(फ्री हिन्दी अंग्रेजी ओशे प्रवचन और ई-बुक)http://www.oshoba.org/
आनंद प्रसाद
ओशो की किरण जीवन में जिस दिन से प्रवेश किया, वहीं से जीवन का शुक्ल पक्ष शुरू हुआ, कितना धन्य भागी हूं ओशो को पा कर उस के लिए शब्द नहीं है मेरे पास.....अभी जीवन में पूर्णिमा का उदय तो नहीं हुआ है। परन्तु क्या दुज का चाँद कम सुदंर होता है। देखे कोई मेरे जीवन में झांक कर। आस्तित्व में सीधा कुछ भी नहीं है...सब वर्तुलाकार है , फिर जीवन उससे भिन्न कैसे हो सकता है।
कुछ अंबर की बात करे,
कुछ धरती का साथ धरे।
कुछ तारों की गूंथे माला,
नित जीवन का एहसास करे।।
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सर्कस के शेर और पार्लियामेंट—
एक दफा दिल्ली में सर्कस के दो शेर छूट कर शहर में भाग गये। भागे तो दोनों साथ-साथ पर रास्ते में दोनों अगल-अलग हो गये। दिल्ली जैसे मायावी शहर में मनुष्य खो जाये ये तो बेचारे जानवर थे। सात दिनों … Continue reading
Posted in चलों कुछ हंस ले--
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सरदार विचित्तर सिंह और मुल्ला नसरूदीन—
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