Category Archives: एक विचार

सत्‍य कि विजय–

सत्‍य को लोग सुनने से घबराते है। सत्‍य से हम क्‍यों भय खाते है? शायद सत्‍य उस दर्पण की तरह है। जो हमारा हमारे अंतस को पार दर्श कर हमें नग्‍न कर देता है। इसी लिए तीन चार दिन से … Continue reading

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भय का भोजन क्रोध और अहंकार–

सुबह का घूमना प्रकृति का अनमोल खज़ाने में प्रवेश करने जैसा है। और में सालों से इस लालच से बच नहीं पाया हूं, ऐसा में करीब तब से कर रहा हूं तब से मैंने होश सम्‍हाला है। सूर्य निकलने से … Continue reading

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संतों की अपनी-अपनी कमजोरी—

धर्म गुरूओं को एक सम्‍मेलन हुआ। देश से बड़े-बड़े धर्म गुरु आये, सब ने अपने-अपने ज्ञान की गहराई ऊँचाइयों, के बखान किये, सभी श्रोता गण मंत्र मुग्‍ध हो धन्‍य हो गये। इसके बाद चारों एक कमरे में आराम करने चले … Continue reading

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वासना अंधी होती है—

बात आज से 15-।6 साल पुरानी होगी, पर आज भी चित पर ऐसे अंकित है मानों अभी देख रहा हूं। जब हम किसी घटना को होश से देखते है तो वह हमारे अचेतन पर बहुत साफ और सहज अंकित हो … Continue reading

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महेश भट्ट का संन्‍यास—2

तो यह तो जब तुम दीक्षा लोगे यह घटना घटेगी। फिर जब तुम दीक्षा छोड़ोगे, इससे उल्‍टी घटना घटेगी। घटनी ही चाहिए, ठीक तर्क है; एक सरणी है उसकी। अब तुम्‍हें बोलना पड़ेगा मेरे खिलाफ। अब तुमने जो-जो संदेह दबा … Continue reading

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महेश भट्ट का संन्‍यास………

शिष्‍यों की चार कोटियां है। पहली कोटि—विद्यार्थी की है, जो कुतूहल वश आ जाता है। जिसके आने में न तो साधना की कोई दृष्‍टि है न कोई मुमुक्षा है, न परमात्‍मा को पाने की कोई प्‍यास है। चलें देखें, इतने … Continue reading

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नारी: पुरूष की दासता से मुक्‍ति

स्‍त्री पुरूष की छाया से ज्‍यादा आस्‍तित्‍व नहीं जुटा पाई है। इसीलिए जहां पुरूष होता है, स्‍त्री वहां है। लेकिन जहां छाया होती है वहां थोड़े ही पुरूष को होने की जरूरत है। स्‍त्री का विवाह हो, तो वह श्रीमती … Continue reading

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नालंदा विश्‍वविद्यालय—

बड़ा विश्‍वविद्यालय था, नालंदा। दस हजार विद्यार्थी थे। चीन और लंका और कंबोदिया और जापन और दूर-दूर से लोग, मध्‍य एशिया और इजिप्‍त, सब तरफ से विद्यार्थी आते थे। पैदल यात्रा थी। जो चल पड़ा,वह लोट कर भी आएगा घर … Continue reading

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ताज महल को देखना

ताजमहल सूफी फ़क़ीरों की कल्‍पना है। बनवाया तो एक सम्राट ने, मगर जिन्‍होंने योजना दी, वे सूफी फकीर हैं। जिन्‍होंने निर्माण किया,वे भी सूफी फकीर है। इसलिए ताज महल को अगर तुम पूर्णिमा की रात घड़ी-दो घडी शांत बैठकर देखते … Continue reading

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नारी ओर सौन्दर्य प्रसाधन

नारी और पुरूष में शारीरिक संरचना में जो भेद है। वह जितना बहारी है उससे कहीं ज्‍यादा उसके अंतस की भिन्‍नता है। नारी को क्‍या सौन्‍दर्य की वाक्‍य में कोई जरूरत नहीं है? क्‍या उस के पास कुछ ऐसा है … Continue reading

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दिल्‍ली मैं बौद्धी वृक्ष

अब बुद्ध के बोधि-वृक्ष को बौद्ध नहीं मरने देते। यह इस वृक्ष की बात समझकर आपको ख्‍याल में आ सकेगा कि उसका कुछ उपयोग है। जिस बोधि-वृक्ष के नीचे बुद्ध को ज्ञान हुआ, उसको मरने नहीं दिया गया। असली सूख … Continue reading

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धर्म क्‍या है?

मैं धर्म क्‍या कहूं? जो कहा जा सकता है, वह धर्म नहीं होगा। जो विचार के परे है, वह वाणी के अंतर्गत नहीं हो सकता है। शास्‍त्रों में जो है, वह धर्म नहीं है। शब्‍द ही वहां है। शब्‍द सत्‍य … Continue reading

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वैणव जन तो तै न: कहिए…..

पिछले दिनों जब से हमने पोनी को पाला तो लगा इसे सुबह-सुबह घुमा कर लाना चाहिए। हम सुबह घूमने के लिए कम ही जाते थे। सुबह घर पर ही ध्‍यान नियम से एक घण्‍टा कर लेते थे। गांव के पास … Continue reading

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क्रोध वरदान या अभिशाप

तुम्‍हारी पूरी जिंदगी एक वर्तुल में घूमता हुआ चाक है। इसलिए हिंदुओं ने जीवन को जीवन चक्र कहा। देखते है, भारत के ध्‍वज पर जो चक्र बना है, वह बौद्धों का चक्र है। बौद्धों ने जीवन आरा ऊपर आता है। … Continue reading

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सत्‍संग

सत्‍संग को पूरब में बहुत मूल्‍य दिया है। पश्चिम की भाषाओं में सत्‍संग के लिए कोई ठीक-ठीक शब्‍द नहीं है। क्‍योंकि सत्‍संग का कोई मूल्‍य पश्‍चिम में समझा नहीं गया। सत्‍संग का अर्थ इतना ही है। जिसने जान लिया हो, … Continue reading

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कुतुब मीनार: एक भटकता इतिहास

पृथ्वी राज चौहान महाभारत काल की बंसा वली में आखरी हिंदू राजा था। मोहम्‍मद गोरी ने छल से उसे सन् 1192 ई में उसे हराया। उसे से पहले वहीं मोहम्‍मद गोरी 16 बार हारा। उसे अंधा कर के अपनी राजधानी … Continue reading

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यहुदी लोक कथा—(गधे की कब्र)

एक फकीर किसी बंजारे की सेवा से बहुत प्रसन्‍न हो गया। और उस बंजारे को उसने एक गधा भेंट किया। बंजारा बड़ा प्रसन्‍न था। गधे के साथ, अब उसे पेदल यात्रा न करनी पड़ती थी। सामान भी अपने कंधे पर … Continue reading

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क्या नारी को सौन्दर्य प्रसाधन की जरूरत नहीं?

नारी नारी और पुरूष में शारीरिक संरचना में जो भेद है। वह जितना बहारी है उससे कहीं ज्‍यादा उसके अंतस की भिन्‍नता है। नारी को क्‍या सौन्‍दर्य की वाक्‍य में कोई जरूरत नहीं है? क्‍या उस के पास कुछ ऐसा … Continue reading

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आदमी की संवेदन हिनता प्रकृर्ति की सबसे बड़ी दुशमन।

पिछले दिनों कुछ ऐतिहासिक स्मारक देखने गया। तो वहां पर पेड़ो की हालत देख कर रोना आ गया। हम क्‍या कर रहे है। विश्व स्मारक सूचि में कुतुब मीनार में भी पेड़े को भगवान भरोसे भी छोड़ दिया जाता तो … Continue reading

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राज नेता और धर्म गुरु

राज नेता और धर्म गुरूओं का आपसी ताल मेल एक कुट निति है ये दोनों सदियों से उस भ्रम जाल से जनता को छल रहे है। ये बहुत प्रचीन समय ये चालबाजी चली आ रही है। गीदड़ और लोमड़ी वाली, … Continue reading

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