(फ्री हिन्दी अंग्रेजी ओशे प्रवचन और ई-बुक)http://www.oshoba.org/
आनंद प्रसाद
ओशो की किरण जीवन में जिस दिन से प्रवेश किया, वहीं से जीवन का शुक्ल पक्ष शुरू हुआ, कितना धन्य भागी हूं ओशो को पा कर उस के लिए शब्द नहीं है मेरे पास.....अभी जीवन में पूर्णिमा का उदय तो नहीं हुआ है। परन्तु क्या दुज का चाँद कम सुदंर होता है। देखे कोई मेरे जीवन में झांक कर। आस्तित्व में सीधा कुछ भी नहीं है...सब वर्तुलाकार है , फिर जीवन उससे भिन्न कैसे हो सकता है।
कुछ अंबर की बात करे,
कुछ धरती का साथ धरे।
कुछ तारों की गूंथे माला,
नित जीवन का एहसास करे।।
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Category Archives: एक विचार
सत्य कि विजय–
सत्य को लोग सुनने से घबराते है। सत्य से हम क्यों भय खाते है? शायद सत्य उस दर्पण की तरह है। जो हमारा हमारे अंतस को पार दर्श कर हमें नग्न कर देता है। इसी लिए तीन चार दिन से … Continue reading
भय का भोजन क्रोध और अहंकार–
सुबह का घूमना प्रकृति का अनमोल खज़ाने में प्रवेश करने जैसा है। और में सालों से इस लालच से बच नहीं पाया हूं, ऐसा में करीब तब से कर रहा हूं तब से मैंने होश सम्हाला है। सूर्य निकलने से … Continue reading
संतों की अपनी-अपनी कमजोरी—
धर्म गुरूओं को एक सम्मेलन हुआ। देश से बड़े-बड़े धर्म गुरु आये, सब ने अपने-अपने ज्ञान की गहराई ऊँचाइयों, के बखान किये, सभी श्रोता गण मंत्र मुग्ध हो धन्य हो गये। इसके बाद चारों एक कमरे में आराम करने चले … Continue reading
वासना अंधी होती है—
बात आज से 15-।6 साल पुरानी होगी, पर आज भी चित पर ऐसे अंकित है मानों अभी देख रहा हूं। जब हम किसी घटना को होश से देखते है तो वह हमारे अचेतन पर बहुत साफ और सहज अंकित हो … Continue reading
महेश भट्ट का संन्यास—2
तो यह तो जब तुम दीक्षा लोगे यह घटना घटेगी। फिर जब तुम दीक्षा छोड़ोगे, इससे उल्टी घटना घटेगी। घटनी ही चाहिए, ठीक तर्क है; एक सरणी है उसकी। अब तुम्हें बोलना पड़ेगा मेरे खिलाफ। अब तुमने जो-जो संदेह दबा … Continue reading
महेश भट्ट का संन्यास………
शिष्यों की चार कोटियां है। पहली कोटि—विद्यार्थी की है, जो कुतूहल वश आ जाता है। जिसके आने में न तो साधना की कोई दृष्टि है न कोई मुमुक्षा है, न परमात्मा को पाने की कोई प्यास है। चलें देखें, इतने … Continue reading
नारी: पुरूष की दासता से मुक्ति
स्त्री पुरूष की छाया से ज्यादा आस्तित्व नहीं जुटा पाई है। इसीलिए जहां पुरूष होता है, स्त्री वहां है। लेकिन जहां छाया होती है वहां थोड़े ही पुरूष को होने की जरूरत है। स्त्री का विवाह हो, तो वह श्रीमती … Continue reading
नालंदा विश्वविद्यालय—
बड़ा विश्वविद्यालय था, नालंदा। दस हजार विद्यार्थी थे। चीन और लंका और कंबोदिया और जापन और दूर-दूर से लोग, मध्य एशिया और इजिप्त, सब तरफ से विद्यार्थी आते थे। पैदल यात्रा थी। जो चल पड़ा,वह लोट कर भी आएगा घर … Continue reading
ताज महल को देखना
ताजमहल सूफी फ़क़ीरों की कल्पना है। बनवाया तो एक सम्राट ने, मगर जिन्होंने योजना दी, वे सूफी फकीर हैं। जिन्होंने निर्माण किया,वे भी सूफी फकीर है। इसलिए ताज महल को अगर तुम पूर्णिमा की रात घड़ी-दो घडी शांत बैठकर देखते … Continue reading
नारी ओर सौन्दर्य प्रसाधन
नारी और पुरूष में शारीरिक संरचना में जो भेद है। वह जितना बहारी है उससे कहीं ज्यादा उसके अंतस की भिन्नता है। नारी को क्या सौन्दर्य की वाक्य में कोई जरूरत नहीं है? क्या उस के पास कुछ ऐसा है … Continue reading
दिल्ली मैं बौद्धी वृक्ष
अब बुद्ध के बोधि-वृक्ष को बौद्ध नहीं मरने देते। यह इस वृक्ष की बात समझकर आपको ख्याल में आ सकेगा कि उसका कुछ उपयोग है। जिस बोधि-वृक्ष के नीचे बुद्ध को ज्ञान हुआ, उसको मरने नहीं दिया गया। असली सूख … Continue reading
धर्म क्या है?
मैं धर्म क्या कहूं? जो कहा जा सकता है, वह धर्म नहीं होगा। जो विचार के परे है, वह वाणी के अंतर्गत नहीं हो सकता है। शास्त्रों में जो है, वह धर्म नहीं है। शब्द ही वहां है। शब्द सत्य … Continue reading
वैणव जन तो तै न: कहिए…..
पिछले दिनों जब से हमने पोनी को पाला तो लगा इसे सुबह-सुबह घुमा कर लाना चाहिए। हम सुबह घूमने के लिए कम ही जाते थे। सुबह घर पर ही ध्यान नियम से एक घण्टा कर लेते थे। गांव के पास … Continue reading
क्रोध वरदान या अभिशाप
तुम्हारी पूरी जिंदगी एक वर्तुल में घूमता हुआ चाक है। इसलिए हिंदुओं ने जीवन को जीवन चक्र कहा। देखते है, भारत के ध्वज पर जो चक्र बना है, वह बौद्धों का चक्र है। बौद्धों ने जीवन आरा ऊपर आता है। … Continue reading
सत्संग
सत्संग को पूरब में बहुत मूल्य दिया है। पश्चिम की भाषाओं में सत्संग के लिए कोई ठीक-ठीक शब्द नहीं है। क्योंकि सत्संग का कोई मूल्य पश्चिम में समझा नहीं गया। सत्संग का अर्थ इतना ही है। जिसने जान लिया हो, … Continue reading
कुतुब मीनार: एक भटकता इतिहास
पृथ्वी राज चौहान महाभारत काल की बंसा वली में आखरी हिंदू राजा था। मोहम्मद गोरी ने छल से उसे सन् 1192 ई में उसे हराया। उसे से पहले वहीं मोहम्मद गोरी 16 बार हारा। उसे अंधा कर के अपनी राजधानी … Continue reading
यहुदी लोक कथा—(गधे की कब्र)
एक फकीर किसी बंजारे की सेवा से बहुत प्रसन्न हो गया। और उस बंजारे को उसने एक गधा भेंट किया। बंजारा बड़ा प्रसन्न था। गधे के साथ, अब उसे पेदल यात्रा न करनी पड़ती थी। सामान भी अपने कंधे पर … Continue reading
क्या नारी को सौन्दर्य प्रसाधन की जरूरत नहीं?
नारी नारी और पुरूष में शारीरिक संरचना में जो भेद है। वह जितना बहारी है उससे कहीं ज्यादा उसके अंतस की भिन्नता है। नारी को क्या सौन्दर्य की वाक्य में कोई जरूरत नहीं है? क्या उस के पास कुछ ऐसा … Continue reading
आदमी की संवेदन हिनता प्रकृर्ति की सबसे बड़ी दुशमन।
पिछले दिनों कुछ ऐतिहासिक स्मारक देखने गया। तो वहां पर पेड़ो की हालत देख कर रोना आ गया। हम क्या कर रहे है। विश्व स्मारक सूचि में कुतुब मीनार में भी पेड़े को भगवान भरोसे भी छोड़ दिया जाता तो … Continue reading
राज नेता और धर्म गुरु
राज नेता और धर्म गुरूओं का आपसी ताल मेल एक कुट निति है ये दोनों सदियों से उस भ्रम जाल से जनता को छल रहे है। ये बहुत प्रचीन समय ये चालबाजी चली आ रही है। गीदड़ और लोमड़ी वाली, … Continue reading





