Category Archives: मेरी कविताए

रात की खामोशी—-(कविता )

ऐ खूबसूरत श्‍याम तुम क्‍या रात की खामोशी में, खोने चली है, अपने होने को तू चाहती है कुछ नये का अंकुरण कर लुं, पर जरा संभल कर जाना वहां तुझे मिलेगा मेरा दिलवर,

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पथ चिन्‍ह—(70) कविता

था वो पथ एक दम से वीरान, और यही थी उसकी पहचान बस अभी-अभी गुजरा है उस पथ एक अंजान पथिक देखी मैंने भी उसको है एक धुँधली सी झलक की तरह

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उस पार नहीं मैं होना चाहता—(69)कविता

उस पार नहीं मैं होना चाहता, मझधार बना कुछ रहने दो, प्रियतम टूटे तारों से कोई राग बना कुछ रहने दो। टूटे-बिखरे इन सपनों का संसार बना कुछ रहे दा।।

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लाल बत्‍ती–(68)कविता

चौराहे पर जलती थी एक लाल बत्‍ती कैसे हंसी खिलखिलाती सी दिखती थी कैसा दिखाता था वहाँ सब कुछ आदर्श और सौम्य माहोल जैसे कायदे कानून वहां अपनी शान का प्रदर्शन कर रहे हो न वहां अराजकता, न अफरातफरी न … Continue reading

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कौन है हम? (कविता)67

कौन है हम? है कहां घर? किस जहां से आये है क्‍यों भटकते है युगों से? क्‍या हमारा काम है ? इस बार पूछे गे तुम्‍हीं से कि क्‍या हमारा नाम है?

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एक बार बस बौद्ध पथिक बन–(67) कविता

ऐ दिनकर तू युगों-युगों से निस-नित यूं ही चलता आया तू नहीं चाहता इस जीवन में कुछ तो में परिर्वतन कर लूं कभी भटक जाऊं इस पथ से चाह कर कुछ तो भूले कर लूं…..

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सु-प्रभात–कविता (65)

मैंने पूछा दिनकर से ये नई सुबह, और नई उमंग, तुम कब लाओगे वो कहने लगा- हंस कर यूं कुछ रोज नया तो मैं होता हूं भरता हूं में फूलों में नित रंग गाता हूं विहंग के कंठों पर गीत … Continue reading

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राज—सिंहासन—आज के नेता (कविता)

राज : सिंहासनों पर बैठे ये लोग, संवेदन हिन हो गये है, इनके आदर्श, नैतिकता, शिष्‍टाचार, सब बन गई है केवल भ्रष्‍टाचार देखो इनकी हिमाकत तो जरा जब आप इन्‍हें टोकते हो तो कैसे गुर्रा कर पड़ते आप पर जैसे … Continue reading

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अहंकार और भय–कविता (63)

अहंकार तू मूल है जीवन का, तेरे सहारे ही ये जीवन का भवन खड़ा है तू ही है मेरे होने का रहस्‍य तुझे मिलता है पोषण उस भय रूपी जड़ों से इन शिराऔ को जो फूट कर होती है पल्लवित … Continue reading

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शायद ये मेरा भ्रम था…(कविता) –62

शायद ये था भ्रम मात्र ही, की मैंने तलाशा है तुम्‍हें, पर जब तुम खड़े थे मेरे आँगन एक फैलती घुप की तरह से कहां उठी मेरी नजरे तुम्‍हारी और कहां देखा पाया मैं तुम्‍हें अपने आस पास

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गहरे तल—(कविता)

प्रभात बैला रवि की प्रखर होती किरणें उनका अवारण बहना, चूमना इस धरा के रज कणों को उन अछूते तलों और गहराईयों को जो छू जाती उन अंधेर नीरस कोने को भी जो दबे पड़े थे समय की गोद में … Continue reading

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हां ! हमनें गांधी को मार दिया—कविता

हां ! हमनें गांधी को मारा दिया क्‍योंकि वह करता था आदर्श की बातें? क्‍योंकि वह चलता था सचाई-नैतिकता की राह पर उसकी दी हुई आजादी हमें नहीं भाई, हम आजादी नहीं चाहते थे हम चाहते थे स्वतंत्रता के नाम … Continue reading

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जीवेषणा तेरी जड़ें—कविता

जीवेषणा कहां है तेरी जड़ें? मैं उसे देखना चाहता हूं, किन शिराऔ से मिलता है तुम्‍हें भोजन, तू कहां, किन अंधेरी गलियों से मार्ग ढूंढ कर आती है चुप से और घेर लेती है मेरे पूरे जीवन को पर नहीं … Continue reading

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कौन आधार यहां है जग का?—कविता

एक पत्‍थर आलंबन का है। एक तोरण शिखर की शोभा, एक सहता बोझ गुम्बद का, एक बाँटता दीवारों में कौन आधार यहां है जग का? ये सब अहं का भ्रम पला। –स्‍वामी आनंद प्रसाद ‘’मनसा’’

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जीवेषणा—कविता

जीवेषणा कहां है तेरी जड़ें? मैं उसे देखना चाहता हूं, किन शिराऔ से मिलता है तुम्‍हें भोजन, तू कहां, किन अंधेरी गलियों से मार्ग ढूंढ कर आती है चुप से

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एक पत्र नेता के नाम—( कविता)

शिव कुमार चौहान( मुख्‍य मंत्रि मध्‍यप्रदेश) प्रिय नेता शिव कुमार चौहान जी, आप महान है, इस यूग के लोह पुरूष है। आपकी दृढ़ संकल्प शक्‍ति, अदभुत, विषमय कारी है। आप इस युग में एक मात्र सत्‍य वादी है, आप तो … Continue reading

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मेरा प्‍याला भी—भरा हुआ (कविता)

तुम जब आये मेरे द्वार, मैं मद-अहं से भरा हुआ था। तेरे पदचापों की ध्‍वनि, सुन-सुन कर अनसुना किया था।। डूबा सूरज हुआ अंधेरा, चारों और तमस न घेरा, करूणा करके तूने मुझपर

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मैं फिर हारी—मैं फिर हारी—(कविता)

भिना-भिना सा कुछ महक रहा था, अंबर तारों से दमक रहा था कुछ पल में सब मिटने लगेगा। रात की कालिमा, जो बनी थी प्रहरी, ढँके हुऐ थी सब प्रकृति को उसमें स्‍वर्णिम रंग घुलेंगे। पृथ्‍वी का यौवन ले गा … Continue reading

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मिट्टी और खून –-एक टीस (कविता)

मिट्टी में मिली खून की बूंद, पुकार कर कहती है। देखो उन भयाक्रांत आंखों को, कहना कह कर भी, वह कुछ भी नहीं कह पा रही है। फिर वही गिरा खून, पुकार कर तुम्‍हें कुछ कहना चाहता है।

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दिल की लगी–(गीत)

दिल की लगी को दिल ही जानें, दिल का लगान खेल नहीं। हंसती है दुनियां दिल मिलने पर, मिल के बिछुड़ना मेल नहीं।। आस लगी है, वीरानों को, आयेगा फिर से वो सावन। सबके मिलते मित यहां पर, मेरा भी … Continue reading

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