Category Archives: चलों कुछ हंस ले–

सर्कस के शेर और पार्लियामेंट—

एक दफा दिल्‍ली में सर्कस के दो शेर छूट कर शहर में भाग गये। भागे तो दोनों साथ-साथ पर रास्‍ते में दोनों अगल-अलग हो गये। दिल्‍ली जैसे मायावी शहर में मनुष्‍य खो जाये ये तो बेचारे जानवर थे। सात दिनों … Continue reading

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सरदार विचित्तर सिंह और मुल्‍ला नसरूदीन—

मुल्‍ला नसरूदीन ने एक बार अपने पुराने मित्र सरदार विचित्‍तर सिंह को दावत पर बुलाया। खाना-पीना हो गया था कि एकाएक चावल का एक दाना नसरूदीन की मूँछों में फंस गया। नसरूदीन के नौकर बल्ले खां को यह दिखाई दे … Continue reading

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मुल्‍ला नसरूद्दीन और लाटरी—

मैने सुना है कि मुल्‍ला नसरूदीन एक गांव की सबसे गरीब गली में दर्जी का काम करता था। इतना कमा पता था कि मुश्‍किल से कि रोटी-रोजी का काम चल जाये, बच्‍चे पल जाये। मगर एक व्‍यसन था उसे कि … Continue reading

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स्‍वर्ग का अख़बार और पत्रकार—

पत्रकार की तो और भी अड़चन है। पत्रकार तो जीता है गलत पर ही। पत्रकार का सत्‍य से कोई लेना-देना नहीं है। पत्रकार तो जीता असत्‍य पर है, क्‍योंकि असत्‍य लोगों को रुचिकर है। अख़बार में लोग सत्‍य को खोजने … Continue reading

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मोरारजी देसाई ओर नर्क

मोरारजी देसाई जब इस प्‍यारी दुनियां से चल बसे, तब उन्‍होंने सोचा की हो-न-हो मुझे तो जरूर ही स्‍वर्ग में जगह मिलेगी। पर ये स्‍वर्ग दिल्‍ली तो नहीं था। न ही वहां दिल्‍ली की कोई साठ गांठ ही चल सकती … Continue reading

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राजनेता जी और सर्कस—

एक राजनेता चुनाव में हार गये। राजनेता थे, और कुछ जानते भी नहीं थे। ने पढ़े-लिखे थे, एक दम से अंगूठा छाप थे। राजनेता होने के लिए अंगूठा छाप होना एक योग्‍यता है। सब तरह से अयोग्‍य होना योग्‍यता है। … Continue reading

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