Category Archives: पतंजलि का योग सुत्र–

कूर्म-नाड़ी पर संयम संपन्‍न करने से योगी पूर्ण रूप से थिर हो जाता है—पतंजलि

कूर्मनाडयां स्‍थैर्यम्– कूर्म-नाड़ी प्राण की, श्‍वास की वाहिका है। अगर हम चुपचाप, शांतिपूर्वक अपने श्वसन पर ध्‍यान दें, किसी भी ढंग से श्‍वास की लय न बिगड़े, न तो स्‍वास तेज हो, और न ही धीमी हो, बस उसे स्‍वाभाविक … Continue reading

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कंठ पर संयम संपन्‍न करने से क्षुधानु पिपासा की अनुभूतियां क्षीण हो जाती है—पतंजलि

कण्ठ कूपे क्षुत्‍पिपासानिवृति: यह आंतरिक अन्‍वेषण है। योग जानता है कि अगर हमको भूख लगती है तो भूख पेट में ही अनुभव नहीं होती है। जब प्‍यास लगती है, तो वह ठीक-ठीक गले में ही अनुभव नहीं होती। पेट मस्‍तिष्‍क … Continue reading

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मृत्‍यु की ठीक-ठीक भविष्‍य वाणी—पतंजलि

’सक्रिय व निष्‍क्रिय या लक्षणात्‍मक वह विलक्षणात्‍मक—इन दो प्रकार के कर्मों पर संयम पा लेने के बाद मृत्‍यु की ठीक-ठीक घड़ी की भविष्‍य सूचना पायी जा सकती है।‘’ सोपक्रमं निरूपक्रमं च कर्म तत्‍संयमादपारान्‍तज्ञानमरिष्‍टेभये वा। तो इसे दो प्रकार से जाना … Continue reading

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स्‍वार्थ पर संयम संपन्न करने से अन्‍य ज्ञान से भिन्‍न पुरूष उपलब्‍ध होता है—पतंजलि

‘’स्‍वार्थसंयमात्‍पुरूश ज्ञानम्– तत: प्रतिभश्रावणवेदनादर्शास्‍वादवार्ता जायन्‍ते। पतंजलि कहते है, ‘’स्‍वार्थ परम ज्ञान ले आता है।‘’ स्‍वार्थ। स्‍वार्थी हो जाओ, यही है धर्म का वास्‍तविक मर्म, यह जानने का प्रयास करो कि तुम्‍हारा वास्‍तविक स्‍वार्थ क्‍या है। स्‍वयं को दूसरों से अलग … Continue reading

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ध्रुवे तद्गतिज्ञानम्—पतंजलि योग सूत्र

ध्रुव-नक्षत्र पर संयम संपन्‍न करने से तारों-नक्षत्रों की गतिमयता का ज्ञान प्राप्‍त होता है। और हमारे अंतर-अस्‍तित्‍व का ध्रुव तारा कौन सा है? ध्रुव तारा बहुत प्रतीकात्‍मक है। पौराणिक कथाओं के अनुसार यही समझा जाता है कि ध्रुव तारा ही … Continue reading

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शक्‍तियां है जो मन के बहार होने से प्राप्‍त होती है, लेकिन ये समाधि के मार्ग पर बाधाएं है—पतंजलि (योग-सूत्र)

ख्‍याल रहे वे भी शक्‍तियां है, अगर बाहर की और जाना हो तो—लेकिन अगर भीतर जाना हो ता यहीं शक्‍तियां बाधाएं बन जाती है। अगर व्‍यक्‍ति स्वयं के भीतर जा रहा हो, तो यही शक्‍तियां बाधा बन जायेगी। जो व्‍यक्‍ति … Continue reading

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प्राण उर्जा के पाँच भिन्‍न-भिन्‍न रूप है— (ओशो)

योगियों ने कहा है, प्राण उर्जा के पाँच भिन्‍न-भिन्‍न रूप, क्रियाएं और उर्जा क्षेत्र होते है। हम तो यहीं कहेंगे कि श्‍वास कहना पर्याप्‍त है। हम तो केवल रो ही बातें जानते है—श्‍वास को बाहर छोड़ना, श्‍वास को भी तर … Continue reading

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शिष्‍य का चौथ द्वार खोलना और गुरु कि महाकुंजी— ओशो

प्रश्न–हम अपनी मूर्च्‍छित और अहंकारी अवस्‍था में, सदा गुरु के संपर्क में नहीं होते। लेकिन गुरु क्‍या सदा हमारे संपर्क में होता है? ओशो– तुम्‍हारी चेतना परत मात्र एक है चार परतों में। लेकिन यह तभी संभव है जब तुमने … Continue reading

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धर्म और संस्‍कार—

धर्म तुम्‍हें संस्‍कारित करते है। राजनेता तुम्‍हें संस्‍कारित करते है। तुम एक संस्‍कारित चित हो। केवल ध्‍यान द्वारा संभावना है तुम्‍हारे मन को अ-संस्‍कारित करने की। केवल ध्‍यान ही संस्‍कारों के पार जाता है। क्‍यों? क्‍योंकि प्रत्‍येक संस्‍कार विचारों के … Continue reading

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कामवासना ओर प्रेम—

कामवासना अंश है प्रेम का, अधिक बड़ी संपूर्णता का। प्रेम उसे सौंदर्य देता है। अन्‍यथा तो यह सबसे अधिक असुंदर क्रियाओं में से एक है। इसलिए लोग अंधकार में कामवासना की और बढ़ते है। वे स्‍वयं भी इस क्रिया का … Continue reading

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सपनों के पाँच प्रकार—II

चौथे प्रकार के स्‍वप्‍न– चौथे प्रकार के स्‍वप्‍न जो कि आते है पिछले जन्‍मों से। वे बहुत विरल नहीं होते है। वे घटते हैं, बहुत बार आते है वे। लेकिन हर चीज तुम्‍हारे भीतर इतनी गड़बड़ी में है कि तुम … Continue reading

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सपनों के पाँच प्रकार—I

पहला प्रकार— पहले प्रकार के स्‍वप्‍न तो मात्र कूड़ा करकट होते है। हजारों मनो विश्लेषक बस कूड़े पर कार्य कर रहे है; यह बिलकुल व्‍यर्थ है। ऐसा होता है क्‍योंकि सारे दिन में, दिन भर काम करते हुए तुम बहुत-कुड़ा … Continue reading

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सादगी भरा व्‍यक्‍ति और प्रसन्‍नता—

एक सादगी भरा व्‍यक्‍ति जान लेता है कि प्रसन्‍नता जीवन का स्‍वभाव है। प्रसन्‍न रहने के लिए किन्‍हीं कारणों की जरूरत नहीं होती। बस तुम प्रसन्‍न रह सकते हो। केवल इसीलिए कि तुम जीवित हो। जीवन प्रसन्‍नता है जीवन आनंद … Continue reading

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क्‍या आप फिर से एक और जन्‍म ले सकते है?

हां, एक बार मैंने कहा था कि यदि इसकी आवश्‍यकता हुई तो मैं आऊँगा वापस। लेकिन अब मैं कहता हूं कि ऐसा असंभव है। अत: कृपा करना, थोड़ी जल्‍दी करना। मेरे फिर से आने की प्रतीक्षा मत करना। मैं यहां … Continue reading

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चाय का अन्‍वेषक— बोधिधर्म

एक बौद्ध भिक्षु अपना दैनिक जीवन चाय से आरंभ करता है। उषा काल में, इसके पूर्व कि वह ध्‍यान करने जाए, वह चाय पीता है। ध्‍यान कर लेने के उपरांत वह चाय पीता है। और वह इसे बहुत धार्मिक ढंग … Continue reading

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अस्‍तित्‍व की आधारभूत संरचना—

अब मैं तुम्‍हें तुम्‍हारे अस्‍तित्‍व की एक परम आधारभूत यौगिक संरचना के बारे में बताता हूं। जैसे कि भौतिकविद सोचते है कि यह सब और कुछ नहीं बल्‍कि इलेक्ट्रॉन, विद्युत-उर्जा से निर्मित है। योग की सोच है कि यह सब … Continue reading

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सिद्घपुरुष और संबोधी व्‍यक्‍ति में भेद—

सिद्ध पुरूष—में वह सारी शक्‍तियां जिनकी योग बात करता है, और पतंजलि बात करेंगे जिनके बारे में—वे उसे आसानी से उपलब्‍ध होंगी। वह चमत्‍कारों से भरा होगा; उसका स्‍पर्श चमत्‍कारिक होगा। कोई भी चीज संभव होगी क्‍योंकि उसके पास निन्यानवे … Continue reading

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हंसी कि छ: कोटियां—

भगवान बुद्ध ने एक बार सारिपुत्र से कहां की तुम हंसी पर ध्‍यान के देखो और मुझे बतलाओ हंसी कितने प्रकार की होती है। सारिपुत्र ने पुरा विवरण बुद्ध भगवान को दिया। सारिपुत्र के पहले और सारिपुत्र के बाद कभी … Continue reading

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