Category Archives: मेरी नई कविता..

आओ साजन—गदराया फागुन ( कविता)

आओ साजन—गदराया फागुन  फिसलन मन की अकड़न तन की। बनगया पतझड़ सारा जीवन। नहीं सूलझती सुलझी उलझन प्रेम प्रीत का ये कैसा बंधन। आओ साजन गदराया फागून। याद तुम्‍हारी बनी सिसकि की ह्रदय मैं उठती—एक सिहरन।

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कितना भागे जग से आगे (कविता)

कितना भागे जग से आगे। टूटे पल—छल जीवन धागे। किसको पकड़े किसको छोड़े। कदम—कदम पर आग बीछी है। राह—राह में शूल सजी है। पथ है नीरव, न दिखता आगे। लाशों का अंबार लगा है। पल पल मरना, पल—पल जलना। किसे … Continue reading

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एक प्रेम प्रीत की पाती जो……कविता

बहता जीवन पल-पल उत्‍सव कल-कल बहता झरना बन जा कुछ मधुर राग किन्‍हीं छंदों में कानों में आकर कुछ कह जा देखो मेरे तुम उत्‍सव को नित खेल खेलता अटखेली वह नहीं पकड़ता दीवारे बह नहीं बाँधता बंधन हार नित … Continue reading

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तुम हो एक अंधकार

कुछ दीवारें दे रही थी एक रूप और आकर का भ्रम मुझे गिरा दिया मैंने उसे एक रात के अंधेरे में थी एक पकड़ वह भी मेरे होने की जो चिपक गई थी किसी कोने में अंहकार बन कर की … Continue reading

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न और न छौर—(कविता)

न कोई है और मेरा, न कोई है छोर तेरा। केवल एक गति भर है, जो एक सम्‍मोहन बन कर छाई है। हर और जहां-तहां, चर-अचर, उस बिंदू के छोर तक। बन कर एक उदासी जो आभा की तरह चमकती … Continue reading

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एक काली अमावस—लादेन (कविता)

काल बन कर निगल गई उस काली परछाई को हो गई जो समय के गर्त में दफ़न जो समझता था अपने को काल का पर्यायवाची कलंक-कलुषित जीवन मिटा दिया उस काल ने फिर एक बार कि शायद ले सके कोई … Continue reading

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उजाला—कविता

कब तक खड़ा रहेगा ये उजाला मेरे द्वारा पर और करता रहेगा यूं तन्‍हा मेरा इंतजार… पर मैं हूं कि आंखें बंद किये उलझा हूं किन्‍हीं अंधेरी गलियों में और ढूंढ रहा हूं, उन आस्‍था और विश्‍वासों में कुछ वादे … Continue reading

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मत पूछो बहते जीवन का–कविता

मत पूछो बहते जीवन का, उन्‍माद रहेगा कब तक। आती जाती इन सांसों का, साथ चलेगा कब तक।। बहने दो दिल के तारों से, झंकार छुपे उन रागों को। मत पूछो सुने ह्रदय में, आलाप उठेगा कब तक।।

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दूज का चाँद— ( कविता )

बैठा है दूज का चाँद आसमान पर सुबह-सुबह घुटने मोड कर एक छुई मुई प्रेमिका की तरह शायद वो कर रह है इंतजार किसी पूर्णिमा के आने का परन्‍तु वो कितना पूर्ण लगता है

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टूट गया तू अपनी साख से—(कविता)

तू बना है क्‍यों आजान, तू बिछुड़ गया अपनी धूरी से टूट गया तू अपनी साख से कैसा कलरव था वो जीवन जो जाना था तुने राग से भूल गया इस मशीनी यूग में तू भी इसके जैसा हो गया … Continue reading

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सूखा पत्‍ता – (कविता)

सुखा पत्‍ता नहीं झुका न ही मुड़ा और झूमा आने पर पवन के झोंके से आकर उसने उसे छुआ चूमा और गुद-गुदाया पर वह अकड़ कर मोड़े रहा उससे मुख को और चिपका रहा डाल से

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भ्रम-चाप (कविता)

एक निर्जन-वीरान, अंत हीन सुना पथ, जब मैं तुझ पर चलता हूं सुनाई देते है पदचाप पीछे से जैसे कर रहा है मेरा पीछा कोई

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कौन अँधेरा तुम्‍हें जगाता—कविता (83)

कौन अँधेरा तुम्‍हें जगता। कौन पपीहा तुम्‍हें बुलाता।। किन छंदो में तुम्‍हें बाँधता। किन सप्‍तक में राग बजाता।। कहींदूर तो है कोई पूर्ण। निति-निति मुझको जो है लुभाता

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जब बरसता है तुम्‍हारा माधुर्य—(कविता)

जब बरसता है माधुर्य तुम्‍हारा छलक़ता है भर-भर प्‍याला मेरा तब झूम उठता है उपवन का पौर-पौर गाने लगते है कंठ-कोकिला के पर होती है उनमें तेरी ही—स्‍वर लहरी?

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लूटने की आस है—(कविता)

टुकड़ा कोई यूं टूट कर, कुछ दूर रह गया। मुझसे मेरे ऐ दोस्‍त तू रूठ क्‍यों गया। कहने लगा इक घर चाहिए उसकी तलाश है। जीते रहे यूं संग तेरे, जैसे की लाश है।।

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पीपल तू अब नहीं बचेगा?–(कविता)

देखना पीपल अब तू नहीं बचेगा? सुकोमल सा था तब किया तूने, तपती दुपहरी का किस साहस से सामना, रिम-झिम बरसतें सावन में गर्दन तक डूब कर भी तू नहीं डरा। जिस दिन वो दीवार बन रही थी,

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नेता कि अमृत वाणी—कविता

हरा सके जब चुनाव में, विजय तभी तू जान। भूखे रहकर चार दिन, क्‍या मार लिया मैदान।। नेता की फुफकार से जल रही थी घास। झूठ तोहमत लगाये कर रहा बकवास।

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हे अवतारे—अन्‍ना हज़ारे—कविता

हे अवतारे, अन्‍ना हज़ारे। जग से न्‍यारे, हो तुम प्‍यारे। आकर हमें जगा….रे।।

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जीवित –मधुशाला

प्रियतम तेरे सपनों की, मधुशाला मैंने देखी है। होश बढ़ता इक-इक प्‍याला, ऐसी हाला देखी है।। मदिरालय जाने बालों नें, भ्रम न जाने क्‍यों पाला। हम तो पहुंच गए मंजिल पे, पीछे रह गई मधुशाला।।

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हठीला केकटस—कविता

कल जब मैंने पूछा उस हठीले गर्बीले और ज़हरीले केकटस से तुम कैसे करते हो निर्णय फूल और कांटों के बनाने में कैसे कर पाता है संतुलन तुम्‍हारा दोनों में

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कली का अंहकार–कविता

कविता–2 एक नन्ही सी कली, सुबह जब खिलने चली। अनन्त था फूलों का विस्तार, चमन में छाई थी बहार। रंग ही रंग थे हजार, करने लगी सोच-विचार। कौन देखेंगे मुझे, मैं हूं अंजान कली।।

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बे बुझ पहेली–(कविता )

कविता–3 शाश्‍वत के इस बेबुझ भँवर में, जो उतर गया वो परा हआ। कैसी उलझी लगे ये पहेल जो पकडना चाहा वो छूट गया। मिटने वाला मिट-मिट कर,

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