(फ्री हिन्दी अंग्रेजी ओशे प्रवचन और ई-बुक)http://www.oshoba.org/
आनंद प्रसाद
ओशो की किरण जीवन में जिस दिन से प्रवेश किया, वहीं से जीवन का शुक्ल पक्ष शुरू हुआ, कितना धन्य भागी हूं ओशो को पा कर उस के लिए शब्द नहीं है मेरे पास.....अभी जीवन में पूर्णिमा का उदय तो नहीं हुआ है। परन्तु क्या दुज का चाँद कम सुदंर होता है। देखे कोई मेरे जीवन में झांक कर। आस्तित्व में सीधा कुछ भी नहीं है...सब वर्तुलाकार है , फिर जीवन उससे भिन्न कैसे हो सकता है।
कुछ अंबर की बात करे,
कुछ धरती का साथ धरे।
कुछ तारों की गूंथे माला,
नित जीवन का एहसास करे।।
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Category Archives: अमृत कण
अतीत का विसर्जन—63
लाओत्से से कोई पूछता कि तुम्हारा सबसे श्रेष्ठतम वचन कौन सा है। तो लाओत्से कहता है, यही। जो अभी-अभी बोल रहा हूं। बान गॉग से कोई पूछता है, तुम्हारी श्रेष्ठतम चित्र कृति कौन सी है, तो वान गॉग पेंट कर … Continue reading
विचार की तरंगें–62
एक हिटलर पैदा होता है, तो पूरी जर्मनी को अपना विचार दे देता है, और पूरे जर्मनी का आदमी समझता है कि ये मेरे विचार है। ये उसके विचार नहीं है, एक बहुत डाइनेमिक आदमी अपने विचारों को विकीर्ण कर … Continue reading
ब्रह्मचर्य– (61)
सेक्स तो संपदा है। उससे लड़ कर उसको नष्ट मत कर लेना। उसे प्रेम से और आहिस्ता से बदलने की कीमिया है। खोजना है उसकी केमिस्ट्री कि वह कैसे बदल जाए। और मैं कहता हूं, उस किमिया के दो सूत्र … Continue reading
देश-द्रोही या मानव द्रोही–60
मैं तो राष्ट्रों में मानता नहीं। अगर मेरी सुनी जाए तो, मैं कहूंगा कि भारत को पहला देश होना चाहिए जो राष्ट्रीयता छोड़ दे। यह अच्छा होगा कि कृष्ण, बुद्ध, महावीर, पतंजलि और गोरख का देश राष्ट्रीयता छोड़ दे और … Continue reading
धर्म नहीं—धार्मिकता –59
धर्म सिद्धांत नहीं है। धर्म फिर क्या है? धर्म ध्यान है, बोध है, बुद्धत्व है। इसलिए मैं धार्मिकता की बात नहीं करता हूं। चूंकि धर्म को सिद्धांत समझा गया है। इस लिए ईसाई पैदा हो गए, हिंदू पैदा हो गए,
भगवान नहीं—भगवत्ता–58
भगवान पर जोर नहीं देता हूं, भगवता पर जोर देता हूं। भग वत्ता का अर्थ हुआ, नहीं कोई पूजा करनी है, नहीं कोई प्रार्थना, नहीं किन्हीं मंदिरों में घड़ियाल बजाने है,
ध्यान है अंतर्यात्रा–( 57 )
और जिसकी अंतर् याता सफल है, उसकी बहिर्यात्रा भी सफल हो जाती है। क्योंकि फिर वे ही आंखे, भीतर के रस को लेकर बाहर देखती है। वो उस पाम रस का अनुभव होने लगता है। जिस दिन तुम्हें अपनी पत्नी … Continue reading
पृथ्वी पर क्रांति–(56)
पृथ्वी के दूर-दूर देशों से आए हुए ये लोग, आने वाली पूरी पृथ्वी पर क्रांति के पहले प्रतीक है। यह छोटी घटना नही है, बीज तो छोटा ही होता है। जब वृक्ष बनेगा और बादलों को छुएगा, तब तुम पहचान … Continue reading
सत्य के मार्ग पर–55
ध्यान रहे—असत्य के मार्ग पर, सफलता मिल जाए तो व्यर्थ है, असफलता भी मिले तो सार्थक है। सवाल मंजिल का नहीं, सवाल कहीं पहुंचने का नहीं, कुछ पाने का नही—
देह का सम्मान करो–(54)
मैं चाहता हूं कि तुम इस सत्य को ठीक-ठीक अपने अंतस्तल की गहराई में उतार लो। देह का सम्मान करे, अपमान न करना। देह को गर्हित न कहना: निंदा न करना। देह तुम्हारा मंदिर है।
सत्य का अवतरण–(53)
सत्य जब भी अवतरित होता है, तब व्यक्ति के प्राणों पर अवतरित होता है। सत्य भीड़ के ऊपर अवतरित नहीं होता। सत्य को पकड़ने के लिए व्यक्ति का प्राण ही बीणा बनता है। वही से झंकृत होता है सत्य। भीड़ … Continue reading
परंपरा और धर्म–52
धर्म विद्रोह है। धर्म का और कोई रूप होता ही नहीं। धम्र कभी परंपरा बनता ही नहीं, जो बन जाता है, परंपरा वह धर्म है ही नहीं। परंपरा तो ऐसे है जैसे आदमी गुजर गया, उसके जूते के चिन्ह रेत … Continue reading
बच्चे और ध्यान–51
अगर मां बाप इतना ही कहे जितना वो जानते है, बच्चे को मुक्त रखे, उसकी सरल श्रद्धा नष्ट न करे। तो ये सार दुनियां धार्मिक हो सकती है, ये दुनिया अधार्मिक नास्तिकों के कारण नहीं है। तुम्हारे थोथे आस्तिकों के … Continue reading
बच्चे और अनाचार–50
मनुष्य-जाती ने बच्चों पर जितना अनाचार किया है किसी और पर नहीं। जब सारी दुनिया में सब अनाचार मिट जाएंगे, जब अंतिम अनाचार जो मिटेगा, वह होगा मां-बाप के द्वारा किया गया बच्चों के प्रति अनाचार होगा। वह अनाचार दिखाई … Continue reading
स्वास्थ्य और रोग—49
स्वास्थ्य शब्द का अर्थ समझ लो तो रोग का अर्थ समझ में आ जाएगा। स्वस्थ का अर्थ होता है, स्वयं में स्थित हो जाना। यह शब्द बड़ा प्यारा है। स्वस्थ का अर्थ होता है, स्वयं में ठहर जाना। जो चीज … Continue reading
आकाश में पंख फैलाना–48
मैं तुम्हारा सम्मान करता हूं, क्योंकि मुझे लगता है— तुम्हारी निंदा तुम्हारे भीतर बैठे परमात्मा की निंदा है। मैं तुमसे यह नहीं कहता हूँ तुम असाधारण हो जाना है। मैं तुमसे कहता हूं, तुम साधारण हो जाओ, तो सब मिल … Continue reading
साधारण होने में तृप्त–47
मैं तुम्हारा सम्मान करता हूं, क्योंकि मुझे लगता है— तुम्हारी निंदा तुम्हारे भीतर बैठे परमात्मा की निंदा है। मैं तुमसे यह नहीं कहता हूँ तुम असाधारण हो जाना है। मैं तुमसे कहता हूं, तुम साधारण हो जाओ, तो सब मिल … Continue reading
नमस्कार का अदभुत ढंग— 46
दुनिया मैं वैसा कहीं भी नहीं है। इसे देश ने कुछ दान दिया है मनुष्य की चेतना को, अपूर्व। यह देश अकेला है जब दो व्यक्ति नमस्कार करते है, तो दो काम करते है। एक तो दोनों हाथ जोड़ते है। … Continue reading
रामेश्वरम और गंगा जल—(43)
हिंदुओं न बड़ा अद्भुत काम किया है। पृथ्वी पर किसी जाति ने ऐसा अद्भुत काम नहीं किया। बाहर तो प्रतीक है और प्रतीकों में जब हम भटक गये तो हिंदुओं की सारी जीवन-चेतना खो गई।
संक्रांति की घड़ी—42
आज जितनी शुभ घड़ी है इतनी कभी न थी, क्योंकि सामूहिक नींद टूट गर्इ है, अब सिर्फ व्यक्तिगत नींद तोड़ने का सवाल है। पहले तो व्यक्तिगत नींद तो थी ही। सामूहिक नींद भी थी। अब कम से कम सामूहिक नींद … Continue reading





