Category Archives: आशो सतसंग

धन-शक्‍ति का संचित रूप है—

धन-धन नहीं है। धन एक शक्‍ति का संचित रूप है। एक रूपया आपकी जेब में पडा है तो सिर्फ वह रूपया नहीं है, शक्‍ति संचित पड़ी है। इसका आप तत्‍काल उपयोग कर सकते है। जो आदमी अकड़ कर जा रहा … Continue reading

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अरविंद का आजादी में योगदान—गांधी जी से अधिक

लेकिन भारत की आजादी में अरविंद का जितना हाथ है उतना किसी का भी नहीं है। पर वह चरित्र दिखाई नहीं पड़ सकता। आकस्‍मिक नहीं है कि पंद्रह अगस्‍त को भारत को आजादी मिली; वह अरविंद का जन्‍म दिन है। पर उसे देखना कठिन है। और उसे सिद्ध करना तो बिलकुल असंभव है। क्‍योंकि उसको सिद्ध करने का कोई उपाय नहीं है। जो प्रकट स्‍थूल में नहीं दिखाई पड़ता उसे सूक्ष्‍म में सिद्ध करने का भी कोई उपाय नहीं है। भारत की आजादी में अरविंद को कोई योगदान है। इसे भी लिखने की कोई जरूरत नहीं मालूम होती। कोई लिखता भी नहीं। और जिन्‍होंने काफी शोरगुल और उपद्रव मचाया है, जो जेल गए है, लाठी खाई है, गोली खाई है। जिनके पास ताम्रपत्र है। वे इतिहास के निर्माता है।
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पूर्ण–संतोष—

एक सूफी फकीर के संबंध में मैंने सूना है। उसके मरने के दिन करीब थे। रहता तो एक छोटे झोंपड़े में था। लेकिन एक बड़ा खेत और एक बड़ा बग़ीचा भक्‍तों ने उसके नाम कर रखा था। मरने के कुछ … Continue reading

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गुरु की खोज—

हम बड़े मजेदार लोग है। हम में से अनेक लोग गुरु को खोजते फिरते है। पूछो कहां जा रहे हो, वो कहते है हम गुरु की खोज कर रहे है। आप कैसे गुरु की खोज करिएगा? आपके पास कोई मापदंड, … Continue reading

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महात्‍मा गांधी और हरिदास—

आप क्‍यों सुधारने के लिए इतने दीवाने है। ओर अगर किसी ने नही सुधरना है तो आप कुछ भी नहीं कर सकते हो। इस दुनियां में किसी को जबरदस्‍ती ठीक करने का कोई उपय नही है। जबरदस्‍ती ठीक करने की … Continue reading

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आशु प्रज्ञ–प्रकृति दत्‍त या संकल्‍प जन्‍य—

आशु प्रज्ञ होना प्रकृति दत्‍त आकस्‍मिक घटना नहीं है। साधना जन्‍य परिणाम है। प्रकृति है अचेतन। आपको भूख लगती है, यह प्रकृति-दत्‍त है। आपको प्‍यास लगती है ये प्रकृति दत्‍त है। आप सोते है रात, आप जागते है सुबह ये … Continue reading

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निम्‍न विचार तीव्रता से फैलते है—

आप हैरान होंगे जानकर कि आपको हमेशा अनार्य वचनों में आनंद मिलता है—क्‍यों? क्‍योंकि जब भी कोई अनार्य वचन आप सुनते है क्षुद्र तो पहली तो बात उसे एकदम समझ पाते है। क्‍योंकि वह आपकी भाषा है। दूसरी बात उसे … Continue reading

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जीवन ऊर्जा की नौवीं गति—

अगर गति अधिक हो जाए तो चीजें ठहरी हुई मालूम पड़ती है। अधिक गति के कारण ठहराव के कारण नहीं। जिस कुर्सी पर आप बैठे हे, उसकी गति बहुत है। उसका एक-एक परमाणु उतनी ही गति से दौड़ रहा है … Continue reading

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आदत और स्‍वभाव—

गलत तपस्‍वी सिर्फ आदत बनाता है तप की। ठीक तपस्‍वी स्‍वभाव को खोजता है, आदत नहीं बनाता। हैबिट और नेचर का फर्क समझ लें। हम सब आदतें बनवाते है। हम बच्‍चे को कहते है—क्रोध मत करो, क्रोध की आदत बुरी … Continue reading

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2010 in review

The stats helper monkeys at WordPress.com mulled over how this blog did in 2010, and here’s a high level summary of its overall blog health: The Blog-Health-o-Meter™ reads Wow. Crunchy numbers About 3 million people visit the Taj Mahal every … Continue reading

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शराब और कामवासना—

तो हम तो आपने को एक मादक बिन्‍दु बनाना चाहते है। जिसमें चारों तरफ, जिसके व्‍यक्‍तित्‍व में शराब हो और खींच ले। और महावीर कहते है कि जो दूसरे को खींचने जायेगा, वह पहले ही दूसरों से खिंच चुका है। … Continue reading

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छठी शुभ्र लेश्‍या—

शुभ्र चित की आखरी अवस्‍था है। झीने से झीना पर्दा बचा है, वह भी खो जायेगा। तो सातवीं को महावीर ने नहीं गिनाया; क्‍योंकि सांतवीं फिर चित की अवस्‍था नही, आत्‍मा का स्‍वभाव है। वहां सफेद भी नहीं बचता। उतनी … Continue reading

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पांचवी–पद्म लेश्‍या

व्यक्ति जब पहली दफा धार्मिक होना शुरू होता है, तो बड़ा धार्मिक जोश खरोश होता है। यही लोग उपद्रव का कारण हे जो जाते है, क्‍योंकि उनमें इतना जोश खरोश होता है कि वे फेनेटिक हो जाते है; वे अपने को ठीक मानते है, सबको गलत मानते है। और सबको ठीक करने की चेष्‍टा में लग जाते है….दया वश। लेकिन वह दया भी कठोर हो सकती है।…………ओशो Continue reading

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चौथी लेश्‍या—तेज(लाल) लेश्‍या–

यह जो लाल लेश्‍या है, इसके संबंध में कुछ बातें समझ लेनी चाहिए। क्‍योंकि धर्म की यात्रा पर यह पहला रंग हुआ। आकाशी, अधर्म की यात्रा पर संन्‍यासी रंग था। लाल, धर्म की यात्रा पर पहला रंग हुआ। इसलिए हिन्‍दुओं … Continue reading

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तीसरी लेश्‍या—कापोत लेश्‍या

तीसरी लेश्‍या को महावीर ने ‘’कापोत’’ कहा है—कबूतर के कंठ के रंग की। नीला रंग और भी फीका हो गया। आकाशी रंग हो गया। ऐसा व्‍यक्‍ति खुद को थोड़ी हानि भी पहुंच जाए, तो भी दूसरे को हानि नहीं पहुँचाता। … Continue reading

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दूसरी –नील लेश्‍या–

नील लेश्‍या दूसरी लेश्‍या है। जो व्‍यक्‍ति अपने को भी हानि पहुँचाकर दूसरे को हानि पहुंचने में रस लेता है। वह कृष्‍ण लेश्‍या में डूबा है। जो व्‍यक्‍ति अपने को हानि न पहुँचाए, खुद को हानि पहुंचाने लगे तो रूक … Continue reading

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छ: लेश्‍याएं—ओर मनुष्‍य केचित के प्रकार(भाग-1)

हमारे चेहरे के आस पास सामान्‍यतया काली आभा होती है। और या फिर बीच की आभायें होती है। प्रत्‍येक आभा भीतर की अवस्‍था की खबर देती है। अगर आपके आस पास काली आभा मंडल है, आरा है, तो आपके भीतर भंयकर हिंसा, क्रोध, भंयकर कामवासना होगी। आप उस अवस्‍था में होंगे, जहां आपको खुद भी नुकसान हो तो कोई हर्ज नहीं दूसरे को नुकसान हो तो आपको आनंद मिलेगा।
–ओशो Continue reading

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बुद्धि का स्‍वभाव नकरात्मक—

वस्‍तुत: बुद्धि का स्‍वभाव नकार है। इसे समझ लें,ठीक से। बुद्धि का स्‍वभाव निगेटिव है, नकारात्‍मक हे। जब बुद्धि कहती है नहीं—तभी होती है। ओर जब आप कहते है हां, तब बुद्धि विसर्जित हो जाती है, ह्रदय होता है। जब … Continue reading

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वृक्षों का भी संवेगों और भावनाओं को महसूस करना—

वृक्षों के संवेगों पर, भावनाओं पर। वह बड़ा हैरान करने वालो प्रयोग हुआ। पहले किसी नह सोचा भी नहीं था कि वृक्षों में संवेग हो सकते है। महावीर के बाद जगदीश चंद्र बसु तक बात ही भूल गई थी। फिर … Continue reading

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सम्‍मोहन क्‍या होता है?

सम्‍मोहन क्‍या होता है, क्‍या तुमने कभी किसी सम्मोहन विद को ध्‍यान से देखा है, क्‍या करता है वह? पहले तो वह कहता है ‘’रिलैक्‍स’’ शिथिल हो जाओ। और वह दोहराता है इसे, वह कहता जाता है, रिलैक्‍स, रिलैक्‍स—शिथिल हो … Continue reading

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