<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?>
<rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:geo="http://www.w3.org/2003/01/geo/wgs84_pos#" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/"
	>

<channel>
	<title>Osho Satsang.org/ओशो सत्‍संग</title>
	<atom:link href="http://oshosatsang.org/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>http://oshosatsang.org</link>
	<description>यदि मैं शरीर छोड़ भी दू तो भी मैं अपने संन्‍यायों को छोड़ने वाला नहीं हूं।--ओशो</description>
	<lastBuildDate>Tue, 31 Jan 2012 12:52:36 +0000</lastBuildDate>
	<language>hi</language>
	<sy:updatePeriod>hourly</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>1</sy:updateFrequency>
	<generator>http://wordpress.com/</generator>
<cloud domain='oshosatsang.org' port='80' path='/?rsscloud=notify' registerProcedure='' protocol='http-post' />
<image>
		<url>http://1.gravatar.com/blavatar/5d5e28dc8a0fe9af2ee663df71e9999f?s=96&#038;d=http%3A%2F%2Fs2.wp.com%2Fi%2Fbuttonw-com.png</url>
		<title>Osho Satsang.org/ओशो सत्‍संग</title>
		<link>http://oshosatsang.org</link>
	</image>
	<atom:link rel="search" type="application/opensearchdescription+xml" href="http://oshosatsang.org/osd.xml" title="Osho Satsang.org/ओशो सत्‍संग" />
	<atom:link rel='hub' href='http://oshosatsang.org/?pushpress=hub'/>
		<item>
		<title>प्रिंसिपिया एथिका—जी. इ. मूर—(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)</title>
		<link>http://oshosatsang.org/2012/01/31/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%aa%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%8f%e0%a4%a5%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a5%80-%e0%a4%87-%e0%a4%ae/</link>
		<comments>http://oshosatsang.org/2012/01/31/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%aa%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%8f%e0%a4%a5%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a5%80-%e0%a4%87-%e0%a4%ae/#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 31 Jan 2012 12:52:35 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[ओशो की प्रिय पूस्‍तके--]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://oshosatsang.org/?p=4343</guid>
		<description><![CDATA[आधुनिक दर्शन शास्‍त्र के विकास में जी. ई मूर का योगदान उतना ही महत्‍वपूर्ण है! जितना कि बर्ट्रेंड रसेल का। उसकी बहुत कम रचनाएं प्रकाशित हुई। और ‘’प्रिंसिपिया एथिका’’ उनमें से सर्वप्रथम और सर्वाधिक प्रसिद्ध किताब है। अंग्रेजी साहित्‍य और &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/01/31/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%aa%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%8f%e0%a4%a5%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a5%80-%e0%a4%87-%e0%a4%ae/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4343&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>आधुनिक दर्शन शास्‍त्र के विकास में जी. ई मूर का योगदान उतना ही महत्‍वपूर्ण है! जितना कि बर्ट्रेंड रसेल का। उसकी बहुत कम रचनाएं प्रकाशित हुई। और ‘’प्रिंसिपिया एथिका’’ उनमें से सर्वप्रथम और सर्वाधिक प्रसिद्ध किताब है।</p>
<p>      अंग्रेजी साहित्‍य और चिंतन पर उसका प्रभाव विचारणीय है। बर्ट्रेंड रसेल ने इस किताब के बारे में लिखा, ‘’इसका हमारे ऊपर (कैम्ब्रिज में) जो प्रभाव पडा, और इसे लिखने से पहले और बाद में जो व्‍याख्‍यान हुआ उसने हर चीज को प्रभावित किया। हमारे लिए वह विचारों और मूल्यों का बहुत बड़ा स्‍त्रोत था। लॉर्ड केन्‍स का तो मानना था कि यह किताब प्लेटों से भी बेहतर है।<span id="more-4343"></span></p>
<p>      ‘’यह किताब नैतिक तर्क सारणी के दो मूलभूत सिद्धांतों की मीमांसा करती है। इसमें दो प्रश्‍न अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण  मालूम होते है; वे कौन सी चीजें है जो अपने आप में शुभ है, और हम किस तरह के कृत्‍य करें? नीतिशास्‍त्र के चिंतन में मूर के लेखन की सरलता, स्‍पष्‍टता और कॉमन सेंस ताजा प्राण फूंक देते है। उसकी बौद्धिक प्रामाणिकता और ओज इस किताब पर श्रेष्‍ठता की मुहर लगाते है।</p>
<p>      यह किताब उस मानसिकता और बौद्धिक स्‍थिति के लिए लिखी गई है। जो आज से पचास साल पहले निति और नैतिकता का आचरण में बहुत विश्‍वास रखती थी। बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में मनुष्‍य के मन पर नीति की जबरदस्‍त पकड़ थी। यहां तक कि सभी धर्म नैतिक आचरण बनकर रह गये थे। आज की तारीख में इस किताब का महत्‍व समझ में आना बहुत मुशिकल है। क्‍योंकि आज नीति की धज्‍जियां उड़ गई है। हम मानसिक तौर पर एक अलग ही समय में जी रहे है।</p>
<p>      बहरहाल जिस समय यह किताब लिखी गई उस समय यह क्रांतिकारी साबित हुई। क्‍योंकि उसने नीति नियमों की बुनियाद को हिला दिया। अच्‍छा-बुरा, सही-गलत, पाप-पूण्‍य, इसकी सामाजिक परिभाषा पत्‍थर की लकीर जैसी स्‍थिर होती है, मजबूत होती है। उसके आधार पर न्‍याय, अदालत, पुलिस, धर्म इत्‍यादि बनाये जाते है। और यहां मूर मौलिक सवाल उठाता है कि जिसे हम शुभ कहते है वह क्‍या है? क्‍या वह किसी वस्‍तु की आंतरिक गुणवता है या कि एक खास तरह के आचरण का मापदंड है? क्‍या अस्‍तित्‍व में लिखा है कि फलां चीज शुभ है और फलां चीज अशुभ? यह आचरण सही है और यह गलत? इसे आदमी ही तय करता है, अस्‍तित्‍व नहीं।</p>
<p>      ये सारे प्रश्‍न नीतिशास्‍त्र के अंतर्गत आते है, किताब की भूमिका में मर ने यह बात स्‍पष्‍ट की है, ‘’जब हम कहते है, फलां आदमी अच्‍छा है या वह शख्‍स दुर्जन है। जब हम पूछते है, मुझे क्‍या करना चाहिए? या क्‍या ऐसा करना गलत होगा? तो यह नीतिशास्‍त्र का अधिकार है कि वह इस तरह के प्रश्‍नों की चर्चा करे। अधिकार जब हम इन शब्‍दों का प्रयोग करते है, ‘’शुभ, अशुभ, कर्तव्‍य, अधिकार, अच्‍छा, बुरा तब हम नैतिक मूल्यांकन कर रहे होते है।</p>
<p>      अधिकांश नीतिवादी दार्शनिक अच्‍छाई को अच्‍छे आचरण से जोड़ते है। क्‍योंकि एक आदमी अच्‍छा है कि नहीं यह कैसे पता चलेगा? उसके आचरण से ही न? जब हम कहते है नशे में धुत होना बुरा है तो हम मानकर चलते है कि मदहोश होना बुरा कृत्‍य है।</p>
<p>      मूर की विशिष्‍टता यह है कि वह आचरण को गुणवत्‍ता से अलग करता है। पहले गुणवत्‍ता, बाद में आचरण।  और उसका मुद्दा सटीक है। कोई व्‍यक्‍ति अच्‍छा है। इसीलिए अच्‍छा आचरण कर सकता है। बुरा आदमी अच्‍छा आचरण कर सकता है। बुरा आदमी अच्‍छा आचरण कैसे कर सकता है। इसका मतलब है, अच्‍छाई अपने आप में कोई गुण है, मूल्‍य है।</p>
<p>      अच्‍छाई की परिभाषा क्‍या है? मूर कहता है अच्‍छाई को परिभाषित करना असंभव है। ठीक वैसे ही जैसे पीले रंग ने देखा हो उसे समझाना मुश्‍किल है कि पीला रंग क्‍या है।</p>
<p>      एक बार यह  स्‍थापित कर कि अच्‍छाई का विश्‍लेषण और चर्चा करना नीतिशास्‍त्र को तीन हिस्‍सों में बांटा है। एक नैसर्गिक नीतिशास्‍त्र, दूसरा आध्‍यात्‍मिक नीतिशास्‍त्र और तीसरा सुखवाद (हिडोनिज्‍म) इससे पहले कि मनोविज्ञान एक स्‍वतंत्र विज्ञान की तरह विकसित हुआ, अध्‍यात्‍म, विज्ञान और गुह्म विज्ञान, ये सब ‘’नैचुरल साइंस’’ नैसर्गिक विज्ञान कहलाते थे। नैसर्गिक विज्ञान मानता है कि ‘’शुभ’’ वस्‍तुएं न हो तो क्‍या समय में कहीं भी केवल अच्‍छाई हो सकती है? क्‍या ‘’शुभ’’ एक अनुभूति है या कि वह वस्‍तुओं का अंग है जिससे कि वे बनी है? यदि वह उनका मूल द्रव्‍य है तो उसे निकाल लेने पर वह बचेगी ही नहीं।</p>
<p>      ‘’सुखवाद’’ पर एक पूरा परिच्‍छेद है। सुखवाद सुप्रसिद्ध दार्शनिक मिल का सिद्धांत है जो बीसवीं सदी के प्रारंभ में बहुत लोकप्रिय था। और आज यह सिद्धांत मात्र दर्शन नहीं, मनुष्‍य की जीवन चर्या बन चुका है। यह सिद्धांत मनुष्‍य की हर इच्‍छा और हर कृत्‍य के पीछे एक ही प्रेरणा को मानता है। और वह है सुख पाने की आकांशा इसलिए सुखवाद के अनुसार शुभ की परिभाषा है सुख। जो भी सुखद है उसे हम शुभ या अच्‍छा कहते है। सुखवादी दार्शनिक सुख को सर्वोपरि मानते है, सुख के अलावा जो भी है, फिर वह पूण्‍य हो या ज्ञान, जीवन हो या प्रकृति, या सौंदर्य, ये सब सुख प्राप्‍त करने के साधन की तरह अच्‍छे है। ये अपने आप में साध्‍य नहीं है। मिल ने लिखा है: ‘’सुख, और दुःख से मुक्‍ति ये ही अपने आपे साध्‍य हो सकते है।‘’</p>
<p>      नीतिशास्त्र का एक और तल है आध्‍यात्‍मिक नीतिशास्‍त्र। मूर की दृष्‍टि में यही नीतिशास्‍त्र शुभ की परिभाषा कर सकता है। क्‍योंकि यह नैसर्गिक नीतिशास्त्रियों या सुखवादियों की तरह शुभ को किसी वस्‍तु का गुण नहीं मानता।</p>
<p>      ‘’आध्‍यात्‍मवादी लोगों की यह बहुत बड़ी योग्‍यता है कि वे ज्ञान को सिर्फ उन वस्‍तुओं तक सीमित नहीं मानते जिन्‍हें हम छू सकते है। देख सकते है, या महसूस कर सकते है। आध्यात्मवादी मानिसक तल पर जो वस्‍तुएं है उनके बारे में तो सोचते ही है, साथ में वस्‍तुओं के उस वर्ग के बारे में भी चिंतन करते है जो समय में नहीं होती, समय का अंग नहीं है, न ही प्रकृति का अंग है। सच तो यह है कि वह होती ही नहीं। यह जो वर्ग है ये शुभ को एक विशेषण की तरह समझ सकते है। यह ‘’गुडनेस’’ याने अच्‍छाई नहीं है, वरन वे वस्‍तुएं और गुणवत्‍ताएं है जो समय के भीतर हो सकती है। जिनकी एक अवधि होती है। और जो होती है और विदा भी हो सकती है। ये हमारे जानने के विषय हो सकते है।   </p>
<p>      ‘’इस वर्ग के सबसे अहम उदाहरण है, अंक अर्थात नंबर। यह तो निश्‍चित है कि दो प्राकृतिक चीजें है; और यह भी उतना ही सुनिश्‍चित है कि ‘’दो’’ का अपना कोई अस्‍तित्‍व नहीं होता, और न ही हो सकता है। दो और दो चार जरूर हो सकते है। लेकिन अस्‍तित्‍व में न तो दो होते है और न चार होते है। और फिर भी उसमे कोई अर्थ तो होता है। तो एक अर्थ में दो है भी, और नहीं भी। जिसे सामान्‍य सत्‍य कहा जाता है, मसलन धरती पर कहीं भी कोई भी दो चीजें जुडकर चार होती है, वह वस्‍तुत: चार होती ही नहीं। इसे सामान्‍य सत्‍य माना जाता है। और प्लेटों के समय से लेकर आज तक इन ‘’सामान्‍य सत्‍यों‘’ ने दार्शनिकों के चिंतन में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई है।</p>
<p>      मूर के अनुसार, आध्‍यात्‍मिक नीति शास्त्री ‘’सुप्रीम गुड’’ ‘’ आत्‍यंतिक शुभ’’ को मानते है लेकिन वह समय के बारे में अंत: वह प्रकृति का हिस्‍सा नहीं होता है। प्रकृति और सभी प्राकृतिक वस्‍तुएं समय में जीती है।</p>
<p>      इसके बाद मर ने नीतिशास्‍त्र और आचरण का संबंध स्‍थापित किया है। नीतिशास्‍त्र के लिए शुभ की अवधारणा को मानना बहुत आवश्‍यक है क्‍योंकि उनका पूरा भवन ही उस पर खड़ा है।</p>
<p>      जब हम किसी बात को या वस्‍तु को ‘’अच्‍छा’’ कहते है तो क्‍यों कहते है? इसे तय करना नीति शास्‍त्र का काम है।</p>
<p>      इसी से जुड़ा हुआ दूसरा पहलू है या अच्‍छा भाव से किये हुए हर कृत्‍य का परिणाम अच्‍छा होता है। अगर हां, तो किसके लिए अच्‍छा है? खुद के लिए या सबके लिए? क्या कोई ऐसा कृत्‍य हो सकता है जो सब के लिए अच्‍छे परिणाम लाये?</p>
<p>      किताब का अंतिम परिच्‍छेद है: ‘’दि आइडियल, आदर्श’’ इससे पहले वाक्‍य से ही मूर अपनी भूमिका स्‍पष्‍ट करता है—‘’ इस परिच्‍छेद का शीर्षक संदिग्‍ध है। जब हम किसी अवस्‍था को आदर्श कहते है तो हम तीन अलग-अलग बातें करना चाह सकते है। जब हम किसी चीज को अच्‍छा कहते है तो हो सकता है। कि हम न केवल अच्‍छा मानते है। वरन अन्‍य सभी चीजों से उसे बेहतर समझते है।‘’</p>
<p>      ‘’आदर्श का अर्थ है वस्‍तुओं की सर्वश्रेष्‍ठ अवस्‍था, आत्यंतिक शुभ का सार निचोड़। इस अर्थ में स्‍वर्ग की सम्‍यक कल्‍पना आदर्श की सम्‍यक धारण होगी। तथापि वैयक्‍तिक शुभ के पार एक सामूहिक और सार्वत्रिक शुभ की भी संकल्‍पना है। इसे ही दर्शन शास्‍त्र में मानवता का शुभ कहते है। यह वह अंतिम लक्ष्‍य है जिसके लिए हम काम करें। इस अर्थ में युटोपिया आदर्श है। युटोपिया की मन ही मन कल्‍पना करने वाले अपने ख़्यालों में कई चीजों को संभव मान सकते है। जो कि यथार्थ में असंभव हो सकते है।‘’</p>
<p>      क्‍या ऐसा कोई शुभ है जो अपने आपमें सत्‍य हो सकता है। हो सकता है यह जो आत्‍यंतिक शुभ है उसकी कुछ ऐसी गुणवत्‍ताएं हों जिनकी हम कल्‍पना भी कर सकते हो। क्‍या कोई ऐसा खालिस शुभ है जिस पर अशुभ की बिलकुल छाया न हो? यदि सुख शुभ नहीं हो सकता, सौंदर्य शुभ नहीं हो सकता, ज्ञान शुभ नहीं हो सकता—क्‍योंकि प्रत्‍येक का विपरीत उसमे समाया हुआ है—तो फिर परम शुभ क्‍या है।</p>
<p>      दो सौ पच्‍चीस पृष्ठों की यह खोज अंतत: शुभ तक नहीं पहुँचती अपितु पाठक को अधर में ही लटका देती है। जिस प्रश्‍न को लेकर शुरूआत की थी, ‘’वॉट इज़ गुड’’ ‘’शुभ क्‍या है। उसका उत्‍तर मिलना तो दूर, प्रश्‍न और विराट हो जाता है। तो फिर सवाल उठता है हम किस मुंह से इस अथाह जीवन के नीतिशास्‍त्र, कानून, अदालतें, किस लिए? यदि यह किताब किसी को इतना भी डांवाडोल कर देती है तो क्‍या चाहिए जी इ मूर सफल हुआ।</p>
<p><strong>ओशो का नज़रिया&#8211;</strong></p>
<p>      जी. इ. मूर एक महान समसामयिक लेखक, न एक किताब लिखी है: ‘’प्रिंसिपिया एथिका’’ और पूरे इतिहास में संभवत: वह एकमात्र व्‍यक्‍ति है जिसने शुभ को परिभाषित करने के लिए इतनी गहराई से सोचा हो। शुभ की परिभाषा किए बगैर कोई नीतिशास्‍त्र कोई नैतिकता नहीं हो सकती। अगर तुम्‍हें यही पता नहीं हे कि शुभ क्‍या तो तुम कैसे जानोंगे क्‍या नैतिक है, क्‍या अनैतिक ; क्‍या सही है, क्‍या गलत।</p>
<p>      उसने एक बुनियादी सवाल को उठाया और बगैर यह जानते हुए कि यह आखिरी सवाल है। और वह मुसीबत में फंस गया। आज की दुनियां के सर्वाधिक बुद्धिमान लोगों में एक था वह। वह इस सवाल को हर दृष्‍टि कोण से देखकर लगभग ढाई सौ पन्‍नों तक खोज करता है: ‘’शुभ क्‍या है?’’ और इतने सरल से शब्‍द की परिभाषा करने में वह बुरी तरह असफल रहा। हर कोई जानता है कि अच्‍छा क्‍या है, हर कोई जानता है बुरा क्‍या है। हर कोई जानता है सुंदर क्‍या है। हर कोई जानता है बुरा क्‍या है? हर कोई जानता है सुंदर क्‍या है? लेकिन उसकी परिभाषा करोगे तो तुम उसी मुसीबत में पड़ोगे।</p>
<p>      उसने सोचा होगा कि हर कोई जानता है कि शुभ क्‍या है, सिर्फ थोड़ा सा राज जानने की बात है। ताकि उसकी परिभाषा की जा सके। लेकिन ढाई सौ पन्‍नों के बारीक तर्क के बाद, गहन चिंतन और बौद्धिक विश्‍लेषण के बाद वह इस नतीजे पर पहुंचता है कि शुभ अव्‍याख्‍येय है।</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>बोधिधर्म: दि ग्रे टेस्ट झेन मास्‍टर</strong></p>
<p>जी. इ. मूर की ‘’प्रिंसिपिया एथिका’’ मुझे यह किताब बहुत पसंद है। यह तर्क की महान सरणी है। यह दो सौ से अधिक पृष्‍ठ एक ही प्रश्‍न के ऊहापोह में बिताता है: शुभ क्‍या है। और अंतत: इस निष्‍कर्ष पर पहुंचता है कि शुभ अव्‍याख्‍येय है। अद्भुत लेकिन उसने अपना गुह्म पाठ बखूबी किया। उसने जल्‍दी से निर्णय नहीं ले लिया जैसे कि रहस्‍यदर्शी लेते है। वह दार्शनिक था। वह आहिस्‍ता-आहिस्‍ता कदम-दर-कदम बढ़ता गया। शुभ अव्‍याख्‍येय है जैसे कि सौंदर्य है या भगवत्‍ता है। वस्‍तुत: जो भी मूल्‍यवान है वह अव्‍याख्‍येय है। ध्‍यान रहे, जिसकी भी परिभाषा की जा सके वह दो कौड़ी का है। जब तक कि तुम अव्याख्येय तक नहीं पहु्ंचो, तुम किसी मूल्‍यवान के करीब आये ही नहीं।</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>बुक्‍स आय हैव लव्‍ड </strong></p>
<br />Filed under: <a href='http://oshosatsang.org/category/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%af-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%a4%e0%a4%95%e0%a5%87/'>ओशो की प्रिय पूस्‍तके--</a> Tagged: <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/'>ओशो</a>, <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6/'>स्‍वामी आनंद प्रसाद</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/oshosatsang.wordpress.com/4343/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/oshosatsang.wordpress.com/4343/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/oshosatsang.wordpress.com/4343/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/oshosatsang.wordpress.com/4343/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/oshosatsang.wordpress.com/4343/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/oshosatsang.wordpress.com/4343/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/oshosatsang.wordpress.com/4343/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/oshosatsang.wordpress.com/4343/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/oshosatsang.wordpress.com/4343/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/oshosatsang.wordpress.com/4343/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/oshosatsang.wordpress.com/4343/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/oshosatsang.wordpress.com/4343/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/oshosatsang.wordpress.com/4343/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/oshosatsang.wordpress.com/4343/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4343&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://oshosatsang.org/2012/01/31/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%aa%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%8f%e0%a4%a5%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a5%80-%e0%a4%87-%e0%a4%ae/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>0</slash:comments>
		<georss:point>28.621671 77.162177</georss:point>
		<geo:lat>28.621671</geo:lat>
		<geo:long>77.162177</geo:long>
		<media:content url="http://1.gravatar.com/avatar/18ba8ff7182a19f3392c7e668fd1934c?s=96&#38;d=identicon&#38;r=G" medium="image">
			<media:title type="html">anandprashad</media:title>
		</media:content>
	</item>
		<item>
		<title>ध्‍यान में प्रथम अनुभूति&#8211;स्‍वामी आनंद प्रसाद</title>
		<link>http://oshosatsang.org/2012/01/30/%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a5%e0%a4%ae-%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a5%81%e0%a4%ad%e0%a5%82%e0%a4%a4%e0%a4%bf/</link>
		<comments>http://oshosatsang.org/2012/01/30/%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a5%e0%a4%ae-%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a5%81%e0%a4%ad%e0%a5%82%e0%a4%a4%e0%a4%bf/#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 30 Jan 2012 16:20:37 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[मार्ग की मधुर अनुभूतियां—]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://oshosatsang.org/?p=4339</guid>
		<description><![CDATA[ध्‍यान के प्रथम कदम मनुष्‍य के एक नर्म मुलायम मिट्टी पर पड़ें कदमों की तरह होते है जो बहुत गहरी छाप छोड़ जाते है। फिर आप उसमें श्रद्धा की गुड़ाई की हो तो सोने पे सुहागा समझो। अगर उस भूमि &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/01/30/%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a5%e0%a4%ae-%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a5%81%e0%a4%ad%e0%a5%82%e0%a4%a4%e0%a4%bf/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4339&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><div id="attachment_4340" class="wp-caption alignright" style="width: 206px"><a href="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/01/scan0025.jpg"><img src="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/01/scan0025.jpg?w=196&#038;h=300" alt="ध्‍यान की अनुभुति--" title="ध्‍यान की अनुभुति--" width="196" height="300" class="size-medium wp-image-4340" /></a><p class="wp-caption-text">ध्‍यान की अनुभुति--</p></div>ध्‍यान के प्रथम कदम मनुष्‍य के एक नर्म मुलायम मिट्टी पर पड़ें कदमों की तरह होते है जो बहुत गहरी छाप छोड़ जाते है। फिर आप उसमें श्रद्धा की गुड़ाई की हो तो सोने पे सुहागा समझो। अगर उस भूमि में अपने बीज बो दिया तो वह बहुत गहरा और उँचा वृक्ष जरूर बनेगा। जिसे कोई भी मीलों दूर से भी देख सकेगें। इस लिए प्रथम अनुभूतियों को आज भी में अपने बिलकुल पास महसूस करता हूं, जैसे वो अभी कोरी और अनछुई है। ध्‍यान के पहले दिन ही चित मुझे अचेतन की उन गहराइयों में ले गया। जिस की अनुभूति आज मैं रोंए रेशे में मांस मज्‍जा बन कर समा गई है। कितनी मधुर और ठोस धरातल पर वह अनुभूति मुझे एक स्‍वप्‍न तुल्‍य लगती है। परन्‍तु मैं जानता हूं कि वह कोई कोरी कल्‍पना नहीं थी। और न ही वह एक स्‍वप्‍न। बस यूं समझो मेरे अंदर एक प्‍यास थी और सामने अमृत गागर मिल गया। और में डूब गया उस में, छोड़ अपने को पूरी तरह से बिना कुछ सोचे विचारे किये की क्‍या होगा और कैसे..;। <span id="more-4339"></span>डूबने वाले को क्‍या पता क्‍या किनारा और क्‍या गहराई। मैंने तो बस छलांग लगा दी और छोड़ दिया आस्‍तित्‍व के हाथ में। वैसे मुझे में लाख खराबियां थी पर एक संकल्प और साहस की कमी नहीं थी। मैं बचपन से जो भी काम करता, उस के अंदर पूर्णता से डूब जाता था। शायद यही सोच और संकल्प मुझे ध्‍यान की धारा में ले गई। जब भी में ध्‍यान करने  जाता था तो झोक देता था पूरी ताकत और अपने आप को। पूरे शरीर की उर्जा लगा देता, और  चूकने का इंतजार करता की कहां पर वह खत्‍म होती है। पर ऐसा दिन कभी नहीं आया आज तक, वह कभी नहीं चुकी, कभी-कभी ध्‍यान करते हुए मन यह कल्‍पना या भय जरूरी दिखाता की अगर अभी एक भी हूं&#8230;हूं&#8230;और किया तो हूं के साथ प्राण निकल जायेगे। परन्‍तु मैंने एक नहीं हजार किये&#8230;.लेकिन कभी कुछ नहीं हुआ। ये सब मन का खेल होता है। मन को जब लगता है कि मैं मरा। वह लाख बहाने बाजी करता है। यही उसके बच निकलने का एक मात्र उपाय है, जिस में वो कभी-कभी कामयाब हो जाता है। परन्‍तु मैंने उसकी एक नहीं चलने दि और फिर वह बेचारा लाचार एक कोने में दूबक कर बैठ गया। उसकी बंदर वाली उछल कूद कुछ ही महीनों में थक हार गई।</p>
<p>      ध्‍यान करते समय किसी अनुभव या कल्‍पना पर मेरा कोई जोर या विश्‍वास नहीं था। क्‍योंकि ओशो ने साफ कहां था, ‘’ये सब मार्ग के दृश्‍य है इन्‍हें देखो पर रुको मत।‘’ पहले दिन जब में ध्‍यान करने के लिए गया तो, किसी ने कुछ नहीं बताया कि ध्‍यान क्‍या है और कैसे करना है। मैंने चोगा पहना और अंदर चला गया ध्‍यान केन्‍द्र में। वहां और मित्र भी ध्‍यान के लिए आये हुए थे। ध्‍यान का संगीत चालू हुआ। मुझे मजबूरन देखना पडा की ये सब क्‍या हो रहा है और कैसे करना है। परन्‍तु आँख खोल कर किसी को देखा शोभा दाई बात नहीं होती। परन्‍तु यह मेरी मजबूर या असह्यता समझो। क्‍योंकि क्‍या करना है मुझे कुछ भी पता नहीं था। वैसे अकसर ध्‍यान में जाने से पहले नये मित्र को ध्‍यान कराने वाला बता देता है कि किसी तरह से ध्‍यान करना है। पर होना कुछ और ही था&#8230;.जो मेरे लिए विस्मयकारी ही था। लेकिन एक बार सब देखने के बाद मैनें आंखें बंद कर ली और प्रथम चरण के संगीत खत्‍म होने तक मैं वह क्रिया करता रहा। अब दूसरा नृत्‍य कर चरण आया। तब भी मैंने आंखें खोल कर देखा और कुछ झिझक के साथ नाचने लगा। कुंडलिनी का संगीत चमत्कारी है। ओशो के दिशानिर्देश पर तैयार संगीत किसी और ही लोक का लगता है। आज भी उसे हजारों बार सून कर ऐसा लगता वह एक दम नया और अनछुआ है। जबकि आप किसी भी संगीत को दस-पाँच बार सुनने के बाद बोर हो जाते हो। और ये मेरा अकेले का अनुभव नहीं है। लाखों करोड़ो&#8230;.जो 30-35 साल से रोज इस संगीत पर ध्‍यान करते है। पूना आश्रम में साय चार बज कर पंद्रह मिनट पर।</p>
<p>सालों से ये ध्‍यान नित नियम से हो रहा है।     </p>
<p>      नृत्‍य ने मेरे पूरे शरीर को एक दम हलका और भार रहित कर दिया। तोड़ दिया मैंने सारे बंधन जो सालों से कही दबे हुए थे। क्‍योंकि वहां पर सब मौज से नाच रहे थे, न वहां कोई देखने वाला ही था, सब ही तो नृत्‍य में डूबे हुई थे। फिर आप को क्‍या झिझक और शर्म। ये अनुभव मुझे तीसरे चरण में हुआ। जब ध्‍यान के लिए एक खास संगीत बजने लगा। इस चरण में आप को बैठ कर या खड़े रह कर संगीत तो सुनना होता है। घंटियों हजार-हजार ध्‍वनि के साथ और भी बाद यत्र बज रहे थे। जो हमारे सुनने की पूर्णता पर चोट कर रहे थे। हजारों लाखों घ्वनियां इधर उधर से आ रही थी और वह सब मेरी नाभि में डूब रही थी। और मुझे ऐसा लग रहा था, जैसे मेरा पूरा शरीर कान बन गया है। और घ्वनियां मुझे में से होकर गुजर रही है। कुछ देर में मेरा शरीर मानों मिट गया। शरीर का एक भार जो हमेशा महसूस करते है हम, अचानक गायब हो गया। कितना हल्‍कापन पहली बार मुझे लगा आपको बात नहीं सकता।</p>
<p>      मैं आंखें बंद किये&#8230;थिर खड़ा था। शरीर की सभी प्रकार की हलचल समाप्‍त हो गयी थी। या यूं कह सकते है की में शरीर को हीला-झूला पाने की स्‍थिति में नहीं था। मानों पहली बार शरीर ने में मेरी आज्ञा माननी बंद कर दी। मैने एक दो बार हाथ हिलाने की कोशिश की पर मैं कामयाब नहीं हो सका। मरना क्‍या होता है&#8230;..शरीर का मिटना क्‍या होता है, उसे पहले बार मैने जाना। हम नाहक मोत से डरते है। सच ही मुझे उस मिटने पर जरा भी डर नहीं लगा क्‍योंकि मैं देख रहा था अपने को पूरा का पूरा।  और मेरी स्‍वास भी चल रही थी, पर वो कही दूर थी। जिन पर मनुष्‍य का वैसे भी कोई नियंत्रण नहीं है। और हम नियंत्रण करने को योग आसन मानते है कैसा विरोधा भास है। जो स्‍वय चल रही है, अविरल। धीरे-धीर मुझे लगने लगा की मेरे शरीर ने एक वृक्ष का रूप ले लिया है। एक पहाड़ी ढलान पर खड़ा मैं नीचे खाई की और झांक रहा हूं। दूर दराज तक बर्फ ही बर्फ है। और नरम मुलायम बर्फ मेरे तनों और टहनियों पर अब भी गिर रही थी। वहां हवा का एक झोंका भी नहीं था। आस पास के छोटे मोटे पेड़ों को में निहार रहा था। दूर पहाड़ियों पर बादल तैर रहे थे। मेरे आप पास जो छोटे-छोटे पेड़ पौधे थे। मैं उन पर ज़मीं बर्फ को देख रहा था। पूरा रास्‍ता एक दम सून-सान था। केवल बर्फ की सफेद चादर पर हल्‍की-हल्‍की सूर्य की रोशनी पड़ने के कारण वह चाँदी के समान चमक रही थी। मैं बहुत विशाल और ऊँचा था। परंतु मैं देख रहा था, मेरे टहनियों पर कोई पत्‍ते नहीं थे। जिसके कारण मैं देख नहीं पाया की मैं कौन सा वृक्ष था। रूई की तरह गिरती बर्फ के साथ एक प्राणी जो ऊदबिलाव की तरह दिखाई दे रहा था। धीरे-धीरे मेरे उपर चढ़ रहा था। उस समय मेरे मन कि अवस्‍था कैसी थी, एक हलका पन&#8230;.ऐसा जिसे इससे पहले मैंने कभी महसूस नहीं किया था। बोझ रहित&#8230;..जहां पर विचारों की दौड़ नहीं थी। एक दम सूना पथ। मीलों दूर तक कोई विचार नहीं।  सब कुछ खाली हो गया हो जैसे शायद वृक्षों के जगत में विचार नहीं होते केवल भाव होते है। न वहां कोई तरंग थी, न कोई विचार, न कोई शब्‍द&#8230;&#8230;.ओर न ही थी वहां कोई उत्‍तेजना। कितना सुखद लग रहा था वह क्षण&#8230;.</p>
<p>      वह प्राणी जो मेरे उपर चढ़ रहा था शायद इस बर्फ और ठंड में किसी आश्रय की आस में था। उसका छूना, उसका रेंगना। मुझे बहुत भला लग रहा था। जैसे कोई मेहमान हमारे घर आये और हम आनंद और उत्‍साह से भर जाये। वह प्रेम ऐसा था, मातृत्‍व लिये, आपका पूरा शरीर प्रेम की तरंगों से तरंगाइत हो रहा हो। मैं अपने को पूर्ण प्रेम की छूआन से लबरेज होता हुआ महसूस कर रहा था। ऐसा शायद कोई मनुष्‍य के शरीर में कभी अनुभव नहीं कर सकता।  क्‍यों मनुष्‍य के शरीर में हमारा मन कार्य करने लगा है। यहां पर विचारों ने उत्पत्ति शुरू हो जाती है। मनुष्‍य के ऊपर लाखों सालों की यात्रा ने विकास का एक जाल फैला लिया है। आज भी हम आपने जीवन में इसे देख सकते है। जब भी आप किसी को कुछ समझाना चाहते हो तो आप बात करते हो विचारों से और सुनने वाला उन्‍हें लेता है आपने भाव से। आ डांट रह रहे है उसकी भलाई के लिए और वो कहता है तुमने मेरे दिल को ठेस पहुँचाई। कहीं कोई तालमेल नहीं। तब हम कहते फिरते है कि मुझे कोई समझ नहीं रहा &#8230;&#8230;सभी को ऐसा लगा है। वो शायद भाव का लोक है, जो विचारों के ठीक नीचे बह रह है। जिसे कभी कोई प्रेम में गोता मार कर महसूस कर लेता है। प्रत्‍येक मनुष्‍य अपने भाव देखता है और दूसरे के विचार। विचार मन और बुद्धि के जगत के है। और भाव ह्रदय के जगत का। पहली बार विचारों के भार रहित मन में जो हलका पन होता है उसे मैंने महसूस किया। उसे शब्दों में नहीं कहा जा सकता। उस स्‍थिति के बाद घंटो किसी से बात करने या मिलने को मेरा मन नहीं किया। मैं दूर एक एकांत में किसी वृक्ष से टेक लगा कर बैठ गया। कब मेरी आँख लगी और कितना समय बिता मुझे कुछ पता नहीं चला। जब आंख उठा कर सामने देखा तो आसमान पर पूरा चाँद चमक रहा था। इतना खुबसूरत चाँद मेंने पहले कभी नहीं देखा। आस पास झींगुरों की आवाज मानों मन को गुदगुदा रही थी। चाँद की छांव में पेड़ों की पड़ती परछाई झूम रही थी। घंटो बाद भी तन भार रहित&#8230;..अपने हल्‍के पन को लिए रहा। और मैं एक अद्भुत सिहरन सी महसूस करता रहा था। एक खामोशी मेरे दामन पर मानों लिपट गई थी। जो मेरे अंदर से गुद-गुदा हट से भर रही थी। कितनी देर में तो मुझे महसूस हुआ की मैं कौन हूं और यहां पर क्‍या कर रहा हूं&#8230;मस्‍तिष्‍क को ये सब ताल मेल बिठाने में बहुत देर लगी। जैसे हमें कभी-कभार स्‍वप्‍न से बहार आने पर पता नहीं चलता की हम कहां पर है। पर वह स्‍थिति बहुत सुनंद थी।</p>
<p>      दूसरी अनुभूति को मैं ‘’मांग’’ ही कहूंगा। वैसे मैंने ध्‍यान के इन 21 वर्षो में केवल दो ही मांग रखी थी। जो दोनों ही पूर्ण हो गई। दूसरी का जिक्र आगे करूंगा आज पहली मांग की बारी है। ध्‍यान शुरू किये करीब 6 महीने हो गये थे। पर एक बात मुझे बहुत चुभती थी। जब भी में आँख बंद कर के बैठता। तो मेरी आंखों की पुतलियाँ हिलती रहती और हरकत करती थी। और अंदर देखने में जो गहरा मटियाला गाढ़ा अँधेरा साफ नहीं दिखाई देता था। जब भी मैं आँख बंद कर के उसे देखता तो वह हमेशा हिलती रहता। हमारी आंखों की पुतलियों कि हलचल हमारे बेचैन मन का प्रतीक है। मन जितना बेचैन होगा पुतलियाँ उतनी ही अधिक हिलती रहेगी। वह अजीब काला मटियाला अंधकार, एक धुएँ और समुद्र की लहरों को तरह अंदर हिलोरे ले रहा था । कुछ ऐसा अजीब सा था जैसे कि कोई अंधकार से भरा समुद्र हिलोरे मार रहा है। मेरे मन में अचानक एक कल्‍पना आई कि काश ऐसा हो जाता की मेरी आँखो की पुतलियाँ हिलना बंद कर दे।  तब इस अंधकार को देखना कितना सुखद लगेगा भला लगेगा।  पर ये सब मेरे बस की बात नहीं थी। मैं चाहता था मेरी आँख एक दम से जड़ वत हो जाये। एक पत्‍थर की आँख बन जाए। जो मात्र हो वहां उसमें कोई हलचल न हो। क्‍या फिर भी वह अंधकार इस तरह से हिलेगा। या उस मैं जब थिर आंखों से देखूँगा तो वह मुझे कैसा लगेगा।</p>
<p>      इस बात को मैं जानता था, मांग हमेशा मन की होती है, और वह ध्‍यान में बाधा डालने के लिए मन की ही एक कल्‍पना होती है, या उसे कहे लालच, कहीं&#8230;.किसी मांग&#8230;..पर मैं रूक न जाऊं या अपने-आप को रोक नहीं लूं। पर लाख जतन कर उस वासना को मैं दबा नहीं पा रहा था। सच तो यह था की वह मेरी पकड़ से बहार हो गई थी। इस तरह से पुतलियों का हिलना प्रत्‍येक साधक की पहली बाधा होता होगा। क्‍योंकि लाखों सालों से उर्जा आँखो के द्वारा से लगातार बाहर बहती रही है। जब हम आँख बंद करते है। तो उर्जा लगातार आंखों की पुतलियों से टकराती है। उर्जा कभी थिर रह सकती। तब वह वहां मार्ग न पा कर वह वापस लोटती है। और उस उर्जा को संभालने के लिए आंखों की पुतलियों को हलचल करनी होती है। क्‍योंकि तीसरी आँख उस समय तक सोई होती है। उसके द्वार बंद होते है। वैसे तो वह आँख ध्‍यान के लिए हमेशा प्‍यासी रहती है। पर शायद साधक को उर्जा इन आंखों से उस आँख तक हस्तांतरण करने में कुछ समय लगता है। फिर तो वह तीसर आँख यह कार्य खुद-ब-खुद कर लेती है। इसमे साधक को कुछ भी नहीं करना होता। उसके बाद तो आपको केवल ध्‍यान को तीसरी आँख पर केंद्रित करना है और वह चूस लगी सारी उर्जा को अपने अंदर। क्‍यों तब तक आपकी आंखे जड़वत थिर हो चुकी होती है।</p>
<p>      इस सब को महसूस करेने के लिए मुझे तीन महीने का समय लगा। अचानक एक दिन जैसे ही मैं ध्‍यान के चरण में खड़ा हुआ। तो क्‍या देखता हूं मेरी दोनों आंखे आपस में चिपक गई। न तो बाहर की तरफ हलचल थी और न अंदर की तरफ। कितना अभूतपूर्व क्षण था। उस समय आंखों से देखना। चाहें वहां प्रकाश नहीं था। पर हम उस अंधकार को भी कहां देख पाते है। मैं देखता रहा उस काले-मटमैले अंधकार को। जो लहरों की भाति हिलडूल रहा था। मानों अंदर एक अंधकार का समुद्र लहरा रहा है। वहां अंदर अब केवल अंधकार में हलचल थी। पर में केवल देख रहा था। वो हिलती छाया&#8230;..कितनी सौम्य और सुखद लग रही थी। अंदर तक सब शांत हो गया। शायद वहीं दर्व है जिसे विज्ञान कोई नाम दे रहा है। मैटर या और कुछ। पर यह मानने की बात है, हम प्रकाश करते है। तब भी अंधकार होता है। और प्रकाश को बुझा देते है तब भी। प्रकाश आता जाता है। परन्‍तु अंधकार न आता है जाता। जो आता नहीं वह जा भी कैसे सकता है। अब ध्‍यानियों ने परमात्‍मा को प्रकाश रूप कहा है। और कितने ही धर्म अपनी साधना के पहले चरण में ही प्रकाश की साधना से शुरू करते है। परन्‍तु मेरा तो पहला साक्षात्कार एक अंधकार से होता है। वह भी महीनों हिलते-डुलती आंखों से आज पहली बार में उन थिर आंखों के बाद में देख पा रहा था, उस तरल अंधकार को जो जम गया था बर्फ की तरह&#8230;&#8230;</p>
<p><strong>ओशो ने एक जगह कहां है&#8230;</strong></p>
<p>      ‘’जब भी कोई साधक भीतर प्रविष्‍ट होता है, तो प्रकाश से उसकी सीधी मुलाकात कभी नहीं होती। होगी भी नहीं, क्‍योंकि प्रकाश तो बहुत गहरे में छिपा है। हमारे और हमारे ही प्रकाश के बीच अंधकार की गहरी पर्त है। तो पहले तो भीतर आँख बंद करते ही अंधकार हो जाता है। इस अंधकार से भयभीत मत होना। और इस अंधकार में काई कल्‍पित अंधकार निर्मित मत करना। इस अंधकार में प्रवेश करते ही जाना&#8230;.कल्‍पित प्रकाश भी हम निर्मित कर सकते है। लेकिन इस कल्‍पित प्रकाश के कारण असली प्रकाश का कोई पता नहीं चलेगा।</p>
<p>      बहुत सी साधनाएं, जो प्रकाश की कल्‍पना से शुरू होती है; वे साधनाएं इस अंधकार के पार नहीं ले जाती। &#8230;&#8230;.बंद आँख करके हम उस प्रकाश को देखने की कोशिश भी कर सकते है। और कोशिश की तो सफल भी होगें। क्‍योंकि वह प्रकाश हमारी कल्‍पना ने निर्मित किया है। वह आपके ही मन की उत्पती है। वह आपकी ही संतति है। उससे ये अंधकार नहीं कटेगा।</p>
<p>      हां वहां एक और भी प्रकाश है; जब हम अंधेरे में प्रवेश करते चले जाते है। तब वह एक दिन उपल्‍बध होगा। जिसे हमने सोच और चाह कर निर्मित नहीं किया। लेकिन अंधकार में डूबते-डूबते एक दिन अंधेरे की वह पर्त टूट जाती है। और हम प्रकाश के लोक में प्रवेश कर जाते है।</p>
<p>      पहली मुलाकात वास्‍तविक साधक को अंधकार से होगी&#8230;.झूठे साधक को प्रकाश से भी हो सकती है।&#8230;</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>समाधि के सप्त द्वार</p>
<p>प्रवचन पहला ध्‍यान शिविर, अंबर नाथ</p>
<p>रात्रि 9 फरवरी 1973</strong></p>
<p>      वो दिन था और उसके बाद मेरी आंखों की पुतलियाँ थिर हो गई। अब कभी भी कहीं पर भी आंखें जैसे बंद करता हूं मेरी आँख चिपक जाती है।&#8230;ओर दोनों आँखों के बीच&#8230;..माथे के अंदर एक अजीब सा चुंबकीय खिचाव महसूस होता है। एक मधुर सुगंध मुझे घेर लेती है। और चारों और थिरता का कोहरा फैल जाता है। मन के परदे पर आते जाता विचारों का रेला&#8230;रुकता चलता रहता है। जब होश बढ़ता है तब विचार गायब हो जाते ह। मार्ग मीलों तक सूनसान। कोई मुसाफिर नहीं&#8230;ओर जैसे ही होश इधर उधर होता है। विचार अपनी दौड़ शुरू कर देते है। मार्ग कितना ही लंबा क्‍यों न हो&#8230;ओर एक हिसाब से होना भी चाहिए। ताकि मार्ग में चलने का आनंद मिल सके। वहां का सौंदर्य&#8230;वहां की सीतलता&#8230;वहां गीत&#8230;वहां सुगंध और सरसता में एक प्रकार की मादकता है। लगता ही नहीं हम चर रहे है। कोई अंजान सी शक्‍ति हमे बहाए लिए चली जा रही है। परन्‍तु एक बात है इसके बदले में हम कुछ मेहनत नहीं करनी पड़ रही है। जैसे संसार में हमेशा जीने के लिए जद्दो जहद मारा मारी करनी होती है। ये मार्ग कितना आराम दाई है सरल है। शायद ध्‍यान दुनियां का सबसे सरल क्रत्‍य है। और सबसे कठिन भी। क्‍योंकि सबसे सरल जिसके लिए कुछ भी नहीं करना होता। परन्‍तु हमारा मन तो कार्य को करने में विश्‍वास रखता है। इस लिए उसे न कुछ करना अति जटिल लगता है।</p>
<p>      नहीं करता मैं मंजिल का इंतजार&#8230;.चलना ही इतना मधुर है। मार्ग ही इतना आनंद दाई है। फिर क्‍यों रूकने के बार में सोचें।</p>
<p>बस चलना ही है लक्ष्‍य मेरा</p>
<p>फिर तूफ़ानों से क्‍या डरना</p>
<p>कांटों की झोली भर ली जब</p>
<p>अब फूलों से भी क्‍या डरना</p>
<p>इस सुने अनंत पथ पर चल कर</p>
<p>पलकों से कांटों को चून कर</p>
<p>है झूल रहा अंब्‍बर नित दिन</p>
<p>आनंद की झोली है भर कर</p>
<p>वो नदिया हो या हो सरिता</p>
<p>फिर खोने से अब क्‍या डरना&#8230;.</p>
<p>है राग वहीं और सुर भी वहीं</p>
<p>पर तान बदलनी पड़ती है</p>
<p>उस आंगन के वो थिर जो कदम</p>
<p>अब झूम-झूम इठलाते है</p>
<p>मन मार मगन हो जाता है</p>
<p>है मधुरस तान लगाते है</p>
<p>आलाप वही, है स्‍थाई वहीं</p>
<p>पर सूर खरज बन जाते है</p>
<p>उन गहरे जाती बंदिश के</p>
<p>गाने से भी अब क्‍या डरना&#8230;.</p>
<p><strong>स्‍वामी आनंद प्रसाद ‘’मनसा’’</p>
<p>(मार्ग की अनुभूति)</strong></p>
<br />Filed under: <a href='http://oshosatsang.org/category/%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a4%a7%e0%a5%81%e0%a4%b0-%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a5%81%e0%a4%ad%e0%a5%82%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%82/'>मार्ग की मधुर अनुभूतियां—</a> Tagged: <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6/'>स्‍वामी आनंद प्रसाद</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/oshosatsang.wordpress.com/4339/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/oshosatsang.wordpress.com/4339/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/oshosatsang.wordpress.com/4339/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/oshosatsang.wordpress.com/4339/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/oshosatsang.wordpress.com/4339/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/oshosatsang.wordpress.com/4339/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/oshosatsang.wordpress.com/4339/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/oshosatsang.wordpress.com/4339/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/oshosatsang.wordpress.com/4339/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/oshosatsang.wordpress.com/4339/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/oshosatsang.wordpress.com/4339/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/oshosatsang.wordpress.com/4339/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/oshosatsang.wordpress.com/4339/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/oshosatsang.wordpress.com/4339/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4339&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://oshosatsang.org/2012/01/30/%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a5%e0%a4%ae-%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a5%81%e0%a4%ad%e0%a5%82%e0%a4%a4%e0%a4%bf/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>2</slash:comments>
		<georss:point>28.621671 77.162177</georss:point>
		<geo:lat>28.621671</geo:lat>
		<geo:long>77.162177</geo:long>
		<media:content url="http://1.gravatar.com/avatar/18ba8ff7182a19f3392c7e668fd1934c?s=96&#38;d=identicon&#38;r=G" medium="image">
			<media:title type="html">anandprashad</media:title>
		</media:content>

		<media:content url="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/01/scan0025.jpg?w=196" medium="image">
			<media:title type="html">ध्‍यान की अनुभुति--</media:title>
		</media:content>
	</item>
		<item>
		<title>बीइंग एंड टाईम-मार्टिन हाइडेगर—(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)</title>
		<link>http://oshosatsang.org/2012/01/30/%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%87%e0%a4%82%e0%a4%97-%e0%a4%8f%e0%a4%82%e0%a4%a1-%e0%a4%9f%e0%a4%be%e0%a4%88%e0%a4%ae-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%b9%e0%a4%be/</link>
		<comments>http://oshosatsang.org/2012/01/30/%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%87%e0%a4%82%e0%a4%97-%e0%a4%8f%e0%a4%82%e0%a4%a1-%e0%a4%9f%e0%a4%be%e0%a4%88%e0%a4%ae-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%b9%e0%a4%be/#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 30 Jan 2012 11:01:46 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[ओशो की प्रिय पूस्‍तके--]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://oshosatsang.org/?p=4334</guid>
		<description><![CDATA[कभी-कभार कोई ऐसी किताब प्रकाशित होती है। जो बुद्धिजीवियों की जमात पर टाइम-बम का काम करती है। पहले तो उसकी अपेक्षा की जाती है लेकिन जैसे-जैसे मत बदलते है वह लोगों का ध्‍यान आकर्षित करने लगती है। ऐसी किताब है &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/01/30/%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%87%e0%a4%82%e0%a4%97-%e0%a4%8f%e0%a4%82%e0%a4%a1-%e0%a4%9f%e0%a4%be%e0%a4%88%e0%a4%ae-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%b9%e0%a4%be/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4334&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>कभी-कभार कोई ऐसी किताब प्रकाशित होती है। जो बुद्धिजीवियों की जमात पर टाइम-बम का काम करती है। पहले तो उसकी अपेक्षा की जाती है लेकिन जैसे-जैसे मत बदलते है वह लोगों का ध्‍यान आकर्षित करने लगती है। ऐसी किताब है जर्मन दार्शनिक मार्टिन हाइडेगर द्वारा लिखित ‘’बीइंग एंड टाईम’’<span id="more-4334"></span></p>
<p>      इसका प्रभाव न केवल यूरोप और अमेरिका के दर्शन पर हुआ बल्‍कि वहां के साहित्‍य और मनोविज्ञान पर भी हुआ। इसके प्रशंसक तो यहां तक कहते है कि उसने आधुनिक विश्‍व का बौद्धिक नक्‍शा बदल दिया। सार्त्र, मार्टिन वूबर, और कामू जैसे अस्‍तित्‍ववादी दार्शनिक हाइडेगर से बहुत प्रभावित थे। यह किताब पहली बार 1927 में प्रकाशित हुई। चूंकि हाइडेगर जर्मन लोगों के लिए बेबूझ था। इस लिए इसका अनुवाद करना लगभग असंभव था। लेकिन हाइडेगर के प्रभाव शाली शिष्‍य जॉन मैकेरी और एडवर्ड रॉबिन्‍सन ने बड़ी मेहनत से यह किताब अंग्रेजी में उपलब्‍ध कराई। हाइडेगर की खूबी यह है कि वह प्रचलित शब्‍दों का सामान्‍य अर्थों में प्रयोग नहीं करता, वरन उन्‍हें अपने आशय देता है। इस करके उसका लेखन बेहद तरोताजा होता है। पाठक को पुलकित करता है लेकिन अनुवाद के लिए चुनौती बनता है। कभी-कभी वह शब्‍दों के पुराने धातुओं में जाकर उनके नए अर्थ गढ़ता है। हाइडेगर की प्रतिभा भाषा के साथ अभिसार करती है। यह किताब वाकई अनुवाद तथा पाठक, दोनों के लिए बुद्धि की कवायद है। न केवल इसकी भाषा बल्‍कि इसका विषय ‘’अंतस और समय’’ भी बड़ा ही दुर्बोध और अगम है। और इसे सुबोध करने में हाइडेगर की लेखनी कहीं भी सहयोग नहीं करती।</p>
<p>      पूरी किताब जीवन के दो बुनियादी गहन बिंदुओं का ऊहापोह है—स्‍वयं का होना और समय। और सचमुच गहराई से देखें तो मनुष्‍य को जीवन के ये ही दो प्रश्‍न बहुत परेशान करते है। मैं कौन हूं? और समय क्‍या है? हाइडेगर लिखता है कि हम जो कि समझते थे कि हम जानते है, कि अपना होना, बीइंग क्‍या है, अब बिबूचन में  पड़ गया है। क्‍या हमारे पास इसका कोई उत्‍तर है। कि बीइंग का वास्‍तविक अर्थ क्‍या है? जरा भी नहीं। इस ग्रंथ में हम इसका अनुसंधान करेंगे। कि बीइंग अर्थात होना क्‍या है? और इसका समय के साथ क्‍या रिश्‍ता है?</p>
<p>      अपने होने के भिन्‍न-भिन्‍न पहलूओं का बारीक विश्‍लेषण हाइडेगर इतनी प्रवीणता से करता है कि पढ़ने वाले को अपने-आप पर संदेह होने लगाता है। क्‍या सचमुच हम वह है जैसा कि हम मानते है? क्‍या यह विश्‍व वास्‍तव में है या हमने इसे मान लिया है? इस मोटी किताब का (488 पृष्‍ठ) तीसर परिच्‍छेद है: ‘’दि वर्ल्ड हुड ऑफ दि वर्ल्‍ड’’ विश्‍व का विश्‍वता। विश्‍व के संदर्भ में अपने होने का मतलब समझना हो तो पहले यह समझना जरूरी है कि यह विश्‍व क्‍या है। सतही तौर पर माना जायेगा कि विश्‍व को समझने की क्‍या जरूरत है? यह तो है ही। नहीं, हाइडेगर की नजरों से देखें तो आप जानेंगे कि आपने कभी विश्‍व को समझा ही नहीं है। क्‍या विश्‍व वे सारी वस्तुएँ है जो उसके भीतर है? जैसे मकान, लोग, वृक्ष पर्वत, सितारे&#8230;.. ? यदि इन वस्‍तुओं का हटा लें तो विश्‍व क्‍या होगा? होगा या नहीं होगा? क्‍या बीइंग भी एक वस्‍तु है या वस्‍तुओं से पहले की घटना है? क्‍या वस्‍तुओं का अपना मूल्‍य है या वह मूल्‍य उनमें हमने डाला हुआ है? हमने—याने किसने?</p>
<p>      &#8230;..फंस गए न भंवर में। इसी भँवर का ना है मार्टिन हाइडेगर। बीसवीं सदी का मूर्धन्‍य अस्‍तित्‍ववादी दार्शनिक। ओशो ने इसकी किताब को अपनी मनपसंद किताबों में शामिल तो किया है लेकिन साथ में यह भी कहा है कि जो तीसरे दर्जे के पागल है वह ही इसे पढ़े।</p>
<p>      फिर भी, चल पड़े है तो थोड़ी दूर तो चलना चाहिए।</p>
<p>      मृत्‍यु के संबंध में हाइडेगर का चिंतन भी असामान्‍य है।</p>
<p><strong>किताब की एक झलक&#8211;</strong></p>
<p>      हम एक दूसरे के साथ रोजमर्रा की जिंदगी में जिस प्रकार की सार्वजनिकता में है उसमे मृत्‍यु को एक ऐसी दुर्घटना माना जाता है जो निरंतर घट रही है। कोई न कोई ‘’मरता’’ है—चाहे पड़ोसी हो या अजनबी। लोग, जिनका हमसे कोई परिचय नहीं है वे मर रहे है—प्रतिदिन, प्रति घंटे। मृत्‍यु एक जानी मानी घटना है जो विश्‍व के भीतर घटती है। लोगों ने  इस घटना की व्‍याख्‍या अपनी सुविधा के लिए की हुई है। जिसका सार इस प्रकार है&#8230;.’’कभी न कभी हमें मरना होगा, अंत में, लेकिर अभी हमारा इससे कोई लेना देना नहीं है।‘’</p>
<p>      ‘’व्‍यक्‍ति मरता है’’ इस वाक्‍य का विश्‍लेषण असंदिग्‍ध रूप से ऐसा होने को प्रगट करता है जो मृत्‍यु की और उन्‍मुख है। इस प्रकार की वार्ता में मृत्‍यु को कुछ ऐसी अनिश्‍चिता समझा जाता है जो प्राथमिक रूप से अभी करीब नहीं है। और इसलिए उससे कोई खतरा नहीं है। यह वक्‍तव्‍य यह ख्‍याल प्रसारित करता है कि मृत्‍यु जिन तक पहूंचती है वे दूसरे लोग है। बीइंग या अपना ‘’होना’’ कभी यह नहीं सोच सकता की मरनेवालों में मैं भी शामिल है।</p>
<p>      सभी जीनियसों की तरह हाइडेगर भी रूढिवादिता और पिटी-पिटाई धारणाओं से संतुष्‍ट नहीं है। वह हर मान्‍यता  की जड़ तर उतरता है। और अंतिम छोर तक पहुंचने के बाद उसे पता चलता है कि वह एक बेबूझ पहली है। सभी गहन चिंतक उस ‘’डेड एंड’’ पर पहुंचते है जो रहस्‍य का द्वार होता है। उसके आगे सोच-विचार संभव नहीं है। अज्ञेय और छलांग ही काम आती है।</p>
<p>      इस विशाल किताब का अंत दो प्रश्‍न वाचक वाक्‍यों से होता है—‘’क्‍या कोई रास्‍ता है जो आदिम समय से निकल कर बीइंग के, होने के अर्थ तक पहुँचाता है? क्‍या समय स्‍वयं को होने के क्षितिज पर प्रकट करता है?</p>
<p>      मार्टिन हाइडेगर जर्मनी में 1989 में पैदा हुआ। फ्रेबर्ग विश्‍वविद्यालय में वह प्राध्‍यापक रहा। हाइडेगर के माता-पिता निम्न 8मध्येवर्गीय परिवार के थे। उसकी मां किसान की बेटी थी। और पिता मजदूर थे। लेकिन वह खुद बहुत मेधावी था इसलिए शिष्‍य वृति पाकर उच्‍च शिक्षा ले सका। उसके जीते जी उसके जीवन का एक पहलू अज्ञात रहा। जो 1987 में उसके एक विद्यार्थी ने उजागर किया। वह पहलू यह था कि हाइडेगर नाझी पार्टी का सदस्‍य था। 1933 में वह नाझी पार्टी में शामिल हुआ। वह हिटलर से इतना प्रभावित कि फ्रेबर्ग विश्‍वविद्यालय में वह नाझी वाद की नीतियों का लागू करना चाहता था। न जाने कैसे, अब तक उसका यह हिटलर प्रेम दुनिया की नजरों से छिपा रहा। मन की जटिलता का कोई क्‍या कहे। हो सकता है हिटलर की और आकर्षित होने का कारण उसका गरीब, सुकड़ता बचपन रहा हो।</p>
<p>      जो भी हो, इस काली छाया के बावजूद या हो सकता है इसकी वजह से, हाइडेगर का मौलिक योगदान दर्शन के क्षितिज पर चंद्रमा की तरह चमकता है। वह बीसवीं सदी की पाश्‍चात्‍य दर्शन धाराओं की गंगोत्री था। 1976 में उसका देहांत हुआ और तब तक वह बीइंग एंड टाइम’’ का दूसरा भाग प्रकाशित न कर सका।</p>
<p><strong>ओशो का नज़रिया&#8211;</strong></p>
<p>      दूसरी किताब है, मार्टिन हाइडेगर की ‘’बीइंग एंड टाइम’’ मुझे यह आदमी बिलकुल पसंद नहीं है। वह न केवल कम्युनिस्ट था बल्‍कि फासिस्‍ट भी था। एडोल्फ हिटलर को मानने वाला। जर्मन लोग क्‍या कर सकते है। उस पर भरोसा नहीं होता। वह इतना प्रतिभाशाली आदमी था, जीनियस था, और फिर भी उस विक्षिप्‍त, मूढ़ एडोल्फ हिटलर का समर्थक था। मैं वाकई हैरान हूं।</p>
<p>      लेकिन उसकी किताब अच्‍छी है—मेरे शिष्‍यों के लिए नहीं वरन जो अपने पागलपन में बहुत आगे निकल गये है उनके लिए। यदि तुम्‍हारा पागलपन बहुत बढ़ चुका है तो बीइंग एंड टाइम पढ़ो। यह समझने से बिलकुल परे है। वह तुम्‍हारे सिर पर हथौड़े की तरह चोट करेगी। लेकिन उसमें कुछ सुदंर झलकें है। जब कोई तुम्‍हारे सिर के ऊपर हथौड़े से चोट करता है तो दिन में तारे नजर आते है। यह किताब ऐसी ही है, उसमे कुछ तारे है।</p>
<p>      यह किताब अधूरी है। मार्टिन हाइडेगर ने दूसरा भाग प्रकाशित करने का वादा किया था। वह जिंदगी भर, बार-बार दूसरा भाग प्रकाशित करने का वादा करता रहा लेकिन कभी उसने उसे लिख नहीं। शुक्र है। मैं सोचता हूं कि उसे खुद समझ में नहीं आया होगा कि उसने क्‍या लिखा है? तो आगे क्‍या लिखता? दूसरा भाग कैसे छापता? और दूसरा भाग उसके दर्शन की पराकाष्‍ठा होने वाली थी। उसे न लिखना ही बेहतर था। कम से कम मज़ाक का विषय तो न बना।  वह दूसरा भाग लिखे बगैर ही मर गया। लेकिन पहला भी  अंतिम दर्जे के पागलों के लिए अच्‍छा है। और ऐसे कई लोग है। इसलिए मैं इन किताबों पर बोल कर उन्‍हें अपनी सूची में सम्‍मिलित कर रहा हूं।</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>बुक्‍स आय हैव लव्‍ड</strong></p>
<br />Filed under: <a href='http://oshosatsang.org/category/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%af-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%a4%e0%a4%95%e0%a5%87/'>ओशो की प्रिय पूस्‍तके--</a> Tagged: <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/'>ओशो</a>, <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6/'>स्‍वामी आनंद प्रसाद</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/oshosatsang.wordpress.com/4334/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/oshosatsang.wordpress.com/4334/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/oshosatsang.wordpress.com/4334/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/oshosatsang.wordpress.com/4334/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/oshosatsang.wordpress.com/4334/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/oshosatsang.wordpress.com/4334/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/oshosatsang.wordpress.com/4334/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/oshosatsang.wordpress.com/4334/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/oshosatsang.wordpress.com/4334/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/oshosatsang.wordpress.com/4334/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/oshosatsang.wordpress.com/4334/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/oshosatsang.wordpress.com/4334/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/oshosatsang.wordpress.com/4334/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/oshosatsang.wordpress.com/4334/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4334&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://oshosatsang.org/2012/01/30/%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%87%e0%a4%82%e0%a4%97-%e0%a4%8f%e0%a4%82%e0%a4%a1-%e0%a4%9f%e0%a4%be%e0%a4%88%e0%a4%ae-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%b9%e0%a4%be/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>2</slash:comments>
		<georss:point>28.621671 77.162177</georss:point>
		<geo:lat>28.621671</geo:lat>
		<geo:long>77.162177</geo:long>
		<media:content url="http://1.gravatar.com/avatar/18ba8ff7182a19f3392c7e668fd1934c?s=96&#38;d=identicon&#38;r=G" medium="image">
			<media:title type="html">anandprashad</media:title>
		</media:content>
	</item>
		<item>
		<title>पुनर्जन्‍म की बात—ओशो</title>
		<link>http://oshosatsang.org/2012/01/28/%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a4-%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/</link>
		<comments>http://oshosatsang.org/2012/01/28/%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a4-%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 28 Jan 2012 15:51:28 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[प्रशन चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://oshosatsang.org/?p=4329</guid>
		<description><![CDATA[प्रश्‍न—कुछ धर्म पुनर्जन्‍म में विश्‍वास करते है और कुछ नहीं करते। आप अपने बारे में कैसे जान सकते है कि आपने भी जीवन जिया है और पुन: जीएंगे? ओशो—सिद्धांतों में मेरा विश्‍वास नहीं हे। मैं एक साधारण आदमी हूं कोई &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/01/28/%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a4-%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4329&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>प्रश्‍न</strong>—कुछ धर्म पुनर्जन्‍म में विश्‍वास करते है और कुछ नहीं करते। आप अपने बारे में कैसे जान सकते है कि आपने भी जीवन जिया है और पुन: जीएंगे?</p>
<p><strong>ओशो—</strong>सिद्धांतों में मेरा विश्‍वास नहीं हे। मैं एक साधारण आदमी हूं कोई सिद्धांतवादी नहीं। सिद्धांतवादी तो महान विचारक होते है। वह यथार्थ के बारे में कुछ भी नहीं जानते, मगर वह इसके बारे में सिद्धांत गढ़ता रहते है। उसकी पूरा जीवन घूमता ही रहता है। और सत्‍य, यर्थाथ तो बस केंद्र में ही रह जाता है। किंतु सिद्धांतवादी इधर-उधर की हांकने में माहिर होता है।<span id="more-4329"></span></p>
<p>      जिस क्षण तुम किसी दूसरे पर भरोसा करने लगते हो, तो अपनी व्‍यक्‍तिगत खोज बंद कर देते हो। और मैं नहीं चाहूंगा। कि तुम अपनी व्‍यक्‍तिगत खोज बंद करों। हजारों वर्ष से व्‍यक्‍ति को इसी तरह छला गया और उसका शोषण किया गया है। मैं इस पूरी रणनीति को समूल नष्‍ट कर देना चाहता हूं। केवल अपने अनुभव पर भरोसा रखो। मैं हां कहूं या न, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। अंतर इस बात से पड़ता है कि तुमने इसका अनुभव किया या नहीं। वहीं निर्णायक होगा। उससे तुम्‍हारे जीवन में निश्‍चय ही परिवर्तन आ जाएगा।</p>
<p>      तीन धर्म है—यहूदी, ईसाइयत, इसलाम, जिनका पूनर्जन्‍म के सिद्धांत पर नकारात्‍मक रूख रहा है। वे कहते है कि यह सच नहीं है। यह एक नकारात्‍मक विश्‍वास है। इन तीनों धर्मों के समानांतर—हिंदू, बौद्ध और जैन, तीन धर्म है जिनका सकारात्‍मक दृष्‍टिकोण है। वे कहते है, पुनर्जन्‍म एक वास्‍तविकता है। किंतु वह भी एक विश्‍वास है; एक सकारात्‍मक विश्‍वास।</p>
<p>      मेरी मान्‍यता तीसरी है, जिसे अभी आजमाया नहीं गया है। मैं कहता हूं, इस सिद्धांत को परिकल्‍पना मान कर स्‍वीकार करो, न तो हां कहो और न ना। परिकल्‍पना मान कर स्‍वीकार करने का अर्थ है: ‘’मैं इसके बारे में किसी सकारात्‍मक अथवा नकारात्‍मक पूर्वाग्रह के बिना इसी जांच-पड़ताल करने के लिए तैयार हूं। मैं इसकी सच्‍चाई जानने के लिए किसी पूर्व कल्‍पित विचार के बिना इसकी गहराई में जाऊँगा।</p>
<p>      धर्मों ने परिकल्‍पना शब्‍द का प्रयोग किया ही नहीं है। तुम या तो विश्‍वास करे या अविश्‍वास। अविश्‍वासी भी विश्‍वासी होता है। केवल नकारात्‍मक ढंग से। उनमें कोई गुणात्‍मक भिन्‍नता नहीं है। वे एक तरह के लोग है। जब तुम्‍हारा कोई नकारात्‍मक विश्‍वास या कोई सकारात्‍मक विश्‍वास होता है, तो तुम्‍हारे मन ने यह निर्णय कर लिया होता है कि सच्‍चाई क्‍या है। इसे मैं अप्रामाणिक, बेईमान कहता हूं। और तुम किसी वस्‍तु को नकारात्‍मक अथवा सकारात्‍मक दृष्‍टि से स्‍वीकार कर लेते हो। तो मन की यह क्षमता है कि वह उस तरह का भ्रम पैदा कर देता है।</p>
<p>      इसलाम में, ईसाइयों में, यहूदियों में तुम्‍हें ऐसे बच्‍चे नहीं मिलेंगे जिन्‍हें अपने पूर्वजन्‍म की याद हो। किंतु हिंदू, बौद्ध, और जैन धर्मों में लगभग प्रत्‍येक दिन कहीं ने कहीं किसी बच्‍चे को अपने पूर्व जन्‍मों की याद आती है। लोगों ने यह समझने का प्रयत्‍न किया है कह उसकी स्‍मृति में कोई तथ्‍य होता है या यह मात्र कल्‍पना होती है। और ऐसे बहुत से मामले मिले है जिनमे तथ्‍य इसका स्‍पष्‍ट रूप से समर्थन करते है।</p>
<p>      भारत में तो ऐसा हर दिन होता रहता है—एक स्‍थान में, दूसरे स्‍थान में, किसी ने किसी बच्‍चे को इसकी स्‍मृति होती है। और हिंदू, जैन और बौद्ध धर्म कोई भी इसकी जांच-पड़ताल नहीं करता। क्‍योंकि वे इस बात से भयभीत होते है कि उनका सिद्धांत गलत न सिद्ध हो जाये। मगर तुम किसी ईसाई देश में, यहूदी समुदाय में, किसी इस्‍लामिक भूमि में ऐसा नहीं कर सकते, क्‍योंकि उन्‍होंने इस बात को स्‍वीकार कर लिया है कि इस तरह की चीज पूर्ण रूप से असत्‍य है।</p>
<p>      जहां तक मेरा संबंध है, पुनर्जन्‍म एक सच्‍चाई है। यह मेरा अपना अनुभव है। किंतु जो मेरे लिए सत्‍य है, तुम्‍हारे लिए वह सिद्धांत हो जाता है। और मैं अपने सत्‍य को तुम्‍हारा सिद्धांत नहीं बनाना चाहता। इसीलिए मैंने कहा: ‘’मेरा सिद्धांतों में, विश्‍वासों से कुछ लेना-देना नहीं है। सत्‍य मेरा व्‍यवसाय है।‘’</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>फ्रॉम पर्सनैलिटी टु इंडीवीजुअलटी</strong></p>
<p><strong>प्रश्न</strong>&#8211;आप पुनर्जन्‍म की बात करते है। मुझे तो इसका अनुभव नहीं है और जिसका मुझे अनुभव नहीं होता है, ऐसी किसी वस्‍तु में मैं विश्‍वास नहीं करना चाहता। मुझे क्‍या करना चाहिए?</p>
<p><strong>ओशो</strong>—पुनर्जन्‍म में विश्‍वास करने के लिए तुम्‍हें कौन कह रहा है? और तुम इसके बारे में कुछ करने के लिए चिंतित क्‍यों हो? लगता है तुम्‍हारे भीतर कहीं पडा हुआ विश्‍वास है। यदि तुम पुनर्जन्‍म में विश्‍वास नहीं करते हो तो वही पूर्ण विराम है। कुछ करने की चिंता क्‍यों करते हो?</p>
<p>      पुनर्जन्‍म में विश्‍वास मत करो, बस यह जन्‍म जीओं, और तुम्‍हें अनुभव होगा कि पुनर्जन्‍म कोई सिद्धांत नहीं; यह एक सच्‍चाई है। क्‍या तुम इस जन्‍म में  विश्‍वास करते हो। या नहीं करते? पुनर्जन्‍म या तो अतीत में है अथवा भविष्‍य में, किंतु तुम यहां हो, जीवित, तुममें जीवन का स्‍पंदन हो रहा है।</p>
<p>      मैं जानता हूं कि पूनर्जन्‍म सत्‍य है। किंतु मैं यह नहीं कह रहा हूं कि तुम इसमें इसलिए विश्‍वास करो क्‍योंकि मैं ऐसा कह रहा हूं। किसी दूसरे के अनुभव पर कभी विश्‍वास न करो। यह एक बाधा है। मैं तुम से केवल यही कह सकता हूं कि बस, इसी जन्‍म को ही जीते रहो। उससे द्वार खुलेगा और तुम पीछे की और देखने में समर्थ हो सकोगे, तुम इसमें इसमे विश्‍वास करो या न करो। फिर ये तुम्‍हारे उपर निर्भर है। तब तुम इस पर विश्‍वास कर सकते हो। या नहीं कर सकते। इसे एक अनुभव बन जाने दो।</p>
<p>      सभी धर्म विश्‍वास पद्धतियों पर ही आधारित होते है। में तुम्‍हें खोज करने की, संदेह करने की पूर्ण स्‍वतंत्रता देता हूं क्‍योंकि तुम्‍हारे अनुभव-अनुभव लेने का यही एकमात्र तरीका है। स्‍वयं अनुभव लो। विश्‍वास करने का कोई महत्‍व नहीं है।</p>
<p>      तुम मुझे प्रेम करते हो। स्‍वाभाविक ही, यदि मैं कहता हूं कि पुनर्जन्‍म होता है। वह एक सत्‍य है। तुम्‍हारे प्रेम के कारण तुम मुझ पर विश्‍वास करोगे। तुम कैसे कल्‍पना कर सकते हो कि मैं तुमसे कुछ झूठ बोलूगा। तुम मुझ पर भरोसा करते हो&#8230;.ओर इसी भरोसे का लाखों वर्षों से शोषण हो रहा है। प्रत्‍येक धर्म द्वारा इस प्रेम का शोषण हो रहा है। मैं किसी तरह से शोषण तो नहीं करने जा रहा हूं, जो कुछ भी मुझे ज्ञात है इसके बारे में मैं अपना ह्रदय तुम्‍हारे सामने खोल सकता हूं, किंतु याद रखो, विश्‍वास के जाल में न गिरना। प्रेम अच्‍छा  है, भरोसा अच्‍छा है—किंतु विश्‍वास जहर है।</p>
<p>      मैं चाहता हूं कि तुम जानने वाले बनो। यदि तुम मुझे प्रेम करते हो और मुझ पर भरोसा करते हो, तब तो जांच-पड़ताल करते रहो, खोज-ढूंढ करते रहो। जब तक तुम्‍हें निष्‍कर्ष नहीं मिल जाता। कभी विश्‍वास न करना। मैं यह इतना निश्चय पूर्वक कह सकता हूं क्‍योंकि में जानता हूं कि यदि तुम जांच पड़ताल करोगे तो तुम्‍हें यह मिल जाएगा। यह वही है। मेरे एक भी शब्‍द पर विश्‍वास न किया जाए। किंतु अनुभव किया जाए। मैं तुम्‍हें इसका अनुभव लेने की विधि दे रहा हूं, अधिक ध्‍यानस्‍थ हो जाओ। पुनर्जन्म और परमात्‍मा, स्‍वर्ग-नरक से कोई अंतर नहीं पड़ता। जिससे अंतर पड़ता है, वह तुम्‍हारा सजग हो जाना है। ध्‍यान से तुम जाग्रत हो जाते हो। तुम्‍हें आंखे मिल जाती है। तब तो तुम जो कुछ भी देखते हो, तुम अस्‍वीकार नहीं कर सकते।</p>
<p>      जहां तक मेरा संबंध है, पुनर्जन्‍म एक सत्‍य है। क्‍योंकि आस्‍तित्‍व में कुछ भी मरता नहीं। चिकित्‍सक भी कहेंगे कि कुछ भी मरता नहीं है। तुम हिरोशिमा और नागासाकी को नष्‍ट कर सकते हो। विज्ञान ने चिंपाजी राजनीतिज्ञों को इतनी शक्‍ति दे दी है—किंतु तुम पानी की एक बूंद भी नष्‍ट नहीं कर सकते।</p>
<p>      तुम नष्‍ट नहीं कर सकते हो। चिकित्‍सक लोग इस असंभावना के प्रति सावधान हो गये है। तुम जो कुछ भी करते हो। केवल रूप परिवर्तित हो जाता है। तुम ओस की एक बूंद मिटा नहीं सकते। और वहां हाइड्रोजन व आक्‍सीजन है; वे इसके घटक है। तुम हाइड्रोजन व आक्‍सीजन को नष्‍ट नी कर सकते हो। यदि तुम प्रयत्‍न भी करते हो, तो तुम अणुओं से परमाणु तक आ जाते हो। यदि तुम परमाणु को नष्‍ट करते हो, तो तुम इलेक्ट्रॉन के पास आ जाते हो। हम अभी तक तो नहीं जानते कि हम इलेक्ट्रॉन को भी नष्‍ट कर सकते है। या तो तुम इसे नष्‍ट कर सकते &#8230;यह वास्‍तविकता का चरम वस्‍तुपरक घटक है। या यदि तुम इसे नष्‍ट कर सकते हो, तब तो तुम्‍हें कुछ और मिल जायेगा। किंतु इस वस्‍तुपरक जगत में कुछ भी नष्‍ट नहीं हो सकता।</p>
<p>      यही जीवन चेतना के, जीवन के जगत के बारे में सत्‍य है। वहां कोई मृत्‍यु नहीं है। मृत्‍यु  तो एक आकार से दूसरे आकार में एक परिवर्तन मात्र है। और अंतत: आकार एक प्रकार की कारा है। जब तक तुम आकारहीन नहीं हो जाते, तब तक तुम दुःख, ईर्ष्‍या, क्रोध, धृणा, लोभ, भय से मुक्‍त नहीं हो सकते। क्‍योंकि ये तुम्‍हारे आकार से संबंधित है। जब तुम आकार हीन हो जाते हो तब हानि पहुंचाने के लिए तुम्‍हारे पास कुछ नहीं होता। और अब खोने के लिए कुछ भी नहीं है तुम्‍हारे पास। ऐसा कुछ भी नहीं होता जो तुम्‍हारे पास बढ़ सके। तुम चरम अनुभूति तक पहूंच जाते हो। वहां कुछ भी नहीं है, मात्र एक होना है।</p>
<p>      अस्‍तित्‍व प्रत्‍येक स्‍तर पर जीवित होता है। कुछ भी मृत नहीं है। एक पत्‍थर भी&#8230;जिसे तुम पूर्ण रूप से मृत समझते हो। वह मृत नहीं है। तुम देख नहीं सकते, किंतु वे सब सजीव होते है। इलैक्ट्रा तुम्‍हारी तरह ही सजीव होते है। संपूर्ण अस्‍तित्‍व जीवन का ही पर्याय होता है। वस्‍तुएं एक आकार से दूसरे आकार में तब तक परिवर्तित होती रहती है जब तक वे पर्याप्‍त रूप से परिपक्‍व नहीं हो जाती। जिससे उन्‍हें पुन: स्‍कूल जाने की आवश्‍यकता नहीं होती। तब वे आकारहीन जीवन की और चलती है; तब वे स्‍वयं महासागर में एकाकार हो जाती है।</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>फ्रॉम पर्सनैलिटी टू इंडीवीजुअलटी</p>
<p>पिछले जन्‍मों का क्‍या महत्‍व होता है, उसकी क्‍या उपयोगिता है?</p>
<p>क्‍या उन्‍हें याद करना लाभ दायी होगा?</strong></p>
<p><strong>ओशो—</strong>इस जन्‍म का भी तो कोई महत्‍व नहीं है; और वे बीते हुए जन्‍म भी एक ही चीज की बार-बार पुनरावृति के आलावा और कुछ नहीं था। उनका क्‍या महत्‍व हो सकता है। इस जीवन के स्‍वप्‍न को देख लो, तो तुमने वे सारे स्‍वप्‍न देख लिए जिन्‍हें तुमने पहले जीया है। स्‍वप्‍नों का कोई महत्‍व नहीं होता।</p>
<p>      पाश्‍चात्‍य मनोविश्‍लेषण का बड़ा आग्रह है कि स्‍वप्‍नों का महत्‍व होता है। पूरब के देशों में, हम कहते है कि स्‍वप्‍नों को कोई महत्‍व नहीं होता। केवल स्‍वप्‍न द्रष्‍टा महत्‍वपूर्ण है। स्‍वप्‍न विषय है, उन्‍हें देखने वाला तुम्‍हारी आत्म परकता है। स्‍वप्‍न परिवर्तित होते रहे है। स्‍वप्‍न द्रष्‍टा वहीं रहता है। विज्ञान परिवर्तित होता रहता है। किंतु दृष्‍टा वहीं रहता है। दृष्‍टा का महत्‍व है। यही पर पाश्‍चात्‍य मनोविज्ञान और पूर्वीय मनोविज्ञान में भेद। पूरब के रहस्‍यवादी के लिए वे सारे खोल जो मनोविश्‍लेषण, उनकी शाखाएं वे उनके संस्‍थापक खेलते है, मात्र पहेली है। मनोविश्‍लेषण एक सुंदर खेल है। तुम खेलते रह सकते हो, मगर तुम पूर्ण रूप से वही रहते हो।</p>
<p>      वास्‍तविक चीज तो परिवर्तन है, चेतना को स्‍वप्‍न से हटा कर स्‍वप्‍न द्रष्‍टा में ले जाना है। पूरे गेस्‍टाल्‍ट का परिवर्तन—वस्‍तु की और नहीं देखना बल्‍कि देखने वाले को देखना है। तब फिर सब कुछ सपना हो जाता है।</p>
<p>      पुनर्जन्‍म, जन्‍म, और मृत्‍यु, अच्‍छा और बुरा। तुम सम्राट हो या भिखारी, तुम हत्‍यारे हो या महात्‍मा—सब कुछ सपना है।</p>
<p>      लेकिन एक बात तय है कि सपने के लिए साक्षी की जरूरत नहीं है। साक्षित्‍व सत्‍य है। उस साक्षित्‍व को जान लेना अपने बुद्ध स्‍वभाव को जान लेना है</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>टेक इट ईजी </strong>   </p>
<br />Filed under: <a href='http://oshosatsang.org/category/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b6%e0%a4%a8-%e0%a4%9a%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9a%e0%a4%be/'>प्रशन चर्चा</a> Tagged: <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/'>ओशो</a>, <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6/'>स्‍वामी आनंद प्रसाद</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/oshosatsang.wordpress.com/4329/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/oshosatsang.wordpress.com/4329/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/oshosatsang.wordpress.com/4329/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/oshosatsang.wordpress.com/4329/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/oshosatsang.wordpress.com/4329/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/oshosatsang.wordpress.com/4329/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/oshosatsang.wordpress.com/4329/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/oshosatsang.wordpress.com/4329/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/oshosatsang.wordpress.com/4329/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/oshosatsang.wordpress.com/4329/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/oshosatsang.wordpress.com/4329/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/oshosatsang.wordpress.com/4329/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/oshosatsang.wordpress.com/4329/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/oshosatsang.wordpress.com/4329/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4329&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://oshosatsang.org/2012/01/28/%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a4-%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>2</slash:comments>
		<georss:point>28.621671 77.162177</georss:point>
		<geo:lat>28.621671</geo:lat>
		<geo:long>77.162177</geo:long>
		<media:content url="http://1.gravatar.com/avatar/18ba8ff7182a19f3392c7e668fd1934c?s=96&#38;d=identicon&#38;r=G" medium="image">
			<media:title type="html">anandprashad</media:title>
		</media:content>
	</item>
		<item>
		<title>धर्म के नाम पर इतना गोरख धंधा क्‍यों? ( ओशो)</title>
		<link>http://oshosatsang.org/2012/01/28/%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%87%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%97%e0%a5%8b%e0%a4%b0%e0%a4%96-%e0%a4%a7%e0%a4%82/</link>
		<comments>http://oshosatsang.org/2012/01/28/%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%87%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%97%e0%a5%8b%e0%a4%b0%e0%a4%96-%e0%a4%a7%e0%a4%82/#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 28 Jan 2012 05:51:39 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[प्रशन चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://oshosatsang.org/?p=4325</guid>
		<description><![CDATA[धर्मों के कारण ही। धर्मों का विवाद इतना है, धर्मों की एक दूसरे के साथ इतनी छीना-झपटी है। धर्मों का एक दूसरे के प्रति विद्वेष इतना है कि धर्म-धर्म ही नहीं रहे। उन पर श्रद्धा सिर्फ वे ही कर सकते &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/01/28/%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%87%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%97%e0%a5%8b%e0%a4%b0%e0%a4%96-%e0%a4%a7%e0%a4%82/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4325&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>धर्मों के कारण ही। धर्मों का विवाद इतना है, धर्मों की एक दूसरे के साथ इतनी छीना-झपटी है। धर्मों का एक दूसरे के प्रति विद्वेष इतना है कि धर्म-धर्म ही नहीं रहे। उन पर श्रद्धा सिर्फ वे ही कर सकते है जिनमें बुद्धि नाममात्र को नहीं है। अस सिर्फ मूढ़ ही पाए जाते है मंदिरों में, मसजिदों में। जिसमें थोड़ा भी सोच विचार है, वहां से कभी का विदा <div id="attachment_4326" class="wp-caption alignright" style="width: 206px"><a href="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/01/scan0033.jpg"><img src="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/01/scan0033.jpg?w=196&#038;h=300" alt="धर्म के नाम पर गोरख धंधा--ओशो" title="ओशो तिर्थि--1995" width="196" height="300" class="size-medium wp-image-4326" /></a><p class="wp-caption-text">धर्म के नाम पर गोरख धंधा--ओशो</p></div>हो चुका है। क्‍योंकि जिसमें थोड़ा-सोचविचार है, उसे दिखाई पड़ेगा कि धर्म ने नाम से जो चल रहा है वह धर्म नहीं, राजनीति है। कुछ और है।<span id="more-4325"></span></p>
<p>      जीसस चले जब जमीन पर तो धर्म चला; पोप जब चलते है तो धर्म नहीं चलता, कुछ और चलता है। बुद्ध जब चले तो धर्म चला; अब पंडित है, पुजारी है, पुरोहित है, वे चलते है। उनके चलने में वह प्रसाद नहीं। उनकी वाणी में अनुभव की गंध नहीं। उनके व्‍यक्‍तित्‍व में वह कमल नहीं खिला जो प्रतीक है धर्म का उनके ह्रदय बंद है और उतनी ही कालिख से भरे है जितने किसी और के शायद थोड़े ज्‍यादा ही।</p>
<p>      धर्म के नाम पर वैमनस्‍य है, ईप्सा है, हिंसा है। खून ख़राबा है। मस्‍जिद और मंदिर ने इतना लड़वाया है कि कोई भरोसा भी करना चाहे तो कैसे करे। और शास्‍त्र आज नहीं कल झूठे हो जाते है। सत्‍य तो शास्‍ता है, शास्‍त्रों में नहीं। सत्‍य तो बुद्ध है। धम्म पद में नहीं; मोहम्‍मद में है, कुरान में नहीं। यद्यपि कुरान मोहम्‍मद से पैदा हुई है। तो जब तक कुरान मोहम्‍मद के होंठों पर थी, तब तक उसमें मोहम्‍मद की श्‍वास थी। मोहम्‍मद की प्राण उर्जा थी। प्रतिफलित होती थी। जैसे ही शब्‍द मोहम्‍मद के होठो से हटे, मुर्दा हो गये। स्‍त्रोत से टूटे, कुछ के कुछ हो गये। फिर तुम्‍हारे हाथ में पड़े, तुमने उन्‍हें वह अर्थ दिया जो तुम दे सकते हो। तुम वह अर्थ तो कैसे दोगे जो मोहम्‍मद देना चाहते थे। मोहम्‍मद हुए बिना वह अर्थ नहीं दिया जा सकता। वह अर्थ मोहम्‍मद के होने में है। तुमने अपने अर्थ दिए। तुम्‍हारे अर्थ किसी प्रयोजन के नहीं। लाभ तो नहीं हो सकता, हानि सुनिश्चत होगी।</p>
<p>      अनातोले फ्रांस का प्रसिद्ध वचन है कि कोई बंदर अगर दर्पण में झांकेगा तो बंदर ही नजर आयेगा।</p>
<p>      दर्पण में वही दिखाई पड़ता है, जो तुम हो। शास्त्रों में भी वहीं दिखाई पड़ता है जो तुम हो। जिसके हाथ ते शास्‍त्र पडा उसका ही हो गया। मोहम्‍मद के हाथ में जब तक था, तब तक कुरान थी; तुम्‍हारे हाथ में जब तक आया कुछ का कुछ हो गया। और फिर तुम्‍हारे हाथ से भी चलती रही, हजारों साल बीत गये, एक हाथ से दूसरे हाथ में बदलते हुए। किताबें गंदी हो गई है। तुम्‍हारे हाथ की मैल उन पर जम गई है। कौन उन्‍हें झाड़े और साफ करे। वही तुम्‍हारा सबसे बड़ा दुश्मन।</p>
<p>      ध्‍यान रहे, इस जगत में प्रत्‍येक चीज का जन्‍म होता है और प्रत्‍येक चीज की मृत्‍यु होती है। धर्म तो शाश्‍वत है। लेकिन कौन सा धर्म? वह धर्म जो जीवन को धारण किए है। वह शाश्‍वत है। लेकिन बुद्ध ने जब कहा, कहा शाश्‍वत को ही, लेकिन जब विचार में बांधा तो शाश्‍वत समय में उतरा। और समय के भीतर कोई भी चीज शाश्‍वत नहीं हो सकती। समय के भीतर तो पैदा हुई है, मरेगी। जन्‍मदिन होगा, मृत्‍यु दिन भी आयेगा। जब कोई सत्‍य शब्‍द में रूपायित होता है तो सबसे पहले लोग उसका विरोध करते है। क्‍यों? क्‍योंकि उनकी पुरानी मानी हुई किताबों के खिलाफ पड़ता है। खिलाफ न पड़े तो कम से कम भिन्‍न तो पड़ता है। लोग विरोध करते है।</p>
<p>      सत्‍य का पहला स्‍वागत विरोध से होता है—पत्‍थरों से, गलियों से। सत्‍य पहले विद्रोह की तरह मालूम होता है। खतरनाक मालूम होता है। बहुत सूलियां चढ़नी पड़ती है सत्‍य को, तब कहीं स्‍वीकार होता है। लेकिन वे सूलियां चढ़ने में ही समय बीत जाता है और सत्‍य जो संदेश लाया थ वह धूमिल हो चुका होता है। जब तक तुम सत्‍य को स्‍वीकार करते हो, तब तक वह सत्‍य ही नहीं रह जाता। इतनी देर लगा देते हो स्‍वीकार करने में; लड़ने-झगड़ने में, विवाद में इतना समय गंवा देते हो कि तब तक सत्‍य पर बहुत धूल जम जाती है। धूल जाती है तब तुम स्‍वीकार करते हो। क्‍योंकि तब सत्‍य तुम्‍हारे शास्‍त्र जैसा मालूम होने लगाता है। तुम्‍हारे शास्‍त्र पर भी धूल जमी है बहुत।</p>
<p>      जब समय की धूल जम जाती है शास्‍त्रों पर, तो वह परंपरा बन जाता है। जब शास्‍त्र सत्‍य को जन्माता नहीं। सत्‍य की कब्र बन जाता है। तब तुम स्‍वीकार करते हो—इसीलिए तुम स्‍वीकार करते हो। कब्रें-कब्रें सब एक जैसी होती है। क़ब्रों में तो सिर्फ नाम का ही फर्क होता है। जिंदा आदमियों में फर्क होता है। कब्र किस की है, पत्‍थर पर लिखा होता है। बस इतना ही फर्क होता है। और तो कोई फर्क नहीं होता। धम्म पद जब कब्र बन जाता है तो गीता की कब्र और कुरान की कब्र और वेद उपनिषद या बाइबल की कब्र में कुछ फर्क नहीं रह जाता है। तब तुम स्‍वागत करते हो। तुम पुराने का स्‍वागत करते हो।</p>
<p>      सत्‍य जब नया होता है तब सत्‍य होता है। जितना नया होता है उतना ही सत्‍य होता है। क्‍योंकि उतना ही ताजा-ताजा परमात्‍मा से आया होता है। जैसे गंगा गंगोत्री में जैसी स्‍वच्‍छ है, फिर वैसी काशी में थोड़ी ही होगी। हालांकि तुम काशी जाते हो पूजने। काशी तक तो बहुत गंदी हो चुकी, बहुत नदी नाले गीर चूके, बहुत अर्थ मिश्रित हो चूका, न जाने कितने मुर्दे बहाये जा चूके। काशी तक आते-आते तो गंगा अपवित्र हो गई। कितनी ही पवित्र रही हो गंगोत्री में। जैसे वर्षा होती है, तो जब तक पानी की बूंद न जमीन नहीं छुई, तब तक वह परम शुद्ध होती है; जैसे ही जमीन छुई, कीचड़ हो गई। कीचड़ के साथ एक हो गई।</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>अथातो भक्‍ति जिज्ञासा, भाग—1</strong></p>
<br />Filed under: <a href='http://oshosatsang.org/category/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b6%e0%a4%a8-%e0%a4%9a%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9a%e0%a4%be/'>प्रशन चर्चा</a> Tagged: <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/'>ओशो</a>, <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6/'>स्‍वामी आनंद प्रसाद</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/oshosatsang.wordpress.com/4325/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/oshosatsang.wordpress.com/4325/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/oshosatsang.wordpress.com/4325/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/oshosatsang.wordpress.com/4325/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/oshosatsang.wordpress.com/4325/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/oshosatsang.wordpress.com/4325/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/oshosatsang.wordpress.com/4325/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/oshosatsang.wordpress.com/4325/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/oshosatsang.wordpress.com/4325/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/oshosatsang.wordpress.com/4325/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/oshosatsang.wordpress.com/4325/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/oshosatsang.wordpress.com/4325/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/oshosatsang.wordpress.com/4325/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/oshosatsang.wordpress.com/4325/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4325&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://oshosatsang.org/2012/01/28/%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%87%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%97%e0%a5%8b%e0%a4%b0%e0%a4%96-%e0%a4%a7%e0%a4%82/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>5</slash:comments>
		<georss:point>28.621671 77.162177</georss:point>
		<geo:lat>28.621671</geo:lat>
		<geo:long>77.162177</geo:long>
		<media:content url="http://1.gravatar.com/avatar/18ba8ff7182a19f3392c7e668fd1934c?s=96&#38;d=identicon&#38;r=G" medium="image">
			<media:title type="html">anandprashad</media:title>
		</media:content>

		<media:content url="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/01/scan0033.jpg?w=196" medium="image">
			<media:title type="html">ओशो तिर्थि--1995</media:title>
		</media:content>
	</item>
		<item>
		<title>उमर ख्‍याम की रूबाइयां—ओशो की प्रिय पुस्‍तकें</title>
		<link>http://oshosatsang.org/2012/01/28/%e0%a4%89%e0%a4%ae%e0%a4%b0-%e0%a4%96%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%82-%e0%a4%93/</link>
		<comments>http://oshosatsang.org/2012/01/28/%e0%a4%89%e0%a4%ae%e0%a4%b0-%e0%a4%96%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%82-%e0%a4%93/#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 28 Jan 2012 00:53:01 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[ओशो की प्रिय पूस्‍तके--]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://oshosatsang.org/?p=4319</guid>
		<description><![CDATA[उमर ख्‍याम सुंदरी, शराबी, इश्‍क के बारे में लिखता है। उसे पढ़कर लगता है, यह आदमी बड़े से बड़ा सुखवादी होगा। उसकी कविता का सौंदर्य अद्वितीय है। लेकिन वह आदमी ब्रह्मचारी था। उसने कभी शादी नहीं की, उसका कभी किसी &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/01/28/%e0%a4%89%e0%a4%ae%e0%a4%b0-%e0%a4%96%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%82-%e0%a4%93/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4319&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>उमर ख्‍याम  सुंदरी, शराबी, इश्‍क के बारे में लिखता है। उसे पढ़कर लगता है, यह आदमी बड़े से बड़ा सुखवादी होगा। उसकी कविता का सौंदर्य अद्वितीय है। लेकिन वह आदमी ब्रह्मचारी था। उसने कभी शादी नहीं की, उसका कभी किसी से प्रेम नहीं हुआ। वह कवि भी नहीं था। गणितज्ञ था। वह सूफी था। जब वह सौंदर्य के संबंध में लिखता तो ऐसा लगता कि वह स्त्री के सौंदर्य के बारे में लिख रहा है। नहीं, वह परमात्‍मा के सौंदर्य का बखान कर रहा है।<span id="more-4319"></span></p>
<p>      &#8230;..पर्शियन भाषा में उसकी किताबों में चित्र बनाये हुए है और अल्‍लाह को साकी के रूप में चित्रित किया गया है—एक सुंदर स्‍त्री हाथ में सुराही लेकिर शराब ढाल रही है। सूफी शराब को प्रतीक की तरह इस्‍तेमाल करते है। जो इंसान अल्‍लाह से इश्‍क करता है उसे अल्‍लाह एक तरह की मस्‍ती देता है जो उसे बेहोश नहीं करती बल्‍कि होश में लाती है। एक मदहोशी जो उसे नींद से जगाती है।</p>
<p>      फिट्जरल्‍ड को इन प्रतीकों की कोई जानकारी नहीं थी। वह सीधा सरल पार्थिव कवि था। और वस्‍तुत: उमर ख्‍याम से बेहतर कवि था। जब उसने अनुवाद किया तो उसने यही समझा कि स्‍त्री यानी स्‍त्री, शराब यानी शराब। प्रेम यानी प्रेम। उसके लिए प्रतीक नहीं थे। फिट्जरल्‍ड ने अपनी गलतफहमी के द्वारा उमर ख्‍याम को विश्‍व विख्‍यात कर दिया। अगर तुम उमर ख्‍याम को समझने की कोशिश करोगे तो दोनों में इतना अंतर दिखाई देगा कि तुम हैरान होओगे कि फिट्जरल्‍ड ने उमर ख्‍याम के गणितिक मस्‍तिष्‍क से इतनी सुंदर कविता कैसे निर्मित की।</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>फ्रॉम मिज़री टू इनलाइटमेंट</strong></p>
<p><strong>किताब की झलक&#8211;</strong></p>
<p>     जागों मित्र, भरों प्‍याला, लो वह देखो प्राची की और</p>
<p>      राज अटारी पर चढ़ता रवि फेंक अरूण किरणों की डोर</p>
<p>      नभ के प्‍याले में दिन मणि को माणिक-सुधा ढालते देख</p>
<p>      कलियां अधर पुटों को खोले ललक रही आनंद-विभोर।</p>
<p>     पौ फटते ही मधुशाला में, गुंजा शब्‍द निराला एक,</p>
<p>      मधुशाला से हंस कर यों कहता था, मतवाला एक&#8211;</p>
<p>      स्‍वांग बहुत है रात रही पर थोड़ी, ढालों-ढालों शीध्र</p>
<p>      जीवन ढल जाने के पहिले ढालों मधु का प्‍याला एक।</p>
<p>      और कान में भनक पड़ी जब ऊधा मैं पीर कर दो चार</p>
<p>      कोई कहता था पुकार कर, ‘’मधुशाला का खोलों द्वार</p>
<p>      केवल चार घड़ी रहना है हम को, क्‍यों करते हो देर?</p>
<p>      एक बार के गये हुए न लौटेंगे न दूजी बार।</p>
<p>      लो फिर आई है वसंत ऋतु, हरी हुई फिर मन की आस</p>
<p>      व्‍यथित ह्रदय कहता है चल कर करें कही एकांत-निवास</p>
<p>      जहां लता-तरुणों के पत्‍ते हिलते ज्‍यों मूसा का हाथ</p>
<p>      और सुगंध सुमन-माला की उठती ज्‍यों ईसा की श्‍वास।</p>
<p>      देखो आज खिले है सुख के लाखों मधु-कलियों के गात&#8211;</p>
<p>      किंतु कहो तो कल इन में से कितने फेर खिलेंगे ताता,</p>
<p>      बूंद-बूंद टपका जाता हो, जीवन का मधु रस ख्याम,</p>
<p>      एक-एक कर झड़ते जा रहे पक-पक कर जीवन पात।</p>
<p>      कैकोवाद, कैखुसरो, दारा, रूस्तम और सिकंदर वीर&#8211;</p>
<p>      क्‍या जानें अब कहां छिपे वे बड़े-बड़े योद्धा रणधीर,</p>
<p>      किंतु आज भी विमल वारुण में जगती मणिक की ज्‍योति</p>
<p>      और चित को चंचल करता अब भी वन का स्‍निग्‍ध समीर</p>
<p>      अब भी, झुकी लदी गुच्‍छों से, अंगूरों की डाली देख&#8211;</p>
<p>      फूली, छकी, ओस की धोई नव गुलाब की प्‍याली देख</p>
<p>      भूली, अमी-अधखिली कलियों की चितवन की लाली देख</p>
<p>      पीओ-पीओ कहती फिरती है बुलबुल मतवाली देख।</p>
<p>      ला, ला, साकी। और-और ला; फिर प्‍याले पर प्‍याला ढाल,</p>
<p>      घर रख, गूढ-ज्ञान गाथा को, व्रत-विवेक चूल्हे में डाल।</p>
<p>      सिखला रहा ‘’त्‍याग’’ की पट्टी—कैसा ज्ञानी है तू मित्र।</p>
<p>      नहीं सूझता क्‍या तुझको वह यौवन यह मधु, यह मधुकाल?</p>
<p>      यों तो मैं भी नित्‍य सोचता हूं अब खाऊंगा सौगंध—</p>
<p>      इस प्‍याले का मोह तजूंगा, पानी कर दूँगा अब बंद।</p>
<p>      किंतु आज तो प्रकृति-प्रिया है आई सज फूलों का साज</p>
<p>      आज वसंतोत्‍सव है प्रियतम, आज न पीऊँ तो सौगंध।</p>
<p>      आज वसंतोत्‍सव है प्रियतम फूलों में फूटा रसराज</p>
<p>      मन की कसर निकालूंगा सब, तज कर लोक-लीक की लाज&#8211;</p>
<p>      पहिला प्‍याला पी, कर दूँगा बांझ बुद्धि बुढ़ियाँ का त्‍याग</p>
<p>      चढ़ा दूसरा, वरण करूंगा, वरूण नन्‍दिनी को फिर आज।</p>
<p>      कोई स्‍वर्ग लोक से सुख को कहता है अतोल, अनमोल,</p>
<p>      कोई राजपाट के ऊपर करता है मन डांवाडोल,</p>
<p>      गांठ बाँध ले मूर्ख नकद ने नौ, तेरह उधर के छोड़&#8211;</p>
<p>      यों तो लगते है, सुहावनें सब को सदा देर के ढोल।</p>
<p>      गांठ-बाँध लें मूर्ख नकद के, फिर की आशा पर मल भूल,</p>
<p>      सुन तो सही कह रहा है क्‍या हंस-हंस कर गुलाब का फूल&#8211;     </p>
<p>      जो सु-वर्ण लाता हूं जग में चलने से पहिले ही, मित्र।</p>
<p>      उपवन में बिखेर जाता हूं, रत्‍ती-रत्‍ती झाड़ दुकूल।</p>
<p>      हाँ, मिट्टी में मिल जाती है आशा सभी हमारी, तात।</p>
<p>      कभी खिली भी तो बस जैसे दो दिन की उँजियारी रात।</p>
<p>      हीरा-मोती लाल, धरा-धन-धाम-संपदा जितनी, हाय।</p>
<p>      क्षणिक मरुस्थल के तुषार सी उड़ जाती है सारी तात।</p>
<p>      और, मरुस्थल यह जीवन है, लेना सतर्कता से काम,</p>
<p>      काल-क़जाक़ प्राण हरने की घात लगाता आठों याम।</p>
<p>      सूख का प्‍यासा मृग-अबोध-मन, रखना इसको खूब संभाल</p>
<p>      स्‍वर्ग-नरक की मृग-तृष्‍णा में बहक न कही जाए ख्याम।</p>
<p><strong>ओशो का नजरिया&#8211;</strong></p>
<p>      उमर ख्‍याम, महान पर्शियन कवि था। उसने अपनी रूबाइयात में लिखा है&#8230;..रूबाइयात याने जैसे—जैसे में हाइकु होते है वैसे सूफियों में रूबाइयात होते है। एक रुबाई में वह कहता है:</p>
<p>      गुनाह क्‍या न किए, क्‍या खुदा रही न था,</p>
<p>      फिट्जरल्‍ड ने इसका अंग्रेजी में अनुवाद कर उसे विश्‍व विख्‍यात कर दिया।</p>
<p><strong>ओशो</strong></p>
<p>      मैं ‘’रूबाइयात’’ को भूल गया। मेरी आँख में आंसू आ रहे है। मैं और कुछ भी भूल जाऊं तो माफी मांग सकता हूं, लेकिन ‘’रूबाइयात’’ के विषय में नहीं। उस के विषय में मैं केवल आंसू बहा सकता हूं। आंसुओं के द्वारा क्षमा मांग सकता हूं। शब्‍द काफी नहीं होंगे। ‘’रूबाइयात’’ ऐसी किताब है जो संसार में सबसे अधिक पढ़ी गई। और सबसे कम समझी गई। उसका अनुवाद समझा गया है लेकिन उसकी आत्‍मा बिलकुल नहीं समझी गई। अनुवादक अपने शब्‍दों में आत्‍मा को नहीं उड़ेल सकता। ‘रूबाइयात’’ प्रतीकात्‍मक है, और अनुवादक सीधा-सादा अंग्रेज था—अमेरिका में उसे ‘’स्कवेअर’’ कहेंगे; कोई गोलाई नहीं। ‘’रूबाइयात’’ को समझने के लिए तुममें थोड़ी गोलाई चाहिए।</p>
<p>      ‘’रूबाइयात’’ सिर्फ मदिरा और महिषाक्षी के बारे में बातें करती है। और कुछ नहीं। बस शराब और सुंदरियों के गीत गाता रहता है। उसके अनुसार जो कि अनेक अनुवादक, जो कि अनेक है, सभी गलत है। ऐसा होना ही था क्‍योंकि उमर ख्‍याम सूफी था। तसव्वुफ़ का आदमी था—जो जानता है। सूफी अल्‍लाह को इसी तरह बुलाते है। महबूब&#8230;.ओ मेरे महबूब&#8230;.ओर वे अल्‍लाह के लिए स्त्रीलिंग वाचक शब्‍दों का उपयोग करते है। विश्‍व में और किसी ने, मनुष्‍य जाति और चेतना के पूरे इतिहास में, परमात्‍मा को स्‍त्री  की तरह संबोधित नहीं किया है। सिर्फ सूफी ही परमात्‍मा को महबूब कहते है।</p>
<p>      और शराब वह है जो आशिक माशूका के बीच घटती है, उसका अंगूरों से कोई लेना देना नहीं है। प्रेमी और प्रेमिका के बीच, शिष्‍य और गुरु के बीच, भक्‍त और भगवान के बीच जो रसायन, जो अल्‍केमी घटती है, जो रूपांतरण होता है। वह शराब है। ‘’रूबाइयात’’ को इतना गलत समझा गया है&#8230;.शायद इसीलिए मैं उसे भूल गया।</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>बुक्‍स आई हैव लव्‍ड </strong></p>
<br />Filed under: <a href='http://oshosatsang.org/category/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%af-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%a4%e0%a4%95%e0%a5%87/'>ओशो की प्रिय पूस्‍तके--</a> Tagged: <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/'>ओशो</a>, <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6/'>स्‍वामी आनंद प्रसाद</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/oshosatsang.wordpress.com/4319/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/oshosatsang.wordpress.com/4319/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/oshosatsang.wordpress.com/4319/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/oshosatsang.wordpress.com/4319/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/oshosatsang.wordpress.com/4319/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/oshosatsang.wordpress.com/4319/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/oshosatsang.wordpress.com/4319/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/oshosatsang.wordpress.com/4319/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/oshosatsang.wordpress.com/4319/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/oshosatsang.wordpress.com/4319/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/oshosatsang.wordpress.com/4319/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/oshosatsang.wordpress.com/4319/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/oshosatsang.wordpress.com/4319/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/oshosatsang.wordpress.com/4319/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4319&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://oshosatsang.org/2012/01/28/%e0%a4%89%e0%a4%ae%e0%a4%b0-%e0%a4%96%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%82-%e0%a4%93/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>2</slash:comments>
		<georss:point>28.621671 77.162177</georss:point>
		<geo:lat>28.621671</geo:lat>
		<geo:long>77.162177</geo:long>
		<media:content url="http://1.gravatar.com/avatar/18ba8ff7182a19f3392c7e668fd1934c?s=96&#38;d=identicon&#38;r=G" medium="image">
			<media:title type="html">anandprashad</media:title>
		</media:content>
	</item>
		<item>
		<title>लिसन-लिटल मैन—ओशो की प्रिय पुस्‍तकें</title>
		<link>http://oshosatsang.org/2012/01/26/%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a4%a8-%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%9f%e0%a4%b2-%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%a8-%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf/</link>
		<comments>http://oshosatsang.org/2012/01/26/%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a4%a8-%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%9f%e0%a4%b2-%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%a8-%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf/#comments</comments>
		<pubDate>Thu, 26 Jan 2012 15:10:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[ओशो की प्रिय पूस्‍तके--]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://oshosatsang.org/?p=4316</guid>
		<description><![CDATA[ऑर्गोन इंस्टिट्यूट की आर्काइव्‍ज का एक दस्तावेज ‘’लिसन लिटल मैन’’ एक मानवीय पुस्‍तक है, वैज्ञानिक नहीं। यह ऑर्गोन इंस्टिट्यूट के आर्काइव्‍ज के लिए 1945 की गर्मी में लिखी गई थी। इसे प्रकाशित करने का कोई इरादा नहीं था। यह एक &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/01/26/%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a4%a8-%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%9f%e0%a4%b2-%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%a8-%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4316&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>ऑर्गोन इंस्टिट्यूट की आर्काइव्‍ज का एक दस्तावेज ‘’लिसन लिटल मैन’’ एक मानवीय पुस्‍तक है, वैज्ञानिक नहीं। यह ऑर्गोन इंस्टिट्यूट के आर्काइव्‍ज के लिए 1945 की गर्मी में लिखी गई थी। इसे प्रकाशित करने का कोई इरादा नहीं था। यह एक (Natural scientist) प्राकृतिक वैज्ञानिक और चिकित्‍सक के अंतर्द्वंद्व और आंतरिक आंधी तूफ़ानों का परिमाण है। इस वैज्ञानिक ने बरसों तक पहले भोलेपन से, फिर आश्‍चर्य से और अंतत: भय से देखा है कि सड़क पर जानेवाला छोटा आदमी अपने साथ क्‍या करता है। कैसे वह दुःख झेलता है। और विद्रोह करता है; कैसे वह अपनी दुश्‍मनों को सम्‍मान करकता है और दोस्‍तों की हत्‍या करता है। कैसे जब भी उसे लोक प्रतिनिधि बनने की ताकत मिलती है वह इस ताकत का गलत उपयोग कर उससे क्रूरता ही पैदा करता है। इससे पहले उच्‍च वर्ग के पर पीड़कों ने उसके साथ जो किया है। उससे यह क्रूरता अधिक भंयकर होती है।<span id="more-4316"></span></p>
<p>      ‘’लिटल मैन’’ के साथ यह बातचीत अपने बारे में फैलायी गई अफ़वाहों और बदनामी के लिए दिया गया विलहेम रेक का खामोश जवाब था। वर्षों से, ‘’भावनात्‍मक प्‍लेग’’ ने ऑर्गोन रिसर्च को कुचल डाने का प्रयास किया है—उसे गलत सिद्ध करके नहीं, उसकी बदनाम करके। दुर्भाग्‍य से वह लेखक को ही मारने में सफल हुआ। लेकिन लेखक का काम अभी भी स्‍थापित वैज्ञानिकों और सामाजिक संस्थानों को चुनौती दे रहा है। ऑर्गोन रिसर्च पर मानव जीवन और स्‍वास्‍थ्‍य की बहुत बड़ी जिम्‍मेदारी है। इसे ध्‍यान से रखते हुए इस ऐतिहासिक वार्तालाप को प्रकाशित किया गया है।</p>
<p>      सन 1947 में इस दस्‍तावेज को प्रकाशित करने का निर्णय लिया गया। उससे पहले किसी को यह ख्‍याल भी नहीं था कि कोई सरकारी एजेंसी राजनैतिक और मनोविश्‍लेषकों के साथ सांठ-गांठ करके ऑर्गोन रिसर्च पर जबर्दस्‍त आक्रमण करेगी।</p>
<p>      इस भाषण का यह मतलब है कि कोई इसे अपने जीने का ढंग बनाये। किसी भी रचनात्‍मक, प्रसन्‍न व्‍यक्‍ति के जीवन में जो आंधी-तूफान आते है उनका यह वर्णन है। वह किसी को जीतना या स्‍वयं के साथ राज़ी करवाना  नहीं चाहता। इसमे अनुभव को उस तरह चित्रित करता है। जरूरी नहीं है कि पाठक इसे समझे। यह इसे पढ़े या न पढ़े इसमे कोई उदेश्‍य या कार्यक्रम नहीं है। इसकी एक ही इच्‍छा है कि खोजी या विचारक को प्रतिक्रिया करने का वही हक मिले जो कवि या दार्शनिक को मिलता है। यह निषेध है। भावनात्‍मक प्‍लेग है, गुप्‍त और अंजान इरादों के खिलाफ यह प्‍लेग मेहनती अन्‍वेषकों की और विषैले तीर फेंकता है। सुरक्षित स्‍थानों में छुपकर। भावनात्‍मक प्‍लेग क्‍या है। कैसे काम करता है। और  प्रगति को रोकता है। यह दर्शाना इसका प्रयोजन है। मनुष्‍य की प्रकृति की गहराइयों में अपरिसीम खजानें है जिनकी खुदाई नहीं हुई है, उनमें  विश्‍वास जगाना है और उन्‍हें मनुष्‍य की आशाओं की सेवा में लगाना है।</p>
<p>      इस अद्भुत किताब की खोज मेरे लिए लगभग उतनी ही दूभर और रोमांचकारी थी जितनी कि स्‍वयं विलहेम रेक लिए उसकी अपनी खोज रही होगी। जब से इस किताब के बारे में ओशो का वक्‍तव्‍य पढ़ा, मैं इसे पाने के लिए बेचैन हो उठा। ओशो कहते है; ‘’मेरा हर संन्‍यासी इस किताब पर ध्‍यान करे।‘’ कैसे होगी यह किताब जिसे ओशो हमारे ध्‍यान के काबिल समझते है।</p>
<p>      ओशो का पढ़ने का अंदाज अद्वितीय है—उनके ही जैसा। हर किताब के पहले पृष्‍ठ पर उनके हस्‍ताक्षर, जिनकी स्‍याही का रंग और लिखने का ढंग उस किताब के आशय से मेल खाता है और अंतिम पृष्‍ठ पर हिंदी में तारीख जिसमे उनके हाथ यह किताब आई, और उस शहर का नाम जहां उन्‍हें ये किताब मिली। जैसे इस किताब में—बम्‍बई 25-2-1970</p>
<p>      किताब के पन्‍नों पर जो अंश उन्‍हें महत्‍वपूर्ण लगे उनकी पहली पंक्‍ति के पहले अक्षर के आगे लाल और नीले रंग से छोटे-छोटे बिंदू। कुछ शब्‍दों के नीचे लाल या नीले रंग की छोटी सी रेखा—सिर्फ पहले शब्‍द के नीचे। बाकी पूरा पन्‍ना बिलकुल साफ-सुथरा। क्‍या अर्थ होगा इन लाल-नीले बिंदुओं या रेखाओं का। अब कौन बता सकता है। सिवाय उनके।</p>
<p>      यह ‘’किताब की झलक’’ के अंतर्गत जो अंश प्रस्‍तुत किये है वे ओशो के लाल नीले सौभाग्‍य तिलकों के साथ आये है।</p>
<p><strong>किताब की एक झलक—</strong></p>
<p>      इस किताब के कुल 128 पृष्‍ठ है। इसे सर्वप्रथम सन 1947 में न्‍यूयार्क के नून डे प्रेस ने प्रकाशित किया था। इन तीस वर्षों में इसके पंद्रह संस्‍करण छप चूके है। विलहेम रेक के साथ दुनिया ने जो दुराचार, अत्‍याचार आरे अनाचार किया है उसकी प्रतिक्रिया है यह आक्रोश। हारकर, तिल मिलाकर वह अपनी बात लोगों तक पहुँचाता है। लिटल मैन अर्थात कॉमन मैन साधारण आदमी। जो दिखता तो बड़ा निरीह, असहाय है लेकिन तमाम असाधारण व्‍यक्‍तियों को कुचल डालने की विध्‍वंसक शक्‍ति रखता है। सदियों-सदियों से, सभी असाधारण आदमियों के साथ साधारण आदमी ने यही किया है। किसी को सूली दी, किसी को जहर दिया, किसी को जेल भिजवाया, किसी को बोटी-बोटी काट डाला।</p>
<p>      इस साधारण आदमी की ताकत क्‍या है? समूह की शक्‍ति, भीड़ की शक्‍ति। भीड़ जब एक इकाई की तरह व्‍यवहार करती है तो एटम बम से भी अधिक खतरनाक हो जाती है। अपने जीवन भर के अनुभव, हताशा और विषाद को विलहेम रेक व्यांगात्मक ढंग व्‍यक्‍ति करता है। अपनी भावनाओं को उसने इस तरह शब्‍दों में ढाला है जैसे वह एक-एक लिटल मैन के साथ बात कर रहा है। साधारण आदमी के दिशाहीन जीवन का ओछापन, टुच्‍चापन; उसका स्‍वार्थ और पाखंड, उसकी दोगली जीवन शैली, उसके अंधेरे में किरण बनकर उतरने वाले असाधारण व्‍यक्‍ति के साथ किया हुआ दुर्व्‍यवहार और क्रुरता&#8230;..हर छोटा-मोटी बात पर रेक करारी चोट करता है। यह चोट उसका तिरस्‍कार करने के लिए नहीं है। उसके पीछे निहित रेक की पीड़ा है। उसकी व्याकुलता साफ दिखाई देती है। वह छटपटाता है कि इस साधारण आदमी को उसकी कीचड़ से कैसे निकाला जाये।</p>
<p><strong>किताब की शुरूआत देखिए&#8211;</strong></p>
<p>      ‘’वे तुम्‍हें लिटल मैन कहते है या कॉमन मैन कहते है। वे कहते है तुम्‍हारे दिन आ गए है—साधारण आदमी का यूग।</p>
<p>      यह तुम नहीं कहते हो ‘’लिटल मैन’’ वे कहते है—महान राष्ट्रों के उपराष्‍ट्रपति मजदूर नेता, बूर्ज्‍वा के पश्‍चात्‍ताप करने वाले पुत्र, कूटनीतिज्ञ और दार्शनिक। वे तुम्‍हें भविष्‍य देते है, लेकिन अतीत के बारे में कोई सवाल नहीं पूछते।</p>
<p>      तुम्‍हारा अतीत भयंकर रहा है। तुम्‍हारी विरासत तुम्‍हारे हाथों में एक जलता हुआ हीरा है। तुमसे मैं यही कहना चाहता हूं।</p>
<p>      डॉक्‍टर हो या चमार, मजदूर या शिक्षक, उसे अपना काम कुशलता से करना हो और पैसे कमाने हों तो उसे अपनी कमज़ोरियों का पता चलना चाहिए। अब कुछ दशकों से पूरी दुनिया में तुम्‍हारा शासन चल रहा है। मनुष्‍य जाति का भविष्‍य तुम्‍हारे विचारों और कृत्‍यों पर निर्भर करेगा।</p>
<p>      लेकिन तुम्‍हारे शिक्षक और गुरु तुम्‍हें ठीक-ठाक नहीं बताते कि तुम कैसे सोचते हो या तुम वास्‍तव में क्‍या हो। किसी की भी, तुमसे एक सत्‍य कहने की हिम्‍मत नहीं होती जिससे तुम तुम्‍हारे भविष्‍य के अडिग मालिक बन जाओ। तुम सिर्फ एक अर्थ में स्‍वतंत्र हो: खुद की आलोचना सुनकर ही तुम अपने जीवन को नियंत्रित कर पाओगे।</p>
<p>      तुम महान आदमी से सिर्फ एक बात में अलग हो: महान आदमी भी कभी बहुत छोटा आदमी था। लेकिन उसने एक महत्‍वपूर्ण गुणवत्‍ता को विकसित किया उसने अपने विचारों और कृत्‍यों की संकीर्णता को पहचाना। किसी अर्थपूर्ण काम के दबाव के नीचे उसने यह देखना सीखा कि किस तरह उसका छोटापन, टुच्‍चापन, उसकी प्रसन्‍नता को बिगड़ता है। दूसरे शब्‍दों में महान आदमी जानता है कि कब और किस तरह वह छोटा आदमी है। छोटा आदमी नहीं जानता कि वह छोटा है और जानने से डरता भी है। वह ताकत और महानता की भ्रांति के पीछे अपनी क्षुद्रता और छोटापन को छिपाता है। वह अपने महान सेनाधिकारियों पर नाज करता है, खुद पर नहीं।</p>
<p>      मैं तुमसे घबड़ाता हूं लिटल मैन, बेहद घबड़ाता है। क्‍योंकि तुम पर मनुष्‍य जाति का भविष्‍य निर्भर करता है। मैं तुमसे घबड़ाता हूं। क्‍योंकि तुम इतना किसी चीज से नहीं भागते जितना कि स्‍वयं से।</p>
<p>      तुम रूग्‍ण हो, बहुत रूग्‍ण लिटल मैन। इसमें तुम्‍हारा दोष नहीं है। लेकिन इस रूग्‍णता को दूर करना तुम्‍हारा दायित्‍व है। अगर तुम दमन को स्‍वीकार नहीं करते तो तुम उत्‍पीड़कों को कभी के उठाकर फेंक देते। तुम उसे सिक्रय सहारा देते हो। अगर रोजमर्रा के व्‍यावहारिक जीवन में तुम्‍हारे पास थोड़ा भी आत्‍म सम्‍मान होता तो संसार की कोई पुलिस की ताकत तुम्‍हें दबा नहीं सकती थी। काश गहरे में तुम्‍हें पता होता है कि तुम्‍हारे बगैर जीवन एक घंटा भी नहीं चल सकता था। क्‍या तुम्‍हारे मुक्‍तिदाता ने तुम्‍हें यह बताया। नहीं उसने तुमसे कहा: ‘’प्रोलिटेरिएट ऑफ दि वर्ल्‍ड’’ लेकिन उसने तुमसे यह नी कहा कि तुम्‍हारे जीवन के लिए तुम, सिर्फ तुम ही जिम्‍मेदार हो तुम्‍हारी पितृभूमि के लिए नहीं हो।</p>
<p>      तुम जीवन के सूख की भीख मांगते हो। लेकिन तुम्‍हारे लिए सुरक्षा अधिक कीमती है भले ही उसके लिए तुम्‍हें अपनी रीढ़ की या अपने जीवन की कीमत चुकानी पड़े। चूंकि तुमने कभी भी सुख को पैदा करना, उसे भोगना, और उसकी रक्षा करना नहीं सीखा है। तुम निर्भीक व्‍यक्‍ति के साहस को नहीं जानते। लिटल मैन, क्‍या तुम जानना चाहते हो कि तुम कैसे हो। तुम टी. वी. पर हाज मोला, टूथपेस्ट और डियोडोरंट के विज्ञापन देखते हो। लेकिन उसके पीछे प्रचार को के संगीत को नहीं सुनते। इन चीजों की असीम मूढ़ता और घटियापन को तुम नहीं देखते जो कि तुम्‍हें फंसाने के लिए बनायी गई है। नाइट क्‍लब में अनाउंसर जो मजाक सुनाता है क्‍या उन्‍हें तुमने बनायी गई। नाइट क्लब में अनाउंसर जो मजाक सुनाता है क्‍या उन्‍हें तुमने कभी ध्‍यान से सुना है। मजाक जो तुम्‍हारे बारे में है, उसके खुद के बारे में है, तुम्‍हारे छोटे दुःखी संसार के बारे में है&#8230;.।</p>
<p>      तुम अपने बारे में मजाक सुनते हो और दिल खोलकर हंसते हो। तुम इसलिए नहीं हंसते कि तुम अपनी ही हंसी उड़ा रहे हो। तुम जो दूसरे पर, लिटल मैन पर हंसते हो लेकिन तुम्‍हें यह पता नहीं है कि तुम अपने पर ही हंस रहे हो। लाखों लिटल मैन्‍स को यह पता नहीं है। कि तुम्‍हारी हंसी उड़ायी जा रही है। सदियों-सदियों से, इतने खुलकर दुष्‍ट प्रसन्‍नता के साथ तुम्‍हारी हंसी क्‍यों उड़ायी जा रही है लिटल मैन। क्‍या कभी तुम्‍हारे ख्‍याल में आया कि सिनेमा में साधारण लोगों को इतना हास्‍यास्‍पद क्‍यों दिखाया जाता है। मैं तुम्‍हें बताता हूं, कि मैं तेह दिल से तुम्‍हारी कद्र करता हूं।</p>
<p>      अत्‍यंत संगत रूप ये यानि कि लगातार तुम्‍हारी सोच सत्‍य को चूक जाती है। ठीक वैसे ही जैसे कोई अनाड़ी तीरंदाज हमेशा अपने निशाने को चूक जाये। क्‍या तुम ऐसा नहीं सोचते। मैं तुम्‍हें दिखाता हूं। तुम कभी के अपने जीवन के मालिक बन चुके होते अगर तुम्‍हारी सोच सत्‍य की और उन्‍मुख होती। लेकिन तुम इस तरह सोचते हो&#8211;</p>
<p>      ‘’यह सब यहूदियों को दोष है।‘’</p>
<p>      ‘’यहूदी कौन है, मैं पूछता हूं।‘’</p>
<p>जिन लोगों में यहूदी खून है, तुम्‍हारा जवाब।</p>
<p>      यहूदी खून और दूसरे खून में क्‍या फर्क है।</p>
<p>      यह सवाल तुम्‍हें स्‍तब्‍ध कर दे है, तुम झिझकते हो, कन्फ्यूज हो जाते हो। लिटल मैन, तुम इस तरह बेहूदापन करते हो। तुम्‍हारे बेहूदेपन से तुम सशस्‍त्र सेनाएं बनाते हो और वे सेनाएं एक करोड़ यहूदियों की हत्‍या कर देती है। जब कि तुम इतना भी नहीं बता सकते कि यहूदी कौन है। इसीलिए हम तुम पर हंसते है। जब गहरा काम करना हो तो लोग तुमसे बचते है। इसीलिए तुम दलदल में फंसे हुए हो। जब तुम किसी को यहूदी कहते हो तो अपने आपको श्रेष्‍ठ समझते हो। यह जरूरी है क्‍योंकि भीतर तुम वस्‍तुत: दुःखी हो। और तुम इसलिए दुःखी हो क्‍योंकि तुम जिस कारण तथाकथित यहूदी को मारते हो, तुम वही हो। लिटल मैन, यह तुम्‍हारे संबंध में सत्‍य का एक छोटा सा अंश है।</p>
<p>      लिटल वू मन, यदि तुम्‍हारे अपने बच्‍चे नहीं है, इसलिए तुम शिक्षक के पेशे में चली आई हो, तो तुम बच्‍चों का अविवेकपूर्ण नुकसान कर रही हो। तुम्‍हें बच्‍चों की परवरिश करनी है। बच्‍चों की परवरिश करने की सही तरीका है, उनकी लैंगिक ऊर्जा का सही प्रशिक्षण। बच्‍चे की लैंगिकता को ठीक से समझने के लिए व्‍यक्‍ति को प्रेम का अनुभव होना चाहिए। लेकिन तुम एक टब की तरह बनी हो, तुम ,खुद झिझक से भरी हो और शरीर से कुरूप हो। यह अकेली वजह तुम्‍हें हर जीवित आकर्षक शरीर के प्रति घृणा से, कड़वाहट भर</p>
<p>के लिए काफी है। मैं तुम्‍हें टब जैसी बनावट के लिए दोषी नहीं ठहराता, या  प्रेम का अनुभव न करने के लिए और बच्‍चों में खिलते हुए प्रेम को न समझने के लिए भी कुछ नहीं कहता। लेकिन अपनी सारी कुरूपता को लेकर बच्‍चों के पास जाना और उनके भी के प्रेम का गला घोटना में बहुत बड़ा जुर्म मानता हूं। तुम उनके भी जन्‍मनें वाले स्‍वस्थ प्रेम का रूग्‍ण मानती हो, क्‍योंकि तुम स्‍वयं रूग्‍ण हो।</p>
<p>      और लिटल मैन तुम ऐसी मोटी कुरूप महिलाओं को अपने बच्‍चों को सौपकर अपने बच्‍चों की स्‍वस्‍थ आत्‍माओं में जहर और कड़वाहट घोलते हो। इसीलिए तुम ऐसे हो जैसे कि तुम हो।</p>
<p>        +                             +                               +                                +</p>
<p>            तुम मेरे पास दौड़ें चले आते हो और पूछते हो, प्‍यारे महान डॉक्‍टर, हम क्‍या करे। मैं क्‍या करू, मेरा पूरा भवन गिर गया है। दीवार की दरारों में से हवा गुजर रही है। मेरा बच्‍चा बीमार है और मेरी पत्‍नी का बुरा हाल है। मैं खुद बीमार हूं। क्‍या करू?</p>
<p>      अपने घर को ग्रेनाइट जैसी मजबूती पर बनाओ ग्रेनाइट से मेरा मतलब है तुम्‍हारा स्‍वभाव; जिसे तुम सता कर मटियामेट कर रहे हो। तुम्‍हारे बच्‍चे की काया में पनप रहा प्रेम के सपने सोलह साल की उमर में देखे तुम्‍हारे अपने सपने। तुम्‍हारे भ्रम को थोड़े से सत्‍य के साथ बदल लो। अपने राजनीतिज्ञों और कूटनीतिज्ञों को बाहर फेंक दो। अपनी किस्मत को अपने हाथ से लिखो और अपने जीवन को चट्टान पर खड़ा करो। अपने पड़ोसी को भूल जाओ और अपने भीतर झांको। इससे तुम्‍हारा पड़ोसी भी अनुगृहीत होगा। पूरे संसार में अपने साथियों से कह दो कि, अब तुम मृत्‍यु के लिए नहीं, जीवन के लिए काम करना चाहते हो। किसी की हत्‍या करने के लिए या निषेध करने के लिए जुलूस निकालने की बजाय मानव जीवन और उसके आशीषों की रक्षा करने के लिए कानून बनाओ। ऐसा कानून तुम्‍हारे घर की मजबूत बुनियाद का हिस्‍सा बनेगा।</p>
<p>       +                             +                               +                                +</p>
<p>      दिन भर के काम के बाद मैं अपने घर के आँगन में, हरी-हरी दूब पर अपनी प्रियतमा या अपने बेटे के साथ बैठता हूं। चारों और सांस लेती हुई प्रकृति के अहसास से भर जाता हूं तब मनुष्‍य जाति और उसके भविष्‍य के बारे में एक गीत मेरे जहर में उभरता है।</p>
<p>      और फिर मैं जीवन से अनुरोध करता हूं, कि वह अपने हक को पुन: प्राप्‍त कर ले और जो दुष्‍ट और भयभीत लोग युद्ध का ऐलान करते है उनका ह्रदय परिवर्तन कर दे। वे इसलिए संहार करते है क्‍योंकि वे जीवन से वंचित हुए है।</p>
<p>      मेरे बेटा मुझसे पूछता है: पिताजी सूरज विदा हो गया। कहां गया वह? क्‍या वह जल्‍दी लौट आयेगा? मैं उसे बांहों में भर कहता हूं, हां बेटा, सूरज फिर अपनी ममतामयी उष्‍मा को लेकर वापिस आ जायेगा।</p>
<p>      लिटल मैन, मैं अपनी अपील के अंत पर आ रहा हूं, मैं तो अंतहीन रूप से लिख सिकता था। लेकिन तुमने यदि मेरे शब्‍दों को ध्‍यान से और निश्‍छलता से पढ़ा है तो तुम तुम्‍हारे भीतर के छोटे आदमी को उन संदर्भों में भी पहचान लोगे जिनमें मैंने कहा नहीं है। तुम्‍हारे हर ओछे कृत्‍यों और विचारों के पीछे एक ही मानसिकता है।</p>
<p>      तुमने मेरे साथ जो भी व्‍यवहार किया है या करोगे, तुम मुझे जीनियस कहो या पागल कहार जेल में बंद कर दो। तुम्‍हारा मुक्‍तिदाता कहो या जासूस कहकर सताओ और फांसी दे दो। तुम्‍हारी पीड़ा तुम्‍हें देर अबेर यह देखने के लिए मजबूर करेगी कि मैने जीवंत ऊर्जा के नियम खोजें है और तुम्‍हारे जीवन की सुनियोजित करेन के लिए एक साधन तुम्‍हारे हाथ दिया है। तुम्‍हारे ऑर्गानिज्‍म़ के लिए मैं एक भरोसेमंद अभियंता इंजीनियर हूं। तुम्‍हारे नाती-पोते मेरे पद चिन्‍हों पर चलेंगे और मनुष्‍य स्‍वभाव के प्रज्ञावान अभियंता होंगे। मैंने तुम्‍हारे भीतर जीवंत ऊर्जा का, तुम्‍हारे वैश्‍विक सार-अंश का विराट लोक उद्घाटित किया है।</p>
<p>      यह मेरा बड़े से बड़ा पुरस्‍कार है।</p>
<p>      मैंने इस जगह में</p>
<p>      पवित्र शब्‍दों का ध्‍वज रोपित किया है।</p>
<p>      पाम वृक्ष के मुरझाने और चट्टान के चूर-चूर होने के अरसे बाद,</p>
<p>      चमकते हुए सम्राट</p>
<p>      सूखे पत्‍तों की धूल की तरह उड़ जायेंगे।</p>
<p>      लेकिन उसके बाद भी हजारों नौकाएं</p>
<p>      हर बाढ़ में मेरे शब्‍दों का वहन करेंगी</p>
<p>      वे गूँजते रहेंगे</p>
<p>      गूँजते रहेंगे।</p>
<p><strong>ओशो का नजरिया&#8211;</strong></p>
<p>      यह एक अजीब किताब है, उसे कोई नहीं पढ़ता। तुमने शायद उसका नाम भी नहीं सुना होगा। हालांकि यह अमेरिका में ही लिखी गई है। किताब है: ‘’लिसन, लिटल मैन’’ लेखक विलहम रेक। बड़ी छोटी सी किताब है। लेकिन वह ‘’सर्मन ऑन माउंट’’, ‘’ताओ तेह किंग’’, ‘’दस स्‍पेस जुरतुस्त्र’’, ‘’दि प्रॉफेट’’ इनकी याद दिलाती है। वस्‍तुत: रेक की यह हैसियत नहीं थी की वह इस तरह की किताब लिखे, लेकिन लगता है वह कसी अज्ञात आत्‍मा से आविष्‍ट हो गया&#8230;&#8230;..</p>
<p>      ‘’लिसन लिटल मैन’’ ने रेक के प्रति बहुत दुश्‍मनी पैदा की—खास कर व्‍यावसायिक मनस चिकित्‍सकों के बीच, जो कि उसके सहयोगी थे क्‍योंकि वह हर किसी को ‘’लिटल मैन’’ छोटा आदमी कहा रहा था। और वह क्‍या सोचता था, वह बहुत महान है। मैं तुमसे कहना चाहता हूं; वह था। बुद्ध के अर्थों में नहीं लेकिन सिगमंड फ्रायड, कार्ल गुस्‍ताव युंग, अस गोली &#8230;. वह उसी कोटि का था।</p>
<p>      वह महान आदमी था—आदमी ही था, महा मानव नहीं था, लेकिन बहुत बड़ा था। और यह उसके अहंकार से पैदा नहीं हुई। वह विवश था, उसे लिखना पडा। यह ऐसे ही है जैसे स्‍त्री गर्भवती हो तो उसे बच्‍चे को जन्‍म देना ही पड़ता है। इस छोटी सी किताब को यह वर्षो तक अपने भीतर सम्‍हाले रहा। उसे लिखने के ख्‍याल को दबाता रहा क्‍योंकि वह भलीभाँति जानता था। कि वह उसके लिए तूफान खड़ा करने वाला है। आरे वैसा ही हुआ।</p>
<p>      इस किताब के बाद सब तरफ से उसकी भर्त्‍सना हुई।</p>
<p>      इस संसार में किसी भी महान चीज का सर्जन करना महान अपराध है। आदमी जरा भी नहीं बदला है। सुकरात&#8230;उसने मार डाला। रेक&#8230;.उसने मार डाला। कोई परिर्वतन नहीं। उन्‍होंने रेक को पागल करार दे दिया और उसे जेल में डाल दिया। वह वैसा ही सज़ा भुगतते हुए, पागल खाने में पागल होने का लेबल माथे पर लगाकर जेल में ही मर गया।  बादलों के पार उठने की उसी क्षमता थी लेकिन उसे नहीं उठने दिया गया। सुकरात, जीसस, बुद्ध जैसे लोगों के साथ जीना अभी अमरीका को सीखना है।</p>
<p>      मैं चाहता हूं, मेरे सभी संन्‍यासी इस किताब पर ध्‍यान करें। मैं इस किताब का बेशर्त समर्थन करता हूं।</p>
<p>      <strong>ओशो</p>
<p>     बुक्‍स आय हैव लव्‍ड </strong> </p>
<br />Filed under: <a href='http://oshosatsang.org/category/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%af-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%a4%e0%a4%95%e0%a5%87/'>ओशो की प्रिय पूस्‍तके--</a> Tagged: <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/'>ओशो</a>, <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6/'>स्‍वामी आनंद प्रसाद</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/oshosatsang.wordpress.com/4316/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/oshosatsang.wordpress.com/4316/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/oshosatsang.wordpress.com/4316/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/oshosatsang.wordpress.com/4316/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/oshosatsang.wordpress.com/4316/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/oshosatsang.wordpress.com/4316/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/oshosatsang.wordpress.com/4316/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/oshosatsang.wordpress.com/4316/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/oshosatsang.wordpress.com/4316/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/oshosatsang.wordpress.com/4316/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/oshosatsang.wordpress.com/4316/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/oshosatsang.wordpress.com/4316/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/oshosatsang.wordpress.com/4316/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/oshosatsang.wordpress.com/4316/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4316&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://oshosatsang.org/2012/01/26/%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a4%a8-%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%9f%e0%a4%b2-%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%a8-%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>1</slash:comments>
		<georss:point>28.621671 77.162177</georss:point>
		<geo:lat>28.621671</geo:lat>
		<geo:long>77.162177</geo:long>
		<media:content url="http://1.gravatar.com/avatar/18ba8ff7182a19f3392c7e668fd1934c?s=96&#38;d=identicon&#38;r=G" medium="image">
			<media:title type="html">anandprashad</media:title>
		</media:content>
	</item>
		<item>
		<title>शिष्‍य का चौथ द्वार खोलना और गुरु कि महाकुंजी— ओशो</title>
		<link>http://oshosatsang.org/2012/01/25/%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%af-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9a%e0%a5%8c%e0%a4%a5-%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%96%e0%a5%8b%e0%a4%b2%e0%a4%a8%e0%a4%be/</link>
		<comments>http://oshosatsang.org/2012/01/25/%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%af-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9a%e0%a5%8c%e0%a4%a5-%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%96%e0%a5%8b%e0%a4%b2%e0%a4%a8%e0%a4%be/#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 25 Jan 2012 12:06:22 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[पतंजलि का योग सुत्र--]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://oshosatsang.org/?p=4312</guid>
		<description><![CDATA[प्रश्न&#8211;हम अपनी मूर्च्‍छित और अहंकारी अवस्‍था में, सदा गुरु के संपर्क में नहीं होते। लेकिन गुरु क्‍या सदा हमारे संपर्क में होता है? ओशो&#8211; तुम्‍हारी चेतना परत मात्र एक है चार परतों में। लेकिन यह तभी संभव है जब तुमने &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/01/25/%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%af-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9a%e0%a5%8c%e0%a4%a5-%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%96%e0%a5%8b%e0%a4%b2%e0%a4%a8%e0%a4%be/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4312&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>प्रश्न&#8211;हम अपनी मूर्च्‍छित और अहंकारी अवस्‍था में, सदा गुरु के संपर्क में नहीं होते। लेकिन गुरु क्‍या सदा हमारे संपर्क में होता है?</strong><div id="attachment_4313" class="wp-caption alignright" style="width: 226px"><a href="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/01/scan0238.jpg"><img src="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/01/scan0238.jpg?w=216&#038;h=300" alt="स्‍वामी आनंद प्रसाद" title="स्‍वामी आनंद प्रसाद" width="216" height="300" class="size-medium wp-image-4313" /></a><p class="wp-caption-text">स्‍वामी आनंद प्रसाद</p></div></p>
<p><strong>ओशो&#8211;   </strong> तुम्‍हारी चेतना परत मात्र एक है चार परतों में। लेकिन यह तभी संभव है जब तुमने समर्पण कर दिया हो और उसे अपने गुरु के रूप में स्‍वीकार कर लिया हो, उससे पहले यह संभव नहीं है। यदि तुम मात्र एक विद्यार्थी होते हो, सीख रहे होते हो, तब तुम संपर्क में होते हो तभी गुरु संपर्क में होता है; जब तुम संपर्क में नहीं होते तब वह भी संपर्क में नहीं होता।<span id="more-4312"></span></p>
<p>      इस घटना को समझ लेना है। तुम्‍हारे चार मन होते है—वह परम मन जो भविष्‍य की संभावना है जिसके तुम केवल बीज लिए हुए हो। कुछ प्रस्‍फुटित नहीं हुआ; केवल बीज होते है। मात्र क्षमता होती है। फिर होता है चेतन मन—एक बहुत छोटा टुकड़ा जिसके द्वारा तुम विचार करते हो, सोचते हो, निर्णय करते हो, तर्क करते हो, संदेह करते हो, आस्‍था करते हो। वह चेतन मन गुरु के साथ संपर्क में होता है जिसे तुमने समर्पण नहीं किया है। तो जब भी यह संपर्क में होता है गुरु संपर्क में होता है। अगर यह संपर्क में नहीं, तो गुरु संपर्क में नहीं। तुम एक विद्यार्थी हो, और तुमने गुरु को  गुरु के रूप में नहीं धारण किया है। तुम अब भी एक शिक्षक के रूप में ही उसके बारे में सोचते हो।</p>
<p>      शिक्षक और विद्यार्थी चेतन मन में अस्‍तित्‍व रखते है। कुछ नहीं किया जा सकता क्‍योंकि तुम खुले हुए नहीं हो। तुम्‍हारे दूसरे तीनों द्वार बंद है। परम चेतना मात्र एक बीज है। तुम इसके द्वार नहीं खोल सकते।</p>
<p>      उप चेतन जरा ही नीचे है चेतन से। वह द्वार खुलना संभव है यदि तुम प्रेम करो। यदि तुम यहां मेरे साथ हो केवल तुम्‍हारी तर्कणा के कारण तो तुम्‍हारा चेतना द्वार खुला हुआ है। जब कभी तुम खोलते हो इसे तो मैं वहां होता हूं। यदि तुम इसे नहीं खोलते, तो मैं बहार होता हूं। मैं प्रवेश नहीं कर सकता। चेतन के नीचे ही उप चेतन है। यदि तुम मेरे प्रेम में हो, यदि यह मात्र शिक्षक और विद्यार्थी का संबंध नहीं है बल्‍कि कुछ ज्‍यादा आत्‍मीयता का संबंध है, यदि वह प्रेम-जैसी घटना है, तो उपचेतनिय द्वार खुला होता है। बहुत बार चेतन द्वार तुम्‍हारे द्वारा बंद हो जायेगा। तुम मेरे विरूद्ध तर्क करोगे; कई बार तुम नकारात्‍मक हो जाओगे। कई बार तुम मेरे विरूद्ध हो जाओगे। लेकिन वह बात महत्‍व नहीं रखती। प्रेम का उपचेतनिय द्वार खुला होता है, और मैं सदा रह सकता हूं तुम्‍हारे संपर्क में।</p>
<p>      लेकिन वह भी एक संपूर्ण श्रेष्‍ठ द्वार नहीं है। क्‍योंकि कई बार तुम मुझसे घृणा कर सकते हो। यदि तुम मुझे घृणा करते हो, तो तुमने वह द्वार भी बंद कर दिया है। प्रेम है यहां, वह विपरीत बात घृणा भी वहां है। यह हमेशा होती है। प्रेम के साथ। द्वितीय द्वार ज्‍यादा खुला होता है प्रथम से, क्‍योंकि पहला तो अपनी मनोदशा इतनी तेजी से बदलता है कि तुम जानते ही नहीं कि क्‍या घट सकता है। किसी भी क्षण यह बदल सकता है। एक क्षण पहले यह मौजूद था यहां; अगले क्षण यह यहां नहीं होता। क्षण मात्र की घटना होती है।</p>
<p>      प्रेम थोड़ी ज्‍यादा देर बना रहता है। यह भी अपनी भाव दशाएं बदलता है, लेकिन इसकी मनोदशाओं की थोड़ी ज्‍यादा लंबी तरंगें होती है। कई बार तुम मुझे घृणा करोगे। तीस दिन में करीब आठ दिन ऐसे होते है। कम से कम एक सप्‍ताह तो होता ही है। जिसके दौरान तुम मुझसे घृणा करते हो। लेकिन तीन सप्‍ताह के लिए तो वह द्वार खुला होता है। बुद्धि के साथ एक सप्‍ताह बहुत लंबा है। यह एक अनंतकाल होता है। बुद्धि के संग तुम एक क्षण यहां होते हो, दूसरे क्षण तुम विरूद्ध होते हो। पक्ष में होते हो, फिर विरूद्ध और यही चलता जाता है। यदि दूसरा द्वार खुला होता है और तुम प्रेम में होते हो। चाहे तर्क का द्वार बंद भी हो तो मैं संपर्क में बना रह सकता हूं।</p>
<p>      तीसरा द्वार उप चेतन के नीचे होता है—जो है अचेतन। तर्क प्रथम द्वार खोल देता है—यदि तुम मेरे साथ कायल होने का अनुभव करो। प्रेम द्वितीय द्वार खोल देता है। जो पहले से ज्‍यादा बड़ा होता है। यदि तुम मेरे प्रेम में होते हो। कायल नहीं बल्‍कि प्रेम में होते हो, एक घनिष्‍ठ संबंध अनुभव करते हो। एक समस्‍वरता, एक स्‍त्रेही भाव अनुभव करते हो।</p>
<p>      तीसरा द्वार खुलता है समर्पण द्वारा। यदि तुम मेरे द्वारा संन्‍यस्‍त  हुए हो, यदि तुम संन्‍यास में छलांग लगा चुके हो, यदि तुमने छलांग लगा दी है और मुझसे कह दिया है, अब—तुम होओ मेरे मन। अब तुम थाम लो मेरी बागडोर। अब तुम मेरा मार्ग निर्देशन करो। और मेरे पीछे चलूंगा। ऐसा नहीं है कि तुम इसे हमेशा ही कर पाओगे। लेकिन मात्र यह चेष्‍टा ही कि तुमने समर्पण  किया, तीसरा द्वार खोल देता है।</p>
<p>      तीसरा द्वार खुला रहता है। हो सकता है तार्किक रूप से तुम मेरे विरूद्ध होओ। इससे फर्क नहीं पड़ता; मैं संपर्क में होता हूं। हो सकता हो तुम मुझसे घृणा करो। इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता है, क्‍योंकि तीसरा द्वार खुला रहता है। तुमने समर्पण कर दिया है। और तीसरे द्वार को बंद करना मुश्‍किल है। मुश्‍किल ही नहीं अति कठिन है। खोलना भी कठिन है, वह बंद करना भी अति कठिन है। पर फिर भी इतना कठिन नहीं की जितना की बंद करना। लेकिन वह भी बंद किया जा सकता है। क्‍योंकि तुमने इसे खोला है, वह भी किया जा सकता है बंद। किसी दिन तुम निर्णय कर सकते हो तुम्‍हारे समर्पण को लौटा लेने का। या तुम जा सकते हो और स्‍वयं का समर्पण किसी दूसरे के प्रति कर सकते हो। लेकिन ऐसा कभी नहीं; करीब-करीब कभी नहीं घटता। क्‍योंकि इन तीनों द्वारों सहित गुरु चौथे द्वार को खोलने का कार्य कर रहा होता है।</p>
<p>      अंत: लगभग असंभव संभावना होती है। कि तुम तुम्‍हारा समर्पण वापस लौटा लोगे। इससे पहले कि तुमने इसे लौटा लिया हो, गुरु अवश्‍य चौथा द्वार खोल चुका होता है। जो तुम्‍हारे बास के बहार होता है। तुम इसे खोल नहीं सकते। तुम इसे बंद नहीं कर सकते। जो द्वार तुम खोलते हो, इसके तुम मालिक रहते हो। और तुम इसे बंद भी कर सकते हो। लेकिन चौथा द्वार का तुम से कुछ लेना देना नहीं होता। वह है परम चेतना। इन तीनों द्वारों को खोलना आवश्‍यक है। जिससे की गुरु चौथे द्वार के लिए चाबी गढ़ सकता हो। यह एक जालसाजी जैसा है, एक फोर्जरी है, क्‍योंकि स्‍वयं मालिक के पास चाबी नहीं होती है।</p>
<p>      गुरु का सारा प्रयास यही है कि इन तीनों द्वारों से चौथे में प्रवेश करना और चाबी गढ़ना और इसे खोलना, इसके लिए उसे पर्याप्‍त समय मिले। एक बार यह खुल जाता है, तो तुम नहीं रहते। अब तुम कुछ नहीं कर सकते। तुम तीनों के द्वार बंद कर सकते हो। लेकिन उसके पास चाबी है चौथे की और वह हमेशा संपर्क में है। तब चाहे तुम मर भी जाओ, इससे कुछ नहीं होता। यदि तुम पृथ्‍वी के अंत तक चले जाओ। यदि तुम चाँद पर चले जाओ, इस से कोई अंतर नहीं पड़ता। उसके पास चौथे की चाबी है। और वस्‍तुत: सच्‍चा गुरु कभी भी चाबी अपने पास रखता नहीं। वह सिर्फ खोलता है, चौथे को और फेंक देता है समुद्र में। अंत: कोई संभावना नहीं होती इसे चुराने की यह कुछ करने की। कुछ नहीं किया जा सकता।</p>
<p>      मैंने तुममें से बहुतों के चौथे द्वार की चाबी बढ़ ली और फेंक दी है। अंत: स्‍वयं को नाहक परेशान मत करो। यह व्‍यर्थ है। अब कुछ नहीं किया जा सकता। एक बार चौथा द्वार खुल जाता है तो कोई समस्‍या नहीं रहती। सारी समस्‍याएं इससे पहले की ही होती है। ठीक अंतिम क्षण गुरु तैयार कर रहा होता है चाबी क्‍योंकि चाबी अति कठिन है।</p>
<p>      लाखों जन्‍मों से द्वार बंद रहा है, इसने तमाम तरह की जंग इकट्ठी कर ली है। यह दीवार की भांति लगता है। द्वार की भांति नहीं। लाता कहां है, इसे खोजना कठिन होता है। और हर किसी के पास अलग लता है। अंत: कहीं कोई मास्‍टर की , कोई परम कुंजी नहीं होती। एक चाबी काम न देगी क्‍योंकि हर कोई उतना ही अनूठा है जितना की तुम्‍हारे अंगूठे का चिन्‍ह। कोई दूसरा वह चिन्‍ह कहीं नहीं पा सकता। न तो अतीत में, न ही भविष्‍य में। तुम्‍हारे अंगूठे का चिन्‍ह तो बस तुम्‍हारा होगा। एकमेव घटना। यह कभी दोहराई नहीं जाती है।</p>
<p>      तुम्‍हारे अंतर कोष्‍ठ का ताला भी तुम्‍हारे अंगूठे के चिन्‍ह की भांति ही होता है। यह नितांत वैयक्‍तिक होता है। कोई परम कुंजी मदद नहीं कर सकती। इसीलिए गुरु की जरूरत होती है। क्‍योंकि परम कुंजी खरीदी नहीं जा सकती है। वरना एक बार चाबी तैयार हो जाये, तो हर किसी का द्वार खोला जा सकता है। नहीं, प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति के पास अलग ढंग का द्वार है। अलग प्रकार का ताला। उस ताले के बंद होने खुलने का अपना ढंग होता है। गुरु को ध्‍यान देना है और  खोजना है और चाबी गढ़नी है—कोई विशिष्‍ट चाबी।</p>
<p>      एक बार तुम्‍हारा चौथा द्वार खुल जाता है तब गुरु सतत तुम्‍हारे साथ गहन संपर्क में होता है। तुम चाहे उसे बिलकुल भूल जाओं; इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। तुम उसे याद न करो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। गुरु देह छोड़ दे, इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता। जहां कहीं वह हो, जहां कही तुम हो, द्वार खुला ही होता है। और यह द्वार समय-स्‍थान के पार रहता है। इसीलिए यह परम मन है, यह परम चेतन है।</p>
<p>      ‘’हम अपनी मूर्च्‍छित और अहंकारी अवस्‍था में, सदा गुरु के संपर्क में नहीं होते। लेकिन गुरु क्‍या सदा हमारे संपर्क में होता है? –हां लेकिन सिर्फ तभी जब चौथा द्वार खुला हो। अन्‍यथा तीसरे द्वार पर वह कुछ अंश तक संपर्क में होता है। दूसरे द्वार पर करीब आधे समय वह संपर्क में होता है। पहले द्वार पर वह केवल क्षण मात्र संपर्क में होता है।</p>
<p>      अंत: मुझे तुम्‍हारा चौथा द्वार खोलने दो। और चौथा द्वार एक निश्‍चित घड़ी में ही खुलता है। वह घड़ी आती है जब तुम्‍हारे तीनों द्वार खुल हों। यदि एक भी द्वार बंद हो तो चौथा द्वार नहीं खुल सकता। यह एक गणित भरी पहली है। और ऐसी अवस्‍था की जरूरत होती है। कि तुम्‍हारा पहला—चेतन द्वार खुला रहना चाहिए। फिर तुम्‍हारा दूसरा द्वार खुला रहना चाहिए। तुम्‍हारा उप चेतन तुम्‍हारा प्रेम। यदि तुमने समर्पण कर दिया है यदि तुमने दीक्षा में एक कदम रख लिया है। तब तुम्‍हारा तीसरा द्वार, उप चेतन खुला होता है।</p>
<p>      जब तीनों द्वार खुले होते है, जब एक निश्‍चित घड़ी में चौथा द्वार खोला जा सकता है। तो ऐसा घटता है कि जब तुम जागे हुए होते हो, चौथा द्वार कठिन है खोलना। जब तुम सोये होते हो। केवल तभी। अंत: मेरा वास्‍तविक कार्य दिन में नहीं होता। यह रात्रि में होता है जब तुम कहरी नींद में खर्राटे भर रहे होते हो, क्‍योंकि तब तुम कोई मुश्‍किल खड़ी नहीं करते। तुम गहरी नींद में सोय होते हो, इसीलिए तुम उल्‍टे तर्क नहीं करते। तुम तर्क करने की बात भूल जाते हो।</p>
<p>      गहरी नींद में तुम्‍हारी ह्रदय ठीक कार्य करता है। तुम इस समय ज्‍यादा प्रेममय होते हो उसकी उपेक्षा जिस समय कि तुम जागे हुए हो। क्‍योंकि जब तुम जागे होते हो, बहुत सारे भय तुम्‍हें घेर लेते है। और भय कारण ही प्रेम संभव नहीं हो पाता। जब तुम गहरी नींद में सोये हुए होते हो, भय तिरोहित हो जाते है। प्रेम खिलता है। प्रेम एक रात्रि पुष्‍प है। तुमने देखा होगा रात की रानी को—वह फूल जो रात्रि में खिलता है। प्रेम रात की रानी है। यह रात में खिलता है—तुम्‍हारे कारण ही; और कोई दूसरा कारण नहीं। यह खिल सकता है दिन में, लेकिन तब तुम्‍हें स्‍वयं को बदलना होता है। इससे पहले कि प्रेम दिन में खिल सके, भरी परिवर्तन की आवश्‍यकता होती है।</p>
<p>      इसीलिए तुम देख सकते हो कि जब लोग नशे की में मस्‍ती में होते है। चले जाओं किसी मधुशाला में जहां लोगों ने बहुत ज्‍यादा पी रखी हो। वे लगभग सदा ही प्रेममय होते है। देखना दो शराबियों को सड़क पर चलते हुए। एक दूसरे के कंधों पर झूलते हुए—इतने प्रेममय—जैसे की एक ही हो। वे सोये हुए है।</p>
<p>      जब तुम भयभीत नहीं होते, तब प्रेम खिलता है। भय है विष। और जब तुम नींद में गहरे उतरे होते हो, तब में तुम्‍हारी नींद में प्रवेश कर सकता हूं। क्‍योंकि तुमने पहले से ही समर्पित किया है, यदि तुम गुरु को समर्पण कर दिया है तो वह अपना कार्य कर सकता है। तुम सून भी न पाओगे उसकी पग ध्वनि को। वह चुपचाप प्रवेश करता है। और अपना कार्य करता है। यह एक कूट-रचना, एक फोर्जरी है, बिलकुल वैसी है जैसे कि चोर उस समय रात में प्रवेश करे, जबकि तुम सोये होते हो। गुरु एक चोर है। जब तुम गहरी निद्रा में होते हो और तुम नहीं जानते कि क्‍या घट रहा है। वह प्रवेश करता है तुममें और चौथा द्वार खोल देता है।</p>
<p>      एक बार चौथा द्वार खुल जाता है तो कोई समस्‍या नहीं रहती। हर कोशिश और हर मुसीबत जो तुम बना सकते हो तुम उसे निर्मित कर सकते हो केवल चौथे के खुलने से पहले ही। वह चौथा द्वार न वापसी है। एक बार चौथा खुल जाता है, तो गुरु चौबीसों घंटे तुम्‍हारे साथ रह सकता है। तब कोई मुश्किल नहीं है।</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>पतंजलि: योग-सूत्र</p>
<p>भाग-1, प्रवचन—16,</p>
<p>6 जनवरी, 1975, रजनीश आश्रम पूना।</strong></p>
<br />Filed under: <a href='http://oshosatsang.org/category/%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%9c%e0%a4%b2%e0%a4%bf-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%97-%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0/'>पतंजलि का योग सुत्र--</a> Tagged: <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/'>ओशो</a>, <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6/'>स्‍वामी आनंद प्रसाद</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/oshosatsang.wordpress.com/4312/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/oshosatsang.wordpress.com/4312/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/oshosatsang.wordpress.com/4312/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/oshosatsang.wordpress.com/4312/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/oshosatsang.wordpress.com/4312/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/oshosatsang.wordpress.com/4312/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/oshosatsang.wordpress.com/4312/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/oshosatsang.wordpress.com/4312/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/oshosatsang.wordpress.com/4312/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/oshosatsang.wordpress.com/4312/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/oshosatsang.wordpress.com/4312/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/oshosatsang.wordpress.com/4312/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/oshosatsang.wordpress.com/4312/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/oshosatsang.wordpress.com/4312/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4312&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://oshosatsang.org/2012/01/25/%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%af-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9a%e0%a5%8c%e0%a4%a5-%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%96%e0%a5%8b%e0%a4%b2%e0%a4%a8%e0%a4%be/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>1</slash:comments>
		<georss:point>28.621671 77.162177</georss:point>
		<geo:lat>28.621671</geo:lat>
		<geo:long>77.162177</geo:long>
		<media:content url="http://1.gravatar.com/avatar/18ba8ff7182a19f3392c7e668fd1934c?s=96&#38;d=identicon&#38;r=G" medium="image">
			<media:title type="html">anandprashad</media:title>
		</media:content>

		<media:content url="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/01/scan0238.jpg?w=216" medium="image">
			<media:title type="html">स्‍वामी आनंद प्रसाद</media:title>
		</media:content>
	</item>
		<item>
		<title>दि सूफीज़—ओशो की प्रिय पुस्‍तकें</title>
		<link>http://oshosatsang.org/2012/01/24/%e0%a4%a6%e0%a4%bf-%e0%a4%b8%e0%a5%82%e0%a4%ab%e0%a5%80%e0%a4%9c%e0%a4%bc-%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%af-%e0%a4%aa%e0%a5%81/</link>
		<comments>http://oshosatsang.org/2012/01/24/%e0%a4%a6%e0%a4%bf-%e0%a4%b8%e0%a5%82%e0%a4%ab%e0%a5%80%e0%a4%9c%e0%a4%bc-%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%af-%e0%a4%aa%e0%a5%81/#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 24 Jan 2012 12:24:05 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[ओशो की प्रिय पूस्‍तके--]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://oshosatsang.org/?p=4310</guid>
		<description><![CDATA[समुंदर ने पूछा किसी ने कि ‘’तुम नीला रंग क्‍यों पहले हुए हो ? यह तो मातम का रंग है। और तुम निरंतर उबलते क्‍यों रहते हो ? वह कौन सी आग है जो तुम्‍हें उबालती है ? समुंदर ने &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/01/24/%e0%a4%a6%e0%a4%bf-%e0%a4%b8%e0%a5%82%e0%a4%ab%e0%a5%80%e0%a4%9c%e0%a4%bc-%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%af-%e0%a4%aa%e0%a5%81/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4310&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>समुंदर ने पूछा किसी ने कि ‘’तुम नीला रंग क्‍यों पहले हुए हो ? यह तो मातम का रंग है। और तुम निरंतर उबलते क्‍यों रहते हो ? वह कौन सी आग है जो तुम्‍हें उबालती है ? समुंदर ने कहा, ‘’मेरे महबूब से बिछुड़ कर में उदास हूं इसलिए नीला पड़ गया हूं, और वह प्‍यार की आग है जिससे मैं खोलता रहता हूं।‘’</strong></p>
<p>     यह है सूफी तरीका। सीधा सी बात को प्रतीक रूप में कहना और उस कहने में अर्थों के समुंदर को उंडेलना सूफियाना अंदाज है।</p>
<p>       सूफियों की जीवन शैली, उनके तौर-तरीकों के बारे में अगर सब कुछ एक साथ जानना हो तो इस किताब की सैर करें। रहस्‍य के पर्दे में ढँके सूफियों को दिन के उजाले में लाने  का महत्‍वपूर्ण काम इदरीस शाह ने किया है।<span id="more-4310"></span></p>
<p>      इदरीस शाह एक अद्भुत व्‍यक्‍तित्‍व है। वे सन 1924 में उतर भारत में जन्‍मे। उनके पुरखों में मध्‍य एशिया के महान सूफी गुरु थे। सूफी प्रणाली का मौलिक अध्‍ययन करने के बाद वह इंग्‍लैड में जा बसे थे। और जीवन के आखरी दस साल सूफी विरासत के पौधे को समकालीन पाश्‍चात्‍य चिंतन के आँगन में लगाने का बहुमूल्य काम करते रहे। इदरीस शाह के भी तर पूरब और पश्‍चिम का अनोखा संगम था। इसलिए बेबूझ, अतर्क, सूफी साहित्‍य को पश्‍चिम की बुद्धिवादी तर्क सरणी में प्रभावशाली ढंग से अभिव्‍यक्‍त कर सके। सूफी साहित्‍य पर उनकी लगभग एक दर्जन किताबें है।</p>
<p>      सूफी लोगों को आप कोई भी व्‍यवस्‍था नहीं दे सकते। उनके न तो मंदिर बन सकते है, न शास्‍त्र, न क्रिया कांड। इसलिए उनका स्‍कूल कॉलेजों में अध्‍ययन नहीं किया जा सकता। सूफियों का दर्शन शास्‍त्र नहीं है क्‍योंकि उनका ज्ञान शब्‍दों में संरक्षित नहीं है। वह सदगुरू के अंतरतम में समाहित है। सदगुरू अपनी आंखों में , आचरण से, खामोशी और अपने वजूद से शिष्‍यों को संप्रेषित करता है। इसलिए सूफियों में सदगुरू का महत्‍व असाधारण होता है। सूफी सदगुरू प्रतीकों में बात करते है। उनकी बातें समझने के लिए तर्क संगत मस्‍तिष्‍क को परे हटाना होता है।</p>
<p>      सूफी आबोहवा इदरीस शाह की रग-रग में समाई थी। साथ ही उन्‍हें पाश्‍चात्‍य शिक्षा भी नसीब हुई थी। इसलिए वे पूरब की मय को पश्‍चिम के पैमाने में उंडेलने का काम बखूबी करते रहे। इस किताब के तीस परिछेद है। और उनमें पूरा सूफी जहां समाया हुआ है। पहले तो वह सूफियों की पृष्‍ठभूमि देते है, सूफी हमेशा परोक्ष बात करते है। सीधी बात नहीं कहते। जीवन दो तरह से जिया जा सकता है। तर्क से या अनुभव से। तर्क किसी निष्‍कर्ष पर पहुंचता है और हमें उसे मानना पड़ता है लेकिन उससे हमारे संदेह दूर नहीं होते। अनिश्‍चय बना रहता है। अनुभव सीधे ह्रदय में प्रवेश करता है और आदमी को एक सुकून बख़्शता है। इसलिए सूफी कभी तर्क नहीं करते, दो टूक बात करते है।</p>
<p>      साधारण आदमी अपने पापों का पश्‍चाताप करता है।</p>
<p>      विकसित व्‍यक्‍ति अपनी असावधानी पर ग्लानि करता है।</p>
<p>      इस किताब के सात परिच्‍छेद सात बुलंद सूफी सदगुरूओं को समर्पित है। इसमें है मुल्‍ला नसरूद्दीन, शेख सादी, फरिदुद्दीन अत्‍तार, जलालुदिन रूमी, इब्‍न–अल-अरबी, अल-गझली और उमर ख्‍याम। ये वे दैदीप्‍यमान नक्षत्र है। जिन्‍होंने सूफी पथ को अपने अलौकिक प्रकाश से आलोकित किया है। हर एक का कुछ न कुछ मौलिक योगदान रहा है। नसरूद्दीन के लतीफ़े, रूमी की कविताएं, उमर ख्‍याम की रूबाइयां। मनुष्‍य जाति के साहित्‍य और जीवन पर छाई हुई है। दूसरे को जीतने का यह भी सूफियाना अंदाज ही है। वे सीधे आक्रमण नहीं करते; हौले-हौले, दिल के दरवाजे से आपके ज़ेहन में प्रवेश करते है। आपके दिल की धड़कन बन जाते है। उनमें मुक्‍ति  पाना असंभव है। मनुष्‍य की पूरी कला सूफियों से प्रभावित है। वे लोग इस अदा से कत्‍ल करते है कि मरने वाले को पता भी नहीं चलता कि मारे गये। वस्‍तुत: हर धर्म का गहराइयों में सूफी बसता है। क्‍योंकि वह हर सृजन का स्‍त्रोत है।</p>
<p>      सूफी साधक निरंतर चेतना के उर्ध्व गमन का प्रयास करते है—कैसे मन के उच्‍चतर स्‍तरों की खिलावट हो और आदमी दिव्‍यता का अनुभव करे। इस प्रयास में वे कई चीजों का उपयोग करते है। इसलिए सूफी खुद को ‘’पीपल ऑफ दि पाथ’’ अर्थात राहगीर कहते है। अनंत की यात्रा है और चलते जाना है अथक अनवरत।</p>
<p>      मन को विकसित करने के लिए वे कुछ नंबर, कुछ अक्षर और कुछ विधियों का प्रयोग करते है। उनके अभ्‍यास से मन की जड़ता दूर होकर वह जीवन के रहस्‍यों को समझने के काबिल हो जाता है। अधिकांश लोग जीवन की टुच्‍ची क्षुद्र बातों में उलझे रहते है। इतना छोटा मन श्रेष्‍ठतर बातों का अहसास नहीं कर सकता। उसके लिए मन को संकीर्णताओं से हटाकर विशालता पर केंद्रित करना, रहस्‍यों पर ध्‍यान करना जरूरी होता है।</p>
<p>      सूफी जिस भाषा का प्रयोग करते है उसे वे ‘’गुह्म भाषा’’ कहते है। उनके शब्‍दों का प्रकट अर्थ कुछ होगा और भीतरी अर्थ कुछ और होगा। एक-एक शब्‍द के कई अर्थ होंगे। और सुनने वाला अपने तल से उस अर्थ को समझेगा। इसके पीछे उद्देश्‍य होता है; बंधी हुई धारणाओं को तोड़कर मन को नई ऊर्जाओं के लिए उपलब्‍ध करना।</p>
<p>      सामान्‍यतया माना जाता है कि सूफियों के पास चमत्‍कार आरे सिद्धियां होते है। लेकिन सूफियों के मुख्‍य धारा में, चमत्‍कार और जादू का प्रदर्शन उस व्‍यक्‍ति का पतन माना जाता है।</p>
<p>      चमत्‍कारों का एक खास उद्देश्‍य होता है। कुछ लोगों उनमें भ्रांति में पड़ जाएंगे। कुछ लोगों में संदेह पैदा होगा, अन्‍य कुछ लोग डर जाएंगे। तो दूसरे उत्‍तेजित हो जाएंगे। चमत्‍कार लोगों की मानसिकता को बदलने का एक साधन है।</p>
<p>      जीवन को देखने का सूफियों का एक खास अंदाज होता है। वे कुदरत के साथ पूरी तरह तालमेल बिठा कर जीते है। मसलन सूफी कहते है कि आप जब बीमार होते है तो फौरन दवा ढूंढने की बजाएं बीमारी की सोहबत करिए। उससे पूछिये की तू क्‍या है। कैसे ठीक होगी। इलाज बीमारी में ही छीपा होता है। जो जानकारी बीमारी के भीतर कैद होती है। उसे मुक्‍त करिये और आप स्‍वास्‍थ हो जाएंगे। शेर जब बीमार होता है तो एक खास तरह का पौधा खाता है और ठीक हो जाता है। उसे यह इलाज कौन बताता है। खुद उसकी बीमारी।</p>
<p>      सूफी फकीर अपने आपको दरवेश कहते है। जो अल्‍लाह की राह पर चलने लगा उसके लिए सारी दुनिया ‘’उसका’’ दर है। दरवेशों की अपनी पूरी व्‍यवस्‍था है और तल है। उनका रहन सहन थेगड़े लगे हुए कपड़े खोयी-खोयी सी मुद्रा और अतार्किक आचरण उन्‍हें आम आदमी से अलग करता है। इश्‍क उनकी जाति है। क्‍योंकि उन्‍हें अल्‍लाह से इश्‍क है। वे उसी का जिक्र करते है। खुद को इस हद तक पाक बनाने की कोशिश करते है। कि अनवर (खुदा का एक नाम, जिसका मतलब है रोशन) हो जाएं।</p>
<p>      इदरीस शाह की इस किताब को पढ़ना एक रहस्‍य लोक का सफर करने जैसा है। यह लोक हर एक शख्‍स के भीतर बसा है। इसमें पैठने के लिए निरंतर सतह को छोड़कर गहरी पर्तों को उघाड़ना जरूरी होता है। सूफियों की नजरों से देखते-देखते पढ़ने वाले को भी एक नई आँख मिलती है। यह कहना बेहतर होगा। कि उसकी आंखें खुल जाती है। वह पहली बार सतह पर दिखाई देने दृश्‍यों के पार देखने लगता है।</p>
<p>      इस किताब का नाम सूफी, सूफीवाद या सूफीज्‍म मत नहीं रखा है। इसे वे कहते है, दि सूफीज़। यह अर्थ पूर्ण है। सूफियों का कोई वाद नहीं होता। सूफी हुआ जा सकता है। जो भी खोजी है, जो भी खुद को बेहतर बनाने के रास्‍ते पर चल पड़े है। उनके लिए सूफियों को समझना बहुत काम आएगा।</p>
<p><strong>किताब की एक झलक&#8211;</strong></p>
<p><strong>मुल्‍ला नसरूद्दीन के लतीफ़े&#8211;</strong></p>
<p>      मुल्‍ला नसरूद्दीन एक आदर्श उदाहरण है। जिसे दरवेशों ने ईजाद किया है। उनका मकसद यह है कि कुछ खास परिस्‍थितियों में मन को एक झटका लगे और वह रूक जाएं। मध्‍यपूर्व में प्रचलित नसरूद्दीन की कथाएं अध्‍यात्‍म के जगत में एक अनूठी उपलब्धियाँ है। ऊपर से देखने पर नसरूद्दीन की कहानियां महज मजाक मालूम होता है। चाय खानों में, कैरेवान सराय में, घरों में, या रेडियों पर ये कहानियां निरंतर सुनाई जाती है। एक कहानी के कई तल होते है। उसमे निहित व्‍यंग्‍य, निष्‍कर्ष और उससे अधिक कुछ तत्‍व, जो रहस्‍य के खोजी को उसकी खोज में एक कदम आगे ले जाते है।</p>
<p>      चूंकि सूफी शैली को जीना होता है और जानना होता है, सिर्फ नसरूद्दीन की कहानी को सुनकर कोई ज्ञानी नहीं बन सकता है। हर कहानी भौतिक जीवन और चेतना के रूपांतरण के बीच की खाई को पाट देती है। विश्‍व का और कोई साहित्‍य यह काम नहीं कर सकता।</p>
<p>      ये कहानियां पाश्‍चात्‍य जगत में कभी पेश नहीं कही गई है। शायद इसलिए क्‍योंकि कोई गैर सूफी इनका अनुवाद नहीं कर सकता।  या संदर्भ के बाहर इनका अध्‍ययन भी नहीं कर सकता। क्‍योंकि तब वे अपना असर खो देंगी। पूरब में भी सिर्फ दीक्षित सूफी साधक ही उन पर मनन कर सकते है। इस संग्रह के मजाक विश्‍व के लगभग सभी तरह के साहित्‍य में प्रविष्‍ट हो गए है। उनकी वजह है, इन मज़ाक़ों में बहती हुई हास्‍य की धारा। हालांकि सूफियों का मकसद यह था कि आम आदमी को सूफियाना अंदाज सक वाकिफ किया जाए और मनुष्‍य जाति सूफियों के गुह्म अनुभवों को उपल्‍बध हो।</p>
<p>      मजाक को फैलने से रोका नहीं जा सकता। मनुष्‍य के ऊपर विचारों का जो ढांचा थोपा गया है उसकी दरारों में निकल कर मजाक फिसल जाती है। नसरूदीन मनुष्‍य जाति के विचारों के इतने तलों पर जा बसा है कि उसे निकाल बाहर करना असंभव है1 वह अमर है। कोई भी जानता है कि नसरूद्दीन कौन था। कब और कहा हरता था। यही उसका प्रयोजन है। सूफियों को ऐसा ही चरित्र गढ़ना था जो समयातित है, अनचीन्‍हा है। उनके लिए आदमी नहीं उनका संदेश महत्‍वपूर्ण है।</p>
<p>      नसरूद्दीन वस्‍तुत: सूफी सदगुरू है। लेकिन हर कहानी में वह मूढ़ता का दिखावा करता है। और उसके जरिए सत्‍य को उजागर करता है। आम आदमी क सोचने के सख्‍त ढाँचे होते है। और लीक से हटकर अलग नज़रिये से यह देख नहीं सकता। इसलिए जीवन के गहरे अर्थों से वंचित रह जाता है। इस तथ्‍य को यह कहानी बहुत स्‍पष्‍टता से प्रकट करती है।</p>
<p>      नसरूद्दीन प्रतिदिन गधे को सरहद के पर ले जाता है। उस पर घास लादी होती थी। सरहद के सिपाहियों के सामने वह स्‍वीकार करता था कि वह तस्‍कर है। इसलिए वह लोग उसकी रोज तलाशी लेते थे। उसकी घास उछालते थे, कभी जला देते थे। कभी पानी में डाल देते थे।  इधर नसरूद्दीन धनी से धनी होता जा रहा था।</p>
<p>      फिर वह वहां से दूसरे देश में रहने गया। वर्षों बाद उसे सरहद की रखा करने वाल पुराने अफसरों में से एक मिला। उसने कुतूहलवश पूछा, नसरूद्दीन तुम ऐसी कौन सकी चीज की तस्‍करी करते थे कि हम तुम्‍हें कभी नहीं पकड़ पाये।</p>
<p>      नसरूदीन ने कहां की गधे की।</p>
<p><strong>शिक्षक, शिक्षा और शिक्षार्थी&#8211;</strong></p>
<p>      पश्‍चिम से आया हुआ एक खोजी एक सूफी शेख से बुरी तरह जवाब तलब कर रहा था। कि वह सूफी शिक्षकों को कैसे पहचाने? क्‍या वह शिक्षक एक मसीही मार्गदर्शक होता है, जो लोगों का नेतृत्‍व करता है?</p>
<p>            शेख ने कहा, तुम खुद इस तरह के नेता बनोंगे। और तुम्‍हारी जिंदगी में पूरब के रहस्‍यदर्शीयों का महत्‍वपूर्ण स्‍थान होगा। विश्‍वास करो।</p>
<p>      बाद में शेख अपने शिष्‍यों से बोला, वह आदमी इसीलिए यहां आया था। क्‍या तुम बच्‍चों को मिठाई देने से इनकार करते हो। या पागल आदमी से कहते हो कि वह विक्षिप्‍त है। जो सीखने  के काबिल नहीं है उनका हौसला बढ़ाना चाहिए। जब कोई आदमी पूछता है, ‘’मेरा नया कोट कैसा है, तो तुम्‍हें यह नहीं कहना चाहिए कि, बिलकुल बेकार है। जब तक कि तुम उसे बेहतर कोट नहीं दे देते हो। या रहन सहन की तहजीब नहीं सिखा देते हो। कुछ लोगों को सिखाया नहीं जा सकता है।</p>
<p>      जलालुद्दीन रूमी कहता है: ‘’किसी का विरोधी बनकर सिखाया नहीं जा सकता है।‘’</p>
<p><strong>रेत की कहानी-</strong></p>
<p>      एक उछलता हुआ झरना रेगिस्‍तान पहुंचा। उसे दिखाई दिया कि वह उसे पार नहीं कर सकेगा। बारीक रेत में उसका पानी तेजी से सूख रहा था। झरने ने स्‍वयं से कहा, ‘’रेगिस्‍तान को पार करना मेरी नियति है लेकिन उसके आसार नजर नहीं आते है।</p>
<p>      यह शिष्‍य की स्‍थिति है जिसे सदगुरू की जरूरत होती है। लेकिन वह किसी पर श्रद्धा नहीं कर सकता। यह मनुष्‍य की दुखद हालत है।</p>
<p>      रेगिस्‍तान की आवाज ने कहा, ‘’हवा रेगिस्‍तान को पार करती है, तुम भी कर सकते हो।‘’</p>
<p>      झरना बोला, ‘’जब भी मैं कोशिश करता हूं मेरा पानी रेत में समा जाता है, और मैं कितना ही जोर लगाऊं थोड़ी दूर ही जा पाता हूं।</p>
<p>      हवा रेगिस्‍तान के साथ जोर नहीं लगाती।</p>
<p>   लेकिन हवा उड़ सकती है, मैं उड़ नहीं सकती।</p>
<p>      तुम गलत ढंग से सोच रही हो। अकेले उड़ने की कोशिश मूढ़ता है। हवा को तुम्‍हें ले जाने दो।</p>
<p>      झरने ने कहा कि वह अपनी निजता को खोना नहीं चाहता। इस तरह तो उसकी हस्‍ती खो जाएगी। रेत ने समझाया कि इस तरह सोचना तर्क का एक भाग है लेकिन यथार्थ के साथ उसका कोई ताल्‍लुक नहीं है। हवा जल की नमी को आत्‍म सात कर लेती है। रेगिस्‍तान के पार ले जाती है। और फिर बरसात बन कर पुन: नीचे ले आती है।</p>
<p>      झरना पूछता है, ‘’यदि ऐसा है तो क्‍या मैं यही झरना रहूंगा जो आज हूं।‘’</p>
<p>      रेत बोली; ‘’यों भी किसी सूरत में तुम यही नहीं रहोगे। तुम्‍हारे पास कोई चुनाव नहीं है। हवा तुम्‍हारे सार तत्‍व को, सूक्ष्‍म अंश को ले जाएगी। जब रेगिस्‍तान के पार, पहाड़ों में तुम फिर नदी बन जाओगे। फिर लोग तुम्‍हें किसी और नाम से पुकारेगा। लेकिन भीतर गहरे में तुम जानोंगे: ‘’मैं वहीं हूं।‘’</p>
<p>      हवा की स्‍वागत करती हुई बांहों में स्मारक झरना रेगिस्‍तान के पार चला गया। हवा उसे पर्वत की चोटी पर ले गई और फिर धीरे से, लेकिन दृढ़ता से जमीन पर गिरा दिया। झरना बुदबुदाया: ‘’अब मुझे मेरी वास्‍तविक अस्‍मिता का पता चला। फिर भी एक प्रश्न उसके मन में था। ‘’मैं अपने आप को क्‍यों नहीं जान सका।‘’ रेत को मुझे क्‍यों बताना पडा।</p>
<p>      एक छोटी सी आवाज उसके कानों में गूँजी। रेत का एक कण बोल रहा था: सिर्फ रेत ही जान सकती है क्‍योंकि उसने कई बार इसे घटते देखा है। क्‍योंकि वह नदी से लेकिर पर्वत तक फैली हुई है। जीवन की सरिता अपनी यात्रा कैसे करेगी इसका पूरा नक्‍श रेत में बना होता है।‘’</p>
<p><strong>ओशो का नजरिया&#8211;</strong></p>
<p>      एक आदमी है, इदरीस शाह। मैं उसकी किसी किताब का नाम नहीं लुंगा क्‍योंकि वे सभी अद्भुत है। मैं इस आदमी की प्रत्‍येक पुस्‍तक का समर्थन करता हूं। लेकिन उसकी एक पुस्‍तक अन्‍य सभी पुस्तकों से उभरकर दिखाई देती है। ‘’दि सूफीज़’’ यह पुस्तक कोहिनूर है। ‘’सूफीज़’’ में उसने जो काम किया है वह अपरिसीमित है। इस आदमी ने पश्‍चिम को मुल्‍ला नसरूद्दीन से परिचित कराया। उसने बहुत बड़ा काम किया है। उसने नसरूद्दीन के छोटे-छोटे किस्‍से बहुत खूबसूरत बना दिये है। वह कहानियों को सुंदरता से अनुवादित तो करता ही था। उसके साथ उनकी सुंदरता में चार चाँद लगा देता था। और उन्‍हें ज्‍यादा सारगर्भित, ज्‍यादा दिलकश बना देता है।</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>बुक्‍स आय हैव लव्‍ड </strong></p>
<br />Filed under: <a href='http://oshosatsang.org/category/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%af-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%a4%e0%a4%95%e0%a5%87/'>ओशो की प्रिय पूस्‍तके--</a> Tagged: <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/'>ओशो</a>, <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6/'>स्‍वामी आनंद प्रसाद</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/oshosatsang.wordpress.com/4310/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/oshosatsang.wordpress.com/4310/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/oshosatsang.wordpress.com/4310/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/oshosatsang.wordpress.com/4310/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/oshosatsang.wordpress.com/4310/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/oshosatsang.wordpress.com/4310/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/oshosatsang.wordpress.com/4310/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/oshosatsang.wordpress.com/4310/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/oshosatsang.wordpress.com/4310/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/oshosatsang.wordpress.com/4310/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/oshosatsang.wordpress.com/4310/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/oshosatsang.wordpress.com/4310/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/oshosatsang.wordpress.com/4310/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/oshosatsang.wordpress.com/4310/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4310&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://oshosatsang.org/2012/01/24/%e0%a4%a6%e0%a4%bf-%e0%a4%b8%e0%a5%82%e0%a4%ab%e0%a5%80%e0%a4%9c%e0%a4%bc-%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%af-%e0%a4%aa%e0%a5%81/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>1</slash:comments>
		<georss:point>28.621671 77.162177</georss:point>
		<geo:lat>28.621671</geo:lat>
		<geo:long>77.162177</geo:long>
		<media:content url="http://1.gravatar.com/avatar/18ba8ff7182a19f3392c7e668fd1934c?s=96&#38;d=identicon&#38;r=G" medium="image">
			<media:title type="html">anandprashad</media:title>
		</media:content>
	</item>
		<item>
		<title>बालशेम तोव—(हसीद दर्शन) ओशो की प्रिय पुस्‍तकें</title>
		<link>http://oshosatsang.org/2012/01/23/%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a4%b6%e0%a5%87%e0%a4%ae-%e0%a4%a4%e0%a5%8b%e0%a4%b5-%e0%a4%b9%e0%a4%b8%e0%a5%80%e0%a4%a6-%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6%e0%a4%a8-%e0%a4%93%e0%a4%b6/</link>
		<comments>http://oshosatsang.org/2012/01/23/%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a4%b6%e0%a5%87%e0%a4%ae-%e0%a4%a4%e0%a5%8b%e0%a4%b5-%e0%a4%b9%e0%a4%b8%e0%a5%80%e0%a4%a6-%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6%e0%a4%a8-%e0%a4%93%e0%a4%b6/#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 23 Jan 2012 11:40:23 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[ओशो की प्रिय पूस्‍तके--]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://oshosatsang.org/?p=4308</guid>
		<description><![CDATA[हसीद की धारा कुछ चंद रहस्यदर्शीयों की रहस्‍यपूर्ण गहराइयों से पैदा हुई है। बालशेम उनमें सबसे प्रमुख है। हमीद पंथ का जा भी दर्शन है वह शाब्‍दिक नहीं है, बल्‍कि उसके रहस्यदर्शीयों के जीवन में, उनके आचरण में प्रतिबिंबित होता &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/01/23/%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a4%b6%e0%a5%87%e0%a4%ae-%e0%a4%a4%e0%a5%8b%e0%a4%b5-%e0%a4%b9%e0%a4%b8%e0%a5%80%e0%a4%a6-%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6%e0%a4%a8-%e0%a4%93%e0%a4%b6/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4308&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>हसीद की धारा कुछ चंद रहस्यदर्शीयों की रहस्‍यपूर्ण गहराइयों से पैदा हुई है। बालशेम उनमें सबसे प्रमुख है। हमीद पंथ का जा भी दर्शन है वह शाब्‍दिक नहीं है, बल्‍कि उसके रहस्यदर्शीयों के जीवन में, उनके आचरण में प्रतिबिंबित होता है। इसलिए उनका साहित्‍य सदगुरू के जीवन की घटनाओं की कहानियों से बना है। हसीदों की मान्‍यता है कि ईश्‍वर का प्रकरण स्‍तंभ इन ज़द्दिकियों में प्रवेश करता है और उनका आचरण इस प्रकाश की किरणें है अंत:, स्‍वभावत: दिव्‍य प्रकाश से रोशन है।<span id="more-4308"></span></p>
<p>      बालशेम तोव हसीदियों का सर्व प्रथम सदगुरू है। ‘’बालशेम तोव’’ असली नाम नहीं है, वह एक किताब है जो इज़रेलबेन एलिएज़र नाम के रहस्‍यदर्शी को मिला हुआ था। हसीद परंपरा में उसे बेशर्त कहा जाता है। इसका अर्थ है: दिव्‍य नामों वाला सदगुरू। बालशेम एक यहूदी रबाई था जिसके पास गुह्म शक्‍तियां थी। वह गांव-गांव घूमता था और अपनी स्वास्थ्य दायी आध्‍यात्‍मिक शक्‍तियों से लोगों का स्‍वस्‍थ करता था। उसने अपनी शक्‍तियां तब तक छुपा रखी थी। जब तक कि उसने खुद को आध्‍यात्‍मिक सदगुरू घोषित नहीं किया। वह किस्‍से-कहानियों में अपनी बात कहता था। हसीद साहित्‍य में बहुत गुरु गंभीर ग्रंथ नहीं है। हसीद फ़क़ीरों द्वारा कही गई किस्‍से कहानियों ही कुल हसीद साहित्‍य है। हसीद मिज़ाज यहूदियों से बिलकुल विपरीत है। यहूदी लोग गंभीर और व्‍यावहारिक होते है। और हसीद मस्‍ती और उन्‍मादी आनंद में जीते है। हसीदों की प्रज्‍वलित आत्‍माएं, ‘’Soul on fire’’ कहा जाता है।</p>
<p>      बालशेम की जन्‍म की तारीख पक्‍की नहीं है। कुछ कहते है 1698 और कुछ कहते है 1700।</p>
<p>      हसीद कहानियों को बाहर से समझा नहीं जा सकता। उनके भीतर प्रवेश किया जाता है। तब कहीं वे समझी जाती है। लगभग दो शताब्‍दियों तक इज़ रेल में हसीद कहानियां पीढ़ी दर पीढ़ी सुनायी जाती रही है। बालशेम तोव कहता था, कहानी इस ढंग से कही जानी चाहिए कि वह एक मार्गदर्शन बन जाये। कहानी कहते वक्‍त बालशेम कूदता-फांदता था, नाचता था। ये कहानियां बौद्धिक नहीं है। उसके रोएं-रोएं से प्रस्‍फुटित होती है। हसीदों का मूल सिद्धांत है: ऐसा नहीं है कि परमात्‍मा है, जो कुछ है, परमात्‍मा ही है। बालशेम तोव परमात्‍मा प्रेम से आविष्‍ट हो जाता था, इतना अधिक कि उसकी जबान खामोश हो जाती थी। उसकी स्‍मृति पटल से सब कुछ मिट जाता था। वह रोशनी का एक खाली स्‍तंभ हो जाता था। बालशेम ने विद्घान और  पंडितों की प्रतिभा को नहीं झकझोरा, उसका योगदान यह है कि वह दीन-दरिद्र साधारण जनों के मुरझाये, कुचले हुए दिलों में दिव्‍य प्रकाश की आग जलाता था।</p>
<p>      बालशेम तोव बच्‍चों से बेहद प्‍यार करता था। दूर-दराज से मां-बाप अपने बच्‍चों को बालशेम के पास लाते थे। बालशेम उनका शिक्षक नहीं, दोस्‍त बन जाता था। उन्‍हें उपदेश नहीं देता, उनके प्राणों में नया जीवन फूंक देता था। उनमें बच्‍चों जैसी मासूमियत थी। उसकी कोई गद्दी नहीं थी। न कोई पीठ था, लेकिन वह जिस शान के साथ जन-साधारण के ह्रदय सिंहासन पर विराजमान था, वैसा कोई सम्राट भी कभी नहीं होगा।</p>
<p><strong>हसीद पंथ: एक छोटा सा झरना</strong></p>
<p><strong>ओशो का नज़रिया&#8211;</strong></p>
<p>      यह ज्ञात नहीं है कि अत्‍यंत परंपरागत, सनातन यहूदी घर्म में भी कुछ महान बुद्धत्‍व प्राप्‍त सदगुरू पैदा हुए है। कुछ तो बुद्धत्‍व के पर चले गये। उनमें से एक है बालशेम तोव।</p>
<p>      तोव उसके शहर का नाम था। उसके नाम का मतलब इतना ही हुआ: तोव शहर का बालशेम। इसलिए हम उसके केवल बालशेम कहेंगे। मैंने उसे पर प्रवचन दिये क्‍योंकि जब मैं हसीद पंथ के विषय में बात कर रहा था तब मैंने कुछ भी सारभूत बाकी नहीं छोड़ा। ताओ, ज़ेन, सूफी, हसीद, सब पर मैंने बात की। मैं किसी परंपरा का हिस्‍सा नहीं हूं। इसलिए में किसी भी दिशा में जा सकता हूं। मुझे नक्‍शे की जरूरत नहीं है। मैं तुम्‍हें फिर एक बार याद दिला दूँ:</p>
<p>      भीतर आते, बहार जाते।</p>
<p>      पीनी का बतख़ कोई चिन्‍ह नहीं छोड़ता।</p>
<p>      न ही उसे मार्ग दर्शक जरूरत है।</p>
<p>      बालशेम तोव ने कोई शास्‍त्र नहीं लिखा। रहस्‍यवाद के जगत में शास्‍त्र एक वर्जित शब्‍द है। लेकिन उसने कई खुबसूरत कहानियां कही है। वह इतनी सुंदर है कि उनमें से एक मैं तुम्‍हें सुनाना चाहता हूं। यह उदाहरण सुनकर तुम उस आदमी की गुणवत्‍ता का स्‍वाद ले सकते हो।</p>
<p>      बालशेम तोव के पास एक स्‍त्री आई, वह बांझ थी। उसे बच्‍चा चाहिए था। वह निरंतर बालशेम तोव के पीछे पड़ी रही।</p>
<p>      आप मुझे आशीर्वाद दें, तो सब कुछ हो सकता है। मुझे आशीर्वाद दें, मैं मां बनना चाहती हूं।‘’</p>
<p>      आखिरकार तंग आकर—हां सतानें वाली स्‍त्री से बालशेम तोव भी तंग आ जाते है—वे बोले, बेटा चाहिए की बेटी।</p>
<p>      वह बोली—‘’ निश्‍चय ही बेटा चाहिए’’</p>
<p>      बालशेम तोव ने कहा तो फिर तुम यह कहानी सुनो। मेरी मां का भी बच्‍चा नहीं था। और वह हमेशा गांव के रबाई के पीछे पड़ी रहती थी। आखिर रबाई बोला, एक सुदंर टोपी ले आ।</p>
<p>      मेरी मां ने सुदंर टोपी बनवाई और रबाई के पास ले गई। वह टोपी इतनी सुदंर बनी कि उसे बनाकर ही वह तृप्‍त हो गई। और उसने रबाई से कहा, ‘’मुझे बदले में कुछ नहीं चाहिए।‘’ आपको इस टोपी में देखना ही अच्‍छा लग रहा है। आप मुझे धन्‍यवाद दें, मैं ही आपको ही आपको धन्‍यवाद दे रही हूं।‘’</p>
<p>      ‘’और मेरी मां चली गई, उसके बाद वह गर्भवती हो गई। और मेरा जन्‍म हुआ। बालशेम तोव ने कहानी पूरी की।</p>
<p>      इस स्‍त्री ने कहा, बहुत खुब अब कल मैं भी एक सुंदर टोपी ले आती हूं, दूसरे दिन वह टोपी लेकर आई। बालशेम तोव ने उसे ले लिया। और धन्‍यवाद तक न दिया। स्‍त्री प्रतीक्षा करती रही। फिर उसने पूछा बच्‍चे के बारे में क्‍या।</p>
<p>      बालशेम ने कहां की बच्‍चें के बारे में भूल जाओं। टोपी इतनी सुंदर है कि मैं आभारी हूं। मुझे धन्‍यवाद करना चाहिए।। वह कहानी याद है। उस स्‍त्री ने बदले में कुछ नहीं मांगा इस लिए उसके बच्‍चा हुआ। और वह भी मेरे जैसा बच्‍चा।</p>
<p>      लेकिन तुम कुछ लेने की चाहत से आई हो। इस छोटी सी टोपी के बदले में तू बालशेम जैसा बेटा चाहती है।</p>
<p>      कई बातें ऐसी है जो केवल कहानियों द्वारा कहीं जा सकती है। बालशेम तोव ने बुनियादी बात कह दी: ‘’माँगों मत और मिल जायेगा।‘’</p>
<p>      मांग मत—यह मूल शर्त है।</p>
<p>      बालशेम की कहानियों से जिस हसीद पंथ का निर्माण हुआ वह एक बहुत सुंदर खिलावट है। जो आज तक हुई है। हसीदों की तुलना में यहूदियों ने कुछ भी नहीं किया है। हसीद पंथ एक छोटा सा झरना है—अभी भी जीवंत, अभी भी खिलता हुआ।</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>बुक्‍स आय हैव लव्‍ड</strong></p>
<br />Filed under: <a href='http://oshosatsang.org/category/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%af-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%a4%e0%a4%95%e0%a5%87/'>ओशो की प्रिय पूस्‍तके--</a> Tagged: <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/'>ओशो</a>, <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6/'>स्‍वामी आनंद प्रसाद</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/oshosatsang.wordpress.com/4308/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/oshosatsang.wordpress.com/4308/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/oshosatsang.wordpress.com/4308/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/oshosatsang.wordpress.com/4308/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/oshosatsang.wordpress.com/4308/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/oshosatsang.wordpress.com/4308/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/oshosatsang.wordpress.com/4308/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/oshosatsang.wordpress.com/4308/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/oshosatsang.wordpress.com/4308/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/oshosatsang.wordpress.com/4308/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/oshosatsang.wordpress.com/4308/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/oshosatsang.wordpress.com/4308/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/oshosatsang.wordpress.com/4308/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/oshosatsang.wordpress.com/4308/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4308&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://oshosatsang.org/2012/01/23/%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a4%b6%e0%a5%87%e0%a4%ae-%e0%a4%a4%e0%a5%8b%e0%a4%b5-%e0%a4%b9%e0%a4%b8%e0%a5%80%e0%a4%a6-%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6%e0%a4%a8-%e0%a4%93%e0%a4%b6/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>1</slash:comments>
		<georss:point>28.621671 77.162177</georss:point>
		<geo:lat>28.621671</geo:lat>
		<geo:long>77.162177</geo:long>
		<media:content url="http://1.gravatar.com/avatar/18ba8ff7182a19f3392c7e668fd1934c?s=96&#38;d=identicon&#38;r=G" medium="image">
			<media:title type="html">anandprashad</media:title>
		</media:content>
	</item>
		<item>
		<title>ऐलन वॉटस –‘’दि वे ऑफ झेन’’—(ओशो की प्रिय किताबें)</title>
		<link>http://oshosatsang.org/2012/01/22/%e0%a4%90%e0%a4%b2%e0%a4%a8-%e0%a4%b5%e0%a5%89%e0%a4%9f%e0%a4%b8-%e0%a4%a6%e0%a4%bf-%e0%a4%b5%e0%a5%87-%e0%a4%91%e0%a4%ab-%e0%a4%9d%e0%a5%87%e0%a4%a8/</link>
		<comments>http://oshosatsang.org/2012/01/22/%e0%a4%90%e0%a4%b2%e0%a4%a8-%e0%a4%b5%e0%a5%89%e0%a4%9f%e0%a4%b8-%e0%a4%a6%e0%a4%bf-%e0%a4%b5%e0%a5%87-%e0%a4%91%e0%a4%ab-%e0%a4%9d%e0%a5%87%e0%a4%a8/#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 22 Jan 2012 14:46:17 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[ओशो की प्रिय पूस्‍तके--]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://oshosatsang.org/?p=4303</guid>
		<description><![CDATA[आध्‍यात्‍मिक अनुभवों का सौंदर्य यह है कि उनके घटने से विश्‍व की और देखने का नजरिया बदल जाता है। विश्‍व एक समस्‍या नहीं रहता। उल्‍टे ऐसा लगता है कि जो भी है बिलकुल ठीक है, इससे अन्‍यथा हो ही नहीं &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/01/22/%e0%a4%90%e0%a4%b2%e0%a4%a8-%e0%a4%b5%e0%a5%89%e0%a4%9f%e0%a4%b8-%e0%a4%a6%e0%a4%bf-%e0%a4%b5%e0%a5%87-%e0%a4%91%e0%a4%ab-%e0%a4%9d%e0%a5%87%e0%a4%a8/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4303&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>आध्‍यात्‍मिक अनुभवों का सौंदर्य यह है कि उनके घटने से विश्‍व की और देखने का नजरिया बदल जाता है। विश्‍व एक समस्‍या नहीं रहता। उल्‍टे ऐसा लगता है कि जो भी है बिलकुल ठीक है, इससे अन्‍यथा हो ही नहीं सकता। </strong>  </p>
<p>      इस बार ऐलन वॉटस की दो किताबों को एक साथ प्रस्‍तुत कर रहे है। ये दोनों किताबें ओशो ने एक साथ गिनाई है। ऐलन वॉटस ओशो का प्रिय लेखक है। बहुत कम लेखक है जिनकी शख्‍सियत ओशो को प्रसंद आती है। और ऐलन वॉटस उनमें से एक है। आम तौर पर लेखक और उनकी रचना में जमीन आसमान का फर्क होता है। लेकिन ऐलन वॉटस उसका अपवाद है।<span id="more-4303"></span></p>
<p>      ‘’दि इज़ इट’’ ऐलन वॉटस के अनुभवों से उपजे हुए लेखों का संकलन है। इन लेखों से जाहिर होता है कि वह केवल विचारक या दार्शनिक नहीं वरन खोजी भी है। उसका कंठ पानी पीने के लिए प्‍यासा है, उसे पानी की बौद्धिक चर्चा नहीं करनी। पहले पृष्‍ठ पर ही ये पंक्‍तियां है: झेन और आध्‍यात्‍मिक अनुभव पर एक निबंध’’ किताब 1961 में प्रकाशित हई है। उसके आमुख में ऐलन वॉटस ने जो वर्णन किया है उससे इन निबंधों की प्रकृति समझ में आती है। ‘’पहले चार वर्षो के आध्‍यात्‍मिक और रहस्‍यपूर्ण अनुभव और साधारण भौतिक जीवन से उनका संबंध।‘’ और ध्‍यान रहे, इन निबंधों का पूरा उद्देश्‍य यह है कि भौतिक और आध्‍यात्‍मिक, विशिष्‍ट और साधारण, इनके बीच हमने जो खाई बनाई है उसे मिटा दिया जाए। हमारे विचार और वक्‍तव्‍यों की आदतें ऐसी बन गई है कि हम इन दो लोको को अलग करते है। और यह नहीं मानते कि जो सामान्‍य है, अभी है, रोजमर्रा का है वही परम है, आत्‍यंतिक है।‘’</p>
<p>      ऐलन वॉटस की दृष्‍टि बहुमूल्‍य है जो उसे झेन के अध्‍ययन से मिली है। गहन आध्‍यात्‍मिक अनुभवों का अर्थ यह नहीं है कि हम संसार से मुंह मोड़ लें, उल्‍टे उन अनुभवों का आनंद ही दूसरों को बांटने में है। लेकिन यह बांटना किसी शिक्षक या उपदेशक की भांति नहीं वरन कुछ ऐसा है जैसे हम स्‍नान करते हुए गुनगुनाते है या सागर में उतर कर लहरों के साथ खेलते है।</p>
<p>      ‘’आध्‍यात्‍मिक अनुभवों का सौंदर्य यह है कि उनके घटने से विश्‍व की और देखने का नजरिया बदल जाता है। विश्‍व एक समस्‍या नहीं रहती उल्‍टे ऐसा लगता है कि जो भी है बिलकुल ठीक है, इससे अन्‍यथा हो ही नहीं सकता।‘’</p>
<p>      ‘’आध्‍यात्‍मिक अनुभव का केंद्र है यह अंतर्दृष्‍टि का जन्‍मना कि जो अभी है, यहीं है वही सभी जीवों का अंतिम लक्ष्‍य है। इस अंतर्दृष्‍टि को घेरे हुए और इससे बहती हुई एक भावनाओं की मस्‍ती होती है, एक तीव्र राहत, मुक्‍ति, निर्भारता और विश्‍व के प्रति एक असहनीय प्रेम का झरना फूट पड़ता है—लेकिन वह गौण है।</p>
<p>      अपने अनुभवों की पुष्‍टि की खातिर ऐलन वॉटस ने जगह-जगह उन लोगों के वक्‍तव्‍य उद्धत किये है जिन्‍हें ऐसे अनुभव हुए है। ध्‍यान के अनुभव तो नि: शब्द गहराइयों में होते है लेकिन वे जब भाव के तल पर उतरते है तो प्रतीकों के वस्‍त्र पहन लेते है। उनके बगैर निर्वस्‍त्र अनुभव को कहना असंभव है। उदाहरण के लिए बर्नार्ड ब्रैन्सन का एक वक्‍तव्‍य पढ़ें-</p>
<p>‘’वि ग्रीष्‍म की सुबह। नींबू के वृक्षों पर एक रूपहली पर्त झिलमिला रही थी। थिरक रही थी। वातास उन वृक्षों की सुगंध से बोझिल था। तापमान ऐसा कि मानों सहला रहा था। मुझे याद हे—मुझे स्‍मरण करने की जरूरत नहीं है—कि में एक वृक्ष के ठूंठ पर चढ़ा और अकस्‍मात ‘’उसमें’’ डूब गया। मैंने इसे कोई नाम नहीं दिया। मुझे शब्‍दों की कोई जरूरत नहीं थी। ‘’वह’’ और मैं एक थे।</p>
<p>      ऐसे कतिपय अनुभवों को प्रस्‍तुत कर ऐलन वॉटस लिखता है कि सामान्‍य जीवन में सोमवार की सुबह जब हम काम करने जाते है और संसार को जिन आंखों से देखते है वह हमारे सामाजिक संस्‍कारों के अलावा कुछ नहीं है।</p>
<p>      ऐलन वॉटस के आकस्मिक अनुभवों का विवरण पढ़ना बड़ा ही सुगंधित मालूम होता है। दूसरा अनुभव उसे तब हुआ जब वह भारतीय और चीनी दर्शन को पढ़ रहा था&#8211;</p>
<p>      ‘’एक रात आग के पास बैठा हुआ मैं ‘’ध्‍यान के लिए सही मनोदशा क्‍या हो’’ इसका चिंतन कर रहा था। हिंदू और बौद्ध पद्धतियों के अनुसार बहुत सी विभिन्‍न मन:स्‍थितियां हो सकती है। उसके बारे में सोचते-सोचते मैं इतना परेशान हो गया कि मैंने सोचना बंद कर उस सभी पद्धतियों को परे कर दिया। और तय किया कि मैं एक भी मनोदशा को नहीं अपना उगा। उन्‍हें एक साथ छोड़ने के प्रयास में मैंने अपने आपको भी हटा दिया। और अचानक मेरे शरीर का बोझ गायब हो गया। मुझे लगा मेरा कुछ नहीं है। आत्‍मा भी नहीं। और मैं किसी का नहीं हूं। पूरा विश्‍व किसी अवरोध के पारदर्शी नजर आने लगा। ठीक ऐसा जैसा इस क्षण मेरा मन था। जीवन की समस्‍या नि: शेष हो गई और लगभग अठारह घंटे तक मैं स्‍वयं और मेरा परिवेश ऐसा प्रतीत होता रहा। जैसे पतझड़ के किसी दिन हवा पत्‍तों को खेत में सब तरफ उड़ा रही है।‘’</p>
<p>      ऐलन वॉटस के ये पारदर्शी अनुभव जब शब्‍दों में प्रवाहित होते है तो उसकी कलम रस से सराबोर हो जाती है और उससे सत्‍य की चिनगारियां प्रस्फुटित होने लगती है। जैसे&#8211;</p>
<p>      ‘’ मनुष्‍य के उद्देश्‍य और लक्ष्‍य एक विराट वर्तुलाकार विश्‍व के भीतर पाये जाते है। जिसका अपना कोई लक्ष्‍य नहीं है। प्रकृति एक खेल है, उसका कोई उद्देश्‍य नहीं है। और यह संभावना कि भविष्‍य में उसका कोई उदेश्‍य नहीं, और यह संभावना कि भविष्‍य में उसका कोई लक्ष्‍य नहीं है उसकी कोई खामी नहीं है। उल्‍टे प्रकृति की जो भी प्रक्रियाएं है जिन्‍हें हम आसपास के जगत में और हमारे शरीर की अनैच्‍छिक क्रियाओं में देखते है वे कला की मानिंद है, उद्योग, राजनीति या धर्म की तरह नहीं। वे संगीत और नृत्‍य कला जैसी है जो अपने आप ही खिलती जाती है। उनमें कोई भविष्‍य का लक्ष्‍य नहीं होता संगीत का लक्ष्‍य प्रतिपल उसे बजाने और उसे प्रतिपल सुनने में है, हमारे अधिकांश जीवन के संबंध में यहीं सच है। यदि हम अकारण उसे सुधारने में लग जाते है तो उसे जीना भूल जाते है। जिस संगीतज्ञ का लक्ष्‍य सिर्फ इतना ही है कि उसका यह कार्यक्रम पहले वाले से बेहतर हो, तो वह अपने खुद के संगीत में सहभागी होने से और उसका आनंद लेने से वंचित रह जायेगा। उसका पूरा ध्‍यान अपनी तकनीक की प्रवीणता दिखाकर श्रोताओं को प्रभावित करने में लगा रहेगा।‘’</p>
<p>      पहले निबंध के बाद अन्‍य दो निबंध मुख्‍यत: झेन के मौलिक विश्‍लेषण जैसे है। ‘’झेन एंड दि प्रॉब्‍लम ऑफ कंट्रोल’’ और बीट झेन, स्‍कवेअर झेन, झेन।‘’ अपने दूसरे निबंध के कारण ऐलन वॉटस अच्‍छी तरह से जानता है कि झेन का विशेषज्ञ कहलाने लगा। ऐलन वॉटस अच्‍छी तरह से जानता है कि झेन चीन प्रज्ञा की उपज है। और पश्‍चिम के तर्क निष्ठ मनस के लिये इसे समझना टेढ़ी खीर है। ताओ की अंत दृष्टि बुद्धि के लिए बेबूझ है। लाओत्से और च्‍वांत्‍सु कहते है, ‘’जब तक आप गलत नहीं होते तब तक सही नहीं हो सकते क्‍योंकि सही और गलत एक सिक्‍के के दो पहलु है। उन्‍हें अलग नहीं किया जा सकता।</p>
<p>      फिर भी यूरोप और अमेरिका में झेन की लोकप्रियता बढ़ती चली गई है। ऐलन वाटस के देखे इसका कारण है, झेन नैतिकता का उपदेश नहीं देता, या ईसाई और यहूदी पैगंबरों के अंदाज में लोगों को डाँटता फटकारता नहीं। और झेन के जो प्रबुद्ध गुरु है वे बौद्ध या हिंदू अवतारों की तरह असाधारण नहीं है। वे आम आदमी की तरह जीते है, लेकिन इस असुरक्षित और क्षणजीवी विश्‍व के समुंदर में बड़ी आसानी से तैरते है।</p>
<p>      एलन वॉटस की प्रज्ञा निरंतर मानव जीवन की दुई को मिटाने का प्रयास करती है। यह पूछता है कि रात को विराट आसमान में जब हम तारे और नक्षत्रों का जाल देखकर अवाक हो जाते है तो हमारे मन में यह भाव नहीं उठता कि ये तारे यही है और वो गलत। इसी तरह जीवन में भी सही और गलत के पार एक स्‍थिति होती है जहां से रोज का जीवन जिया जा सकता है। हम जितना अपने भीतर जाते है उतना पाते है की ‘’मैं नहीं हूं’’ लेकिन फिर भी यही मेरा केंद्र है।</p>
<p>      किताब के अंतिम निबंध ‘’दि न्‍यू अल्केमी’’ में नशीले पदार्थों द्वारा आध्‍यात्‍मिक अनुभव उत्‍पन्‍न करने के विषय में चर्चा की गई है। ऐलन वॉटस ने कुछ पदार्थों का सेवन भी किया था। उसके बाद उसे जो अतींद्रिय अनुभव हुए उन्‍हें वह ‘’बोतल में बंद आध्‍यात्‍मिक अनुभव’’ कहता है। यद्यपि उनमें आरे आध्‍यात्‍मिक अनुभवों में थोड़ी समानता है, वह उनके पक्ष में नहीं है, क्‍योंकि वे चेतना के विकास के द्वारा नहीं होते। कृत्रिम रसायनों द्वारा होते है। और स्‍वास्‍थ्‍य के लिए निश्‍चित रूपेण हानिकारक है।</p>
<p><strong>दि वे ऑफ झेन&#8211;</strong></p>
<p>      चीन और जापन में झेन बुद्धिज्‍़म का उदय और विकास हुआ। दूसरे विश्‍व युद्ध के बाद पाश्‍चात्‍य देश जापान की और आकर्षित हुए और झेन धीरे-धीरे अमेरिका में फैलता चला गया। झेन का इतिहास और दर्शन इस किताब में बड़े सरल और सुगम तरीके से समझाया गया है। ऐलन वॉटस स्‍वयं अंग्रेज था और अमरीका में रहा लेकिन उसे जो आध्‍यात्‍मिक अनुभवों की झलकें आती थी उनके कारण वह पूर्वीय दर्शनों का मर्म समझ सकता था। वह समझ इस किताब में प्रतिफलित होती है। इस किताब के दो भाग है—पहला है झेन की पृष्‍ठभूमि और इतिहास, और दूसरा झेन के सिद्धांत और आचरण। इस किताब को लिखने के लिए ऐलन वॉटस ने झेन पर लिखी हुई सारी अंग्रेजी किताबों को तो पढ़ा ही, और साथ में चीन के पुराने रिकार्डो को भी देखा। क्‍योंकि उसका मानना है कि झेन चीनी प्रज्ञा के अधिक करीब है बजाएं जापान के। झेन की जो गहराई है उसका स्‍त्रोत चीन है। जापान उथला है और बहुत कुछ अमरीकी संस्‍कृति जैसा है।</p>
<p>      पहले भाग में ताओ दर्शन और झेन बुद्धिज़्म के विकास का वर्णन है क्‍योंकि झेन ताओ से उपजा है। किताब के प्रारंभ में ऐलन वॉटस ने झेन बुद्धिज़्म का वर्णन इन शब्‍दों में किया है।</p>
<p>      ‘’झेन बुद्धिज़्म जीवन की एक शैली और मार्ग है जो किसी भी आधुनिक पाश्‍चात्‍य विचार में सम्‍मिलित नहीं हो सकता। वह न तो धर्म है और न दर्शन, यह न मनोविज्ञान है न विज्ञान की कोई शाखा। चीन और भारत में जिसे मोक्ष का मार्ग कहते है, वह इसका उदाहरण है। और इसीलिए वह ताओ वाद, वेदांत और योग से मिलता-झूलता है। मोक्ष मार्ग की सकारात्‍मक परिभाषा नहीं हो सकती। उसे ऐसे कहा जा सकता है कि वह नहीं है—ठीक ऐसे ही जैसे शिल्‍पकार पत्‍थर के टुकड़े हटाकर मूर्ति को खोदता है।‘’</p>
<p>      झेन ताओ से अधिक जुड़ा है क्‍योंकि बौद्ध मत जब पैदा हुआ तब ताओ वाद दो हजार साल पुराना हो चुका था। और विशाल वृक्ष की भांति फैल गया था। और इस प्रचीन चीनी प्रज्ञा प्रवाह में बौद्ध मत की नई धारा शामिल हुई। ताओ ने उसे आत्‍मसात कर लिया। इसीलिए ताओ वाद की गहनता, रहस्‍यवाद, विरोधाभास, सरलता और सहजता झेन बुद्धिज़्म के रक्‍त मांस मज्‍जा बने। और इसीलिए झेन कभी धर्म या संप्रदाय नहीं बन पाया। उसका संगठन नहीं बना, वह जीवन शैली ही बना रहा। और पश्‍चिम को इसी बात ने आकर्षित किया। पश्‍चिम के लोग संगठित धर्म, नैतिकता, उपदेश, पाप-पूण्‍य, चर्च इनसे ऊबे हुए थे। उन्‍हें झेन की पर्वतों से आयी हुई हवा की ताजी लहर बहुत भायी।</p>
<p>      झेन का अपना अनूठा स्‍वाद है, सुगंध है। माना कि उसका स्‍त्रोत बुद्धिज़्म है फिर भी वह उससे बिलकुल अलग हो गया। पहले तो चीन में जाकर वह ताओ वाद के रंग में रंग गया और बाद में जापान में जाकर उसकी शक्‍ल पूरी ही बदल गई, इतनी की उसे बौद्ध प्रवाह की एक धारा कहना भी मुश्‍किल मालूम होता है। न कोई क्रिया कांड, न संप्रदाय, न ध्‍यान की विधियां। न व्रत या जप-तप। झेन, बुद्धत्‍व के साथ सीधा संस्‍पर्श है। बौद्ध मत में बोधि या जागरण अत्‍यंत कठिन, अति मानवीय है। झेन में अगर कोई कठिनाई है तो वह है—वह बहुत सीधा-सादा है।</p>
<p>      झेन के उदय और विकास का इतिहास लिखने के बाद किताब के दूसरे भाग में प्रत्‍यक्ष झेन बताया गया है। झेन के विषय में ऐलन वॉटस की समझ सचमुच बहुत गहरी है। उसने लिखा है कि झेन का बेबूझ विरोधाभाष समझ में आये इसके लिए सापेक्षता को समझना जरूरी है। दो विपरीत ध्रुवों के बीच जो संबंध है, वह है झेन। जैसे, सफल होने का मतलब है असफल होना; इन अर्थों में कि व्‍यक्‍ति जितना सफल होता है उतना उसकी सदा सफल होने की भूख बढ़ती जाती है।  खाने का मतलब है, भूखा होने के लिए जीवित रहना।</p>
<p>      झेन गुरूओं का अतार्किक भाषण बुद्धिजीवी मस्‍तिष्‍क को एक चक्‍कर में डाल देता है। ऐसे अनेक गुरु शिष्‍य संवाद कहानियों के रूप में यहां प्रस्‍तुत किये गये है। झेन का अजीबोगरीब चेहरा इन कहानियो में जितना प्रकट होता है उतना और कहीं भी नहीं होता। मसलन,</p>
<p>      एक बार मात्‍सु और पो चांग सैर करने गये थे। तभी उन्‍होंने जंगली बत्‍तखों को ऊपर उड़ते हुए देखा।</p>
<p>      मात्सु ने पूछा: ‘’वे क्‍या है?’’</p>
<p>      ‘’जंगली बत्‍तख, ‘’पो-चांग ने कहां।‘’</p>
<p>      पो-चांग ने कहा, ‘’वे तो उड़ गये।‘’</p>
<p>      मात्सु ने पो-चांग की नाक को मरोड़ दिया।</p>
<p>पो-चांग पीड़ा से चीख उठा।</p>
<p>      ‘’वे ऐसे कैसे उड़ गये?’’ मात्‍झ़ु चिल्लाया।</p>
<p>      वह पो-चांग को जगाने का क्षण था।</p>
<p>      अंतिम दो परिच्‍छेदों में झेन के अन्‍य अंग जैसे झा झेन, कुआन (पहेली) और कला के संबंध में खुबसूरत विवरण है। वह वाकई अपने आप में एक कुआन है कि बाहर से इतनी रूखी-सूखी प्रतीत होनेवाली झेन शैली ने एक से एक नाजुम और नफीस कला को जन्‍म दिया। चित्रकला, हाइकु, चाय समारोह, बग़ीचे, ये सब झेन के स्‍त्रैण अंग कहे जा सकते है।</p>
<p>      झेन का सार क्‍या है? ऐलन वॉटस बहुत कुशल चित्रकार की तरह इन वाक्‍यों में झेन का सारांश चित्रित करता है—‘’झेन का कोई लक्ष्‍य नहीं है। वह एक यात्रा है जिसका कोई गंतव्‍य नहीं है। यात्रा करना जीवंतता का प्रतीक है लेकिन कहीं पहुंचना मृत्‍यु है। यह आधुनिक संसार जिसमे मंज़िलें ही मंज़िलें है और उनके बीच कोई यात्रा नहीं, यह जगत जिसमे कहीं पहुंचने की ही कीमत है, तेज से तेज रफ्तार से इस जगत में कोई सार नहीं।</p>
<p>      ये शब्‍द ऐलन वॉटस ने आज से 45 वर्ष पहले लिखे थे। और आज हम इसी नि: सार जगत में जी रहे है। सभी लोग कही न कहीं पहुँचना चाहते है। यात्रा में किसी को रस नहीं है। इस खोखले, तनावपूर्ण विश्‍व में क्‍या झेन ही एकमात्र आशा नहीं है?</p>
<p><strong>ओशो का नज़रिया&#8211;</strong></p>
<p>      मैं एक आदमी को, उसकी सभी किताबों के साथ सम्‍मिलित करना चाहता हूं। उसका नाम है ऐलन वॉटस1 मैंने इस आदमी से बेहद प्रेम किया है। मैंने बुद्ध से प्रेम किया है किन्‍हीं और कारणों से। मैंने सोलोमन से प्रेम किया और कारणों से। वे प्रबुद्ध थे। ऐलन वॉटस नहीं है। वह अमरीकी है&#8230;.पैदाइशी नहीं, वह उसकी एकमात्र आशा है। वह सिर्फ वहां रहने गया। लेकिन उसने बहुत कीमती किताबें लिखी। ‘’दि वे ऑफ झेन’’ को अत्‍यंत महत्‍व पूर्ण किताबों में शामिल करना चाहिए।</p>
<p>      ‘’दिस इज़ इट’’ बहुमूल्‍य खूबसूरत रचना है। जिसमे उसकी समझ दिखाई देती है। और ये ऐसे आदमी ने लिखी है जो अभी जागा नहीं है। इसलिए सह और भी प्रशंसा योग्‍य है।</p>
<p>      जब तुम जाग जाते हो तब तुम जो भी करते हो वह सुंदर होता है। होना ही चाहिए। लेकिन जब तुम प्रबुद्ध नहीं हो, अंधेरे में टटोल रहे हो, और फिर भी अगर प्रकाश का एक छोटा सा झरोखा खोज लेते हो तो वह बहुत बड़ी बात है। अद्भुत है। ऐलन वॉटस शराबी था लेकिन बुद्धत्‍व के बहुत करीब था।</p>
<p>      एक समय ऐसा थ जब वह दीक्षित ईसाई पादरी था—कैसा दुर्भाग्‍य। लेकिन उसने उसका त्‍याग कर दिया। धर्मगुरू का पद छोड़ने का साहस बहुत कम लोगों में होता है। क्‍योंकि उसके साथ संसार की बहुत सी सुविधाएँ मिलती हे। उसने वह सब कुछ छोड़ दिया और साधारण हो गया। वह मुझे बोधिधर्म, बाशो और रिंझाई की याद दिलाता है।</p>
<p>      ऐलन वॉटस बुद्ध हुए बगैर बहुत दिन नहीं रह सकता। वह अब मर चूका है&#8230;.लेकिन मेरे पास आने के लिए तैयार हो रहा होगा। मैं इन सब लोगों की प्रतीक्षा कर रहा हूं। ऐलन वॉटस उनमें से एक है।</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>बुक्‍स आय हैव लव्‍ड</strong></p>
<br />Filed under: <a href='http://oshosatsang.org/category/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%af-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%a4%e0%a4%95%e0%a5%87/'>ओशो की प्रिय पूस्‍तके--</a> Tagged: <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/'>ओशो</a>, <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6/'>स्‍वामी आनंद प्रसाद</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/oshosatsang.wordpress.com/4303/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/oshosatsang.wordpress.com/4303/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/oshosatsang.wordpress.com/4303/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/oshosatsang.wordpress.com/4303/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/oshosatsang.wordpress.com/4303/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/oshosatsang.wordpress.com/4303/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/oshosatsang.wordpress.com/4303/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/oshosatsang.wordpress.com/4303/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/oshosatsang.wordpress.com/4303/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/oshosatsang.wordpress.com/4303/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/oshosatsang.wordpress.com/4303/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/oshosatsang.wordpress.com/4303/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/oshosatsang.wordpress.com/4303/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/oshosatsang.wordpress.com/4303/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4303&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://oshosatsang.org/2012/01/22/%e0%a4%90%e0%a4%b2%e0%a4%a8-%e0%a4%b5%e0%a5%89%e0%a4%9f%e0%a4%b8-%e0%a4%a6%e0%a4%bf-%e0%a4%b5%e0%a5%87-%e0%a4%91%e0%a4%ab-%e0%a4%9d%e0%a5%87%e0%a4%a8/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>1</slash:comments>
		<georss:point>28.621671 77.162177</georss:point>
		<geo:lat>28.621671</geo:lat>
		<geo:long>77.162177</geo:long>
		<media:content url="http://1.gravatar.com/avatar/18ba8ff7182a19f3392c7e668fd1934c?s=96&#38;d=identicon&#38;r=G" medium="image">
			<media:title type="html">anandprashad</media:title>
		</media:content>
	</item>
		<item>
		<title>दि साइकोलाजी ऑफ-मैन्‍स पॉसिबल इवोलुशन—(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)</title>
		<link>http://oshosatsang.org/2012/01/09/%e0%a4%a6%e0%a4%bf-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a5%80-%e0%a4%91%e0%a4%ab-%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b8-%e0%a4%aa%e0%a5%89/</link>
		<comments>http://oshosatsang.org/2012/01/09/%e0%a4%a6%e0%a4%bf-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a5%80-%e0%a4%91%e0%a4%ab-%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b8-%e0%a4%aa%e0%a5%89/#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 09 Jan 2012 13:12:09 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[ओशो की प्रिय पूस्‍तके--]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://oshosatsang.org/?p=4300</guid>
		<description><![CDATA[पी. डी. ओस्पेंस्की&#8211; (मनुष्‍य का संभावित विकास) पी. डी. ओस्पेंस्की बीसवीं सदी के विख्‍यात रहस्‍यदर्शी गुरजिएफ का प्रधान शिष्‍य था। वह अत्‍यंत विद्वान और प्रतिभाशाली तो था ही, उसे शब्‍दों की बादशाहत भी हासिल थी। उसने आध्‍यात्‍मिक जगत की खोजों &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/01/09/%e0%a4%a6%e0%a4%bf-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a5%80-%e0%a4%91%e0%a4%ab-%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b8-%e0%a4%aa%e0%a5%89/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4300&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पी. डी. ओस्पेंस्की&#8211; (मनुष्‍य का संभावित विकास)</strong> </p>
<p>     पी. डी. ओस्पेंस्की बीसवीं सदी के विख्‍यात रहस्‍यदर्शी गुरजिएफ का प्रधान शिष्‍य था। वह अत्‍यंत विद्वान और प्रतिभाशाली तो था ही, उसे शब्‍दों की बादशाहत भी हासिल थी। उसने आध्‍यात्‍मिक जगत की खोजों पर एक से एक अद्भुत किताबें लिखी है। यक किताब ‘’दि सॉयकॉलाजी ऑफ मैन्‍स पॉसिबल इवोलुशन’’ ओस्पेंस्की की सबसे छोटी किताब है। वस्‍तुत: यह उसके पाँच व्‍याख्‍यानों का संकलन है जो उसने लंदन में 1934 के दौरान दिये।<span id="more-4300"></span></p>
<p>      पी. डी. ओस्पेंस्की के व्‍याख्‍यानों का विषय है, ‘’मनोविज्ञान का अध्‍ययन।‘’ बीसवीं सदी से पहले मनोविज्ञान एक स्‍वतंत्र विषय नहीं था। वह धर्म ओर अध्यात्मिक का हिस्‍सा था। हजारों साल तक विश्‍व के सारे पुराने ग्रंथ, भारत के योग सूत्र और छहों दर्शन, सभी कुछ मनोविज्ञान का हिस्‍सा थे। लेकिन इस नाम से मनोविज्ञान कभी अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पाया। न जाने क्‍यों उसके बारे में यही धारण थी कि वह विकृति है और उसमे कुछ गलत है। मनोविज्ञान को दर्शन शास्‍त्र से घटिया माना जाता था जबकि वे सारे शास्‍त्र चाहे सांख्‍य हो, योग हो, सूफी देशना हो, क्‍या मानवीय मन का ही विज्ञान नहीं बताते?</p>
<p>      इसके अलावा काव्‍य शास्‍त्र नाटय शास्‍त्र, कला, सौंदर्य शास्‍त्र भी मन की विभिन्‍न स्‍थितियों का वर्णन ही तो है। फिर भी आज तक मन को एक अलग स्‍वतंत्र वस्‍तु की तरह कभी मान्‍यता प्राप्‍त नहीं हुई। जो बीसवीं सदी में मिली। पहली बार यह घटना घटी है कि अब धर्म गुरूओं या दार्शनिकों की बनिस्‍बत मनोवैज्ञानिक की प्रतिष्‍ठा ज्‍यादा है। इस सदी में मनोविज्ञान की इतनी शाखाएं और इतने मनोवैज्ञानिक पैदा हुए कि उनकी चकाचौंध ने उन सब धार्मिक संदर्भों को धूमिल कर दिया जिनकी छाया में मनोविज्ञान चलता था।</p>
<p>      इस पृष्‍ठभूमि को साफ-साफ प्रस्‍तुत करने के बाद ओस्पेंस्की अपने लेखों की दशा-निर्देश करता है। वह दो प्रश्‍नों की खोज कर रहा है: एक कि मनुष्‍य का विकास याने क्‍या? और दूसरा, क्‍या उसके लिए कोई खास स्‍थितियों का होना जरूरी है?</p>
<p>      डार्विन का विकास सिद्धांत या मनुष्‍य की उत्पती और विकास की और कोई थ्योरी ऑस्पेन्सकी स्‍वीकार नहीं करता। क्‍योंकि मनुष्‍य की परंपरा, पुराने शास्‍त्र, अवशेष यही दर्शाते है कि हमसे भी विकसित लोग है पृथ्‍वी के परे।</p>
<p>      फिर मनुष्‍य के विकास का अर्थ क्‍या है? एक तो यह विकास अपने आप, यंत्रवत नहीं होता। प्रकृति एक बिंदु तक उसे ले आती है और उसके बाद उसे छोड़ देती है। अगर वह चाहे तो अपने प्रयासों से ऊपर उठ सकता है। या जैसा पैदा हुआ वैसा ही मर सकता है। वक्‍त के इस चौराहे पर आकर मनुष्‍य के विकास का मतलब है उसके आंतरिक गुणों, संभावनाओं का विकास और इसके लिए उसे अधिक सावचेत, अधिक सजग होना जरूरी है। क्‍योंकि मनुष्‍य सरलता से सजग हो सकता है।</p>
<p>      मनुष्‍य की सजगता को नापने के लिए ओस्‍पेंस्‍की ने बड़ा सरल प्रयोग बताया है। एक घड़ी लेकर उसकी सेकंड की सुई पर ध्‍यान दें और अपने आपको स्‍मरण करने का प्रयास करें। ध्‍यान कहीं और न जाने दें। बस स्‍वयं का होना और घड़ी की सरकती हुई सुई। यदि आप एकाग्र होकर लगे रहे तो मुश्‍किल से दो मिनट होश रख पाएंगे, उससे अधिक नहीं। यह आपकी सजगता की सीमा है। इस प्रयोग से यही सिद्ध होता है कि मनुष्‍य को अपना होश नहीं है।</p>
<p>      मनुष्‍य की देह भर से कोई मनुष्‍य नहीं हो जाता। ओस्‍पेंस्‍की सभी मनुष्‍यों को सात श्रेणियों में बाटता है। उन्‍हें वह मनुष्‍य न. 1, मनुष्‍य न.-2, इस तरह नाम देता है। ये भेद किस आधार पर किये गये है? उनमें जो हिस्‍सा प्रधान है उसके आधार पर। मनुष्‍य न.-1, सिर्फ शरीर के तल पर नैसर्गिक प्रवृतियों में जीता है। मनुष्‍य न.-2, में भावनाओं की प्रबलता होती है। नंबर तीन में—मनुष्‍य बुद्धि प्रधान होता है, मनुष्‍य जाती में अकसर ये तीन प्रकार के ही मनुष्‍य पाये जाते है। चौथे, नंबर का मनुष्‍य आध्‍यात्‍मिक विद्यालयों में, अनेक साधना पद्धतियों से गुजरने के बाद तैयार होता है। उसकी विशेषता यह है कि उसे अपना होश होता है। वह स्‍वयं के प्रति जागने लगता है।</p>
<p>      इसके बाद के तीन नंबर मनुष्‍य चेतना की उच्‍चतर विकास की स्थितियाँ है। सातवें नंबर का मनुष्‍य वह है जिसने वह सब पा लिया जो मनुष्‍य पा सकता है। उसके बाद कुछ शेष नहीं रहता।</p>
<p>झूठ बोलना क्‍या है?</p>
<p>      जैसा कि सामान्‍य भाषा में समझा जाता है। झूठ बोलने का अर्थ सच को विकृत करना या कुछ मौक़ों पर सच को, या जिसे लोग सच मानते है उसे छूपाना। जीवन में झूठ बोलने का स्‍थान बहुत बड़ा है। लेकिन झूठ बोलने के कई बदतर तरीके भी है जब लोगों को पता नहीं चलता कि वे झूठ बोलते है। पिछले व्‍याख्‍यान में मैंने कहा था हम जैसे है वैसे सच को नहीं जा सकते और उसे केवल वस्‍तुगत चेतना की दशा में ही जान सकते है।</p>
<p>      फिर हम झूठ कैसे बोल सकते है? यहां विरोधाभास मालूम पड़ता है। लेकिन वास्‍तव में है नहीं। हम सच को जान नहीं सकते। लेकिन दिखा सकते है। कि जानते है। और यही झूठ बोलना है। झूठ बोलना हमारे पूरे जीवन में छाया हुआ है। लोग दिखावा करते है कि वे हर तरह की बातें जानते है जैसे ईश्‍वर, भविष्‍य, विश्‍व के संबंध में, मनुष्‍य की उत्पती के बारे में, विकास क्रम—हर चीज के बारे में, लेकिन यथार्थ में वे कुछ भी नहीं जानते, स्‍वयं के बारे में भी नहीं और हर बार जब वे उस विषय के बारे में ऐसे बात करते है जिसके बारे में नहीं जानते मानो वे जानते है। वे झूठ बोलते है। फलत: झूठ का अध्‍ययन करना मनोविज्ञान का अहम विषय बनता है।</p>
<p>      और उससे मनोविज्ञान की तीसरी परिभाषा भी बन सकती है: झूठ बोलने का अध्‍ययन।</p>
<p>      मनोविज्ञान उन झूठों में रूचि लेता है जो आदमी अपने बारे में बोलता है और सोचता है। ये झूठ मनुष्‍य को समझना मुश्‍किल बना देती है। मनुष्‍य जैसा है वैसा प्रामाणिक चीज नहीं है। वह किसी चीज की नकल है। और बड़ी बुरी नकल।</p>
<p>      मनुष्‍य को लेकिन मनोविज्ञान की यही स्‍थिति है। उसे नकली मनुष्‍य का अध्‍ययन करना पड़ता है यह जाने बगैर कि असली मनुष्‍य कैसा है। स्‍वभावत: मनुष्‍य जैसे जीव का अध्‍ययन करना आसान नहीं हो सकता। क्‍योंकि वह यही नहीं जानता कि उसमे असली क्‍या है। और कल्‍पनागत क्‍या है। अंत: मनोविज्ञान को असली और नकली मनुष्‍य में फर्क करके शुरूआत करनी पड़ेगी। मनुष्‍य का, एक संपूर्ण इकाई की तरह अध्‍ययन करना असंभव है, क्‍योंकि मनुष्‍य दो हिस्‍सों में बंटा हुआ है—एक जो कुछ मामलों में लगभग वास्‍तविक है, और दूसरा हिस्‍सा, जो कुछ मामलों में लगभग एकदम कल्‍पनागत होगा। अधिकांश सामान्‍य जनों में वे दो हिस्‍से मिले जूले होते है। उन्‍हें अलग से जानना आसान नहीं होता जबकि वे दोनों ही मौजूद होते है। और उन दोनों का अपना अर्थ और परिणाम होता है।</p>
<p>      हम जिस प्रणाली का अध्‍यन कर रहे है उसके तहत इस स्‍थिति को इसेंस, अर्क और पर्सनैलिटी, व्‍यक्‍तित्‍व कहा जाता है।</p>
<p>      अर्क वह है जो मनुष्‍य के साथ पैदा होता है। व्‍यक्‍तित्‍व वह है जो अर्जित किया जाता है। अर्क उसका अपना होता है। व्‍यक्‍तित्‍व वह है जो उसका अपना नहीं होता। अर्क खोता नहीं, बदलता नहीं, या उसे आसानी से चोट नहीं पहुँचाई जा सकती। जैसे व्‍यक्‍तित्‍व को पहुंचायी जा सकती है। व्यक्तित्व को करीब-करीब पूरा बदला जा सकता है। अगर हालात बदले जायें। वह खोया जा सकता है या टूट-फूट सकता है।</p>
<p>      यदि मैं अर्क का वर्णन करने की कोशिश करूं तो सबसे पहले मुझे कहना होगा कि यह मनुष्‍य के शारीरिक और मानसिक गठन की बुनियाद है। उदाहरण के लिए एक आदमी स्‍वभावत: एक अच्‍छा नाविक है, दूसरा बुरा नाविक है; एक सुरीला है, दूसरा नहीं है, किसी के पास भाषाओं की क्षमता है, दूसरे के पास नहीं है। यह अर्क है।</p>
<p>      व्‍यक्‍तित्‍व वह सब है जो किसी ने किसी प्रकार से सीखा गया है—याने कि सामान्‍य भाषा में चेतन या अचेतन रूप से—‘’अचेतन’’ का अर्थ अधिकतर ‘’नकल’’ होता है। व्‍यक्‍तित्‍व बनाने में नकल का बहुत बड़ा हाथ होता है।</p>
<p>      व्‍यक्‍तित्‍व ओर अर्क, इसेंस—ये दो शब्‍द गुरजिएफ के है। वह अकसर लोगों का इसेंस, उनका वजूद देखने के लिए बहुत से प्रयोग करता था। जिसका कोई वजूद है वही ध्‍यान की कठिन तपस्‍या से गुजर सकता है। अकसर देखा गया है कि पढ़े लिखे, सुसंस्‍कृत लोगों का व्‍यक्‍तित्‍व तो विकसित होता है लेकिन उनका वजूद एकदम बचकाना होता है। ग्रामीण लोगों में कई बार विकसित अर्क या वजूद दिखाई देता है। लेकिन उनका व्‍यक्‍तित्‍व जार भी नहीं होता।</p>
<p>      व्‍यक्‍तित्‍व एक यंत्र है, इसलिए विकसित व्‍यक्‍तित्‍व के लोग और आम लोग यंत्रवत जीते है। यदि यंत्रवत जीने से ऊब कर मनुष्‍य आत्‍म विकास करना चाहता है तो उसमें उसके बड़े शत्रु है कल्‍पना और दुर्भाव। ये दोनों उसे स्‍वयं की सच्‍चाई जानने नहीं देते। इनकी पर्तें  बीच में खड़ी हो जाती है। नकारात्‍मक भाव इतने प्रबल होते है कि उनका प्रकोप होने पर इनका निरीक्षण करना असंभव होता है। आदमी को ये बहा ले जाते है।</p>
<p>      मनुष्‍य की यांत्रिकता चार बातों में प्रगट होती है—झूठ बोलना, कल्‍पना करना, नकारात्‍मक भावों को व्यक्त करना। और व्‍यर्थ बोलना। इस यांत्रिकता के प्रति वह अपने बलबूते पर जाग नहीं सकता क्‍योंकि वह बार-बार सो जाता है। उसे कोई जगाने वाला चाहिए।</p>
<p>      ओस्‍पेंस्‍की के लेखे नकारात्‍मक भाव एकदम व्‍यर्थ है—उनकी कोई जरूरत नहीं है। लेकिन यह भी सच है कि वे है, और कुछ लोग तो उन्‍ही के सहारे जीते है। यदि उनसे उनकी नफरत या क्रोध या दुख छीन लो तो वे टूट जायेगे। जी नहीं पायेंगे। मनुष्‍य का साहित्‍य, कला इन भावों का ही काव्‍यात्‍मक, सतरंगा चित्रण है।</p>
<p>      तो फिर मनुष्‍य अपना विकास कैसे करे, अपने आप पर काम कैसे करे? एक ही उपाय है—अपना स्‍मरण करके। अपना स्‍मरण, सतत स्‍मरण मुश्‍किल मालूम होता है। क्‍योंकि हमारी समझ कम है। यहां पर ओस्‍पेंस्‍की ज्ञान और अंतस में फर्क करता है। ज्ञान सूचनाओं  के संग्रह से इकट्ठा होता है। लेकिन समझ अंतस से पैदा होती है।</p>
<p>      पाँच व्‍याख्‍यानों में तरह-तरह से मनुष्‍य के मनोविज्ञान की चर्चा करने के बाद सबका सार निचोड़ वह एक ही शब्दों में ले आता है और है ‘’Self remembrance” स्‍वयं का स्‍मरण। यदि आप पल-पल आत्‍म स्मरण से भरे है तो आपको मनोविज्ञान जानने समझने की कोई जरूरत नहीं रह जाती। वह ऐसी चीज है जिसे पाकर सब पा लिया जाता है।</p>
<p><strong>ओशो का नज़रिया:</strong></p>
<p>      मुझे ओस्‍पेंस्‍की की किताबें हमेशा अच्‍छी लगी है। हालांकि मुझ वह आदमी कभी अच्‍छा नहीं लगा। वह स्‍कूल के शिक्षक जैसा दिखता था। सदगुरू की तरह नहीं।</p>
<p>      मुझे ओस्‍पेंस्‍की पसंद नहीं है। जब वह गुरजिएफ की देशना पर व्‍याख्‍यान देता था तब भी वह ब्‍लैक बोर्ड के आगे हाथ में खड़िया लेकर खड़ा हो जाता था। सामने एक मेज और कुर्सी, चश्‍मा चढ़ाकर। कुछ भी बाकी नहीं था। और जिस तरह से वह सिखाता था&#8230;.मैं समझता हूं कि उसकी और इतने कम लोग आकर्षित क्‍यों होते थे, जब कि वह स्‍वर्णिम संदेश ला रहा था।</p>
<p>      दूसरी बात, मैं उसे इसलिए पसंद नहीं करता क्‍योंकि वह जूदास था, उसने धोखा दिया। जो धोखा देता है उसे मैं पसंद नहीं कर सकता। धोखा देना आत्‍महत्‍या करने जैसा है, आध्‍यात्‍मिक आत्‍महत्‍या। ओस्‍पेंस्‍की से मुझे  कोई इश्‍क नहीं है। लेकिन मैं क्‍या करूं? यह एक सक्षम लेखक था, प्रतिभाशाली था, जीनियस था।</p>
<p>      यह किताब जिस का में जिक्र करने जा रहा हूं, वह उसके मरणोपरांत प्रकाशित हुई। वह कतई नहीं चाहता था कि उसके जीवन काल में वह छपे। शायद वह डर रहा था कि हो सकता है यह किताब उसकी अपेक्षाओं को पूरा न करे।</p>
<p>      यह छोटी सी किताब है, और इसका नाम है ‘’दि सॉयकॉलाजी ऑफ मैन पॉसिबल इवोलुशन’’। उसने अपनी वसीयत में लिखा था कि यह किताब मेरे मरने के बाद प्रकाशित हो। मुझे यह आदमी पसंद नहीं है। लेकिन कहना पड़ेगा मेरे बावजूद कि इस किताब में उसने करीब-करीब मेरी और मेरे संन्‍यासियों की भविष्‍यवाणी की थी। उसने भविष्‍य के मनोविज्ञान के बारे में लिखा, और यहां मैं कर रहा हूं—भविष्‍य का मनुष्‍य , नया मनुष्‍य।</p>
<p>      मेरे सभी संन्‍यासियों को इस छोटी सी किताब का अध्‍ययन करना चाहिए।</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>बुक्‍स आय हैव लव्‍ड</strong></p>
<br />Filed under: <a href='http://oshosatsang.org/category/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%af-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%a4%e0%a4%95%e0%a5%87/'>ओशो की प्रिय पूस्‍तके--</a> Tagged: <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/'>ओशो</a>, <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6/'>स्‍वामी आनंद प्रसाद</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/oshosatsang.wordpress.com/4300/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/oshosatsang.wordpress.com/4300/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/oshosatsang.wordpress.com/4300/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/oshosatsang.wordpress.com/4300/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/oshosatsang.wordpress.com/4300/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/oshosatsang.wordpress.com/4300/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/oshosatsang.wordpress.com/4300/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/oshosatsang.wordpress.com/4300/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/oshosatsang.wordpress.com/4300/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/oshosatsang.wordpress.com/4300/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/oshosatsang.wordpress.com/4300/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/oshosatsang.wordpress.com/4300/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/oshosatsang.wordpress.com/4300/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/oshosatsang.wordpress.com/4300/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4300&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://oshosatsang.org/2012/01/09/%e0%a4%a6%e0%a4%bf-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a5%80-%e0%a4%91%e0%a4%ab-%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b8-%e0%a4%aa%e0%a5%89/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>1</slash:comments>
		<georss:point>28.621671 77.162177</georss:point>
		<geo:lat>28.621671</geo:lat>
		<geo:long>77.162177</geo:long>
		<media:content url="http://1.gravatar.com/avatar/18ba8ff7182a19f3392c7e668fd1934c?s=96&#38;d=identicon&#38;r=G" medium="image">
			<media:title type="html">anandprashad</media:title>
		</media:content>
	</item>
		<item>
		<title>सूक्ष्‍म शरीर का जगत—ओशो (भाग&#8211;3)</title>
		<link>http://oshosatsang.org/2012/01/09/%e0%a4%b8%e0%a5%82%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%b6%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a4%97%e0%a4%a4-%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b-3/</link>
		<comments>http://oshosatsang.org/2012/01/09/%e0%a4%b8%e0%a5%82%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%b6%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a4%97%e0%a4%a4-%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b-3/#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 09 Jan 2012 01:08:47 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[प्रशन चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://oshosatsang.org/?p=4295</guid>
		<description><![CDATA[प्रश्‍न—क्‍या हम अपने अतीत के जन्‍मों को जान सकते है? ओशो—निश्‍चित ही जान सकते है। लेकिन अभी तो आप इस जन्‍म को भी नहीं जानते है, अतीत के जन्‍मों को जानना तो फिर बहुत कठिन है। निश्‍चित ही मनुष्‍य जान &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/01/09/%e0%a4%b8%e0%a5%82%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%b6%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a4%97%e0%a4%a4-%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b-3/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4295&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>प्रश्‍न—क्‍या हम अपने अतीत के जन्‍मों को जान सकते है?</strong></p>
<p><strong>ओशो—</strong>निश्‍चित ही जान सकते है। लेकिन अभी तो आप इस जन्‍म को भी नहीं जानते है, अतीत के जन्‍मों को जानना तो फिर बहुत कठिन है। निश्‍चित ही मनुष्‍य जान सकता है। अपने पिछले जन्‍मों को। क्‍योंकि जो भी एक बार चित पर स्‍मृति बन गई है, वह नष्‍ट नहीं होती। वह हमारे चित के गहरे तलों में अनकांशस हिस्‍सों में सदा मौजूद रहती है। हम जो भी जान लेते है कभी नहीं भूलते।<span id="more-4295"></span></p>
<p>      अगर मैं आपसे पुछूं कि उन्‍नीस सौ पचास में एक जनवरी को आपने क्‍या किया था? तो शायद आप कुछ भी न बता सके, आपको कुछ भी याद न हो। आप कहेंगे की मुझे तो कुछ भी याद नहीं है? एक जनवरी उन्‍नीस सौ पचास, कुछ भी ख्‍याल में नहीं आता।</p>
<p>      लेकिन अगर आपको सम्‍मोहित किया जा सके, हिप्रोटाइज किया जा सकें—और सरलता से किया जा सकता है—और आपको बेहोश करके पूछा जाए कि एक जनवरी उन्‍नीस सौ पचास में अपने क्‍या किया? तो आप सुबह से सांझ तक का ब्‍यौरा इस तरह सक बता देंगे जैसे अभी वह एक जनवरी आपके सामने से गुजर रही है। आप यह भी बता देंगे कि एक जनवरी को सुबह जो मैंने चाय पी थी उसमे थोड़ी शक्‍कर कम थी। आप यह भी बता देंगे की जिस आदमी ने मुझे चाय दि थी, उस आदमी के शरीर से पसीने की बदबू आ रही थी। आप इतनी छोटी बातें बता देंगे कि जो जूता मैंने पहने हुए था वह मेरे पेर में काट रहा था।</p>
<p>      सम्मोहित अवस्‍था में आपके भीतर की स्‍मृति को बहार लाया जा सकता है। मैंने उस दिशा में बहुत से प्रयोग किये है। इसलिए आपसे कहता हूं। और जिस मित्र को भी इच्‍छा हो अपने पिछले जन्‍मों में जाने की, उसे ले जाया जा सकता है।</p>
<p>      लेकिन पहले उसे इसी जन्‍म में पीछे लौटना पड़ेगा। इस जन्‍म की ही स्‍मृतियों में पीछे लौटना पड़ेगा। वहां तक पीछे लौटना पड़ेगा, जहां वह मां के पेट में कंसीव हुआ। गर्भ-धारण हुआ। और बाद में फिर दूसरे जन्‍मों की स्‍मृतियों में प्रवेश किया जा सकता है।</p>
<p>      लेकिन ध्यान प रहे, प्रकृति ने पिछले जन्‍मों की व्‍यवस्‍था आकारण नहीं कर रखी है। कारण बहुत महत्‍व पूर्ण है। और पिछला जन्‍म तो दूर है, अगर आपको इस महीने की भी सारी बातें याद रह जाये, तो आप पागल हो जायेंगे। एक दिन की भी अगर सुबह से सांझ तक की सारी बातें याद रह जाएं तो आप जिंदा नहीं रह सकते।</p>
<p>      तो प्रकृति की सारी व्‍यवस्‍था यह है कि आपका मन कितने तनाव झेल सकता है। उतनी ही स्‍मृति आपके भी तर शेष रहने दी जाती है। शेष अंधेरे गर्त में डाल दि जाती है। जैसे घर में कबाड़-घर होता है। डालकर दरवाजा बंद कर दिया है। वैसे ही स्‍मृति का एक कलेक्‍टिव हाऊस है, एक अनकांशस घर है, एक अचेतन घर है, जहां स्‍मृति में जो बेकार होता है, जिसे चित में रखने की कोई जरूरत नहीं है, वह सब संग्रहीत होता रहता है। लेकिन अगर कोई आदमी अनजाने , बिना समझे हुए उस घर में प्रविष्‍ट हो जाए तो तत्‍क्षण पागल हो जाएगा। इतनी ज्‍यादा है वे स्‍मृतियां।</p>
<p>      एक महिला मेरे पास प्रयोग करती थी। उनको बहुत इच्‍छा थी कि वे पिछले जन्‍मों को जानें। मैंने उन्‍हें कहा कि यह हो सकता है। लेकिन आगे की जिम्‍मेवारी समझ लेनी चाहिए। क्‍योंकि हो सकता है पिछले जन्‍म को जानने से आप बहुत चिंतित हो जाए। और अधिक परेशान हो जाएं। उन्‍होंने कहा कि नहीं, ‘’मैं क्‍यों परेशान होऊंगी? पिछला जन्‍म तो हो चुका है, अब क्‍या फिक्र की बात।</p>
<p>      उन्‍होंने प्रयोग शुरू किया। वे एक कालेज में प्रोफेसर थी। बुद्धिमान थी, समझदार थी, हिम्‍मतवर थी। उन्‍होंने प्रयोग शुरू किया। और जिस भांति मैंने कहा, उन्‍होंने गहरे से गहरे मेडिटेशन किए। गहरे से गहरा ध्‍यान किया। धीरे-धीरे स्‍मृति के नीचे की पर्तों को उघाड़ना शुरू किया। और एक दिन जिस दिन पहली बार उन्‍हें पिछले जन्‍म में प्रवेश मिला, वे भागती हुई मेरे पास आई, उसके हाथ पैर कांप रहे थे। आँख से आंसू बह रहे थे। वे एकदम छाती पीटकर रोने लगी और कहने लगी कि मैं भूलना चाहती हूं उस बात को जो मुझे याद आ रही है। मैं पिछले में अब आगे नहीं जाना चाहती।</p>
<p>      मैंने कहा, अब मुश्‍किल है, जो याद आ गई उसे भूलने में फिर बहुत वक्‍त लग जायेगा। लेकिन इतनी घबराहट क्‍यों?</p>
<p>      उन्‍होंने कहां, कि नहीं-नहीं, मत पूछिये, मैं तो सोचती थी कि मैं बहुत पवित्र हूं, बहुत सच्‍चरित्र हूं, लेकिन पिछले जन्‍म में एक मंदिर में वेश्‍या थी। दक्षिण के। मैं देवदासी थी। और मैंने हजारों पुरूषों के साथ संभोग किया। मैंने अपने शरीर को बेचा। नहीं, मैं उसे भूलना चाहती हूं, मैं उसे एक क्षण भी याद नहीं करना चाहती हूं।</p>
<p>      पिछले जन्‍म में जाया जा सकता है। और जिसकी भी मर्जी हो, उसके रास्‍ते है। मैथिोलिजी है। महावीर और बुद्ध दोनों मनुष्‍य को ये मनुष्‍य जाती को अद्भुत दान दिया है। वह उनकी अहिंसा-वहिंसा का सिद्धांत नहीं है। वह सबसे बड़ा दान है जाति-स्‍मरण का सिद्धांत। वह है पिछले जन्‍मों की स्‍मृति में उतने की कला। महावीर और बुद्ध दोनों ही पहले आदमी है पृथ्‍वी पर, जिन्‍होंने प्रत्‍येक साधक के लिए यह कहा कि तब तक तुम आत्‍मा से परिचित नहीं हो सकते, जब तक कि तुम पिछले जन्‍म में न जा सको। और प्रत्येक साधक ने पिछले जन्‍म में जाने की फर्क की।</p>
<p>      और एक बार कोई आदमी अपने पिछले जन्‍मों की स्‍मृतियों में जाने की हिम्‍मत जुटा ले, वह दूसरा आदमी हो जाएगा। क्‍योंकि उसे पता चलेगा कि जिन बातों  को मैं हजारों बार कर चूकि हुं, उन्‍हीं बातों को बार-बार कर रहा हूं। कैसा पागल हूं। कितनी बार मैंने संपति इकट्ठी की। कितनी बार मैंने करोड़ों के अंबार लगाये। कितनी बार मैं महल खड़े कर चूका हूं, कितनी बार इज्‍जत और शान और पद और सिंहासनों पर बैठा हूं। कितनी बार कितनी अंनत बार, और फिर बार-बार मैं वहीं सब कर रहा हूं। और हर बार यह यात्रा असफल होती है। तत्‍क्षण उसके पदों का मोह भंग हो जायेगा। वह आदमी जानेगा मैंने हजारों-हजार बार कितनी स्‍त्रियों को भोगा है, स्‍त्री जानेगी कि मैंने हजारों पुरूषों को भोगा है। और कहीं किसी पुरूष से तृप्‍ति नहीं  मिली। और न किसी स्‍त्री से ही तृप्‍ति मिली। और अब भी मैं यह सोच रहा हूं कि इस स्‍त्री को भोगूं। उस स्‍त्री को भोगूं। यह सब करोड़ो बार दोहराया जा चूका है&#8230;.जो एक थका देनेवाली अंतहीन यात्रा हे।</p>
<p> एक बार स्‍मरण आ जाए इसका तो फिर यह दोबारा नहीं हो सकता। क्‍योंकि इतनी बार जब हम कर चुके हों ओर कोई फल न पाया हो, तो फिर आगे उसे दोहराए जाने का कोई उपाय नहीं है। कोई अर्थ नहीं है। बुद्ध और महावीर दोनों ने जाति-स्मरण के गहरे प्रयोग किए—स्‍मृति के, अतीत जन्‍मों की स्‍मृति के। और जो साधक एक बार उस स्‍मृति से गुजर गया। वह आदमी दूसरा हो गया। ट्रांसफार्म हो गया, बदल गया।<br />
<strong><br />
</strong>ओशो</p>
<p>मैं मृत्‍यु सिखाता हूं,</p>
<p>प्रवचन—2</p>
<p>(संस्‍करण-1995)<strong></p>
<p> </strong></p>
<br />Filed under: <a href='http://oshosatsang.org/category/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b6%e0%a4%a8-%e0%a4%9a%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9a%e0%a4%be/'>प्रशन चर्चा</a> Tagged: <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/'>ओशो</a>, <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6/'>स्‍वामी आनंद प्रसाद</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/oshosatsang.wordpress.com/4295/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/oshosatsang.wordpress.com/4295/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/oshosatsang.wordpress.com/4295/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/oshosatsang.wordpress.com/4295/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/oshosatsang.wordpress.com/4295/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/oshosatsang.wordpress.com/4295/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/oshosatsang.wordpress.com/4295/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/oshosatsang.wordpress.com/4295/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/oshosatsang.wordpress.com/4295/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/oshosatsang.wordpress.com/4295/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/oshosatsang.wordpress.com/4295/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/oshosatsang.wordpress.com/4295/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/oshosatsang.wordpress.com/4295/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/oshosatsang.wordpress.com/4295/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4295&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://oshosatsang.org/2012/01/09/%e0%a4%b8%e0%a5%82%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%b6%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a4%97%e0%a4%a4-%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b-3/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>1</slash:comments>
		<georss:point>28.621671 77.162177</georss:point>
		<geo:lat>28.621671</geo:lat>
		<geo:long>77.162177</geo:long>
		<media:content url="http://1.gravatar.com/avatar/18ba8ff7182a19f3392c7e668fd1934c?s=96&#38;d=identicon&#38;r=G" medium="image">
			<media:title type="html">anandprashad</media:title>
		</media:content>
	</item>
		<item>
		<title>सूक्ष्‍म शरीर का जगत—ओशो (भाग&#8211;2)</title>
		<link>http://oshosatsang.org/2012/01/08/%e0%a4%b8%e0%a5%82%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%b6%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a4%97%e0%a4%a4-%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b-2/</link>
		<comments>http://oshosatsang.org/2012/01/08/%e0%a4%b8%e0%a5%82%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%b6%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a4%97%e0%a4%a4-%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b-2/#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 08 Jan 2012 13:07:11 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[प्रशन चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://oshosatsang.org/?p=4292</guid>
		<description><![CDATA[प्रश्‍न&#8211; एक और मित्र ने पूछा है, आत्‍मा शरीर के बाहर चली जाए, तो क्‍या दूसरे शरीर में भी प्रवेश कर सकती है? ओशो—कर सकती है। लेकिन दूसरे मृत शरीर में प्रवेश करने का कोई अर्थ और प्रयोजन नहीं रह &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/01/08/%e0%a4%b8%e0%a5%82%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%b6%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a4%97%e0%a4%a4-%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b-2/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4292&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>प्रश्‍न&#8211;</strong> एक और मित्र ने पूछा है, आत्‍मा शरीर के बाहर चली जाए, तो क्‍या दूसरे शरीर में भी प्रवेश कर सकती है?</p>
<p><strong>ओशो—</strong>कर सकती है। लेकिन दूसरे मृत शरीर में प्रवेश करने का कोई अर्थ और प्रयोजन नहीं रह जाता। क्‍योंकि दूसरा शरीर इस लिए मृत हुआ है कि उस शरीर में रहने वाली आत्‍मा उस शरीर में रहने में असमर्थ हो गई थी। वह शरीर व्‍यर्थ हो गया था। इसीलिए छोड़ा था। कोई प्रयोजन नहीं है, उस शरीर में प्रवेश करने का। लेकिन इस बात की संभावना है कि दूसरे शरीर में प्रवेश किया जा सके।<span id="more-4292"></span></p>
<p>      लेकिन यह प्रश्न पूछना मुल्‍य वान नहीं है। कि हम दूसरे के शरीर में कैसे प्रवेश करें, अपने ही शरीर में हम कैसे बैठे हुए है। इसका भी हमें कोई पता नहीं है। हम दूसरे के शरीर में प्रवेश करने की व्‍यर्थ की बातों पर विचार करने से क्‍या फायदा उठा सकते है। हम अपने ही शरीर में कैसे प्रविष्‍ट हो गई है, इसका भी हमे कोई पता नहीं है। हम अपने ही शरीर को कैसे जी रहे है, इसका कोई पता नहीं है। हम अपने ही शरीर से पृथक होकर अपने को देख सकें, इसका भी कोई अनुभव नहीं है। दूसरे के शरीर में प्रवेश का प्रयोजन भी नहीं है। लेकिन वैज्ञानिक रूप से यह कहा जा सकता है कि दूसरे के शरीर में प्रवेश संभव है। क्‍योंकि शरीर न दूसरे का है। और न अपना। सब शरीर दूसरे के है। जब मां के पेट में एक आत्‍मा प्रविष्‍ट करती है। तब भी वह शरीर में प्रवेश करती है। बहुत छोटे शरीर में प्रवेश हो रही है। ऐटमिक बॉडी में प्रवेश हो रही है। लेकिन शरीर तो है ही।</p>
<p>     वह जो पहले दिन अणु बनता है मां के पेट में वह अणु आपके पूरे शरीर की रूपाकृति अपने में छिपाए हुए होता है। पचास साल बाद आपके बाल सफेद हो जायेंगे, यह संभावना भी उस छोटे से बीज छिपी थी। आपकी आंखों का रंग कैसा होगा। आपके हाथ कितने लंबे होंगे, आप स्‍वास्‍थ होंगे या बीमार। आप गोरे होंगे या काले, आपके बाल कैसे होंगे, सीधे या घुंघराले, ये तमाम बातें उस अणु में छुपी थी। जो उस समय वह अणु एक छोटी सी देह लिए परिपूर्ण था। वह ऐटमिक बाड़ी है, अणु शरीर, उस अणु शरीर में आत्मा प्रविष्‍ट होती है। उस अणु शरीर की जो संरचना है, उस अणु शरीर की जो स्‍थिति है, जो सिचुएशन है उसके अनुकूल आत्‍मा उसमे प्रविष्‍ट होती है।</p>
<p>      और दुनिया में जो मनुष्‍य जाति का जीवन और चेतना रोज नीचे गिरती जा रही है। उसका एक मात्र कारण है कि दुनियां  के दंपति श्रेष्‍ठ आत्‍माओं का जन्‍म देने की संभावना और सुविधा पैदा नहीं कर पा रहे। जो सुविधा पैदा की जा रही है, वह अत्‍यंत निकृष्‍ट आत्‍माओं के पैदा होने की सुविधा है।</p>
<p>      आदमी के मर जाने के बाद जरूरी नहीं है कि उस आत्‍मा को जल्‍दी ही जन्‍म लेने का अवसर मिल जाए। साधारण आत्माएं, जो न बहुत श्रेष्‍ठ होती है, और न निकृष्‍ठ होती है। तेरह दिन के भीतर नए शरीर की खोज कर लेती है। लेकिन बहुत निकृष्‍ट आत्‍माओं को रूकना पड़ता है। क्‍योंकि उतना निकृष्‍ट अवसर मिलना मुश्‍किल है। उन निकृष्‍ट आत्‍माओं को ही हम प्रेत कहते है। बहुत श्रेष्‍ठ आत्‍माएं भी रूक जाती है। क्‍योंकि उन्‍हें श्रेष्‍ठ अवसर उपलब्‍ध नहीं मिलता। उन श्रेष्‍ठ आत्‍माओं को हम देवता कहते है।</p>
<p>      पहली पुरानी दुनिया में भूत-प्रेतों की संख्‍या बहुत ज्‍यादा थी और देवताओं की संख्‍या बहुत कम। आज की दुनियां में भूत-प्रेतों की संख्‍या बहुत कम हो गई है और देवताओं की संख्‍या बहुत। क्‍योंकि देवता पुरूषों को पैदा होने का अवसर बहुत कम हो रहा है। भूत-प्रेतों को पैदा होने का अवसर बहुत तीव्रता से उपलब्‍ध हुआ है। तो जो भूत प्रेत रुके रह जाते है। मनुष्‍य के भी तर प्रवेश करने से, वे सारे के सारे मनुष्‍य जाति में प्रविष्‍ट हो गए है। इसीलिए आज भूत-प्रेत का दर्शन मुश्‍किल हो गया है। क्‍योंकि उसके दर्शन की कोई जरूरत नहीं है, आप अपने चारों और आदमी को देख लें, और उसका दर्शन हो जाता है। और देवता पर हमारा विश्‍वास कम हो गया है। क्‍योंकि देव पुरूष ही जब दिखाई न पड़ते हो तो देवता पर विश्‍वास करना बहुत कठिन है।</p>
<p>      एक जमाना था कि देवता उतनी ही वास्‍तविकता थी, उतनी ही एक्जुअलटि थी जितना कि हमारे जीवन के और दूसरे सत्‍य है। अगर हम वेद के ऋषियों को पढ़ें तो ऐसा नहीं मालूम पड़ता कि देवताओं के संबंध में जो बात कर रहे है, वह किसी कल्‍पना के देवता के संबंध में बात कर रहे है। नहीं, वे ऐसे देवता की बात कर रहे है जो उनके साथ गीत गाता है, हंसता है, बात करता है, वे ऐसे देवता की बात कर रहे है। जो उनके साथ गीत गा रहे है जो उनके साथ पृथ्‍वी पर उनके साथ चल रहा हो। उनके अत्‍यंत निकट है। हमारा देव लोक से सारा संबंध विनिष्‍ट हो गया है। क्‍योंकि हमारे बीच ऐसे पुरूष नहीं जो सेतु बन सकें, जो ब्रिज बन सकें, जो देवताओं और मनुष्‍यों के बीच में खड़े हो सकें, जो एक दूसरे के बीच ब्रिज बना सके बता सके की देखो देवता कैसे होते है। और इसका सारा जिम्‍मा मनुष्‍य जाति के दांपत्‍य की जो व्‍यवस्‍था है, उस पर निर्भर करता है। मनुष्‍य जाती की दांपत्‍य की सारी की सारी व्‍यवस्‍था कुरूप, अगली और परवर्टेड है।</p>
<p>      पहली तो बात यह है कि हमने हजारों साल से प्रेमपूर्ण विवाह बंद कर दिए है। और विवाह हम बिना प्रेम के करते है। जो विवाह बिना प्रेम के होगा, उस दंपति के बीच कभी भी वह आध्‍यात्‍मिक संबंध उत्‍पन्‍न नहीं होता जो प्रेम से संभव था। उन दोनो के बीच कभी भी वह हार्मनी, कभी भी वह एकरूपता और संगीत पैदा नहीं होता, जो एक श्रेष्‍ठ आत्‍मा के जन्‍म के लिए जरूरी है। उनका प्रेम केवल साथ रहने की वजह से पैदा हो गया सहचर्या होता है। उनके प्रेम में वह आत्‍मा का आंदोलन नहीं होता, जो दो प्राणों को एक कर देता है।</p>
<p>      शायद आपको पता न होगा, स्‍त्रियां पुरूषों से ज्‍यादा सुंदर क्‍यों दिखाई पड़ती है। शायद आपको ख्‍याल न होगा, स्‍त्री के व्‍यक्‍तित्‍व में एक राउंड नेस, एक सुडौलता क्‍यों दिखाई पड़ती है? शायद आपको ख्‍याल में न होगा। कि स्‍त्री के व्यक्तित्व में एक संगीत, एक नृत्‍य, एक इनर डांस, एक भीतरी नृत्‍य क्‍यों दिखाई पड़ता है। जो पुरूष में दिखाई नहीं पड़ता। एक छोटा सा कारण है, बहुत बड़ा कारण नहीं है। एक छोटा सा, इतना छोटा कि आप कल्‍पना भी नहीं कर सकते। उतने छोटे से कारण पर व्यक्तित्व का इतना भेद पैदा हो जाता है।</p>
<p>      मां के पेट में जो बच्‍चा निर्मित होता है, पहला अणु, उस पहले अणु में चौबीस जीवाणु पुरूष के होते है, चौबीस जीवाणु स्‍त्री के होते है। अगर चौबीस-चौबीस के दोनों जीवाणु मिलते है तो अड़तालीस जीवाणुओं का पहला सेल निर्मित होता है। अड़तालीस सेल से जो प्राण पैदा होता है, वह स्‍त्री का शरीर बनता है। अड़तालीस सेल से जो प्राण पैदा होता है, वह स्‍त्री का शरीर बनता है। उनके दोनों बाजू चौबीस-चौबीस के होते है—एक बैलेंस्‍ड, एक संतुलित। पुरूष का जो जीवाणु होता है। वह सैंतालीस जीवाणुओं का होता है। एक तरु चौबीस होते है, एक तरफ तेईस। बस यह बैलेंस टूट या वहीं से व्‍यक्‍तित्‍व का; संतुलन टूट गया। हार्मनी टूट गई।</p>
<p>      स्‍त्री के दोनों पलड़े व्‍यक्‍तित्‍व के बराबर संतुलन के है। उससे सारे स्‍त्री का सौंदर्य, उसकी सुडौलता, उसकी कला, उसके व्यक्तित्व का काव्य पैदा होता है। और पुरूष के व्‍यक्‍तित्‍व में जरा सी कमी है। उसका एक तराजू चौबीस जीवाणुओं से बना है और दूसरा तेईस कोष्ठ धारी जीवाणुओं से। अगर मां के चौबीस कोष्ठ धारी जीवाणु से मिलता है तो पुरूष का जन्‍म होता है। इस लिए पुरूष में एक बेचैनी है। उसका सारा जीवन उस असन्तुलन से डोलता रहता है। उसके जीवन में एक बेचैनी है। मैं यह कर लूं, वह कर लूं, एक चिंता गई नहीं की दूसरी तैयार, पूरा जीवन उस असंतुलन के कारण बन गया है। एक छोटी से घटना से शुरू होती है पुरूष की इस बेचैनी की शुरू आत। जो बाद में हजारों तूफ़ानों में बदल जाती है, चंगेज खा, हिटलर, मुसोलनी, नादिरशाही के अनेक रूपों में। उसके एक पलड़े में एक अणु कम है। उसका बैलेंस व्‍यक्‍तित्‍व कम है। स्‍त्री का पूरा है। स्‍त्री की हार्मनी पूरी है, उसकी लयबद्धता पूरी है।</p>
<p>      इतनी सी घटना इतना फर्क लाती है। हालांकि इससे सत्री सुंदर तो हो सकी। लेकिन स्‍त्री विकासमान नहीं हो सकी। क्‍योंकि जिस व्‍यक्‍तित्‍व में समता है, वह विकास नहीं करता। वह ठहर जाता है। पुरूष का व्‍यक्‍तित्‍व विषम है। विषम होने के कारण वह दौड़ता है, विकास करता है। चाँद पर जाएंगा, तारों पर जाएगा। खोज-बीन करेगा। सोचगा-विचारेगा। ग्रंथ लिखेगा। धर्म-निर्माण करेगा। न वह एवरेस्‍ट पर जाएगी, न चाँद तारों पर जाएगी। न वह धर्मों की खोज करेगी। न ग्रंथ लिखेगी, न विज्ञान की शोध करेगी। वह कुछ भी नहीं करेगी। उसके व्यक्तित्व में एक संतुलन है, वह संतुलन उसे पार होने के लिए तीव्रता नहीं भरता।</p>
<p>      पुरूष ने सारी सभ्‍यता विकसित की, एक छोटी सी बात के कारण से कि उसमे एक अणु कम है। और स्‍त्री ने सारी सभ्‍यता विकसित नहीं की, उसमे एक अणु पूरा है। इतनी छोटी सी घटना इतने व्‍यक्‍तित्‍व का भेद ला सकती है। मैं इसलिए यह कह रहा हूं कि यह तो बायोलॉजिकली है, यह तो जीव-शास्‍त्र कहेगा कि इतना सा फर्क इतने भिन्‍न व्‍यक्‍तित्‍व को जन्‍म दे सकता है। और गहरे फर्क है, और इनर डिफरेंस है।</p>
<p>      पुरूष और स्‍त्री के मिलने से जिस बच्‍चे का जन्‍म होता है। वह उन दोनों व्‍यक्‍तियों में कितना गहरा प्रेम है, कितनी आध्‍यात्‍मिकता है। कितनी पवित्रता है, कितने प्रेयर फुल है, कितने प्रार्थना पूर्ण ह्रदय से एक वे एक दूसरे के पास आये है। इस पर निर्भर करता है। इस प्रेम और समर्पण की भाव दिशा में कितनी ऊंची आत्‍मा उनकी तरफ आकर्षित होती है, कितनी विराट आत्‍मा उनकी और खिंची चली आती है। कितनी महान दिव्‍य चेतना उस घर को  अपना अवसर बनाती है, इस पर निर्भर करता है।</p>
<p>      मनुष्‍य जाति क्षीण और दीन और दरिद्र और दुःखी होती चली जा रही हे। उसके बहुत गहरे में कारण मनुष्‍य के दांपत्‍य का विकृत होना है। और जब तक हम मनुष्‍य के दांपत्‍य जीवन को सुकृत नहीं कर लेते, सुसंस्‍कृत नहीं कर लेते, जब तक उसे हम स्‍प्रिचुएलाइज नहीं कर लेते, जब तब तक हम मनुष्‍य के भविष्‍य को सुधार नहीं सकते। और दुर्भाग्य में उन लोगों का भी हाथ है, जिन लोगों ने गृहस्‍थ जीवन की निंदा की है और संन्‍यासी जीवन का बहुत ज्‍यादा शोरगुल मचाया है। उनका हाथ है। क्‍योंकि एक बार जब गृहस्‍थ जीवन कंडेम्‍ड़ हो गया, निंदित हो गया, तो उस तरफ हमने विचार करना छोड़ दिया।</p>
<p>      नहीं, मैं आपसे कहना चाहता हूं, संन्‍यास के रास्‍ते से बहुत थोड़े से लोग ही परमात्‍मा तक पहुंच सकते है। बहुत थोड़े-से लोग, कुछ विशिष्‍ट तरह के लोग, कुछ अत्‍यंत भिन्‍न तरह के लोग संन्‍यास के रास्‍ते से परमात्‍मा तक पहुंचने है। अधिकतम लोग गृहस्‍थ के रास्‍ते से और दांपत्‍य के रास्‍ते से ही परमात्‍मा तक पहुंचते है। और आश्‍चर्य की बात है कि गृहस्‍थ के मार्ग से पहुंच जाना अत्‍यंत सरल है, सुलभ है, लेकिन उस तरफ कोई ध्‍यान नहीं देता। आज तक का सारा धर्म संन्‍यासियों के अति प्रभाव से पीड़ित है। आज तक का पूरा धर्म गृहस्थ के लिए विकसित नहीं हो सका। और अगर गृहस्‍थ के लिए धर्म विकसित होता, तो हमने जन्‍म के पहले क्षण से विचार किया होता कि कैसा आत्‍मा को आमंत्रित करना है, कैसी आत्‍मा को पुकारना है, कैसी आत्‍मा को प्रवेश देना है जीवन में।</p>
<p>      अगर धर्म की ठीक-ठीक शिक्षा हो सके और एक-एक व्‍यक्‍ति को अगर धर्म की दिशा में ठीक विचार, कल्‍पना और भावना दी जा सके, तो बीस वर्षो में आने वाली मनुष्‍य की पीढ़ी को बिलकुल नया बनाया जा सकता है।</p>
<p>      वह आदमी पापी है जो आदमी आने वाली आत्‍मा के लिए प्रेमपूर्ण निमंत्रण भेजे वाली आत्‍मा के लिए प्रेमपूर्ण निमंत्रण भेजे बिना भोग में उतरता है। वह आदमी अपराधी है, उसके बच्‍चे नाजायज है—चाहे उसे बच्‍चे विवाह के द्वारा पैदा किए हों—जिन बच्‍चों के लिए उसने अत्‍यंत प्रार्थना और पूजा से और परमात्‍मा को स्मरण करके नहीं बुलाया है। वह आदमी अपराधी है। सारी संततियों के सामने वह अपराधी रहेगा। कौन हमारे भीतर प्रविष्‍ट। हम शिक्षा की फिक्र करते है, हम वस्‍त्रों की फ्रिक करते है, हम बच्‍चें के स्‍वास्‍थ की फिक्र करते है, लेकिन बच्‍चों की आत्‍मा की फिक्र हम बिलकुल ही छोड़ दिए है। इससे कभी भी कोई अच्‍छी मनुष्‍य जाति पैदा नहीं हो सकती है।</p>
<p>            इसलिए यह बहुत फ्रिक मत करें कि दूसरे के शरीर में कैसे प्रवेश करें। इस बात की फ्रिक करे कि आप इस शरीर में ही कैसे प्रवेश कर गए है।</p>
<p> <strong>ओशो</p>
<p>मैं मृत्‍यु सिखाता हूं, प्रवचन&#8211; 2</strong></p>
<br />Filed under: <a href='http://oshosatsang.org/category/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b6%e0%a4%a8-%e0%a4%9a%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9a%e0%a4%be/'>प्रशन चर्चा</a> Tagged: <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/'>ओशो</a>, <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6/'>स्‍वामी आनंद प्रसाद</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/oshosatsang.wordpress.com/4292/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/oshosatsang.wordpress.com/4292/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/oshosatsang.wordpress.com/4292/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/oshosatsang.wordpress.com/4292/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/oshosatsang.wordpress.com/4292/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/oshosatsang.wordpress.com/4292/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/oshosatsang.wordpress.com/4292/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/oshosatsang.wordpress.com/4292/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/oshosatsang.wordpress.com/4292/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/oshosatsang.wordpress.com/4292/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/oshosatsang.wordpress.com/4292/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/oshosatsang.wordpress.com/4292/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/oshosatsang.wordpress.com/4292/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/oshosatsang.wordpress.com/4292/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4292&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://oshosatsang.org/2012/01/08/%e0%a4%b8%e0%a5%82%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%b6%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a4%97%e0%a4%a4-%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b-2/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>1</slash:comments>
		<georss:point>28.635308 77.224960</georss:point>
		<geo:lat>28.635308</geo:lat>
		<geo:long>77.224960</geo:long>
		<media:content url="http://1.gravatar.com/avatar/18ba8ff7182a19f3392c7e668fd1934c?s=96&#38;d=identicon&#38;r=G" medium="image">
			<media:title type="html">anandprashad</media:title>
		</media:content>
	</item>
		<item>
		<title>सूक्ष्‍म शरीर का जगत—ओशो (भाग&#8211;1)</title>
		<link>http://oshosatsang.org/2012/01/08/%e0%a4%b8%e0%a5%82%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%b6%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a4%97%e0%a4%a4-%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/</link>
		<comments>http://oshosatsang.org/2012/01/08/%e0%a4%b8%e0%a5%82%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%b6%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a4%97%e0%a4%a4-%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 08 Jan 2012 06:43:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[प्रशन चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://oshosatsang.org/?p=4290</guid>
		<description><![CDATA[प्रश्‍न&#8211;एक मित्र ने पूछा है कि यदि मां के पेट में, पुरूष और स्‍त्री, आत्‍मा के जन्‍मनें के लिए अवसर पैदा करते है, तो इसका अर्थ यह हुआ कि आत्‍माएं अलग-अलग है और सर्वव्‍यापी आत्‍मा नहीं है? उन्होंने यह भी &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/01/08/%e0%a4%b8%e0%a5%82%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%b6%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a4%97%e0%a4%a4-%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4290&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>प्रश्‍न&#8211;</strong>एक मित्र ने पूछा है कि यदि मां के पेट में, पुरूष और स्‍त्री, आत्‍मा के जन्‍मनें के लिए अवसर पैदा करते है, तो इसका अर्थ यह हुआ कि आत्‍माएं अलग-अलग है और सर्वव्‍यापी आत्‍मा नहीं है? उन्होंने यह भी पूछा है कि मैंने तो बहुत बार कहा है कि एक ही है सत्‍य, एक ही परमात्‍मा है, एक ही आत्‍मा है। फिर ये दोनों बातें तो कंट्राडिक्‍टरी, विरोधी मालूम होती है।</p>
<p><strong>ओशो—</strong>ये दोनों बातें विरोधी नहीं है। आत्‍मा तो  वस्‍तुत: एक ही है। लेकिन शरीर दो प्रकार के है। एक शरीर जिसे हम स्‍थूल शरीर कहते है, जो हमें दिखाई देता है। एक शरीर जो सूक्ष्‍म शरीर है जो हमें दिखाई नहीं पड़ता है। एक शरीर की जब मृत्‍यु होती है, तो स्‍थूल शरीर तो गिर जाता है। लेकिन जो सूक्ष्‍म शरीर है वह जो सटल बॉडी है, वह नहीं मरती है।<span id="more-4290"></span></p>
<p>      आत्‍मा दो शरीरों के भीतर वास कर रही है। एक सूक्ष्‍म और दूसरा स्‍थूल। मृत्‍यु के समय स्‍थूल शरीर गिर जाता है। यह जो मिट्टी पानी से बना हुआ शरीर है यह जो हड्डी मांस मज्‍जा की देह है। यह गिर जाती है। फिर अत्‍यंत सूक्ष्‍म विचारों का, सूक्ष्‍म संवेदनाओं का, सूक्ष्‍म वयब्रेशंस का शरीर शेष रह जाता है, सूक्ष्‍म तंतुओं का।</p>
<p>      वह तंतुओं से घिरा हुआ शरीर आत्‍मा के साथ फिर से यात्रा शुरू करता है। और नया जन्‍म फिर नए स्‍थूल शरीर में प्रवेश करता है। तब एक मां के पेट में नई आत्‍मा का प्रवेश होता है, तो उसका अर्थ है सूक्ष्‍म शरीर का प्रवेश।</p>
<p>      मृत्‍यु के समय सिर्फ स्‍थूल शरीर गिरता है—सूक्ष्‍म शरीर नहीं। लेकिन परम मृत्‍यु के समय—जिसे हम मोक्ष कहते है—उस परम मृत्‍यु के समय स्‍थूल शरीर के साथ ही सूक्ष्‍म शरीर भी गिर जाता है। फिर आत्‍मा का कोई जन्‍म नहीं होता। फिर वह आत्‍मा विराट में लीन हो जाती है। वह जो विराट में लीनता हे, वह एक ही है। जैसे एक बूंद सागर में गिर जाती है।</p>
<p>      तीन बातें समझ लेनी जरूरी है। आत्‍मा का तत्‍व एक है। उस आत्‍मा के तत्‍व के संबंध में आकर दो तरह के शरीर सक्रिय होते है। एक सूक्ष्‍म शरीर, और एक स्‍थूल शरीर। स्‍थूल शरीर से हम परिचित है, सूक्ष्‍म से योगी परिचित होता है। और योग के भी जो ऊपर उठ जाते है, वे उससे परिचित होते है जो आत्‍मा है। सामान्‍य आंखे देख पाती है इस शरीर को। योग-दृष्‍टि, ध्‍यान देख पाता है, सूक्ष्‍म शरीर को। लेकिन ध्‍यानातित, बियॉंड योग, सूक्ष्‍म के भी पार, उसके भी आगे जो शेष रह जाता है, उसका तो समाधि में अनुभव होता है। ध्‍यान से भी जब व्‍यक्‍ति ऊपर उठ जाता है। तो समाधि फलित होती है। और उस समाधि में जो अनुभव होता है, वह परमात्‍मा का अनुभव है। साधारण मनुष्‍य का अनुभव शरीर का अनुभव है, साधारण योगी का अनुभव सूक्ष्‍म शरीर का अनुभव है, परम योगी का अनुभव परमात्‍मा का अनुभव है। परमात्‍मा एक है, सूक्ष्‍म शरीर अनंत है, स्‍थूल शरीर अनंत है।</p>
<p>      वह जो सूक्ष्‍म शरीर है वह है कॉज़ल बॉडी। वह जो सूक्ष्‍म शरीर है, वही नए स्‍थूल शरीर ग्रहण करता है। हम यहां देख रहे है कि बहुत से बल्‍ब जले हुए है। विद्युत तो एक है। विद्युत बहुत नहीं है। वह ऊर्जा, वह शक्‍ति, वह एनर्जी एक है। लेकिन दो अलग बल्लों से वह प्रकट हुई है। बल्‍ब का शरीर अलग-अलग है, उसकी आत्‍मा एक है। हमारे भीतर से जो चेतना झांक रही है, वह चेतना एक है। लेकिन उस चेतना के झांकने में दो उपकरणों का, दो वैहिकल का प्रयोग किया गया है। एक सूक्ष्‍म उपकरण है, सूक्ष्‍म  देह: दूसरा उपकरण है, स्‍थूल देह।</p>
<p>      हमारा अनुभव स्‍थूल देह तक ही रूक जाता है। यह जो स्‍थूल देह तक रूक गया अनुभव है, यहीं मनुष्‍य के जीवन का सारा अंधकार और दुख है। लेकिन कुछ लोग सूक्ष्‍म शरीर पर  भी रूक  सकेत है। जो लोग सूक्ष्‍म शरीर पर रूक जाते है। वे ऐसा कहेंगें की आत्‍माएं अनंत है। लेकिन जो सूक्ष्‍म शरीर के भी आगे चले जाते है। वे कहेंगे की परमात्‍मा एक है। आत्‍मा एक ब्रह्मा एक है।</p>
<p>      मेरी इन दोनों बातों में कोई विरोधाभाष नहीं है। मैंने जो आत्‍मा के प्रवेश के लिए कहा, उसका अर्थ है वह आत्‍मा जिसका  अभी सूक्ष्‍म शरीर गिरा नहीं है। इसलिए हम कहते है कि जो आत्‍मा परम मुक्‍ति को उपलब्‍ध हो जाती है, उसका जन्‍म मरण बंद हो जाता है। आत्‍मा का तो कोई जन्‍म मरण है ही नहीं। वह न तो कभी जन्‍मी है और न कभी मरेगी। वह जो सूक्ष्‍म शरीर है, वह भी समाप्‍त हो जाने पर कोई जन्‍म मरण नहीं रह जाता। क्‍योंकि सूक्ष्‍म शरीर ही कारण बनता है नए जन्‍मों का।</p>
<p>      सूक्ष्‍म शरीर का अर्थ है, हमारे विचार, हमारी कामनाए, हमारी वासनाएं, हमारी इच्‍छाएं, हमारे अनुभव, हमारा ज्ञान, इन सबका जो संग्रही भूत जो इंटिग्रेटेड सीड है, इन सबका जो बीज है, वह हमारा सूक्ष्‍म शरीर है। वहीं हमें आगे की यात्रा करता है। लेकिन जिस मनुष्‍य के सारे विचार नष्‍ट हो गए, जिस मनुष्‍य की सारी वासनाएं क्षीण हो गई, जिस मनुष्‍य की सारी इच्‍छाएं विलीन हो गई, जिसके भीतर अब कोई भी इच्‍छा शेष न रही, उस मनुष्‍य को जाने के लिए कोई जगह नहीं बचती, जाने का कोई कारण नहीं रह जाता। जन्‍म की कोई वजह नहीं रह जाती।</p>
<p>      राम कृष्‍ण के जीवन में एक अद्भुत घटना है। रामकृष्‍ण को जो लोग बहुत निकट से जानते थे, उन सबको यह बात जानकर अत्यंत कठिनाई होती थी कि रामकृष्‍ण जैसा परमहंस, रामकृष्‍ण जैसा समाधिस्‍थ व्‍यक्‍ति भोजन के संबंध में बहुत लोलुप था। रामकृष्‍ण भोजन के लिए बहुत आतुर होते थे, और भोजन के लिए इतनी प्रतीक्षा करते थे कई बार उठकर चोंके में पहुंच जाते थे। और पूछते शारद को, बहुत देर हो गई। क्‍या बन रहा है आज? ब्रह्म की चर्चा चलती और बीच में ब्रह्म-चर्चा छोड़कर पहु्ंचो जाते चोंके में। और खोजने लगते कि शारदा आज क्‍या बना रहा है? शारद ने भी उन्‍हें कई बार कहा की लोग क्‍या सोचते होंगे?  क्‍या कहते होंगे? ब्रह्म की चर्चा छोड़ कर एक दम अन की चर्चा पर उतर आते हो। रामकृष्‍ण हंसते और चुप रह जाते। उनके शिष्‍यों ने भी उन्‍हें अनेक बार कहां। इससे बड़ी बदनामी होती है। लोग कहते है कि ऐसा व्‍यक्‍ति क्‍या ज्ञान को उपलब्‍ध होगा। जिसकी अभी वासना , रसना, जीभ की भी पूरी नहीं हुई है।</p>
<p>      एक दिन शारदा ने बहुत कुछ भला-बुरा कहा, रामकृष्‍ण की पत्‍नी ने, तो रामकृष्‍ण ने कहा कि तुझे पागल, पता नहीं, जिस दिन मैं भोजन के प्रति अरूचि प्रकट करूं, तू समझ लेना कि अब मेरे जीवन की यात्रा केवल तीन दिन शेष रह गये है। बस तीन दिन से ज्‍यादा फिर मैं जीऊूंगा नहीं। जिस दिन भोजन के प्रति मेरी उपेक्षा हो, समझ लेना कि तीन दिन बाद मेरी मौत आ गई है। शारदा कहने लगी, इसका अर्थ? रामकृष्‍ण कहने लगे, मेरी सारी वासनाएं क्षीण हो गई है। मेरी सारी इच्‍छाएं विलीन हो गई है। मेरे सारे विचार नष्‍ट हो गये है। लेकिन जगत के हित के लिए मैं रुका रहना चाहता हूं। मैं एक वासना को जबर्दस्‍ती पकड़े हुए हूं। जैसे किसी नाव की सारी ज़ंजीरें खुल जाएं  एक जंजीर से नाव अटकी रह गई है। और वह एक जंजीर और टूट जाए तो नाव आनी अनंत यात्रा पर निकल जाएगी। मैं चेष्‍टा करके रुका हुआ हूं।</p>
<p>      नहीं किसी की समझ में शायद उस दिन यह बात आई, लेकिन रामकृष्‍ण की मृत्‍यु के तीन दिन पहले शारदा थाली लगाकर रामकृष्‍ण के कमरे में गई। वे बैठे हुए देख रहे थे। उन्‍होंने थाली देखकर आँख बंद कर ली। लेट गए, और पीठ कर ली शारदा की तरफ। उसे एकदम से ख्‍याल आया कि उन्‍होंने कहां था कि तीन दिन बाद मौत हो जाएगी। जिस दिन भोजन के प्रति अरूचि करूंगा। उसके हाथ से थाली छूट गई। वह छाती पीटकर रोने लगी। राम कृष्‍ण ने कहा रोओ मत, तुम जो कहती थी वह बात भी अब पूरी हो गई।</p>
<p>      ठीक तीन दिन बाद रामकृष्‍ण की मृत्‍यु हो गई। एक छोटी सी वासना को प्रयास करके वे रोके हुए थे। उतनी छोटी सी वासना जीवन यात्रा का आधार बनी थी। वह वासना भी चली गई जो जीवन यात्रा का सारा आधार समाप्‍त हो गया।</p>
<p>      जिन्‍हें हम तीर्थकर कहते है, जिन्‍हें हम बुद्ध कहते है। जिन्‍हें हम ईश्‍वर के पुत्र कहते है। जिन्‍हें हम अवतार कहते है। उनकी भी एक ही वासना शेष रह गई होती है। और उस वासना को वे शेष रखना चाहते है करूणा के हित, सर्वमंगला के हित, सर्व लोक के हित। जिस दिन वह वासना भी क्षण हो जाती है, उसी दिन जीवन की यह यात्रा समाप्‍त और अनंत की अंतहीन यात्रा शुरू हो जाती है। उसके बाद जन्‍म नहीं है, उसके बाद मरण नहीं है। उसके बाद&#8230;.उसके बाद न एक है, न अनेक है। उसके बाद तो जो शेष रह जाता है, उसे संख्‍या में गिनने का कोई उपाय नहीं है।</p>
<p>      इसलिए जो जानते है, वे यह भी नहीं कहते कि ब्रह्म एक है। परमात्‍मा एक है। क्‍योंकि एक कहना व्‍यर्थ है जब कि दो की गिनती न बनती हो। एक कहने का कोई अर्थ नहीं है। जब कि दो और तीन न कहे जा सकते हों। एक कहना तभी तक सार्थक है जब तक कि दो, तीन चार भी सार्थक होते है। संख्‍याओं के बीच ही एक की सार्थकता है। इसलिए जो जानते है, वे यह भी नहीं कहते कि ब्रह्म एक है; वे कहते है, ब्रह्म अद्वय हे, नानडुअल है, दो नहीं है। बहुत अद्भुत बात कहते है। वे कहते है, परमात्‍मा दो नहीं है। दो नहीं है। बहुत अदभुद बात कहते है। वे कहते है कि परमात्‍मा की संख्‍या गिनने का उपाय नहीं है। एक कहकर भी हम संख्‍या में गिनने की कोशिश करते है। वह गलत है।</p>
<p>      लेकिन उस तक पहुंचना दूर, अभी तो हम स्‍थूल पर खड़े है, उस शरीर पर जो अनंत है, अनेक है। उस शरीर के भीतर हम प्रवेश करेंगे तो एक और शरीर उपल्‍बध होगा। सूक्ष्म शरीर को भी पार करेंगे तो वह उपलब्‍ध होगा। जो नहीं है, अशरीर है, जो आत्‍मा है।</p>
<p>      मैंने जो कल कहा, उसमे जरा भी विरोध नहीं है, उसमें कोई विरोधाभास नहीं है।</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>मैं मृत्‍यु सिखाता हूं, प्रवचन&#8211; 2</strong></p>
<br />Filed under: <a href='http://oshosatsang.org/category/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b6%e0%a4%a8-%e0%a4%9a%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9a%e0%a4%be/'>प्रशन चर्चा</a> Tagged: <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/'>ओशो</a>, <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6/'>स्‍वामी आनंद प्रसाद</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/oshosatsang.wordpress.com/4290/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/oshosatsang.wordpress.com/4290/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/oshosatsang.wordpress.com/4290/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/oshosatsang.wordpress.com/4290/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/oshosatsang.wordpress.com/4290/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/oshosatsang.wordpress.com/4290/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/oshosatsang.wordpress.com/4290/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/oshosatsang.wordpress.com/4290/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/oshosatsang.wordpress.com/4290/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/oshosatsang.wordpress.com/4290/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/oshosatsang.wordpress.com/4290/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/oshosatsang.wordpress.com/4290/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/oshosatsang.wordpress.com/4290/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/oshosatsang.wordpress.com/4290/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4290&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://oshosatsang.org/2012/01/08/%e0%a4%b8%e0%a5%82%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%b6%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a4%97%e0%a4%a4-%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>1</slash:comments>
		<georss:point>28.621671 77.162177</georss:point>
		<geo:lat>28.621671</geo:lat>
		<geo:long>77.162177</geo:long>
		<media:content url="http://1.gravatar.com/avatar/18ba8ff7182a19f3392c7e668fd1934c?s=96&#38;d=identicon&#38;r=G" medium="image">
			<media:title type="html">anandprashad</media:title>
		</media:content>
	</item>
		<item>
		<title>माय ऐक्सपैरिमैंट विद दि टूथ(महात्‍मा गांधी)—ओशो की प्रिय पुस्‍तकें</title>
		<link>http://oshosatsang.org/2012/01/07/%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%af-%e0%a4%90%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a4%aa%e0%a5%88%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%82%e0%a4%9f-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a6-%e0%a4%a6%e0%a4%bf-%e0%a4%9f/</link>
		<comments>http://oshosatsang.org/2012/01/07/%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%af-%e0%a4%90%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a4%aa%e0%a5%88%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%82%e0%a4%9f-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a6-%e0%a4%a6%e0%a4%bf-%e0%a4%9f/#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 07 Jan 2012 13:35:29 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[ओशो की प्रिय पूस्‍तके--]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://oshosatsang.org/?p=4287</guid>
		<description><![CDATA[आज में जिस किताब का जिक्र करने जा रहा हूं, उसके बारे में किसी ने सोचा नहीं होगा कि मैं बोलूगा। वह है: महात्‍मा गांधी की आत्‍मकथा। माय ऐक्सपैरिमैंट विथ टूथ। सत्‍य को लेकिर उनके प्रयोगों के विषय में बात &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/01/07/%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%af-%e0%a4%90%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a4%aa%e0%a5%88%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%82%e0%a4%9f-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a6-%e0%a4%a6%e0%a4%bf-%e0%a4%9f/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4287&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>आज में जिस किताब का जिक्र करने जा रहा हूं, उसके बारे में किसी ने सोचा नहीं होगा कि मैं  बोलूगा। वह है: महात्‍मा गांधी की आत्‍मकथा। माय ऐक्सपैरिमैंट विथ टूथ। सत्‍य को लेकिर उनके प्रयोगों के विषय में बात करना सचमुच अद्भुत है। यह सही समय है।</p>
<p>      आज महात्‍मा गांधी के बारे में मैं कुछ अच्‍छी बातें कहता हूं, एक: एक भी व्‍यक्‍ति ने अपनी जीवनी इतनी ईमानदारी से, इतनी प्रामाणिकता से नहीं लिखी। आज तक जो सबसे प्रमाणिक जीवनी लिखी गई उसमें से एक है।<span id="more-4287"></span></p>
<p>      जीवनी बड़ी विचित्र चीज है। या तो तुम अपनी प्रशंसा करना शुरू कर दो या अत्‍यंत विनम्र बनो। लेकिन महात्‍मा गांधी ये दोनों बातें नहीं कहते। वे सरल है; सिर्फ तथ्‍य कथन करते है, एक वैज्ञानिक की भांति। उन्‍हें हम बात का बहुत अहसास है कि यह उनकी जीवनी है। वे उन सब बातों को कहते है जिन्‍हें आदमी दूसरों से छिपाना चाहता है।</p>
<p>      लेकिन इसका शीर्षक गलत है। सत्‍य के साथ प्रयोग नहीं किये जा सकते। या तो आप उसे जान सकते हो या नहीं जान सकते। लेकिन उसके प्रयोग नहीं कर सकते। यह शब्‍द ‘’प्रयोग’’ ही वस्‍तुनिष्‍ठ विज्ञान के जगत का शब्‍द है। व्यक्ति निष्ठता के साथ प्रयोग नहीं कर सकते। ध्‍यान रहे, व्यक्ति निष्ठता (Subjectively) को, प्रयोग या निरीक्षण के किसी भी तल पर उतारना संभव नहीं है।</p>
<p>      अस्‍तित्‍व में व्‍यक्‍तिनिष्‍ठता सबसे रहस्‍यपूर्ण घटना है। और उसका रहस्‍य यह है कि वह सदा पीछे हटता चला जाता है। तुम जिसका भी निरीक्षण करते हो वह ‘’वह’’ नहीं है: वह व्‍यक्‍तिनिष्‍ठता नहीं है। व्‍यक्‍तिनिष्‍ठता निरीक्षक है, निरीक्षण की जानेवाली वस्‍तु नहीं है। सत्‍य के प्रयोग नहीं किए जा सकते क्‍योंकि प्रयोग केवल वस्‍तुओं के , विषयों के किये जाते है। चेतना के नहीं।</p>
<p>      महात्‍मा गांधी ईमानदार और भले आदमी थे। लेकिन वे ध्‍यानी नहीं थे। और अगर कोई ध्‍यानी नहीं है तो कितना ही अच्‍छा क्‍यों न हो, सब बेकार है। उन्‍होंने जीवन भर प्रयोग किए और कुछ भी उपल्‍बध न हुआ। वे उतने ही अज्ञानी मरे जितने कि थे। यह दुर्भाग्‍य है क्‍योंकि इतना संगठित, इतना ईमानदार, इतना प्रामाणिक आदमी मिलना मुश्किल है। सत्‍य को खोजने की उनकी इच्‍छा प्रबल थी। लेकिन वही इच्‍छा बाधा बन गई।</p>
<p>      सत्‍य मेरे जैसे लोगों को मिलता है जो उसकी फिक्र ही नहीं करते। जो सत्‍य की और ध्‍यान भी नहीं देते। मेरे द्वार पर परमात्‍मा भी दस्‍तक दे तो मैं खोलनेवाला नहीं हूं, द्वार खोलने का उपाय भी उसे ही खोजना होगा। सत्‍य ऐसे आलसी लोगों के पास आता है। इसलिए मैं स्‍वयं को ‘’बुद्धत्‍व के लिए आलसी मनुष्‍य का मार्गदर्शक’’ कहता हूं।</p>
<p>      मुझे इस आदमी से हमदर्दी है यद्यपि मैंने उसकी राजनीति की, सामाजिक विचारों की और समय के चरख़े को पीछे की और मोड़ने की मूढ़ धारणाओं की हमेशा आलोचना की है। वे चाहते थे कि मनुष्‍य पुन: आदिम हो जाए। वे सभी टैकनॉलॉजी के खिलाफ थे। यहां तक कि रेलगाड़ी और डाक-तार के भी विरोध में थे। विज्ञान के बगैर आदमी बंदर हो जायेगा। माना कि बंदर ताकतवर होता है, लेकिन बंदर आखिर बंदर ही है। आदमी को आगे बढ़ना है।</p>
<p>      मुझे किताब के शीर्षक पर भी ऐतराज है। क्‍योंकि यह सिर्फ शीर्षक नहीं है, उनके पूरे जीवन का सारांश है। वे सोचते थे, चूंकि वे इंग्‍लैड में पढ़े थे, वे आदर्श भारतीय अंग्रेज थे। बिलकुल विक्‍टोरियन। ये विक्‍टोरियन लोग नर्क में जाते है। गांधी बहुत भद्र व्यक्ति थे, शिष्‍टाचार और तहजीब से भरपूर। हर तरह की अंग्रेज मूढताएं&#8230;&#8230;</p>
<p>      महात्‍मा गांधी इंग्‍लैड में पढ़े। शायद उसी कारण वे इतने उलझ गये। बेहतर होता अगर वे अशिक्षित रहते । फिर वे सत्‍य के प्रयोग न करते, सत्‍य का अनुभव करते।</p>
<p>      सत्‍य को जानना हो तो उसको अनुभव करना चाहिए, उसके प्रयोग नहीं।</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>बुक्‍स आय हैव लव्‍ड</strong></p>
<p><strong>किताब की एक झलक:</strong></p>
<p>      नैटाल की राजधानी मेरिन्‍सवर्ग में ट्रेन कोई 9 बजे पहुंची। यहां सोने वालों को बिछौना दिए जाते थे। एक रेलवे के नौकर ने आकर पूछा&#8211;</p>
<p>      ‘’आप बिछौना चाहते है?’’</p>
<p>      मैंने कहा—‘’मेरे पास बिछौना है।</p>
<p>      वह चला गया। इस बीच में एक यात्री आया। उसने मेरी और देखा। मुझे काला आदमी देखकर चकराया, बहार गया ओ एक दो कर्मचारियों को लेकर आया। किसी ने मुझ‍ से कुछ न कहा—अंत में एक अफसर आया। कहा चलो, तुमको दूसरे डिब्‍बे में जाना होगा।‘’</p>
<p>      मैंने कहा—‘’पर मेरे पास पहले दर्जे का टिकट है।‘’</p>
<p>      उसने कहा—‘’परवाह नहीं, मैं तुमसे कहता हूं कि तुम्‍हें आखिरी डिब्‍बे में बैठना होगा।‘’</p>
<p>      ‘’मैं कहता हूं कि मुझे डरबन से इसी डिब्‍बे में बिठाया गया है। और इसी में जाना चाहता हूं।‘’</p>
<p>      अफसर बोला—‘’यह नहीं हो सकता। तुम्‍हें उतरना होगा, नहीं तो सिपाही आकर उतार देंगे।‘’</p>
<p>      मैंने कहा—‘’तो सिपाही आकर भले ही मुझे उतार दें, मैं अपने से नहीं उतरूंगा।‘’</p>
<p>      सिपाही आया। उसने हाथ पकड़ा और धक्‍का मारकर मुझे नीचे गिरा दिया। मेरा सामान नीचे फेंक दिया गया। मैंने दूसरे डिब्‍बे में जाने से इनकार कर दिया। गाड़ी चल दी। मैं वेटिंग रूम में जा बैठा। हैंडबैग अपने साथ रखा। दूसरे सामान को मैने हाथ न लगाया। रेलवे वालों ने सामान कही रखवा दिया।</p>
<p>      मौसम जाड़े का था। दक्षिण अफ्रीका में ऊंची जगहों पर बड़े जोर का जाड़ा पड़ता है। मेरिन्सवर्ग ऊँचाई पर था। इससे खूब जाड़ा लगा। मेरा ओवरकोट मेरे सामान में रह गया था। सामान मांगने की हिम्‍मत न पड़ी कि कहीं फिर बेइज्‍जती न हो। जाड़े में सिकुड़ता और ठिठुरता रहा। कमरे में रोशनी न थी। आधी रात के समय एक मुसाफिर आया। ऐसा जान पडा मानो वह कुछ बात करना चाहता है। पर मेरे मन की हालत ऐसी न थी की मैं बात करता।</p>
<p>      मैंने सोचा—मेरा कर्तव्‍य क्‍या है? या तो मुझे अपने हकों के लिए लड़ना चाहिए, या वापस लौट जाना चाहिए। अथवा जो बेइज्‍जती हो रही है, उसे बर्दाश्‍त करके प्रिटोरिया पहुंचूं और मुक़द्दमे का काम खत्‍म कर के देश चला जाऊं। मुक्दमें को अधूरा छोड़कर भाग जाना तो कायरता होगी। मुझे पर जो कुछ बीत रही है, वह तो ऊपरी चोट है, वह तो भीतर के महारोग का एक बह्म लक्षण है। यह महारोग है वर्ण-द्वेष। यदि इस गहरी बीमारी को उखाड़ फेंकने की सामर्थ्‍य हो तो उसका उपयोग करना चाहिए। उसके लिए जो कुछ कष्‍ट और दुःख सहन करना पड़े, सहना चाहिए। इन अन्‍यायों का विरोध उसी हद तक करना चाहिए। जिस हद तक उनका संबंध रंग-द्वेष दूर करने से हो।</p>
<p>      ऐसा संकल्‍प करके मैने जिस तरह हो दूसरी गाड़ी से आगे जाने का निश्‍चय किया।</p>
<p>      रात गई गाड़ी गई। ट्रेन मुझे चार्ल्‍स टाउन ले चली।</p>
<p>      चार्ल्‍स टाउन ट्रेन सुबह पहुँचती है। चार्ल्‍स टाउन से जोहानिसबर्ग तक पहुंचने के लिए उस समय ट्रेन न थी। घोड़ा गाडी थी। और बीच में एक रात स्टैड रटन में रहना पड़ता था। मेरे पास घोड़ा-गाड़ी का टिकट था। मेरे एक दिन पिछड़ जाने से यह टिकट रद न होता था। फिर अब्‍दुल्‍ला सेठ ने चार्ल्‍स टाउन के घोड़ा-गाड़ी को तार भी दे दिया था। पर उसे तो बहाना बनाना था। इसलिए मुझे एक अंजान आदमी समझ कर उसने कहा—‘’तुम्‍हारा टिकट रद हो गया है।‘’ मैंने उचित उत्‍तर दिया। यह कहने का, कि टिकट रद्द हो गया है। कारण तो और ही था। मुसाफिर सब घोड़ा-गाडी में बैठते है। पर मैं समझा जाता था ’’कुली’’ और अंजान मालूम होता था। इसलिए घोड़ा-गाड़ी वाले कि यह नीयत थी कि मुझे गोरे मुसाफ़िरों के पास न बैठना पड़े तो अच्‍छा है। घोड़ा गाड़ी के बाहर की तरह अर्थात हांकने वाले के पास, दाएं-बांए दो बैठके थी। उनमें से एक बैठक पर घोड़ा गाड़ी के मालिक अफसर गोरा बैठता। वह अंदर बैठा और मुझे हांकने वाले के पास बिठाया। मैं समझ गया कि यह बिलकुल अन्‍याय है। अपमान है, परंतु मैंने इसे पी लिया। मैं जबर्दस्‍ती तो अंदर बैठ नहीं सकता था। यदि झगडा छेडूं तो घोड़ा गाड़ी वाला गाडी चला कर ले जाएं और मुझे एक दिन की देर हो, और दूसरे दिन का हाल परमात्‍मा ह जाने। इसलिए मैंने समझदारी से काम लिया और बैठ गया। मन में बड़ी खीझ रहा था।</p>
<p>      कोई तीन बजे घोड़ा गाड़ी पारडीकोप पर पहुंची। उस वक्‍त गोरे अफसर को मेरी जगह बैठने की इच्‍छा हुई। उसे सिगरेट पीना था। शायद खुली हवा भी खानी थी। सो उसने एक मैला सा बोरा हांकने वाले के पास से लिया। और पैर रखने के तख्‍ते पर बिछाकर मुझसे कहा—सामी, तू यहां बैठ, मैं हांकने वाले के पास बैठूंगा।‘’ इस अपमान को सहन करना मेरे सामर्थ्‍य के बाहर था। इसलिए मैंने डरते-डरते कहां, ‘’तुमने मुझे यहां जो बैठाया, सो मैंने इस अपमान को सहन कर लिया। मेरी जगह तो थी अंदर; पर तुमने अंदर बैठकर मुझे यहां बैठाया; अब तुम्‍हारा दिल बहार बैठने का हुआ, तुम्‍हें सिगरेट पीना है, इसलिए तुम मुझे अपने पैरों के पास बिठाना चाहते हो। मैं चाहे अंदर चला जाऊं पर तुम्‍हारे पैरों के पास बैठने को तैयार नहीं हूं।</p>
<p>      यह मैं किसी तरह से कह ही रहा था। कि मुझे पर थप्‍पड़ों की वर्षा होने लगी। और मेरे हाथ पकड़कर वह नीचे खींचने लगा। मैंने बैठक के पास लगे पीतल के सीख़चों को जोर से पकड़ लिया, और निश्‍चय कर लिया कि कलाई टुट जाने पर भी सींखचे न छोडूंगा। मुझ पर जा कुछ बीत रही थी, वह अंदर वाले यात्री देख रहे थे। वह मुझे गालियां दे रहा था। खींच रहा था। फिर भी में चुप रहा। वह तो बलवान और मैं बल-हीन। कुछ मुसाफ़िरों को दया आई और किसी ने कहा—अजी बेचारे को वहां बैठने क्‍यों नहीं देते? फिजूल उसे मार पीट रहे हो? वह ठीक तो कहता है, वहां नहीं तो उसे हमारे पास अंदर बैठने दो। वह बोला हरगिज नहीं। पर जरा सिटपिटा जरूर गया। पीटना छोड़ दिया, मेरा हाथ भी छोड़ दिया। हां दो चार गालियां अलबत्‍ता और दे डाली। फिर एक हाटेटोर नौकर को जो दूसरी तरफ बैठा था, अपने पाँव के पास बिठाया, और खुद बहार बैठा। मुसाफिर अंदर बैठे। सीटी बजी और घोड़ा-गाड़ी चली। मेरी छाती धक-धक कर रही थी। मुझे भय था कि मैं जीते जी मुकाम पर पहुंच सकूंगा कि नहीं। गौरा मेरी और त्योरी चढ़ाकर देख रहा था। अंगुलि का इशारा करके बकता रहा—‘’याद रख स्टैण्ड रन पहुंचने दे, फिर तुझे मजा चखाऊंगा।‘’ मैं चुप साध कर बैठा रहा और ईश्‍वर से सहायता के लिए प्रार्थना करता रहा।</p>
<p><strong>महात्‍मा गांधी</p>
<p>आत्‍म कथा</strong></p>
<br />Filed under: <a href='http://oshosatsang.org/category/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%af-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%a4%e0%a4%95%e0%a5%87/'>ओशो की प्रिय पूस्‍तके--</a> Tagged: <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/'>ओशो</a>, <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6/'>स्‍वामी आनंद प्रसाद</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/oshosatsang.wordpress.com/4287/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/oshosatsang.wordpress.com/4287/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/oshosatsang.wordpress.com/4287/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/oshosatsang.wordpress.com/4287/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/oshosatsang.wordpress.com/4287/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/oshosatsang.wordpress.com/4287/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/oshosatsang.wordpress.com/4287/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/oshosatsang.wordpress.com/4287/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/oshosatsang.wordpress.com/4287/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/oshosatsang.wordpress.com/4287/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/oshosatsang.wordpress.com/4287/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/oshosatsang.wordpress.com/4287/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/oshosatsang.wordpress.com/4287/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/oshosatsang.wordpress.com/4287/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4287&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://oshosatsang.org/2012/01/07/%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%af-%e0%a4%90%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a4%aa%e0%a5%88%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%82%e0%a4%9f-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a6-%e0%a4%a6%e0%a4%bf-%e0%a4%9f/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>0</slash:comments>
		<georss:point>28.621671 77.162177</georss:point>
		<geo:lat>28.621671</geo:lat>
		<geo:long>77.162177</geo:long>
		<media:content url="http://1.gravatar.com/avatar/18ba8ff7182a19f3392c7e668fd1934c?s=96&#38;d=identicon&#38;r=G" medium="image">
			<media:title type="html">anandprashad</media:title>
		</media:content>
	</item>
		<item>
		<title>दि आऊटसाइडर: ओशो की प्रिय पुस्‍तकें</title>
		<link>http://oshosatsang.org/2012/01/07/%e0%a4%a6%e0%a4%bf-%e0%a4%86%e0%a4%8a%e0%a4%9f%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%a1%e0%a4%b0-%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%af-%e0%a4%aa/</link>
		<comments>http://oshosatsang.org/2012/01/07/%e0%a4%a6%e0%a4%bf-%e0%a4%86%e0%a4%8a%e0%a4%9f%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%a1%e0%a4%b0-%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%af-%e0%a4%aa/#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 07 Jan 2012 07:09:54 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[ओशो की प्रिय पूस्‍तके--]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://oshosatsang.org/?p=4285</guid>
		<description><![CDATA[(अजनबी)—कॉलिन विलसन (प्रसिद्ध लेखक एच. जी. वेल्‍स भी एक अजनबी है। वह स्‍वयं को ‘’अंधों के देश में आँखवाला आदमी’’ कहता है। सोरेन किर्कगार्ड एक गहरा आध्‍यात्‍मिक दार्शनिक था। ‘’अस्तित्ववाद’’ उसी ने प्रचलित की हुई संज्ञा है। उसने तर्क और &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/01/07/%e0%a4%a6%e0%a4%bf-%e0%a4%86%e0%a4%8a%e0%a4%9f%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%a1%e0%a4%b0-%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%af-%e0%a4%aa/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4285&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>(अजनबी)—कॉलिन विलसन</strong></p>
<p>(प्रसिद्ध लेखक एच. जी. वेल्‍स भी एक अजनबी है। वह स्‍वयं को ‘’अंधों के देश में आँखवाला आदमी’’ कहता है। सोरेन किर्कगार्ड एक गहरा आध्‍यात्‍मिक  दार्शनिक था। ‘’अस्तित्ववाद’’ उसी ने प्रचलित की हुई संज्ञा है। उसने तर्क और दर्शन को बिलकुल ही नकार दिया। वह कहता था: मैं कोई गणित का फार्मूला नहीं हूं—मैं वास्‍तव में ‘’हूं’’।</p>
<p>     बीसवीं सदी के मध्‍य में जो शब्‍द लोकप्रिय हुआ उनमें से एक है: आऊटसाइडर। अस्तित्ववादी दार्शनिक सार्त्र और आल्बेर कामू ने अपनी किताबों में इस शब्‍द का बहुत प्रयोग किया है। आऊटसाइडर। इस किताब पर एक फिल्‍म भी बनी थी जो बहुचर्चित रही।<span id="more-4285"></span></p>
<p>      क्‍या अर्थ है ‘’आऊटसाइडर’’ कि? शब्दशः: आऊटसाइडर वह है जो बाहरी व्‍यक्‍ति है, जिंदगी के बाहर खड़ा है। साथी द्रष्‍टा, तटस्‍थ। जीवन के कोलाहल में वह अजनबी है। साक्षी और द्रष्‍टा आध्‍यात्‍मिक शब्‍द है, और आऊटसाइडर दार्शनिकों के दिमाग से पैदा हुआ। बीसवीं सदी के प्रारंभ में पाश्‍चात्‍य विचारक मानव जीवन के प्रति हताश ओर निराशा से भर गये थे। उनकी बुद्धि इतनी प्रखर हो गई थी कि वह साधारण सामाजिक जीवन में रस नहीं ले पाती थी। उस दौर में जो भी अस्तित्ववादी साहित्‍य पैदा हुआ उसमे लेखकों का जीवन के प्रति रूख ऐसा था जैसे वे एक कमरे में खड़े है और दूसरे कमरे में घटने वाली घटनाओं को दूर से देख रहे है। इन अर्थों में आऊटसाइडर याने अजनबी।</p>
<p>      यह किताब आधुनिक युग का प्रतीक है। आधुनिक समय न जाने कैसी सभ्‍यता और संस्‍कृति विकसित हई है, आज हर शख्स जिस में थोड़ी भी सजगता है। अपने आपको बेगाना मानता है। वह जिंदगी से उखड़ा-उखड़ा जीता है। जैसे कोई अपना नहीं है। किसी से लगाव नहीं है। आऊटसाइडर या अजनबी होने को ख्‍याल ही इस मनोभूमि में अंकुरित हुआ है।</p>
<p>      यह किताब वक्‍त की जरूरत थी। एक ही तथ्‍य इसे सिद्ध करता है कि यह किताब कॉलिन विलसन ने 1956 में लिखी और 1960 तक इसके तेरह संस्‍करण प्रकाशित हुए। यह इस बात का प्रतीक है कि उन दिनों यह विचार बुद्धिजीवियों पर किस कदर छाया हुआ था। एक अजनबियों की जमात इस किताब की प्रतीक्षा कर रही थी। इस किताब में कॉलिन विलसन ने उन सब लेखकों की किताबों को शामिल किया है। जो असाधारण रूप से प्रतिभाशाली है। जो सतही, समाजिक जीवन से असंतुष्‍ट है; जिनकी कोई गहरी खोज है।</p>
<p>      जो अजनबी है उनकी समस्‍या क्‍या है? लोगों की भीड़ में अजनबी बनकर जीना सरल नहीं है। समस्‍या वह है कि एक ही शरीर में बंदर और मनुष्‍य दोनों जीते है। और जैसे ही बंदर की इच्‍छाएं पूरी होने के करीब होती है। वह गायब हो जाता है। और उसकी जगह मनुष्‍य आ जाता हे। और यह मनुष्‍य अपने बंदर से सषत नफरत करता है।</p>
<p>      विलसन किताब की शुरूआत में लिखता है: ‘’इस किताब के दौरान हम भिन्‍न-भिन्‍न प्रकार से इस समस्‍या का साक्षात करेंगे—दार्शनिक तल पर सार्त्र और कामू के साथ (जहां उसे अस्तित्ववाद कहा जाता है) धार्मिक स्‍तर पर बोहेमें और किर्कगार्ड के साथ&#8230;..समस्‍या कमोवेश रूप में वैसी ही रहती है।</p>
<p>      विलसन अजनबी की परिभाषा बड़ी मजेदार करता है। वह कहता है, ‘’अजनबी व्‍यक्‍ति एक समाजिक समस्‍या होता है। याने कि वह हर कहीं बेमेल होता है।‘’</p>
<p>      विलसन हमे तथ्‍य से आगाह करता है कि हर कलाकर अजनबी नहीं होता। शेक्‍सपीयर, डांटे, कीट्स बिलकुल सामान्‍य थे। सामाजिक थे अजनबी व्‍यक्‍ति कुछ बेगाना होता है। उस सब कुछ सपने जैसा प्रतीत होता है। अजनबी व्‍यक्‍ति आरामदेह, प्रतिष्‍ठित लोगों का सुरक्षित जीवन नहीं जी सकता। वह बहुत ज्‍यादा और बहुत गहरे देख लेता है। मूलत: उसकी पैनी नजर अराजक को देख लेती है। वह अराजक के प्रति जाग जाता है। और उसी में जीवन का बीज छिपा होता है। क़बाला नाम के कबीले यह मानते है कि अराजक या कै ओस वह स्‍थिति है जिसमे व्‍यवस्‍था छिपी हुई है। जैसे अंडा पक्षी का अराजक है, कै ओस है।</p>
<p>      प्रसिद्ध लेखक एच. जी. वेल्‍स भी एक अजनबी है। वह स्‍वयं को ‘’अंधों के देश में आँख वाला आदमी’’ कहता है। सोरेन किकगार्ड एक गहरा आध्‍यात्‍मिक दार्शनिक है। ‘’अस्‍तित्‍ववाद’’ उसी ने प्रचलित की हुई संज्ञा हे। उसने तर्क और दर्शन को बिलकुल की नकार दिया। वह कहता था। ‘’मैं कोई गणित का फार्मूला नहीं हूं—मैं वास्‍तव मैं, ‘’हूं’’।</p>
<p>      किर्कगार्ड और फ्रेडरिक नीत्‍शे दोनों विचारक अपने आप को अजनबी मानते थे।</p>
<p>      विलसन की किताब पढ़ते हुए एक बात बड़े प्रभावशाली रूप से उभरती है। और वह है, कॉलिन विलसन का आर्श्‍चयजनक अध्‍ययन। उसने पिछले दो शताब्‍दियों के सभी पाश्चात्य दार्शनिकों और विचारकों का लेखन न केवल पढ़ा है। बल्‍कि हजम किया है। और उस पूरे अध्‍ययन का सार निचोड इस किताब में प्रस्‍तुत किया है।  इसलिए विलसन का ‘’आऊटसाइडर’’ कामू और सार्त्र के आऊटसाइडर से बहुत विशाल है।</p>
<p>      यह आऊटसाइडर या अजनबी व्‍यक्‍ति, एक संकल्‍पना है, और पश्‍चिम के जिन लेखकों न इस संकल्‍पना को समृद्ध बनाने में योगदान दिया है उन सबको किताबों के परिछेद और उन लेखकों के विभिन्‍न पहलू सामने लाकर विलसन तटस्‍थता की धारणा को बहु आयामी ओर बहुत अमीर बनाता है। गहरे में, हर प्रतिभाशाली, जीनियस इस दुनिया में अजनबी की तरह जीता है।</p>
<p>      आऊटसाइडर को अस्‍तित्‍ववाद के छोटे दायरे से मुक्‍त कर विलसन उसे ‘’रोमांटिक आऊटसाइडर’’ की नई दिशाएं बहाल करता है। पुस्‍तक के तीसरे परिच्‍छेद में वह लिखता है।</p>
<p>      ‘’अस्तित्ववादियों ने पैदा किए हुए आऊटसाइडर के वातावरण में सांस लेना दुखद है। उसमें कुछ मितली आने जैसा है, जीवन विरोधी है। ये निरूदेश्‍य लोग एक ही कमरे में रहते है क्‍योंकि कुछ और करने जैसा नहीं है। इनके जीवन में कोई मूल्य नहीं है। यह बुज़ुर्गों का जगत है। इससे विपरीत बच्‍चों का जगत बिलकुल साफ-सुथरा है। उसकी हवा में अपेक्षाओं का स्‍पंदन है। क्रिसमस के समय सजी-धजी बड़ी दुकान नये का जगत का हिस्‍सा है। रूग्ण चित के लिए, इस दुकान के बाहर खड़े हुए आदमी के लिए यह नया जगत भय पैदा करता है। यह यांत्रिक सभ्‍यता का प्रतीक है जो लकीरों पर चलती है मानों ग्रामोफोन रेकार्ड हो।</p>
<p>      ‘’बच्‍चों के और बड़ों के जगत में जो फर्क है वही फर्क उन्‍नीसवीं शताब्‍दी और वर्तमान समय के बीच है। जॉज स्टूवर्ड मिल, हक्सले, डार्विन, इमर्सन, कार्ल इल, रस्‍किन इन विक्‍टोरियन युन के ऋषियों ने विचार के जगत में जो क्रांति लायी उससे मानव जीवन में  अंतहीन परिवर्तनों का सिलसिला शुरू हुआ। और मनुष्‍य अपनी ही मृत आत्‍माओं को सीढ़ी बनाता हुआ आगे बढ़ता चला गया। इससे पहले कि हम उसकी निंदा करें हम—जो कि दो विश्‍व युद्धों और अणु बम से बचकर निकले है—उन बुज़ुर्गों की स्‍थिति में है जो बच्‍चों की बुराई करते है। अठारहवीं और उन्‍नीसवीं सदी का बुद्धिवाद मन की मुर्दा, ऊबाऊ स्‍थिति नहीं थी। वह तीव्र और स्‍वस्‍थ आशावादिता का दौर था जिसे कठिन श्रम और साधारण तर्क से कोई एतराज न था। क्‍योंकि उसने अपने आपको इतना आजाद कभी न अनुभव किया था।</p>
<p>      बीसवीं सदी के पाश्‍चात्‍य लेखकों में हरमन हेस (सिद्धार्थ) का लेखक अर्नेस्‍ट, हमिंग्‍वे, एच जी वेल्‍स इत्‍यादि उपन्‍यासकारों की कृतियां अजनबी के विभिन्‍न पहलुओं को चित्रित करने वाली रचनाएं थी। कला के क्षेत्र में देखा जाए तो ऐसे कई कलाकार थे जो असाधारण प्रतिभा को न झेल पाने की वजह से विक्षिप्‍त हुए। उन्‍हें कॉलिन ‘’कलाकार आऊटसाइडर’’ कहता है। विन सेन्ट वॉन गाग, ऐसा अजनबी है जिसने चित्रकला को अपनी माध्‍यम चूना। विन सेंट वॉन गाग, टी ई लॉरेंस, विलक्षण रशियन नर्तक निजिन्‍सकी इसके कुछ उदाहरण है। इनमें निजिन्सकी पर ईश्‍वर या जीसस क्राइस्‍ट बनने की धुन सवार थी। इसके चलते, अंतिम दिनों में निजिन्सकी का पागल होना वाजिब था। उसकी डायरी उसके दर्दनाक जीवन पर काफी प्रकाश डालती है।</p>
<p>      नृत्‍य निजिन्सकी के भीतर बसे अजनबी की अभिव्‍यक्‍ति का माध्‍यम था; लेकिन वह सिर्फ कलाकार नहीं था, उसकी खोज धार्मिक थी। वह लिखता है, ‘’मैं अपने शरीर में ईश्‍वर को अनुभव करता हूं, कभी वह मेरे सिर में आग बनता है।&#8230;.मेरा शरीर बीमार नहीं है, मेरी आत्‍मा बीमार है। लेकिन डॉ इसे नहीं समझते।</p>
<p>अपनी डायरी में निजिन्सकी बार-बार लिखता है: मैं ईश्‍वर हूं, मैं ईश्‍वर हूं। मैं अपनी मांस मज्‍जा में इसे अनुभव करता हूं।‘’ निजिन्सकी का जिस्‍म उसकी सृजन ऊर्जा की अभिव्‍यक्‍ति बना और उसके उन्‍मेषों का आज्ञाकारी सेवक की तरह अनुसरण करता रहा। लोग इसे नृत्य कहते थे।</p>
<p>      अजनबी का यह भी मनभावन रूप था&#8230;&#8230;..</p>
<p>      फ्रेडरिक नीत्‍शे एक गंभीर, मौलिक चिंतन करने वाला अजनबी था। उसकी प्रतिभा उसे ही भारी पड़ गई। और निजिन्सकी की तरह आखिर वह भी पागल खानें में पहुंच गया। प्रसिद्ध रशियन उपन्यासकार दोस्‍तोव्‍सकी के उपन्‍यास ‘’ब्रदर्स कार्मोझोव’’ की सविस्‍तार समीक्षा करते हुए विलसन ‘’आऊटसाइडर’’ नाम के प्राणी की कुछ ख़ूबियाँ बताता है।</p>
<p>     <strong> 1.</strong> आऊटसाइडर तटस्‍थ बने रहना नहीं चाहता।</p>
<p>     <strong> 2.</strong> वह संतुलित होना चाहता है।</p>
<p>     <strong> 3. </strong>वह मनुष्‍य की आत्‍मा और उसकी कार्य शैली को समझना चाहता है।</p>
<p>     <strong> 4.</strong> वह क्षुद्रता से मुक्‍त होकर अधिक विशाल जीवन जीना चाहता है।</p>
<p>      <strong>5.</strong> सबसे बढ़कर वह स्‍वयं को अभिव्‍यक्‍ति करना चाहता है। क्‍योंकि उसी के द्वारा         वह  खुद को और खुद की अज्ञात संभावनाओं को समझ सकता है।</p>
<p>     <strong> 6.</strong>किबात के अंतिम दो  परिच्‍छेदों में अजनबी का स्‍तर बौद्धिक न रहकर आध्‍यात्‍मिक हो जाता है। इन परिच्‍छेदों में विलसन रहस्यदर्शीयों को शामिल करता है। उनमें एक है रामकृष्‍ण परमहंस, और दूसरे है, जॉर्ज गुरूजिएफ। रामकृष्‍ण परमहंस का परिचय देते हुए विलसन कहता है।‘’</p>
<p>      ‘’अब तक हम पाश्‍चात्‍य रहस्यदर्शीयों पर चिंतन करते रहे, अब हिंदू रहस्‍यदर्शी रामकृष्‍ण के जीवन का थोड़ा       अवलोकन करें। यह वातावरण अलग है। भारत में ध्‍यान और आत्‍म ज्ञान की लंबी परंपरा है। यहां हम देख सकते है कि आऊटसाइडर जब किसी परंपरा में प्रवेश करता है, जहां वह एक अकेला अजनबी नहीं रहता, तब क्‍या होता है।‘’</p>
<p>      रामकृष्‍ण उनकी शिशु वत निश्‍छलता को बरकरार रखने में सफल रहे। हमारी जटिल आधुनिक सभ्‍यता में हम अपने आसपास एक सषत पर्त ओढने को मजबूर हो जाते है। अंत: यह कहाना गलत नहीं होगा कि हमारे भौतिकवादी और मानवतावादी विचारधारा के लिए हमारी सभ्‍यता जिम्‍मेदार है। उधर रामकृष्‍ण कल्‍पना की उस उन्‍मत्‍त अवस्‍था में गहरे उतर सके जहां पश्‍चिम का आदमी विरला ही पहुंचा है।‘’</p>
<p>      ‘’किताब का समापन करते हुए विलसन ने यह स्‍वीकार किया है कि जीवन में जो भी आऊटसाइडर है, अजनबी है। वह कई समस्याओं से जूझता है। यह समाज साधारण व्‍यक्‍तियों के लिए बना है। उसमें असाधारण व्‍यक्‍ति सदा बेचैन और बेमेल ही रहेंगे। लेकिन ये ही वे व्‍यक्‍ति है जिन्‍होंने समाज को कुछ दिया है, विकास को गतिमान किया है। मनुष्‍य जीवन को समृद्ध बनाया है।</p>
<p>      एक और अजनबी है जो आध्‍यात्‍मिक तल पर जीता है, वह है साक्षी या द्रष्‍टा। वहीं वास्‍तविक तटस्‍थता को उपलब्‍ध हुआ है। सचमुच जीवन के खेल से ही बाहर है। यह अजनबी आनंदमय है, चैन और सुकून में जीता है। यहां तक पहुंचने के लिए मन को छोड़ना पड़ता है। लेकिन पश्‍चिम के बुद्धिजीवी के लिए यह बहुत लंबा सफर है। इसका एक इशारा विलसन के अंतिम वाक्‍य में है।</p>
<p>      ‘’आत्‍म विकास की अंतिम यात्रा पर जब कोई निकलता है तो उसकी शुरूआत अजनबी की तरह होती है और अंत, संत की तरह।‘’</p>
<p><strong>ओशो का नज़रिया:</strong></p>
<p> ‘’कॉलिन विलसन ने लिखी हुई ‘’दि आऊटसाइडर’’ इस सदी की सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण किताबों में से एक है। लेकिन यह आदमी साधारण है। वह अद्भुत क्षमता का विद्वान है। और उसमें कुछ अंतदृष्टियां भी है—यह किताब सुंदर है।</p>
<p>      जहां तक कॉलिन विलसन का सवाल है, वह खुद आऊटसाइडर नहीं है, वह सांसारिक आदमी है। मैं ‘’आऊटसाइडर’’ हूं, इसलिए मुझे यह किताब अच्‍छी लगती है। मुझे इसलिए अच्‍छी लगती है क्‍योंकि यद्यपि वह उन आयामों को नहीं जानता जिनका वर्णन करता है। वह सत्‍य के बहुत करीब जाकर लिखता है। लेकिन ध्‍यान रहे, तुम सत्‍य के कितने ही करीब होओ, होओगे असत्‍य ही। या तो  तुम सत्‍य हो, या असत्‍य; इसके बीच कुछ नहीं है।</p>
<p>      कॉलिन ने बहुत बड़ा प्रयास किया है। वह आऊटसाइडर के बाहर खड़ा होकर उसके भीतर झांकने का प्रयास करता है। जैसे कोई दरवाजे के बाहर खड़ा होकर ‘’की होल’’ से अंदर झांके। वह थोड़ा बहुत तो देख ही सकता है। और कॉलिन विलसन ने  देखा है।</p>
<p>      यह किताब पढ़ने जैसी है—सिर्फ पढ़ने जैसी। अध्‍ययन करने जैसी नहीं है। इसे पढ़ो और फिर फेंक दो। क्‍योंकि जब तक कोई किताब वास्‍तविक अजनबी से नहीं आती तब तक वह सत्‍य सिर्फ एक प्रतिध्‍वनि होगी—दूर की प्रतिध्‍वनि &#8230;.प्रतिध्‍वनि की प्रतिध्‍वनि ।</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>बुक्‍स आय हैव लव्‍ड</strong></p>
<br />Filed under: <a href='http://oshosatsang.org/category/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%af-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%a4%e0%a4%95%e0%a5%87/'>ओशो की प्रिय पूस्‍तके--</a> Tagged: <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/'>ओशो</a>, <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6/'>स्‍वामी आनंद प्रसाद</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/oshosatsang.wordpress.com/4285/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/oshosatsang.wordpress.com/4285/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/oshosatsang.wordpress.com/4285/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/oshosatsang.wordpress.com/4285/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/oshosatsang.wordpress.com/4285/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/oshosatsang.wordpress.com/4285/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/oshosatsang.wordpress.com/4285/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/oshosatsang.wordpress.com/4285/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/oshosatsang.wordpress.com/4285/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/oshosatsang.wordpress.com/4285/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/oshosatsang.wordpress.com/4285/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/oshosatsang.wordpress.com/4285/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/oshosatsang.wordpress.com/4285/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/oshosatsang.wordpress.com/4285/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4285&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://oshosatsang.org/2012/01/07/%e0%a4%a6%e0%a4%bf-%e0%a4%86%e0%a4%8a%e0%a4%9f%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%a1%e0%a4%b0-%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%af-%e0%a4%aa/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>1</slash:comments>
		<georss:point>28.621671 77.162177</georss:point>
		<geo:lat>28.621671</geo:lat>
		<geo:long>77.162177</geo:long>
		<media:content url="http://1.gravatar.com/avatar/18ba8ff7182a19f3392c7e668fd1934c?s=96&#38;d=identicon&#38;r=G" medium="image">
			<media:title type="html">anandprashad</media:title>
		</media:content>
	</item>
		<item>
		<title>ए न्‍यू मॉडल ऑफ दि यूनिवर्स—(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)</title>
		<link>http://oshosatsang.org/2012/01/06/%e0%a4%8f-%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%af%e0%a5%82-%e0%a4%ae%e0%a5%89%e0%a4%a1%e0%a4%b2-%e0%a4%91%e0%a4%ab-%e0%a4%a6%e0%a4%bf-%e0%a4%af%e0%a5%82%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a5%8d/</link>
		<comments>http://oshosatsang.org/2012/01/06/%e0%a4%8f-%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%af%e0%a5%82-%e0%a4%ae%e0%a5%89%e0%a4%a1%e0%a4%b2-%e0%a4%91%e0%a4%ab-%e0%a4%a6%e0%a4%bf-%e0%a4%af%e0%a5%82%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a5%8d/#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 06 Jan 2012 12:34:22 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[ओशो की प्रिय पूस्‍तके--]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://oshosatsang.org/?p=4281</guid>
		<description><![CDATA[पी. डी. ऑस्पेन्सकी एक रशियन गणितज्ञ और रहस्‍यवादी था। उसे रहस्‍यदर्शी तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन रहस्‍य का खोजी जरूर था। विज्ञान अध्‍यात्‍म, गुह्म विद्या, इन सबमें उसकी एक साथ गहरी पैठ थी। इस अद्भुत प्रतिभाशाली लेखक ने पूरी &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/01/06/%e0%a4%8f-%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%af%e0%a5%82-%e0%a4%ae%e0%a5%89%e0%a4%a1%e0%a4%b2-%e0%a4%91%e0%a4%ab-%e0%a4%a6%e0%a4%bf-%e0%a4%af%e0%a5%82%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a5%8d/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4281&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पी. डी. ऑस्पेन्सकी एक रशियन गणितज्ञ और रहस्‍यवादी था। उसे रहस्‍यदर्शी तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन रहस्‍य का खोजी जरूर था। विज्ञान अध्‍यात्‍म, गुह्म विद्या, इन सबमें उसकी एक साथ गहरी पैठ थी। इस अद्भुत प्रतिभाशाली लेखक ने पूरी जिंदगी अस्‍तित्‍व की पहेली को समझने-बुझने में लगायी। उसने विश्वंभर में भ्रमण किया, वह भारत भी आया, कई योगियों और महात्‍माओं से मिला। और अंत मैं गुरजिएफ का शिष्‍य बन गया। गुरजिएफ के साथ उसे जो अनुभव हुए उनके आधार पर उसने कई किताबें लिखी।</strong></p>
<p>     ऑस्पेन्सकी को बचपन से ही अदृश्‍य पुकारता था; उसकी झलकें आती थी। एक तरफ वह फ़िज़िक्स का अध्‍यन करता और दूसरी तरफ उसे ‘’अनंतता’’ दिखाई देता।<span id="more-4281"></span></p>
<p>     ओशो ने ऑस्‍पेन्‍सकी की पाँच किताबों को अपनी मनपसंद किताबों में शामिल किया है। ‘’टर्शियम ऑर्गेनम’’, ‘’इस सर्च ऑफ दि मिरेकुलस’’, ‘’ एक न्‍यू मॉडल ऑफ यूनिवर्स’’, ‘’दी फोर्थ वे’’, और ‘’दि फ़्यूचर साइकॉलॉजी ऑफ मैन’’। वे स्‍पष्‍ट रूप से कहते थे, ऑस्पेन्सकी की किताबें मुझे बहुत पसंद है।</p>
<p>      इस किताब के भी 542 पृष्‍ठ है, और बारह प्रकरण है। यह एक अच्‍छा खाता रत्‍नाकर हे। विचारों के रत्‍न ही रत्‍न भरे पड़े है। इसके पन्‍नों में। और हर विचार ऐसा जो हमें एक नई अंतर्दृष्‍टि दे, जीवन के बारे में नये ढंग से सोचने की प्रेरणा दे। किताब का प्रारंभिक प्रकरण है ’’इसोटेरिज्‍म एक मॉडर्न थॉट (गुह्म विज्ञान और आधुनिक विचार) और अंतिम प्रकरण है: सेक्‍स एंड इवोल्यूशन (सेक्‍स और विकास)। ऑस्‍पेन्‍सकी निरंतर विज्ञान की खोजों का आधार लेते हुए, उसकी नींव पर रहस्‍य और अध्‍यात्‍म का भवन खड़ा करता है। उसका पूरा प्रयास यह है कि अतीत के आविष्‍कारों, वैज्ञानिकों, तर्क शास्त्रियों और नियमों को रद्द करके आधुनिक मनुष्‍य को एक नवीन, संपूर्ण और स्‍वस्‍थ आध्‍यात्‍मिक दृष्‍टि दी जाये। इसीलिए उसने किताब का नामकरण किया है: ‘’ए न्‍यू मॉडल ऑफ दि यूनिवर्स’’  इसी नाम का एक प्रकरण भी है इस किताब में।</p>
<p>      ऑस्‍पेन्‍सकी का तर्क सीधा-साफ है। वह कहता है विश्‍व को समझने के लिए उसकी एक रूपरेखा बनानी जरूरी है। जैसे घर बनाने से पहले आर्किटेक्‍ट उसका नक्‍शा बनाता है। विज्ञान और दर्शन ने अतीत में विश्‍व का जो नक्‍शा बनाया था वह बड़ा संकीर्ण था। फ़िज़िक्स, केमिस्‍ट्री, खगोलविज्ञान इतना विकसित नहीं हुआ था। अब बीसवीं सदी में विज्ञान ने और विचार ने इतनी छलाँगें लगाई है कि अब हमें अरस्तू न्‍यूटन, पाइथागोरस, यूक्लिडी इत्‍यादि लोगों को सम्‍मानपूर्वक विदा करना चाहिए। विज्ञान ने ही अपने पुरखों की उपयोगिता निरर्थक कर दी है।</p>
<p>      किताब की भूमिका में प्रसिद्ध अंग्रेज नाटककार इब्‍सेन द्वारा निर्मित एक पात्र डॉ स्‍टॉकमन का एक वक्तृत्व ऑस्पेन्सकी के उद्धृत किया है। (इस वक्‍तव्‍य पर ओशो के पेन के लाल निशान लगे है।) वह कहता है, ‘’ कुछ जरा-जर्जर सत्‍य होते है। वे अपनी उम्र से कुछ ज्‍यादा जी चुके है। और जब सत्‍य इतना बूढा होता है तो वह झूठ बनने के रास्‍ते पर होता है। इस तरह के सभी जीर्ण सत्‍य मांस के सड़े हुए टुकड़े की तरह होते है। उनमें पैदा होने वाली नैतिक बीमारी लोगों की अंतड़ियों को भीतर से कुरेदती रहती है।</p>
<p>      अतीत का विचार और विज्ञान अब एक बूढा सत्‍य हो चूका है जो लंबी उमर के कारण असत्‍य बन गया है।</p>
<p>      ऑस्पेन्सकी ने दो तरह की सोच बतायी है: तर्कसंगत और मनोवैज्ञानिक, अब तक हम आस्‍तित्‍व को तर्कसंगत मस्‍तिष्‍क से समझने की कोशिश करते थे लेकिन अस्‍तित्‍व बहुत विराट है, उसे समझने के लिए नई संवेदनशीलता चाहिए जो कि मनोवैज्ञानिक सोच से आ सकती है। तर्क बड़े सुनिश्चत निष्‍कर्ष निकालता है। और तार्किक मस्‍तिष्‍क सोचता है कि उसने सब कुछ  जान लिया। इसलिए जीवन के रहस्‍य को वह बिलकुल चूक जाता है। मनोवैज्ञानिक मस्‍तिष्‍क मुश्‍किल में पड़ जाता है। क्‍योंकि उसके सामने रहस्‍य के इतने द्वार खुल जाते है कि वह कुछ भी सुलझा नहीं पाता। अस्‍तित्‍व के समक्ष विवश होकर खड़ा रह जाता है। लेकिन वह आदमी रहस्‍य को जीता है।</p>
<p>      ऑस्पेन्सकी को बचपन से ही अदृश्‍य पुकारता था; उसकी झलकें आती थी। एक तरफ वह फ़िज़िक्स का अध्‍ययन करता और दूसरी तरफ उसे अनंतता के आलोक में वस्‍तुओं की जड़ता खो जाती। सब कुछ चैतन्‍य से तरंगायित नजर आता। जब चेतना नजर आती है तो उसके साथ एक और परिवर्तन घटते है। वस्‍तुओं को जोड़ने वाले एक अखंड तत्‍व का साक्षात होता है। इन परा मानसिक अनुभूतियों के बाद ऑस्‍पेन्‍सकी अपने घर में न रह सका। वह पूरब की और चल पडा गुह्म रहस्‍य विद्यालयों और गुरूओं की खोज में।</p>
<p>      ऑस्‍पेन्‍सकी अपनी यात्रा के दौरान ईजिप्‍त से होते हुए भारत आया। वह इतने आध्‍यात्‍मिक व्यक्तियों से मिला कि धीरे-धीरे उसकी आंखों के सामने एक नया रहस्‍यपूर्ण समाज उभरने लगा, नयी कोटि के लोग जिनके पैदा होने की तैयारियाँ चल रही है; नये आदर्श नये बीज बोये जा रहे है ताकि आदमी की नई नस्‍ल पैदा हो। क्‍या यह ओशो चेतना के अवतरण की पूर्व तैयारी थी। वे नई कोटि के लोग कौन है? ओशो कहते है: ‘’ऑस्‍पेन्‍सकी मेरे संन्‍यासियों की बात कर रहा है।‘’ (बुक्स आय हैव लव्‍ड)</p>
<p>      ऑस्‍पेन्‍सकी रहस्‍य लोक और भौतिक जगत को जोड़नेवाला एक सेतु है। वह निरंतर मनुष्‍य की प्रचलित, स्‍थापित धारणाओं का अनदेखा पहलू दिखाता है। जैसे डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत के बारे में वह कहता है, कि यह सिद्धांत अब मनुष्‍य के मस्‍तिष्‍क में इतना खुद गया है। इसके पक्ष में बोलना पुरातन पंथी लगता है। लेकिन विकास वाद हर कहीं लागू नहीं होता। अगर हर चीज एक नियम के अनुसार विकसित हो रही है तो फिर दुर्घटनाओं का क्‍या? घटनाओं की आकस्‍मिकता की क्‍या व्‍याख्‍या होगी। कुछ चीजें ऐसी भी है जो विकास से परे है,‍ जैसे आनंद, चेतना, आसमान।</p>
<p>      समय की चर्चा करते हुए, ‘’इटर्नल रिकरन्‍स’’ ‘’अर्थात शाश्‍वत पुनरावर्तन’’ के प्रकरण में ऑस्‍पेन्‍सकी ने यह अंत दृष्टि दी है कि तार्किक मस्तिष्क को समय जैसा दिखाई देता है, केवल वैसा ही नहीं है। समय का तीन आयामों के, विश्‍व के पास का चौथा आयाम भी है: अनंतता, अनंतता समय का अंत ही विस्‍तार नहीं है। बल्‍कि त्रिकाल(भूत, वर्तमान, भविष्‍य) के पार स्‍थित, चौथा आयाम है जिसे सामान्‍य तार्किक मन समझ नहीं पाता।</p>
<p>      पुनर्जन्‍म की वैज्ञानिक जरूरत बताते हुए ऑस्‍पेन्‍सकी कहता है, यदि पुनर्जन्‍म न हो तो मानव जीवन बहुत ही बेतुका, अर्थहीन और छोटा मालूम होता है। जैसे किसी उपन्‍यास का एक फटा हुआ पन्‍ना। इस छोटे से जीवन के लिए इतनी आपाधापी, इतना शोरगुल व्‍यर्थ जान पड़ता है।</p>
<p>      ऑस्‍पेन्‍सकी भारत में कई योगियों से मिला। उसने स्‍वयं योग का अभ्‍यास भी किया। इस अभ्‍यास से निर्मित हुआ एक प्रकरण: ‘’योग क्‍या है।‘’</p>
<p>      ऑस्‍पेन्‍सकी की विशिष्‍टता यह है कि इस किताब को यह दार्शनिक या अध्‍यात्‍मिक शब्‍दजाल नहीं बनाता, बल्‍कि लगातार वैज्ञानिक धरातल पर ले आता है। भौतिक जगत और सूक्ष्‍म जगत, विज्ञान और अध्‍यात्‍म का एक अंतर-नर्तन सतत चलता रहता है। इसलिए यह ग्रंथ एक फंटासी न रहकर वैज्ञानिक खोज बनती है। सभी स्थापित वैज्ञानिक नियमों को ऑस्‍पेन्‍सकी ने आध्‍यात्‍मिक आयाम के द्वारा विस्‍थापित कर दिया है। न्‍यूटन का सर्वमान्‍य गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत ऑस्‍पेन्‍सकी अ-मान्‍य कर दिया है। उसकी दृष्‍टि में गुरुत्वाकर्षण तभी तक लागू है जब तक हम वस्‍तुओं को ठोस आकार की तरह देखते है। यदि वस्‍तुएं केवल वर्तुलाकार तरंगें है। जो एक दूसरें से जुड़ी हुई है तो कौन किसको खींचेगा। हम किस तल से चीजों को देखते है इस पर उसके नियम निर्भर करते है। एक कुर्सी तभी तक कुर्सी है जब तक हम चीजों को जड़ मानते है। इलेक्ट्रॉन की आंखों से देखें तो कुर्सी एक नाचते हुए अणुओं का ऊर्जा-पुंज है। और अवकाश में जायें तो कुर्सी की कोई उपयोगिता नहीं है, क्‍योंकि वहां ‘’बैठना’’ संभव ही नहीं है। सब कुछ तैरता रहता है।</p>
<p>      ‘’ए न्‍यू मॉडल ऑफ दि यूनिवर्स’’ एक आनंद यात्रा है। इसके शब्‍द मृत आकार नहीं है। जीवंत प्राणवान अनुभूतियां है। ऑस्‍पेन्‍सकी की भाव दशा में आकर हम इस अभियान पर चलें तो वाकई नये मनुष्‍य बनकर बाहर आयेंगे—एक ताजगी लेकर, नई आंखे और नई समझ लेकर।</p>
<p>      लेकिन यह ताजगी इतनी आसानी से नहीं मिलेगी। 542 पृष्‍ठ का लंबा सफर तय करना पड़ेगा। उतना साहस और धीरज हो तो विश्‍व का यह नया नक्‍शा आपके जीवन को रूपांतरित कर देगा। लंदन के ‘’रूट लेज एण्‍ड केगन पॉल लिमिटेड’’ ने इसे 1931 में प्रकाशित किया था। उसके बाद इसके छह संस्‍करण प्रकाशित हुए। टी. वी. के उथले मनोरंजन से जो ऊब गये है उनके लिए यह किताब एक स्‍वास्‍थ्‍यवर्धक बौधिक पोषण है।</p>
<p><strong>किताब की एक झलक:</strong></p>
<p><strong>दि फोर्थ डायमेन्‍शन—(चौथा आयाम)</strong></p>
<p>      यह ख्‍याल लोगों के मन में बढ़ना और मजबूत होना जरूरी है कि एक गुह्म ज्ञान है। जो उस सारे ज्ञान के पार है, जो मनुष्‍य अपने प्रयत्‍नों से प्राप्‍त कर सकता है। क्‍योंकि ऐसी कितनी ही समस्‍याएं है, प्रश्‍न है, जिन्‍हें वह सुलझा नहीं सकता।</p>
<p>      मनुष्‍य स्‍वयं को धोखा दे सकता है, सोच सकता है उसका ज्ञान बढ़ता है, विकसित होता है; और वह पहले जितना जानता-समझता था, अब उससे अधिक जानने समझने लगा है। लेकिन कभी-कभार वह ईमानदारी से देखे कि आस्‍तित्‍व की बुनियादी पहेलियों के आगे वह इतना ह विवश है जितना कि जंगली आदमी या छोटा बच्‍चा होता है। हालांकि उसने कई जटिल यंत्र खोज लिए है। जिन्‍होंने उसके जीवन को और उलझा दिया है। लेकिन सुलझाया कुछ भी नहीं।</p>
<p>      स्‍वयं के साथ और भी ईमानदारी बरतें तो मनुष्‍य पहचान सकता है कि उसकी सारी वैज्ञानिक और दार्शनिक प्रणालियां और सिद्धांत इन यंत्रों और साधनों की मानिंद है, क्‍योंकि वे प्रश्‍नों को और दुरूह बना देते है। हल नहीं करते।</p>
<p>      दो खास प्रश्‍न जो मनुष्‍य को हर वक्‍त धेरे रहते है वे है—अदृश्‍य जगत का प्रश्‍न और मृत्‍यु की पहले।</p>
<p>      मनुष्‍य चिंतन के पूरे इतिहास में सभी रूपों में , निरपवाद रूप से, जगत को दो कोटियों में बांटा गया है: दृश्‍य और अदृश्‍य। और लोगों को इस बात का अहसास रहा है कि दृश्‍य जगत जो उनके सीधे निरीक्षण और अध्‍ययन का अहसास रहा है कि दृश्‍य जगत जो उनके सीधे निरीक्षण और अध्‍ययन का हिस्‍सा है वह बहुत छोटा है, लगभग है ही नहीं। जिसकी तुलना में विराट अदृश्‍य आस्‍तित्‍व है। &#8230;.विश्‍व का यह विभाजन—दृश्‍य और अदृश्‍य&#8211;मनुष्‍य की विश्‍व-संबंधी पूरी सोच की आधारशिला है; भले ही इन विभाजनों को उसने नाम कुछ भी दिया हो। अगर हम विश्‍व के दर्शनों की गिनती करें तो ये विभाजन स्‍पष्‍ट हो जायेंगे। पहले ता हम सभी विचार पद्धतियों को तीन वर्गों में  बांट दें&#8211;</p>
<p>      <strong>1. धार्मिक पद्धति</p>
<p>     2. दार्शनिक पद्धति</p>
<p>     3. वैज्ञानिक पद्धति</strong></p>
<p>      सभी धार्मिक पद्धतियां, निरपवाद रूप से, जैसे ईसाइयत, बौद्ध, जैन से लेकर जंगली आदमी के पूर्णतया अप्रगति धर्म तक जो कि आधुनिक मनुष्‍य को आदिम दिखाई देते है। विश्‍व को दो वर्गों में बांटते है—दृश्‍य और अदृश्‍य। ईसाइयत में ईश्‍वर, फ़रिश्ते, शैतान, दैत्‍य, जीवित और मृत व्‍यक्‍तियों की आत्‍माएं, स्‍वर्ग और नर्क की धारणाएं है। और उससे पूर्व पेगन धर्मों में आधी तूफान, बिजली, बरसात, सूरज, आसमान, इत्‍यादि-इत्‍यादि नैसर्गिक शक्‍तियों को मानवीय रूप देकर देवताओं की शकल में पूजा गया है।</p>
<p>      दर्शन में एक घटनाओं का जगत है। और एक कारणों का जगत है। एक संसार वस्‍तुओं का और एक संसार विचारों का। भारतीय दर्शन में, विशेषत: उसकी कुछ शाखाओं में दृश्‍य याने घटनाओं के जगत को माया कहा गया है, जिसका अर्थ है: अदृश्‍य जगत की अयथार्थ प्रतीति, इसलिए वह है ही नहीं।</p>
<p>      विज्ञान में, अदृश्‍य जगत अणुओं का जगत है। और अजीब बात यह है कि वही विशाल मात्राओं का जगत है। जगत की दृश्‍यता उसकी मात्रा से नापी जाती है। अदृश्‍य जगत में है: कोशिकाएं, मांसपेशियाँ, माइक्रो-ऑर्गानिज्‍मस, दूरबीन से देखे जाने वाले सूक्ष्‍म जीवन, इलेक्ट्रॉन -प्रोटोन- न्‍यूट्रॉन, विद्युत तरंगें। इसी जगत में शामिल है, दूर-दूर तक फैले सितारे, सूर्य मालाएँ और अज्ञात विश्व। माइक्रोस्कोप एक आयाम में हमारी दृष्‍टि को विशाल करता है। और टेलीस्‍कोप दूसरी दिशा में। लेकिन जो अदृश्‍य विश्‍व शेष रह जाता है उसकी तुलना में विज्ञान की सूक्ष्‍म दृश्‍यता बहुत कम है।</p>
<p><strong>ऑन दि स्‍टडी ऑफ ड्रीम्‍स एण्‍ड हिप्‍नोटिज्‍म:</strong></p>
<p>      यह पुस्‍तक ओशो ने सन 1869 में पढ़ी। जैसी कि उनका पढ़ने का अंदाज था, वे पुस्‍तक के महत्‍वपूर्ण अंशों पर लाल और नीले निशान लगाते थे। इस पुस्‍तक के जिन अंशों पर ओशो ने नीले बिंदु लगाये है उनमें से  कुछ अंश प्रस्‍तुत है:</p>
<p>      मेरे जीवन के कुछ बहुत अर्थपूर्ण संस्कार ऐसे थे जो स्‍वप्‍नों के जगत से आये। बचपन से स्‍वप्‍न लोक मुझे आकर्षित करता रहा। स्‍वप्‍नों की अगम घटना की व्‍याख्‍या मैं हमेशा ढूँढता रहा और यथार्थ और अयथार्थ स्वप्नों का अंतर-संबंध जानने की कोशिश करता रहा हूं, मेरे कुछ असाधारण अनुभव स्‍वप्‍नों से संबंधित रहे है। छोटी आयु में ही मैं इस ख्‍याल को लेकिर जागता था कि मैंने कुछ अद्भुत देखा है, और वह इतना रोमांचकारी है कि अब तक मैंने भी जो जाना था, समझा था, वह बिलकुल नीरस जान पड़ता है। इसके अलावा, मैं बार-बार आनेवाले स्‍वप्‍नों से आश्‍चर्यचकित था। ये स्‍वप्‍न बार-बार एक ही परिवेश में एक ही शकल में आते और उनका अंत भी एक जैसा होता। और उनके पीछे वही स्‍वाद छूटता।</p>
<p>      सन 1900 के दरमियान जब मैं सपनों पर उपलब्‍ध पूरा साहित्‍य पढ़ चुका, मैंने खुद ही अपने स्‍वप्‍नों को विधिवत समझने की ठान ली। मैं अपने ही एक अद्भुत ख्‍याल पर प्रयोग करना चाहता था। जो बचपन में ही मेरे दिमाग में मेहमान हुआ था: क्‍या स्‍वप्‍न देखते समय होश साधना संभव नहीं है? मतलब, स्‍वप्‍न देखते हुए यह जानना कि में सोया हूं और होश पूर्वक सोचना, जैसे हम जागे हुए सोचते है।</p>
<p>      मैंने अपने स्‍वप्‍नों को लिखना शुरू किया। उससे मेरी समझ में एक बात आ गई कि स्‍वप्‍नों को देखना हो तो जो सामान्‍य विधियां सिखाई जाती है वे किसी काम की नहीं हे। स्‍वप्‍न निरीक्षण को झेल नहीं पाते। निरीक्षण उन्‍हें बदल देता है। और शीध्र ही मेरे ख्‍याल में आया कि मैं जिनका निरीक्षण कर रहा था वे पुराने स्‍वप्‍न नहीं थे। बल्‍कि नये स्‍वप्‍न थे जिन्‍हें मेरे निरीक्षण ने पैदा किया था। मेरे भीतर कुछ था जिसने स्‍वप्‍न  पैदा करने शुरू किये। मानों वे ध्‍यान को आकर्षित कर रहे थे।</p>
<p>      दूसरा प्रयास स्‍वप्‍न में जागे रहना, इसे साधते-साधते मैं स्‍वप्‍नों को निरीक्षण करने का एक नया ही अंदाज सीख गया। उसने मेरी चेतना में एक अर्ध-स्‍वप्‍न की स्‍थिति पैदा कर दी। और मैं निश्‍चित रूप से जान गया कि अर्ध-स्‍वप्‍न की स्‍थिति के बिना स्‍वप्‍नों का निरीक्षण करना असंभव था।&#8230;इस अर्ध स्‍वप्‍न की स्‍थिति में मैं एक ही समय सोचा रहता और जागा भी रहता।</p>
<p><strong>ऐक्सपैरिमैंट मिस्‍टिसिज्‍म:</strong></p>
<p>      सामान्‍य जीवन में हम सिद्धांत और प्रतिसिद्धांत के रूप में सोचते है। हमेशा हर कहीं, ‘’हां’’ या ‘’ना’’ में जवाब होत है। अलग ढंग से सोचने पर, नये तरीके से सोचने पर वस्‍तुओं को चिन्‍ह बनाकर सोचने पर मैं अपनी मानसिक प्रक्रिया की बुनियादी भूल को समझ गया।</p>
<p>      हकीकत में हमेशा तीन तत्‍व होते है। दो नहीं। सिर्फ, हां या ना नहीं होते, वरन ‘’हां’’ ‘’ना’’, ‘’और कुछ’’ और होते है। और इस तीसरे तत्‍व का स्‍वभाव, जो कि समझ के परे था, कुछ ऐसा था कि उसने सामान्‍य तर्क को असंगत बना दिया और सोचने की आम पद्धति में बदलाहट की मांग की। मैंने पाया कि हर समस्‍या का उत्‍तर हमेशा ‘’तीसरे’’ अज्ञात तत्‍व से आता है। और इस तीसरे तत्‍व के बिना सही निष्‍कर्ष निकालना असंभव था।</p>
<p>      मैं जब प्रश्‍न पूछता था तो मैं देखता था कि अकसर वह प्रश्‍न ही गलत पेश किया गया है। मेरे प्रश्‍न का उत्‍तर देने की बजाय वह ‘’चेतना’’ जिससे मैं बात करता था, उस प्रश्‍न को ही उलटा कर, घूमाकर दिखा देती कि प्रश्‍न गलत था।  धीरे-धीरे मैं देखने लगा कि क्‍या गलत था। और जैसे ही मैंने स्‍पष्‍ट रूप से देखा कि मेरे प्रश्‍न में गलत क्‍या था, मुझे उत्‍तर दिखाई दिया। लेकिन उत्‍तर हमेशा अपने भीतर तीसरा तत्‍व लिये रहता जो इससे पहले में देख नहीं पाता था। क्‍योंकि मरे प्रश्‍न सदा दो तत्‍वों पर खड़ा रहता सिद्धांत और प्रतिसिद्धांत। मैंने इसे अपने लिए इस भांति सोच लिया: सारी कठिनाई प्रश्‍न के बनाने में थी। अगर हम सही प्रश्‍न बना सकें तो हमे उत्‍तर का पता चलना चाहिए। सही ढंग से पूछे गये प्रश्‍न में उत्‍तर अंतर्निहित होता है। लेकिन वह उत्‍तर हमारी अपेक्षा से कही भिन्‍न होगा।</p>
<p>ओशो का नज़रिया:</p>
<p>      मैं पुन: ऑस्‍पेन्‍सकी का जिक्र करने जा रहा हूं, मैं उसकी दो किताबों का नाम ले चुका हूं। एक ‘’टर्शियम ऑर्गेनम’’ जो उसने अपने गुरु गुरजिएफ से मिलने से पहले लिखी थी। ‘’टर्शियम ऑर्गेनम’’ गणितज्ञों में प्रसिद्ध है। क्‍योंकि ऑस्‍पेन्‍सकी ने जब यह किताब लिखी तब वह गणितज्ञ था। दूसरी किताब ‘’इन सर्च ऑफ मिरेकुलस’’ उसने उस समय लिखी जब वह गुरूजिएफ के साथ कई वर्ष रह चुका था। लेकिन उसने तीसरी किताब लिखी है जो इन दो किताबों के बीच लिखी, ‘’टर्शियम ऑर्गेनम’’ के बाद और गुरूजिएफ से मिलने से पहले। इस किताब को बहुत कम ख्‍याति प्राप्‍त हुई है। यह किताब है: ‘’ए न्‍यू मॉडल ऑफ दि यूनिवर्स’’ बडी विचित्र किताब है। बड़ी विलक्षण।</p>
<p>      ऑस्‍पेन्‍सकी ने पूरी दुनिया में गुरु की खोज की, खास कर भारत में। क्‍योंकि लोग अपनी मूढ़ता में सोचते है कि गुरु सिर्फ भारत में ही मिलते है। ऑस्‍पेन्‍सकी ने भारत में खोज की, और वर्षों खोज की। गुरु की खोज में वह बंबई भी आया था। उन दिनों में उसने ये सुंदर किताब लिखी ‘’न्‍यू मॉडल ऑफ दि यूनिवर्स’’</p>
<p>      यह एक कवि की कल्‍पना है। क्‍योंकि उसे पता नहीं है कि वह क्‍या कह रहा है। लेकिन जो वह कह रहा है वह सत्‍य के बहुत-बहुत करीब है। लेकिन सिर्फ ‘’करीब’’ ख्‍याल रखना। और सिर्फ बाल की चौड़ाई तुम्‍हारी दूरी बनाने के लिए काफी है। वह दूर ही रहा। वह खोजता रहा&#8230;..खोजता रहा&#8230;.</p>
<p>      इस किताब में उसने उसकी खोज का विवरण लिखा है। किताब अचानक खत्‍म हो जाती है। मॉस्को के एक कैफेटेरिया में, जहां उसे गुरूजिएफ मिलता है। गुरूजिएफ वाकई एक विलक्षण गुरु था। वि कैफेटेरिया में बैठकर लिखता था। लिखने के लिए भी क्‍या जगह ढूँढी। वह कैफेटेरिया में जाकर बैठता&#8230;.लोग बैठे है, खा रहे है, &#8230;..बच्‍चे इधर-उधर दौड़ रहे है। रास्‍ते से शोर गुल आ रहा है। हॉर्न बज रहे है&#8230;.ओर गुरूजिएफ खिड़की के पास बैठा, इस सारे उपद्रव से घिरा ‘’आल एंड एवरीथिंग’’ लिख रहा है।</p>
<p>      ऑस्‍पेन्‍सकी ने इस आदमी को देखा और इसके प्रेम में पड़ गया। कौन बच सकता था? वह सर्वथा असंभव है कि गुरु को देखो और उसके प्रेम में न पड़ जाओं, बशर्ते कि तुम पत्‍थर के होओ&#8230;..या सिंथेटिक चीज से बने हो। जैसे ही उसने गुरूजिएफ को देखा&#8230;..आश्‍चर्य। उसने देखा कि यही वे आंखें है जिन्‍हें खोजते हुए वह पूरी दुनियां में घूम रहा था। भारत की धूल-धूसरित गंदी सड़कें छान रहा था। और यह कैफेटेरिया मॉस्‍को में उसके घर के बिलकुल पास था। कभी-कभी तुम जिसे खोजते हो वह बिलकुल पास में मिल जाता है।</p>
<p>      ए न्‍यू मॉडल ऑफ दि यूनिवर्स’’ काव्‍यात्‍मक है, लेकिन मेरी दृष्‍टि के बहुत करीब आती है। इसलिए मैं उसे सम्‍मिलित करता हूं।</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>दि बुक्‍स आय हैव लव्‍ड </strong></p>
<br />Filed under: <a href='http://oshosatsang.org/category/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%af-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%a4%e0%a4%95%e0%a5%87/'>ओशो की प्रिय पूस्‍तके--</a> Tagged: <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/'>ओशो</a>, <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6/'>स्‍वामी आनंद प्रसाद</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/oshosatsang.wordpress.com/4281/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/oshosatsang.wordpress.com/4281/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/oshosatsang.wordpress.com/4281/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/oshosatsang.wordpress.com/4281/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/oshosatsang.wordpress.com/4281/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/oshosatsang.wordpress.com/4281/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/oshosatsang.wordpress.com/4281/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/oshosatsang.wordpress.com/4281/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/oshosatsang.wordpress.com/4281/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/oshosatsang.wordpress.com/4281/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/oshosatsang.wordpress.com/4281/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/oshosatsang.wordpress.com/4281/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/oshosatsang.wordpress.com/4281/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/oshosatsang.wordpress.com/4281/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4281&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://oshosatsang.org/2012/01/06/%e0%a4%8f-%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%af%e0%a5%82-%e0%a4%ae%e0%a5%89%e0%a4%a1%e0%a4%b2-%e0%a4%91%e0%a4%ab-%e0%a4%a6%e0%a4%bf-%e0%a4%af%e0%a5%82%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a5%8d/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>1</slash:comments>
		<georss:point>28.621671 77.162177</georss:point>
		<geo:lat>28.621671</geo:lat>
		<geo:long>77.162177</geo:long>
		<media:content url="http://1.gravatar.com/avatar/18ba8ff7182a19f3392c7e668fd1934c?s=96&#38;d=identicon&#38;r=G" medium="image">
			<media:title type="html">anandprashad</media:title>
		</media:content>
	</item>
		<item>
		<title>तीसरी आँख को विकसित करने लिए कुछ महत्‍वपूर्ण ध्‍यान: ओशो</title>
		<link>http://oshosatsang.org/2012/01/05/%e0%a4%a4%e0%a5%80%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%81%e0%a4%96-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%b2-3/</link>
		<comments>http://oshosatsang.org/2012/01/05/%e0%a4%a4%e0%a5%80%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%81%e0%a4%96-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%b2-3/#comments</comments>
		<pubDate>Thu, 05 Jan 2012 16:14:43 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[ध्‍यान प्रयोग--प्रथम और अन्‍तिम मुक्‍ति]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://oshosatsang.org/?p=4277</guid>
		<description><![CDATA[नासाग्र को देखना (ध्‍यान)—ओशो लाओत्‍से ने कहा: व्‍यक्‍ति नासाग्र की और देखे। क्‍यों—क्‍योंकि इससे मदद मिलती है, यह प्रयोग तुम्‍हें तृतीय नेत्र की रेखा पर ले आता है। जब तुम्‍हारी दोनों आंखें नासाग्र पर केंद्रित होती है तो उससे कई &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/01/05/%e0%a4%a4%e0%a5%80%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%81%e0%a4%96-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%b2-3/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4277&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नासाग्र को देखना (ध्‍यान)—ओशो</strong><div id="attachment_4278" class="wp-caption alignright" style="width: 310px"><a href="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/01/meditation.jpg"><img src="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/01/meditation.jpg?w=300&#038;h=207" alt="नासाग्र को देखना (ध्‍यान)—ओशो" title="Meditation" width="300" height="207" class="size-medium wp-image-4278" /></a><p class="wp-caption-text">नासाग्र को देखना (ध्‍यान)—ओशो</p></div></p>
<p><strong>लाओत्‍से ने कहा: व्‍यक्‍ति नासाग्र की और  देखे।</strong></p>
<p>क्‍यों—क्‍योंकि इससे मदद मिलती है, यह प्रयोग तुम्‍हें तृतीय नेत्र की रेखा पर ले आता है। जब तुम्‍हारी दोनों आंखें नासाग्र पर केंद्रित होती है तो उससे कई बातें होती है। मूल बात यह है कि तुम्‍हारा तृतीय नेत्र नासाग्र की रेखा पर है—कुछ इंच ऊपर, लेकिन उसी रेखा में। और एक बार तुम तृतीय नेत्र की रेखा में आ जाओ तो तृतीय नेत्र का आकर्षण उसका खिंचाव, उसका चुम्‍बकत्‍व रतना शक्‍तिशाली है कि तुम उसकी रेखा में पड़ जाओं तो अपने बावजूद भी तुम उसकी और खींचे चले आओगे। तुम बस ठीक उसकी रेखा में आ जाना है, ताकि तृतीय नेत्र का आकर्षण, गुरुत्वाकर्षण सक्रिय हो जाए। एक बार तुम ठीक उसकी रेखा में आ जाओं तो किसी प्रयास की जरूरत नहीं है।<span id="more-4277"></span></p>
<p>      अचानक तुम पाओगे कि गेस्‍टाल्‍ट बदल गया, क्‍योंकि दो आंखें संसार और विचार का द्वैत पैदा करती है। और इन दोनों आंखों के बीच की एक आँख अंतराल निर्मित करती है। यह गेस्‍टाल्‍ट को बदलने की एक सरल विधि है।</p>
<p>      मन इसे विकृत कर सकता है—मन कह सकता है, ‘’ठीक अब, नासाग्र को देखो। नासाग्र का विचार करो, उस चित को एकाग्र करो।‘’ यदि तुम नासाग्र पर बहुत एकाग्रता साधो तो बात को चूक जाओगे, क्‍योंकि होना तो तुम्‍हें नासाग्र पर है, लेकिन बहुत शिथिल ताकि तृतीय नेत्र तुम्‍हें खींच सके। यदि तुम नासाग्र पर बहुत ही एकाग्रचित्त, मूल बद्ध, केंद्रित और स्‍थिर हो जाओ तो तुम्‍हारा तृतीय नेत्र तुम्‍हें भीतर नहीं खींच सकेगा क्‍योंकि वह पहले कभी भी सक्रिय नहीं हुआ। प्रारंभ में उसका खिंचाव बहुत ज्‍यादा नहीं हो सकता। धीरे-धीरे वह बढ़ता जाता है। एक बार वह सक्रिय हो जाए और उपयोग में आने लगे, तो उसके चारों और जमी हुई धूल झड़ जाए, और यंत्र ठीक से चलने लगे। तुम नासाग्र पर केंद्रित भी हो जाओ तो भी भीतर खींच लिए जाओगे। लेकिन शुरू-शुरू में नहीं। तुम्‍हें बहुत ही हल्‍का होना होगा, बोझ नहीं—बिना किसी खींच-तान के। तुम्‍हें एक समर्पण की दशा में बस वहीं मौजूद रहना होगा।&#8230;..</p>
<p>      ‘’यदि व्यक्ति नाक का अनुसरण नहीं करता तो यह तो वह आंखें खोलकर दूर देखता है जिससे कि नाक दिखाई न पड़े अथवा वह पलकों को इतना जोर से बंद कर लेता है कि नाक फिर दिखाई नहीं पड़ती।‘’</p>
<p>      नासाग्र को बहुत सौम्‍यता से देखने का एक अन्‍य प्रयोजन यह भी है: कि इससे तुम्‍हारी आंखें फैल कर नहीं खुल सकती। यदि तुम अपनी आंखे फैल कर खोल लो तो पूरा संसार उपलब्‍ध हो जाता है। जहां हजारों व्‍यवधान है। कोई सुंदर स्‍त्री गुजर जाती है और तुम पीछा करने लगते हो—कम से कम मन में। या कोई लड़ रहा है; तुम्‍हारा कुछ लेना देना नहीं है, लेकिन तुम सोचने लगते हो कि ‘’क्‍या होने वाला है?’’ या कोई रो रहा है और तुम जिज्ञासा से भर जाते हो। हजारों चीजें सतत तुम्‍हारे चारों और चल रही है। यदि आंखे फैल कर खुली हुई है तो तुम पुरूष ऊर्जा—याँग—बन जाते हो।</p>
<p>      यदि आंखे बिलकुल बंद हो तो तुम एक प्रकार सी तंद्रा में आ जाते हो। स्‍वप्‍न लेने लगते हो। तुम स्‍त्रैण ऊर्ज—यन—बन जाते हो। दोनों से बचने के लिए नासाग्र पर देखो—सरल सी विधि है, लेकिन परिणाम लगभग जादुई है।</p>
<p>      और ऐसा केवल ताओ को मानने वालों के साथ ही है। बौद्ध भी इस बात को जानते है, हिंदू भी जानते है। ध्‍यानी साधक सदियों से किसी न किसी तरह इस निष्‍कर्ष पर पहुंचते रहे है कि आंखे यदि आधी ही बंद हों तो अत्‍यंत चमत्‍कारिक ढंग से तुम दोनों गड्ढों से बच जाते हो। पहली विधि में साधक बह्म जगत से विचलित हो रहा है। और दूसरी विधि में भीतर के स्‍वप्‍न जगत से विचलित हो रहा है। तुम ठीक भीतर और बाहर की सीमा पर बने रहते हो और यही सूत्र है: भीतर और बाहर की सीमा पर होने का अर्थ है उस क्षण में तुम न पुरूष हो न स्‍त्री हो तुम्‍हारी दृष्‍टि द्वैत से मुक्‍त है; तुम्‍हारी दृष्‍टि तुम्‍हारे भीतर के विभाजन का अतिक्रमण कर गई। जब तुम अपने भीतर के विभाजन से पार हो जाते हो, तभी तुम तृतीय नेत्र के चुम्‍बकीय क्षेत्र की रेखा में आते हो।</p>
<p>      ‘’मुख्‍य बात है पलकों को ठीक ढंग से झुकाना और तब प्रकाश को स्‍वयं ही भीतर बहने देना।‘’</p>
<p>      इसे स्‍मरण रखना बहुत महत्‍वपूर्ण है: तुम्‍हें प्रकाश को भीतर नहीं  खींचना है, प्रकाश को बलपूर्वक भीतर नहीं लाना है। यदि खिड़की खुली हो तो प्रकाश स्‍वयं ही भीतर आ जाता है। यदि द्वार खुला हो तो भीतर प्रकाश की बाढ़ जा जाती है। तुम्‍हें उसे भीतर प्रकाश की बाढ़ आ जाती है। तुम्‍हें उसे भीतर लाने की जरूरत नहीं है। उसे भीतर धकेलने की जरूरत नहीं है। भीतर घसीटने की जरूरत नहीं है। और तुम प्रकाश को भी तर कैसे घसीट सकते हो? प्रकाश को तुम भीतर कैसे धकेल सकते हो? इतना ही चाहिए कि तुम उसके प्रति खुले और संवेदनशील रहो।&#8230;..</p>
<p>      ‘’दोनों आंखों से नासाग्र को देखना है।‘’</p>
<p>      स्‍मरण रखो, तुम्‍हें दोनों आँखो से नासाग्र को देखना है ताकि नासाग्र पर दोनों आंखे अपने द्वैत को खो दें। तो जो प्रकाश तुम्‍हारी आंखों से बाहर बह रहा है वह नासाग्र पर एक हो जाता है। वह एक केंद्र पर आ जाता है। जहां तुम्‍हारी दोनों आंखें मिलती है, वहीं स्‍थान है जहां खिड़की खुलती है। और फिर सब शुभ है। फिर इस घटना को होने दो, फिर तो बस आदत मनाओ, उत्‍सव मनाओ, हर्षित होओ। प्रफुल्‍लित होओ। फिर कुछ भी नहीं करना है।</p>
<p>      ‘’दोनों आंखों से नासाग्र को देखना है, सीधा होकर बैठता है।‘’</p>
<p>      सीधी होकर बैठना सहायक है। जब तुम्‍हारी रीढ़ सीधी होती है। तुम्‍हारे काम-केंद्र की ऊर्जा भी तृतीय नेत्र को उपलब्‍ध हो जाती है। सीधी-सादी विधियां है, कोई जटिलता इनमें नहीं है, बस इतना ही है कि जब दोनों आंखें नासाग्र पर मिलती है, तो तुम तृतीय नेत्र के लिए उपलब्‍ध कर दो। फिर प्रभाव दुगुना हो जाएगा। प्रभाव शक्तिशाली हो जाएगा, क्‍योंकि तुम्‍हारी सारी ऊर्जा काम केंद्र में ही है। जब रीढ़ सीधी खड़ी होती है तो काम केंद्र की ऊर्जा भी तृतीय नेत्र को उपलब्‍ध हो जाती है। यह बेहतर है कि दोनों आयामों से तृतीय नेत्र पर चोट की जाए, दोनों दिशाओं से तृतीय नेत्र में प्रवेश करने की चेष्‍टा की जाए।</p>
<p>      ‘’व्‍यक्‍ति सीधा होकर और आराम देह मुद्रा में बैठता है।‘’</p>
<p>      सदगुरू चीजों को अत्‍यंत स्‍पष्‍ट कर रहे है। सीधे होकर, निश्‍चित ही, लेकिन इसे कष्‍टप्रद मत बनाओ; वरन फिर तुम अपने कष्‍ट से विचलित हो जाओगे। योगासन का यही अर्थ है। संस्‍कृत शब्‍द ‘’आसन’’ का अर्थ है: एक आरामदेह मुद्रा। आराम उसका मूल गुण है। यदि वह आरामदेह न हो तो तुम्‍हारा मन कष्‍ट से विचलित हो जाएगा। मुद्रा आरामदेह ही हो&#8230;..</p>
<p>      ‘’और इसका अर्थ अनिवार्य रूप से सिर के मध्‍य में होना नहीं है।‘’</p>
<p>      और केंद्रिय होने का अर्थ यह नहीं है कि तुम्‍हें सिर के मध्‍य में केंद्रित होना है।</p>
<p>      ‘’केंद्र सर्वव्‍यापी है; सब कुछ उसमें समाहित है; वह सृष्‍टि की समस्‍त प्रक्रिया के निस्‍तार से जुड़ा हुआ है।‘’</p>
<p>      और जब तुम तृतीय नेत्र के केंद्र पर पहुंच कर वहां केंद्रित हो जाते हो और प्रकाश बाढ़ की भांति भीतर आने लगता है, तो तुम उस बिंदु पर पहुंच गए, जहां से पूरी सृष्‍टि उदित हुई है। तुम निराकार और अप्रकट पर पहुच गए। चाहो तो उसे परमात्‍मा कह लो। यही वह बिंदु है, यह वह आकाश है, जहां से सब जन्‍मा है। यही समस्‍त अस्‍तित्‍व का बीज है। यह सर्वशक्‍तिमान है। सर्वव्‍यापी है, शाश्‍वत है।&#8230;&#8230;</p>
<p>      ‘’ध्‍यान की साधन अपरिहार्य है।‘’</p>
<p>      ध्‍यान क्‍या है?—निर्विचार का एक क्षण। निर्विचार की एक दशा, एक अंतराल। और यह सदा ही घट रहा है, लेकिन तुम इसके प्रति सजग नहीं हो; वरना तो इसमें कोई समस्‍या नहीं है। एक विचार आता है, फिर दूसरा आता है, और उन दो विचारों के बीच में सदा एक छोटा सा अंतराल होता है। और वह अंतराल ही दिव्‍य का द्वार है, वह अंतराल ही ध्‍यान है। यदि तुम उस अंतराल ही ध्‍यान है। यदि तुम उस अंतराल में गहरे देखो, तो वह बड़ा होने लगता है।</p>
<p>      मन ट्रैफिक से भरी हुई एक सड़क की तरह है; एक कार गुजरती है फिर दूसरी कार गुजरती है फिर दूसरी कार गुजरती है। और तुम कारों से इतने ज्‍यादा ग्रसित हो कि तुम्‍हें वह अंतराल तो दिखाई ही नहीं पड़ता जो दो कारों के बीच सदा मौजूद है। वरना तो कारें आपस में टकरा जाएंगी। वे टकराती नहीं; उनके बीच में कुछ है जो उन्‍हें अलग रखता है। तुम्‍हारे विचार आपस में नहीं टकराते, एक दूसरे पर नहीं चढ़ते, एक दूसरे में नहीं मिल जाते। वे किसी भी तरह एक दूसरे पर नहीं चढ़ते। हर विचार की अपनी सीमा होता है, हार विचार परिभाष्‍य होता है। लेकिन विचारों का जुलूस इतना तेज होता है, इतना तीव्र होता है कि अंतराल को तुम तब तक नहीं देख सकते, जब तक कि तुम उसकी प्रतीक्षा नहीं कर रहे हो। उसकी खोज नहीं कर रहे हो।</p>
<p>      ध्‍यान का अर्थ है गेस्‍टाल्‍ट को बदल डालना। साधारणत: हम विचारों को देखते है: एक विचार, दूसरा विचार, फिर कोई और विचार। जब तुम गेस्‍टाल्‍ट को बदल देते हो तो तुम एक अंतराल को देखते हो, फिर दूसरे अंतराल को देखते हो। तुम्‍हारा आग्रह विचार पर नहीं रहता। अंतराल पर आ जाता है।</p>
<p>      ‘’यदि सांसारिक विचार उठे तो व्‍यक्‍ति जड़ न बैठा रहे, वरन निरीक्षण करे कि विचार कहां से शुरू हुआ, और कहां विलीन हुआ।‘’</p>
<p>      यह पहले ही प्रयास में नहीं होने वाला है। तुम नासाग्र पर देख रहे होओगे और विचार आ जाएंगे। वे इतने जन्‍मों से आते रहे है कि इतनी सरलता से तुम्‍हें नहीं छोड़ सकते। वे तुम्‍हारा हिस्‍सा बन गए है। तुम करीब-करीब एक पूर्वनिर्धारित जीवन जी रहे हो।</p>
<p>      ऐसा होता है: जब लोग ध्‍यान में शांत होकर बैठते है, तो सामान्‍यत: जितने विचार आते है। तब उससे अधिक विचार आते है—असमान्‍य विस्‍फोट होते है। लाखों विचार दौड़ें चले आते है, क्‍योंकि उनका अपना स्‍वार्थ है तुम्हें, और तुम उनकी ताकत से बाहर निकलने की चेष्‍टा कर रहे हो? तुम शांत होकर बैठे नहीं रह सकते। तुम्‍हें कुछ करना पड़ेगा। संघर्ष से तो कोई लाभ नहीं होगा। क्‍योंकि तुम यदि संघर्ष करने लगे तो तुम नासाग्र पर देखना भूल जाओगे। तृतीय नेत्र का, प्रकाश के प्रवाह को बोध खो जाएगा; तुम सब भूल कर विचारों के जंगल में खो जाओगे। यदि तुम विचारों का पीछा करने लगे तो तुम खो गए। उसका अनुसरण करने लगे तो तुम खो गए। उनके साथ तुम संघर्ष करने लगे तो भी तुम खो गए। तो फिर क्‍या करना?</p>
<p>      और यही राज है। बुद्ध भी इसी राज को उपयोग में लाए। वास्‍तव में सभी राज तो लगभग एक से ही है क्‍योंकि मनुष्‍य यही है—ताला वही है, जो कुंजी भी वहीं होनी चाहिए। यही राज है; बुद्ध इसे सम्मा सती, सम्‍यक स्‍मृति कहते है। इतना स्‍मरण रखो: यह विचार आया है, बिना किसी विरोध, बिना किसी दलील , बिना किसी निंदा के देखो कि वह है, कहां एक वैज्ञानिक की भांति निरीक्षक हो रहो। देखो कि वह कहां है, कहां से आ रहा है। कहां जा रहा है। उसके आने को देखो उसके रूकने को देखो उसके जाने को देखो। और विचार बहुत गत्‍यात्‍मक है; वे देर तक नहीं रुकते। तुम्‍हें तो बस विचार के उठने उसके रूकने, उसके जाने को देखना भर है। न संघर्ष करने की चेष्‍टा करो। न अनुसरण करो, बस एक मौन निरीक्षक बने रहो। और तुम्‍हें हैरानी होगी; निरीक्षक जितना थिर हो जाता है, विचार उतने ही कम आएँगे। जब निरीक्षक बिलकुल पूर्ण हो जाता है तो विचार समाप्‍त हो जाते है। बस एक अंतराल, एक मध्‍यांतर ही बचता है।</p>
<p>      लेकिन एक बात और याद रखना: मन फिर से एक चाल चल सकता है।</p>
<p>      ‘’प्रतिबिंब को आगे सरकाने से कुछ भी प्राप्‍त नहीं होता।‘’</p>
<p>      यही फ्रायडियन मनोविश्‍लेषण भी है: विचारों की मुक्‍त साहचर्य शृंखला। एक विचार आता है, और फिर तुम दूसरे विचार की प्रतीक्षा करते हो, और फिर तीसरे की, और यह पूरी शृंखला है। &#8230; हर मनोविश्‍लेषण यही कहता है—तुम अतीत में पीछे जाने लगते हो। एक विचार दूसरे से जुड़ा होता है। और यह शृंखला अनंत तक चलती है। उसका काई अंत नहीं है। यदि तुम उसके भीतर जाने लगो तो तुम एक अनंत यात्रा पर निकल जाओगे। और यह बिलकुल अपव्‍यय होगा। मन ऐसा कर सकता है। तो इसके प्रति सजग रहो।&#8230;.</p>
<p>      मन के द्वारा तुम मन के पार नहीं जा सकेत। इसलिए व्‍यर्थ में अनावश्‍यक चेष्‍टा मत करो। वरना एक बात तुम्‍हें दूसरे में ले जाएगी। और ऐस आगे से आगे चलता रहेगा। और तुम बिलकुल भूल ही जाओगे कि तुम क्‍या करने का प्रयास कर रहे थे। नासाग्र गायब हो जाएगा। तृतीय नेत्र भूल जाएगा। और प्रकाश का प्रवाह तो तुमसे मीलों दूर चला जाएगा। तो ये दो बातें स्‍मरण रखने की है, ये दो पंख है। एक: जब अंतराल आ जाएं, कोई विचार न चलता हो, तो ध्‍यान करो। जब कोई विचार आए तो बस इन तीन बातों को देखो: विचार कहां है, वह कहां से आया है और कहां जा रहा है। एक क्षण के लिए अंतराल को देखना छोड़ दो और विचार को देखो, उसे अलविदा करो। जब वह चला जाए, तो फिर से ध्‍यान के अभ्‍यास पर वापस लौट आओ।</p>
<p>      ‘’जब विचारों की उड़ान आग बढती जाए, जो व्‍यक्‍ति को रूक कर विचारों का निरीक्षण करना चाहिए। इस प्रकार वह ध्‍यान भी करे और तब फिर से निरीक्षण शुरू करे।‘’</p>
<p>      तो जब भी विचार आता है, तब निरीक्षण करो। जब भी विचार जाता है तब ध्‍यान करो।</p>
<p>      ‘’यह संबोधि को तीव्रता से लाने का दोहरा उपाय है। संबोधि का अर्थ है प्रकाश का वृताकार प्रवाह। प्रवाह है निरीक्षण और प्रकाश है ध्‍यान।‘’</p>
<p>      जब भी तुम ध्‍यान करोगे तो प्रकाश को भीतर प्रवेश करता पाओगे, और जब भी तुम एकाग्र होकर देखोगें तो प्रवाह को निर्मित करोगे।  प्रवाह को संभव बनाओगे। दोनों की ही जरूरत है।</p>
<p>      ‘’प्रकाश ध्‍यान है। ध्‍यान के बिना निरीक्षण का अर्थ है प्रकाश के बिना प्रवाह।‘’</p>
<p>      यही हुआ है। हठयोग के साथ यही दुर्घटना घटी है। वे निरीक्षण तो करते है, चित को एकाग्र तो करते है, लेकिन प्रकाश को भूल जाते है। अतिथि के विषय में वक बिलकुल भूल गए है। वे बस घर को तैयार किए चले जाते है; वे घर को तैयार करने में इतने उलझ गए है कि वे उस प्रयोजन को ही भूल गए है। जिसके लिए घर की तैयारी है। हठ योगी सतत अपने शरीर को तैयार करता है, शरीर को शुद्ध करता है, योगासन, प्राणायाम करता है। और आजीवन करता ही चला जाता है। वह भूल ही गया है कि यह सब वह कर किस लिए रहा है। और प्रकाश बाहर खड़ा है लेकिन हठ योगी उसे भीतर नहीं आने दे रहे है। क्‍योंकि प्रकाश तभी भीतर आ सकता है तब तुम पूर्णता: समर्पण की दशा में आ जाओ।</p>
<p>      ‘’ध्‍यान के बिना निरीक्षण का अर्थ है प्रकाश के बिना प्रवाह।‘’</p>
<p>      तथाकथित योगियों के साथ यही दुर्घटना घटी है। दूसरी दुर्घटना मनोविश्‍लेषकों और दार्शनिकों के साथ घटी है।</p>
<p>      ‘’निरीक्षण के बिना ध्‍यान का अर्थ है प्रवाह के बिना प्रकाश।‘’</p>
<p>      वे प्रकाश पर विचार करते है, लेकिन उन्‍होंने प्रकाश की बाढ़ भीतर आ सके इसके लिए तैयारी नहीं की है; वे प्रकाश पर केवल विचार करते है। वे अतिथि के विषय में सोचते है, अतिथि के विषय में हजारों बातों की कल्‍पना करते है, लेकिन उनका घर तैयार नहीं है। दोनों की चूक रहे है।</p>
<p>      ‘’इसका ख्‍याल रखो।‘’</p>
<p>      दोनों में से किसी भी भ्रांति में मत गिरो। यदि तुम सचेत रह सको तो यह अत्‍यंत सरल सी प्रक्रिया है और गहन रूप से रूपांतरणकारी है। जो व्‍यक्‍ति ठीक ढंग से समझ ले वह एक क्षण में ही एक भिन्‍न वास्‍तविकता में प्रवेश कर सकता है।</p>
<p><strong>ओशो</p>
<p>ध्‍यान योग: प्रथम और अंतिम मुक्‍ति</strong></p>
<p> (</p>
<br />Filed under: <a href='http://oshosatsang.org/category/%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%97-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a5%e0%a4%ae-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%85%e0%a4%a8/'>ध्‍यान प्रयोग--प्रथम और अन्‍तिम मुक्‍ति</a> Tagged: <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/'>ओशो</a>, <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6/'>स्‍वामी आनंद प्रसाद</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/oshosatsang.wordpress.com/4277/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/oshosatsang.wordpress.com/4277/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/oshosatsang.wordpress.com/4277/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/oshosatsang.wordpress.com/4277/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/oshosatsang.wordpress.com/4277/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/oshosatsang.wordpress.com/4277/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/oshosatsang.wordpress.com/4277/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/oshosatsang.wordpress.com/4277/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/oshosatsang.wordpress.com/4277/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/oshosatsang.wordpress.com/4277/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/oshosatsang.wordpress.com/4277/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/oshosatsang.wordpress.com/4277/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/oshosatsang.wordpress.com/4277/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/oshosatsang.wordpress.com/4277/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4277&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://oshosatsang.org/2012/01/05/%e0%a4%a4%e0%a5%80%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%81%e0%a4%96-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%b2-3/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>2</slash:comments>
		<georss:point>28.621671 77.162177</georss:point>
		<geo:lat>28.621671</geo:lat>
		<geo:long>77.162177</geo:long>
		<media:content url="http://1.gravatar.com/avatar/18ba8ff7182a19f3392c7e668fd1934c?s=96&#38;d=identicon&#38;r=G" medium="image">
			<media:title type="html">anandprashad</media:title>
		</media:content>

		<media:content url="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/01/meditation.jpg?w=300" medium="image">
			<media:title type="html">Meditation</media:title>
		</media:content>
	</item>
		<item>
		<title>तीसरी आँख : स्‍वप्‍न या सत्‍य?—</title>
		<link>http://oshosatsang.org/2012/01/04/%e0%a4%a4%e0%a5%80%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%81%e0%a4%96-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%a8-%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%a4%e0%a5%8d/</link>
		<comments>http://oshosatsang.org/2012/01/04/%e0%a4%a4%e0%a5%80%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%81%e0%a4%96-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%a8-%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%a4%e0%a5%8d/#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 04 Jan 2012 16:01:07 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sw anand prashad</dc:creator>
				<category><![CDATA[ध्‍यान प्रयोग--प्रथम और अन्‍तिम मुक्‍ति]]></category>
		<category><![CDATA[ओशो]]></category>
		<category><![CDATA[स्‍वामी आनंद प्रसाद]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://oshosatsang.org/?p=4272</guid>
		<description><![CDATA[ध्‍यान के अंतर्यात्रा पर जो भी चल पड़ता है वह अक्‍सर, अध्‍यात्‍म-जगत के गुह्म विज्ञान से बेहद आकर्षित हो जाता है। इससे पहले कि उसके पैर पार्थिव शरीर की भूमि में दृढ़ता से जम जाएं, वह तीसरे-चौथे-पांचवें सूक्ष्‍म शरीरों की &#8230; <a href="http://oshosatsang.org/2012/01/04/%e0%a4%a4%e0%a5%80%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%81%e0%a4%96-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%a8-%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%a4%e0%a5%8d/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4272&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><div id="attachment_4273" class="wp-caption alignright" style="width: 310px"><a href="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/01/angel1.jpg"><img src="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/01/angel1.jpg?w=300&#038;h=216" alt="तीसरी आँख : स्‍वप्‍न या सत्‍य?—" title="तीसरी आँख : स्‍वप्‍न या सत्‍य?—" width="300" height="216" class="size-medium wp-image-4273" /></a><p class="wp-caption-text">तीसरी आँख : स्‍वप्‍न या सत्‍य?—</p></div> ध्‍यान के अंतर्यात्रा पर जो भी चल पड़ता है वह अक्‍सर, अध्‍यात्‍म-जगत के गुह्म विज्ञान से बेहद आकर्षित हो जाता है। इससे पहले कि उसके पैर पार्थिव शरीर की भूमि में दृढ़ता से जम जाएं, वह तीसरे-चौथे-पांचवें सूक्ष्‍म शरीरों की खोजबीन करने लगता है। सुदूर आकाश के ये रहस्‍यपूर्ण टिमटिमाते सितारे उसे बुलाने लगते है। इन सितारों में सर्वाधिक आकर्षक सितारा अगर कोई मालूम होता है तो वह है: ‘’तीसरी आँख का।‘’</p>
<p>      न जाने तीसरी आँख में कौन सी कशिश है जो साधकों को बेहद लुभाती रहती है। उसकी अनुभूति तो बहुत कम लोगों को हुई होगी, अधिकांश लोग उसकी रूमानी कल्‍पनाओं से अपने सपने सज़ा लेते है। दो आंखों से अभी ठीक से दुनियां देखी नहीं, और तीसरी आँख को खोलने का महा कठिन प्रयत्‍न करने लगते है।<span id="more-4272"></span></p>
<p>      लगभग 20-25 साल पहले तिब्‍बत के एक लामा लोब सैंग राम्‍पा की एक दर्जन किताबें एक साथ प्रकाशित हुई थी। वे सारी किताबें विश्‍व भी में बेहद लोकप्रिय हुई थी। फिल्‍मी पत्रिकाओं की तरह वे बाजार में बिक रही थी। क्‍या थ उन किताबों में? तीसरी आँख की आंखों देखी कहानियां, सूक्ष्‍म शरीर के ऑपरेशन, सूक्ष्‍म शरीर की अवकाश यात्राएं। अतीद्रिय शक्‍तियों का लोक&#8230;.इस प्रकार की गुह्म बातों की जानकारी। उनकी लोकप्रियता देखकर ओशो ने किसी संन्‍यासी से कहा था: ‘’इन किताबों को उपन्‍यास की भांति पढ़ना।‘’ वाकई जासूसी उपन्‍यासों का सा सम्‍मोहन था इन किताबों में।</p>
<p>     ओशो का यह दोहरा काम ध्‍यान देने जैसा है। एक तरफ वे कुंडलिनी, चक्र और इंद्रियातीत शक्‍तियों के रहस्‍य उद्घाटित कर रहे है। और दूसरी और शिष्‍यों को इससे सावधान रहने की चेतावनी दे रहे थे। यदि आम शिष्‍य के लिए यह जानकारी मात्र दंतकथा थी, तो वे क्‍यों इन पर पडा पर्दा उठा रहे थे? क्‍योंकि इनका विज्ञान तो शत प्रतिशत सही है। उसे उच्‍चतर विज्ञान कहा जा सकता है। लेकिन जब तक मनुष्‍य ध्‍यान में पकता नहीं, उसकी वासना और की दौड़ शांत नहीं होती तब तक शक्‍ति के प्रयोग उसके लिए बहुत घातक सिद्ध हो सकते है।</p>
<p>      तीसरी आँख खुलती ही तब है जब समूचा द्वंद्व विलीन हो जाता है, मन को खड़खड़ करनेवाले सारे न्यूरोसिस विदा होते है। अवचेतन में दबी पड़ी भावों की ज़हरीली नागिनें निष्‍प्रभ निर्विष हो जाती है। तब उस स्‍वच्‍छ निर्मल मनोभूमि में, ऊर्जा केंद्रित होने लग जाती है। और इस केंद्रित, अखंडित ऊर्जा को गति करने के लिए एक ही बिंदु बचता है: तीसरी आँख। ठीक ऐसे ही जैसे अग्‍नि की ज्‍वाला ऊपर की और बहने लगती है।</p>
<p>      अभी तो हमारा यह हाल है कि हमारी लौ कंपती ही रहती है। कोई हल्‍की सी अफवाह का झोंका, कहीं से आया हुआ अनर्गल पत्र कि हमारा संदेह फन उठा लेता है। डगमगा जाती है सारी श्रद्धा। कंप गई लौ, जरूर कोई बात है। कुछ गलत हो रहा है। भड़काओं औरों को लगा दो आग।</p>
<p>      नहीं ऐसा कंपित मन निस्कंप बिंदु पर नहीं पहुंच सकता। तीसरी आँख तो अपनी जगह है—गौरी शंकर की भांति अडिग, अचल, अजेय। लेकिन हमारी ऊँचाई क्‍या है? एक टीले के बराबर।</p>
<p>      कुछ फासले है हमारे और उसके बीच।</p>
<p><strong>पहला:</strong>      हम सदा झुंड में जीते है। अकेले होने का साहस नहीं रखते। भीड़ में रहने की इतनी गहरी आदत है कि ध्‍यान के लिए जाएं तो भी भीड़ को साथ लेकर जाते है। लेकिन भीतर कौन किसका साथ निभा सकता है? अकेले को पाना है तो अकेला होना पड़ेगा।</p>
<p><strong>दूसरा:</strong>      हम खंडित है, न जाने कितने टुकड़ों में बंटे हुए है। इन टुकड़ों को समेटना होगा। संगठित करना होगा। एक सूत्र में पिरोना होगा। ध्‍यानी को अपने भीतर एक रीढ़ पैदा करनी होती है। जिसकी रीढ़ ही नहीं है वह क्‍या ध्‍यान करेगा ?</p>
<p><strong>तीसरा:</strong>     देखने की कला विकसित करनी होगी। केंद्र को ‘’तीसरी आँख’’ कहते है। तीसरा कान या तीसरी नाक नहीं कहते। यह बहुत अर्थ गर्भित है। दो भौंहों के बीच विराजमान यह केंद्र देखने की अपूर्व क्षमता रखता है। यह देखना विशुद्ध पारदर्शी, सुने मन का देखना है। यह शक्‍ति का जागरण नहीं है। शांति की स्फुरणा है। मन इतना शांत हो जाता है। तृप्‍त हो जाता है कि देखने की इच्‍छा भी शेष रहती। दर्पण कब किसे देखना चाहता है? अब दर्पण में सब कुछ दिख जाता है तो इसके लिए वह क्‍या करे?</p>
<p>      यदि सचमुच किसी को तीसरी आँख को खोलना है तो पूरा ध्‍यान दो आंखों पद केंद्रित करे; देखे मन के पूरे संसार को। दुई की तलवार से विच्‍छिन्‍न लहूलुहान व्‍यक्‍तित्‍व का इलाज करे। उसे स्‍वास्‍थ्‍य प्रदान करे। भय, लोभ, ईर्ष्‍या, अहंकार की क्षुद्र सीमाओं में कैद चेतना को आजाद करे। इन छोटे-छोटे दायरों में बंधी ऊर्जा जब मुक्‍त हो जाती है तो ऊर्जा का विशाल दीप स्‍तंभ उपलब्‍ध हो जाता है। फिर तीसरी आँख खोलनी नहीं पड़ती, खुल जाती है।</p>
<p>      तीसरी आँख एक वैज्ञानिक तथ्‍य है। हो सकता है अभी इसका पूरा राज विज्ञान की पकड़ में न आया हो, लेकिन इससे उसके यथार्थ में कोई फर्क नहीं पड़ता। सत्‍य वैज्ञानिक खोजों पर निर्भर नहीं है। ओशो ने पश्‍चिम के कतिपय वैज्ञानिकों के उदाहरण देकर तीसरी आंख को सिद्ध क्या है। प्राचीन योगी कहानियों और प्रतीकों के माध्‍यम से गहन अनुभवों को प्रकट करते थे। और आज हम इलेक्ट्रानिक उपकरणों द्वारा इन अनुभवों की व्‍याख्‍यायित कर सकते है। पहले कुंडलिनी के लिए सांप का प्रतीक था, अब उसे विद्युत शक्‍ति की उपमा दी जाती है। जो कि अधिक यथार्थ है। शरीर के भीतर विद्युत तो दौड़ सकती है। सांप नहीं। अब हम बच्‍चों के कल्‍पना लोक से बाहर आ रहे है।</p>
<p>      विज्ञान के साथ मनुष्‍य का चित प्रौढ़ हो गया है। अब अंतर जगत के रहस्‍य को समझने के लिए उसे किस्‍से कहानियों की जरूरत नहीं है। अगर हम तीसरी आँख को ‘’पाइनियल ग्रंथि’’ कहें तो उसे समझने का आयाम तत्‍क्षण बदल जाता है। यह ग्रंथि प्रकाश के प्रति अति संवेदनशील है इसलिए प्रकाश को देखती और दिखाती है।</p>
<p>      विज्ञान ने परमात्‍मा को पूरी तरह से इनकार किया और पदार्थ की खोज में डूब गया। और अब पदार्थ को खोजते-खोजते वैज्ञानिक पुन: परमात्‍मा से टकरा गया है। क्‍योंकि पदार्थ को तोड़ते जाओं तो अंत में वह बचता ही नहीं ऊर्जा बन जाता है। और वैज्ञानिक भौंचक्‍का होकर आस्‍तित्‍व के अज्ञेय सागर के किनारे खड़ा रह जाता है। न्‍यूटन, आइंस्टीन ओपेन-हेमर&#8230;.जितने भी बड़े वैज्ञानिक थे, सब अंतत: रहस्‍यवादी बन गये। हो सकता है एक न एक दिन विज्ञान तीसरी आँख का रहस्‍य भी खोल लेगा।</p>
<p>      अच्‍छा होगा सभी ध्‍यानी और खोजी वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए तत्‍पर हों। वैज्ञानिक अनुसंधान का अर्थ है: कल्‍पना की उड़ानें न भरकर यथार्थ के धरातल पर उत्‍तर आयें। हमारे भीतर पैठे हुए असत्‍य का साक्षात करें, सत्‍य अपनेआप प्रगट हो जायेगा।</p>
<p><strong>मां अमृत साधना</p>
<p>संपादकीय, ओशो टाइम्‍स</p>
<p>सितंबर 2000</strong></p>
<br />Filed under: <a href='http://oshosatsang.org/category/%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%97-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a5%e0%a4%ae-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%85%e0%a4%a8/'>ध्‍यान प्रयोग--प्रथम और अन्‍तिम मुक्‍ति</a> Tagged: <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/'>ओशो</a>, <a href='http://oshosatsang.org/tag/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6/'>स्‍वामी आनंद प्रसाद</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/oshosatsang.wordpress.com/4272/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/oshosatsang.wordpress.com/4272/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/oshosatsang.wordpress.com/4272/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/oshosatsang.wordpress.com/4272/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/oshosatsang.wordpress.com/4272/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/oshosatsang.wordpress.com/4272/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/oshosatsang.wordpress.com/4272/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/oshosatsang.wordpress.com/4272/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/oshosatsang.wordpress.com/4272/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/oshosatsang.wordpress.com/4272/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/oshosatsang.wordpress.com/4272/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/oshosatsang.wordpress.com/4272/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/oshosatsang.wordpress.com/4272/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/oshosatsang.wordpress.com/4272/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=oshosatsang.org&amp;blog=12293864&amp;post=4272&amp;subd=oshosatsang&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://oshosatsang.org/2012/01/04/%e0%a4%a4%e0%a5%80%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%81%e0%a4%96-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%b5%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%a8-%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%a4%e0%a5%8d/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>1</slash:comments>
		<georss:point>28.621671 77.162177</georss:point>
		<geo:lat>28.621671</geo:lat>
		<geo:long>77.162177</geo:long>
		<media:content url="http://1.gravatar.com/avatar/18ba8ff7182a19f3392c7e668fd1934c?s=96&#38;d=identicon&#38;r=G" medium="image">
			<media:title type="html">anandprashad</media:title>
		</media:content>

		<media:content url="http://oshosatsang.files.wordpress.com/2012/01/angel1.jpg?w=300" medium="image">
			<media:title type="html">तीसरी आँख : स्‍वप्‍न या सत्‍य?—</media:title>
		</media:content>
	</item>
	</channel>
</rss>
