(फ्री हिन्दी अंग्रेजी ओशे प्रवचन और ई-बुक)http://www.oshoba.org/
आनंद प्रसाद
ओशो की किरण जीवन में जिस दिन से प्रवेश किया, वहीं से जीवन का शुक्ल पक्ष शुरू हुआ, कितना धन्य भागी हूं ओशो को पा कर उस के लिए शब्द नहीं है मेरे पास.....अभी जीवन में पूर्णिमा का उदय तो नहीं हुआ है। परन्तु क्या दुज का चाँद कम सुदंर होता है। देखे कोई मेरे जीवन में झांक कर। आस्तित्व में सीधा कुछ भी नहीं है...सब वर्तुलाकार है , फिर जीवन उससे भिन्न कैसे हो सकता है।
कुछ अंबर की बात करे,
कुछ धरती का साथ धरे।
कुछ तारों की गूंथे माला,
नित जीवन का एहसास करे।।
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Category Archives: ओशो के अमृत पत्र
पत्र-पाथेय–अन्तत:26( संन्यास का संकल्प )
प्रिय सुमित्रा, प्रेम। संन्यास का मन है तो मन से तो संन्यास ले ही लो। बाह्य परिवर्तन की जब सुविधा मिले तब कर डालना। स्वयं को संन्यास में ही जानों और उसी भांति जियो। फिर जि परिवार और प्रियजनों को … Continue reading
पत्र-पाथेय–25(संन्यास और गृहस्थी का मेल परमात्मा पर छोड़ )
प्यारी साधना, प्रेम। पूछा है तूने: मन स्थिति संन्यासी की और परिस्थिति गृहस्थी की—इनमें मेल कैसे करें? मेल तू करना ही नहीं—वह कठिन कार्य प्रभु पर ही छोड़। संसार और स्वयं का भी उसने मेल किया है—शरीर और आत्मा का … Continue reading
पत्र-पाथेय–24(संन्यास है,मन से मनातीत में यात्रा )
प्रिय आनंद विजय, प्रेम। संन्यास के लिए मन कैसे-कैसे बचाव खोज रहा था। क्योंकि, संन्यास मन की मृत्यु जो है। पर साहस किया तुमने—उठ सके मन के ऊपर। तो जाना वह, जो कि परमानंद है। मन है संसार। मनातीत है … Continue reading
पत्र-पाथेय:23 (ध्यान की गहराई के साथ ही संन्यास-चेतना का आगमन)
मेरे प्रिय, प्रेम, बहुमूल्य है तुम्हारा अनुभव। जो चाहते थे वही हुआ है। द्वार खुला है—जन्मों-जन्मों से बंद पडा द्वार। इसलिए पीड़ा स्वभाविक है। नया जन्म हुआ है तुम्हारा। इसलिए, प्रसव से गुजरना पडा है।
पत्र-पाथेय:(संन्यास में छलांग—22)
प्यारी सावित्री, प्रेम, कब तक करेगी बाहर-भीतर का भेद? शरीर और आत्मा का? पदार्थ और परमात्मा का? काफी किया—अब छोड़। संन्यास न है बाहर से, न भीतर से। संन्यास बाहर भीतर का भेद है। और इसलिए कहीं से प्रांरभ कर—अंत … Continue reading
पत्र-पाथेय–21(मन है संन्यास का तो डुबो )
मेरे प्रिय, प्रेम, मन है संन्यास का तो डुबो। फिर स्थगन ठीक नहीं। प्रभु जब पुकारें तो चल पड़ो। फिर रूकना नहीं। क्योंकि, अवसर द्वार पर बार-बार आए कि न आए। रजनीश के प्रणाम 23—1—1971 (प्रति : श्री शिव, अब … Continue reading
Posted in ओशो के अमृत पत्र
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पत्र-पाथेय–20 (संन्यास संकल्प नहीं, समर्पण है )
मेरे प्रिय, प्रेम, सोच-विचार कैसा? क्षण का भी तो भरोसा नहीं है। समय तो प्रतिपल हाथ से चुकता ही जाता है। और मृत्यु ने पूछकर आती है। न बताकर ही। फिर संन्यास का अर्थ है :सहज जीवन। वह आरोपण नहीं; … Continue reading
प्रत्र-पाथेय–19(संन्यास सबसे बड़ा विद्रोह है)
प्रिय कृष्ण कबीर, प्रेम, संन्यास बड़े से बड़ा विद्रोह है—संसार से, समाज से, सभ्यता से। वह मूल्यों का मूल्यांतर है। वह स्वयं में और स्वयं के द्वारा क्रांति है। इसलिए अनेक प्रकार की कठिनाइयां सहनी होंगी। विरोध होगा। हंसी होगी। … Continue reading
पत्र-पाथेय (18)—संन्यास है कर्ता-मुक्त दृष्टि
प्रिय योग मूर्ति, प्रेम, आह, क्या तुम्हें ऐसा लगता है कि, ‘आये थे हरि भजन को ओटन लगे कपास, तब तुम न तो हरि भजन का ही अर्थ समझते हो, और न ही कपास को ओटने का। जिसके लिए ‘कपास … Continue reading
पत्र-पाथये—(17)संन्यास की आत्मा—स्वतंत्रता में
प्रिय यो माया, प्रेम,स्वतंत्रता से बहुमूल्य इस पृथ्वी पर कुछ और नहीं है। उसकी गहराई में ही संन्यास है। उसकी ऊंचाई में ही मोक्ष है। लेकिन, सच्चे सिक्कों के साथ खोटे सिक्के भी तो चलते है। शायद, साथ कहना भी … Continue reading
पत्र-पाथय–(16)—कोयले जैसी चेतना को हीरे जैसा बनाने की कीमिया है—संन्यास
प्रेम, नासमझी से वरदान भी अभिशाप हो जाते है। और समझ से अभिशाप भी वरदान। इसलिए, असली सवाल अभी श्राप या वरदान का नहीं है; असली सवाल है उस कीमिया (अल्केमी) को जानने का, जो कि कांटों को फूल में … Continue reading
पत्र पाथय: 15 ( संन्यास भी ध्यान का एक मार्ग है )
मेरे प्रिय, प्रेम । ध्यान के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं है। या जो भी मार्ग है, वह सब ध्यान (मेडिटेशन) के ही रूप है। प्रार्थना भी ध्यान है। पूजा भी। उपासना भी। योग भी ध्यान है। सांख्य भी।
पत्र पाथय: 14 ( संसार को लीला मात्र जानना संन्यास है )
प्यारी हंसा, प्रेम । संसार आनंदपूर्ण अभिनय बन जाए तो संन्यास फलित होता है। संसार को बोझ रूप ढोना गार्हस्थ्य है। संसार को लीला मात्र जानना संन्यास है। संन्यास संसार का विरोध नहीं है। वरन संसार के प्रति दृष्टि का … Continue reading
पत्र पाथय: 13(ध्यान, प्रेम और संन्यास का फूल)
प्रिय कचु, प्रेम । ध्यान का जल सींचते रहो। संन्यास का फूल तो खिलेगा ही। लेकिन, सतत प्रयास चाहिए, ह्रदय की धड़कन-धड़कन में ध्यान का नाद भरना है। संन्यास सरल है, लेकिन सस्ता नहीं है।
पत्र पाथय: 12 (खिलना–संन्यास के फूल का)
मेरे प्रिय, प्रेम । जीवन में जो भी शुभ है, सुंदर है, सत्य है, संन्यास उन सबका समवेत संगीत है। संन्यास के बिना जीवन में सुवास असंभव है। जीवन अपने आप में जड़ों से ज्यादा नहीं है। संन्यास का फूल … Continue reading
पत्र-पाथेय: 11 (संन्यास सबसे बड़ा विद्रोह है)
प्रिय कृष्ण कबीर, प्रेम । संन्यास बड़े से बड़ा विद्रोह है—संसार से, समाज से, सभ्यता से। वह मूल्यों का मल्यांतरण है। वह स्वयं से स्वयं में और स्वयं के द्वारा क्रांति है। इसलिए, अनेक प्रकार की कठिनाइयां सहनी होंगी।
प्रत्र पाथेय: (10) ईश्वर की पुकार से भरे प्राणों में ही संन्यास का अवतरण
प्रिय धर्म ज्योति, प्रेम, संन्यास उस चित में ही अवतरित होता है, जिसके लिए कि ईश्वर ही सब कुछ हो। जहां ईश्वर ‘’सब कुछ’’ है, वहां संसार अपने आप ही ‘’कुछ नहीं’’ हो जाता है। किसी फकीर के पास ऐ … Continue reading
पत्र पाथेय:-(9) संकल्प ही सीढ़ियां है जीवन की
प्रिय आनंद मूर्ति, प्रेम, संकल्प के मार्ग में आती बाधाओं को प्रभु-प्रसाद समझना, क्योंकि उनके बिना संकल्प के प्रगाढ़ होने का और कोई उपाय नहीं है। राह के पत्थर प्रज्ञावान के लिए, अवरोध नहीं, सीढ़ियां ही सिद्ध होती हे। अंतत, … Continue reading
पत्र पाथेय-(8)संन्यास अर्थात जीवन का समग्र स्वीकार
प्रिय योग प्रेम, प्रेम, भय छोड़। क्योंकि भय को पकड़ा कि यह बढ़ा। उसे पकड़ना ही उसे पानी देना है। लेकिन,भय छोड़ने का अर्थ उससे लड़ना नहीं है। लड़ना भी उसे पकड़ना ही है। भय है—ऐसा जान। उससे भाग मत
पत्र-पाथेय: ( 7 ) संसार में संन्यास का प्रवेश
प्रिय प्रेम कृष्ण, प्रेम । संन्यास की सुगंध को संसार तक पहुंचाना है। धर्मों के कारा गृहों ने संन्यास के फूल को भी विशाल दीवारों की ओट में कर लिया है। इसलिए अब सन्यासी को कहना है कि मैं किसी … Continue reading





