(फ्री हिन्दी अंग्रेजी ओशे प्रवचन और ई-बुक)http://www.oshoba.org/
आनंद प्रसाद
ओशो की किरण जीवन में जिस दिन से प्रवेश किया, वहीं से जीवन का शुक्ल पक्ष शुरू हुआ, कितना धन्य भागी हूं ओशो को पा कर उस के लिए शब्द नहीं है मेरे पास.....अभी जीवन में पूर्णिमा का उदय तो नहीं हुआ है। परन्तु क्या दुज का चाँद कम सुदंर होता है। देखे कोई मेरे जीवन में झांक कर। आस्तित्व में सीधा कुछ भी नहीं है...सब वर्तुलाकार है , फिर जीवन उससे भिन्न कैसे हो सकता है।
कुछ अंबर की बात करे,
कुछ धरती का साथ धरे।
कुछ तारों की गूंथे माला,
नित जीवन का एहसास करे।।
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Category Archives: परिशिष्ट प्रकरण–स्वणिम बचपन
मेरे एथिक्स के प्रोफेसर और पंचानवे प्रतिशत अंक
जब मैं विश्वविद्यालय में विद्यार्थी था। मैंने एथिक्स, निति शास्त्र लिया था। मैं उस विषय के प्रोफेसर के केवल एक ही लेक्चर में उपस्थित हुआ। मुझे तो विश्वास ही नहीं आ रहा था कि कोई व्यक्ति इतना पुराने विचारों का … Continue reading
परिशिष्टि प्रकरण–26
मेरा –सूक्ष्म शरीर का अनुभव— एक अद्भुत अनुभव मुझ हुआ। वह मैं कहूं। अब तक उसे कभी कहा नहीं। अचानक ख्याल आ गया तो कहता हूं। कोई सत्रह-अट्ठारह साल पहले की बात है। रातों को मैं वृक्ष के ऊपर बैठ … Continue reading
परिशिष्ट प्रकरण–(24) झूठा ब्रह्मज्ञान
झूठा ब्रह्मज्ञान- मैं जब छोटा था तो मेरे गांव में एक बहुत बड़े विद्धवान पंडित रहते थे। वह मेरे पिता के मित्र थे। मैं अपने पिता के उलटे सीधे प्रश्न पूछ कर सर खाता रहता था। पर मेरे पिता ईमानदार … Continue reading
परिशिष्ट प्रकरण—भट्टाचार्य की भूत से भेट(23)
मेरे गांव मैं एक आश्रम था, जहां कबीर के एक बहुत प्रसिद्ध अनुयायी साहिब दास रहते थे। वे मुझसे काफी पहले हुए थे। लेकिन वे ध्यान करने वालों के लिए एक बड़ा आश्रम एक बड़ा सा मंदिर और बहुत सह … Continue reading
परिशिष्ट प्रकरण—(मेरा पुस्तक प्रेम–22)
मेरे पिता जी वर्ष में कम से कम तीन या चार बार बंबई जाया करते थे। और वे सभी बच्चों से पूछा करते थे, तुम अपने लिए क्या पसंद करोगे। और वे मुझसे भी पूछा करते यदि तुमको किसी वस्तु … Continue reading
परिशिष्ट प्रकरण— (मुझे सुझाव दे-आदेश नहीं-21)
मुझे सुझाव दे–आदेश नहीं मेरे बचपन में मेरे माता पिता के साथ यह प्रतिदिन की समस्या थी। मैंने उनसे बार-बार कहा, एक बार आप लोगों को समझ लेनी चाहिए कि यदि आप चाहते है कि मैं कुछ करू, तो मुझको … Continue reading
परिश्ष्टि प्रकरण—20 ( मुहर्रम)
मुहर्रम का त्योहार—और मेरी सूई मेरे बचपन में मेरे गांव में…जब कभी भी मुसलमानों द्वारा मुहर्रम का त्यौहार मनाया जाता है, कुछ लोगों पर पवित्र आत्मा सवार हो जाती है। इस पवित्र आत्मा को वली कहा जाता है। कुछ लोग … Continue reading
परिशिष्ट प्रकरण—19( मौन की सुगंध)
मौन की सुगंध मैं बहुत छोटा था, शायद बारह वर्ष का रहा होऊंगा, जब एक बहुत विचित्र व्यक्ति हमारे घर में आया। मेरे पिता उनको लेकर आए थे। क्योंकि वे विद्वान थे। और न केवल विद्वान थे बल्कि उनके अपने … Continue reading
शिक्षक की शर्तें–(परिशिष्ट प्रकरण-18)
मेरे शिक्षकों में से एक प्रतिदिन अपनी कक्षा इस बात को कह कर शुरू किया करते थे। पहले मेरी शर्तों को सुन लो। मुझे सिर में दर्द होना स्वीकार नहीं है, मुझे पेट में दर्द होना स्वीकार नहीं है। मैं … Continue reading
सौ फीट के पूल से छल्लांग–(परिशिष्ट प्रकरण—17 )
मैंने इस जन्म में साहसी होने, प्रखर होने या होने या प्रति भावन होने के लिए आरंभ से ही कुछ अलग कार्य नहीं किया, और कभी इसे साहस प्रखरता प्रतिभा की भांति नहीं सोचा। यह तो बाद में धीर-धीरे मैं … Continue reading
तैरना एक युक्ति है–(परिशष्टि-16)
, मेरे गांव में एक बहुत सुंदर वृद्ध भले व्यक्ति थे। उनको प्रत्येक व्यक्ति प्रेम करता था। वे बहुत सरल और बहुत भोले थे, यद्यपि वे अस्सी वर्ष के ऊपर के थे। और मेरे गांव के साथ में ही एक … Continue reading
पहली सतोरी नदी तीर–(परिशिष्ट प्रकरण–15)
पहली सतोरी नदी तीर अपने बचपन के दिनों में मैं प्रात: काल जल्दी नदी पर जाया करता था। यह एक छोटा सा गांव का। नदी बहुत अधिक सुस्त थी। जैसे कि यह जरा भी प्रवाहित न हो रही हो। प्रति: … Continue reading
बोतल का रहस्य–(परिश्ष्टि प्रकरण–15)
बोतल का रहस्य मेरे पिता, जब वे किस समारोह में, किसी विवाह में, किसी जन्म-दिवस की दावत में या कहीं और जा रहे होते,तो मुझको साथ ले जाया करते थे। वे मुझे इस शर्त पर ले जाते थे। कि मैं … Continue reading
पूर्णत: मुक्ति-परिशिष्ट प्रकरण–(13)
मेरे पड़ोस में एक मंदिर था, कृष्ण का मंदिर, मेरे मकान से कुछ ही मकान आगे। मंदिर सड़क के दूसरी और था, मेरा मकान सड़क के इस और था। मंदिर के सामने वे सज्जन रहा करते थे जिन्होंने यह मंदिर … Continue reading
बहादुर या कायर मास्टर(परिशिष्ट प्रकरण–12)
मेरे हाई स्कूल में, वहां विद्यालय भवन में दो इमारतें थी। और उनके बीच में कम से कम बीस फिट का फासला था। मुझे लकड़ी का एक ऐसा पटिया मिल गया जो बीस फिट लंबा था। पहले मैं इसे भूमि … Continue reading
ओम, ओम…..का नाद और दंड–(परिशिष्ट प्रकरण -11)
अपने प्राइमरी स्कूल में उस समय मैं चौथी कक्षा में था, मेरे एक शिक्षक थे…स्कूल में यह उनकी कक्षा में मेरा पहला दिन था, और मैंने कुछ गलत किया भी नहीं था, मैं वहीं कर रहा था जो तुम ध्यान … Continue reading
दंड या पुरस्कार–(परिशिष्ट प्रकरण–10)
पक्षियों को सुनते-सुनते मुझे स्मरण हो आता है…..होई स्कूल में बस मेरी कक्षा के बाहर ही आम के अनेक वृक्ष थे। और आम के वृक्षों पर कोयलें अपना घोंसला बनाया करती है। जिसकी पुकार इस समय आ रही है, वहीं … Continue reading
मैं निर्वासित व्यक्ति था–(परिशिष्ट प्रकरण-9)
जब मैं अपनी प्राथमिक पाठशाला में पढ़ा करता था। उस समय मेरा घर विद्यालय से बहुत निकट था। इसलिए जब विद्यालय के आरंभ होने की घंटी बजती, मेरे लिए वह स्नानागार मैं जाने का समय होता। मेरा पूरा परिवार दरवाजा … Continue reading
ब्राह्मण की चोटी काटना–(परिशिष्ट प्रकरण-8)
मेरे बचपन में—क्योंकि उसके बारे में मैं तुमसे अधिक अधिकार पूर्वक बात कर सकता हूं; मैं तुम्हारे बचपन के बारे में नहीं जानता, केवल अपने बचपन के बारे में जानता हूं—यह प्रश्न प्रतिदिन का था। मुझसे लगातार सत्यभाषी होने के … Continue reading
पिता का थप्पड़ मारना–(परिशिष्टि प्रकरण–7)
मेरे दादा प्रत्येक मामले मैं सदैव मेरे पक्ष में रहा करते थे। यदि वे कर सकते तो वे मेरे साथ सहभागिता करने को तत्पर रहते थे। निस्संदेह उन्होंने कभी मुझे दंडित नहीं किया, उनहोंने मुझे सदा पुरस्कृत किया। मैं हर … Continue reading





