Category Archives: बचपन की सुनहरी यादे

स्‍वणिम बचपन–(सत्र—50)

निकलंक– दीवाना है यह अच्‍छा है कि मैं देख नहीं सकता…..पर मुझे पता है कि क्‍या हो रहा है। पर मैं क्‍या कर सकता हूं—तुम्‍हें तुम्‍हारी टेकनालॉजी के हिसाब से चलना होगा। और मेरे जैसे आदमी के साथ स्‍वभावत: तूम … Continue reading

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स्‍वर्णिम बचपन– {सत्र—49 }

नीम का पेड़ और भूत अच्‍छा, मैं उस आदमी को याद करने की कोशिश कर रहा था। मुझे उसका चेहरा तो दिखाई दे रहा है। किंतु शायद मैंने उसका नाम जानने की कभी कोशिश नहीं की। इसलिए मुझे वह याद … Continue reading

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स्‍वर्णिम बचपन–(सत्र—48)

महर्षि महेश योगी यों सबसे अधिक चालाक मैं तुम लोगों को यह बता रहा था कि मैं स्‍कूल नियमित रूप से हाजिरी लगाने नहीं जाता था। मैं तो वहां कभी-कभी जाता था। और वह भी उस समय जब मुझे कोई … Continue reading

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स्‍वर्णिम बचपन–(सत्र–47)

स्‍कूल का हाथी फाटक और शरारत मैं अपने प्राइमरी स्‍कूल की बात कर रहा था। मैं वहां कभी-कभार ही जाता था। मेरे न जाने से स्‍कूल के सब लोगों को बडी राहत मिलती थी और मैं भी उन्‍हें तकलीफ देना … Continue reading

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स्‍वर्णिम बचपन–(सत्र-46)

सत्‍य साईं बाबा तो अति साधारण जादूगर ठीक है। मैं प्राइमरी स्‍कूल के दूसरे दिन से शुरूआत करता हूं। कितनी देर वह घटना इंतजार कर सकती है। पहले ही बहुत इंतजार कर चुकी है। सच मैं स्‍कूल में मेरा प्रवेश … Continue reading

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स्‍वर्णिम बचपन–45

महात्‍मा गांधी से भेट ओ.के.। सारी दुनिया स्‍तब्‍ध रह गई जब जवाहर लाल नेहरू रेडियो पर महात्‍मा गांधी की मृत्‍यु की सूचना देते समय एकाएक रो पेड। यह तैयार किया गया भाषण नहीं था। वे अपने ह्रदय से बोल रहे … Continue reading

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मस्‍तो की भविष्‍य वाणी—मोरार जी देसाई प्रधानमंत्री बनेगा–44

कल मुझे अचरज हो रहा था कि परमात्‍मा ने इस दुनियां को छह दिनों में कैसे बना लिया। मुझे अचरज इस लिए हो रहा था, क्‍योंकि मैं तो अभी प्राइमरी स्‍कूल के दूसरे दिन पर ही अटका हुआ हूं, दूसरे … Continue reading

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मृत्‍यु के बाद भी मैं उपल्‍बध रहुंगा

ओके.। मुझे हमेशा इत बात पर आश्‍चर्य हुआ है कि परमात्‍मा ने इस दुनिया को छह दिनों में कैसे बना दिया। ऐसी दुनिया, शायद इसीलिए अपने बेटे को जीसस कहा। अपने ही बेटे के लिए ये कैसा नाम चुना? उसने … Continue reading

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जवाहरलाल नेहरू बोधिसत्‍व थे –42

ओके. । मैं क्‍या बता रहा था तुम्‍हें? आप बता रहे थे कि सत्य भक्त और मोरार जी देसाई किसी प्रकार आपके दुश्‍मन बन गए। वे और अंत में आपने यह कहा था कि मोरार जी देसाई कह आंखों से … Continue reading

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स्‍वर्णिम बचपन–(चौबीस तीर्थकर एक भेड़ परम्‍परा-41)

ओ के. । मैं जो तुम्‍हें बताना चाहता था उसे बताना शुरू भी न कर सका। शायद ऐसा नहीं ही होना था क्‍योंकि कई बार मैंने उसकी चर्चा करने की कोशिश कि किंतु कर नहीं सका। परंतु यह मानना पड़ेगा … Continue reading

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मैं ‘कल्‍कि’ अवतार नहीं हूं–40

मैं खड़ा हूं—अजीब बात है, इस समय तो मैं आराम कर रहा हूं—मेरा मतलब है अपनी स्मृति में मैं मस्‍तो कि साथ खड़ा हूं। निश्‍चित ही तो ऐसा कोई और नहीं है जिसके साथ मैं खड़ा हो सकता हूं। मस्‍तो … Continue reading

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पंडित जवाहरलाल नेहरू से भेट–39

देव गीत, मुझे लगता है तुम किसी बात से परेशान हो रहे हो। ।तुम्‍हें परेशान नहीं होना चाहिए, ठीक है? ठीक है। ….नहीं तो नोट कौन लिखेगी, अब लिखने वाले को तो कम से कम लिखने वाला ही चाहिए। अच्‍छा। … Continue reading

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मोज़ेज और जीसस—पहलगाम (कश्‍मीर)में मरे –सत्र–38

ओ. के.। मैं तुम्‍हें एक सीधा-सादा सरल सा सत्‍य बताना चाहता था। शायद सरल होने के कारण ही वह भुला दिया गया है। और कोई भी धर्म उसका अभ्‍यास नहीं कर सकता। क्‍योंकि जैसे ही तुम किसी धर्म के अंग … Continue reading

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( बे घर का मुसाफिर )–सत्र—37

ओ. के. । हम लोग अभी मेरे प्राइमरी स्‍कूल के दूसरे दिन पर ही है। बस, ऐसा ही होगा, हर रोज नई-नई बातें खुलती जाएंगी। अभी तक मैंने दूसरे दिन का वर्णन समाप्‍त नहीं किया आज में उसे समाप्‍त करने … Continue reading

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मैं और मस्‍तो–सत्र—36

अभी-अभी मैं एक कहानी के बारे में सोच रहा था। मुझे नहीं मालूम कि इस कहानी को किसने रचा और क्‍यों? और मैं उसके निष्‍कर्ष से भी सहमत नहीं हूं फिर भी यह कहानी मुझे बहुत प्रिय है। कहानी बहुत … Continue reading

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अल्‍लाउद्दीन खां और पं रविशंकर–सत्र—35

ओ. के.। मैं रविशंकर को सितार बजाते हुए सुना है। हम जो सोच सकें, वे सब गुण उनमें है। उनका व्‍यक्‍तित्‍व गायक का है। अपने वाद्ययंत्र पर उनका पूर्ण अधिकार है। और उनमें नवीनता उत्‍पन्‍न करने की योग्‍यता है। जो … Continue reading

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प्रोफेसर एस. एस. राय–(सत्र-34)

आज सुबह मैंने मस्‍तो से एकाएक विदा ली और दिन भर मुझे यह बात खटकती रही। कम से कम इस मामले में तो ऐसा नहीं किया जा सकता इससे मुझे उस समय की याद आ गई जब मैं कई बरसों … Continue reading

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सत्र–33 (मस्‍तो का सितार बजाना—नानी का नवयौवना होना)

ओ.के.। अभी उस दिन मैं तुम लोगों को मस्‍तो के गायब हो जाने के बारे में बता रहा था। मुझे लगता है कि वह अभी भी जीवित है। सच तो यह है कि मैं जानता हूं कि वह जीवित है। … Continue reading

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स्‍वर्णिम बचपन—( 32 )

( भगवान )—मस्‍तो बाबा का उद्घोष मुझे सदा यह हैरानी होती है कि आरंभ से ही मेरे साथ कुछ ठीक हुआ है। किसी भी भाषा में ऐसा कोई मुहावरा नहीं है। कुछ गलत हो गया, जैसा मुहावरा तो पाया गया … Continue reading

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स्‍वर्णिम बचपन—31 ( श्रद्धांजलि )‍

मस्‍तो बाबा से मिलन पागल बाबा अपने अंतिम दिनों में हमेशा कुछ चिंतित रहते थे। मैं यह देख सकता था, हालांकि उन्‍होंने कुछ कहा नहीं था, न ही किसी और ने इसका उल्‍लेख किया था। शायद किसी और को इसका … Continue reading

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