्‍वास-तत्‍व से, प्राण से भरने दो। वहां वह प्रकाश की तरह बरसेगा।</strong><div id="attachment_4589" class="wp-caption alignright" style="width: 310px"><a href="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/05/shira53.jpg"><img src="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/05/shira53.jpg?w=300&h=235" alt="Shira तंत्र-सूत्र—विधि-05 (विज्ञान भैरव तंत्र--ओशो)" title="Shira तंत्र-सूत्र—विधि-05 (विज्ञान भैरव तंत्र--ओशो)" width="300" height="235" class="size-medium wp-image-4589" /></a><p class="wp-caption-text">Shira तंत्र-सूत्र—विधि-05 (विज्ञान भैरव तंत्र&#8211;ओशो)</p></div></p>
<p>     यह विधि पाइथागोरस को दी गई थी। पाइथागोरस इसे लेकर यूनान वापस गए। और वह पश्‍चिम के समस्‍त रहस्‍यवाद के आधार बन गए। पश्‍चिम में अध्‍यात्‍मवाद के वे पिता है। यह विधि बहुत गहरी विधियों में ऐ एक है। इसे समझने की कोशिश करो।</p>
<p>      ‘’भृकुटियों के बीच  अवधान को स्‍थिर करो।‘’<span id="more-4588"></span></p>
<p>      आधुनिक शरीर-शस्‍त्र कहता है, वैज्ञानिक शोध कहती है कि दो भृकुटियों के बीच में ग्रंथि है वह शरीर का सबसे रहस्‍यपूर्ण भाग है। जिसका नाम पाइनियल ग्रंथि है। यही तिब्‍बतियों की तीसरी आँख है। और यही है शिव का नेत्र। तंत्र के शिव का त्रिनेत्र। दो आंखों के बीच एक तीसरी आँख भी है। लेकिन यह सक्रिय नहीं है। यह है, और यह किसी भी समय सक्रिय हो सकती है। निसर्गत: यह सक्रिय नहीं है। इसको सक्रिय करने के लिए संबंध में तुम को कुछ करना पड़ेगा। यह अंधी नहीं है, सिर्फ बंद है। यह विधि तीसरी आँख को खोलने की विधि है।</p>
<p>      ‘’भृकुटियों के बीच अवधान को स्‍थिर कर&#8230;..।‘’</p>
<p>      आंखे बंद कर लो और फिर दोनों आंखों को बंद रखते हुए भौंहों के बीच में दृष्‍टि को स्‍थिर करो—मानो कि दोनों आंखों से तुम देख रहे हो। और समग्र अवधान को वही लगा दो।</p>
<p>      यह विधि एकाग्र होने की सबसे सरल विधियों में से एक है। शरीर के किसी दूसरे भाग में इतनी आसानी से तुम अवधान को नहीं उपलब्‍ध हो सकते। यह ग्रंथि अवधान को अपने में समाहित करने में कुशल है। यदि तुम इस पर अवधान दोगे तो तुम्‍हारी दोनों आंखे तीसरी आँख से सम्‍मोहित हो जाएंगी। वे थिर हो जाएंगी, वे वहां से नहीं हिल सकेंगी। यदि तुम शरीर के किसी दूसरे हिस्‍से पर अवधान दो तो वहां कठिनाई होगी। तीसरी आँख अवधान को पकड़ लेती है। अवधान को खींच लेती है। अवधान के लिए वह चुंबक का काम करती है।</p>
<p>      इसलिए दुनिया भी की सभी विधियों में इसका समावेश किया गया है। अवधान को प्रशिक्षित करने में यह सरलतम है, क्‍योंकि इसमे तुम ही चेष्‍टा नही करते, यह ग्रंथि भी तुम्‍हारी मदद करती है। यह चुंबकीय है। तुम्‍हारे अवधान को यह बलपूर्वक खींच लेती है।</p>
<p>      तंत्र के पुराने ग्रंथों में कहा गया है कि अवधान तीसरी आँख का भोजन है। यह भूखी है; जन्‍मों-जन्‍मों से भूखी है। जब तुम इसे अवधान देते हो यह जीवित हो उठती है। इसे भोजन मिल गया है। और जब तुम जान लोगे कि अवधान इसका भोजन है, जान लोगे कि तुम्‍हारे अवधान को यह चुंबक की तरह खींच लेती है। तब अवधान कठिन नहीं रह जाएगा। सिर्फ सही बिंदु को जानना है।</p>
<p>      इस लिए आँख बंद कर लो, और अवधान को दोनों आंखों के बीच में घूमने दो और उस बिंदू को अनुभव करो। जब तुम उस बिंदु के करीब होगें। अचानक तुम्‍हारी आंखे थिर हो जाएंगी। और जब उन्‍हें हिलाना कठिन हो जाए तब जानो कि सही बिंदु मिल गया।</p>
<p>      ‘’भृकुटियों के बीच अवधान को स्‍थिर कर विचार को मन के सामने रखो।‘’</p>
<p>      अगर यह अवधान प्राप्‍त हो जाए तो पहली बार एक अद्भुत बात तुम्‍हारे अनुभव में आएगी। पहली बार तुम देखोगें कि तुम्‍हारे विचार तुम्‍हारे सामने चल रहे है, तुम साक्षी हो जाओगे। जैसे कि सिनेमा के पर्दे पर दृश्‍य देखते हो, वैसे ही तुम देखोगें कि विचार आ रहे है, और तुम साक्षी हो। एक बार तुम्‍हारा अवधान त्रिनेत्र-केंद्र पर स्‍थिर हो जाए तुम तुरंत विचारों के साक्षी हो जाओगे।</p>
<p>      आमतौर से तुम साक्षी नहीं होते, तुम विचारों के साथ तादात्म्य कर लेते हो। यदि क्रोध है तो तुम क्रोध हो जाते हो। यदि एक विचार चलता है तो उसके साक्षी होने की बजाएं तुम विचार के साथ एक हो जाते हो। उससे तादात्‍म्‍य करके साथ-साथ चलने लगते हो। तुम विचार ही बन जाते हो, विचार का रूप ले लेते हो, जब क्रोध उठता है तो तुम क्रोध बन जाते हो। और जब लोभ उठता है तब लोभ बन जाते हो। कोई भी विचार तुम्‍हारे साथ एकात्‍म हो जाता है। और उसके ओर तुम्‍हारे बीच दूरी नहीं रहती।</p>
<p>      लेकिन तीसरी आँख पर स्‍थिर होते ही तुम एकाएक साक्षी हो जाते हो। तीसरी आँख के जरिए तुम साक्षी बनते हो। इस शिवनेत्र के द्वारा तुम विचारों को वैसे ही चलता देख सकते हो जैसे आसमान पर तैरते बादलों को, या रहा पर चलते लोगो को देखते हो।</p>
<p>      जब तुम अपनी खिड़की से आकाश कोया रहा चलते लोगों को देखते हो तब तुम उनसे तादात्‍म्‍य नहीं करते। तब तुम अलग होते हो, मात्र दर्शक रहते हो—बिलकुल अलग। वैसे ही अब जब क्रोध आता है तब तुम उसे एक विषय की तरह देखते हो। अब तुम यह नहीं सोचते कि मुझे क्रोध हुआ। तुम यही अनुभव करते हो कि तुम क्रोध से घिरे हो। क्रोध की एक बदली तुम्‍हारे चारो और घिर गई। और जब तुम खुद क्रोध नहीं रहे तब क्रोध नापुंसग हो जाता है। तब वह तुमको नहीं प्रभावित कर सकता। तब तुम अस्‍पर्शित रह जाते हो। क्रोध आता है और चला जाता है। और तुम अपने में केंद्रित रहते हो।</p>
<p>      यह पाँचवीं विधि साक्षित्‍व को प्राप्‍त करने की विधि है।</p>
<p>      ‘’भृकुटियों के बीच अवधान को स्‍थिर कर विचार को मन के सामने करो।‘’</p>
<p>      अब अपने विचारों को देखो, विचारों का साक्षात्‍कार करो।</p>
<p>      ‘’फिर सहस्‍त्रार तक रूप को श्‍वास तत्‍व से प्राण से भरने दो। वहां वह प्रकाश की तरह बरसेगा।‘’</p>
<p>      जब अवधान भृकुटियों के बीच शिवनेत्र के केंद्र पर स्‍थिर होता है। तब दो चीजें घटित होती है।</p>
<p>      और यही चीज दो ढंगों से हो सकती है। एक, तुम साक्षी हो जाओ तो तुम तीसरी आँख पर थिर हो जाते हो। साक्षी हो जाओ, जो भी हो रहा हो उसके साक्षी हो जाओ। तुम बीमार हो, शरीर में पीड़ा है, तुम को दुःख और संताप है, जो भी हो, तुम उसके साक्षी रहो, जो भी हो, उससे तादात्‍म्‍य न करो। बस साक्षी रहो—दर्शक भर। और यदि साक्षित्व संभव हो जाए, तो तुम तीसरे नेत्र पर स्‍थिर हो जाओगे।</p>
<p>      इससे उलटा भी हो सकता है। यदि तुम तीसरी आँख पर स्‍थिर हो जाओ, तो साक्षी हो जाओगे।। ये दोनों एक ही बात है।</p>
<p>      इसलिए पहली बात: तीसरी आँख पर केंद्रित होते ही साक्षी आत्‍मा का उदय होगा। अब तुम अपने विचारों का सामना कर सकते हो। और दूसरी बात: और अब तुम श्‍वास-प्रश्‍वास की सूक्ष्‍म और कोमल तरंगों को भी अनुभव कर सकते हो। अब तुम श्‍वसन के रूप को ही नहीं, उसके तत्‍व को , सार को, प्राण को भी समझ सकते हो।</p>
<p>      पहले तो यह समझने की कोशिश करें कि ‘’रूप’’ और ‘’श्‍वास-तत्‍व’’ का क्‍या अर्थ है। जब तुम श्‍वास लेते हो, तब सिर्फ वायु की ही श्‍वास नहीं लेते। वैज्ञानिक तो यही कहते है कि तुम वायु की ही श्‍वास लेते हो। जिसमें आक्‍सीजन, हाइड्रोजन तथा अन्‍य तत्‍व रहते है। वे कहते है कि तुम वायु की श्‍वास लेते हो।</p>
<p>      लेकिन तंत्र कहता है कि हवा तो मात्र वाहन है, असली चीज नहीं है। असल में तुम प्राण की श्‍वास लेते हो। हवा तो माध्‍यम भर है। प्राण उसका सत्‍व है, सार है। तुम न सिर्फ हवा की, बल्‍कि प्राण की श्‍वास लेते हो।</p>
<p>      आधुनिक विज्ञान अभी नहीं जान सका है कि प्राण जैसी कोई वस्‍तु भी है। लेकिन कुछ शोधकर्ताओं ने कुछ रहस्‍यमयी चीज का अनुभव किया है। श्‍वास में सिर्फ हवा हम नहीं लेते, वह बहुत से आधुनिक शोधकर्ताओं ने अनुभव किया है। विशेषकर एक नाम उल्‍लेखनीय है। वह है जर्मन मनोवैज्ञानिक विलहेम रेख का। जिसने इसे आर्गन एनर्जी या जैविक ऊर्जा का नाम दिया है। वह प्राण ही है। वह कहता है कि जब आप श्‍वास लेते है, तब हवा तो मात्र आधार है, पात्र है, जिसके भीतर एक रहस्‍यपूर्ण तत्‍व है, जिसे आर्गन या प्राण या एलेन वाइटल कह सकते है। लेकिन वह बहुत सूक्ष्म है। वास्‍तव में वह भौतिक नहीं है। पदार्थ गत नहीं है। हवा भौतिक है, पात्र भौतिक है; लेकिन उसके भीतर से कुछ सूक्ष्‍म, अलौकिक तत्‍व चल रहा है।</p>
<p>      इसका प्रभाव अनुभव किया जा सकता है। जब तुम किसी प्राणवान व्‍यक्‍ति के पास होते हो, तो तुम अपने भीतर किसी शक्‍ति को उगते देखते हो। और जब किसी बीमार के पास होते हो, तो तुमको लगता है कि तुम चूसे जा रहे हो। तुम्‍हारे भीतर से कुछ निकाला जा रहा है। जब तुम अस्‍पताल जाते हो, तब थके-थके क्‍यों अनुभव करते हो? वहां चारों ओर से तुम चूसे जाते हो। अस्‍पताल का पूरा माहौल बीमार होता है और वहां सब किसी को अधिक प्राण की, अधिक एलेन वाइटल की जरूरत है। इसलिए वहां जाकर अचानक तुम्‍हारा प्राण तुमसे बहने लगता है। जब तुम भीड़ में होते हो, तो तुम घुटन महसूस क्‍यों करते हो। इसलिए कि वहां तुम्‍हारा प्राण चूसा जाने लगता है। और जब तुम प्रात: काल अकेले आकाश के नीचे या वृक्षों के बीच होते हो, तब फिर अचानक तुम अपने में किसी शक्‍ति का, प्राण का उदय अनुभव करते हो। प्रत्‍येक का एक खास स्‍पेस की जरूरत है। और जब वह स्‍पेस नहीं मिलता है तो तुमको घुटन महसूस होती है।</p>
<p>      विलहेम रेख ने कई प्रयोग किए। लेकिन उसे पागल समझा गया। विज्ञान के भी अपने अंधविश्‍वास है। और विज्ञान बहुत रूढ़िवादी होता है। विज्ञान अभी भी नहीं समझता है कि हवा से बढ़कर कुछ है; वह प्राण है। लेकिन भारत सदियों से उस पर प्रयोग कर रहा है।</p>
<p>      तुमने सुना होगा—शायद देखा भी हो—कि कोई व्‍यक्‍ति कई दिनों के लिए भूमिगत समाधि में प्रवेश कर गया। जहां हवा का कोई प्रवेश नहीं था। 1880 में मिस्‍त्र में एक आदमी चालीस वर्षों के लिए समाधि में चला गया था। जिन्‍होंने उसे गाड़ा था वे सभी मर गए। क्‍योंकि वह 1920 में समाधि से बहार आने वाला था।</p>
<p>      1920 में किसी को भरोसा नहीं था कि वह जीवित मिलेगा। लेकिन वह जीवित था और उसके बाद भी वह दस वर्षों तक जीवित रहा। वह बिलकुल पीला पड़ गया था, परंतु जीवित था। और उसको हवा मिलने की कोई संभावना नहीं थी।</p>
<p>      डॉक्टरों ने तथा दूसरों ने उससे पूछा कि इसका रहस्‍य क्‍या है? उसने कहां हम नहीं जानते; हम इतना ही जानते है कि प्राण कही भी प्रवेश कर सकता है। और वह है। हवा वहां नहीं प्रवेश कर सकती, लेकिन प्राण कर सकता है।</p>
<p>      एक बार तुम जान जाओ कि श्‍वास के बिना भी कैसे तुम प्राण को सीधे ग्रहण कर सकते हो, तो तुम सदियों तक के लिए भी समाधि में जा सकते हो।</p>
<p>      तीसरी आँख पर केंद्रित होकर तुम श्‍वास के सार तत्‍व को, श्‍वास को नहीं, श्‍वास के सार तत्‍व प्राण को देख सकेत हो। और अगर तुम प्राण को देख सके, तो तुम उस बिंदु पर पहुंच गए जहां से छलांग लग सकती है, क्रांति घटित हो सकती है।</p>
<p>      सूत्र कहता है: ‘’सहस्त्रार तक रूप को प्राण से भरने दो।‘’</p>
<p>      और जब तुम को प्राण का एहसास हो, तब कल्‍पना करो कि तुम्‍हारा सिर प्राण से भर गया है। सिर्फ कल्‍पना करो, किसी प्रयत्‍न की जरूरत नहीं है। और मैं बताऊंगा कि कल्‍पना कैसे काम करती है। तब तुम त्रिनेत्र-बिंदु पर स्‍थिर हो जाओ तब कल्‍पना करो, और चीजें आप ही और तुरंत घटित होने लगती है।</p>
<p>      अभी तुम्‍हारी कल्‍पना भी नपुंसक है। तुम कल्‍पना किए जाते हो और कुछ भी नहीं होता।  लेकिन कभी-कभी अनजाने साधारण जिंदगी में भी चीजें घटित होती है। तुम अपने मित्र की सोच रहे हो और अचानक दरवाजे पर दस्‍तक होती है। तुम कहते हो कि सांयोगिक था कि मित्र आ गया। कभी तुम्‍हारी कल्‍पना संयोग की तरह भी काम करती है।</p>
<p>      लेकिन जब भी ऐसा हो, तो याद रखने की चेष्‍टा करो  और पूरी चीज का विश्‍लेषण करो। जब भी लगे कि तुम्‍हारी कल्‍पना सच हुई है। तुम भीतर जाओ और देखो। कहीं न कहीं तुम्‍हारा अवधान तीसरे नेत्र के पास रहा होगा। दरअसल यह संयोग नहीं था। यह वैसा दिखता है; क्‍योंकि गुह्म विज्ञान का तुमको पता नहीं है। अनजाने ही तुम्‍हारा मन त्रिनेत्र केंद्र के पास चला गया होगा। और अवधान यदि तीसरी आँख पर है तो किसी घटना के सृजन के लिए उसकी कल्‍पना काफी है।</p>
<p>      यह सूत्र कहता है कि जब तुम भृकुटियों के बीच स्‍थिर हो और प्राण को अनुभव करते हो, तब रूप को भरने दो। अब कल्‍पना करो कि प्राण तुम्‍हारे पूरे मस्‍तिष्‍क को भर रहे है। विशेषकर सहस्‍त्रार को जो सर्वोच्‍च मनस केंद्र है। उस क्षण तुम कल्‍पना करो। और वह भर जाएगा। कल्‍पना करो कि वह प्राण तुम्‍हारे सहस्‍त्रार से प्रकाश की तरह बरसेगा। और वह बरसने लगेगा। और उस प्रकाश की वर्षा में तुम ताजा हो जाओगे। तुम्‍हारा पुनर्जन्‍म हो जाएगा। तुम बिलकुल नए हो जाओगे। आंतरिक जन्‍म का यही अर्थ है।</p>
<p>      यहां दो बातें है। एक, तीसरी आँख पर केंद्रित होकर तुम्‍हारी कल्‍पना पुंसत्‍व को, शुद्धि को उपलब्‍ध हो जाती है। यही कारण है कि शुद्धता पर, पवित्रता पर इतना बल दिया गया है। इस साधना में उतरने के पहले शुद्ध बने।</p>
<p>      तंत्र के लिए शुद्धि कोई नैतिक धारणा नहीं हे। शुद्धि इसलिए अर्थपूर्ण है कि यदि तुम तीसरी आँख पर स्‍थिर हुए और तुम्‍हारा मन अशुद्ध रहा, तो तुम्‍हारी कल्‍पना खतरनाक सिद्ध हो सकती है—तुम्‍हारे लिए भी और दूसरें के लिए भी। यदि तुम किसी की हत्‍या करने की सोच रहे हो, उसका महज विचार भी मन में है। तो सिर्फ कल्‍पना से उस आदमी की मृत्‍यु घटित हो जाएगी। यही कारण है कि शुद्धता पर इतना जोर दिया जाता है।</p>
<p>      पाइथागोरस को विशेष उपवास और प्राणायाम से गुजरने को कहा गया; क्‍योंकि यहां बहुत खतरनाक भूमि से यात्री गुजरता है। जहां भी शक्‍ति है, वहां खतरा है। यदि मन अशुद्ध है तो शक्‍ति मिलने पर आपके अशुद्ध विचार शक्‍ति पर हावी हो जाएंगे।</p>
<p>      कई बार तुमने हत्‍या करने की सोची है; लेकिन भाग्‍य से वहां कल्‍पना न काम नहीं किया। यदि वह काम करे, यदि वह तुरंत वास्तविक हो जाए तो वह दूसरों के लिए ही नहीं तुम्‍हारे लिए भी खतरनाक सिद्ध हो सकती है। क्‍योंकि कितनी ही बार तुमने आत्‍म हत्‍या की सोची है। अगर मन तीसरी आँख पर केंद्रित है तो आत्‍महत्‍या का विचार भी आत्‍महत्‍या बन जाएगा। तुमको विचार बदलने का समय भी नहीं मिलेगा। वह तुरंत घटित हो जाएगी।</p>
<p>      तुमने किसी को सम्‍मोहित होते देखा है। जब कोई सम्‍मोहित किया जाता है, तब सम्मोहन विद जो भी कहता है, सम्‍मोहित व्‍यक्‍ति तुरंत उसका पालन करता है। आदेश कितना ही बेहूदा हो तर्कहीन हो असंभव ही क्‍या न हो। सम्‍मोहित व्‍यक्‍ति उसका पालन करता है। क्‍या होता है?</p>
<p>      यह पांचवी विधि सब सम्मोह न की जड़ में है। जब कोई सम्‍मोहित किया  जाता है, तब उसे एक विशेष बिंदू पर, किसी प्रकाश पर या दीवार पर लगे किसी चिन्‍ह पर या किसी भी चीज पर या सम्‍मोहक की आँख पर ही अपनी दृष्‍टि केंद्रित करने को कहा जाता है। और जब तुम किसी खास बिंदू पर दृष्‍टि केंद्रित करते हो, उसके तीन मिनट के अंदर तुम्‍हारा आंतरिक अवधान तीसरी आँख की और बहने लगता है। तुम्‍हारे चेहरे की मुद्रा बदलने लगती है। और सम्‍मोहन विद जानता है कि कब तुम्‍हारा चेहरा बदलने लगा। एकाएक चेहरे से सारी शक्‍ति गायब हो जाती है। वह मृत वत हो जाता है। मानों गहरी तंद्रा में पड़े हो। जब ऐसा होता है, सम्‍मोहक को उसका पता हो जाता है। उसका अर्थ हुआ कि तीसरी आँख अवधान को पी रही है। आपका चेहरा पीला पड़ गया है। पूरी ऊर्जा त्रिनेत्र केंद्र की और बह रही है।</p>
<p>      अब सम्मोहित करने वाला तुरंत जान जाता है। कि जो भी कहा जाएगा। वह घटित होगा। वह कहता है कि अब तुम गहरी नींद में जा रहे हो, और तुम तुरंत सो जाते हो। वह कहता है कि अब तुम बेहोश हो रहे हो और तुम बेहोश हो जाते हो। अब कुछ भी किया जा सकता है। अब अगर वह कहे कि तुम नेपोलियन या हिटलर हो गए हो तो तुम हो जाओगे। तुम्‍हारी मुद्रा बदल जायेगी। आदेश पाकर तुम्‍हारा अचेतन उसका वास्‍तविक बना देता है। अगर तुम किसी रोग से पीडित हो तो रोग को हटने का आदेश देगा, और मजेदार बात रोग दूर हो जायेगा। या कोई नया रोग भी पैदा किया जा सकता है।</p>
<p>      यही नहीं, सड़क पर से एक कंकड़ उठा कर अगर सम्मोहन विद तुम्‍हारी हथेली पर रख दे  और कहे कि यह अंगारा है तो तुम तेज गर्मी महसूस करोगे और तुम्‍हारी हथेली जल जाएगी—मानसिक तल पर नहीं, वास्‍तव में ही। वास्‍तव में तुम्‍हारी चमड़ी जब लायेगी और तुम्‍हें जलन महसूस होगी। क्‍या होता है? अंगारा नहीं, बस एक मामूली कंकड़ है वह भी ठंडा, फिर भी जलना ही नहीं हाथ पर फफोले तक उगा देता है।</p>
<p>      तुम तीसरी आँख पर केंद्रित हो और सम्मोहन विद तुमको सुझाव देता है और वह सुझाव वास्‍तविक हो जाता है। यदि सम्मोहन विद कहे कि अब तुम मर गए, तो तुम तुरंत मर जाओगे। तुम्‍हारी ह्रदय गति रूक जायेगी। रूक ही जाएगी।</p>
<p>      यह होता है त्रिनेत्र के चलते। त्रिनेत्र के लिए कल्‍पना और वास्‍तविकता दो चीजें नहीं है। कल्‍पना ही तथ्‍य है। कल्‍पना करें और वैसा ही जाएगा। स्‍वप्‍न और यथार्थ में फासला नहीं है। स्‍वप्‍न देखो और सच हो जायेगा।</p>
<p>      यही कारण है कि शंकर ने कहा कि यह संसार परमात्‍मा के स्‍वप्‍न के सिवाय और कुछ नहीं है—यह परमात्‍मा की माया है। यह इसलिए कि परमात्‍मा तीसरी आँख में बसता है—सदा, सनातन से। इसलिए परमात्‍मा जी स्‍वप्‍न देखता है वह सच हो जाता है। और यदि तुम भी तीसरी आँख में थिर हो जाओ तो तुम्‍हारे स्‍वप्‍न भी सच होने लगेंगे।</p>
<p>      सारिपुत्र बुद्ध के पास आया। उसने गहरा धान किया। तब बहुत चीजें घटित होने लगीं, बहुत तरह के दृश्‍य उसे दिखाई देने लगे। जो भी ध्‍यान की गहराई में जाता है। उसे यह सब दिखाई देने लगता है। स्‍वर्ग और नरक; देवता और दानव, सब उसे दिखाई देने लगे। और वह ऐसे वास्‍तविक थे कि सारिपुत्र बुद्ध के पास दौड़ा आया। और बोला कि ऐसे-ऐसे दृश्‍य दिखाई देते है। बुद्ध ने कहा, वे कुछ नहीं है। मात्र स्‍वप्‍न है।</p>
<p>      लेकिन सारिपुत्र ने कहा कि वे इतने वास्‍तविक है कि मैं कैसे उन्‍हें स्‍वप्‍न कहूं? जब एक फूल दिखाई पड़ता है, वह फूल किसी भी फूल से अधिक वास्‍तविक मालूम पड़ता है। उसमे सुगंध है। उसे मैं छू सकता हूं। अभी जो मैं आपको देखता हूं वह उतना वास्‍तविक नहीं है; आप जितना वास्‍तविक मेरे सामने है, वह फूल उससे अधिक वास्‍तविक है। इसलिए कैसे मैं भेद करूं कि कौन सच है, और कौन स्‍वप्‍न।</p>
<p>      बुद्ध ने कहा, अब चूंकि तुम तीसरी आँख में केंद्रित हो, इसलिए स्‍वप्‍न और यथार्थ एक हो गए है। जो भी स्‍वप्‍न तुम देखोगें सच हो जाएगा।</p>
<p>      और उससे ठीक उलटा भी घटित हो सकता है। जो त्रिनेत्र पर थिर हो गया, उसके लिए स्‍वप्‍न यथार्थ हो जाएगा। और यथार्थ स्‍वप्‍न हो जाएगा। क्‍योंकि जब तुम्‍हारा स्‍वप्‍न सच हो जाता है तब तुम जानते हो कि स्‍वप्‍न और यथार्थ में बुनियादी भेद नहीं है।</p>
<p>      इसलिए जब शंकर कहते है कि सब संसार माया है, परमात्‍मा का स्‍वप्‍न है, तब यह कोई सैद्धांतिक प्रस्‍तावना या कोई मीमांसक वक्‍तव्‍य नहीं है। यह उस व्‍यक्‍ति का आंतरिक अनुभव है जो शिवनेत्र में थिर हो गया है।</p>
<p>      अंत: जब तुम तीसरे नेत्र पर केंद्रित हो जाओ तब कल्‍पना करो कि सहस्‍त्रार से प्राण बरस रहा है; जैसे कि तुम किसी वृक्ष के नीचे बैठे हो और फूल बरस रहे है, या तुम आकाश के नीचे हो और कोई बदली बरसने लगी। या सुबह तुम बैठे हो और सूरज उग रहा है और उसकी किरणें बरसने लगी है। कल्‍पना करो और तुरंत तुम्‍हारे सहस्‍त्रार से प्रकाश की वर्षा होने लगेगी। यह वर्षा मनुष्‍य को पुनर्निर्मित करती है, उसका नया जन्‍म दे जाती है। तब उसका पुनर्जन्‍म हो जाता है।</p>
<p><strong> ओशो</p>
<p>विज्ञान भैरव तंत्र</p>
<p>(तंत्र-सूत्र—भाग-1)</p>
<p>प्रवचन-5</strong></p>
<br />Filed under: <a href='http://oshosatsang.org/category/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%ad%e0%a5%88%e0%a4%b0%e0%a4%b5-%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%97-1/'>विज्ञान भैरव तंत्र--भाग-1</a> Tagged: <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/'>ओशो</a>, <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6/'>स्‍वामी आनंद प्रसाद</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/oshosatsang.wordpress.com/4588/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/oshosatsang.wordpress.com/4588/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/oshosatsang.wordpress.com/4588/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/oshosatsang.wordpress.com/4588/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/oshosatsang.wordpress.com/4588/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/oshosatsang.wordpress.com/4588/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/oshosatsang.wordpress.com/4588/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/oshosatsang.wordpress.com/4588/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/oshosatsang.wordpress.com/4588/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/oshosatsang.wordpress.com/4588/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/oshosatsang.wordpress.com/4588/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/oshosatsang.wordpress.com/4588/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/oshosatsang.wordpress.com/4588/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/oshosatsang.wordpress.com/4588/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&#038;blog=12293864&#038;post=4588&#038;subd=oshosatsang&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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			<media:title type="html">Shira तंत्र-सूत्र—विधि-05 (विज्ञान भैरव तंत्र--ओशो)</media:title>
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		<title>तंत्र-सूत्र—विधि—04</title>
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		<pubDate>Sat, 19 May 2012 12:09:18 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[विज्ञान भैरव तंत्र--भाग-1]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

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		<description><![CDATA[या जब श्‍वास पूरी तरह बाहर गई है और स्‍वय: ठहरी है, या पूरी तरह भीतर आई है और ठहरी है—ऐसे जागतिक विराम के क्षण में व्‍यक्‍ति का क्षुद्र अहंकार विसर्जित हो जाता है। केवल अशुद्ध के लिए यह कठिन &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/05/19/%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a5%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a7%e0%a4%bf-04/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&#038;blog=12293864&#038;post=4585&#038;subd=oshosatsang&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>या जब श्‍वास पूरी तरह बाहर गई है और स्‍वय: ठहरी है, या पूरी तरह भीतर आई है और ठहरी है—ऐसे जागतिक विराम के क्षण में व्‍यक्‍ति का क्षुद्र अहंकार विसर्जित हो जाता है। केवल अशुद्ध के लिए यह कठिन है।</strong><div id="attachment_4586" class="wp-caption alignright" style="width: 235px"><a href="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/05/shiva-parvati-dm90_l.jpg"><img src="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/05/shiva-parvati-dm90_l.jpg?w=225&h=300" alt="shiva-parvati-तंत्र-सूत्र—विधि—04 ओशो" title="shiva-parvati-तंत्र-सूत्र—विधि—04 ओशो" width="225" height="300" class="size-medium wp-image-4586" /></a><p class="wp-caption-text">shiva-parvati-तंत्र-सूत्र—विधि—04 ओशो</p></div></p>
<p>    लेकिन तब तो यह विधि सब के लिए कठिन है, क्‍योंकि शिव कहते है कि ‘’केवल अशुद्ध के लिए कठिन है।‘’</p>
<p>      लेकिन कौन शुद्ध है? तुम्‍हारे लिए यह कठिन है; तुम इसका अभ्‍यास नहीं कर सकते। लेकिन कभी अचानक इसका अनुभव तुम्‍हें हो सकता है। तुम कार चला रहे हो और अचानक तुम्‍हें लगता है कि दुर्धटना होने जा रही है। श्‍वास बंद हो जाएगी। अगर वह बाहर है तो बाहर ही रह जाएगी। और भी अगर वह भीतर है तो वह भीतर ही रह जायेगी। ऐसे संकट काल में तुम श्‍वास नहीं ले सकते: तुम्‍हारे बस में नहीं है। सब कुछ ठहर जाता है। विदा हो जाता है।<span id="more-4585"></span></p>
<p>      ‘’या जब श्‍वास पूरी तरह बाहर गई है और स्‍वत: ठहरी है, या पूरी तरह भीतर आई है और ठहरी है—ऐसे जागतिक विराम के क्षण में व्‍यक्‍ति का क्षुद्र अहंकार विसर्जित हो जाता है।‘’</p>
<p>      तुम्‍हारा क्षुद्र अहंकार दैनिक उपयोगिता की चीज है। संकट</p>
<p>की घड़ी में तुम उसे नहीं याद रख सकते। तुम जो भी हो, नाम बैंक बैलेंस, प्रतिष्‍ठा, सब काफूर हो जाता है। तुम्‍हारी कार दूसरी कार से टकराने जा रही है। एक क्षण, और मृत्‍यु हो जाएगी। इस क्षण में एक विराम होगा, अशुद्ध के लिए भी विराम होगा। ऐसे क्षण में अचानक श्‍वास बंद हो जाती है। और उस क्षण में अगर तुम बोधपूर्ण हो सके तो तुम उपलब्‍ध हो जाओगे।</p>
<p>      जापान में झेन संतों ने इस विधि का बहुत उपयोग किया। इसीलिए उनके उपाय अनूठे है। बेतुके और चकित करने वाले होते है। उन्‍होंने बहुत से ऐसे काम किए है जिन्‍हें तुम सोच भी नहीं सकते। एक गुरु किसी को घर के बाहर फेंक देगा। अचानक और अकारण गुरु शिष्‍य को चांटा मारने लग जायेगा। तुम गुरु के साथ बैठे थे। और अभी तक सब कुछ ठीक था। तुम गपशप कर रहे थे। और वह तुम्‍हें मारने लगा ताकि विराम पैदा हो।</p>
<p>      अगर गुरु सकारण ऐसा करे तो विराम नहीं पैदा होगा। अगर तुमने गुरु को गाली दी होती और गुरु तुम्‍हें पीटता तो पीटना सकारण होता है। तुम्‍हारा मन समझ जाता कि मेरी गाली के लिए मुझे मार लगी। असल में तुम्‍हारा मन उसकी अपेक्षा करता। इसलिए विराम नहीं पैदा होगा। लेकिन याद रहे, झेन गुरु गाली देने पर तुम्‍हें नहीं मारेगा। वह हंसेगा, क्‍योंकि तब हंसी विराम पैदा कर सकती है। तुम गाली दे रहे थे, अनाप-शनाप बक रहे थे, और क्रोध का इंतजार कर रहे थे। लेकिन गुरु हंसना या नाचना गुरु कर देता है। यह अचानक है और इससे विराम पैदा होगा। तुम उसे नहीं समझ पाओगे। और अगर नहीं समझ सके तो मन ठहर जाएगा। और जब मन ठहरता है तो श्‍वास भी ठहर जाती है।</p>
<p>      दोनों ढंग से घटना घटती है। अगर श्‍वास रूक जाती है। या अगर मन रुकता है तो श्‍वास रूक जाती है। तुम गुरु की प्रशंसा कर रहे थे, तुम अच्‍छी मुद्रा में थे और सोचते थे कि गुरु प्रसन्‍न ही होगा। और गुरु अचानक डंडा उठा लेता है और तुम्‍हें मारने लगता है, वह भी बेरहमी से, क्‍योंकि झेन गुरु बेरहम होते है। वह तुम्‍हें पीटने लगता है और तुम समझ नहीं पाते हो कि क्‍या हो रहा है। उस क्षण मन ठहर जाता है, विराम घटित होता है। और अगर तुम्‍हें विधि मालूम है तो तुम आत्‍मोपलब्‍ध हो सकते हो।</p>
<p>      अनेक कथाएं है कि कोई बुद्धत्‍व को उपलब्‍ध हो गया जब गुरू अचानक उसे मारने लगा था। तुम नहीं समझोगे। क्‍या नासमझी है। किसी से पीटने पर या खिड़की से बाहर फेंक दिए जाने पर कोई बुद्धत्‍व को कैसे उपलब्‍ध हो सकता है। अगर तुम्‍हें कोई मार भी डाले तो भी तुम बुद्धत्‍व को उपलब्‍ध नहीं हो सकते। लेकिन अगर इस विधि को तुम समझते हो तो इस तरह की घटनाओं को समझना आसान होगा।</p>
<p>      पश्‍चिम में पिछले तीस-चालीस वर्षों के दरम्‍यान झेन बहुत फैला है। फैशन की तरह। लेकिन जब तक वे इस विधि को नहीं जानेंगे, वे झेन को नहीं समझ सकते है। वह इसका अनुकरण कर सकते है, लेकिन अनुकरण किसी काम का नहीं होता है। बल्‍कि वह खतरनाक है। यह चीज अनुकरण करने की नहीं है।</p>
<p>      समूची झेन विधि शिव की चौथी विधि पर आधारित है। लेकिन कैसे दुर्भाग्‍य कि अब हमें जापान से झेन का आयात करना होगा; क्‍योंकि हमने पूरी परंपरा खो दी है। हम उसे नहीं जानते। शिव इस विधि के बेजोड़ विशेषज्ञ थे। जब वे अपनी बरात लेकर देवी को ब्याहने पहुंचे थे, समूचे नगर       ने विराम अनुभव किया होगा।</p>
<p>      देवी के पिता अपनी बेटी को इस हिप्‍पी के साथ ब्‍याहने को बिलकुल राज़ी नहीं थे। शिव मौलिक हिप्‍पी थे। देवी के पिता उनके बिलकुल खिलाफ थे। कोई भी पिता ऐसे विवाह की अनुमति नहीं दे सकता है। इसलिए हम देवी के पिता के खिलाफ कुछ नहीं कह सकते। कौन पिता शिव से विवाह की अनुमति देगा? और तब देवी हठ कर बैठी। और उन्‍हें अनिच्‍छा से , खेद पूर्वक अनुमति देनी पड़ी।</p>
<p>      और फिर बरात आई। कहा जाता है कि शिव और उनकी बरात देखकर लोग भागने लगे। समूची बराम मानो एल. एस. डी. मारीजुआना, भाँग और गांजा जैसी चीजें खाकर आये थे। लोग नशे में चूर थे। सच तो यह है कि एल. एस. डी. और मारीजुआना आरंभिक चीजें है। शिव और उनके दोस्‍तों और शिष्‍यों को उस परम मनोमद्य का पता था जिसे वह सोमरस कहते थे। अल्डुअस हक्‍सले ने शिव के कारण‍ ही परम मनोमद्य को सोमा नाम दिया है। वे मतवाले थे, नाचते थे, गाते थे, चीखते-चिल्‍लाते थे। समूचा नगर भाग खड़ा हुआ। अवश्‍य ही विराम का अनुभव हुआ होगा।</p>
<p>      अशुद्ध के लिए कोई भी आकस्‍मिक, अप्रत्‍याशित, अविश्वसनीय चीज विराम पैदा कर सकती है। लेकिन शुद्ध के लिए ऐसी चीजों की जरूरत नहीं है। शुद्ध के लिए तो हमेशा विराम उपलब्‍ध है। विराम ही विराम है। कई बार शुद्ध चित के लिए श्‍वास अपने आप ही रूक जाती है। अगर तुम्‍हारा चित शुद्ध है—शुद्ध का अर्थ। है कि तुम किसी चीज की चाहना नहीं करते, किसी के पीछे भागते नहीं—मौन और शुद्ध है, सरल और शुद्ध है, तो तुम बैठे रहोगे और अचानक तुम्‍हारी श्‍वास रूक जाएगी।</p>
<p>      याद रखो कि मन की गति के लिए श्‍वास की गति आवश्‍यक है; मन के तेज चलने के लिए श्‍वास का तेज चलना आवश्‍यक है। यही कारण है कि जब तुम क्रोध में होते हो तो तुम्‍हारी श्‍वास तेज चलती है। और यही कारण है कि आयुर्वेद में कहा गया है कि मैथुन अतिशय होगा तो तुम्‍हारी आयु कम हो जायेगी। आयुर्वेद श्‍वास से आयु का हिसाब रखता है। अगर तुम्‍हारी श्‍वास-क्रिया बहुत तीव्र है तो तुम चिरायु नहीं हो सकते।</p>
<p>      आधुनिक चिकित्‍सा कहती है कि काम भोग रक्‍त प्रवाह में और विश्राम में जाने में सहयोगी होता है। और जो लोग कामवासना का दमन करते है, वे मुसीबत में पड़ते है। खासकर ह्रदय रोग के शिकार होते है।</p>
<p>      आधुनिक चिकित्‍सा ठीक कहती है। अपनी-अपनी जगह आयुर्वेद भी सही है और आधुनिक चिकित्‍सा भी; यद्यपि दोनों परस्‍पर विरोधी मालूम होते है।</p>
<p>      आयुर्वेद का आविष्‍कार आज से पाँच हजार साल पहल हुआ था। तब आदमी काफी श्रम करता था; जीवन ही श्रम था। इसलिए विश्राम की जरूरत नहीं थी। और रक्‍त प्रवाह के लिए कृत्रिम उपायों की भी जरूरत नहीं थी। लेकिन अब जिन लोगों को बहुत शारीरिक श्रम नहीं करना पड़ता है उनके लिए काम भोग ही श्रम है।</p>
<p>      इसलिए आधुनिक आदमी के बाबत आधुनिक चिकित्‍सा सही है। वह शारीरिक श्रम नहीं करता है, उनके लिए काम भोग श्रम है। काम मे उसकी ह्रदय की धड़कन तेज हो जाती है, उसका रक्‍त प्रवाह बढ़ जाता है और उसकी श्‍वास क्रिया गहरी होकर केंद्र तक पहुंच जाती है। इसलिए संभोग के बाद तुम शिथिल अनुभव करते हो और आसानी से नींद में उतर जाते हो। फ्रायड कहता है कि संभोग सबसे बढ़िया नींद की दवा है। ट्रैंक्विलाइजर है। और आधुनिक आदमी के लिए फ्रायड सही भी है।</p>
<p>      काम भोग में क्रोध में श्‍वास क्रिया तेज हो जाती है। काम भोग में मन वासना से, लोग से अशुद्धियों से भरा होता है। जब मन शुद्ध होता है, मन में कोई वासना नहीं होती है, कोई चाह, कोई दौड़ कोई प्रयोजन नहीं होता है, तुम कहीं जा नहीं रहे होते हो, तुम निर्दोष जलाशय की तरह अभी और यहीं ठहरे हुए होते हो, कोई लहर भी नहीं होती है। तब श्‍वास अपने आप ही ठहर जाती है—अकारण।</p>
<p>      इस मार्ग पर क्षुद्र अहंकार विसर्जित हो जाता है। और तुम उच्‍चात्‍मा को, परमात्‍मा को उपलब्‍ध हो जाते हो।</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>विज्ञान भैरव तंत्र</p>
<p>(तंत्र-सूत्र—भाग-1)</p>
<p>प्रवचन-2</strong></p>
<br />Filed under: <a href='http://oshosatsang.org/category/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%ad%e0%a5%88%e0%a4%b0%e0%a4%b5-%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%97-1/'>विज्ञान भैरव तंत्र--भाग-1</a> Tagged: <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/'>ओशो</a>, <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6/'>स्‍वामी आनंद प्रसाद</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/oshosatsang.wordpress.com/4585/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/oshosatsang.wordpress.com/4585/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/oshosatsang.wordpress.com/4585/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/oshosatsang.wordpress.com/4585/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/oshosatsang.wordpress.com/4585/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/oshosatsang.wordpress.com/4585/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/oshosatsang.wordpress.com/4585/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/oshosatsang.wordpress.com/4585/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/oshosatsang.wordpress.com/4585/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/oshosatsang.wordpress.com/4585/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/oshosatsang.wordpress.com/4585/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/oshosatsang.wordpress.com/4585/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/oshosatsang.wordpress.com/4585/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/oshosatsang.wordpress.com/4585/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&#038;blog=12293864&#038;post=4585&#038;subd=oshosatsang&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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			<media:title type="html">shiva-parvati-तंत्र-सूत्र—विधि—04 ओशो</media:title>
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		<title>तंत्र-सूत्र—विधि—03</title>
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		<pubDate>Sat, 19 May 2012 00:38:20 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[विज्ञान भैरव तंत्र--भाग-1]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

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		<description><![CDATA[या जब कभी अंत: श्वास और बहिर्श्‍वास एक दूसरे में विलीन होती है, उस क्षण में ऊर्जारहित, ऊर्जापूरित केंद्र को स्‍पर्श करो। हम केंद्र और परिधि में विभाजित है। शरीर परिधि है। हम शरीर को, परिधि को जानते है। लेकिन &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/05/19/%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a5%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a7%e0%a4%bf-03/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&#038;blog=12293864&#038;post=4581&#038;subd=oshosatsang&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>या जब कभी अंत: श्वास और बहिर्श्‍वास एक दूसरे में  विलीन होती है, उस क्षण में ऊर्जारहित, ऊर्जापूरित केंद्र को स्‍पर्श करो।</strong><div id="attachment_4582" class="wp-caption alignright" style="width: 310px"><a href="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/05/3346524372_38eeac5bf9.jpg"><img src="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/05/3346524372_38eeac5bf9.jpg?w=300&h=220" alt="विज्ञान भैरव तंत्र--ध्‍यान विधि--03--ओशो" title="विज्ञान भैरव तंत्र--ध्‍यान विधि--03--ओशो" width="300" height="220" class="size-medium wp-image-4582" /></a><p class="wp-caption-text">विज्ञान भैरव तंत्र&#8211;ध्‍यान विधि&#8211;03&#8211;ओशो</p></div></p>
<p>    हम केंद्र और परिधि में विभाजित है। शरीर परिधि है। हम शरीर को, परिधि को जानते है। लेकिन हम यह नहीं जानते कि कहां केंद्र है। जब बहिर्श्‍वास अंत:श्‍वास में विलीन होती है। जब वे एक हो जाती है। जब तुम यह नहीं कह सकते कि यह अंत:श्वास है कि बहिर्श्‍वास, जब यह बताना कठिन हो कि श्‍वास भीतर जा रही है कि बाहर जा रही है। जब श्‍वास भी तर प्रवेश कि बाहर की तरफ मुड़ने लगती है, तभी विलय का क्षण है। तब श्‍वास जाती है और न भीतर आती है। श्‍वास गतिहीन है। जब वह बहार जाती है, गतिमान है, जब वह भीतर आती है, गतिमान है। और जब वह दोनों में कुछ भी नहीं करती है। तब वह मौन है, अचल है। और तब तुम केंद्र के निकट हो। आने वाली और जाने वाली श्‍वासों का यह विलय विंदु तुम्‍हारा केंद्र है।<span id="more-4581"></span></p>
<p>      इसे इस तरह देखो। जब श्‍वास भीतर जाती है तो कहां जाती है? वह तुम्‍हारे केंद्र को जाती है। और जब वह बाहर जाती है तो कहां जाती है? केंद्र से बाहर जाती है। इसी केंद्र को स्‍पर्श करना है। यही कारण हे कि ताओ वादी संत और झेन संत कहते है कि सिर तुम्‍हारा केंद्र नहीं है, नाभि तुम्‍हारा केंद्र है। श्‍वास नाभि-केंद्र को जाती है, फिर वहां से लौटती है, फिर उसकी यात्रा करती है।</p>
<p>      जैसा मैंने कहा, श्‍वास तुम्‍हारे और तुम्‍हारे शरीर के बीच सेतु है। तुम शरीर को तो जानते हो, लेकिन यह नहीं जानते कि केंद्र कहां है। श्‍वास निरंतर केंद्र को जा रही है। और वहां से लौट रही है। लेकिन हम पर्याप्‍त श्‍वास नहीं लेते है। इस कारण से साधारण: वह केंद्र तक नहीं पहुंच पाती है। खासकर आधुनिक समय में तो वह केंद्र तक नहीं जाती। और नतीजा यह है कि हरेक व्‍यक्‍ति विकेंद्रित अनुभव करता है। अपने को केंद्र से च्‍यूत महसूस करता है। पूरे आधुनिक संसार में जो लोग भी थोड़ा सोच-विचार करते है। वे महसूस करते है कि उनका केंद्र खो गया है।</p>
<p>      एक सोए हुए बच्‍चे को देखो, उसकी श्‍वास का निरीक्षण करो। जब उसकी श्‍वास भीतर जाती है तो उसका पेट ऊपर उठता है। उसकी छाती अप्रभावित रहती है। यही वजह है कि बच्‍चों के छाती नहीं होती। उनके केवल पेट होते है। जीवंत पेट। श्‍वास प्रश्‍वास के साथ उनका पेट ऊपर नीचे होता है। उनका पेट ऊपर-नीचे होता है और बच्‍चे अपने केंद्र पर होते है, केंद्र में होते है, और यही कारण है कि बच्चे इतने सुखी है, इतने आनंदमग्‍न है। इतनी ऊर्जा से भरे है कि कभी थकते नहीं और ओवर फ्लोइंग है। वे सदा वर्तमान क्षण में होते है। न उनका अतीत है न भविष्‍य।</p>
<p>      एक बच्‍चा क्रोध कर सकता है। जब वह क्रोध करता है तो समग्रता से क्रोध करता है। वह क्रोध ही हो जाता है। और तब उसका क्रोध भी कितना सुंदर लगता है। जब कोई समग्रता से क्रोध ही हो जाता है। तो उसके क्रोध का भी अपना सौंदर्य है। क्‍योंकि समग्रता सदा सुंदर होती है।</p>
<p>      तुम क्रोधी और सुंदर नहीं हो सकते। क्रोध में तुम कुरूप लगोगे। क्‍योंकि खंड सदा कुरूप होता है। क्रोध के साथ ही ऐसा नहीं है। तुम प्रेम भी करते हो तो कुरूप लगते हो। क्‍योंकि उसमे भी तुम खंडित हो, बंटे-बंटे हो। जब तुम किसी को प्रेम कर रहे हो, जब तुम संभोग में उतर रहे हो तो अपने चेहरे को देखो। आईने के सामने प्रेम करो और अपना चेहरा देखो। वह कुरूप और पशुवत होगा।</p>
<p>      प्रेम में भी तुम्‍हारा रूप कुरूप हो जाता है। क्‍यों? तुम्‍हारे प्रेम में भी द्वंद्व है, तुम कुछ बचाकर रख रहे हो, कुछ रोक रहे हो; तुम बहुत कंजूसी से दे रहे हो। तुम अपने प्रेम में भी समग्र नहीं हो। तुम समग्रता से, पूरे-पूरे दे भी नहीं पाते।</p>
<p>      और बच्‍चा क्रोध और हिंसा से भी समग्र होता है। उसका मुखड़ा दीप्‍त और सुंदर हो उठता है। वह यहां और अभी होता है। उसके क्रोध का न किसी अतीत से कुछ लेना-देना है और न किसी भविष्‍य से; वह हिसाब नहीं रखता है। वह मात्र क्रुद्ध है। बच्‍चा अपने केंद्र पर है। और जब तुम केंद्र पर होते हो तो सदा समग्र होते हो। तब तुम तो कुछ करते हो वह समग्र होता है। भला या बुरा, वह समग्र होता है। और जब खंडित होते हो, केंद्र से च्‍युत होते हो तो तुम्‍हारा हरेक काम भी खंडित होता है। क्‍योंकि उसमे तुम्‍हारा खंड ही होता है। उसमे तुम्‍हारा समग्र संवेदित नहीं होता है। खंड समग्र के खिलाफ जाता है। और वही कुरूपता पैदा करता है।</p>
<p>      कभी हम सब बच्‍चो थे। क्‍या बात है कि जैसे-जैसे हम बड़े होते है हमारी श्‍वास क्रिया उथली हो जाती है। तब श्‍वास पेट तक कभी नहीं जाती है, नाभि केंद्र को नहीं छूती है। अगर वह ज्‍यादा से ज्‍यादा नीचे जाएगी तो वह कम से कम उथली रहेगी। लेकिन वि तो सीने को छूकर लौट आती है। वह केंद्र तक नहीं जाती है। तुम केंद्र से डरते हो, क्‍योंकि केंद्र पर जाने से तुम समग्र हो जाओगे। अगर तुम खंडित रहना चाहो तो खंडित रहने की यही प्रक्रिया है।</p>
<p>      तुम प्रेम करते हो, अगर तुम केंद्र से श्‍वास लो तो तुम प्रेम में पूरे बहोगे। तुम डरे हुए हो। तुम दूसरे के प्रति, किसी के भी प्रति खुल होने से, असुरक्षित और संवेदनशील होने से डरते हो। तुम उसे अपना प्रेमी कहो कि प्रेमिका कहो, तुम डरे हुए हो। वह दूसरा है, और अगर तुम पूरी तरह खुले हो, असुरक्षित हो तो तुम नहीं जानते कि क्‍या होने जा रहा है। तब तुम हो, समग्रता से हो—दूसरे अर्थों में। तुम पूरी तरह दूसरे में खो जाने से डरते हो। इसलिए तुम गहरी श्‍वास नहीं ले सकते। तुम अपनी श्‍वास को शिथिल और ढीला नहीं कर सकते हो। क्‍योंकि वह केंद्र तक चली जायेगी। क्‍योंकि जिस क्षण श्‍वास केंद्र पर पहुँचेगी, तुम्‍हारा कृत्‍य अधिकाधिक समग्र होने लगेगा।</p>
<p>      क्‍योंकि तुम समग्र होने से डरते हो, तुम उथली श्‍वास लेते हो। तुम अल्‍पतम श्‍वास लेते हो। अधिकतम नहीं। यही कारण है कि जीवन इतना जीवनहीन लगता है। अगर तुम न्‍यूनतम श्‍वास लोगे तो जीवन जीवनहीन ही होगा। तुम जीते भी न्‍यूनतम हो, अधिकतम नहीं। तुम अधिकतम जियो तो जीवन अतिशय हो जाए। लेकिन तब कठिनाई होगी। यदि जीवन अतिशय हो तो तुम न पति हो सकते हो और न पत्‍नी। सब कुछ कठिन हो जाएगी। अगर जीवन अतिशय हो तो प्रेम अतिशय होगा। तब तुम एक से ही बंधे नहीं रह सकते। तब तुम सब तरफ प्रवाहित होने लगोगे। सभी आयाम में तुम भर जाओगे। और उस हालत में मन खतरा महसूस करता है; इसलिए जीवित ही नहीं रहना उसे मंजूर है।</p>
<p>      तुम जितने मृत होगें उतने सुरक्षित होगें। जितने मृत होगें उतना ही सब कुछ नियंत्रण में होगा। तुम नियंत्रण करते हो तो तुम मालिक हो, क्‍योंकि नियंत्रण करते हो इसलिए अपने को मालिक समझते हो। तुम अपने क्रोध पर, अपने प्रेम पर, सब कुछ पर नियंत्रण कर सकते हो। लेकिन यह नियंत्रण ऊर्जा के न्‍यूनतम तक पर ही संभव है।</p>
<p>      कभी न कभी हर आदमी ने यह अनुभव किया है कि वह अचानक न्‍यूनतम से अधिकतम तल पर पहुंच गया। तुम किसी पहाड़ पर चले जाओ। अचानक तुम शहर से, उसकी कैद से बाहर हो जाओ। अब तुम मुक्‍त हो। विराट आकाश है, हरा जंगल है, बादलों को छूता शिखर है। अचानक तुम गहरी श्‍वास लेते हो। हो सकता है, उस पर तुम्‍हारा ध्‍यान न को छूता शिखर है। अचानक तुम गहरी श्‍वास लेते हो। हो सकता है, उस पर तुम्‍हारा ध्‍यान न गया हो। अब जब पहाड़ जाओ तो इसका ख्‍याल रखना। केवल पहाड़ के कारण बदलाहट नहीं मालूम होती, श्‍वास के कारण मालूम होती है। तुम गहरी श्‍वास लेते हो और कहते हो, अहा, तुमने केंद्र छू लिया, क्षण भर के लिए तुम समग्र हो गए। और सब कुछ आनंदपूर्ण है। वह आनंद पहाड़ से नहीं, तुम्‍हारे केंद्र से आ रहा है। तुमने अचानक उसे छू जो लिया।</p>
<p>      शहर में तुम भयभीत थे। सर्वत्र दूसरा मौजूद था और तुम अपने को काबू में किए रहते थे। न रो सकते थे, न हंस सकते थे। कैसे दुर्भाग्‍य, तुम सड़क पर गा नहीं सकते थे। नाच नहीं सकते थे। तुम डरे-डरे थे। कहीं सिपाही खड़ा था, कहीं पुरोहित, कहीं जज खड़ा था। कहीं राजनीतिज्ञ, कहीं नीतिवादी। कोई न कोई था कि तुम नाच नहीं सकते थे।</p>
<p>      बर्ट्रेंड रसेल न कहीं कहा है कि मैं सभ्‍यता से प्रेम करता हूं, लेकिन हमने यह सभ्‍यता भारी कीमत चुका कर हासिल की है।</p>
<p>      तुम सड़क पर नहीं नाच सकते, लेकिन पहाड़ चले जाओ और वहां अचानक नाच सकते हो। तुम आकाश के साथ अकेले हो और आकाश कारागृह नहीं है। वह खुलता ही जाता है, खुलता ही जाता है। अंनत तक खुलता ही जाता है। एकाएक तुम एक गहरी श्‍वास लेते हो; केंद्र छू जाता है; और तब आनंद ही आनंद है।</p>
<p>      लेकिन वह लंबे समय तक टिकने वाला नहीं है। घंटे दो घंटे में पहाड़ विदा हो जाएगा। तुम वहां रह सकते हो, लेकिन पहाड़ विदा हो जाएगा। तुम्‍हारी चिंताएं लौट आएँगी। तुम शहर देखना चाहोगे, पत्‍नी को पत्र लिखने की सोचोगे या सोचोगे कि तीन दिन बाद वापस जाना है तो उसकी तैयारी शुरू करें। अभी तुम आए हो और जाने की तैयारी होने लगी। फिर तुम वापस आ गए। वह गहरी श्‍वास सच में तुमसे नहीं आई थी। वह अचानक घटित हुई थी, बदली परिस्‍थिति के कारण गियर बदल गया था। नई परिस्‍थिति में तुम पुराने ढंग से श्‍वास नहीं ले सकते थे। इसलिए क्षण भर को एक नयी श्‍वास आ गई, उसने केंद्र छू लिया और तुम आनंदित थे।</p>
<p>      शिव कहते है, तुम प्रत्‍येक क्षण केंद्र को स्‍पर्श कर रहे हो, या यदि नहीं स्‍पर्श कर रहे हो तो कर सकते हो। गहरी, धीमी श्‍वास लो और केंद्र को स्‍पर्श करो। छाती से श्‍वास मत लो। वह एक चाल है; सभ्‍यता, शिक्षा और नैतिकता ने हमें उथली श्‍वास सिखा दी है। केंद्र में गहरे उतरना जरूरी है, अन्‍यथा तुम गहरी श्‍वास नहीं ले सकते।</p>
<p>      जब तक मनुष्‍य समाज कामवासना के प्रति गैर-दमन की दृष्‍टि नहीं अपनाता, तब तक वह सच में श्‍वास नहीं ले सकता। अगर श्‍वास पेट तक गहरी जाए तो वह काम केंद्र को ऊर्जा देती है। वह काम केंद्र को छूती है। उसकी भीतर से मालिश करती है। तब काम-केंद्र अधिक सक्रिय, अधिक जीवंत हो उठता है। और सभ्‍यता कामवासना से भयभीत है।</p>
<p>      हम अपने बच्‍चों को जननेंद्रिय छूने नहीं देते है। हम कहते है, रुको, उन्‍हें छुओ मत। जब बच्‍चा पहली बार जननेंद्रिय छूता है तो उसे देखो; और कहो, रुको; और तब उसकी श्‍वास क्रिया को देखो। जब तुम कहते हो, रुको, जननेंद्रिय मत छुओ। तो उसकी श्‍वास तुरंत उथली हो जायेगी। क्‍योंकि उसका हाथ ही काम केंद्र को नहीं छू रहा। गहरे में उसकी श्‍वास भी उसे छू रही है। अगर श्‍वास उसे छूती रहे तो हाथ को रोकना कठिन है। और अगर हाथ रुकता है तो बुनियादी तौर से जरूरी हो जाता है कि श्‍वास गहरी न होकर उथली रहे।</p>
<p>      हम काम से भयभीत है। शरीर का निचला हिस्‍सा शारीरिक तल पर ही नहीं मूल्‍य के तल पर भी निचला हो गया है। वह निचला कहकर निंदित है। इसलिए गहरी श्‍वास नहीं, उथली श्‍वास लो। दुर्भाग्‍य की बात है कि श्‍वास नीचे को ही जाती है। अगर उपदेशक की चलती तो वह पूरी यंत्र रचना को बदल देता। वह सिर्फ ऊपर की और, सिर में श्‍वास लेने की इजाजत देता। और तब कामवासना बिलकुल अनुभव नहीं होती।</p>
<p>      अगर काम विहीन मनुष्‍य को जन्‍म देना है तो श्‍वास-प्रणाली को बिलकुल बदल देना होगा। तब श्‍वास को सिर में सहस्‍त्रार में भेजना होगा। और वहां से मुंह में वापस लाना होगा। मुंह से सहस्‍त्रार उसका मार्ग होगा। उसे नीचे गहरे में नहीं जाने देना होगा। क्‍योंकि वहां खतरा है। जितने गहरे उतरोगे उतने ही जैविकी के गहरे तलों पर पहुंचोगे। तब तुम केंद्र पर पहुंचोगे। और वह केंद्र काम केंद्र के पास ही है। ठीक भी है, क्‍योंकि काम ही जीवन है।</p>
<p>      इसे इस तरह देखो। श्‍वास ऊपर से नीचे को जाने वाला जीवन है। काम ठीक दूसरी दिशा से नीचे से ऊपर को जाने वाला जीवन है। काम-ऊर्जा बह रही है। और श्‍वास ऊर्जा बह रही है। श्‍वास का रास्‍ता ऊपर शरीर में है और काम का रास्‍ता निम्‍न शरीर में है। और जब श्‍वास और काम मिलते है। जीवन को  जन्‍म देते है। इस लिए अगर तुम काम से डरते हो, तो दोनों के बीच दूरी बनाओ। उन्हें मिलने मत दो। सच तो यह है कि सभ्‍य आदमी बधिया किया हुआ आदमी है। यही कारण है कि हम श्‍वास के संबंध में नह जानते, और हमें यह सूत्र समझना कठिन है।</p>
<p>      शिव कहते है: जब कभी अंत:श्‍वास और बहिर्श्‍वास एक दूसरे में विलीन होती है। उस क्षण में ऊर्जारहित, ऊर्जापूरित केंद्र को स्‍पर्श करों।</p>
<p>      शिव परस्‍पर विरोधी शब्‍दावली का उपयोग करते है। ऊर्जारहित, ऊर्जापूरित। वह ऊर्जारहित है, क्‍योंकि तुम्‍हारे शरीर, तुम्‍हारे मन उसे ऊर्जा नहीं दे सकते। तुम्‍हारे शरीर की ऊर्जा और मन की ऊर्जा वहां नहीं है। इसलिए जहां तक तुम्‍हारे तादात्म्य का संबंध है, वह ऊर्जारहित है। लेकिन वह ऊर्जापूरित है, क्‍योंकि उसे ऊर्जा का जागतिक स्‍त्रोत उपलब्‍ध है।</p>
<p>      तुम्‍हारे शरीर की ऊर्जा को ईंधन है—पेट्रोल जैसी। तुम कुछ खाते-पीते हो उससे ऊर्जा बनती है। खाना पीना बंद कर दो और शरीर मृत हो जाएगा। तुरंत नहीं कम से कम तीन महीने लगेंगे। क्‍योंकि तुम्‍हारे पास पेट्रोल का एक खजाना भी है। तुमने बहुत ऊर्जा जमा की हुई है, जो कम से कम तीन महीने काम दे सकती है। शरीर चलेगा, उसके पास जमा ऊर्जा थी। और किसी आपत्काल में उसका उपयोग हो  सकता है। इसलिए शरीर ऊर्जा-ईंधन ऊर्जा है।</p>
<p>      केंद्र को ईंधन-ऊर्जा नहीं मिलती है। यही कारण है कि शिव उसे ऊर्जारहित कहते है। वह तुम्‍हारे खाने पीने पर निर्भर नहीं है। वह जागतिक स्‍त्रोत से जुड़ा हुआ है, वह जागतिक ऊर्जा है। इसलिए शिव उसे ‘’ऊर्जारहित, ऊर्जापूरित केंद्र कहते है। जिस क्षण तुम उस केंद्र को अनुभव करोगे जहां से श्‍वास जाती-आती है, जहां श्‍वास विलीन होती है, उस क्षण तुम आत्‍मोपलब्‍ध हुए।</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>विज्ञान भैरव तंत्र,</p>
<p>(तंत्र-सूत्र—भाग-1)</p>
<p>प्रवचन-2</strong></p>
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			<media:title type="html">विज्ञान भैरव तंत्र--ध्‍यान विधि--03--ओशो</media:title>
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		<title>तंत्र-सूत्र—विधि—02</title>
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		<pubDate>Fri, 18 May 2012 01:45:42 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[विज्ञान भैरव तंत्र--भाग-1]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

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		<description><![CDATA[जब श्‍वास नीचे से ऊपर की और मुड़ती है, और फिर जब श्‍वास ऊपर से नीचे की और मुड़ती है—इन दो मोड़ों के द्वारा उपलब्‍ध हो। थोड़े फर्क के साथ यह वही विधि है; और अब अंतराल पर न होकर &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/05/18/%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a5%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a7%e0%a4%bf-02/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&#038;blog=12293864&#038;post=4578&#038;subd=oshosatsang&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जब श्‍वास नीचे से ऊपर की और मुड़ती है, और फिर जब श्‍वास ऊपर से नीचे की और मुड़ती है—इन दो मोड़ों के द्वारा उपलब्‍ध हो।</strong><div id="attachment_4579" class="wp-caption alignright" style="width: 238px"><a href="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/05/thumbnail.jpg"><img src="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/05/thumbnail.jpg?w=640" alt="तंत्र-सूत्र—विधि—02 ( ओशो)" title="तंत्र-सूत्र—विधि—02 ( ओशो)"   class="size-full wp-image-4579" /></a><p class="wp-caption-text">विज्ञान भैरव तंत्र ;;;;तंत्र-सूत्र—विधि—02 ( ओशो)</p></div></p>
<p>     थोड़े फर्क के साथ यह वही विधि है; और अब अंतराल पर न होकर मोड़ पर है। बाहर जाने वाली और अंदर जाने वाली श्‍वास एक वर्तुल बनाती है। याद रहे, वे समांतर रेखाओं की तरह नहीं है। हम सदा सोचते है कि आने वाली श्‍वास और जाने वाली श्‍वास दो समांतर रेखाओं की तरह है। मगर वे ऐसी है नहीं। भीतर आने वाली श्‍वास आधा वर्तुल बनाती है। और शेष आधा वर्तुल बाहर जाने वाली श्‍वास बनाती है।<span id="more-4578"></span></p>
<p>     इसलिए पहले यह समझ लो कि श्‍वास और प्रश्‍वास मिलकर एक वर्तुल बनाती है। और वे समांतर रेखाएं नहीं है; क्‍योंकि समांतर रेखाएं कही नहीं मिलती है। दूसरी यह कि आने वाली और जाने वाली श्‍वास दो नहीं है। वे एक है। वही श्‍वास भीतर आती है, बहार भी जाती है। इसलिए भीतर उसका कोई मोड़ अवश्‍य होगा। वह कहीं जरूर मुड़ती होगी। कोई बिंदु होगा, जहां आने वाली श्‍वास जाने वाली श्‍वास बन जाती होगी।</p>
<p>     लेकिन मोड़ पर इतना जोर क्‍यों है?</p>
<p>     क्‍योंकि शिव कहते है, ‘’जब श्‍वास नीचे से ऊपर की और मुड़ती है, और फिर जब श्‍वास ऊपर से नीचे की और मुड़ती है—इन दो मोड़ों के द्वारा उपलब्‍ध हो।‘’</p>
<p>     बहुत सरल है। लेकिन शिव कहते है कि मोड़ों को प्राप्‍त कर लो। और आत्‍मा को उपलब्‍ध हो जाओगे। लेकिन मोड़ क्‍यों?</p>
<p>          अगर तुम कार चलाना जानते हो तो तुम्‍हें गियर का पता होगा। हर गियर बदलते हो तो तुम्‍हें न्‍यूट्रल गियर से गुजरना पड़ता है जो कि गियर बिलकुल नहीं है। तुम पहले गियर से दूसरे गियर में जाते हो और दूसरे से तीसरे गियर में। लेकिन सदा तुम्‍हें न्‍यूट्रल गियर से होकर जाना पड़ता है। वह न्‍यूट्रल गियर घुमाव का बिंदु है। मोड़ है। उस मोड़ पर पहला गियर दूसरा गियर बन जाता है। और दूसरा तीसर बन जाता है।</p>
<p>     वैसे ही जब तुम्‍हारी श्‍वास भीतर जाती है और घूमने लगती है तो उस वक्‍त वह न्‍यूट्रल गियर में होती है। नहीं तो वह नहीं धूम सकती। उसे तटस्‍थ क्षेत्र से गुजरना पड़ता है।</p>
<p>     उस तटस्‍थ क्षेत्र में तुम न तो शरीर हो और न मन ही हो; न शारीरिक हो, न मानसिक हो। क्‍योंकि शरीर तुम्‍हारे अस्‍तित्‍व का एक गियर है और मन उसका दूसरा गियर है। तुम एक गियर से दूसरे गियर में गति करते हो, इस लिए तुम्‍हें  एक न्‍यूट्रल गियर की जरूरत है जो न शरीर हो और न मन हो। उस तटस्‍थ क्षेत्र में तुम मात्र हो, मात्र अस्‍तित्‍व–शुद्ध, सरल, अशरीरी और मन से मुक्‍त। यही कारण है कि घुमाव बिंदु पर, मोड़ पर इतना जोर है।</p>
<p>     मनुष्‍य एक यंत्र है—बड़ा और बहुत जटिल यंत्र। तुम्‍हारे शरीर और मन में भी अनेक गियर है। तुम्‍हें उस महान यंत्र रचना का बोध नहीं है। लेकिन तुम एक महान यंत्र हो। और अच्‍छा है कि तुम्‍हें उसका बोध नहीं है। अन्‍यथा तुम पागल हो जाओगे। शरीर ऐसा विशाल यंत्र है कि वैज्ञानिक कहते है, अगर हमें शरीर के समांतर एक कारखाना निर्मित करना पड़े तो उसे चार वर्ग मिल जमीन की जरूरत होगी। और उसका शोरगुल इतना भारी होगा कि उससे सौ वर्ग मील भूमि प्रभावित होगी।</p>
<p>     शरीर एक विशाल यांत्रिक रचना है—विशालतम। उसमे लाखों-लाखों कोशिकांए है, और प्रत्‍येक कोशिका जीवित है। तुम सात करोड़ कोशिकाओं के एक विशाल नगर में हो; तुम्‍हारे भी तर सात करोड़ नागरिक बसते है; और सारा नगर बहुत शांति और व्‍यवस्‍था से चल रहा है। प्रतिक्षण यंत्र-रचना काम कर रही है। और वह बहुत जटिल है।</p>
<p>     कई स्‍थलों पर इन विधियों का तुम्‍हारे शरीर और मन की एक यंत्र-रचना के साथ वास्‍ता पड़ेगा। लेकिन याद रखो। कि सदा ही जोर उन बिंदुओं पर रहेगा जहां तुम अचानक यंत्र-रचना के अंग नहीं रह जाते हो। जब एकाएक तुम यंत्र रचना के अंग नहीं रहे तो ये ही क्षण है जब तुम गियर बदलते हो।</p>
<p>     उदाहरण के लिए, रात जब तुम नींद में उतरते हो तो तुम्‍हें गियर बदलना पड़ता है। कारण यह है कि दिन में जागी हुई चेतना के लिए दूसरे ढंग की यंत्र रचना की जरूरत रहती है। तब मन का भी एक दूसरा भाग काम करता है। और जब तुम नींद में उतरते हो तो वह भाग निष्‍क्रिय हो जाता है। और अन्‍य भाग सक्रिय होता है। उस क्षण वहां एक अंतराल, एक मोड़ आता है। एक गियर बदला। फिर सुबह जब तुम जागते हो तो गियर बदलता है।</p>
<p>     तुम चुपचाप बैठे हो और अचानक कोई कुछ कह देता है, और तुम क्रुद्ध हो जाते हो। तब तुम भिन्‍न गियर में चले गए। यही कारण है कि सब कुछ बदल जाता है। तुम क्रोध में हुए श्‍वास क्रिया बदल जायेगी। वह अस्तव्यस्त हो जायेगी। तुम्‍हारी श्‍वास क्रिया में कंपन आ जाएगा। किसी चीज को चूर-चूर कर देना चाहेगा, ताकि यह घुटन जाए। तुम्‍हारी श्‍वास क्रिया बदल जाएगी, तुम्‍हारे खून की लय दुसरी होगी। शरीर में और ही तरह का रस द्रव्‍य सक्रिय होगा। पूरी ग्रंथि व्‍यवस्‍था ही बदल जाएगी। क्रोध में तुम दूसरे ही आदमी हो जाते हो।</p>
<p>     एक कार खड़ी है, तुम उसे स्‍टार्ट करो। उसे किसी गियर में न डालकर न्‍यूट्रल गियर में छोड़ दो। गाड़ी हिलेगी, कांपेगी, लेकिन चलेगी नहीं। वह गरम हो जाएगी। इसी तरह क्रोध में नहीं कुछ कर पाने के कारण तुम गरम हो जाते हो। यंत्र रचना तो कुछ करने के लिए सक्रिय है और तुम उसे कुछ करने नहीं देते तो उसका गरम हो जाना स्‍वाभाविक है। तुम एक यंत्र-रचना हो, लेकिन मात्र यंत्र-रचना नहीं हो। उससे कुछ अधिक हो। उस अधिक को खोजना है। जब तुम गियर बदलते हो तो भीतर सब कुछ बदल जाता है। जब तुम गियर बदलते हो तो एक मोड़ आता है।</p>
<p>     शिव कहते है, ‘’जब श्‍वास नीचे से ऊपर की और मुड़ती है, और फिर जब श्‍वास ऊपर से नीचे की और मुड़ती है। इन दो मोड़ों के द्वारा उपलब्‍ध हो जाओ।‘’</p>
<p>     मोड़ पर सावधान हो जाओ, सजग हो जाओ। लेकिन यह मोड़ बहुत सूक्ष्‍म है और उसके लिए बहुत सूक्ष्‍म निरीक्षण की जरूरत पड़ेगी। हमारी निरीक्षण की क्षमता नहीं के बराबर है; हम कुछ देख ही नहीं सकते। अगर मैं तुम्‍हें कहूं कि इस फूल को देखो—इस फूल को जो तुम्‍हें मैं देता हूं। तो तुम उसे नहीं देख पाओगे। एक क्षण को तुम उसे देखोगें और फिर किसी और चीज के संबंध में सोचने लगोगे। वह सोचना फूल के विषय में हो सकता है। लेकिन वह फूल नहीं हो सकता। तुम फूल के बारे में सोच सकते हो। कि देखो वह कितना सुंदर है। लेकिन तब तुम फूल से दूर हट गए। अब फूल तुम्‍हारे निरीक्षण क्षेत्र में नहीं रहा। क्षेत्र बदल गया। तुम कहोगे कि यह लाल है, नीला है, लेकिन तुम उस फूल से दूर चले गए।</p>
<p>     निरीक्षण का अर्थ होता है: किसी शब्‍द या शाब्‍दिकता के साथ, भीतर की बदलाहट के साथ न रहकर मात्र फूल के साथ रहना। अगर तुम फूल के साथ ऐसे तीन मिनट रह जाओ, जिसमे मन कोई गति न करे, तो श्रेयस् घट जाएगा। तुम उपलब्‍ध हो जाओगे।</p>
<p>     लेकिन हम निरीक्षण बिलकुल नहीं जानते है। हम सावधान नहीं है, सतर्क नहीं है, हम किसी भी चीज को अपना अवधान नहीं दे पाते है। हम ता यहां-वहां उछलते रहत है। वह हमारी वंशगत विरासत है, बंदर-वंश की विरासत। बंदर के मन से ही मनुष्‍य का मन विकसित हुआ है। बंदर शांत नहीं बैठ सकता। इसीलिए बुद्ध बिना हलन-चलन के बैठने पर, मात्र बैठने पर इतना जौर देते है। क्‍योंकि तब बंदर-मन का अपनी राह चलना बंद हो जाता है।</p>
<p>     जापान में एक खास तरह का ध्‍यान चलता है जिसे वे झा झेन कहते है। झा झेन शब्‍द का जापानी में अर्थ होता है, मात्र बैठना और कुछ भी नहीं करना। कुछ भी हलचल नहीं करनी है, मूर्ति की तरह वर्षों बैठे रहना है—मृतवत्, अचल। लेकिन मूर्ति की तरह वर्षों बैठने की जरूरत क्‍या है? अगर तुम अपने श्‍वास के घुमाव को अचल मन से देख सको तो तुम प्रवेश पा जाओगे? तुम स्‍वयं में प्रवेश पा जाओगे। अंतर के भी पार प्रवेश पा जाओगे। लेकिन ये मोड़ इतने महत्‍वपूर्ण क्‍यों है?</p>
<p>     वे महत्‍वपूर्ण है, क्‍योंकि मोड़ पर दूसरी दिशा में घूमने के लिए श्‍वास तुम्‍हें छोड़ देती है। जब वह भीतर आ रही थी तो तुम्‍हारे साथ थी; फिर जब वह बाहर जाएगी तो तुम्‍हारे साथ होगा। लेकिन घुमाव-बिंदु पर न वह तुम्‍हारे साथ है और न तुम उसके साथ हो। उस क्षण में श्‍वास तुमसे भिन्‍न है और तुम उससे भिन्‍न हो। अगर श्‍वास क्रिया ही जीवन है तो तब तुम मृत हो। अगर श्‍वास-क्रिया तुम्‍हारा मन है तो उस क्षण तुम अ-मन हो।</p>
<p>     तुम्‍हें पता हो या न हो, अगर तुम अपनी श्‍वास को ठहरा दो तो मन अचानक ठहर जाता है। अगर तुम अपनी श्‍वास को ठहरा दो तो तुम्‍हारा मन अभी और अचानक ठहर जाएगा; मन चल नहीं सकता। श्‍वास का अचानक ठहरना मन को ठहरा देता है। क्‍यों? क्‍योंकि वे पृथक हो जाते है। केवल चलती हुई श्‍वास मन से शरीर से जुड़ी होती है। अचल श्‍वास अलग हो जाती है। और जब तुम न्‍यूट्रल गियर में होते हो।</p>
<p>     कार चालू है, ऊर्जा भाग रही है, कार शोर मचा रही है। वह आगे जाने को तैयार है। लेकिन वह गियर में ही नहीं है। इसलिए कार का शरीर और कार का यंत्र-रचना, दोनों अलग-अलग है। कार दो हिस्‍सों में बंटी है। वह चलने को तैयार है, लेकिन गति का यंत्र उससे अलग है।</p>
<p>     वही बात तब होती है जब श्‍वास मोड़ लेती है। उस समय तुम उसे नहीं जुड़े हो। और उस क्षण तुम आसानी से जान सकते हो कि मैं कौन हूं, यह होना क्‍या है, उस समय तुम जान सकते हो कि शरीर रूपी घर के भीतर कौन है, इस घर का स्‍वामी कौन है। मैं मात्र घर हूं या वहां कोई स्‍वामी भी है, मैं मात्र यंत्र रचना हूं, या उसके परे भी कुछ है। और शिव कहते है कि उस घुमाव बिंदु पर उपलब्‍ध हो। वे कहते है, उस मोड़ के प्रति बोधपूर्ण हो जाओ और तुम आत्‍मोपलब्‍ध हो।</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>विज्ञान भैरव तंत्र</p>
<p>प्रवचन-2( तंत्र-सूत्र—भाग-1)</strong></p>
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			<media:title type="html">तंत्र-सूत्र—विधि—02 ( ओशो)</media:title>
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		<title>तंत्र-सूत्र&#8211;विधि—01</title>
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		<pubDate>Wed, 16 May 2012 01:09:18 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[विज्ञान भैरव तंत्र--भाग-1]]></category>
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		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

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		<description><![CDATA[शिव कहते है: हे देवी, यह अनुभव दो श्‍वासों के बीच घटित हो सकता है। श्‍वास के भीतर आने के पश्‍चात और बाहर लौटने के ठीक पूर्व&#8211; श्रेयस् है, कल्‍याण है। आरंभ की नौ विधियां श्‍वास-क्रिया से संबंध रखती है। &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/05/16/%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a5%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a7%e0%a4%bf-01/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&#038;blog=12293864&#038;post=4574&#038;subd=oshosatsang&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>शिव कहते है:<div id="attachment_4575" class="wp-caption alignright" style="width: 207px"><a href="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/05/thumbnail2.jpg"><img src="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/05/thumbnail2.jpg?w=640" alt="विज्ञान भैरव तंत्र--ओशो" title="विज्ञान भैरव तंत्र--ओशो"   class="size-full wp-image-4575" /></a><p class="wp-caption-text">विज्ञान भैरव तंत्र&#8211;ओशो<br />तंत्र-सूत्र, ध्‍यान विधि&#8211;</p></div></p>
<p>हे देवी, यह अनुभव दो श्‍वासों के बीच घटित हो सकता है।</p>
<p>श्‍वास के भीतर आने के पश्‍चात और बाहर लौटने के ठीक पूर्व&#8211;</p>
<p>श्रेयस् है, कल्‍याण है।</strong></p>
<p>     आरंभ की नौ विधियां श्‍वास-क्रिया से संबंध रखती है। इसलिए पहले हम श्‍वास-क्रिया के संबंध में थोड़ा समझ लें और विधियों में प्रवेश करेंगे।</p>
<p>      हम जन्‍म से मृत्‍यु के क्षण तक निरंतर श्‍वास लेते रहते है। इन दो बिंदुओं के बीच सब कुछ बदल जाता है। सब चीज बदल जाती है। कुछ भी बदले बिना नहीं रहता। लेकिन जन्‍म और मृत्‍यु के बीच श्‍वास क्रिया अचल रहती है। बच्‍चा जवान होगा, जवान बूढ़ा होगा। वह। बीमार होगा। उसका शरीर रूग्‍ण और कुरूप होगा। सब कुछ बदल जायेगा। वह सुखी होगा, दुःखी होगा, पीड़ा में होगा, सब कुछ बदलता रहेगा। लेकिन इन दो बिंदुओं के बीच आदमी श्‍वास भर सतत लेता रहेगा।<span id="more-4574"></span></p>
<p>      श्‍वास क्रिया एक सतत प्रवाह है, उसमें अंतराल संभव नहीं है। अगर तुम एक क्षण के लिए भी श्‍वास लेना भूल जाओं तो तुम समाप्‍त हो जाओगे। यही कारण है कि श्‍वास लेने का जिम्‍मा तुम्‍हारी नहीं है। नहीं तो मुश्‍किल हो जायेगी। कोई भूल जाये श्‍वास लेना तो फिर कुछ भी नहीं किया जा सकता।</p>
<p>      इसलिए यथार्थ में तुम श्‍वास नहीं लेते हो, क्‍योंकि उसमे तुम्‍हारी जरूरत नहीं है। तुम गहरी नींद में हो और श्‍वास चलती रहती है। तुम गहरी मूर्च्‍छा में हो और श्‍वास चलती रहती है। श्‍वासन तुम्‍हारे व्‍यक्‍तित्‍व का एक अचल तत्‍व है।</p>
<p>      दूसरी बात यह जीवन के अत्‍यंत आवश्‍यक और आधारभूत है। इस लिए जीवन और श्‍वास पर्यायवाची हो गये। इस लिए भारत में उसे प्राण कहते है। श्‍वास और जीवन को हमने एक शब्‍द दिया। प्राण का अर्थ है, जीवन शक्‍ति, जीवंतता। तुम्‍हारा जीवन तुम्‍हारी श्‍वास है।</p>
<p>      तीसरी बात श्‍वास तुम्‍हारे और तुम्‍हारे शरीर के बीच एक सेतु है। सतत श्‍वास तुम्‍हें तुम्‍हारे शरीर से जोड़ रही है। संबंधित कर रही है। और श्‍वास ने सिर्फ तुम्‍हारे और तुम्‍हारे शरीर के बीच सेतु है, वह तुम्‍हारे और विश्‍व के बीच भी सेतु है। तुम्‍हारा शरीर विश्‍व का अंग है। शरीर की हरेक चीज, हरेक कण, हरेक कोश विश्‍व का अंश है। यह विश्‍व के साथ निकटतम संबंध है। और श्‍वास सेतु है। और अगर सेतु टूट जाये तो तुम शरीर में नहीं रह सकते। तुम किसी अज्ञात आयाम में चले जाओगे। इस लिए श्‍वास तुम्‍हारे और देश काल के बीच सेतु हो जाती है।</p>
<p>      श्‍वास के दो बिंदु है, दो छोर है। एक छोर है जहां वह शरीर और विश्‍व को छूती है। और दूसरा वह छोर है जहां वह विश्‍वातीत को छूती है। और हम श्‍वास के एक ही हिस्‍से से परिचित है। जब वह विश्‍व में, शरीर में गति करती है। लेकिन वह सदा ही शरीर से अशरीर में गति करती है। अगर तुम दूसरे बिंदू को, जो सेतु है, धुव्र है, जान जाओं। तुम एकाएक रूपांतरित होकर एक दूसरे ही आयाम में प्रवेश कर जाओगे।</p>
<p>      लेकिन याद रखो, शिव जो कहते है वह योग नहीं है। वह तंत्र है। योग भी श्‍वास पर काम करता है। लेकिन योग और तंत्र के काम में बुनियादी फर्क है। योग श्‍वास-क्रिया को व्‍यवस्‍थित करने की चेष्‍टा करता है। अगर तुम अपनी श्‍वास को व्‍यवस्‍था दो तो तुम्‍हारा स्‍वास्‍थ सुधर जायेगा। इसके रहस्‍यों को समझो, तो तुम्‍हें स्‍वास्‍थ और दीर्घ जीवन मिलेगा। तुम ज्‍यादा बलि, ज्‍यादा ओजस्‍वी, ज्‍यादा जीवंत, ज्‍यादा ताजा हो जाओगे।</p>
<p>      लेकिन तंत्र का इससे कुछ लेना देना नहीं है। तंत्र स्‍वास की व्‍यवस्‍था की चिंता नहीं करता। भीतर की और मुड़ने के लिए वह श्‍वास क्रिया का उपयोग भर करता है। तंत्र में साधक को किसी विशेष ढंग की श्‍वास का अभ्‍यास नहीं करना चाहिए। कोई विशेष प्राणायाम नहीं साधना है, प्राण को लयवद्ध नहीं बनाना है; बस उसके कुछ विशेष बिंदुओं के प्रति बोधपूर्ण होना है।</p>
<p>      श्‍वास प्रश्‍वास के कुछ बिंदु है जिन्‍हें हम नहीं जानते। हम सदा श्‍वास लेते है। श्‍वास के साथ जन्‍मते है, श्‍वास के साथ मरते है। लेकिन उसके कुछ महत्‍व पूर्ण बिंदुओं को बोध नहीं है। और यह हैरानी की बात है। मनुष्‍य अंतरिक्ष की गहराइयों में उतर रहा है, खोज रहा है, वह चाँद पर पहुंच गया है। लेकिन वह अपने जीवन के इस निकटतम विंदु को समझ नहीं सका। श्‍वास के कुछ बिंदु है, जिसे तुमने कभी देखा नहीं है। वे बिंदु द्वार है, तुम्‍हारे निकटतम द्वार है, जिनसे होकर तुम एक दूसरे ही संसार में, एक दूसरे ही अस्‍तित्‍व में, एक दूसरी ही चेतना में प्रवेश कर सकते हो।</p>
<p>      लेकिन वह बिंदु बहुत सूक्ष्‍म है। जो चीज जितनी निकट हो उतनी ही कठिन मालूम पड़ेगी, श्वास तुम्‍हारे इतना करीब है, कि उसके बीच स्‍थान ही नहीं बना रहता। या इतना अल्‍प स्‍थान है कि उसे देखने के लिए बहुत सूक्ष्‍म दृष्‍टि चाहिए। तभी तुम उन बिंदुओं के प्रति बोध पूर्ण हो सकते हो। ये बिंदु इन विधियों के आधार है।</p>
<p>शिव उत्‍तर में कहते है—हे देवी,  यह अनुभव दो श्‍वासों के बीच घटित हो सकता है। श्‍वास के भीतर आने के पश्‍चात और बाहर लौटने के ठीक पूर्व—श्रेयस् है, कल्‍याण है।</p>
<p>यह विधि है: हे देवी, यह अनुभव दो श्‍वासों के बीच घटित हो सकता है। जब श्‍वास भीतर अथवा नीचे को आती है उसके बाद फिर श्‍वास के लौटने के ठीक पूर्व—श्रेयस् है। इन दो बिंदुओं के बीच होश पुर्ण होने से घटना घटती है।</p>
<p>      जब तुम्‍हारी श्‍वास भीतर आये तो उसका निरीक्षण करो। उसके फिर बाहर या ऊपर के लिए मुड़ने के पहले एक क्षण के लिए, या क्षण के हज़ारवें भाग के लिए श्‍वास बंद हो जाती है। श्‍वास भीतर आती है, और वहां एक बिंदु है जहां वह ठहर जाती है। फिर श्‍वास बाहर जाती है। और जब श्‍वास बाहर जाती है। तो वहां एक बिंदु पर ठहर जाती है। और फिर वह भीतर के लौटती है।</p>
<p>      श्‍वास के भीतर या बाहर के लिए मुड़ने के पहले एक क्षण है जब तुम श्‍वास नहीं लेते हो। उसी क्षण में घटना घटनी संभव है। क्‍योंकि जब तुम श्‍वास नहीं लेते हो तो तुम संसार में नहीं होते हो। समझ लो कि जब तुम श्‍वास नहीं लेते हो तब तुम मृत हो; तुम तो हो, लेकिन मृत। लेकिन यह क्षण इतना छोटा है कि तुम उसे कभी देख नहीं पाते।</p>
<p>      तंत्र के लिए प्रत्‍येक बहिर्गामी श्‍वास मृत्‍यु है और प्रत्‍येक नई स्‍वास पुनर्जन्‍म है। भीतर आने वाली श्‍वास पुनर्जन्‍म है; बाहर जाने वाली श्‍वास मृत्‍यु है। बाहर जाने वाली श्‍वास मृत्‍यु का पर्याय है; अंदर जाने वाली श्‍वास जीवन का। इसलिए प्रत्‍येक श्‍वास के साथ तुम मरते हो और प्रत्‍येक श्‍वास के साथ तुम जन्‍म लेते हो। दोनों के बीच का अंतराल बहुत क्षणिक है, लेकिन पैनी दृष्‍टि, शुद्ध निरीक्षण और अवधान से उसे अनुभव किया जा सकता है। और यदि तुम उस अंतराल को अनुभव कर सको तो शिव कहते है कि श्रेयस् उपलब्‍ध है। तब और किसी चीज की जरूरत नहीं है। तब तुम आप्‍तकाम हो गए। तुमने जान लिया; घटना घट गई।</p>
<p>      श्‍वास को प्रशिक्षित नहीं करना। वह जैसी है उसे वैसी ही बनी रहने देना। फिर इतनी सरल विधि क्‍यों? सत्‍य को जानने को ऐसी सरल विधि? सत्‍य को जानना उसको जानना है। जिसका न जन्‍म है न मरण। तुम बहार जाती श्‍वास को जान सकते हो, तुम भीतर जाती श्‍वास को जान सकते हो। लेकिन तुम दोनों के अंतराल को कभी नहीं जानते।</p>
<p>      प्रयोग करो और तुम उस बिंदु को पा लोगे। उसे अवश्‍य पा सकते हो। वह है। तुम्‍हें या तुम्‍हारी संरचना में कुछ जोड़ना नहीं है। वह है ही। सब कुछ है; सिर्फ बोध नहीं है। कैसे प्रयोग करो? पहले भीतर आने वाली श्‍वास के प्रति होश पूर्ण बनो। उसे देखो। सब कुछ भूल जाओ और आने वाली श्‍वास को, उसके यात्रा पथ को देखो। जब श्‍वास नासापुटों को स्‍पर्श करे तो उसको महसूस करो। श्‍वास को गति करने दो और पूरी सजगता से उसके साथ यात्रा करो। श्‍वास के साथ ठीक कदम से कदम मिलाकर नीचे उतरो; न आगे जाओ और ने पीछे पड़ो। उसका साथ न छूटे; बिलकुल साथ-साथ चलो।</p>
<p>      स्‍मरण रहे, न आगे जाना है और न छाया की तरह पीछे चलना है। समांतर चलो। युगपत। श्‍वास और सजगता को एक हो जाने दो। श्‍वास नीचे जाती है तो तुम भी नीचे जाओं; और तभी उस बिंदु को पा सकते हो, जो दो श्‍वासों के बीच में है। यह आसान नहीं है। श्‍वास के साथ अंदर जाओ; श्‍वास के साथ बाहर आओ।</p>
<p>      बुद्ध ने इसी विधि का प्रयोग विशेष रूप से किया; इसलिए यह बौद्ध विधि बन गई। बौद्ध शब्‍दावली में इसे अनापानसति योग कहते है। और स्‍वयं बुद्ध की आत्‍मोपलब्‍धि इस विधि पर ही आधारित थी। संसार के सभी धर्म, संसार के सभी द्रष्‍टा किसी न किसी विधि के जरिए मंजिल पर पहुंचे है। और वह सब विधियां इन एक सौ बारह विधियों में सम्‍मिलित है। यह पहली विधि बौद्ध विधि है। दुनिया इसे बौद्ध विधि के रूप में जानती है। क्‍योंकि बुद्ध इसके द्वारा ही निर्वाण को उपलब्‍ध हुए थे।</p>
<p>      बुद्ध न कहा है। अपनी श्‍वास-प्रश्‍वास के प्रति सजग रहो। अंदर जाती, बहार आती, श्‍वास के प्रति होश पूर्ण हो जाओ। बुद्ध अंतराल की चर्चा नहीं करते। क्‍योंकि उसकी जरूरत ही नहीं है। बुद्ध ने सोचा और समझा कि अगर तुम अंतराल की, दो श्‍वासों के बीच के विराम की फिक्र करने लगे, तो उससे तुम्‍हारी सजगता खंडित होगी। इसलिए उन्‍होंने सिर्फ यह कहा कि होश रखो, जब श्‍वास भीतर आए तो तुम भी उसके साथ भीतर जाओ और जब श्‍वास बहार आये तो तुम उसके साथ बहार आओ। विधि के दूसरे हिस्‍से के संबंध में बुद्ध कुछ नहीं कहते।</p>
<p>      इसका कारण है। कारण यह है कि बुद्ध बहुत साधारण लोगों से, सीधे-सादे लोगों से बोल रहे थे। वे उनसे अंतराल की बात करते तो उससे लोगों में अंतराल को पाने की एक अलग कामना निर्मित हो जाती। और यह अंतराल को पाने की कामना बोध में बाधा बन जाती। क्‍योंकि अगर तुम अंतराल को पाना चाहते हो तो तुम आगे बढ़ जाओगे; श्‍वास भीतर आती रहेगी। और तुम उसके आगे निकल जाओगे। क्‍योंकि तुम्‍हारी दृष्‍टि अंतराल पर है जो भविष्‍य में है। बुद्ध कभी इसकी चर्चा नहीं करते; इसीलिए बुद्ध की विधि आधी है।</p>
<p>      लेकिन दूसरा हिस्‍सा अपने आप ही चला आता है। अगर तुम श्‍वास के प्रति सजगता का, बोध का अभ्‍यास करते गए तो एक दिन अनजाने ही तुम अंतराल को पा जाओगे। क्‍योंकि जैसे-जैसे तुम्‍हारा बोध तीव्र, गहरा और सघन होगा, जैसे-जैसे तुम्‍हारा बोध स्‍पष्‍ट आकार लेगा। जब सारा संसार भूल जाएगा। बस श्‍वास का आना जाना ही एकमात्र बोध रह जाएगा—तब अचानक तुम उस अंतराल को अनुभव करोगे। जिसमें श्‍वास नहीं है।</p>
<p>      अगर तुम सूक्ष्‍मता से श्‍वास-प्रश्‍वास के साथ यात्रा कर रहे हो तो उस स्‍थिति के प्रति अबोध कैसे रह सकते हो। जहां स्‍वास नहीं है। वह क्षण आ ही जाएगा जब तुम महसूस करोगे। कि अब श्‍वास न जाती है, न आती है। श्‍वास क्रिया बिलकुल ठहर गई है। और उसी ठहराव में श्रेयस् का वास है।</p>
<p>      यह एक विधि लाखों-करोड़ों लोगों के लिए पर्याप्‍त है। सदियों तक समूचा एशिया इस एक विधि के साथ जीया और उसका प्रयोग करता रहा। तिब्‍बत, चीन, जापन, बर्मा, श्‍याम, श्रीलंका। भारत को छोड़कर समस्‍त एशिया सदियों तक इस एक विधि का उपयोग करता रहा। और इस एक विधि के द्वारा हजारों-हजारों व्‍यक्‍ति ज्ञान को उपलब्‍ध हुए। और यह पहली ही विधि है। दुर्भाग्‍य की बात कि चूंकि यह विधि बुद्ध के नाम से संबंद्ध हो गई। इसलिए हिंदू इस विधि से बचने की चेष्‍टा में लगे रहे। क्‍योंकि यह बौद्ध विधि की तरह बहुत प्रसिद्ध हुई। हिंदू इसे बिलकुल भूल गये। इतना ही नहीं, उन्‍होंने और एक कारण से इसकी अवहेलना की। क्‍योंकि शिव ने सबसे पहले इस विधि का उल्‍लेख किया, अनेक बौद्धों ने इस विज्ञान भैरव तंत्र के बौद्ध ग्रंथ होने का दावा किया। वे इसे हिंदू ग्रंथ नहीं मानते।</p>
<p>      यह न हिंदू है और न बौद्ध, और विधि मात्र विधि है। बुद्ध ने इसका उपयोग किया, लेकिन यह उपयोग के लिए मौजूद ही थी। और इस विधि के चलते बुद्ध-बुद्ध हुए। विधि तो बुद्ध से भी पहले थी। वह मौजूद ही थी। इसको प्रयोग में लाओ। यह सरलतम विधियों में से है—अन्‍य विधियों की तुलना में। मैं यह नहीं कहता कि यह विधि तुम्‍हारे लिए सरल है। अन्‍य विधियां अधिक कठिन होंगी। यही कारण है कि पहली विधि की तरह इसका उल्‍लेख हुआ है।</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>विज्ञान भैरव तंत्र</p>
<p>(तंत्र-सूत्र—भाग-1)</p>
<p>प्रवचन—2,</strong></p>
<br />Filed under: <a href='http://oshosatsang.org/category/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%ad%e0%a5%88%e0%a4%b0%e0%a4%b5-%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%97-1/'>विज्ञान भैरव तंत्र--भाग-1</a> Tagged: <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/'>ओशो</a>, <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6/'>स्‍वामी आनंद प्रसाद</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/oshosatsang.wordpress.com/4574/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/oshosatsang.wordpress.com/4574/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/oshosatsang.wordpress.com/4574/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/oshosatsang.wordpress.com/4574/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/oshosatsang.wordpress.com/4574/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/oshosatsang.wordpress.com/4574/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/oshosatsang.wordpress.com/4574/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/oshosatsang.wordpress.com/4574/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/oshosatsang.wordpress.com/4574/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/oshosatsang.wordpress.com/4574/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/oshosatsang.wordpress.com/4574/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/oshosatsang.wordpress.com/4574/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/oshosatsang.wordpress.com/4574/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/oshosatsang.wordpress.com/4574/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&#038;blog=12293864&#038;post=4574&#038;subd=oshosatsang&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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		<title>विज्ञान भैरव तंत्र—ओशो</title>
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		<pubDate>Tue, 15 May 2012 13:27:48 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[विज्ञान भैरव तंत्र--भाग-1]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

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		<description><![CDATA[विज्ञान भैरव तंत्र—ओशो विज्ञान भैरव तंत्र का जगत बौद्धिक नहीं है। वह दार्शनिक भी नहीं है। तंत्र शब्‍द का अर्थ है। विधि, उपाय, मार्ग। इस लिए यह एक वैज्ञानिक ग्रंथ है। विज्ञान ‘’क्‍यों‘’ की नहीं, ‘’कैसे’’ की फिक्र करता है। &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/05/15/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%ad%e0%a5%88%e0%a4%b0%e0%a4%b5-%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&#038;blog=12293864&#038;post=4569&#038;subd=oshosatsang&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>विज्ञान भैरव तंत्र—ओशो</strong><div id="attachment_4570" class="wp-caption alignright" style="width: 291px"><a href="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/05/vigyan_bhairav_tantra_vol1.jpg"><img src="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/05/vigyan_bhairav_tantra_vol1.jpg?w=640" alt="विज्ञान भैरव तंत्र--ओशो" title="Vigyan_Bhairav_Tantra_Vol1"   class="size-full wp-image-4570" /></a><p class="wp-caption-text">विज्ञान भैरव तंत्र—ओशो</p></div></p>
<p>      विज्ञान भैरव तंत्र का जगत बौद्धिक नहीं है। वह दार्शनिक भी नहीं है। तंत्र शब्‍द का अर्थ है। विधि, उपाय, मार्ग। इस लिए यह एक वैज्ञानिक ग्रंथ है। विज्ञान ‘’क्‍यों‘’ की नहीं, ‘’कैसे’’ की फिक्र करता है। दर्शन और विज्ञान में यही बुनियादी भेद है। दर्शन पूछता है। यह अस्‍तित्‍व क्‍यों है? विज्ञान पूछता है, यह आस्‍तित्‍व कैसे है? जब तुम कैसे का प्रश्‍न पूछते हो, तब उपाय, विधि, महत्‍वपूर्ण हो जाती है। तब सिद्धांत व्‍यर्थ हो जाती है। अनुभव केंद्र बन जाता है।</p>
<p>      विज्ञान का मतलब है चेतना है। और भैरव का विशेष शब्‍द है, तांत्रिक शब्‍द, जो पारगामी के लिए कहा जाता है। इसीलिए शिव को भैरव कहते है, और देवी को भैरवी—वे जो समस्‍त द्वैत के पार चले जाते है।<span id="more-4569"></span></p>
<p><strong>पार्वती कहती है—</p>
<p>आपका सत्‍य रूप क्‍या है?</p>
<p>यह आपका आश्‍चर्य-भरा जगता क्‍या है?</p>
<p>इसका बीज क्‍या है?</p>
<p>विश्‍व चक्र की धूरी क्‍या है?</p>
<p>यह चक्र चलता ही जाता है—महा परिवर्तन, सतत प्रवाह।</p>
<p>इसका मध्य बिंदु क्‍या है?</p>
<p>इसकी धूरी कहां है?</p>
<p>अचल केंद्र कहां है?</p>
<p>रूपों पर छाए लेकिन रूप के परे यह जीवन क्‍या है?</p>
<p>देश और काल, नाम और प्रत्‍यय के परे जाकर हम इसमे कैसे पूर्णत: प्रवेश करे?</p>
<p>मेरे संशय निर्मूल करे&#8230;&#8230;</strong></p>
<p>      लेकिन संशय निर्मूल कैसे होंगे? किसके ऊपर से? क्‍या कोई उत्‍तर है जो कि मन के संशय दूर कर दे? मन ही तो संशय है। जब तक मन नहीं मिटता है, संशय निर्मूल कैसे होंगे?</p>
<p>      शिव उत्‍तर देंगे। उनके उत्‍तर में सिर्फ विधियां है—सबसे पुरानी, सबसे प्रचीन विधियां। लेकिन तुम उन्‍हें अत्‍याधुनिक भी कह सकते हो। क्‍योंकि उनमें जोड़ा नहीं जा सकता। वे पूर्ण है, एक सौ बारह विधियां। उनमें सभी संभावनाओं का समावेश है; मन को शुद्ध करने के, मन के अतिक्रमण के सभी उपाय उनमें समाएँ है। शिव की एक सौ बारह विधियों में एक और विधि नहीं जोड़ी जा सकती। कुछ जोड़ने की गुंजाईश ही नहीं है। यह सर्वांगीण है, संपूर्ण है, अंतिम है। यह सब से प्राचीन है और साथ ही सबसे आधुनिक, सबसे नवीन। पुराने पर्वतों की भांति ये तंत्र पुराने है, शाश्‍वत जैसे लगते है। और साथ ही सुबह के सूरज के सामने खड़े ओस-कण की भांति ये नए है। ये इतने ताजे है।</p>
<p>      ध्‍यान की इन एक सौ बारह विधियों से मन के रूपांतरण का पूरा विज्ञान निर्मित हुआ है। एक-एक कर हम उनमें प्रवेश करेंगे। पहले हम उन्‍हें बुद्धि से समझने की चेष्‍टा करेंगे। लेकिन बुद्धि को मात्र एक यंत्र की तरह काम में लाओ, मालिक की तरह नहीं। समझने के लिए यंत्र की तरह उसका उपयोग करों। लेकिन उसके जरिए नए व्‍यवधान मत पैदा करो। जिस समय हम इन विधियों की चर्चा करेंगे। तुम अपने पुराने ज्ञान को पुरानी जानकारियों को एक किनारे धर देना। उन्‍हें अलग ही कर देना। वे रास्‍ते की धूल भर है।</p>
<p>      इन विधियों का साक्षात्‍कार निश्‍चित ही सावचेत मन से करो; लेकिन तर्क को हटा कर करो। इस भ्रम में मत रहो कि विवाद करने वाला मन सावचेत मन है। वह नहीं है। क्‍योंकि जिस क्षण तुम विवाद में उतरते हो, उसी क्षण सजगता खो जाती है। सावचेत नहीं रहते हो। तुम तब यहां हो ही नहीं।</p>
<p>      ये विधियां किसी धर्म की नहीं है। वे ठीक वैसे ही हिंदू नहीं है जैसे सापेक्षवाद का सिद्धांत आइंस्‍टीन के द्वारा प्रतिपादित होने के कारण यहूदी नहीं हो जाता है। रेडियों टेलीविजन ईसाई नहीं है। ये विधियां हिंदुओं की ईजाद अवश्‍य है, लेकिन वे स्‍वयं हिंदू नहीं है। इस लिए इन विधियों में किसी धार्मिक अनुष्‍ठान का उल्‍लेख नहीं रहेगा। किसी मंदिर की जरूरत नहीं है। तुम स्‍वयं मंदिर हो। तुम ही प्रयोगशाला हो, तुम्‍हारे भीतर ही पूरा प्रयोग होने वाला है। और विश्‍वास की भी जरूरत नहीं है।</p>
<p>      तंत्र धर्म नहीं है। विज्ञान है। किसी विश्‍वास की जरूरत नहीं है। कुरान या वेद में, बुद्ध या महावीर में आस्‍था रखने की आवश्‍यकता नहीं है। नहीं, किसी विश्‍वास की आवश्‍यकता है। प्रयोग करने का महा साहस पर्याप्‍त है, प्रयोग करने की हिम्‍मत काफी है। एक मुसलमान प्रयोग कर सकता है। वह कुरान के गहरे अर्थों को उपलब्‍ध हो जाएगा। एक हिंदू अभ्‍यास कर सकता है। और वह पहली दफा जानेगा कि वेद क्‍या है? वैसे ही एक जैन इस साधना में उतर सकता है, बौद्ध इस साधना में उतर सकता है, एक ईसाई इस साधना में उतर सकता है&#8230;वे जहां है तंत्र उन्‍हें आप्‍तकाम करेगा। उनके अपने चुने हुए रास्‍ते जो भी हो, तंत्र सहयोगी होगा।</p>
<p>      यहीं कारण है कि जनसाधारण के लिए तंत्र नहीं समझा गया। और सदा यह होता है कि जब तुम किसी चीज को नहीं समझते हो तो उसे गलत जरूर समझते हो। क्‍योंकि तब तुम्‍हें लगता है। कि समझते जरूर हो। तुम रिक्‍त स्‍थान में बने रहने को राज़ी नहीं हो।</p>
<p>      दूसरी बात कि जब तुम किसी चीज को नहीं समझते हो, तुम उसे गाली देने लगते हो। यह इसलिए कि यह तुम्‍हें अपमानजनक लगता है। तुम सोचते हो, मैं और नहीं समझूं, यह असंभव है। इस चीज के साथ ही कुछ भूल होगी। और तब तुम गाली देने लगते हो। तब तुम ऊलजलूल बकने लगते हो। और कहते हो कि अब ठीक है।</p>
<p>      इस लिए तंत्र को नहीं समझा गया। और तंत्र को गलत समझा गया। महान राज भौज ने पवित्र उज्‍जैन नगरी में तंत्र के विद्यि पीठ को खत्‍म कर दिया। एक लाख तांत्रिक जोड़ों को काट दिया। क्‍यों ये क्‍या है, हमारी समझ में नहीं आता। कुछ सालों पहले वहीं पर राजा विक्रमादित्‍य ने उन्‍हीं तांत्रिकों कितना सम्‍मान दिया&#8230;..यह इतना गहरा और उँचा था कि यह होना स्‍वाभाविक था।</p>
<p>      तीसरी बात कि चूंकि तंत्र द्वैत के पार जाता है, इसलिए उसका दृष्‍टिकोण अति नैतिक है। कृपया कर इन शब्‍दों को समझो: नैतिक, अनैतिक, अति नैतिक। नैतिक क्‍या है हम समझते है; अनैतिक क्‍या है हम समझते है; लेकिन जब कोई चीज अति नैतिक हो जाती है, दौनों के पार चली जाती है। तब उसे समझना कठिन है।</p>
<p>     तंत्र अति नैतिक है। तंत्र कहता है। कोई नैतिकता जरूरी नहीं है। कोई खास नैतिकता जरूरी नहीं है। सच तो यह है कि तुम अनैतिक हो, क्‍योंकि तुम्‍हारा चित अशांत है। इसलिए तंत्र शर्त नहीं लगता कि पहले तुम नैतिक बनो तब तंत्र की साधना कर सकते हो। तंत्र के लिए यह बात ही बेतुकी है। कोई बीमार है, बुखार में है, डाक्‍टर आकर कहता है: पहले अपना बुखार कम करो, पहले पूरा स्‍वस्‍थ हो लो और तब मैं दवा दूँगा।</p>
<p>      यही तो हो रहा है, चौर साधु के पास जाता है। और कहता है, मैं चौर हूं, मुझे ध्‍यान करना सिखाएं। साधु कहता है, पहले चौरी छोड़ो, चौर रहते ध्‍यान कैसे कर सकते हो। एक शराबी आकर कहता है, मैं शराब पीता हूं, मुझे ध्‍यान बताएं। और साधु कहता है, पहली शर्त कि शराब छोड़ो तब ध्‍यान कर सकोगे।</p>
<p>      तंत्र तुम्‍हारी तथा कथित नैतिकता की, तुम्‍हारे समाजिक रस्‍म-रिवाज आदि की चिंता नहीं करता है। इसका यह अर्थ नहीं है कि तंत्र तुम्‍हें अनैतिक होने को कहता है। नहीं, तंत्र जब तुम्‍हारी नैतिकता की ही इतनी परवाह नहीं करता। तो वह तुम्‍हें अनैतिक होने को नहीं कह सकता। तंत्र तो वैज्ञानिक विधि बताता है कि कैसे चित को बदला जाए। और एक बार चित दूसर हुआ कि तुम्‍हारा चरित्र दूसरा हो जाएगा। एक बार तुम्‍हारे ढांचे का आधार बदला कि पूरी इमारत दूसरी हो जाएगी।</p>
<p>      इसी अति नैतिक सुझाव के कारण तंत्र तुम्‍हारे तथाकथित  साधु-महात्‍माओं  को बर्दाश्‍त नहीं हुआ। वे सब उसके विरोध में खड़े हो गए। क्‍योंकि अगर तंत्र सफल होता है तो धर्म के नाम पर चलने वाली सारी नासमझी समाप्‍त हो जाएगी।</p>
<p>      तंत्र कहता है कि उस अवस्‍था का नाम भैरव है जब मन नहीं रहता—अ-मन की अवस्‍था है। और तब पहल दफा तुम यथार्थत: उसको देखते हो जो है। जब तक मन है, तुम अपना ही संसार रचे जाते हो, तुम उसे आरोपित, प्रक्षेपित किए जाते हो, इसलिए पहल तो मन को बदलों और तब मन को अ-मन में बदलों।</p>
<p>      और ये एक सौ बारह विधियों सभी लोगों के काम आ सकती है। हो सकता है, कोई विशेष उपाय तुमको ठीक न पड़े, इसलिए तो शिव अनेक उपाय बताए चले जाते है। कोई एक विधि चुन लो जो तुमको जंच जाए।</p>
<p>      और यह जानना कठिन नहीं है। कि कौन सी विधि तुम्‍हें जँचती है। हम यहां प्रत्‍येक विधि को समझने की कोशिश करेंगे। तुम अपने लिए वह विधि चुन लो जो कि तुम्‍हें और तुम्‍हारे मन को रूपांतरित कर दे। यह समझ, यह बौद्धिक समझ बुनियादी तौर से जरूरी है। लेकिन अंत नहीं है। जिस विधि की भी चर्चा में यहां करूं उसको प्रयोग करो। सच में यह है कि जब तुम अपनी सही विधि का प्रयोग करते हो तब झट से उसका तार तुम्‍हारे किसी तार से लगाकर बज उठता है।</p>
<p>      एक विधि लो उसके साथ तीन दिन खेलो। अगर तुम्‍हें उसके साथ निकटता की अनुभूति हो, अगर उसके साथ तुम थोड़ा स्‍वस्‍थ महसूस करो, अगर तुम्‍हें लगे कि यह तुम्‍हारे लिए है तो फिर उसके प्रति गंभीर हो जाओ। तब दूसरी विधियों को भूल जाओ, उनमें खेलना बंद करो। और अपनी विधि के साथ टीको, कम से कम तीन महीने टीको। चमत्‍कार संभव है, बस इतना होना चाहिए कि वह विधि सचमुच तुम्‍हारे लिए हो। यदि तुम्‍हारे लिए नहीं है तो कुछ नहीं होगा। तब उसके साथ जन्‍मों-जन्‍मों तक  प्रयोग करके भी कुछ नहीं होगा।</p>
<p>      लेकिन ये एक सौ बारह विधियां तो समस्‍त मानव-जाति के लिए है। और वे उन सभी युगों के लिए है जो गुजर गए है और आने वाले है। और किसी भी युग में एक भी एका आदमी नहीं हुआ और न होने वाला ही है। जो कह सके कि ये सभी एक सौ बारह विधियां मेरे लिए व्‍यर्थ है। असंभव , यह असंभव है।</p>
<p>      प्रत्‍येक ढंग के चित के लिए यहां गुंजाइश है। तंत्र में प्रत्‍येक किस्‍म के चित के लिए विधि है। कई विधियां है जिनके उपयुक्‍त आदमी अभी उपलब्‍ध नहीं है, वे भविष्‍य के लिए है। और ऐसी विधियां भी है जिनके उपयुक्‍त मनुष्‍य रहे ही नहीं। वे अतीत के लिए है। लेकिन डर मत जाना। अनेक विधियां है जो तुम्‍हारे लिए ही है।</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>विज्ञान भैरव तंत्र</p>
<p>प्रवचन—1</strong></p>
<p>भाग—1( तंत्र सूत्र)</p>
<br />Filed under: <a href='http://oshosatsang.org/category/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%ad%e0%a5%88%e0%a4%b0%e0%a4%b5-%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%97-1/'>विज्ञान भैरव तंत्र--भाग-1</a> Tagged: <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/'>ओशो</a>, <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6/'>स्‍वामी आनंद प्रसाद</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/oshosatsang.wordpress.com/4569/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/oshosatsang.wordpress.com/4569/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/oshosatsang.wordpress.com/4569/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/oshosatsang.wordpress.com/4569/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/oshosatsang.wordpress.com/4569/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/oshosatsang.wordpress.com/4569/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/oshosatsang.wordpress.com/4569/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/oshosatsang.wordpress.com/4569/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/oshosatsang.wordpress.com/4569/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/oshosatsang.wordpress.com/4569/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/oshosatsang.wordpress.com/4569/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/oshosatsang.wordpress.com/4569/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/oshosatsang.wordpress.com/4569/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/oshosatsang.wordpress.com/4569/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&#038;blog=12293864&#038;post=4569&#038;subd=oshosatsang&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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		<title>कूर्म-नाड़ी पर संयम संपन्‍न करने से योगी पूर्ण रूप से थिर हो जाता है—पतंजलि</title>
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		<pubDate>Sun, 13 May 2012 11:38:53 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[पतंजलि का योग सुत्र--]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

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		<description><![CDATA[कूर्मनाडयां स्‍थैर्यम्&#8211; कूर्म-नाड़ी प्राण की, श्‍वास की वाहिका है। अगर हम चुपचाप, शांतिपूर्वक अपने श्वसन पर ध्‍यान दें, किसी भी ढंग से श्‍वास की लय न बिगड़े, न तो स्‍वास तेज हो, और न ही धीमी हो, बस उसे स्‍वाभाविक &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/05/13/%e0%a4%95%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%af%e0%a4%ae-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%8d/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&#038;blog=12293864&#038;post=4566&#038;subd=oshosatsang&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>कूर्मनाडयां स्‍थैर्यम्&#8211;</strong><div id="attachment_4567" class="wp-caption alignright" style="width: 163px"><a href="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/05/03-02-kissofdawn.jpg"><img src="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/05/03-02-kissofdawn.jpg?w=153&h=300" alt="कूर्म-नाड़ी पर संयम संपन्‍न—पतंजलि   " title="कूर्म-नाड़ी पर संयम संपन्‍न —पतंजलि   " width="153" height="300" class="size-medium wp-image-4567" /></a><p class="wp-caption-text">कूर्म-नाड़ी पर संयम संपन्‍न करने से योगी पूर्ण रूप से थिर हो जाता है—पतंजलि<br /></p></div></p>
<p>     कूर्म-नाड़ी प्राण की, श्‍वास की वाहिका है। अगर हम चुपचाप, शांतिपूर्वक अपने श्वसन पर ध्‍यान दें, किसी भी ढंग से श्‍वास की लय न बिगड़े, न तो स्‍वास तेज हो, और न ही धीमी हो, बस उसे स्‍वाभाविक और शिथिल रूप से चलने दें। तब अगर हम केवल श्‍वास को देखते रहे, तो हम धीरे-धीरे थिर होने लगेंगे। फिर भीतर किसी तरह की कोई हलन-चलन नहीं होगी। क्‍यों?</p>
<p>क्‍योंकि सभी हलन-चलन, गति श्‍वास के द्वारा ही होती है। श्‍वास से ही पूरी की पूरी गति होती है। श्‍वास ही सारी हलन-चलन और गतियों का संचरण करती है। जब श्‍वास रूक जाती है। तो व्‍यक्‍ति मर जाता है। फिर वह चल फिर नहीं सकता। हिल-डुल नहीं सकता।<span id="more-4566"></span></p>
<p>      अगर व्‍यक्‍ति निरंतर श्‍वास पर ही संयम करता है, कूर्म-नाड़ी पर ही केंद्रित रहे, तो धीरे-धीरे एक ऐसी अवस्‍था आ जाएगी जहां पर स्‍वास करीब-करीब रूक ही जाती है।</p>
<p>      योगी इस ध्‍यान की प्रक्रिया को दर्पण के सामने करते है, क्‍योंकि योगी की श्‍वास धीरे-धीरे इतनी शांत हो जाती है। कि उसे श्‍वास चल रही है या नहीं इसकी प्रतीति भी नहीं रह जाती है। अगर दर्पण पर श्‍वास की कुछ धुंध आ जाए, तो ही उन्‍हें मालूम पड़ता है कि उनकी श्‍वास चल रही है। कई बार योगी ध्‍यान में इतनी शांत और थिर हो जाते है कि उन्‍हें यह मालूम ह नहीं पड़ता कि वह भी जिंदा है या नहीं है। ध्‍यान की गहराई में तुम्‍हें भी यह अनुभव कभी न कभी घटेगा। उससे भयभीत मत होना। उस समय श्‍वास लगभग रूक सी जाती है। जब होश अपनी परिपूर्णता पर होता है, उस समय श्‍वास लगभग ठहर जाती है। लेकिन उस समय परेशान मत होना। भयभीत मत होना, यह काई मृत्‍यु नहीं है। वह तो केवल शांत अवस्‍था है।</p>
<p>      योग का संपूर्ण प्रयास ही इस बात के लिए है कि व्‍यक्‍ति को ऐसी गहन शांत अवस्‍था तक ले आए कि फिर उस शांति को कोई भी भंग न कर सके। चेतना ऐसी शांत अवस्‍था को उपलब्‍ध हो जाए कि फिर उसकी शांति भंग न हो सके।</p>
<p>            योग का अर्थ है, एक होने की विधि। योग का अर्थ है, जो कुछ अलग-अलग जा पडा है। उसे फिर से जोड़ना। योग का अर्थ है जोड़। योग का अर्थ है, यूनिओ मिस्‍टिका। योग का अर्थ है, एकता। हां, लाभ की प्राप्‍त तभी होती है जब हम दो का एक कर सकें।</p>
<p>      और योग का पूरा प्रयास ही इसके लिए है कि शाश्‍वतता को कैसे पा सकें, जीजों के पीछे छीपी एकात्‍मकता को कैसे पा सकें। सभी परिवर्तनों, सभी गतियों के पीछे छीपी थिरता को कैसे प्राप्‍त कर सकें—अमृत को कैसे उपल्‍बध हो सकें, मृत्‍यु का अतिक्रमण कैसे कर सकें।</p>
<p>      निश्‍चित ही हमारी आदतें बाधा खड़ी करेंगी। क्‍योंकि लंबे समय से हम इन्‍हीं गलत आदतों के साथ जीते आ रहे है। हमारे मन का गलत आदतों के साथ तालमेल बैठ गया है। इसी कारण हम हमेशा हर चीज को खंड-खंड में तोड़ देते है। आदमी की बुद्धि इसी के लिए प्रशिक्षित हुई है कि पहले हर चीज को विभक्‍त कर दो और फिर चीजों का विश्‍लेषण करो और एक चीज को बहुत रूपों में विभाजित कर दो। मनुष्‍य आज तक बुद्धि से ही जीता आया है, और वह भूल ही गया है कि चीजों को कैसे जोड़ना है, कैसे एक करना है।</p>
<p>      लेकिन हमारी पुरानी आदतें चीजों को विश्‍लेषित करने की, चीर फाड़ करने की है। हमारी पुरानी आदतें यही है कि उसे खोजना है जो निरंतर परिवर्तनशील है। मन तो हमेशा नए में और परिवर्तन में ही रोमांच का अनुभव करता है। अगर कुछ भी बदले नहीं, सब कुछ वैसा का वैसा ही रहे, तो मन उदास हो जाता है, हमें मन की इन आदतों के प्रति सचेत होना होगा। अन्यथा आदतें तो किसी ने किसी रूप में बनी ही रहेंगी। और मन बहुत चालाक है।</p>
<p>      ध्यान रहे मन कि आदत विश्‍लेषण करने की है। और योग है संश्‍लेषण, तो जब कभी मन विश्लेष ण करे, उसे उठाकर एक तरफ रख देना। विश्‍लेषण के द्वारा तुम अंतिम छोर तक, छोटे से छोटे, अणु परिमाणु तक पहुंच जाओगे। लेकिन संश्‍लेषण के द्वारा तुम विराट और समग्र तक पहुंच जाओगे। विज्ञान खोज करते-करते अणु तक जा पहुंचा। और योग खोजते-खोजते, आत्‍मा तक पहुंच गया। अणु का अर्थ है: लघु और छोटा, और आत्‍मा का अर्थ है, विराट। योग ने संपूर्ण को जाना है, समग्र हो अनुभव किया है। और विज्ञान ने छोटे और उससे भी छोटे तत्‍व को जाना है। और इसी तरह वह लधु की और चलता जा रहा है।</p>
<p>      पहले तो विज्ञान ने पदार्थ को अणु में विभाजित किया। फिर विज्ञान ने पाया कि अणु को विभाजित करना कठिन है; फिर जब वे अणु का भी विभाजन करने में सफल हो गए, तो उन्‍होंने उसे परमाणु कहा। अणु का अर्थ ही होता है वह तत्‍व जो अविभाज्‍य जिसे अब और अधिक विभाजित न किया जा सके। लेकिन विज्ञान ने उसे भी विभाजित कर दिया। फिर विज्ञान इलेक्ट्रॉन न न्यूट्रॉन तक जा पहुंचा, और उसने सोचा कि अब और विभाजन संभव नहीं है। क्‍योंकि पदार्थ लगभग अदृश्‍य ही हो गया था। उसे अब देखना संभव नहीं था। जब इलेक्ट्रॉन दिखाई ही नहीं देता, तो कैसे उसका विभाजन संभव हो सकता है। लेकिन अब विज्ञान उसे भी विभाजित करने में सफल हो गया है। बिना इलेक्ट्रॉन को देखे, वैज्ञानिकों के उसको भी विभक्‍त कर दिया है।</p>
<p>      वैज्ञानिक इसी तरह से चीजों को विभक्‍त करते चले जाएंगे&#8230;&#8230;अब सभी कुछ हाथ के बाहर हो गया है।</p>
<p>      योग ठीक इसके विपरीत प्रक्रिया है: योग संश्‍लेषण की प्रक्रिया है। योग जुड़ते जाने की और अधिकाधिक जुड़ते जाने की प्रक्रिया है, जिससे अंत में व्‍यक्‍ति अपने पूर्ण स्‍वरूप तक जा पहुंचे, स्‍वयं के साथ एक हो जाए। अस्‍तित्‍व एक है।</p>
<p>      मन को भी सूर्य-मन, और चंद्र-मन में विभक्‍त किया जा सकता है। सूर्य मन वैज्ञानिक होता है, चंद्र मन काव्यात्मक होता है। सूर्य-मन विश्‍लेषणात्‍मक होता है, चंद्र-मन संश्‍लेषणात्‍मक होता है। सूर्य-मन गणितीय, तार्किक, अरस्‍तुगत होता है। चंद्र-मन बिलकुल अलग ही ढंग का होता है—असंगत होता है। अतार्किक होता है। सूर्य-मन और चंद्र-मन दोनों इतने अलग-अलग ढंग से कार्य करते है कि उनके बीच कही कोई संवाद नहीं हो पाता।</p>
<p>      तुम कौन से केंद्र पर हो इसको जानने का प्रयत्‍न करो, तुम सूर्य-मन हो—तब गणित और तर्क तुम्‍हारे जीवन की शैली है। अगर तुम चंद्र-मन हो तो—तो काव्‍य, कल्‍पनाशीलता तुम्‍हारी जीवन-शैली होगी। तो तुम क्‍या हो और तुम्‍हारी क्‍या स्‍थिति है, पहले तो इसे जानना जरूरी है।</p>
<p>      और ध्‍यान रहे, दोनों मन आधे-आधे होते है, तुम्‍हें दोनों के ही पार जाना है। अगर तुम सूर्य मन हो तो पहले चंद्र मन तक आना होगा। फिर उसके भी आगे जाना है। अगर तुम गृहस्‍थ हो, तो पहले जिप्‍सी हो जाओ।</p>
<p>      यही है, संन्‍यास। मैं तुम्‍हें जिप्‍सी बना रहा हूं, घुमक्कड़ बना रहा हूं। अगर तुम बहुत ज्‍यादा तार्किक हो, तो मैं तुमसे कहता हूं, श्रद्धा करो, समर्पण करो, त्‍याग करो, सर्व-स्‍वीकार भाव से झुको। अगर तुम बहुत ज्‍यादा तार्किक हो, तो मैं तुम से कहूंगा कि यहां तर्क की कोई जरूरत नहीं है, बस मेरी और देखो और प्रेम में डूब जाओ। अगर ऐसा कर सको तो अच्‍छा है, क्‍योंकि यह एक प्रेम का नाता है। अगर तुम श्रद्धा में जी सकते हो, तो तुम्‍हारी ऊर्जा सूर्य से चंद्र की और सरक जाएगी।</p>
<p>      जब तुम्‍हारी ऊर्जा सूर्य से चंद्र की और सरक जाती है। तो एक नयी ही संभावना का द्वार खुलता है। तुम फिर चंद्र के भी पार जा सकत हो, तब तुम साक्षी हो जाते हो, और वही है उद्देश्‍य, वही है मंजिल।</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>पतंजलि : योग-सूत्र,</p>
<p>भाग—4, प्रवचन—13</strong></p>
<br />Filed under: <a href='http://oshosatsang.org/category/%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%9c%e0%a4%b2%e0%a4%bf-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%97-%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0/'>पतंजलि का योग सुत्र--</a> Tagged: <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/'>ओशो</a>, <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6/'>स्‍वामी आनंद प्रसाद</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/oshosatsang.wordpress.com/4566/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/oshosatsang.wordpress.com/4566/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/oshosatsang.wordpress.com/4566/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/oshosatsang.wordpress.com/4566/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/oshosatsang.wordpress.com/4566/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/oshosatsang.wordpress.com/4566/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/oshosatsang.wordpress.com/4566/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/oshosatsang.wordpress.com/4566/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/oshosatsang.wordpress.com/4566/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/oshosatsang.wordpress.com/4566/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/oshosatsang.wordpress.com/4566/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/oshosatsang.wordpress.com/4566/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/oshosatsang.wordpress.com/4566/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/oshosatsang.wordpress.com/4566/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&#038;blog=12293864&#038;post=4566&#038;subd=oshosatsang&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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			<media:title type="html">कूर्म-नाड़ी पर संयम संपन्‍न —पतंजलि   </media:title>
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	</item>
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		<title>कंठ पर संयम संपन्‍न करने से क्षुधानु पिपासा की अनुभूतियां क्षीण हो जाती है—पतंजलि</title>
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		<pubDate>Sun, 13 May 2012 01:33:48 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[पतंजलि का योग सुत्र--]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

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		<description><![CDATA[कण्ठ कूपे क्षुत्‍पिपासानिवृति: यह आंतरिक अन्‍वेषण है। योग जानता है कि अगर हमको भूख लगती है तो भूख पेट में ही अनुभव नहीं होती है। जब प्‍यास लगती है, तो वह ठीक-ठीक गले में ही अनुभव नहीं होती। पेट मस्‍तिष्‍क &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/05/13/%e0%a4%95%e0%a4%82%e0%a4%a0-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%af%e0%a4%ae-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%b8/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&#038;blog=12293864&#038;post=4563&#038;subd=oshosatsang&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>कण्ठ कूपे क्षुत्‍पिपासानिवृति:</strong><div id="attachment_4564" class="wp-caption alignright" style="width: 256px"><a href="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/05/98-16-surrendering-copy.jpg"><img src="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/05/98-16-surrendering-copy.jpg?w=246&h=300" alt="कंठ पर संयम संपन—पतंजलि " title="कंठ पर संयम संपन्‍न —पतंजलि " width="246" height="300" class="size-medium wp-image-4564" /></a><p class="wp-caption-text">कंठ पर संयम संपन्‍न करने से क्षुधानु पिपासा की अनुभूतियां क्षीण हो जाती है—पतंजलि</p></div></p>
<p>     यह आंतरिक अन्‍वेषण है। योग जानता है कि अगर हमको भूख लगती है तो भूख पेट में ही अनुभव नहीं होती है। जब प्‍यास लगती है, तो वह ठीक-ठीक गले में ही अनुभव नहीं होती। पेट मस्‍तिष्‍क को भूख की सूचना देता है। और फिर मस्‍तिष्‍क हम तक इसकी सूचना पहुँचाता है। उसके पास कुछ अपने संकेत होते है। उदाहरण के लिए, जब हमें प्‍यास लगती है, तो मस्‍तिष्‍क ही गले में प्‍यास की अनुभूति को जगा देता है। जब शरीर को पानी चाहिए होता है, तो मस्‍तिष्‍क गले में प्‍यास के लक्षण जगा देता है। और हमको प्‍यास लगने लगती है। जब हमें भोजन चाहिए होता है, तो मस्‍तिष्‍क पेट में कुछ निर्मित करने लगता है। और भूख सतानें लगती हे।<span id="more-4563"></span></p>
<p>      लेकिन मस्‍तिष्‍क को बड़ी आसानी से धोखा दिया जा सकता है। पानी में शक्‍कर घोलकर भी पी लो और भूख शांत हो जाती है। क्‍योंकि मस्‍तिष्‍क केवल शक्‍कर की ही बात समझ सकता है। तो इसलिए अगर शक्‍कर खा लो, या पानी में शक्‍कर घोलकर पीलो तो तुरंत मस्‍तिष्‍क को यह लगने लगता है कि अब कुछ और नहीं चाहिए। भूख मिट जाती है। इसीलिए जो लोग बहुत ज्‍यादा मीठे पदार्थ खाते है उनकी भोजन में रूचि समाप्‍त हो जाती है। शक्‍कर की थोड़ी सी मात्रा से पोषण नहीं हो सकता है। लेकिन मस्‍तिष्‍क मूर्ख बन जाता है। शक्‍कर खाकर व्‍यक्‍ति मस्‍तिष्‍क तक यह सूचना पहुंचा देता है कि उसने कुछ खा लिया है। तत्‍क्षण मस्‍तिष्‍क को लगता है कि तुमने खूब खा लिया और भोजन में शक्‍कर की मात्रा ज्‍यादा हो गयी है। तुमने तो शक्‍कर की गोली ही खायी है; इस तरह से मस्‍तिष्‍क को एक भ्रम निर्मित हो जाता है।</p>
<p>      योग ने यह बात खोज ली है कि किन्हीं सुनिश्‍चित केंद्रों पर संयम संपन्‍न करने से चीजें तिरोहित हो जाती है। उदाहरण के लिए अगर कोई कंठ पर संयम ले आए, तो उसे नक तो प्‍यास लगेगी, और न ही भूख लगेगी। इसी तरह से योगी लोग लंबे समय तक उपवास कर लेते थे। महावीर के लिए ऐसा कहा जाता है। कि वे कई बार तीन महीने, चार महीने तक निरंतर उपवास करते थे। जब महावीर अपनी ध्‍यान और साधना में लीन थे, तो कोई बारह वर्ष की अवधि में करीब ग्‍यारह वर्ष तक वे उपवासे ही रहे, भूखे ही रहे। तीन महीने उपवास करते और फिर एक दिन थोड़ा आहार लेते थे। फिर एक महीने उपवास करते और बीच में दो दिन भोजन ले लेते। इसी तरह से निरंतर उनके उपवास चलते रहते। तो बारह वर्षों में कुल मिलाकर एक वर्ष उन्‍होंने भोजन किया; इसका अर्थ हुआ कि बारह दिन में एक दिन भोजन और ग्‍यारह दिन उपवास।</p>
<p>      वे ऐसा कैसे करते थे? कैसे वे ऐसा कर सकते थे? यह बात तो असंभव ही मालूम होती है। आम आदमी के लिए असंभव है भी। लेकिन योगियों के पास कुछ रहस्‍य है।</p>
<p>      अगर कोई व्‍यक्‍ति कंठ में एकाग्र रहता है&#8230;..थोड़ा कोशिश करके देखना। अब जब तुम्‍हें प्‍यास लगे, तो अपनी आंखें बंद कर लेना, और अपना पूरा ध्‍यान कंठ पर एकाग्र कर लेना। जब पूरा ध्‍यान उसी में स्‍थित हो जाता है। तो तुम पाओगे कि कंठ एकदम शिथिल हो गया। क्‍योंकि जब तुम्‍हारा पूरा ध्‍यान किसी चीज पर एकाग्र हो जाता है। तो तुम उस से अलग हो जाते हो। कंठ में प्‍यास लगती है, और हमें लगता है जैसे मैं ही प्‍यासा हूं। अगर तुम प्‍यास के साक्षी हो जाओ, तो अचानक ही तुम प्‍यास से अलग हो जाओगे। प्‍यास के साथ जो तुम्‍हारा तादात्म्य हो गया थ वह टूट जाएगा। तब तुम जानोंगे कि कंठ प्‍यासा है। मैं प्‍यासा नहीं हूं। और तुम्‍हारे बिना तुम्‍हारा कंठ कैसे प्‍यासा हो सकता है।</p>
<p>      क्‍या तुम्‍हारे बिना शरीर को भूख लग सकती है? क्‍या किसी मृत आदमी को कभी भूख या प्‍यास लगती है? चाहे पानी की एक-एक बूंद शरीर से उड़ जाए, शरीर से पानी की एक-एक बूंद विलीन हो  जाए, तो भी मृत व्‍यक्‍ति को प्‍यास का अनुभव नहीं हो सकता। शरीर को प्‍यास अनुभव करने के लिए शरीर के साथ तादात्‍म्‍य चाहिए।</p>
<p>      इस प्रयोग को करके देखना। जब कभी तुम्‍हें भूख लगे तो अपनी आंखे बंद कर लेना, और अपने कंठ तक गहरे उतर जाना। फिर ध्‍यान से देखना। तुम देखोगें कि कंठ तुम से अलग है। और जैसे ही तुम देखोगें, कि कंठ तुम से अलग है। तो शरीर यह कहना बंद कर देगा कि शरीर भूखा है। शरीर भूखा हो नहीं सकता है, शरीर के साथ तादात्‍म्‍य ही भूख को निर्मित करता है।</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>पतंजलि:  योग-सूत्र</p>
<p>भाग—4</p>
<p>प्रवचन—13</strong></p>
<br />Filed under: <a href='http://oshosatsang.org/category/%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%9c%e0%a4%b2%e0%a4%bf-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%97-%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0/'>पतंजलि का योग सुत्र--</a> Tagged: <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/'>ओशो</a>, <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6/'>स्‍वामी आनंद प्रसाद</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/oshosatsang.wordpress.com/4563/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/oshosatsang.wordpress.com/4563/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/oshosatsang.wordpress.com/4563/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/oshosatsang.wordpress.com/4563/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/oshosatsang.wordpress.com/4563/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/oshosatsang.wordpress.com/4563/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/oshosatsang.wordpress.com/4563/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/oshosatsang.wordpress.com/4563/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/oshosatsang.wordpress.com/4563/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/oshosatsang.wordpress.com/4563/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/oshosatsang.wordpress.com/4563/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/oshosatsang.wordpress.com/4563/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/oshosatsang.wordpress.com/4563/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/oshosatsang.wordpress.com/4563/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&#038;blog=12293864&#038;post=4563&#038;subd=oshosatsang&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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			<media:title type="html">कंठ पर संयम संपन्‍न —पतंजलि </media:title>
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		<title>मृत्‍यु की ठीक-ठीक भविष्‍य वाणी—पतंजलि</title>
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		<pubDate>Sat, 12 May 2012 15:50:43 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[पतंजलि का योग सुत्र--]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

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		<description><![CDATA[’सक्रिय व निष्‍क्रिय या लक्षणात्‍मक वह विलक्षणात्‍मक—इन दो प्रकार के कर्मों पर संयम पा लेने के बाद मृत्‍यु की ठीक-ठीक घड़ी की भविष्‍य सूचना पायी जा सकती है।‘’ सोपक्रमं निरूपक्रमं च कर्म तत्‍संयमादपारान्‍तज्ञानमरिष्‍टेभये वा। तो इसे दो प्रकार से जाना &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/05/12/%e0%a4%ae%e0%a5%83%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%af%e0%a5%81-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%a0%e0%a5%80%e0%a4%95-%e0%a4%a0%e0%a5%80%e0%a4%95-%e0%a4%ad%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e2%80%8d/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&#038;blog=12293864&#038;post=4560&#038;subd=oshosatsang&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>’सक्रिय व निष्‍क्रिय या लक्षणात्‍मक वह विलक्षणात्‍मक—इन दो प्रकार के कर्मों पर संयम पा लेने के बाद मृत्‍यु की ठीक-ठीक घड़ी की भविष्‍य सूचना पायी जा सकती है।‘’<div id="attachment_4561" class="wp-caption alignright" style="width: 230px"><a href="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/05/12042107180985isnj6v1.jpg"><img src="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/05/12042107180985isnj6v1.jpg?w=220&h=300" alt="मृत्‍यु की ठीक-ठीक भविष्‍य वाणी—पतंजलि " title="मृत्‍यु की ठीक-ठीक भविष्‍य वाणी—पतंजलि " width="220" height="300" class="size-medium wp-image-4561" /></a><p class="wp-caption-text">मृत्‍यु की ठीक-ठीक भविष्‍य वाणी—पतंजलि</p></div></p>
<p>सोपक्रमं निरूपक्रमं च कर्म तत्‍संयमादपारान्‍तज्ञानमरिष्‍टेभये वा।</strong></p>
<p>     तो इसे दो प्रकार से जाना जा सकता है। या तो प्रारब्‍ध को देखकर या फिर कुछ लक्षण और पूर्वाभास है जिन्‍हें देख कर जाना जा सकता है।</p>
<p>      उदाहरण के लिए, जब कोई व्‍यक्‍ति मरता है तो मरने के ठीक नौ महीने पहले कुछ न कुछ होता है। साधारणतया हम जागरूक नहीं होते है। और वह घटना बहुत ही सूक्ष्‍म होती है। मैं नौ महीने कहता हूं—क्‍योंकि प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति में इसमे थोड़ी भिन्‍नता होती है। यह निर्भर करता है: समय का जो अंतराल गर्भधारण और जन्‍म के बीच मौजूद रहता है। उतना ही समय मृत्‍यु को जानने का रहेगा। अगर कोई व्‍यक्‍ति गर्भ में नौ महीने रहने बाद जन्‍म लेता है, तो उसे नौ महीने पहले मृत्‍यु का आभास होगा। अगर कोई दस महीने गर्भ में रहता है तो उसे दस महीने पहले मृत्‍यु का अहसास होगा, कोई सात महीने पेट में रहता है तो उसे सात महीने पहले उसे मृत्‍यु का एहसास होगा। यह इस बात पर निर्भर करता है कि गर्भधारण और जन्‍म के समय के बीच कितना समय रहा।<span id="more-4560"></span></p>
<p>      मृत्‍यु के ठीक उतने ही महीने पहले हार में, नाभि चक्र में कुछ होने लगता है। हारा सेंटर को क्‍लिक होना ही पड़ता है। क्‍योंकि गर्भ में आने और जन्‍म के बीच नौ महीने का अंतराल था: जन्‍म लेने में नौ महीने का समय लगा, ठीक उतना ही समय मृत्‍यु के लिए लगेगा। जैसे जन्‍म लेने के पूर्व नौ महीने मां के गर्भ में रहकर तैयार होते हो, ठीक ऐसे ही मृत्‍यु की तैयारी में भी नौ महीने लगेंगे। फिर वर्तुल पूरा हो जायेगा। तो मृत्‍यु के नौ महीने पहले नाभि चक्र में कुछ होने लगता है।</p>
<p>      जो लोग जागरूक है, सजग है, वे तुरंत जान लेंगे कि नाभि चक्र में कुछ टूट गया है; और अब मृत्‍यु निकट ही है। इस पूरी प्रक्रिया में लगभग नौ महीने लगते है।</p>
<p>      या फिर उदाहरण के लिए, मृत्‍यु के और भी कुछ अन्‍य लक्षण तथा पूर्वाभास होते है, कोई आदमी मरने से पहले, अपने मरने के ठीक छह महीने पहले, अपनी नाक की नोक को देखने में धीरे-धीरे असमर्थ हो जाता है। क्‍योंकि आंखें धीरे-धीरे ऊपर की और मुड़ने लगती है। मृत्‍यु में आंखे पूरी तरह ऊपर की और मुड़ जाती है। लेकिन मृत्‍यु के पहल ही लौटने की यात्रा का प्रारंभ हो जाता है। ऐसा होता है: जब एक बच्‍चा जन्‍म लेता है, तो बच्‍चे की दृष्‍टि थिर होने में करीब छह महीने लगते है। साधारणतया ऐसा ही होता है। लेकिन इसमे कुछ अपवाद भी हो सकते है—बच्‍चे की दृष्‍टि ठहरने में छह महीने लगते है। उससे पहले बच्‍चे की दृष्‍टि थिर नहीं होती। इसी लिए तो छह महीने का बच्‍चा अपनी दोनों आंखें एक साथ नाक के करीब ला सकता है। और फिर किनारे पर भी आसानी से ला सकता है। इसका मतलब है बच्‍चे की आंखे अभी थिर नहीं हुई है।  जिस दिन बच्‍चे की आंखे थिर हो जाती है। फिर वह दिन छह महीने के बाद का हो। या दस महीने के बाद का हो, ठीक उतना ही समय लगेगा फिर उतने ही समय के पूर्व आंखें शिथिल होने लगेंगी। और ऊपर की और मुड़ने लगेंगी। इसीलिए भारत में गांव के लोग कहते है, निश्‍चित रूप से इस बात की खबर उन्‍हें योगियों से मिली होगी—कि मृत्‍यु आने के पूर्व व्‍यक्‍ति अपनी ही नाक की नोक को देख पाने में असमर्थ हो जाता है।</p>
<p>      और भी बहुत सी विधियां है, जिनके माध्‍यम से योगी निरंतर अपनी नाक की नोक पर ध्‍यान देते है। वह नाक की नोक पर अपने को एकाग्र करते है। जो लोग नाक की नोक पर एकाग्र चित होकर ध्‍यान करते है, अचानक एक दिन वे पाते है कि वे अपनी ही नाक की नोक को देख पाने में असमर्थ है, वे अपनी नाक की नोक नहीं देख सकते है। इस बात से उन्‍हें पता चल जाता है कि मृत्‍यु अब निकट ही है।</p>
<p>      योग के शरीर विज्ञान के अनुसार व्‍यक्‍ति के शरीर में सात चक्र होत है। पहला चक्र है मूलाधार, और अंतिम चक्र है सहस्‍त्रार, जो सिर में होता है। इन दोनों के बीच में पाँच चक्र और होते है। जब भी व्‍यक्‍ति कि मृत्‍यु होती है; तो वह किसी एक निश्‍चित चक्र के द्वारा अपने प्राण त्याग ता है। व्‍यक्‍ति ने किस चक्र से शरीर छोड़ा है, वह उसके इस जीवन के विकास को दर्श देता है। साधारणतया तो लोग मूलाधार से ही मरते है। क्‍योंकि जीवन भर लोग काम-केंद्र के आसपास ही जीते है। वे हमेशा सेक्‍स के बारे ही सोचते है, उसी की कल्‍पना करते है, उसी के स्‍वप्‍न देखते है, उनका सभी कुछ सेक्‍स को लेकर ही होता है—जैसे कि उनका पूरा जीवन काम केंद्र के आसपास ही केंद्रित हो गया हो। ऐसे लोग मूलाधार से काम केंद्र से ही प्राण छोड़ते है। लेकिन अगर कोई व्‍यक्‍ति प्रेम का उपलब्‍ध हो जाता है। और कामवासना के पार चला जाता है। तो वह ह्रदय केंद्र से प्राण को छोड़ता है। और अगर कोई व्‍यक्‍ति पूर्णरूप से विकसित हो जाता है, सिद्ध हो जाता है तो वह अपनी ऊर्जा को, अपने प्राणों को सहस्‍त्रार से छोड़ेगा।</p>
<p>      और जिस केंद्र से व्‍यक्‍ति की मृत्‍यु होती है, वह केंद्र खुल जाता है। क्‍योंकि तब पूरी जीवन ऊर्जा उसी केंद्र से निर्मुक्‍त होती है&#8230;..</p>
<p>      जिस केंद्र से व्‍यक्‍ति प्राणों को छोड़ता है, व्‍यक्‍ति का निर्मुक्‍ति देने वाला बिंदू स्‍थल खुल जाता है। उस बिंदु स्‍थल को देखा जा सकता है। किसी दिन जब पश्‍चिमी चिकित्‍सा विज्ञान योग के शरीर विज्ञान के प्रति सजग हो सकेगा। तो वह भी पोस्‍टमार्टम का हिस्‍सा हो जाएगा। कि व्‍यक्‍ति कैसे मेरा। अभी तो चिकित्‍सक केवल यही देखता है कि व्‍यक्‍ति की मृत्‍यु स्‍वाभाविक हुई है, या  उसे जहर दिया गया है। या उसकी हत्‍या की गयी है, या उसके आत्‍महत्‍या की है—यही सारी साधारण सी बातें चिकित्‍सक देखते है। सबसे आधारभूत और महत्‍वपूर्ण बात की चिकित्‍सक चूक जाते है। जो कि उनकी रिपोर्ट में होनी चाहिए—कि व्‍यक्‍ति के प्राण किस केंद्र से निकले है: काम केंद्र से निकले है, ह्रदय केंद्र से निकले है, या सहस्‍त्रार से निकले है। किसी केंद्र से उसकी मृत्‍यु हुई है।</p>
<p>      और इसकी संभावना है, क्‍योंकि योगियों ने इस पर बहुत काम किया है। और इसे देखा जा सकता है। क्‍योंकि जिस केंद्र से प्राण-ऊर्जा निर्मुक्‍त होती है। वही विशेष केंद्र टूट जाता है। जैसे कि कोई अंडा टूटता है और कोई चीज उससे बहार आ जाती है। ऐसे ही जब कोई विशेष केंद्र टूटता है, तो ऊर्जा वहां सक निर्मुक्‍त होती है।</p>
<p>      जब कोई व्‍यक्‍ति संयम को उपल्‍बध हो जाता है। तो मृत्‍यु के ठीक तीन दिन पहले वह सजग हो जाता है, कि उसे कौन से केंद्र से शरीर छोड़ना है। अधिकतर तो वह सहस्‍त्रार से ही शरीर को छोड़ता है। मृत्‍यु के तीन दिन पहले एक तरह की हलन-चलन, एक तरह की गति, ठीक सिरा के शीर्ष भाग पर होने लगती है।</p>
<p>      यह संकेत हमे मृत्‍यु को कैसे ग्रहण करना, इसके लिए तैयार कर सकते है। और अगर हम मृत्‍यु को उत्‍सवपूर्ण ढंग से, आनंद से, अहो भाव से नाचते गाते कैसे ग्रहण करना है, यह जान लें—तो फिर हमारा दूसरा जन्‍म नहीं होता। तब इस संसार की पाठशाला में हमारा पाठ पूरा हो गया। इस पृथ्‍वी पर जो कुछ भी सीखने को है उसे हमने सीख लिया। अब हम तैयार है किसी महान लक्ष्‍य महान जीवन और अनंत-अनंत जीवन के लिए। अब ब्रह्मांड में संपूर्ण अस्‍तित्‍व में समाहित होने के लिए हम तैयार है। और इसे हमने अर्जित कर लिया है।</p>
<p>      इस सूत्र के बारे में एक बात और क्रिया मान कर्म, दिन प्रतिदिन के कर्म, वे तो बहुत ही छोटे-छोटे कर्म होते है। आधुनिक मनोविज्ञान की भाषा में हम इसे चेतन कह सकते है। इसके नीचे होता है प्रारब्‍ध कर्म। आधुनिक मनोविज्ञान की भाषा में हम इसे ‘’अवचेतन’’ कह सकते है। उससे भी नीचे होता है, संचित कर्म; आधुनिक मनोविज्ञान की भाषा में इसे हम अचेतन कह सकते है।</p>
<p>      साधारणतया तो आदमी अपनी प्रतिदिन की गतिविधियों के बारे में सजग ही नहीं होता, तो फिर प्रारब्‍ध या संचित कर्म के बारे में कैसे सचेत हो सकता है। यह लगभग असंभव ही है। तो तुम दिन प्रतिदिन की छोटी-छोटी गतिविधियों में सजग होने का प्रयास करना। अगर सड़क पर चल रह हो, तो सड़क पर सजग होकर, होश पूर्वक चलना। अगर भोजन कर रहे हो तो सजगता पूर्वक करना। दिन में जो कुछ भी करो, उसे होश पूर्वक सजगता से करना। कुछ कार्य करो, उस कार्य पूरी तरह से डूब जाना। उसके साथ एक हो जाना। फिर कर्ता और कृत्‍य अलग-अलग न रहें। फिर मन इधर-उधर ही नहीं भागता रहे। जीवित लाश की भांति कार्य मत करना। जब सड़क पर चलो तो ऐसे मत चलना जैसे कि किसी गहरे सम्‍मोहन में चल रहे हो। कुछ भी बोलों वह तुम्‍हारे पूरे होश सजगता से आए, ताकि तुम्‍हें फिर कभी पीछे पछताना न पड़े।</p>
<p>      अगर तुम इस प्रथम चरण को उपलब्‍ध कर लेते हो, तो फिर दूसरा चरण अपने से सुलभ हो जाता है, तब तुम अवचेतन में उतर सकते हो।</p>
<p>      तो फिर जब कोई तुम्‍हारा अपमान करता है, तो जिस समय तुम्‍हें क्रोध आया, जागरूक हो जाओ। तब किसी ने तुम्‍हारा अपमान किया—और क्रोध की एक छोटी सी तरंग, जो कि बहुत ही सूक्ष्‍म होती है। तुम्‍हारे अस्‍तित्‍व के अवचेतन की गहराई में उतर जाती है। अगर तुम संवेदनशील और जागरूक नहीं हो, तो तुम उस उठी हई सूक्ष्‍म तरंग को पहचान न सकोगे। जब तक कि वह चेतन में न आ जाए, तुम उसे नहीं जान सकोगे। वरना, धीरे-धीरे तुम सूक्ष्‍म बातों को, भावनाओं को सूक्ष्‍म तरंगों के प्रति सचेत होने लगोगे—वही है प्रारब्‍ध, वहीं है अवचेतन।</p>
<p>      और जब अवचेतन के प्रति सजगता आती है। तो तीसरा चरण भी उपलब्‍ध हो जाता है। जितना अधिक व्‍यक्‍ति का विकास होता है, उतने ही अधिक विकास की संभावना के द्वार खुलते चले जाते है। तीसरे चरण को, अंतिम चरण को देखना संभव है। जो कर्म अतीत में संचित हुए थे। अब उनके प्रति सजग हो पाना संभव है। जब व्‍यक्‍ति अचेतन में उतरता है। तो इसका अर्थ है कि वह चेतन के प्रकाश को अपने अस्‍तित्‍व की गहराईयों में ले जा रहा है। व्‍यक्‍ति संबोधि को उपलब्‍ध हो जाएगा। संबुद्ध होने का अर्थ यही है, कि अब कुछ भी अंधकार में नहीं है। व्‍यक्‍ति का अंतस्‍तल का कोना-कोना प्रकाशित हो गया। तब वह जीता भी है, कार्य भी करता है, लेकिन फिर भी किसी तरह के कर्म का संचय नहीं होता।</p>
<p><strong> ओशो</p>
<p>पतंजलि को योग सूत्र—भाग-4</p>
<p>प्रवचन—11</strong></p>
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		<title>पोनी एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा-(अध्‍याय—15)</title>
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		<pubDate>Sat, 12 May 2012 02:06:06 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[पोनी--एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा]]></category>
		<category><![CDATA[मनसा]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

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		<description><![CDATA[जंगल में गीदड़ों नं घेरा&#8211; कल बच्‍चों के साथ जंगल में घूमने के लिए मैं गया तो मुझे इतना अच्‍छा लगा। पूरा दिन में उन्‍हें ख्‍यालों में खोया रहा। इसी से मुझे लगा की मुझे अगले दिन भी जंगल में &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/05/12/%e0%a4%aa%e0%a5%8b%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%95-5/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&#038;blog=12293864&#038;post=4557&#038;subd=oshosatsang&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जंगल में गीदड़ों नं घेरा&#8211;</strong><div id="attachment_4558" class="wp-caption alignright" style="width: 310px"><a href="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/05/dsc04859-640x480.jpg"><img src="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/05/dsc04859-640x480.jpg?w=300&h=225" alt="पोनी एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा--(15) स्‍वामी आनंद प्रसाद" title="पोनी एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा--(15) स्‍वामी आनंद प्रसाद" width="300" height="225" class="size-medium wp-image-4558" /></a><p class="wp-caption-text">पोनी एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा&#8211;(15) स्‍वामी आनंद प्रसाद</p></div></p>
<p>      कल बच्‍चों के साथ जंगल में घूमने के लिए मैं गया तो मुझे इतना अच्‍छा लगा। पूरा दिन में उन्‍हें ख्‍यालों में खोया रहा। इसी से मुझे लगा की मुझे अगले दिन भी जंगल में ले जाये। मैं मन्‍नत और ज़िद्द दोनों एक साथ करने लगे। कि आज भी किसी तरह जंगल में ले जाये। जिस दिन भी हम जंगल में जाते है अक्सर उस दिन इतवार होता है। लेकिन ये भी अजीब बात होती थी&#8230;. उस दिन कोई न कोई व्‍यक्‍ति जरूर ध्‍यान करने के लिए आ ही जाता था। उस दिन खास कर मुझे किसी का भी आन फूटी आंखों नहीं सुहाता था।  लगता कि न जाने ये लोग क्‍यों नाहक किसी को भी घर में आने देते है। और फिर यह देख कर तो और भी बूरा लगता की वह खाना भी खाता है। मुझे लगता इस को किस तरह से भगा दूँ। मैं भोंकता भी खुब उन्‍हें गुस्‍से में, पर मुझसे वे लोग डरते कम ही थे। शायद मेरे आकर के हिसाब से अभी में बच्‍चा था। मुझे ये भी पता था कि अगर मैंने किसी को काट लिया तो पापा जी गुस्‍सा करेंगें। पर मैं इस गुस्‍से को अपने मन में ही दबा कर रह जाता था। वरना तो मेरे दाँत तो कुलकुलाते थे बस एक बार उनके पैर में गाड दु। अब देखो हम कुत्तों में ये बीमारी कहां से आई, इतनी वफादारी क्‍यों?  और इस बात को लेकर कि क्‍यों लोग हमारे घर में आते है,<span id="more-4557"></span> वह पूरा दिन मेरे इसी तनाव में गुजरता। एक और बात मैं किसी पर भी भरोसा नहीं करता था, मुझे शक की बिमारी थी। मुझे सब चौर और उठाईगीरे ही लगते थे, लगता की जरा आँख बची नहीं कि ये कुछ न कुछ उठा कर ले जायेगे। इस लिए में आने वाले को कभी भी अकेले नहीं छोड़ता था। ध्‍यान के लिए सब अंदर जाते तो मेरा भी बहुत मन करता पर मुझे बहार निकाल दिया जाता। पूरे ध्‍यान में मैं दरवाजे के बाहर उनका इंतजार करता रहा। ध्‍यान के बाद कुछ लोग जो आस-पास रहते थे वे तो चले जाते। और कुछ जो दूर से आते थे वह तो खाना आदि खाकर ही जाते। उनके जाने के बाद तब मुझे कहीं चैन मिलता। उस दिन घर पर बहुत काम हो जाता। मम्‍मी पाप को एक मिनट का भी आराम नहीं मिल। पापा जी खाना खाने के बाद ही दूकान पर निकल जाते। ममि चाय बनाती या कुछ देर आराम करती। फिर हम सब को दूध मिलता। और ममि पापा जी की चाय ले कर दूकान पर चली जाती।  पर आज कुछ उलटा हो गया।  ममि चाय लेकर गई। और पाप जी को घर पर आते देख कर मुझे कुछ अहसास हुआ। और मेरा बाँछें खिल गई। लगा की हम जंगल में घूमने जाने वाले है। और सच में ऐसा ही हुआ। मुझे बहुत ही सुखद लग रहा था। मेरे पैर जमीन पर नहीं टीक रहे थे। ऐसा लगता था कि सारी दुनियां का सबसे भाग्‍यशाली में हूं&#8230;क्‍यों जंगल में जाना अनजाने ही मुझे बहुत अच्‍छा लगा था। इसका कारण भी मुझे पता नहीं था।</p>
<p>       में नाच-नाच और रौ-रौ कर पागल हो रहा था। कि जल्‍दी क्‍या नहीं करते इतनी देर क्‍यों लगा रहे हो, एक-एक मिनट युगों की तरह लग रहा था&#8230;न जाने इस आदमी को तैयार होने में कितनी देर लगती है। लो हम तो तैयार हो गये, पहनी गले में चेन&#8230;.कब चलोगे। और बच्‍चे है कि तैयार ही नहीं हो रहे, कोई पानी की बोतल उठा रहा है&#8230;.किसी तरह से आखिर काफिला जंगल की और चल दिया। शायद कल के बेर खाने के बाद बच्‍चों ने और बेर खाने की ज़िद्द की होगी। मुझे इस सब क्‍या मतलब, मुझे तो जंगल में जाने का बहाना चाहिए। जैसे-जैसे हवा में ठंडक बढ़ती थी वैसे-वैसे दिन छोटे होने लग जाते थे। अब श्‍याम से रात होने में ज्‍यादा देर नहीं थी। पर बच्‍चों ने कहां हम भाग कर जल्‍दी से बेर खा कर आ जायेगे। दादा जी भी कहने लगा अब रात जल्‍दी हो जाती है। जल्‍दी आना। मम्‍मी की भी यही राय थे। सितम्बर-अक्टूबर दिन रात में करीब एक घंटे का फर्क हो जाता है। हम सब जंगल की और तेज कदमों से चल दिये। सूर्य अभी आसमान पर ही था। पर इस समय उसकी तेजी कुछ कम हो गई थी। हम सब भाग-भाग कर एक दूसरे को पीछे छोड़ते धूल उड़ाते हवा से बातें करते कुछ ही देर में जंगल में पहुंच गये। और बच्‍चो के साथ आज पापा जी भी बेर खा रहे थे। मैं पापा जी के पास ही बैर मांगने गया। क्‍योंकि मैं जानता था कि पापा जी की गति सब से तेज है बेर तोड़ने में। अगर कल भी पापा जी हमारे साथ बेर तोड़ने के लिए आ जाते तो सब को इतने बेर तोड़ कर दे देते की आज किसी को आने का मन ही नही होता। पापा जी ने देखते ही देखते हिमांशु भैया की दोनों जेब भर दी वह सबसे खुश था। और दिखा रहा था कि देखो मेरे पास कितने बैर है। में भी अंदर ही अंदर जलन महसूस कर रह था। कि पापा जी ने हिमांशु भैया को इतने बैर दे दिये। और हम रह गये। पर मेरे पास तो न कपड़ थे न जेब ही थी। हालाकि शारदी अधिक होने पर मेरा भी कोट सिल्वा दिया गया था। और उसे पहन कर में कितने गर्व से घूमता था। पर ये बाद की बात थी।</p>
<p>      आज नाला भी बहुत जल्‍दी आ गया। लगा हम हवा से बातें करते हुए आये है। मैं भाग कर जल्‍दी से पानी में घूस गया। पानी उस समय घुटनों -घुटनों ही था। पानी पी कर मैं उसमें खेलने लगा। हवा में ठड़ंक होने पर भी मुझे गर्मी लग रहा थी। उस समय पानी में जाना बहुत अच्‍छा लग रहा था। पर सब लोगों को जल्‍दी से जल्‍दी आगे जाना था। अभी तो एक नाला और पार करना पड़ेगा। फिर उसके बाद और झंडियों शुरू हो जायेगी जहां पर अधिक बेर है। परंतु सूर्य है की हमसे भी तेज गति से अपने घर जाने के लिए आतुर है। वहां तेजी दूर डूबते सूर्य की तिरछी किरणें पानी में पड़ कर चमक रही थी। जो सीधी आंखों में पड़ने के कारण खुली भी नहीं जा रही थी। दूसरे नाले में पहुंच कर सब ने पानी पिया। और पापा जी ने हिमांशु को गोद में ले कर नाले को पार करवाया। वरूण भैया और दीदी तो बड़े मजे से कूद गए। मैं तो खुद ही पानी में खेल रहा था। और सब को दिखा रहा था की है किसी की हिम्‍मत जो मेरे से मुकाबला करे। अपनी इस एक तरफा विजय पर इतराते हुआ सबसे आगे भाग रहा था। श्‍याम होने में अभी काफी देर थी। उचे पेड़ों पर पक्षी आ-आ कर अपना सोने का स्‍थान बना रहे थे। उनके मधुर गीत अलग-अलग भाषा में पूरे जंगल में गुंज रहे थे। बीच-बीच में मोर भी अपनी दर्द भरी पूकार सूना रहा। कुछ पक्षी आपस में लड़ झगड़ रहे थे, अपनी जगह खाली करने के लिए, ये एक प्रकार से उनका खेल ही था। दूर झाड़ियों अचानक एक खरगोश निकल कर भाग, एक बार तो मेरी समझ में नहीं आया पर दूसरे ही पल मुझे खरगोश की याद आई और मैं पूरी ताकत लगा कर उसके पीछे भागा। पर ये कोई पालतू खरगोश थोड़े ही था। जिसे में पकड़ पाता। वह तो दो ही जंप में आँखों से ओझल हो गया। और में एक जगह खड़ा हो कर सुस्‍ता रहा था और समझने की कोशिश कर रह था की मैं कहां निकल आया। इतनी देर में जंगली मुर्गी एक झाड़ी से निकल कर कुं&#8230;.कुं&#8230;कुं&#8230;कर के र्फू..र..र से उड़ गई। एक बार तो में डर गया कि ये क्‍या आ गया। इतनी देर में मुझे पापा और दीदी की आवाज सुनाई दी। जो मेरे अचानक भागने के कारण मेरे पीछे आ रहे थे। उन्‍हें खतरे का भान था। की जंगल में कोई जंगली जानवर मुझ पर हमला कर सकता है। पर मैं इस सब से अंजान था। मैरा तो दौड़ना भागना एक खेल था।</p>
<p>      जैसे-जैसे हवा मैं ठंडक बढ़ रही थी दिन छोटे हो रहे थे। गर्मी में तो सूर्य अस्‍त होने पर भी गर्मी बनी रहती थी। पर अभी सूर्य डूबा भी नहीं  था।  कि हवा ठंडी हो गई थी। नाला पार कर सब झाड़ियों से लाल-लाल बेर तोड़ कर खाने में लग गये। बीच-बीच में अपनी तोड़-तोड़ कर अपने जेब बो में भी  डाल रहे थे। में भी कभी दीदी के पास कभी पापा जी के पास जा कर बेर मांग-मांग कर खाने लगा। मैं और हिमांशु भैया ऐसे थे जो बैर नहीं तोड़ पा रहे थे। उन झाड़ियों में बेर कम थे और कांटे ज्‍यादा। एक दो बार मैंने कोशिश भी की और कामयाब भी हुआ। और मजा भी बहुत आया। पर नाक पर कांटों का चुंबन का बहुत दर्द होता था। मैं जब कोई बैर तोड़ लेता तो कभी दीदी को दिखाता कभी हिमांशु भैया को चिड़ाने की कोशिश करता की देखो मेंने भी एक बेर तोड़ कर खाया। इस बात पर दीदी और वरूण भैया ताली बजा कर मेरा उत्साह बढ़ाते। और मैं फूल कर कुप्‍पा हो जाता।</p>
<p>      धीरे-धीरे सूर्य डूब रहा था। उसका लाला गोला कितना बड़ा लग रहा था। उससे आती किरणें अब आंखों में कम चुब रही थी। पर मैंने देखा है जब सूर्य डूबता है उसके आस पास बादलों का झुंड जरूर इक्ट्ठा हो जाता है। जैसे-जैसे सूर्य डूब रहा था। हवा की ठंडक के कारण और कुछ मैं पानी में भीग गया था। मुझे ठंड लग रही थी। और मेरे शरीर से झुरझुरी सी उठ रही थी। पर इस पर किसी का ध्‍यान नहीं गया। क्‍योंकि सब अपने-अपने बेर तोड़ने में तल्‍लीन थे। सब को पता था अभी थोड़ी ही देर में श्‍याम ढल जायेगी और फिर यहां से जाना होगा। दिन का समय होता तो शायद बच्‍चें खेलते भी। पर इस समय तो सब बेर खाने का मन बना कर आये थे। अचानक पास की झाड़ी में कुछ अजीब सी गंध महसूस हुई मेरा ध्‍यान उधर की और गया। और मेरे देखते ही वहां पर कुछ सरसराहट हुई। मुझे लगा कुछ गड़बड़ है। और में पापा जी के पास जाकर खड़ा हो कर उधर देखने लगा। पर पापा जी का ध्‍यान मेरी और नहीं था। वह बेर तोड़ने में मगन थे। बीच-बीच में बेर चख कर भी देख लेते थे कि इस झाड़ी के मीठे है या नहीं।</p>
<p>      उधर सूर्य डूब गया। और किस धीरे से अंधार ने अपना आस्‍तित्‍व प्रकृति पर फलाना शुरू कर रहा था। पर शायद पापा जी बेर तोड़ने में समय को भूल गये। और बच्चों को क्‍या भय होगा जब पापा जी उनके साथ है। तभी दूसरी बार मुझे झाड़ियों की और से गंध आई और में उस और धीरे-धीरे बढ़ने लगा। बिलकुल पास जाकर में डर के मारे जोर-जोर से भोंक कर पापा जी की और भाग। मेरे इस तरह से भोंकने से पापा जी को कुछ खतरे का एहसास हुआ। क्‍योंकि हमारा भोंकना मात्र भोंकना नहीं है। कभी वह किसी को डरा रहा होता है। कभी किसी के रोने से उसकी और हमदर्दी दिखा रहा होता है। कभी अधिकार का भोंकना होता है। कभी डर और भय का। आप ध्‍यान से देखोगें तो आप समझ सकते है कि मेरे भोंकने के प्रकार समय और स्‍थिति में भिन्न हो जाते है। मेरे इस तरह भयभीत होकर भौंकने के कारण पापा जी सतर्क हो गये। और इतनी देर में झाड़ी के अंदर से एक पूछ जो घास के रंग की थी वह जाती हुई दिखाई दी। उसके साथ  ही दूर गीदड़ों की हुंकार सुनाई दी। शायद वह मनुष्‍य को आगाह कर रहे थे। कि अब जंगल को तुम छोड़ दो अब निश होने वाली है और हम अपने खाने के लिए एकांत चाहिए। सो कृपया आप यहां से चले जाओ। इतने सारे गीदड़ों की आवाज इतने पास से आने के कारण मैं बहुत डर गया और पापा जी के पास जा कर कुं..कुं&#8230;.कुं&#8230;करके रोने लगा। पापा जी भी शायद खतरे को भांप गये थे। लेकिन ये बात उन्‍होंने बच्‍चों पर जाहिर नहीं होने दी। बच्‍चों ने भी गीदड़ों की हुंकार को सुना। और शायद वह भी कुछ समझ गये।</p>
<p>      पापा जी ने हिमांशु भैया को गोद में उठा लिया ओर दीदी को कहने लगे की चलो घर चलते है। मम्‍मी जी वहां पर हमारा इंतजार कर रही होगी। और रात भी होने वाली है। देखा गीदड़ भी अब कह रहे है। कि अब तुम घर जाओं अब हमारी बारी है बैर खाने की। और हम सब तेज कदमों से घने जंगल से घर की ओर चलने लगे। पास ही झाड़ियों से सरसराहट लगातार हमारा पीछा  कर रही थी। दबे पेर&#8230;घास का हिलना, और कुं—कुं  की आवाज आ रही थी। हम लोग जल्‍दी-जल्‍दी घने जंगल में से खुले मैदान में पहुंच गये। यहाँ पर झाड़ीया थोड़ी कम थी। चारों और रोझ-केर के पेड़ थे। परंतु बह कुछ ऊंचे थे उनके अंदर से दूर तक दिखाई दे रहा था। भाग्‍य से शायद आज पूर्णिमा की रात भी थी। सूर्य के अस्‍त होते ही वह आसमान पर बहुत बड़ा चाँद आ धमका था। पापा जी ने सब को कहां देखो कितना सुंदर चाँद है&#8230;इस पर कुछ देर के लिए सब ने खड़े हो कर चाँद को निहारा। पर कोई और समय होता तो सब खूब देर बैठ कर उसके दर्शन करते पर ये समय उचित नहीं था। आस पास गीदड़ों की सुगबुगाहट महसूस हो रही थी। धीरे-धीरे उनकी दूरी कम-से कम हो रही थी। अब भी हम गांव से 3-4 मील दूर थे। आस पास कोई ग्वाला भी नजर नहीं आ रहा था। जंगल आज एक दम सुनसान हो गया था। वरना तो भेड़-बकरीयों चराने वाले, जंगल से लकड़ी काटने वाले कोई न कोई राहगीर मिल ही जाता था। चाँद अपने पूरे यौवन पर आ रहा था, और अपनी रोशनी चारों और फैला रहा था। चाँद की रोशनी में पेड़ कैसे छद्म सौदर्य लिए दिखाई दे रहे थे। प्रकार की रोशनी उनके गूढ सौदर्य को बलात उघाड़ देती है। और चाँद उस सौदर्य में एक रहस्‍य भर देता है। हम सब सूखी घास को चीरते तेज कदमों से चले जा रहे थे। कभी-कभी मेरे पेर में भांखडी(एक प्रकार का कांटा) चुब जाता थी। और मैं एक पैर पर कुछ देर चल कर उसे निकाल देता था। पर उसके कांटे का जहर काफी देर तक दर्द करता था।</p>
<p>      घास खत्‍म हो रही थे और सामने ही रास्‍ता चौड़ा नजर आ रहा था। तब मेरी जान में जान आई। पर खतरा अभी भी कम नहीं हुआ था। रास्‍ते पर पहुंच कर पापा जी ने कहां चलो भागते है। पापा जी ने हिमांशु को अपनी गोद में लिया और सब बच्‍चों का आगे कर पीछे रह कर दौड़ रहे थे। सबसे आगे वरूण भैया थे। और उनके पीछे में मेरे पीछे दीदी। और सबसे बाद में पापा जी। क्‍यों पाप जी हिमांशु को अपनी पीठ पा लाद कर दौड़ रहे थे। मुझे भी बहुत मजा आता था जब पापा जी मुझे अपनी गोद में उठाते थे। पर अब मैं बड़ा हो गया था। हमने पहला नाला पार किया। चारों और शांति थी। पक्षी भी शोर मचा कर चुप सो गये थे। कभी-कभी किसी टटिहरी की कर्ण भेदी आवाज वातावरण को और रहस्‍यमय बना जाती थी। पापा जी हमारे पीछे चाक चौबंद चल रहे थे। उनके हाथ में एक मोटा लकड़ी का सोटा हमेशा साथ रहता था। पीछे से गीदड़ों की आवाज बार-बार आ रही थी। अब वह एक झुंड में नहीं कई झंडों में बिखर गये थे। कभी आवाज दक्षिण की तरफ से आती और कभी पीछे से कभी उत्‍तर की और से। मैं डर भी रहा था और दौड भी रहा था। चाँद की चांदनी में रास्‍ता दूर तक चमकता साफ दिखाई दे रहा था। पर पास की झाड़ियों में देख पान मुमकिन नहीं था। पहले नाले को पार करके हम खुले मैदान में आ गये। वहां पर शीशम,बबूल और रोझ के ऊंचे-ऊंचे वृक्ष थे। दूर एक जंगली गायों का झुंड एक मैदान में आराम कर रह था। कुछ नवयुवक साँड़ आपस में अपनी ताकत की आज़माई कर रहे थे। जिसके कारण वहां पर धूल का एक गुब्‍बार सा खड़ा हो गया था। कुछ छोटे बछड़े अपने मां के पास सट कर सो रहे थे। मां पास बैठी मजे से जुगाली कर-करे के झाग के गोले बना रही थी। मैं सोचता था ये ही तो वह दूध है जो मैं पीता हूं&#8230;.</p>
<p>      भागने के कारण सबकी साँसे फूल रही थी। उसके साथ पसीना भी आ रहा था। परंतु  रूकने को कोई तैयार नहीं था। पहले नाले और दूसरे नाले तक आने में हमने कम से कम दस मिनट का समय लगा। अब सामने दूसरा बड़ा नाला दिखाई दे रहा था। उसका रास्‍ता काफी चौड़ा था। हम जैसे ही नाले के पास पहुँचे, एक झाड़ी के अंदर से सांप निकल कर भागने लगा। शायद वह हमारे रास्‍ते में विश्राम कर रहा था। और हमारे पैरों की आहट पा कर डर गया। वरूण भैया सबसे आगे थे। मैं उसके पीछे, सांप मेरे और वरूण भैया के बीच में दौड़ रहा था। पापा जी और दीदी हमारे पीछे। पापा जी ने जैसे ही सांप को देखा वरूण भैया को आवाज दी की तुम्‍हारे पीछे सांप है, रूकना मत तेज दौड़ जितना तेज दौड सकते हो। वरूण भैया के साथ मैं भी पूरी ताकत लगा कर भागा। मानों हम जीवन की दौड-दौड रहे है&#8230;ओर सच ही वरूण भैया ने गजब किसा किसी चपलता से भैया दौड़ ये सब में देख कर अचरज से भर गया। मुझे लगता था मैं सबसे तेज दौड़ता हूं&#8230;मैं तो ठगा से देखता ही रह गया। और सांप भी मारे डर के और तेज से दौड़ रहा था। सब एक दूसरे से डर कर दौड़ रहे थे&#8230;..कोई किसी को मार नहीं रहा था, परंतु अंदर एक सुरक्षा का बचाव का नियम कार कर रहा था। नाले की ढलान के कारण हमारी गति और तेल हो गई और रेत के कारण सांप की गति कुछ कम हो गई। पापा जी खतरे को देख रहे थे। और हमे निर्देश दे रहे थे। मेरी समझ में तो कुछ नहीं आ रहा था पर शायद वरूण भैया समझ रहे थे। और में उनके पीछे दौड़ रहा था। अब नीचे उतरने के बाद जैसे ही पानी का नाला दिखाई दिया तब मेरी समझ में नहीं आ रहा था क्‍या करना है। पापा जी ने आवाज लगाई वरूण नाले को कूद जाओ और वरूण भैया छपाक से उस चौड़े नाले को कूद कर पार कर गया। मैंने भी कोशिश की पर में बीच में गीर गया और फटा-फट दूसरे किनारे निकल गया। लेकिन सांप तो पानी को पार नहीं कर सकता था। वह दाई और मुड़ गया।  वह बेचारा अपनी जाने बचाने के लिए पास की झाड़ियों में घूस गया। कुछ देर के लिए सबके प्राण अधर में अटक गये थे।  </p>
<p>      पानी में भीग जाने के कारण में मिट्टी में सन गया था। पर खुशी थी की हमने बहादुरी दिखाई। सब नाला पार कर उपर रूक गये। सब की साँसे तेज चल रही थी। पापा जी ने हिमांशु का नीचे उतारा। और वरूण भैया के सर पर प्‍यार से हाथ फेरते हुए कहां कि वरूण तो बहुत तेज फर्राटा मारता है। देखो सांप को भी पीछे छोड़ दिया। और इस तरह से हमारा भय कम करने लगे। वैसे जंगल में हमे रोज एक या दो सांप देखने को मिल ही जाते थे। पर इस तरह की दौड़ पहली बार की। सब हंस रहे थे। और पापा जी ने मेरे को गोद में उठा कर मेरी मिट्टी को झाड़ने साथ-साथ मुझे प्‍यार दुलार भी कर रहे थे। मैं भी खुशी के मारे पूंछ हिला रहा था। दीदी जो हममें सबसे बड़ी थी वह खतरे को समझ रही थी। और बार-बार वरूण भैया का पसीना पोंछने के साथ-साथ दुलार भी कर रही थी। हिमांशु भैया ने भी पा जा कर वरूण भैया का हाथ अपने हाथ में लेकर उसे देखता रहा। खतरे में हम एक सुकड़ कर कैसे एक दूसरे के नजदीक आ जाते है। दूर अब भी गीदड़ों की हंकार आ रही थी। पर अब हम उनकी पकड़ के बहार थे। दोनों नाले पार करने के बाद गांव की सीमा आ जाती थी। जहां देर तक लोग दशा मैदान को आते रहते थे। अब हम घर के नजदीक थे। श्‍याम अब रात में बदल चुकी थी। पर चाँद की चाँदनी भूगड़े (सफेद) की तरह खीली इतरा रही थी। हम सब धीरे-धीरे घर की और चल दिये। पापा जी ने सब को कहा की ममि जो को ये सांप वाली बात मत बताना। वरना नहीं तो फिर हम जंगल में नहीं आने दिया जायेगा। में भी अपनी पूछ हिला रहा था। पर शायद एक मैं ही ऐसा था जो उस बात पर पक्‍का अमल कर सकता था। वरना तो किसी न किसी के मुख से कभी ने कभी ये बात निकल ही आती। इतनी देर में दादाजी की आवाज सुनाई दी। मनवा&#8230;मनवा&#8230;.दादा जी दीदी को मनवा कह कर पुकारते थे। जब हमारे इतनी देर तक घर नहीं पहुंचे।  तब शायद ममि जी ने उन्‍हें हमे ढूंढने के लिए दादा जी को भेजा था। पास आ कर दादा जी ने हिमांशु भैया का हाथ पकड़ लिया और पापा जी को लगे डांटने। कि बच्‍चों को इतनी रात तक जंगल में घुमाना अच्‍छी बात नहीं है। शुक्र है सांप की बात को उन्‍हें पता नहीं है, वरना तो पापा जी की और भी शामत आ जाती।</p>
<p>      खुशी के साथ एक रोमांच से भर कर हम घर की और चल दिये। चाँद हमें देख रहा था&#8230;ओर हमारा पीछा कर रहा था। मानों कह रहा है&#8230;इस सुंदर एकांत को छोड़ कर तुम क्‍या जा रहे हो&#8230;परंतु हमें जाना ही था। चाँद का क्‍या&#8230;वह तो आसमान में था, और हम ज़मीं पर, उसे कौन से सांप और गीदड़ों का भय था&#8230;&#8230;</p>
<p><strong>स्‍वामी आनंद प्रसाद ‘मनसा’</p>
<p>’’पोनी एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा’’</strong></p>
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			<media:title type="html">पोनी एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा--(15) स्‍वामी आनंद प्रसाद</media:title>
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		<title>अन्‍ना कैरेनिना: लियो टॉलस्टॉय (ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)</title>
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		<pubDate>Fri, 11 May 2012 16:06:18 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[ओशो की प्रिय पूस्‍तके--]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

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		<description><![CDATA[जीवन के शाश्‍वत, अबूझ रहस्‍यों और विरोधाभासों को सुलझाने का एक ललित प्रयास&#8212; अन्‍ना कैरेनिना रशियन समाज की एक संभ्रांत महिला की कहानी है। जो अनैतिक प्रेम संबंध जोड़कर अपने आपको बरबार कर लेती है। इस उपन्‍यास में टॉलस्‍टॉय कदम-कदम &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/05/11/%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%88%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b-%e0%a4%9f%e0%a5%89%e0%a4%b2/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&#038;blog=12293864&#038;post=4554&#038;subd=oshosatsang&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जीवन के शाश्‍वत, अबूझ रहस्‍यों और विरोधाभासों को सुलझाने का एक ललित प्रयास&#8212;</strong><div id="attachment_4555" class="wp-caption alignright" style="width: 210px"><a href="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/05/232770.jpg"><img src="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/05/232770.jpg?w=200&h=300" alt="अन्‍ना कैरेनिना : एक असाधारण किताब--ओशो" title="अन्‍ना कैरेनिना : एक असाधारण किताब--ओशो" width="200" height="300" class="size-medium wp-image-4555" /></a><p class="wp-caption-text">अन्‍ना कैरेनिना : एक असाधारण किताब&#8211;ओशो</p></div></p>
<p>     अन्‍ना कैरेनिना रशियन समाज की एक संभ्रांत महिला की कहानी है। जो अनैतिक प्रेम संबंध जोड़कर अपने आपको बरबार कर लेती है। इस उपन्‍यास में टॉलस्‍टॉय कदम-कदम पर यह दिखाता है कि समाज कैसे स्‍त्री और पुरूष के विषय में दोहरे मापदंड रखता है। अन्‍ना के सगा भाई ऑब्‍लान्‍स्‍की के अनैतिक प्रेम संबंध होते है, और न केवल वह अपितु उसके स्‍तर के कितने ही पुरूष खुद तो पत्‍नी से धोखा करते है, लेकिन अपनी पत्‍नियों से वफादारी की मांग करते है। समाज चाहता है कि पत्‍नी अपने पति की बेवफाई को भूल जाये और उसे माफ कर दे।<span id="more-4554"></span></p>
<p>      अन्‍ना कैरेनिना एक आकर्षक, करुणापूर्ण और गरिमा मंडित महिला है। उसके संपर्क में आने वाले सभी लोग उसका समादर करते है। उससे अभिभूत है। अन्‍ना का करिश्‍मा सभी पुरूषों पर असर करता है। सिवाय उसके पति के। उनका विवाह प्रेम-विहीन है। उनका पति संगदिल पुरूष है जिसे सामाजिक दिखावे और अपनी पद-प्रतिष्‍ठा की फिक्र अधिक है। और अन्‍ना की भावनाओं और सुख दुःख की कम।</p>
<p>      अन्‍ना एक दहकती हुई आग है। उसमे साहस है, और वांछित सुख को पा लेने की हिम्‍मत भी। वह उच्‍च वर्ग की स्‍त्रियों की रीति और रिवाज को ताक पर रखकर एक सेना अधिकारी ब्रॉन्‍सकी के साथ प्रेम करने लगती है। दोनों एक बॉल डांस में मिलते है, और एक दूसरे के प्रेम में पड़ जाते है। इस अवैध प्रेम की राह पर निडरता से आगे बढ़कर अन्‍ना अपने प्रेम को अपने पति के आगे कबूल करती है।</p>
<p>       जब वह पति को छोड़कर ब्रॉन्‍स्‍की के साथ विदेश जाती है तब अपने बेटे से बिछुड़ जाती है। पति बेटे से कहता है कि उसकी मां मर गई। बेटे के जन्‍म दिन पर वह किसी तरह चोरी छुपे पहुँचती है लेकिन उसकी खुशी कुछ पल जी पाती है क्‍योंकि उसका  पति फौरन उसे पकड़ लेता है और वहां से निकाल बाहर कर देता है। बड़े चाव से लाये हुए खिलौने भी वह अपने बच्‍चे को नहीं दे पाती है। पति अपने बेटे से कहता है, ‘’इस औरत ने इतना कुकर्म किया है कि वह उसे दुबारा नहीं देख पायेगा। वह बहुत बुरी औरत है।‘’</p>
<p>      अन्‍ना पति कसे तलाक लेने के लिए तरसती है। जब उसे प्‍यार का इतना बड़ा सरोवर मिला है तो वह निर्दयी पति के साथ रूखी-सूखी जिंदगी क्‍यों बीताये? लेकिन उसका पति उसे तलाक देने से इन्‍कार कर देता है। अन्‍ना उसकी प्रेमी ब्रॉन्‍स्‍की के साथ विवाह कर प्रतिष्‍ठित जीवन नहीं जी सकती। उसके पूर्व परिचित मित्र प्रियजन और समाज का प्रतिष्‍ठित वर्ग उसे व्‍यभिचारिणी कह उससे बचना चाहता है। यहां तक कि वह थियटर भी नहीं जा सकती। अन्‍ना को चारदीवारी में बंद रहकर, घुट-घुट कर अपना समय काटना पड़ता है। जब कि ब्रॉन्‍स्‍की मजे से समाज में घूमता फिरता है।</p>
<p>      अन्‍ना अपने प्‍यार पर सब कुछ क़ुर्बान कर देती है—घर, बेटा, प्रतिष्‍ठा। इन हालातों का असर उसके दिमाग पर होता है और वह मानसिक रोग की शिकार हो जाती है। वह सदा भयभीत रहती है, चिड़ चिड़ी और तनाव ग्रस्त हो जाती है। रिश्‍ता तनावपूर्ण हो जाता है, और ब्रॉन्‍स्‍की के प्‍यार का झरना सूख जाता है। सब तरफ से असफल, हताश अन्‍ना स्‍वयं को बदनसीब समझने लगती है। और निराशा के गहन क्षण में अपने आपको ट्राम के नीचे झोंक देती है।</p>
<p>      मृत्‍यु के उपरांत भी समाज उसकी भर्त्‍सना ही करता है। ब्रॉन्‍स्‍की की मां उसके बारे में कहती है : ‘’वह बदज़ात औरत थी। इतनी विवश वासना। सिर्फ कुछ असाधारण करने के चक्‍कर में उसने अपना और दो शानदार पुरूषों का विनाश कर दिया।‘’</p>
<p>      उसकी नन्‍हीं, ब्रॉन्‍स्‍की से पैदा हुई बेटी भी बाद में उसके पति के पास जाती है।</p>
<p>      अन्‍ना का अपराध इतना था कि उसने एक ऐसे पुरूष से प्रगाढ़ प्रेम किया जो उसका पति नहीं था। लेकिन रशिया के सुसंस्‍कृत, प्रतिष्‍ठित समाज ने उसे ऐसा नारकीय जीवन जीने को मजबूर कर दिया कि उससे उसे मृत्‍यु अधिक सार्थक मालूम हुई।</p>
<p>      टॉलस्‍टॉय ने यह उपन्‍यास उस समय लिखा जब वह रशियन समाज से वितृष्‍ण हो चुका था। उच्‍चवर्गीय समाज के नकली मूल्‍य, उनका पाखंड, उनका छिछोलापन, संस्‍कृति की गिरावट, उनका सबका सशक्‍त पारदर्शी चित्रण करने के साथ-साथ वह समाजिक समस्‍याओं का भी वर्णन करता है। जैसे किसान और जमींदार, स्‍त्री और पुरूष का भेदभाव, अन्ना कैरेनिना की मृत्‍यु की घटना के सहारे वह जीवन और मृत्‍यु की मूलभूत पहेली की दार्शनिकता भी दिखाना चाहता था।</p>
<p>      अन्‍ना कैरेनिना रशियन साहित्‍य की सर्वाधिक लोकप्रिय नायिकाओं में से एक है। उसका अभिभूत कर देनेवाला सौंदर्य इस गहरे और समृद्ध उपन्‍यास के वातास को धेरे रहता है। टॉलस्‍टॉय के अनुसार यह जीवन के शाश्‍वत, अबूझ रहस्‍यों और विरोधाभासों को सुलझाने का एक ललित प्रयास है। उपन्‍यास का प्रारंभ जिस वक्‍तव्‍य से होता है। वह वक्‍तव्‍य ही टॉलस्‍टॉय की गहरी अनंतदृष्टि का प्रतीक है।</p>
<p>      ‘’सारे सुखी परिवार एक जैसे होते है; लेकिन हर दुःखी परिवार अपने ही ढंग से दुखी होता है।‘’</p>
<p>      यह उपन्‍यास जिस काल में लिख गया—1875—77, उसमे समय की गति बहुत धीमी थी। लोगों के पास बहुत वक्‍त था। इसलिए 804 पृष्‍ठों की प्रदीर्घ किताब पढ़ना उनके लिए बड़ा मुश्‍किल मामला नहीं था। आज की आपाधापी में जो इतना लंबा कागजी सफर करने को तैयार हो, वही इस उपन्‍यास के संपन्‍न ताने बाने का आनंद ले सकता है।</p>
<p><strong>ओशो का नजरिया:</strong></p>
<p><strong>अन्‍ना कैरेनिना : एक असाधारण किताब</strong></p>
<p>      लियो टॉलस्‍टॉय की अन्‍ना कैरेनिना बहुत खुबसूरत उपन्‍यास है। तुम हैरान होओगे कि मनपसंद किताबों में मैं उपन्‍यास को क्‍यों सम्‍मिलित कर रहा हूं। क्‍योंकि मैं दीवाना हूं। मुझे अजीबोगरीब चीजें अच्‍छी लगती है। अन्‍ना कैरेनिना मेरी प्रिय किताबों में एक है। मुझे याद है मैंने उसे कितनी बार पढ़ा है।</p>
<p>      यदि मैं सागर में डूब रहा होऊंगा और विश्‍व के लाखों उपन्‍यासों में से मुझे एक चुनाना होगा तो मैं अन्‍ना कैरेनिना चुनूंगा। इस खूबसूरत किताब के साथ रहना सुंदर होगा। उसे बार-बार पढ़ना होगा, तो ही आप से महसूस कर सकते है। सूंघ सकते है। और स्‍वाद ले सकते है। असाधारण किताब है यह।</p>
<p>      लियो टॉलस्‍टॉय एक असफल संत रहा, जैसे महात्‍मा गांधी असफल संत रहे। लेकिन टॉलस्‍टॉय महान उपन्‍यासकार था। महात्‍मा गांधी ईमानदारी का शिखर बनने में सफल रहे और आखिर तक बने रहे। इस सदी में मैं किसी और आदमी को नहीं जानता जो इतना ईमानदार हो। जब वे लोगों को पत्र लिखते थे: योर्स सिंसयरली, तब वे सचमुच ईमानदार थे। जब तुम लिखते हो, ‘’सिंसयरली योर्स’’ तब तुम जानते हो, और हर कोई जानता है कि सब बकवास है। बहुत कठिन है। लगभग असंभव—बस्‍तुत: ईमानदार  होना।</p>
<p>      लियो टॉलस्‍टॉय ईमानदार होना चाहता था। लेकिन हो न सका। उसने भरसक कोशिश की। मुझे उसकी कोशिशों से पूरी सहानुभूति है। लेकिन यह धार्मिक आदमी नहीं था। उसे कुछ और जन्‍म रूकना होगा। एक तरह से अच्‍छा है कि वह मुक्‍तानंद जैसा धार्मिक आदमी नहीं था। नहीं तो हम ‘’रिसरेक्‍शन, वॉर एंड पीस, अन्‍ना कैरेनिना, जैसी अत्‍यंत सुंदर एक दर्जन रचनाओं से वंचित रह जाते।</p>
<p><strong>ओशो<br />
बुक्‍स आय हैव लव्‍ड </strong></p>
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		<title>स्‍वार्थ पर संयम संपन्न करने से अन्‍य ज्ञान से भिन्‍न पुरूष उपलब्‍ध होता है—पतंजलि</title>
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		<pubDate>Fri, 11 May 2012 01:49:38 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[पतंजलि का योग सुत्र--]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

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		<description><![CDATA[‘’स्‍वार्थसंयमात्‍पुरूश ज्ञानम्&#8211; तत: प्रतिभश्रावणवेदनादर्शास्‍वादवार्ता जायन्‍ते। पतंजलि कहते है, ‘’स्‍वार्थ परम ज्ञान ले आता है।‘’ स्‍वार्थ। स्‍वार्थी हो जाओ, यही है धर्म का वास्‍तविक मर्म, यह जानने का प्रयास करो कि तुम्‍हारा वास्‍तविक स्‍वार्थ क्‍या है। स्‍वयं को दूसरों से अलग &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/05/11/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%af%e0%a4%ae-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a8-%e0%a4%95/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&#038;blog=12293864&#038;post=4549&#038;subd=oshosatsang&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>‘’स्‍वार्थसंयमात्‍पुरूश ज्ञानम्&#8211;</p>
<p>तत: प्रतिभश्रावणवेदनादर्शास्‍वादवार्ता जायन्‍ते।</strong><div id="attachment_4550" class="wp-caption alignright" style="width: 203px"><a href="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/05/images.jpg"><img src="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/05/images.jpg?w=640" alt="पतंजलि का योग-सूत्र--भाग4 (ओशो)" title="पतंजलि का योग-सूत्र--भाग4 (ओशो)"   class="size-full wp-image-4550" /></a><p class="wp-caption-text">‘’स्‍वार्थसंयमात्‍पुरूश ज्ञानम्&#8211;<br />तत: प्रतिभश्रावणवेदनादर्शास्‍वादवार्ता जायन्‍ते।</p></div></p>
<p>     पतंजलि कहते है, ‘’स्‍वार्थ परम ज्ञान ले आता है।‘’</p>
<p>      स्‍वार्थ। स्‍वार्थी हो जाओ, यही है धर्म का वास्‍तविक मर्म, यह जानने का प्रयास करो कि तुम्‍हारा वास्‍तविक स्‍वार्थ क्‍या है। स्‍वयं को दूसरों से अलग पहचानने का प्रयास करो—परार्थ, दूसरों से अलग। और यह मत सोचना कि जो लोग तुम से अलग है, बहार है, वहीं दूसरे है। वे तो दूसरे है ही। लेकिन तुम्‍हारा शरीर भी दूसरा है। एक दिन तुम्‍हारा शरीर भी मिट्टी में मिल जायेगा। शरीर भी इस पृथ्‍वी का अंश है। तुम्‍हारी श्‍वास भी तुम्‍हारी नहीं है। वह भी दूसरों के द्वारा दी हुई है; वह हवा में वापस लौट जायेगी। बस कुछ थोड़े समय के लिए ही तुम्‍हें श्‍वास दी गयी है। वह श्‍वास उधार मिली हुई है। तुम्‍हें उसे लौटाना ही होगा। तुम यहां नहीं रहोगे। लेकिन तुम्‍हारी श्‍वास यहीं हवाओं में रहेगी। तुम  यहां नहीं रहोगे, लेकिन तुम्‍हारा शरीर पृथ्‍वी में रहेगा। मिट्टी-मिट्टी में मिल जाएगी। जिसे अभी तुम अपना रक्‍त समझते हो, वह नदियों में प्रवाहित हो रहा होगा। सभी कुछ यहीं समाहित हो जाएगा।<span id="more-4549"></span></p>
<p>      लेकिन एक चीज तुमने किसी से उधार नहीं ली। और वह है तुम्‍हारा साक्षी भाव, वह है तुम्‍हारी जागरूकता। बुद्धि खो जायेगी, तर्क खो जाएगा। यह सभी ऐसे ही है जैसे आकाश में बादल आते है: वे आते है और फिर चले जाते है। लेकिन आकाश वहीं का वही रहता है। तुम विराट आकाश की भांति ही बने रहोगे। वहीं अनंत विराट आकाश पुरूष है—अंतर आकाश ही पुरूष है।</p>
<p>      इस अंतर आकाश को कैसे जाना जा सकता है। इसके लिए स्‍वार्थ में संयम प्रतिष्‍ठित करना होता है। धारण, ध्‍यान और  समाधि इन तीनों को आत्‍मा पर केंद्रित कर दो—भीतर की और मुड़ जाओ पश्‍चिम में लोग बाहर की और भाग रहे है। तुम हमेशा बाहर की और ही भागते हो। भीतर मुड़ो। अपनी चैतन्‍य को केंद्रीय बिंदू तक ले आने दो। विषय वस्‍तु के बीच की भिन्‍नता को पहचानना होगा। जब भूख लगे—भूख एक विषय है। फिर तुमने भोजन कर लिया और भोजन करके संतुष्‍ट हो गए, तो एक प्रकार का सुख मिलता है—यह सुख की प्राप्‍ति भी एक तरह का विषय है। सुबह होती है—यह भी एक विषय है, सांझ होती है, यह भी एक विषय है, तुम वैसे ही रहते हो—भूख हो या न हो, जीवन हो या मृत्‍यु हो, दुःख हो या सुख हो, तुम उसी भांति साक्षी बने रहते हो।</p>
<p>      इसके पश्‍चात अंतर्बोध युक्त श्रवण, स्‍पर्श, दृष्‍टि, आस्‍वाद और आध्राण की उपलब्‍धि चली आती है।</p>
<p>      फिर से इस प्रतिभा शब्‍द को समझ लेना। जो व्‍यक्‍ति परिपूर्ण ध्‍यान को उपलब्‍ध हो जाता है, परिपूर्ण जागरूकता, होश को उपलब्‍ध हो जाता है, परिपूर्ण अंतर स्‍पष्‍टता, निर्दोषता को उपलब्‍ध हो जाता है, वह व्‍यक्‍ति प्रतिभा को उपलब्‍ध हो जाता है। प्रतिभा अंतर्बोध नहीं है। सूर्य; अंतर्बोध है चंद्र, प्रतिभा इन दोनों का अतिक्रमण है। पुरूष बौद्धिक होता है, स्‍त्री अंतर्बोध से जीती है। लेकिन बुद्ध पुरूष न तो पुरूष होता है और न स्‍त्री होता है।</p>
<p>        अगर कोई व्‍यक्‍ति बुद्धि से जीता है तो वह आक्रामक होता है। बुद्धि आक्रामक होती है। सूर्य ऊर्जा आक्रामक होती है। इसीलिए हमने कभी नहीं सुना कि किसी स्‍त्री ने किसी पुरूष का बलात्‍कार किया हो। यह असंभव है। केवल पुरूष ही स्‍त्री का बलात्‍कार कर सकता है। सूर्य ऊर्जा आक्रामक होती है। चंद्र-ऊर्जा ग्राहक होती है। बुद्धि आक्रामक होती है; अंतर्बोध ग्राहक होती है। अगर तुममें ग्राहकता है, ग्रहण करने की क्षमता है, तो अंतर्बोध से जुड़ जाओगे। फिर वह चीजें दिखाई पड़ने लगती है। जिन्‍हें एक बुद्धि से जीने वाला व्‍यक्‍ति कभी नहीं देख सकता।, क्‍योंकि वह खुला हुआ नहीं है।</p>
<p>      और मजेदार बात बुद्धि से जीने वाला व्‍यक्‍ति उन्‍हीं की खोज में होता है, और अंतर्बोध वाला आदमी उनकी तलाश में नहीं होता। लेकिन फिर भी उन्‍हें देख कसता है। सच तो यह है, सभी बड़े-बड़े आविष्‍कार बौद्धिक लोगों से ही संपन्‍न होते है। लेकिन वे आविष्‍कार तभी संभव हो सकते है जब वे अंतर्बोध की भाव दशाओं में होते है। बड़े-बड़े आविष्‍कार अंतर्बोध से संचालित लोगों के द्वारा नहीं हो पाते है। क्‍योंकि उन्‍हें उनकी खोज नहीं होती। अगर वे उसके निकट भी आ जाएं, अगर वे उनके ठीक सामने भी आ जाएं, तो भी वे उनको भूल जाते है।</p>
<p>      इसी कारण तो स्‍त्रियां कभी कोई आविष्‍कार नहीं कर पाईं, ऐसा नहीं है कि उनके साथ उस तरह की घटनाएं कभी घटित नहीं हुई—पुरूषों की अपेक्षा वे घटनाएं उनके साथ अधिक घटित होती है। थोड़ा इस बात पर कभी गौर करना यहां तक कि पाक विज्ञान, भोजन-शास्‍त्र, भी पुरूषों द्वारा रचा गया है। स्‍त्रियों के द्वारा नहीं। सभी अच्‍छे रसोईए पुरूष है। कम से कम भोजन के क्षेत्र में तो ऐसा नहीं होना चाहिए। लेकिन सभी बड़े-बड़े होटल, पाँच सितारा होटल, सब नये प्रयोग पाक-शास्‍त्र संबंधित सारी खोजें, सब नये प्रयोग पुरूषों ने किये है। ऐसा नहीं है कि वे आविष्‍कार नहीं कर सकती है—वह कर सकती है—लेकिन वे तो केवल ग्रहणशील होती है। कई बार ऐसी परिस्थिति आती है जब वे कुछ आविष्‍कार कर सकती है। लेकिन वह ऐसे ही चली जाती है। वे उस और ध्‍यान ही नहीं देती है।</p>
<p>            जो बौद्धिक होते है, जो लोग बुद्धि से जीते है, वे निरंतर खोजबीन में लगे रहते है। हर जगह कुछ न कुछ खोजते रहते है; वे कोई सी भी बात ऐसी नहीं चाहते है, जो बिना प्रकट हुए बिना उधड़ रह जाए। वे हर कोने कातर को उघाड़ने की कोशिश में लगे रहते है। मनस्‍विदों का कहना है कि सभी वैज्ञानिक खोजों का कारण पुरूष की काम ऊर्जा है।</p>
<p>      तुम किसी छोटे लड़के को कोई खिलौना पकड़ा दो: कुछ मिनट में ही वह खिलौना टूट-फूट जाएगा। वह बच्‍चा उस खिलौने से को खोलेगा, उसे देखेगा। वह उस खिलौने के भीतर देखना चाहता है कि वहां है क्‍या। तुम किसी छोटी लड़की के हाथ में खिलौना दे दो: वह वर्षों तक उसे सम्‍हालकर रखेगी। वह उसे अलमारी में रखकर ताला लगा देगी। या उस खिलौने को सजाएगी-संवारेगी। लेकिन अगर लड़का हुआ तो वह तुरंत उसे तोड़ फोड देगा। वह उसे खोलकर देखना चाहता है। कि खिलौना कैसे बना। वह जानना चाहता है कि यह खिलौना कैसे चलता है। वह उसे गहराई में उतरना चाहता है। वह पूरी खोज बीन कर लेना चाहता है।</p>
<p>      पूरा का पूरा विज्ञान एक ढंग से पुरूष की काम भावना ही है—खोजते जाना, खोजते जाना।</p>
<p>      पुरूषों के लिए बुद्धि से जीना आसान होता है, क्‍योंकि बुद्धि भी उसी दिशा में गति करती है। जिसमे आक्रामकता, तार्किकता गति करती है। स्‍त्रियां अधिक अंतर्बोध से जीती है। वे अपनी अंतस प्रेरणा से जीती है। स्‍त्रियां तुरंत निर्णय ले लेती है। इसी लिए किसी भी स्‍त्री के साथ तर्क करना बहुत कठिन है। वह पहले से ही निर्णय पर पहुंच जाती है। तर्क करने की कोई जगह ही नहीं बचती। स्‍त्री के साथ तर्क करना अपना समय नष्‍ट करना है। वह हमेशा पहले से ही जानती है कि अंतिम परिणाम क्‍या होने वाला है। वह तो केवल परिणाम की घोषणा की प्रतीक्षा में रहती है। तुम किसी भी ढंग से स्‍त्री से तर्क करो&#8230;..सब व्‍यर्थ वाला है। वह पहले से ही परिणाम के संबंध में सुनिश्‍चित होती है।</p>
<p>      जादू-टोने की कला स्‍त्रियों की कला-कौशल रही है। इसीलिए इसे जादू-टोना कहते है। जादूगरनियों का सारा संसार अंतर्बोध से जुड़ा रहा है। पंडित पुरोहित इस जादू टोने की कला के विरोध में थे। क्‍योंकि उनका तो पूरा संसार ही बुद्धि से जुड़ा हुआ था। स्मरण रहे, जादू-टोने से संबंधित लगभग सभी स्‍त्रियां ही थी; और लगभग सभी पंडित पुरोहित पुरूष थे। पहले तो पंडित-पुरोहितों ने जादू-टोने वाली स्‍त्रियों को जला डालने की कोशिश की। मध्‍य युग में यूरोप में इसी कला के कारण हजारों स्‍त्रियों को जला दिया था। क्‍योंकि पंडित-पुरोहितों की समझ के बाहर था अंतर्बोध के जगत को समझना। उनका इसमें विश्‍वास ही न था। वह बात ही उन्‍हें खतरनाक लगती थी। वे जादू-टोने वाली स्‍त्रियों को पूरी तरह से मिटा देना चाहते थे।</p>
<p>      और उन्‍होंने पूरी तरह से नष्‍ट भी कर दिया। उन्‍होंने संवेदनशीलता के सबसे सुंदर माध्‍यम, सूक्ष्म ज्ञान के सुंदरतम साधन बुद्धि के जगत से ऊपर के श्रेष्‍ठतम संभावनाओं के सबसे सुंदर जगत को नष्‍ट कर देने का प्रयास किया। जहां कहीं भी उन्‍हें कोई जादू-टोने वाली स्‍त्री मिली, उन्‍होंने उसकी हत्‍या कर दी। और पंडित-पुरोहितों ने स्‍त्रियों को इतना भयभीत कर दिया कि स्‍त्रियों ने भय के कारण उस क्षमता को ही खो दिया।</p>
<p>      अब फिर वैसी ही स्‍थिति मौजूद हो गई है। मनोविश्‍लेषक अंत ज्ञान की कला के विरूद्ध है—वे सब पुरूष है। अब मनोविश्‍लेषकों ने पंडित-पुरोहितों का स्‍थान ले लिया है—वे सब पुरूष है। फ्रायड वादी, एडलर के पीछे चलने वाले, वे सभी पुरूष है। वे स्‍त्री के विरूद्ध है, स्‍त्री के खिलाफ है। और क्‍या तुम्‍हें मालूम है उनके यहां आने वाले अधिकांश रोगियों में स्‍त्रियां ही होती है। इसमें जरूर कुछ बात है।</p>
<p>      और जब स्‍त्री जादूगरनियों हुआ करती थी। तो उनके अधिकांश रोगी पुरूष थे। बुद्धि अंतर्बोध का  सहयोग चाह रही थी। पुरूष स्‍त्री की मदद चाह रहा था।</p>
<p>      अब इसके ठीक विपरीत हो रहा है। सभी मनोविश्‍लेषक पुरूष है और उनकी सभी रोगी स्‍त्रियां है। अब अंतर्बोध इतना अपंग और विनष्‍ट हो चुका है कि उसे बुद्धि की मदद लेनी ही पड़ रही है। श्रेष्‍ठ निम्‍न का सहयोग खोज रहा है। यह तो मनुष्‍य जाति का ह्रास है, मनुष्‍य जाति की दुर्दशा है। यह बहुत ही दुःख की बात है। ऐसा नहीं होना चाहिए।</p>
<p>      विज्ञान का पूरा इतिहास इसे प्रमाणित भी करता है। जब अंतर्बोध का उपयोग विधि की भांति किया जाता था। तो उसकी कीमिया भी मौजूद थी। जब बुद्धि की शक्‍ति बढ़ गयी, तो वह कीमिया, वह अल्‍केमी भी खो गई, और तब रसायन का, केमिस्‍ट्री का जन्‍म हुआ। अल्‍केमी या कीमिया का संबंध अंतर्बोध से है, कैमिस्ट या रसायन का संबंध बुद्धि से है। अल्‍केमी चंद्र था; केमिस्‍ट्री सूर्य है। जब चंद्र प्रमुख था, तब अंतर्बोध प्रवल था। ज्‍योतिष विज्ञान का आस्‍तित्‍व था। अब तो गणित खगोल-विज्ञान का अस्‍तित्‍व है। ज्‍योतिष तो खो गया है। ज्‍योतिष है चंद्र, खगोल है सूर्य। और इस कारण संसार बहुत दरिद्र हो गया है।</p>
<p>      जैसे पुरूष को उसके सूर्य केंद्र पर खिलना है, ऐसे ही स्‍त्री को उसके चंद्र-तल पर खिलना है, लेकिन प्रतिभा उन दोनों के पार है। बुद्धि मनोविज्ञान है, अंतर्बोध परा मनोविज्ञान है, प्रतिभा उन दोनों के पार का मनोविज्ञान है।</p>
<p>      ‘’इसके पश्‍चात अंतर्बोध युक्‍त श्रवण स्‍पर्श, दृष्‍टि, आस्‍वाद और आध्राण की उपलब्‍धि चली आती है।</p>
<p>      स्‍मरण रहे, यह बात दो स्‍तर पर घट सकती है। अगर तुम चंद्र-केंद्रित व्‍यक्‍ति हो, स्‍त्री तत्‍व से जुड़े हुए हो—पुरूष हो या स्‍त्री हो उससे कुछ अंतर नहीं पड़ता है—अगर तुम चंद्र-केंद्र से क्रियाशील होते हो, तो तुम बहुत कुछ ऐसा सुन सकोगे, जिसे दूसरे लोग नहीं सुन सकेत। और तुम ऐसा बहुत कुछ देख सकोगे जिसे दूसरे लोग नहीं देख सकते है। तुम्‍हारे भीतर छिपे हुए अज्ञान तत्‍व की अनुभूति पाने की क्षमता तुममें आ जायेगी। तब अज्ञात का आयाम तुम्‍हारे लिए अपरिचित और अनजाना न रह जाएगा। अज्ञान तुम्‍हारे सामने थोड़ा अपना पर्दा उठाने लगेगा।</p>
<p>      आज परा-मनोविज्ञान के द्वारा मनोवैज्ञानिक इसी बात को अध्‍ययन कर रहे है। अब यह बात और जोर पकड़ रही है। अब कुछ विश्‍वविद्यालयों ने परा-मनोवैज्ञिक के विभाग भी खोले है। परा मनोविज्ञान पर आजकल बहुत अन्‍वेषण कार्य चल रहा है। यहां तक कि सोवियत रूस में भी। क्‍योंकि पुरूष तो एक ढंग से असफल हो गया है; सूर्य केंद्र असफल हो गया है। हम हजारों वर्षों से इसी सूर्य केंद्र के द्वारा जीते आए है; और वे लोग केवल हिंसा, युद्ध और दुःख में ही ले गए है। अब दूसरे केंद्र से जुड़ना है।</p>
<p>      सोवियत रूस तक में भी, जो कि पूरी तरह से सूर्य-केंद्रित है। कम्‍युनिस्‍टों का शासन है, जो किसी धर्म में, परमात्‍मा में विश्‍वास नहीं करता। वे भी इसके लिए प्रयास कर रहे है। और उन्‍होंने इस पर बहुत कार्य किया है। और बहुत खोज भी की है। हालांकि वे इसकी व्‍याख्‍या बुद्धि की भाषा में ही करते है—वे इसे अति संवेदन कहते है। वे इसे परा मनोविज्ञान नहीं कहते है। वे कहते है, यह भी एक तरह का संवेदना है, बस केवल सूक्ष्‍म है।</p>
<p>      और इस तरह से वे ठीक भी है। अंतर्बोध इंद्रियों से पार या बाहर की बात नहीं है, वह इंद्रियों का ही सूक्ष्‍म रूप है। प्रतिभा इंद्रियातीत है। इंद्रियों के पार है—उसमें किसी प्रकार की कोई संवेदना नहीं होती है। वे सीधी या प्रत्‍यक्ष होती है। प्रतिभा में इंद्रियाँ गिर चुकी होती है।</p>
<p>      यह योग की दृष्‍टि से व्‍यक्‍ति अपने भीतर सर्वज्ञातता है—सर्व ज्ञान व्‍यक्‍ति का वास्तविक स्‍वभाव ही है। असल में तो हम सोचते है कि हम आंखों के द्वारा देखते है; योग का कहना है कि तुम आंखों द्वारा नहीं देखते हो—तुम्‍हारी आंखें धोखा देती है। इसे थोड़ा समझ लें।</p>
<p>      तुम एक कमरे में खड़े होकर एक छोटे से छेद में से बहार देख रहे हो। निस्‍संदेह, कमरे में रहते समय तो यह अनुभव होता है कि वह छोटा से छेद तुम्‍हें बाहर के जगत की कुछ खबरें दे रहा है। तुम उसी छोटे से छेद को सब कुछ समझकर उसी पर केंद्रित हो सकते हो। ऐसा भी सोच सकते हो कि इस छोटे से छेद के बिना बाहर देखना असंभव है। योग का कहना है कि तब तुम एक भ्रांति में पड़ गये हो। इस छेद से देखा जा सकता है, लेकिन यह छेद ही देखने का कारण नहीं है। देखना तुम्‍हारी गुणवता है। तुम छेद से देख रहे हो; छेद स्‍वयं नहीं देख रहा। तुम्‍हीं द्रष्‍टा हो। आंखों के द्वारा जगत को देख जा सकता है।  आँख से तुम मुझे देख रहे हो, आँख शरीर में छेद की तरह से है। लेकिन भीतर तुम द्रष्‍टा हो। अगर शरीर के बाहर आकर देख सको, तो ठीक वैसा ही होगा जैसा कि अगर द्वार खोलकर बाहर आ जाओं तो तुम अपने को विराट आकाश के नीचे खड़ा हुआ पाओगे।</p>
<p>      ऐसा नहीं है कि होल के सुराख के गायब होने से तुम अंधे हो जाओगे। या तुम्‍हारा अस्‍तित्‍व ही नहीं रहेगा। सच तो यह है कि तब तुम्‍हें अहसास होगा। तब तुम समझोगे कि सुराख तुम्‍हें अंधा बना रहा है। वह तुम्‍हें बहुत सी सीमित दृष्‍टि दे रहा है। और जब संपूर्ण खुले आकाश के नीचे खड़े होगें ; तो संपूर्ण आस्‍तित्‍व को एक अलग ही दृष्‍टि से देख सकते हो। अब दृष्‍टि सीमित नहीं रही। किन्‍हीं सीमित  दायरों में बंधी हुई नहीं रहीं। क्‍योंकि अब आंखे किसी छोटे छेद से या खिड़की से नहीं देख रही है। अब तुम आकाश के नीचे खड़े होकर चारों और देख सकते हो।</p>
<p>      यही तो योग की दृष्‍टि है, और ठीक भी है। शरीर में जो इंद्रियाँ है, वह और कुछ नहीं केवल छोटे-छोटे सुराख है; कानों से सुना जा सकता है—यह छोटे-छोटे सुराख है। होल्‍स है, और व्‍यक्‍ति उनके पीछे छिपा हुआ है। योग का कहना है, इनके बाहर आ जाओ, इनसे बाहर निकल आओ, इनके पार चले जाओ। अगर व्‍यक्‍ति इन सुराखों से इन इंद्रियों से बाहर आ जाए ता वह सर्वज्ञात, सर्वशक्‍तिमान और  सर्वव्‍यापी हो जाता है। और यही है प्रतिभा।</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>पतंजलि को योग सूत्र</p>
<p>भाग—4, प्रवचन-17</strong></p>
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		<pubDate>Wed, 09 May 2012 02:21:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<p>एक बार पर्शिया का राज विशतस्‍या, <div id="attachment_4547" class="wp-caption alignright" style="width: 310px"><a href="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/05/triking_zarathustra.jpg"><img src="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/05/triking_zarathustra.jpg?w=300&h=204" alt="जसथुस्‍त्र--zarathustra--ओशो" title="जसथुस्‍त्र--zarathustra--ओशो" width="300" height="204" class="size-medium wp-image-4547" /></a><p class="wp-caption-text">जसथुस्‍त्र&#8211;zarathustra&#8211;ओशो</p></div> जब युद्ध जीतकर लौट रहा था, तो वह जरथुस्त्र के निवास के निकट जा पहुंचा। उसने इस रहस्‍यदर्शी संत के दर्शन करने की सोची। राज ने जरथुस्त्र के पास जाकर कहा, ‘’मैं आपके पास इसलिए अया हूं कि शायद आप मुझे सृष्‍टि और प्रकृति के नियम के विषय में कुछ समझा सकें। मैं यहां पर अधिक समय तो नहीं रूक सकता हूं, क्‍योंकि मैं युद्ध स्‍थल से लौट रहा हूं। और मुझे जल्‍दी ही अपने राज्‍य में वापस पहुंचना है, क्‍योंकि राज्‍य के महत्वपूर्ण मसले महल में मेरी प्रतीक्षा कर रहे है।</p>
<p>      जरथुस्‍त्र  राजा की और देखकर मुस्‍कुराया और जमीन से गेहूँ का एक दाना उठा कर राजा को दे दिया और उस गेहूँ के दाने के माध्‍यम से यह बताया कि ‘’गेहूँ के इस छोटे से दाने से, सृष्‍टि के सारे नियम और प्रकृति की सारी शक्‍तियां समाई हुई है।<span id="more-4546"></span></p>
<p>      राजा तो जरथुस्‍त्र के इस उत्‍तर को समझ ही न सका, और जब उसने अपने आसपास खड़े लोगों के चेहरे पर मुस्‍कान देखी तो वह गुस्‍से के मारे आग-बबूला हो गया। और उसे लगा कि उसका उपहास किया गया है, उसने गेहूँ के उस दाने को उठाकर जमीन पर पटक दिया। और जरथुस्‍त्र से उसने कहा, ‘’मैं मूर्ख था जो मैंने अपना समय खराब किया, और आप से यहां पर मिलने चला आया।‘’</p>
<p>      वर्ष आए और गए। वह राजा एक अच्‍छे प्रशासन और योद्धा के रूप में खूब सफल रहा। और खूब ही ठाठ-बाट और ऐश्‍वर्य का जीवन जी रहा था। लेकिन रात को यह सोने के लिए अपने विस्‍तर पर जाता तो उसके मन में बड़े ही अजीब-अजीब से विचार से विचार उठने लगते और उसे परेशान करते; मैं इस आलीशान महल में खूब ठाठ बाट और ऐश्‍वर्य से जीवन जी रहा हूं, लेकिन आखिरकार मैं कब तक इस समृद्धि, राज्‍य, धन-दौलत से आनंदित होती रहूंगा। और जब मैं मर जाऊँगा तो फिर क्‍या होगा। क्‍या मेरे राज्‍य की शक्‍ति, मेरा घन-दौलत, संपति मुझे बीमारी से और मृत्‍यु से बचा सकेंगी। क्‍या मृत्‍यु के साथ ही सब कुछ समाप्‍त हो जाता है?</p>
<p>      राजमहल में एक भी आदमी राजा के इन प्रश्‍नों का उत्‍तर नहीं दे सका। लेकिन इसी बीच जरथुस्‍त्र की प्रसिद्धि चारों और फैलती चली गई। इसलिए राजा ने अपने अहंकार को एक तरफ रखकर, घन दौलत के साथ एक बड़ा काफिला जरथुस्‍त्र के पास भेजा और साथ ही अनुरोध भरा निमंत्रण पत्र लिखा कि ‘’मुझे बहुत अफसोस है, जब मैं अपनी युवावस्‍था में आपसे मिला था, उस समय मैं जल्‍दी में था और आपसे लापरवाही से मिला था। उस समय मैं आपसे अस्‍तित्‍व के गूढ़ तम प्रश्‍नों की व्‍याख्‍या जल्‍दी करने के लिए कहा था। लेकिन अब मैं बदल चुका हूं, और जिसका उत्‍तर नहीं दिया जा सकता, उस असंभव उत्‍तर के मांग में मैं नहीं करता। लेकिन अभी भी मुझे सृष्‍टि के नियम और प्रकृति की शक्‍तियों को जानने की गहन जिज्ञासा है। जिस समय मैं युवा था। उस समय से ज्‍यादा जिज्ञासा है यह सब जानने की। मेरी आपसे प्रार्थना है कि आप मेरे महल में आएं। और अगर आपका महल में आना संभव न हो, तो आप अपने सबसे अच्‍छे शिष्‍य में से किसी एक शिष्‍य को भेज दें, ताकि वह मुझे जो कुछ भी इन प्रश्नों के विषय में समझाया जा सकता हो समझा सके।</p>
<p>      थोड़े दिनों के बाद वह काफिला और संदेशवाहक वापस लौट आये। उन्‍होंने राजा को बताया कि वे जरथुस्‍त्र से मिले। जरथुस्‍त्र ने अपने आशीष भेजे है। लेकिन आपने उनको जो खजाना भेजा था,  वह उन्‍होंने वापस लोटा दिया है। जरथुस्‍त्र ने उस खजानें को यह कहकर वापस कर दिया है कि उसे तो खानों का खजाना मिल चुका है। और साथ ही जरथुस्‍त्र ने एक पत्‍ते में लपेट कर कुछ छोटा सा उपहार राजा के लिए भेजा है। और संदेशवाहक ने कहां कि वे राजा से जाकर कह दें कि इसमे ही वह शिक्षक है जो कि उसे सब कुछ समझा सकता है।   </p>
<p>      राजा ने जरथुस्‍त्र के भेजे हुए उपहार को खोला और फिर उसमें से उसी गेहूँ के दाने को पाया—गेहूँ का वही दाना जिसे जरथुस्‍त्र ने पहले भी उसे दिया था। राजा ने सोचा कि जरूर इस दाने में कोई रहस्‍य या चमत्‍कार होगा, इसलिए राजा ने एक सोने के डिब्‍बे में उस दाने को रखकर अपने खजानें में रख दिया। हर रोज वह उस गेहूँ के दाने को इस आशा के साथ देखता कि एक दिन जरूर कुछ चमत्‍कार घटित होगा, और गेहूँ का दाना किसी ऐसी चीज में या किसी ऐसे व्‍यक्‍ति में परिवर्तित हो जाएगा जिससे कि वह सब कुछ सीख जाएगा जो कुछ भी वह जानना चाहता है।</p>
<p>      महीने बीते, और फिर वर्ष पर वर्ष बीतते चले गए। लेकिन कुछ भी चमत्‍कार नहीं हुआ। अंतत: राजा ने अपना धैर्य खो दिया और फिर से बोला, ‘’ऐसा मालूम होता है, कि जरथुस्‍त्र ने फिर से मुझे धोखा दिया है। या तो वह मेरा उपहास कर रहा है। या फिर वह मेरे प्रश्‍नों के उत्‍तर जानता ही नहीं। लेकिन मैं उसे दिखा दूँगा कि मैं बिना उसकी किसी मदद के भी प्रश्नों के उत्‍तर खोज सकता हूं।‘’ फिर उस राजा ने भारतीय रहस्‍यदर्शी के पास अपने काफिले को भेजा। जिसका नाम तशंग्रगाचा था। उसके पास संसार के कौने-कौने से शिष्‍य आते थे, और फिर से उसने उस काफिले के साथ वहीं संदेशवाहक और वहीं खजाना भेजा जिसे उसने जरथुस्‍त्र के पास भेजा था।</p>
<p>      कुछ महीनों के पश्‍चात संदेशवाहक उस भारतीय दार्शनिक को अपने साथ लेकिन वापस लौटे। लेकिन उस दार्शनिक ने राजा से कहा, ‘’मैं आपका शिक्षक बन कर सम्‍मानित हुआ, लेकिन यह मैं साफ-साफ बता देना चाहता हूं कि मैं खास करके आपके देश में इसलिए आया हूं ताकि मैं जरथुस्‍त्र के दर्शन कर सकूँ।‘’</p>
<p>      इस पर राजा सोने का वह डिब्‍बा उठा लाया जिसमें गेहूँ का दाना रखा हुआ था। और वह उसे बताने लगा, ‘’मैंने जरथुस्‍त्र से कहा था कि मुझे कुछ समझाए-सिखाएं। और देखो, उन्‍होंने यह क्‍या भेज दिया है, मेरे पास। यह गेहूँ का दाना वह शिक्षक है जो मुझे सृष्‍टि के नियमों और प्रकृति की शक्‍तियों के विषय में समझाए गा। क्‍या यह मेरा उपहास नहीं?</p>
<p>            वह दार्शनिक बहुत देर तक उस गेहूँ के दाने की तरफ देखता रहा, और उस दाने की तरफ देखते-देखते जब वह ध्‍यान में डूब गया तो महल में चारों और एक गहन मौन छा गया। कुछ समय बाद वह बोला, ‘’मैंने यहां आने के लिए जो इतनी लंबी यात्रा की उसके लिए मुझे कोई पश्‍चाताप नहीं है, क्‍योंकि अभी तक तो मैं विश्‍वास ही करता था, लेकिन अब मैं जानता हूं कि जरथुस्‍त्र सच में ही एक महान सदगुरू है। गेहूँ का यह छोटा सा दाना हमें सचमुच सृष्‍टि के नियमों और प्रकृति की शक्‍तियों के विषय में सिखा सकता है, क्‍योंकि गेहूँ का यह छोटा सा दाना अभी और यहीं अपने में सृष्‍टि के नियम और प्रकृति की शक्‍ति को अपने में समाएँ हुए है। आप गेहूँ के इस दाने को सोने के डिब्‍बे में सुरक्षित रखकर पूरी बात को चूक रहे है।</p>
<p>      अगर आप इस छोटे से गेहूँ के दाने को जमीन में बो दें, जहां से यह दाना संबंधित है, तो मिट्टी का संसर्ग पाकर, वर्षा-हवा-धूप , और चाँद-सितारों की रोशनी पाकर, यह और अधिक विकसित हो जाएगा। जैसे कि व्‍यक्‍ति की समझ और ज्ञान की विकास होता है, तो वह अपने अप्राकृतिक जीवन को छोड़कर प्रकृति और सृष्‍टि के निकट आ जाता है। जिससे कि वह संपूर्ण ब्रह्मांड के अधिक निकट हो सके। जैसे अनंत-अनंत ऊर्जा के स्‍त्रोत धरती में बोए हुए गेहूँ के दाने की और उमड़ते है, ठीक वैसे ही ज्ञान के अनंत-अनंत स्त्रोत व्‍यक्‍ति की और खुल जाते है। और तब तक उसकी तरफ बहते रहते है जब तक कि व्‍यक्‍ति प्रकृति और संपूर्ण ब्रह्मांड के साथ एक न हो जाए। अगर गेहूँ के इस दाने को ध्‍यानपूर्वक देखो, तो तुम पाओगे कि इसमे एक और रहस्‍य छुपा हुआ है—और वह रहस्‍य है जीवन की शक्‍ति का। गेहूँ का दाना मिटता है, और उस मिटने में ही वह मृत्‍यु को जीत लेता है।</p>
<p>      राजा ने कहा, ‘’आप जो कहते है वह सच है। फिर भी अंत में तो पौधा कुम्‍हलाएगा और मर जाएगा। और पृथ्‍वी में विलीन हो जाएगा।</p>
<p>      उस दार्शनिक ने कहा, लेकिन तब तक नहीं मरता, जब तक कि वह सृष्‍टि की प्रक्रिया को पूरा नहीं कर लेता। और स्‍वयं को हजारों गेहूँ के दानों में परिवर्तित नहीं कर लेता। जैसे छोटा सा गेहूँ का दाना मिटता है तो पौधे के रूप में विकसित हो जाता है। ठीक वैसे ही जब तुम भी जैसे-जैसे विकसित होने लगते हो, तुम्‍हारे रूप भी बदलने लगते है। जीवन से और नए जीवन निर्मित होते है, एक सत्‍य से और सत्‍य जन्‍मते है, एक बीज से और बीजों का जन्‍म होता है। केवल जरूरत है तो एक कला सीखने की और वह है मरने की कला। उसके बाद ही पुनर्जन्‍म होता है, मेरी सलाह है कि हम जरथुस्‍त्र के पास चलें, ताकि वे हमें इस बारे में कुछ अधिक बताएं।</p>
<p>      कुछ ही दिनों के पश्‍चात वे जरथुस्‍त्र के बग़ीचे में आए। प्रकृति की पुस्‍तक ही उसकी एकमात्र पुस्‍तक थी। और उसने अपने शिष्‍यों को उस प्रकृति की पुस्‍तक को ही पढ़ने की शिक्षा दी। इन दोनों ने जरथुस्‍त्र के बग़ीचे में एक और बड़े सत्‍य की शिक्षा पाई। कि जीवन और कार्य, अवकाश और अध्‍यन, एक ही चीज है; जीने का सही ढंग सरल और स्‍वाभाविक जीवन जीना है। जीवन सृजनात्मक होना चाहिए। उसी में व्‍यक्‍ति का विकास समग्रता से और सक्रियता से होता है।</p>
<p>      अस्‍तित्‍व और जीवन के नियमों को पढ़ने-सिखते उनका एक वर्ष बीत गया। अंतत रात अपने नगर लौट आया और उसने जरथुस्‍त्र से निवेदन किया कि वह अपनी महान शिक्षा के सार तत्‍व को व्‍यवस्‍थित रूप से संगृहीत कर दे। जरथुस्‍त्र ने वैसा ही किया, और उसी के परिणामस्‍वरूप पारसियों की महान पुस्‍तक ‘’जेंदावेस्‍ता’’ का आविर्भाव हुआ।</p>
<p>      यह पूरी कहानी बस यही बताती है कि मनुष्‍य परमात्‍मा कैसे हो सकता है।</p>
<p>      जो कुछ मनुष्‍य में बीज रूप में छिपा हुआ है, वह अगर उद्घाटित हो जाए, प्रकट हो जाए, तो मनुष्‍य परमात्‍मा हो सकता है।</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>पतंजलि: योग-सूत्र भाग—4</p>
<p>प्रवचन—4</strong></p>
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		<title>ध्रुवे तद्गतिज्ञानम्—पतंजलि योग सूत्र</title>
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		<pubDate>Sun, 06 May 2012 14:10:19 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[पतंजलि का योग सुत्र--]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

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		<description><![CDATA[ध्रुव-नक्षत्र पर संयम संपन्‍न करने से तारों-नक्षत्रों की गतिमयता का ज्ञान प्राप्‍त होता है। और हमारे अंतर-अस्‍तित्‍व का ध्रुव तारा कौन सा है? ध्रुव तारा बहुत प्रतीकात्‍मक है। पौराणिक कथाओं के अनुसार यही समझा जाता है कि ध्रुव तारा ही &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/05/06/%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%81%e0%a4%b5%e0%a5%87-%e0%a4%a4%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%97%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%ae%e0%a5%8d-%e0%a4%aa%e0%a4%a4/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&#038;blog=12293864&#038;post=4542&#038;subd=oshosatsang&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>ध्रुव-नक्षत्र पर संयम संपन्‍न करने से तारों-नक्षत्रों की गतिमयता का ज्ञान प्राप्‍त होता है।</strong><div id="attachment_4543" class="wp-caption alignright" style="width: 230px"><a href="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/05/12042107180985isnj6v.jpg"><img src="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/05/12042107180985isnj6v.jpg?w=220&h=300" alt="पतंजलि का योग-सूत्र--ओशो" title="पतंजलि का योग-सूत्र--ओशो" width="220" height="300" class="size-medium wp-image-4543" /></a><p class="wp-caption-text">पतंजलि का योग-सूत्र&#8211;ओशो</p></div></p>
<p>      और हमारे अंतर-अस्‍तित्‍व का ध्रुव तारा कौन सा है? ध्रुव तारा बहुत प्रतीकात्‍मक है। पौराणिक कथाओं के अनुसार यही समझा जाता है कि ध्रुव तारा ही एक मात्र ऐसा तारा है, जो पूर्णतया गति विहीन है, उसमें कोई गति नहीं है, वह थिर है। लेकिन यह बात सच नहीं है। उसमें गति है, लेकिन उसकी गति बहुत धीमी होती है। लेकिन फिर भी यह बहुत प्रतीकात्‍मक है: हमको अपने भीतर कुछ ऐसा खोज लेना है जो कि गति विहीन हो, जिसमे किसी प्रकार की गति न हो, पूरी तरह थिर हो। वहीं हमारा स्‍वभाव है, केवल वहीं हमारी वास्‍तविक अस्‍तित्‍व है। हमारा सच्‍चा स्‍वरूप है: ध्रुव तारे जैसा—गति विहीन, पूर्णरूपेण गति। क्‍योंकि जब भीतर कहीं गति नहीं होती है, तब शाश्‍वतता होती है। जब गति होती है, समय भी होता है।<span id="more-4542"></span></p>
<p>      गति के साथ ही समय की आवश्‍यकता होती है। रूकने के लिए ठहरने के लिए समय जरूरी नहीं है। अगर हम गतिमान होते है तो उसका कहीं प्रारंभ होगा तो कहीं अंत भी होगा। सारी गतिशीलता का प्रारंभ भी होता है। और अंत भी होता है। उनका जन्‍म भी होता है उनकी मृत्‍यु भी होती है। लेकिन अगर किसी प्रकार की कोई गति न हो, तो न तो प्रारंभ ही होता है, और न ही अंत ही होता है। तब न तो जन्‍म होता है और न मृत्‍यु ही होती है।</p>
<p>      क्‍योंकि गति का अनुभव केवल उसी चीज के परिप्रेक्ष्‍य में हो सकता है जो थिर होती है। अगर कुछ भी थिर न हो तो गतिशीलता को जाना ही नहीं जा सकता है। और अगर सभी कुछ गतिमान हो और हमारे पास ऐसा कोई आधार न हो जिसकी कोई गति न हो; तो हम गति को कैसे जान सकेंगे?</p>
<p>      इसीलिए पृथ्‍वी लगातार घूमती रहती है, लेकिन हमें उसकी गति का आभास नहीं होता। पृथ्‍वी घूम रही है। और इतनी तीव्रता से घूम रही है की हम उसकी कल्‍पना भी नहीं कर सकते। पृथ्‍वी अंतरिक्ष-यान है। जो निरंतर गतिशील है: अपने केंद्र पर लगातार घूम रही है और साथ ही सूर्य के चारों और भी बड़ी तीव्रता के साथ चक्‍कर लगा रही है। पृथ्‍वी लगातार घूमती चली जा रही है। पेड़-पौधे, घर, आदमी सभी कुछ उसी गति से घूम रहे है। इसलिए उसकी गति को अनुभव करना असंभव है, क्‍योंकि उसकी तुलना करने का कोई उपाय नहीं है।</p>
<p>      इसे ऐसे सोचो, जैसे तुम्‍हारे पास खड़े होने को कोई छोटी सी चीज है—सारी पृथ्‍वी तो घूम रही है, लेकिन तुम नहीं घूम रहे हो—तब तुम समझ सकोगे कि गति क्‍या है। क्‍योंकि शेष सभी चीजें इतनी तेजी से घूम रही है कि तुम चकरा जाओगे; तब तुम्‍हारा पूना में रहना असंभव है। फिर कभी फिलेडेलियफिया तुम्‍हारे सामने सक गुजर रहा होगा तो कभी टोक्यो गुजर रहा होगा। और बार-बार&#8230;&#8230;ओर पृथ्‍वी घूमती चली जा रही है, परिभ्रमण करती ही चली जा रही है।</p>
<p>      पृथ्‍वी बहुत तेजी से घूम रही है, उस गति को अनुभव करने के लिए हमे थिर होना होगा। मनुष्‍य इतनी सदियों से पृथ्‍वी पर रह रहा है। और केवल तीन सौ वर्ष पूर्व ही हमें गैलीलियो और कोपरनिसक द्वारा पता चला है कि पृथ्‍वी घूम रही है। वरना इससे पहले मनुष्‍य यही समझता रहा है कि पृथ्‍वी केंद्र है, पृथ्‍वी गतिवहीन है। केंद्र है और दुनियां की शेष अन्‍य सभी चीजें गतिशील है। चाँद-तारे, सूर्य सभी घूम रहे है, केवल पृथ्‍वी ही थिर है। और वही सभी का केंद्र है।</p>
<p>      अब थोड़ा एक बहुत ही जटिल बात को भी ठीक से समझ लेना। उदाहरण के लिए, अब तक तो मैं इस ढंग से बोल रहा था जैसे कि भीतर के केंद्र थिर होते है। लेकिन वे केंद्र थिर नहीं होते है। कई बार काम केंद्र हमारे सर में होता है। काम-केंद्र हमारे सिर में गतिशील होता है, वह वहां सरक रहा होता है, इसीलिए तो हमारा मन इतना कामवासना से भर जाता है। इसीलिए हम कामवासना के संबंध में निरंतर सोचते रहते है। और स्‍त्री को या पुरूष को छू लेने का मन करता है। कई बार काम-केंद्र आंखों में होता है। और फिरा जो कुछ भी हम देखते है, उसे वासना में बदल लेते है। इसी तरह फिर मन अश्‍लील हो जाता है—फिर जो कुछ भी हम देखेंगे, हम काम में, सेक्‍स में परिवर्तित हो जाती है। कई बार काम केंद्र कानों में होता है। फिर जो कुछ भी हम सुनेंगे उससे हम कामुक होने लगेंगे।</p>
<p>      फिर ऐसा संभव है कि हम मंदिर जाएं और अगर उस समय हमार काम केंद्र कानों में गतिमान हो रहा है, तब वहां भजन को सुनते हुए, भक्‍ति गान को सुनते हुए हम कामुकता का अनुभव करने लगेंगे। और साथ में चिंतित भी होने लगेंगे कि यह क्‍या हो रहा है। मैं मंदिर में हूं, मैं तो एक भक्‍त की तरह मंदिर में आया हूं, और यह क्‍या हो रहा है? और कई बार ऐसा भी होता है कि तुम अपनी प्रेमिका या अपनी पत्‍नी के बैठे हो, और वह एकदम निकट ही बैठी होती—केवल तुम्‍हें कामवासना की कोई इच्‍छा ही नहीं होती है। इसका मतलब है उस समय काम केंद्र अपने केंद्र पर नहीं है, जहां कि उसे होना चाहिए। कई बार ऐसा होता है जब तुम कामवासना की कल्‍पना कर रहे होते हो, कामवासना के स्‍वप्‍नों में खोए होते हो, उस समय तुम अपने को अधिक आनंदित अनुभव करते हो। और जब स्‍त्री के साथ प्रेम कर रहे होते हो उस समय तुम्‍हें अपने को ज्‍यादा आनंदित अनुभव नहीं करते हो।</p>
<p>      उस समय क्‍या होता है? हम यह जानते ही नहीं है कि हमारा केंद्र कहां पर है। लेकिन जब कोई व्‍यक्‍ति साक्षी को उपलब्‍ध हो जाता है। तो कौन सा केंद्र किस जगह है, उसके प्रति वह बोधपूर्ण हो जाता है। यह उस केंद्र के प्रति वह होश से भर जाता है। और जब व्‍यक्‍ति बोध और होश से भर जाता है, तभी कुछ घटने की संभावना होती है।</p>
<p>      जब वह केंद्र कानों में होता है, तो वह कानों को ऊर्जा प्रदान करती है। उस समय अगर उन क्षणों का ठीक से उपयोग किया जा सके, तो व्‍यक्‍ति एक कुशल संगीतकार बन सकता है। जब वह केंद्र आंखों में होता है, अगर उस क्षण का उपयोग ठीक से किया जाए। तो व्‍यक्‍ति एक कुशल चित्रकार, या एक कुशल कलाकार बन सकता है। तब वृक्षों का हरा रंग कुछ अलग ही दिखाई पड़ता है। तब गुलाब के फूलों का खिलना और उनका गुणधर्म कुछ अलग ही हो जाता है। तब उनके साथ एक प्रकार का तादात्‍म्‍य स्‍थापित हो जाता है। अगर वह काम-केंद्र अलग ही हो जाता है। तब उनके व्‍यक्‍ति एक बड़ा वक्‍ता बन सकता है। अपने बोलने के माध्‍यम से यह लोगों को सम्‍मोहित कर सकता है। तब एक शब्‍द भी जब सुनने वालों का ह्रदय में उतरना है, तो लोगों को सम्‍मोहित कर जाते है। यही वे क्षण होते है&#8230;..अगर व्‍यक्‍ति का काम केंद्र आंखों में है, तो बस किसी की तरफ एक दृष्‍टि का पड़ना और वह व्‍यक्‍ति सम्‍मोहित हो जाता है। तब व्‍यक्‍ति चुंबक की तरह हो जाता है। उसमें सम्‍मोहन की शक्‍ति आ जाती है। जब काम केंद्र हाथों में आ जाता है, तो फिर किसी भी चीज को छूने भर से वह सोना बन जाती है। क्‍योंकि काम-केंद्र की उर्जा जीवन से भरी हुई उर्जा होती है।</p>
<p>      और यह बात चंद्र केंद्र के संबंध में भी सत्‍य है।</p>
<p>      अभी तक मैंने केंद्रों की स्‍थित स्‍थितियों के विषयों पर बात की। साधारणतया वे वहीं पाए जाते है; लेकिन फिर भी कुछ स्‍थिर नहीं है। सभी कुछ गतिवान है। अगर व्‍यक्‍ति का मृत्‍यु केंद्र उसके हाथ में है, और तब अगर ऐसे व्‍यक्‍ति को डाक्‍टर दवाई भी देगा तो भी रोगी मर जाएगा। चाहे चिकित्‍सक कुछ भी करे, तो भी रोगी को बचाना संभव नहीं है। भारत में यह कहा जाता है, ‘’डाक्‍टर के पास चिकित्‍सक के हाथ होते है; जो कुछ भी वह छूता है, वह दवा बन जाती है।‘’ और जो डाक्‍टर ऐसा न हो, उसके पास भूलकर मत जाना; क्‍योंकि तब कोई साधारण सी बीमारी का भी वह इलाज नहीं कर पाएगा, और मरीज की हालत पहले से भी ज्‍यादा खराब हो जाएगी।</p>
<p>      इस मामले में योगी एकदम सचेत और जागरूक होता है। आयुर्वेद, जो चिकित्‍सा विज्ञान भारत में योग के साथ-साथ ही विकसित हुआ है। उसके अंतर्गत चिकित्‍सक को योगी भी होना पड़ता था। जब तक कोई आदमी योगी न हो जाए, वह चिकित्‍सक भी नहीं हो सकता था। क्‍योंकि उसके बिना कोई सच्‍चा चिकित्‍सक हो नहीं सकता। इससे पहले कि कोई चिकित्‍सक किसी रोगी के पास उसकी चिकित्‍सा करने के लिए जाए, उस चिकित्‍सक को अपने अंतर्जगत की व्‍यवस्‍था को ठीक से समझना और देखना होता था। अगर मृत्‍यु केंद्र उसके हाथ में आ गया हो, तो वह नहीं जायेगा। अगर मृत्‍यु केंद्र उसकी आँख में हो तब भी वह नहीं जायेगा। उस चिकित्‍सक का मृत्‍यु केंद्र उसके हारा में स्‍थित होना चाहिए। तभी वह रोगी को देखने के लिए जाता था। जब सभी केंद्र अपने-अपने स्‍थान पर होते थे, तभी वह रोगी को देखने जाता था।</p>
<p>      जब व्‍यक्‍ति अपने अंतर्जगत को जान लेता है, तो बहुत सी बातें जान सकना संभव हो जाता है। तुमने भी इस पर कई बार ध्‍यान दिया होगा। लेकिन तुम्‍हें मालूम नहीं होता है कि क्‍या हो रहा है। कई बार बिना किसी विशेष प्रयास के सफलता मिलती चली जाती है। और कई बार कठोर परिश्रम करने के बाद भी असफलता मिलती चली जाती है। इसका मतलब है कि उस समय अंतर व्‍यवस्‍था ठीक नहीं है। तुम गलत केंद्र से काम कर रहे हो।</p>
<p>      जब कोई योद्धा युद्ध के मैदान में जाता है, युद्ध के मोर्चे पर जाता है, तो उसे तब ही जाना चाहिए जब मृत्‍यु केंद्र उसके हाथ में हो। तब&#8230;.तब वह बड़ी आसानी से लोगों को मार सकता है। तब वह साक्षात मृत्‍यु का ही रूप धारण कर लेता है। बुरी नजर की यहीं अर्थ होता है, वह व्‍यक्‍ति जिसका मृत्‍यु केंद्र उसकी आंखों में ठहर गया है। अगर ऐसा आदमी किसी की और देख भी ले तो वह मुसीबतों में फँसता चला जाएगा। उसका देखना भी अभिशाप हो जाता है।</p>
<p>      और ऐसे लोग भी है जिनकी आंखों में जीवन-केंद्र होता है। वे अगर किसी की तरफ देख भर लें, तो ऐसा लगता है जैसे आशीष बरस गए हों, ऐसे व्‍यक्‍ति का देखना और सामने वाला आदमी आनंद से भर जाता है। उसका देखना और सामने वाला व्‍यक्‍ति एकदम जीवंत सा हो जाता है।</p>
<p>’’ध्रुव-नक्षत्र पर संयम संपन्‍न करने से तारों-नक्षत्रों की गतिमयता का ज्ञान प्राप्‍त होता है।‘’</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>पतंजलि : योग सूत्र—भाग-4</p>
<p>ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पुणे</strong></p>
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			<media:title type="html">पतंजलि का योग-सूत्र--ओशो</media:title>
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		<title>शक्‍तियां है जो मन के बहार होने से प्राप्‍त होती है, लेकिन ये समाधि के मार्ग पर बाधाएं है—पतंजलि (योग-सूत्र)</title>
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		<pubDate>Sun, 06 May 2012 01:11:49 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[पतंजलि का योग सुत्र--]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

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		<description><![CDATA[ख्‍याल रहे वे भी शक्‍तियां है, अगर बाहर की और जाना हो तो—लेकिन अगर भीतर जाना हो ता यहीं शक्‍तियां बाधाएं बन जाती है। अगर व्‍यक्‍ति स्वयं के भीतर जा रहा हो, तो यही शक्‍तियां बाधा बन जायेगी। जो व्‍यक्‍ति &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/05/06/%e0%a4%b6%e0%a4%95%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%82-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%9c%e0%a5%8b-%e0%a4%ae%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b0/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&#038;blog=12293864&#038;post=4538&#038;subd=oshosatsang&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>ख्‍याल रहे वे भी शक्‍तियां है, अगर बाहर की और जाना हो तो—<div id="attachment_4539" class="wp-caption alignright" style="width: 310px"><a href="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/05/fraud-nirmal-baba2.jpg"><img src="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/05/fraud-nirmal-baba2.jpg?w=300&h=167" alt="शक्‍ति की खोज मन के बहार होने से प्राप्‍त होती है...पतंजलि" title="fraud-nirmal-baba(2)" width="300" height="167" class="size-medium wp-image-4539" /></a><p class="wp-caption-text">शक्‍ति की खोज मन के बहार होने से प्राप्‍त होती है&#8230;पतंजलि</p></div>लेकिन अगर भीतर जाना हो ता यहीं शक्‍तियां बाधाएं बन जाती है। अगर व्‍यक्‍ति स्वयं के भीतर जा रहा हो, तो यही शक्‍तियां बाधा बन जायेगी।</p>
<p>      जो व्‍यक्‍ति बह्या संसार की और बढ़ रहा होता है, वह चंद्र से सूर्य की और से होता हुआ संसार में जा रहा होता है। और जो व्‍यक्‍ति स्‍वयं के भीतर जा रहा है, उसकी ऊर्जा सूर्य से चंद्र की और, और फिर चंद्र से भी पार की तरफ जा रही होती है। जो व्‍यक्‍ति अंतस की यात्रा पर जा रहा होता है। और एक वह व्‍यक्‍ति जो बह्या संसार की यात्रा पर जो रहा होता है उनके लक्ष्‍य और उद्देश्‍य एकदम अलग-अलग होते है, एकदम विपरीत होते है।<span id="more-4538"></span></p>
<p>      और ऐसा उस समय होता है जब व्‍यक्‍ति को कई बार प्रतिभा की, एकदम पार की पहली-पहली झलकियाँ आने लगती है। और वह इतना शक्‍ति-संपन्‍न हो जाता है , इतना शक्‍ति से भर जाता है, इतना शक्‍तिशाली हो जाता है, वह घड़ी एक ऐसी घड़ी होती है। जब व्‍यक्‍ति फिर से नीचे गिर सकता है। शक्‍ति उसे विकृत कर सकती है। और इस कारण गिरना हो सकता है। वह व्‍यक्‍ति  अपने को इतना अधिक बुद्धिमान समझने लगता है कि वह अहंकारी हो जाता है—तब वह उस शक्‍ति पर सवार होने का मजा लेना चाहेगा। फिर वह चमत्‍कार या इसी प्रकार की कुछ मूढताएं करने लगेगा।</p>
<p>      सभी तरह के चमत्‍कार दिखाने वाले लोग एक तरह से मूढ़ और मूर्ख ही होते है—चाहे वे कहें कुछ भी। वह कह सकते है कि वे यह चमत्‍कार लोगों की मदद करने के लिए कर रहे है। वे किसी की भी मदद नहीं करते है: स्‍वयं को ही नुकसान और क्षति पहुंचाते है—और अपने साथ दूसरों का भी क्षति पहुंचाते है। क्‍योंकि इन चमत्‍कारों को दिखाने के चक्‍कर में वे पार जाने की जगह और नीचे गिर जाते है। और तब पूरी बात ही चालाकी और धूर्तता की बनकर रह जाती है।</p>
<p>      परा-मनोविज्ञान में इस तरह की चालाकियां की जा सकती है। अंतर्बोध के, चंद्र के जगत में कुछ ऐसे दांव-पेंच होते है। जिन्‍हें एक बार जान लेने के बाद उनके साथ खिलवाड़ किया जा सकता है। फिर भी वे है कलाबाजियां ही, और फिर अहंकार उन कला बाजियों का उपयोग कर सकता है।</p>
<p>      पतंजलि कहते है: ‘’यह वे शक्‍तियां है जब मन बाहर की और मुड़ रहा होता है, लेकिन यही समाधि के मार्ग में बाधाएं है।‘’</p>
<p>      अगर परम को उपलब्‍ध होना है तो इन सब मूढ़ताओं को छोड़ना होगा। इन सभी को छोड़ना होगा। और यही एक सच्‍चे खोजी का ढंग है: मार्ग में उसे जो कुछ भी मिलता है, वह उसे परमात्‍मा के चरणों में चढ़ा देता है। वह कहता है, तुमने मुझे दिया, लेकिन मैं इसका करूंगा क्‍या? मैं तो फिर से तुम्‍हारे चरणों में ही चढ़ा देता हूं। जो कुछ भी उसे प्राप्‍त होता है। वह उसे परमात्‍मा के चरणों में चढ़ा देता है। और स्‍वयं हमेशा रिक्‍त और खाली का खाली ही रहता है।</p>
<p>      यही है सच्‍ची आध्यात्मिकता : हमेशा उपलब्‍धि से, या जो भी आस्‍तित्‍व से मिला है उससे रिक्‍त और खाली रहना, और जो कुछ भी मार्ग में मिल जाए उसे परमात्‍मा के चरणों में चढ़ाए चले जाना।</p>
<p>      मैं तुम्‍हें एक कहानी कहता हूं:</p>
<p>      पुरोहित-पादरियों की एक मंडली इस बात पर चर्चा कर रही थी कि वे अपने धर्म-संचयन में आए दान का उपयोग किस तरह से करें।</p>
<p>      एक डि सेंटर पादरी ने उद्घोषणा की, मेरे लोग जो कुछ भी दान-पेटी में डालते है, वह सब का सक परमात्‍मा के कार्य में चला जाता है—अपने लिए तो एक पैसा तक नहीं रखता।</p>
<p>      ऐंग्‍लिकन ने उसके उत्‍साह की प्रशंसा करते हुए स्‍वीकार किया, ‘’मैं तांबे को दान-पेटी में डालता हूं, और चाँदी की चींजे परमात्‍मा के पास पहुँचती है।</p>
<p>      वहां मौजूद कैथोलिक पादरी ने स्‍वीकार किया। ‘’मैं चाँदी की चीजें रख लेता हूं, और तांबे का सब सामान परमात्‍मा के लिए जाता है—मैं तुम्‍हें यह बता दूँ कि गरीबों के चर्च में बहुत तांबा है।‘’</p>
<p>      अब तक रब्‍बी खामोश था, लेकिन जब उस पर जोर डाला गया तो वह बोला, हां, मैं तो इकट्ठा किया गया सारा धन एक कंबल में रख देता हूं, और मैं उसे हवा में उछाल देता हूं, परमात्‍मा को जो रखना होता है वह रख लेता है और जो वह नहीं चाहता है उसे मैं रख लेता हूं।‘’    </p>
<p>      धूर्त और चाला बाज मत बनो—रब्‍बी मत बनों। क्‍योंकि अंत में तुम्‍हारा ही नुकसान होगा, परमात्‍मा का नहीं। अंतर्विकास के मार्ग में जो भी बाधा आती है&#8230;..ओर बहुत सी बाधाएं आती भी है। आंतरिक पथ पर प्रत्‍येक क्षण नया अन्‍वेषण का होता है; हर क्षण कुछ न कुछ घटता रहता है—तुम तो उसकी कल्‍पना भी नहीं कर सकते हो, तुमने तो कभी उसकी मांग भी न की होगी। अंतर यात्रा के पथ पर अनेक भेंटें अस्‍तित्‍व की और से मिलती है, लेकिन परमात्‍मा को या परम को यही उपलब्‍ध होता है, जो इन भेंटों को वापस परमात्‍मा के चरणों में समर्पित कर देता है। और अगर उन भेंटों को पकड़ने लगो, तो फिर विकास वहीं का वहीं रूक जाता है। तब फिर व्‍यक्‍ति उसी जगह रूक जाता है। वहीं ठहर जाता है।</p>
<p>      ते समाधावुपसर्गाव्‍युत्‍थाने सिद्धय:।</p>
<p>      अगर तुम्‍हें समाधि की आकांक्षा है, अगर तुम्‍हें परम शांति चाहिए, परम मौन चाहिए, सत्‍य चाहिए—किसी भी तरह की प्राप्‍ति से , उपलब्‍धि से जुड़ाव मत बना लेना—फिर चाहे वह इस लोक की हो या उस लोक की , मनोवैज्ञानिक हो या परा-मनोवैज्ञानिक हो, बौद्धिक हो या अंतर्बोध युक्‍त हो, कुछ भी हो, किसी भी उपलब्‍धि के साथ मोह मत जोड़ लेना। उसे परमात्‍मा के चरणों में समर्पित करते चले जाना&#8230;&#8230;.ओर फिर बहुत कुछ घटेगा। तुम तो बस उसे परमात्‍मा के चरणों में अर्पित किए चले जाना।</p>
<p>      जब व्‍यक्‍ति सभी कुछ परमात्‍मा के चरणों में चढ़ा देता है यहां तक कि अपने को भी परमात्‍मा के चरणों में चढ़ा देता है, तब परमात्‍मा आता है। जब सभी कुछ परमात्‍मा के चरणों में चढ़ा दिया, उसी परम को वापस सौंप दिया तो फिर परमात्मा अंतिम भेंट की तरह अंतिम उपहार की तरह चला आता है, और परमात्‍मा ह अंतिम उपहार है, अंतिम भेंट है।</p>
<p>ओशो</p>
<p>पतंजलि: योग सूत्र—4</p>
<p>प्रवचन—17</p>
<p>कोरेगांव पार्क ओशो आश्रम पुणे</p>
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		<title>आइंस्‍टीन का सापेक्षवाद&#8211;</title>
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		<pubDate>Sat, 05 May 2012 14:08:19 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[कुछ तथ्‍य गत सत्‍य]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी अनिल सरस्‍वती]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

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		<description><![CDATA[ऊर्जा बह्मांड़— आइंस्‍टीन का प्रसिद्ध कथन है, ‘’ऐसा क्‍यों है कि मुझे कोई नहीं समझता लेकिन प्रेम सभी करते है? इसका उत्‍तर भी आइंस्‍टीन को भली भांति ज्ञात था। कारण है उसका सापेक्षवाद का नियम। ई=एम सी2। उसके समकालीन सर्वाधिक &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/05/05/%e0%a4%86%e0%a4%87%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%9f%e0%a5%80%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%aa%e0%a5%87%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&#038;blog=12293864&#038;post=4535&#038;subd=oshosatsang&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>ऊर्जा बह्मांड़—</strong><div id="attachment_4536" class="wp-caption alignright" style="width: 310px"><a href="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/05/7.jpg"><img src="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/05/7.jpg?w=300&h=200" alt="ऊर्जा का ब्रह्मांड--आइंस्‍टीन का सापेक्षवाद-अनिल सरस्‍वती" title="ऊर्जा का ब्रह्मांड--आइंस्‍टीन का सापेक्षवाद--अनिल सरस्‍वती" width="300" height="200" class="size-medium wp-image-4536" /></a><p class="wp-caption-text">ऊर्जा का ब्रह्मांड&#8211;आइंस्‍टीन का सापेक्षवाद-अनिल सरस्‍वती</p></div></p>
<p>आइंस्‍टीन का प्रसिद्ध कथन है, ‘’ऐसा क्‍यों है कि मुझे कोई नहीं समझता लेकिन प्रेम सभी करते है?</p>
<p>       इसका उत्‍तर भी आइंस्‍टीन को भली भांति ज्ञात था। कारण है उसका सापेक्षवाद का नियम। ई=एम सी2। उसके समकालीन सर्वाधिक प्रतिभाशाली वैज्ञानिक और गणितज्ञ भी इस नियम को समझने में असमर्थ थे।</p>
<p>       सापेक्षवाद का यह नियम बताता है कि ऊर्जा क्‍या है। इसमे पहले ऊर्जा की व्‍याख्‍या करने के लिए बड़े विस्‍तृत और जटिल फ़ॉर्मूला उपयोग लिए जाते थे। पहली बार आइंस्‍टीन ने इसकी व्‍याख्‍या तीन वर्णों में कर डाली।</p>
<p>       समस्‍या यह थी कि जटिलता से गणित और भौतिकी की समस्‍याओं को हल करने वाले वैज्ञानिकों के लिए आइंस्‍टीन का यह सरल नियम समझ के पार था। शायद एक जटिल मस्‍तिष्‍क के लिए सरलता ही जटिलतम समस्‍या है।<span id="more-4535"></span></p>
<p>       सापेक्षवाद के नियम का फ़ॉर्मूला है—ऊर्जा घनत्व में प्रकाश की गति के वर्ग का गुणत्‍व है। साधारण भाषा में कहें तो इसका अर्थ है—ऊर्जा=ब्रह्मांड। अब ब्रह्मांड से हमारा जगत है, जगत में हमारी पृथ्‍वी पर जीवित और जड़ पदार्थ। जीवित में जैव कोशिका और जड़ में कण। कोशिका और कण में अणु। अणु में परमाणु और परमाणु के विभाजन पर मिलती है शुद्ध ऊर्जा।</p>
<p>       सापेक्षवाद के अनुसार संपूर्ण ब्रह्मांड एक ही ऊर्जा है जो विविध रंग-रूपों में उपस्‍थित है। समय और स्‍थान का एक ताना-बाना है। जिससे सारा ब्रह्मांड बना है। एक जगह घटी छोटी सी घटना दूरतम तारों तक अपनी प्रतिध्‍वनि करती है।</p>
<p>       यह नियम इतिहास में घटी बहुत सी वास्‍तविक घटनाओं से स्‍पष्‍ट होती है। इनमें से एक घटना बीजली के बल्‍ब से जूड़ी है।</p>
<p><strong>भविष्‍य का निर्माण&#8211;</strong></p>
<p>       आज हम एक बटन दबाते है और बिजली का बल्‍ब हमारे घर को रोशनी से भर देता है। लेकिन क्‍या ऐसा करते समय हमारे जेहन में नायलोन के धागे से लटकता एक कोट का बटन आता है। बात अक्‍टूबर 1879 की है। प्रसिद्ध आविष्‍कार थॉमस अल्‍वा एडीसन अपनी प्रयोगशाला में गहन विचार में डूबा बैठा था। वह लंबे समय से एक बिजली के बल्‍ब के आविष्‍कार के प्रयासों में जुटा था। कुछ समझ नहीं आ रहा था। अचानक उसने उसे देखा कि उसके कोट का एक बटन ढीला होकर लटक गया था। बिजली की गति से एक विचार कौंधा और उसने बटन के साथ लटकते उस धागे को तोड़ लिया। सामने एक यंत्र के दो छोर थे। एक सकारात्‍मक और दूसरा नकारात्‍मक विद्युत वाला। एडीसन ने नायलोन के उस धागे को दोनों छोरों से जोड़ दिया। वह धागा तुरंत प्रकाश से जगमगा उठा और 13 घंटे तक जलता रहा। पहले बिजली के बल्‍ब का आविष्‍कार हुआ। 19 वीं शताब्‍दी में घटी उस घटना के कारण आज 21 वीं सदी का जगत प्रकाशमान है। भूतकाल में घटी एक घटना भविष्‍य को प्रभावित कर रही है।</p>
<p><strong>सारे विश्‍व का एक ताना-बान&#8211;</strong></p>
<p>       डरावने उपन्‍यास लिखने के लिए जगत प्रसिद्ध लेखक एड़गर एलेन पो ने एक उपन्‍यास लिखा ‘’दि नेरेटिव ऑफ गॉर्डन’’ इस कहानी में एक समुद्री जहाज डूब जाता है। और बचते है मात्र चार लोग। तीन जहाज के वरिष्‍ठ नाविक थे और एक रिचर्ड पार्कर नामक युवा सहायक। एक खुली नाव में वे चारों भूखे प्‍यासे कई दिनों तक समुद्र में भटकते रहे। अंत में भूख से तंग आकर तीनों नाविक रिचर्ड पार्कर को मार कर खा लेते है। एक उपन्‍यास 1880 में प्रकाशित हुआ।</p>
<p>       वर्ष 1884 में मायोनेट नामक एक समुद्री जहाज डूब गया और केवल चार लोग बचे। जब कई दिनों बाद उनकी समुद्र में तैरती नाव मिली। तीन नाविक अपने एक सहायक को मार कर खा चुके थे। इस सहायक का नाम था—रिचर्ड पार्कर।</p>
<p>       यह कैसा संयोग है? एलेन पो कोई ज्‍योतिष या चमत्‍कारी संत नहीं था। फिर चार साल बाद घटने वाली उस घटना का जिक्र उसने अपने उपन्‍यास में कैसे कर दिया? क्‍या उसकी कल्‍पना ने भविष्‍य का निर्माण किया? अथवा भविष्‍य में घटने वाली उस घटना की अदृश्‍य तरंगें उसकी कल्‍पना में उतर आई?</p>
<p>       सापेक्षवाद के अनुसार भूत, भविष्‍य और वर्तमान सभी एक दूसरे से जूड़े हुए है। सारे विश्‍व का एक ही ताना-बाना है। पूरा जगत अंर्तसंबद्ध है।</p>
<p><strong>एक ऊर्जा एक विश्‍व&#8212;</strong></p>
<p>       21 मार्च 2012 को जब मुंबई वासी उठे और सड़कों पर आये तो वे हैरान रह गये। ये देखकर कि मुंबई का आकाश एक गहरी धूल की परत से पटा हुआ है। सड़कों पर दौड़ते वाहन चालकों को रास्‍ता देखना दूभर हो गया। दमे और श्‍वास के रोगों से पीड़ित लोगों के लिए सांस लेना मुश्‍किल हो गया। दो दिन तक यह धूल छाई रही और इसका प्रभाव दिल्‍ली जयपुर और अहमदाबाद में भी देखा गया। दो दिन पश्‍चात वातावरण विशेषज्ञों ने बताया कि इसका कारण था ओमान की खाड़ी में आया तूफान।</p>
<p>       70 के दशक में अफ्रीका के एक प्रदेश साहेल में आकाल पडा। विश्‍व भर के लोग इस सूखे के भयावह प्रभाव से दहल गए। वर्षों तक इस प्रदेश में वर्षा नहीं हुई और दस लाख से अधिक लोगों ने भूख प्‍यास से दम तोड़ दिया। समाचार पत्रों और वैज्ञानिकों ने कहा कि साहेल के पर्यावरण पर बहुत अधिक लोग निर्भर है। वहां की धरती इतने लोगों का बोझ उठाने में असमर्थ है। वहां के प्रशासन को भी दोषी ठहराया गया। लेकिन इस सबके लिए वास्‍तविक दोषियों का किसी को भान नहीं था।</p>
<p>       कुछ ही समय पहले हुई वैज्ञानिक जाँच पड़ताल से पता चला था कि 70 के दशक में यूरोप और अमरीका में औद्योगिक क्रांति अपनी चरम पर थी। उनके कल कारखाने से निकलने वाली गैसों सल्फ़ेट और अन्‍य प्रदूषित पदार्थों के साथ उतरी अटलांटिक के ऊपर उड़ रही थी। और समुद्र की सतह को ठंडा कर रही थी। इसके कारण मानसून पैदा करने की प्रक्रिया ठप्‍प हो गई। और साहेल में होने वाली बरसात रूक गई। यह इस जगत की अतर्संवद्धता का एक जीता जागता उदाहरण है।</p>
<p>       ऐसी ही परिस्‍थिति इस विश्‍व में एक बार फिर निर्मित हो रही है। भारत और चीन में विश्‍व की 40 प्रतिशत जनसंख्‍या रहती है। यह विश्‍व की सबसे तेजी से बढ़ती हुई अर्थ व्‍यवस्‍थाएं है। विशेषकर चीन को पूरी दूनिया का कारखाना कहा जाता है। भारत विश्‍व का कार्यालय कहलाता है। मात्र इन दो देशों द्वारा उत्‍पन्‍न प्रदूषण सारे विश्‍व में कहन बरसा सकता है।</p>
<p>       निकट भविष्‍य में ही यह स्‍थिति आ सकती है। और इस बार इसका शिकार होंगे यूरोप और अमरीका। यह प्रदूषण भारत और चीन के लिए तो खतरनाक है ही लेकिन इसका सर्वाधिक दुष्‍प्रभाव यूरोप, जापान और अमरीका पर होगा। जहां बढ़ते हुए वृद्ध लोग इसे सहन नहीं कर पाएंगे। प्रदूषण यदि इसी गति से बढ़ता रहा तो ऑर्गनाइजेशन फॉर इकॉनामिक को आपरेशन एंड डैवलपमेंट के अनुसार 2050 में विश्‍व के हर वर्ष 36 लाख लोग मात्र प्रदूषण से मरने लगेंगे।</p>
<p><strong>जटिल समस्‍या—सरल समाधान</strong></p>
<p>       13 अप्रैल 2012 को कनाडा के कॉंकॉडियां विश्‍वविद्यालय से प्रकाशित होने वाली एक रिसर्च पत्र में वहां के वैज्ञानिकों की एक अनोखी खोज प्रकाशित की गई। इस खोज में संभवत: विश्‍व के बढ़ते हुए तापमान और कार्बन डायऑक्साइड के स्‍तरों से मुक्‍ति की कुंजी है।</p>
<p>       सूर्य के प्रकाश को चमका कर लौटा देने की प्रक्रिया को अल्‍बीडो कहा जाता है। इन वैज्ञानिकों के अनुसार यदि पृथ्‍वी के शहरी हिस्‍सों की सड़को और इमारतों की छतों की सतह पर एक नई अल्‍बीडो की सतह का निर्माण कर दिया जाए तो पृथ्‍वी सूर्य की बहुत सारी चमक को वातावरण से लोटा देगी।</p>
<p>       इसका प्रभाव इतना घना होगा कि पृथ्‍वी से 150 अरब टन कार्बन डायऑक्साइड सामाप्‍त हो जाएगी।</p>
<p>       बढ़ती कार्बनडाइऑक्साइड से होने वाली आर्थिक हानि का मूल्‍य 25 डॉलर प्रति टन है। यह प्रक्रिया वैश्‍विक अर्थव्‍यवस्‍था के 3300 से 3800 अरब डॉलर बचा सकती है।</p>
<p>       यह उपाय उतना ही कारगर होगा जितना 50 वर्षों के लिए विश्‍व की हर कार को सड़कों से हटा लेना।</p>
<p>       यह एक असंभव महा प्रयास प्रतीत होता है लेकिन है नहीं। इन वैज्ञानिकों के अनुसार वैसे भी छतों का हर 20 से 30 वर्षों में और सड़कों का हर 10 साल में पुन: निर्माण किया जाता है। यदि हर देश हर नगर का प्रशासन यह कदम उठाए तो सारा विश्‍व एक महा संकट से बच सकता है। एक प्रदूषण रहित पृथ्‍वी का निर्माण हो सकता है।</p>
<p><strong>स्‍वामी अनिल सरस्‍वती</p>
<p>यैस ओशो मई 2012</p>
<p>(स-भार)</strong></p>
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		<item>
		<title>प्राण उर्जा के पाँच भिन्‍न-भिन्‍न रूप है— (ओशो)</title>
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		<pubDate>Fri, 04 May 2012 01:28:51 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[पतंजलि का योग सुत्र--]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

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		<description><![CDATA[योगियों ने कहा है, प्राण उर्जा के पाँच भिन्‍न-भिन्‍न रूप, क्रियाएं और उर्जा क्षेत्र होते है। हम तो यहीं कहेंगे कि श्‍वास कहना पर्याप्‍त है। हम तो केवल रो ही बातें जानते है—श्‍वास को बाहर छोड़ना, श्‍वास को भी तर &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/05/04/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a3-%e0%a4%89%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9c%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%81%e0%a4%9a-%e0%a4%ad%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e2%80%8d/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&#038;blog=12293864&#038;post=4532&#038;subd=oshosatsang&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>योगियों ने कहा है, प्राण उर्जा के पाँच भिन्‍न-भिन्‍न रूप, क्रियाएं और उर्जा क्षेत्र होते है।<div id="attachment_4533" class="wp-caption alignright" style="width: 210px"><a href="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/05/kundalinni.jpg"><img src="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/05/kundalinni.jpg?w=200&h=300" alt="प्राण उर्जा के पाँच भिन्‍न-भिन्‍न रूप है— (ओशो) " title="प्राण उर्जा के पाँच भिन्‍न-भिन्‍न रूप है— (ओशो) " width="200" height="300" class="size-medium wp-image-4533" /></a><p class="wp-caption-text">प्राण उर्जा के पाँच भिन्‍न-भिन्‍न रूप है— (ओशो)</p></div> हम तो यहीं कहेंगे कि श्‍वास कहना पर्याप्‍त है। हम तो केवल रो ही बातें जानते है—श्‍वास को बाहर छोड़ना, श्‍वास को भी तर लेना—इतना ही। लेकिन योगी तो प्राण के संसार में जीते है। और वे इसके सूक्ष्‍म भेद को समझते है। इसलिए उन्‍होंने इसको पाँच भागों में विभक्‍त किया है। उन पांचों भागों को समझ लेना, वे बहुत महत्‍वपूर्ण है।</p>
<p><strong>पहला है प्राण,</p>
<p>दूसरा है अपान,</p>
<p>तीसरा है समान,</p>
<p>चौथा उदान,</p>
<p>पाँचवाँ है व्‍यान।</strong></p>
<p>      यह व्‍यक्‍ति के भीतर के पाँच विस्‍तार है। और प्रत्‍येक भीतर अलग-अलग काम करता है।<span id="more-4532"></span></p>
<p>      प्राण है पहला श्‍वसन। दूसरा है अपान, वह मलोत्‍सर्ग में मदद देता है। वह मल आदि शरीर से निकालने में मदद करता है। अंतड़ियों की सफाई अपान से होती है। और अगर तुम जान लो कि कैसे इस पर काम करना है, तो तुम इस ढंग से अंतड़ियों की सफाई कर सकते हो जैसे कि कोई नहीं कर सकता। योगियों की आंतें सर्वाधिक साफ होती है। और वह बहुत ही महत्‍वपूर्ण है, क्‍योंकि एक बार जब आंतें पूरी तरह साफ हो जाती है, जब अंतड़ियां एक दम साफ हो जाती है, तो पूरा शरीर एक दम हल्‍का, भार विहीन हो जाता है, जैसे कि उड़ रहे हो। शरीर का भार समाप्‍त हो जाता है।</p>
<p>      साधारणतया तो अंतड़ियों में बहुत सा कचरा और मल भरा रहता है—जीवन भर मल कि पर्तों पर पर्तें चढ़ती चली जाती है। अंतड़ियों की भीतरी दीवारों पर मल इकट्ठा होता जाता है। यह सूखता जाता है और अति कठोर होता जाता है। जो भीतर जहर बनता रहता है, उस से हमें भारी पन आता है। अगर अंतड़ियों की सफाई हो तो वह पृथ्‍वी के गुरुत्वाकर्षण के प्रति तुम्‍हें ज्‍यादा खोद देगी। योग ने पेट की सफाई पर बहुत जोर दिया है। ताकि भीतर कोई विषैला पदार्थ न बच पाए वरना वे खून में चक्‍कर काटते रहते है। और वे मस्‍तिष्‍क में घूमते रहते है। और वह व्‍यक्‍ति के आसपास एक विशेष तरह का ऊर्जा क्षेत्र निर्मित कर देते है। जो कि बोझिल, उदास और कालिमा लिए होता है।</p>
<p>      जब अंतड़ियां पूरी तरह से स्‍वच्‍छ और साफ हो जाती है। तो व्‍यक्‍ति के सिर के चारों और एक प्रकार का आभा मंडल निर्मित हो जाता है। और जिन लोगों के पास भी आंखें है, वे इसे बड़ी आसानी से देख सकते है। और जब अंतड़ियां पूरी तरह से स्‍वच्‍छ और साफ हो जाती है, तो व्‍यक्‍ति को ऐसा लगता है जैसे उसको पंख लग गए हो।</p>
<p>      तीसरा है समान, वह पाचन शक्‍ति और शरीर को ऊष्‍मा प्रदान करता है। अगर तीसरे की क्रियाशीलता का ज्ञान हो जाए, और इसके प्रति सजगता आ जाए कि वह कहां प्रतिष्‍ठित है, तो पाचन-क्रिया एकदम ठीक हो जाती है।</p>
<p>      साधारणतया भोजन तो हम अधिक कर लेते है। लेकिन उसे पचा नहीं पाते। कुछ लोग है कि खाए चले जाते है। और फिर भी संतुष्ट नहीं होते। भोजन पचे या न पचे, लेकिन कुछ लोग है कि ठूस-ठूस कर खोते चले जाते है। अगर व्‍यक्‍ति समान का उपयोग करना जानता हो, तो भोजन की थोड़ी सी मात्रा भी भोजन की अधिक मात्रा की उपेक्षा अधिक ऊर्जा देगी।</p>
<p>      इसीलिए योगी बिना अपने शरीर को कोई क्षति पहुँचाए कई दिन तक उपवास कर पाते है। कभी-कभी वे थोड़ा सा भोजन ले लेते है, और उस भोजन को पूरी तरह सक पचा लेते है। उसे आत्‍मसात कर लेते है। तुम्‍हारा भोजन तो पूरी तरह पच नहीं पाता है। इसीलिए आदमी का मल दूसरे जानवरों के लिए भोजन बन जाता है। और वे उसे पचा सकते है। उस मल में बहुत सा भोज्‍य-पदार्थ अभी भी शेष रह जाता है।</p>
<p>      और तीसरे, समान के द्वारा ही शरीर को ऊष्‍मा भी मिलती है। तिब्‍बत में समान के आधार पर ही पूरी पद्धति ही शरीर ऊष्‍मा की विकसित कर ली है। वे एक सुनिश्‍चित ढंग से एक सुनिश्‍चित लयबद्धता में श्‍वास लेते है। जिससे समान की ऊष्‍मा निर्मित कर लेते है। वे अपने भीतर एक विशेष ढंग से कार्य कर सकें। और उससे वे काफी ऊष्‍मा निर्मित कर लेते है। वे अपने शरीर में इतनी ऊष्‍मा निर्मित कर लेते है कि चारों और बर्फ गिर रही हो और तिब्‍बती लामा पसीने से भीगा खुले आकाश के नीचे नंगा खड़ा रह सकता है। अगर चारों और बर्फ ही बर्फ हो, तो साधारण आदमी तो ठंड के मारे जमने ही लगेगा। इतनी बर्फ में घर से बाहर भी निकलना संभव नहीं है। और तिब्‍बती लामा है कि पसीने से तर बतर गिरती हुई बर्फ के नीचे खड़ा रहेगा।</p>
<p>      तिब्‍बत में चिकित्‍सक को जो परीक्षा जी जाती है, उसमें से यह भी एक परीक्षा का ढंग है। जब तिब्‍बत में कोई चिकित्‍सक बनता है तो पहले उसे एक परीक्षा देनी होती है। जिसमें उसे अपनी शरीर अग्‍नि को निर्मित करना पड़ता है। अगर वह निर्मित नहीं कर सकता है तो उसे डाक्‍टर बनने का सर्टिफिकेट नहीं दिया जाता। वह बहुत कठिन कार्य है। संसार में कोई भी दूसरी चिकित्‍सा प्रणाली चिकित्‍सक से इतनी बड़ी उपेक्षा नहीं रखती है। यह कोई मौखिक परीक्षा ही नहीं है। यह कुछ ऐसा नहीं है कि जिसे किसी तरह से रट लिया और परीक्षा में जाकर लिख दिया। व्‍यक्‍ति को सिद्ध करना होता है कि सच में उसने अपनी शरीर ऊष्‍मा पर काबू पा लिया है। क्‍योंकि फिर जीवन भर उसे अपने मरीजों की ऊष्‍मा ऊर्जा पर कार्य करना होता है। अगर उस ऊष्‍मा पर तुम्‍हारा ही पूरा अधिकार नहीं है, तो कैसे तुम दूसरों पर काम कर सकते हो?</p>
<p>      इसलिए पूरी रात गिरती हुई बर्फ में परीक्षार्थी को बाहर खड़े रहना पड़ता है। परी रात में नौ बार परीक्षक आता है और हर बार शरीर को छूकर देखता है कि उसे पसीना आ रहा है या नहीं। अगर वह उतनी शरीर ऊष्‍मा निर्मित कर लेता है तो उस सम्‍मान का मालिक हो जाता है। वह चिकित्‍सक बन सकता है। अब उसके स्‍पर्श से रोगी को चमत्‍कारिक ढंग से ठीक कर देगा।</p>
<p>      तिब्‍बत में वे चिकित्‍सक को सिखाते है कि जब रोगी के हाथ या नाड़ी को पकड़ो, तो एक खास ढंग से श्‍वास लो; केवल तभी चिकित्‍सक रोगी की श्‍वास प्रक्रिया को ठीक से जान सकेगा। और जब एक बार रोगी की श्‍वास-प्रक्रिया को चिकित्‍सक ठीक से जान लेता है तो वह रोगी की पूरी बीमारी को जान लेता है। और अब चिकित्‍सक को पता होता है कि क्‍या करना चाहिए। साधारण तो डाक्‍टर मरीज के लक्षणों की जांच करते समय स्‍वय उस स्‍थिति में नहीं जाते जिसमे रोगी है। लेकिन तिब्‍बत में—और उनकी पूरी विधि पतंजलि के योग पर आधारित है। पहले तो डाक्‍टर को उसके विशेष आयामों में आन होता है। ताकि वह रोगी के रोग का अनुभव कर सके। रोगी की श्‍वास प्रक्रिया में कहां पर बाधा है। कहां पर उसकी श्‍वास अवरूद्ध हो रही है।</p>
<p>      चौथा है उदान, वाणी और संप्रेषण। जब तुम बोलते हो, तो चौथे प्रकार के प्राण का उपयोग करते हो। और इस प्राण को प्रशिक्षित किया जा सकता है। अगर यह प्राण प्रशिक्षित कर लिया जाए तो व्‍यक्‍ति के बोलने में, भाषण देने में, गीत गाने में एक तरह का सम्‍मोहन होगा। तब वाणी में एक तरह सम्‍मोहन होगा। तब बस, आवाज को सून कर ही चुंबक की तरह खींचे चले आते है।</p>
<p>      और ठीक ऐसा ही संप्रेषण के साथ भी होता है। जिन लोगों को संप्रेषण करना कठिन होता है—और बहुत से लोग है जो इसी कठिनाई में है कि दूसरे व्‍यक्‍ति के साथ कैसे संबंधित हों, दूसरे के साथ कैसे खुल सकें। बंद न रहें। कैसे बात चीत करें, कैसे प्रेम करे, कैसे मैत्री बनाए, कैसे दूसरे के साथ कम्‍यूनिकेट करें, उन सभी की उदान को लेकिर ही कोई न कोई कठिनाई है। वे नहीं जानते कि इस प्राण ऊर्जा का उपयोग कैसे करना है। जो कि व्‍यक्‍ति को प्रवाह मान बनाती है। और ऊर्जा  को खोल देती है, तब आसानी से दूसरे के साथ संप्रेषण हो सकता है। दूसरे तक पहुंचना हो  सकता है। और तब फिर कहीं कोई अवरोध नहीं रहता।</p>
<p>      उदना उर्जा-प्रवाहिनी को सिद्ध करने से योगी पृथ्‍वी से ऊपर उठ पाता है। और किसी आधार किसी संपर्क के बिना पानी, कीचड़, कांटों को पार कर लेता है।</p>
<p>      अगर व्‍यक्‍ति स्‍वयं के साथ समस्‍वरता पा लेता है और उदना के नाम से पहचाने जाने वाले प्राण को सिद्ध कर लेता है तो वह हवा में ऊपर उठ सकता है। क्‍योंकि यह उदना ही है जो व्‍यक्‍ति को गुरुत्वाकर्षण के साथ जोड़ कर रखती है।</p>
<p>      तुम आकाश में पक्षियों को, बड़े-बड़े पक्षियों को उड़ते हुए देखते हो। अभी भी वैज्ञानिकों के लिए यह एक रहस्‍य ही बना हुआ है कि पक्षी इतनी भार के साथ कैसे उड़ते है। ये पक्षी प्रकृति की और से ही उदना के बारे में जानते है। इसलिए उनके लिए उड़ना सहज और स्वभाविक होता है। वह एक विशेष ढंग विशेष श्‍वास लेते है। अगर तुम भी उसी ढंग से श्‍वास को ले सको तो तुम पाओगे कि तुम्‍हारा संबंध गुरुत्वाकर्षण से टूट गया है। गुरुत्वाकर्षण के साथ जो व्‍यक्‍ति का संबंध है। वह उसके अंतर-अस्‍तित्‍व से ही है। वह उसके भीतर से ही है। इसलिए इसे तोड़ा भी नहीं जा सकता है।</p>
<p>            और पांचवी है, व्‍यान, समन्‍वय और संघटन।</p>
<p>      पांचवी व्‍यक्‍ति को संघटित रखती है। जब पाँचवीं शरीर को छोड़ देती है। तो व्‍यक्‍ति की मृत्‍यु हो जाती है। तब शरीर विघटित होना शुरू हो जाता है। अगर पांचवी मौजूद रहता है। तो चाहे पूरी की पूरी श्‍वास प्रक्रिया क्‍यों न रूक जाए, व्‍यक्‍ति जीवित रहेगा।</p>
<p>      यही तो योगी कर रहे है। जब योगी जनता के सामने प्रदर्शन करके यह दिखाते है कि वे अपनी ह्रदय गति को रोक सकते है। तो वह पहले के चार प्राणों को रोक देते है। पहले के चार प्राणों को—वे पांचवें पर ठहर जाते है। लेकिन पाँचवीं प्राण ऊर्जा इतनी सूक्ष्‍म है कि आज तक कोई ऐसा यंत्र नहीं बना है जो उसका पता लगा सके। तो दस मिनट तक सभी तरह से डाक्‍टर या कोई भी व्‍यक्‍ति निरीक्षण कर सकता है और उन्‍हें लगेगा कि योगी मर गया है। और डाक्‍टर उसका प्रमाण पत्र भी दे देंगे। कि वह मर गया है। और योगी फिर से जीवित हो जाएगा। फिर सक उसकी श्‍वास प्रारंभ हो जाएगी, फिर से उसका ह्रदय धड़कना प्रारंभ कर देगा।</p>
<p>      पांचवी प्रक्रिया सर्वाधिक सूक्ष्‍म है और यही वह धागा है जो व्‍यक्‍ति को एक जैविक एका में ऑर्गेनिक यूनिटी में बांधकर रखता है।</p>
<p>      अगर पांचवें को जान लिया जाये तो परमात्‍मा को जाना जा सकता है। उसे पहले परमात्‍मा को नहीं जाना जा सकता। क्‍योंकि हमारे भी पांचवें का वही कार्य है जो कि परमात्‍मा का उसकी समग्रता में कार्य है। परमात्‍मा व्‍यान है। वह संपूर्ण अस्‍तित्‍व को एकसाथ जोड़े हुए है—चाँद-तारें, सूरज, संपूर्ण ब्रह्मांड को, सब को एक दूसरे के साथ जोड़े हुए है।</p>
<p><strong>पतंजलि: योग-सूत्र,</p>
<p>भाग-4, प्रवचन-19,</p>
<p>ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क, पुणे</strong></p>
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