सेक्‍स और तंत्र—I

(मेरी सेक्‍स के पार की यात्रा)

जीवन में जो भी हम आज पाते है, वो कल बीज रूप में हमारा ही बोया हुआ होता है। पर समय के अंतराल के कारण हम दोनों में तारतम्यता नहीं जोड़ पाते और कहते है। ये क्‍या हो गया, उसमें कुछ अच्छा हो या बुरा। ये भेद हमारे उस बोए हुए बीज में है। बात उन दिनों की जब मैंने आठवीं कक्षा के पेपर दिये थे। हमारे जमाने में पांचवी-आठवीं और ग्यारहवां के बोर्ड के पेपर होते थे। पेपरों के तनाव को कम करने के लिए में उन दिनों प्रेम चन्‍द और रविन्‍द्र नाथ को पढ़ रहा था। इसी बीच मेरे हाथ में महात्‍मा गांधी की आत्‍म कथा आ गई। पढ़ कर चमत्‍कृत हो गया। इतना नामचीनी व्‍यक्‍ति, किस सरलता और सहजता है। अपनी अच्छाईयों और अपनी कमज़ोरियों को ग्रहण कर रहा है। उसे अपने नाम यश की भी जरा परवाह नहीं है। सेक्‍स संबंध में उनके प्रयोग मेरे मन पर एक छाप छोड़ गये। काश मैं ये सब कर सकता। पर कहां प्रकृति हर मनुष्‍य को मोका देती है। पर एक कामना मेरे मन में दब गई। बीज रूप में जो बाद में जाकर वृक्ष बना।

जब मैंने ध्‍यान शुरू किया तो मैं पूरी ताकत झोंक कर उसमे डूब जाता था। ध्‍यान के कई प्रयोगों में से एक प्रयोग हम ‘’नाद ब्रह्मा’’ ध्‍यान का करते थे। ये ध्‍यान ओशो ने खास जोड़े के लिए बनाया था। आप चाहे तो इसे एकल में या युगल में भी कर सकते है। युगल में यह साधारण सा दिखने वाला ध्‍यान तंत्र प्रयोग है। मैं और अदवीता(मेरी पत्‍नी) रात को इस ध्‍यान प्रयोग को करने लगें। रात कि शांति, एकांत और उसके साथ अंधकार। क्‍योंकि इस ध्‍यान प्रयोग के बाद आपको नींद जरूर आती है। इस लिए इसे रात को करों तो बेहतर होगा। हम दोनों पति-पत्‍नी निर्वस्त्र हो कर एक महीन चददर को ओढ़ कर ये ध्‍यान प्रयोग करते। कुछ ही दिनों में ये ध्‍यान अपना चमत्‍कार दिखाने लगा। वैसे भी हम पति पत्‍नी सेक्‍स नहीं करते थे। पर इतने पास घंटो निर्वस्त्र रहने के बाद भी हमारे पर सेक्‍स न चढ़ता था। हमें अच्‍छा भी बहुत लगाता लगता हम कहीं चल रहे हे। मील के पत्‍थर हम बता रहे है। की हमारा सफर जारी है। कुछ पीछे छुट रहा है। पर कहीं ऐसा भी लगता की ये हमारे मन की तो चाल बाजी नहीं है। वैसे भी हम पति-पत्‍नी ने 32साल (9,000) दिन के वैवाहिक जीवन में मुश्‍किल से 500-550 बार भी शारीरिक संबंध नहीं किया होगा। संन्‍यास के 15 वर्ष में तो अब जरूरत ही नहीं पड़ती। ये कोई दबाव नहीं था। पर जरूरत ही नहीं हो रही तो आप कुछ भी नही कर सकते। अदवीता बताती थी, जब हम मिले थे कि मेरी आंखों से सेक्‍स की उर्जा ऐसे बहती थी जैसे जलती चिंगारियां। चटाक-चटाक, शायद वह ठीक ही कहती हो। मेरे अंदर सेक्‍स का तूफान बहुत तेज था। पर मैं अपने पर कंट्रोल बहुत करता था। एक दम चरित्र का पक्‍का। या मुझे होश था एक अनजाने तोर पर। मुझे अपने पर बहुत भरोसा था। क्‍योंकि मेरा बचपन कुछ इस तरह से गुजरा। जो करोड़ो में किसी एक भाग्‍य शाली का गुजरता होगा। गली मोहले की जितनी लड़कियां थी वह मुझे बहुत पसंद करती थी। ओर में बचपन में लड़को की बजाए लडकियों के संग बहुत खोला हूं। वो घर-घर खोलना हो, गली मौहल्‍ले में कोई कुतियां बच्‍च्‍े दे देती तब हम घर-घर जाकर आटा, गुड़ ओर घी इक्‍कठा करते ओर उसके लिये हलवा बना कर उसे कुतियां को खिलाते ओर खुद भी खाते। ओर न जाने कितने खेल चिलझप्‍पटा, काईडंका…….एक सहजता मुझे में बस गई थी। एक आकर्षण भी था। पर उसमें कहीं सेक्‍स नही था। और आज तो मैं उस पहाड़ी पर चढ़ के उतंग आसमान में उड़ सकता हूं। मैंने सेक्‍स के पास के पंख देख लिये हे। जान गया हूं उस उड़ान को।

इसी बीच कुछ ऐसा हुआ, बहुत औरतें और लड़कियां, पुरूष इस ध्‍यान प्रयोग में हमारे साथ आये। जो 60 से 16 साल तक के थे। और खास कर महिला ज्‍यादा आई। दूकान क्‍या कहीं भी में जाता एक चुम्बकीय छेत्र मेरे चारों और बन गया था। इसका कारण आज मुझे महसुस होता है। क्‍योंकि आज उस तरह का खिचाव लड़कियों या औरतों का मैं महसुस नहीं करता। क्‍योंकि मेरी अंदरूणी इच्‍छा ओर रस कारण था। जो अब गहराई में जाने से कम होता जा रहा है। खेर.. स्त्रियां मेरी और बहुत तीव्र गति से अकृषित हो रही थी। इस सबसे बचने के लिए मैंने अपनी दाढ़ी बढा ली। एक सुरक्षा कवच की तरह। एक तो मेरा शरीर और रूप रंग पहले ही बहुत आकर्षक था दुसर ध्‍यान की शांति। तब मेंने जाना ध्‍यान आदमी को कितना सौन्दर्य दे जाता है। एक दिन मजाक में जो नाते में हमारी भाभी लगती थी। उम्र में हालाकि मुझसे वह 15साल बड़ी होगी। कहने लगी एक तू ही इस गांव में देखने लायक छोरा था। तूने भी ये दाढ़ी रख ली भला अब हम किसे देखे।ये सब सुन कर मुझे गर्व भी हुआ ओर अपने आप पर नाज भी। एक दिन दुकान पर एक साठ साल की महिला ने मुझसे कहां की मैं तुमसे प्‍यार करती हूं। मैंने उसका मुख देखा, उसका लड़का भी मुझसे तीन-चार साल बड़ा होगा। उस समय मेरी आयु शायद 32-33 वर्ष की रही होगी। उसकी इस बात को सून कर मैं हंसा और मैंने कहां जैसी तुम्‍हारी मर्जी। फिर भी वह बार-बार यही बात दोहराती रही। मैंने कहा तो फिर तुम एक दिन हमारे घर आ जगाओं हम दोनों एक कमरे में नग्‍न होगें तुमने जो करना हो वह कर के देख लेना तब पता चलेगा किस्में है इतनी शक्ति। कोन हारता या कौन जीतता है। आप को सब कुछ करने की आजादी होगी। बात भी सही थी मुझे अपने पर बहुत विश्‍वास था। ओर शायद इस बात को एक औरत बहुत ही अच्‍छे से जानती है। खास कर आपकी मां। मेरी मां इतने गर्व के साथ कह देती थी कि मेरे बेटे को तुम ”बो भी दोगे तो वह जमेगा नही।” ओर सही मायने मे मां के इन शब्‍दों की मैने जीवन भर लाज खरी है;…अभी तक आगे राम जाने। वह औरत तो मुझसे इतना डर गई उस दिन के बाद मेरी तरफ मूड कर भी नहीं देखा। बहुत घबरा गई। शायद मैंने कुछ अधिक ही खतरनाक बात कह दी। कोई भी अपनी हार नहीं चाहता। भगवान ने हर आदमी के कान मे एक बात कही है। शायद तु ही दुनिया में अनमोल है।

इस ध्‍यान के तीन चरण है, पहले चरण में युगल एक दूसरे का हाथ पकड़ कर आमने सामने बैठ जाते है। और होठ बंद कर भौंरे की गुजार की तरह ध्वनि गुंजार करनी होती है। दूसरे ओर तीसरे चरण में स्‍त्री और पुरूष एक दूसरे में बहते है। एक अपने को छोड़ देता तो दूसरा अपनी उर्जा को उसके मनस शरीर में प्रवेश करने के लिए भेजता है। और दूसरा अपने को जितना मिटा सकता है या खुला छोड़ सकता है। उतना ही एक दूसरे में विलय हो जाता है। तब वहां दो नहीं एक रहते एक हो जाते है। पर यहां इस प्रयोग में हम लोग निर्वस्त्र नहीं होते थे। एक सीमा एक मर्यादा के तोर पर। पति-पत्‍नी की और बात थी। फिर भी ये ध्‍यान बहुत प्रभाव सिद्ध हो रहा था। क्‍योंकि इस का पहला चरण…जब सामने बेठी हुई स्‍त्री अपने आप को छोटती है ओर आपमें बहने लगती है। तब उसके मनस शरीर की उर्जा आपके मनस शरीर में एक गहरा वर्तुल बनाती है। मेरे देखे अगर पति-पत्‍नी में अन बन भी अधिक हो रही हो या आपस में मन मुटाव अधिक हो रहा हो ओर वो दोनों एक सप्‍ताह इस ध्‍यान को कर ले तो वो दोनों एक दुसरे को बहत प्रेम करने लगे जायेगे।

अगर आप इस प्रयोग को लगातार करते रहे किसी एक जोड़े के साथ। तो यह इतना प्रभावी भी हो सकता है कि समय और दूरी भी मिट सकती हे। पर एक ही शर्त है आप जितने पाक साफ होगें उस स्‍त्री के प्रति उतना ही चुंबकीय आकरशण अधिक होगा। अगर आप ने शरीर संबंध बना लिया तो फिर आप शरीर पर ही अटक कर रह जायेगे। मैने इस प्रयोग की गहराई तक जाकर देखा हे। मैं अपनी पत्‍नी के उतना गहरे नहीं जा पाया। जितना एक अंजान और के संग चला गया। क्‍योंकि उसके साथ मेरा शारीरिक संबंध नहीं हुआ।

मेरा भाग्य मुझे उन पचास साठ ध्‍यान करने वाले मित्रों में एक ऐसी मिल गई जिसने मुझे सेक्‍स के पार कर दिया। शयद किसी जन्‍म का कर्ज होगा…या हमारा छूटा हुआ अधुरा तंत्र वरना ये एक असम्‍भव बात है। आप इस प्रयोग के लिए साथ कहा से ला सकते हो। वश्‍या एक व्‍यपारी है। वह आपको शरीर दे सकती हे। लेकिन सर्मपण तो प्रेम ओर श्रृधा मांगता है। वो तो हम पैसे से नहीं खरीद सकते। वो दोनों पति-पत्‍नी थे। शादी से पहले उसका पति मेरे पास ध्‍यान करने के लिए आता था। शादी के बाद पत्‍नी ओशो विरोधी थी। शायद न तो उसने कभी ओशो को पढ़ा था और न ही सुना था। पर ज्‍यादातर ऐसे ही लोग है जो हवा में फैली हुई अफवाह से ही अपना एक कवच बना लेते है। और अपने मन को समझा लेते है कि ये आदमी बहुत ही खतरनाक है। मेरे देखे एक भी आदमी या औरत मुझे जीवन में ऐसा नहीं मिली जो ओशो को पढ़ा हो खुले दिमाग से उन्‍हें समझा हो। और वह ओशो विरोधी भी है। सब विरोधी सुनी सुनाई अफ़वाहों पर अटक जाते है। स्‍वामी देव गगन और उनकी पत्‍नी ध्‍यान निर्वाह ये उनके संन्‍यास के नाम लिख रहा हूं। एक दिन वे दोनों पति-पत्‍नी हम लोगों से मिलने के लिए आये। शायद आज कल के दिनों की ही तरह उन दिनों भी नव रात्रि के उपवास चल रहे थे। और दिन था। 20 मार्च, तब उन्होंने मुझे बताया कि उनकी पत्‍नी तो यहां आना ही नहीं चाहती थी। मैं हंसा। मुझे हंसता देख कर वह कुछ बेचन हुए। पर अपनी बेचैनी छुपते हुए कहने लगे आप शायद मेरी बेबसी को समझ नहीं रहे।

मैंने कहां में समझता हूं, जब तुम आ गये हो तब समझो खत्‍म हो गई तुम्‍हारी मजबूरी और बेबसी। उन्‍होंने कहां ये तो चमत्‍कार ही और जायेगा अगर मेरी पत्‍नी ध्‍यान करने लग जाये। मेरा जीवन स्‍वर्ग हो जायेगा। उन्‍हें इस बात का यकीन नहीं ही नहीं आ रहा था। सब औरतों की तरह वह भी नव रात्रि के उपवास रखे हुऐ थी। हमारी पत्‍नी अदवीता ने सब उपवास, पूजा, पाठ, चूड़ी पहना, मांग में सिंदूर भरना उसी दिन बंध कर दिया था। जिस दिन उन्‍हें ध्‍यान का रस मिल गया था। हमारी पत्‍नी का उपवास न करना। हाथ में चूड़ी न पहनना। मांग में सिंदूर न भरना। देख कर उनकी पत्‍नी की पैरो के नीचे की जमीन खिसक गई। उसे यकीन ही नहीं आ रहा था कि कोई औरत ऐसा भी कर सकती है। पर हम पति पत्‍नी का प्रेम देख कर वह दंग रह गई। फिर वह घड़ी आई हम ध्‍यान करने के लिए तैयार होने लगे। वह कुछ घबरा रही थी कुछ बेचैनी भी उसके चेहरे पर साफ़ दिखाई दे रही थी। उनको मैने ध्‍यान की विधि के बारे में समझा दिया। हम चारो ध्‍यान करने लगे। उनकी पत्‍नी मेरे साथ बैठ ध्‍यान करने के लिए तैयार हो गई। ध्‍यान के बाद उसे कुछ ऐसा आनंद मिला की वह बहुत देर तक सोती रही। उठने के बाद उसे लगा किसी और ही लोक से आई हूं। उसने कहां की मैने बचपन से बहुत पूजापाठ, व्रत उपवास किया मंदिर गई….सब किया। पर आज कहीं अंदर तक शीतलता उतर गई। मैंने ऐसा आनंद कभी महसूस नहीं किया। लगा कुछ कंठ से उतरा। और प्‍यास बुझा गया। पर मनुष्‍य का मन चलायमान है। उसका पति बहुत खुश था। उसकी पत्‍नी ने हिम्‍मत की और अपनी मर्जी से उपवास भी तोड़ कर खाना खा लिया। बस फिर क्‍या था। अगले दिन 21मार्च था। उस दिन ओशो जी को ब्रह्म ज्ञान प्राप्‍त हुआ था। इस लिए हम उसे एक उत्‍सव के रूप में मनाते है।

स्‍वामी देव गगन ने विचार किया की कल उत्‍सव का दिन है। सौ आज की रात यहीं क्‍यों न रूक जाये। और यहीं से ‘’ओशो धाम’’ हमारे संग चलेंगें। उन्‍होंने मुझे कहां आप लोगों के संग हमारा भी जाना हो जायेगे। नहीं तो वहां जाकर हम टुट जायेंगे। ऐसा मोका फिर नहीं मिलेगा। सौ अगले दिन काम से उन्होंने छुट्टी ले ली। और हमारे साथ ‘’ओशेधाम’’ पूरा दिन ध्‍यान में डूबे के लिए चल दिये। शायद उनकी पत्‍नी को और रंग चढ़ जाये। उसका चेहरा देखते ही बनता था, उसकी चाल उसकी वाणी में मीठा एक छलछलाहट बरस रही थी। उसकी आंखों में एक ख़ुमारी थी, एक मस्ती आ गई थी उसके तन मन पर मादकता ने अपना प्रभुत्‍व कर लिया था। जीवन में कहीं उत्‍सव का एक अंकुर निकल रहा था। जो कोई भी उसे देख कर समझ सकता था। जैसे कोई युवती जब किसी के प्रेम में पड़ती है। तो उसका सब कुछ बदल जाता। देखने वाले पल में समझ जाते है। हम सब ओशो धाम चले गये। ओशो धाम सच ही ध्‍यान के लिए एक स्‍वर्ग है। कई एकड़ में फैला, दूर दिल्‍ली की चहल पहल से अनभिग, पेड़-पौधों से भरा। एक रमणीक स्‍थान है। वहां हमारे कई परिचित संन्‍यासियों से मुलाकात हुई। इन्‍हीं में एक महिला मित्र है, मां प्रेम अदवीता वह मुझे प्रेम से गुरूजिएफ के नाम से पुकारती है। दूर से ही देख कर मेरे गले लग गई। मेरे संग बैठ कर ही खाना खाया। इस तरह एक स्‍त्री पुरूष को पास देख कर उनकी पत्‍नी को लगा ये कैसा रहस्‍य लोक है। दूर देहात से आई। पुराने विचारों की महिला थी। उसके लिए ये सब विस्‍मयकारी था। पर वह एक -एक बात को बड़ गोर से देख और समझ रही थी। यही उसके लिए घातक सिद्ध हुआ। वह और-और प्रभावित होती चली गई।

दुर चले जाने के बाद हमारा मन, जानता है। कि कैसे बचा जाये। सो वह उसका ठीक विपरीत एक नई धारना बना लेता है। और हमें मार्ग से रोकने का जतन करता है। बहुत लोग इस भ्रम जाल में फंस कर रूक भी जाते है। पर अगले हफ्ते जब उनका फिर अवकाश का दिन आया तो उनकी पत्‍नी ने विरोध किया और आने से मना कर दिया। स्‍वामी देव गगन तो अपनी पत्‍नी का चेहरा देखता ही रह गया। पर कर क्‍या सकता था ज्‍यादा दबाब डाल भी नहीं सकता था। हमारा मन कई तलों में विभाजित रहता है। चेतन मन और अचेतन मन के अनेक हिस्‍से। चेतन मन सारे आस्‍तित्‍व पर अपना अधिकार करना चाहता है। अचेतन किसी अर्थ को नहीं जानता। वह तो जानता है आवश्‍यकताओं को। इच्‍छाएं है चेतन मन की। अचेतन किन्‍हीं इच्‍छाओं की फिक्र नहीं करता। इच्‍छा आती है, तुम्‍हारे सोचने विचारने से। शिक्षा से, संस्‍कारों से यही द्वैंध खड़ा कर देता है। और हमारी समझ में कुछ नहीं आता कि हम क्‍या करे और क्‍या ने करे। वह अपना बचाव चाहता कि कुछ ऐसा हो कोई मेरे साथ जबरदस्‍ती की जायेगी। या कुछ और मुझे बचने का बहाना मिल जाये। स्‍वामी जी ने मुझे फोन पर बताया। मैने कहां तुम अब उन्‍हे यहां का जिक्र भी मत करना उस छोड़ दो आप ध्‍यान आदि को अपनी तरफ से कुछ दिन के लिए भूल जाओ। जीवन बहुत विरोधा भाषी है। जब हम खिचते है। तो वह पतंग की तरह नीचे गोता मार जाता है। और अगर ढील दी जाये तो आसमान की और चढ़ने लग जाता है।

और ठीक ऐसा ही हुआ। अगले हफ्ते उनकी पत्‍नी ने उन्‍हें खुद ही कहां की हम स्‍वामी की पास ध्‍यान के लिए चलेंगे। स्‍वामी देव गगन को तो यकीन नहीं हुआ। पर ये सब वे होता देख रहे थे। बिना किसी के समझायें बुझा ये। दिन में फिर हमने ध्‍यान किया इस बार ध्‍यान पहले से भी गहरा गया। शायद इस बार उसने अपने आप को खुला छोड़ दिया था। अपने अन्‍दर के मन को खाली रखा। और उर्जा को अपने अंदर तक बहने दिया। उर्जा ने अचेतन की गहराईयों में जाकर। लाखों सालों से ज़मीं धूल की सफाई की। उन अंधेरी परतों को उघाड़ना। और एक नया मार्ग बनने लगा। न उस दिन हाथों की चुहियों कि खनक बाधा डाली। और न शायद संस्‍कारों ने उसे बंधा और सुकड़ा। अरेी दूसरी बात जो मैंने कहीं कृपा आप आपने पति के साथ कुछ दिन शरीर संबंध न बनाये तो ठीक होगा। ओर ये बात मैंने देव गगन को भी बता दी। क्‍योंकि शरीर की शुद्धी जब तक नहीं होगी आप मन के तल को महसूस नही कर सकते। इस लिए ये ध्‍यान उन जोड़ो को इतना गहरा नही ले जा सकता जिन्‍होंने शरीरिक संबंध किया होगा। आगर आप कंवरे है…पाक है। तब आपके शरीर पर सेक्‍स तो जरूर उठेगा पर आपने तो वहां रूकना नहीं अपने तो अगले आयामें में जाना है…तब वो उर्ज जो उठ गई है, आपको ध्‍यान में अधिक गति देगी। वरना आप शरीर पर ही रूक कर रह जायेगे। देखियें ये बात एक दम सत्‍य है। तंत्र सेक्‍स का उपयोग करता है एक वाहन की तरह। वह उसमे डूबता नहीं। नही तो वह तत्र नही है भौग है। चाहे कोई उसे ध्‍यान का नाम ले कर करे…ये एक अच्‍छा नाम है भोग के लिए। ताकि आप ध्‍यानी भी बने रहे ओर सब करते रहे। ये एक तपस्‍या है। आप तन का उपयोग कर रहे है, यंत्र कि तरह।

मेरा उन दिनों एकांत वास चल रहा और मैं पिरामिड में अकेला सोता था। नीचे एक पतली सी चटाई बिछा कर। अति साधारण तरह से बिना किसी पंखे के चाहे कितनी ही गर्मी क्‍यों न हो। और एक बात उन दिनों मुझ पर बांसुरी बजाने और सीखने का भूत सवार था। रात जब तक नींद न आ जाये। बंसरी बजाता रहता था। शायद अंदर का हमारा खाली पन ही हमे ध्‍यान की गहराई में ले जाता है। फिर इस मे आप किसी माध्‍यम का सहारा ले सकते है। अदवीता नीचे बच्‍चों के साथ सोती थी। पिरामिड से जुडे एक कमरे में उन पति-पत्‍नी के सोने का इंतजाम कर दिया था।

उस रात भी ऐसा ही हुआ। कब बांसुरी मेरे हाथ से छुट गई। और मैं सो गया। मैं रात चार घंटे की नींद ही लेता था। क्‍यों चार बजे उठ जाना होता था। अचानक रात को अंधेरे में मुझे लगा की कोई मेरे पास आकर बैठा है। वैसे पिरामिंड में अँधेरा बहुत गहरा होता है। क्‍योंकि उसके अंदर भी काला रंग और काली ही टाईल लगी हुई है। मैंने पूछा कौन? उसने धीरे से मेरा हाथ पकड़ लिया। कि मैं हूं स्‍वामी जी। क्‍या में आपके पास सो सकती हूं। कुछ देर के लिए तो मुझे समझ में नहीं आया की ये सत्‍य है या मेरी वासना मुझे स्वप्न दिखा रही है। क्‍यों उसकी उम्र की तो मेरी लड़की के बराबर है। इतना साहस कोई कैसे कर सकता है। ठीक दरवाजा खोलते ही उनके पति सो रहे है। ऐसा काम तो कोई चरित्र हीन भी नहीं कर सकती। और शायद चरित्र हीन तो कर ही नहीं सकती। क्‍योंकि उसने तो अपने शुभ्र को दिखलाना है। इस लिए अपने अंधेरे के ऊपर एक स्‍वेत परत रखनी ही होगी।

मेरे अंदर एक उथल पुथल शुरू हो गई। खुशी और भय एक साथ मेरे सामने आ जा रहा था। पर मैंने उसे मना नहीं किया और अपनी बगल में लिटा लिया। वह मेरे सिने से चिपट कर लेट गई। एक जवान लड़की, और रात का अँधेरा। और वह खुद तुम्‍हें समर्पण कर रही है। मेरे अंदर वासना का एक झंझावात शुरू हो गया। मेरा पूरा तन मन सेक्‍स के उत्पात से जलने लगा। सेक्‍स की उठती लहरों को में अपनी और आते देख रहा था, महसूस कर रहा था। मैने अपने हाथ उसकी पीठ पर रख लिए और उसके सर और पीठ को धीरे-धीरे सहलाने लगा। वह और सुकड़ कर मुझ में समा गई। लहरे धीरे-धीरे तूफान का रूप लेने लगी। मन नाना प्रकार के ताने बाने बुनने लगा। पर मैं उस सब को देखता रहा। अपने पर काबू भी नहीं कर रहा था। और नहीं उसे मैंने रोका। मेरा पूरा शरीर आग का शोला होता जा रहा था। मेरा तन ज्वर से जलने लगा। पर जब मैंने उस ज्‍वाला को देखता तो उसमे एक मधुर शीतलता की पतली परत भी साथ दिखाई दी। यहीं किरण ही मेरे नये और अंजान मार्ग को खोल दिया। एक अजीब सी जलन जो गर्मी के साथ ठंडक भी अपने साथ लिए थी। हां उसमें जलन कहीं ज्‍यादा थी और शांति की लहर तब आती जब में उसे थोड़े होश से भर कर उसे देखता। पर उत्‍पात लगातार बढ़ रहा था।

मेरी शरीर पर सेक्‍स का उन्‍माद मुझे जला रहा था। पर अचानक कुछ ऐसा हुआ की जो शरीर पर फैला सेक्‍स का सिकुड़ कर योनि केंद्र पर एकत्रित होने लगा। शायद ये में होश या उसे देखते रहने से ही ऐसा हुआ। नहीं तो हम सैक्‍स के तूफान को चढ़ने ही नहीं देते। पहले ही उस में डूब जाते। नाव किनारों के लंगर खोल भी नहीं पाती और शांत हो जाती। खुले समुद्र में मैं उसे बहने दिया। देखा की वह कहां तक जा पाती है। और आगे कितना बड़ा तूफ़ान है। अब धीर-धीर सारा उत्पात, सेक्‍स, मेरे योनि केन्द्र पर तनाव बनता जा रहा था। शरीर तो शांति हो रहा था। पर योनि केंद्र अपने अति पर पहुंच रहा था। लगा उस जलन को शांत करने के लिए अपने गुप्‍त अंग को किसी शीतलता में कोई छुपा ले। यह वहीं समय होता है जब हम सेक्‍स के हाथों, काम क्रीड़ा में उतर जाते है। ये एक प्रकृति की स्‍वभाविक क्रिया है। आपका शरीर कुछ ऐसा रसायन छोड़ देता है की आप एक उन्माद में डूब जाते है। और चाह कर भी इस प्रकृति के नशे से अछूते नहीं रह सकते। क्‍यों अगर प्रकृति हमें इतना मजबूरन करे तो उसकी उत्पत्ति कैसे होगी। पर हम थोड़ विक्रीत हो गये है। शरीर पर सेक्‍स चढ़ने से पहले ही मन पर फैले सेक्‍स की कल्‍पना के करण उसमें डूब जाते है। मन पर फैला सेक्‍स तुम्‍हें कभी तृप्‍त नहीं कर सकता। आज पूरी पृथ्‍वी पर केवल मनुष्‍य ही ऐसा प्राणी है जो चौबीस घंटे सेक्‍स के बारे में सोचता है। इसका करण आपने कभी जानना चाहा। सेक्‍स शरीर की जरूरत है मन को सेक्‍स की जरूरत नहीं है। पर हम मन से विक्रीत हो गये है। वह प्रकृतिक नहीं हो विपरीत हो गया। आप इस का प्रयोग कर के कभी देखना। शरीर को मन पर उठने के बाद। पूरे शरीर पर चढ़ने दे। उसे देखते रहे। जीतना आप के पास होश होगा उस चढ़ने दे। रोके भी नहीं। अब ये आप पर निर्भर करता आप के उसे कितनी दूर तक ले जा सकते है। जितनी दूर तक आप उसे ले जायेंगे आनंद उतना ही गहरा होगा। और तृप्‍ति दाई। शायद महीनों फिर आप को उसमें डूबने की जरूरत ही न हो। पर हम उथले ही रह जाते है। और डूब जाते है किनारे पर ही होश है हमारे पास। इसे शरीर पर किस गहराई तक ले जा सकते है। यहीं है कीमिया। देखा आपने जानवरों को उन्‍हें सालों जरूरत नहीं होती। क्‍योंकि वह शरीर पर जीते है।

यहीं उस दिन मेरे साथ हुआ। शायद प्रकृति का कोई नियोजित कार्य क्रम था। जो मेरा सहयोग कर रही था। उस स्‍थिति को बनाने में मेरा अपना कोई हाथ या मन नहीं था। और नहीं मैं इस के लिए तैयार ही था। पर थी कोई शक्‍ति जो मुझे सहयोग दे रही थी। काम केंद्र पूरे तनाव पर था। पर न जाने काने मुझे बहाये लिए जा रहा था। और संप्रेषित कर रहा था कि इस में मत डुबो इसे देखो । ये विचार मेरे मन में कही और से आ रहा था। ये मुझे साफ दिखाई रहा था। ये मेरी कामना नहीं थी। मुझे कोई मार्ग दर्शित कर रहा था। मैं एक सूखे पत्‍ते की तरह कांप रहा था। लगता था। अभी जला की तभी जला। बस एक ही सहारा था कि किसी तरह सेक्‍स में उतर जाऊं तो शायद मुझे शांति मिले। पर शायद ये प्रकृति के विपरीत था। मैने पूरे जीवन में साथी की इच्‍छा के बीना कभी सैक्‍स नहीं किया। मुझे तो यह सोच कर भी बड़ा अचरज आता था। कि कैसे कोई बलत्कार कर सकता है। वहां तो इच्‍छा की बात ही नहीं है। एक जोर जबरदस्ती है। ये सारी विक्रतिया हमारे साये पन का परिणाम है।

मेरी मां जो बार मेरे बारे में बड़े गर्व से एक बात कहां करती थी। कि मेरे बेटे को तुम बो भी दोगे तो जमेगा (उगेगा) नहीं। अब ये किस आधार पर कहती थी। इस के बारे में मुझे उस रात पता चला। उसने जरूर मुझमें मेरे दूसरे भाई बहन से कुछ तो अलग देखा या जाना होगा। शायद एक मां अपने प्रत्‍येक बच्‍चें के चरित्र और उसकी गहराई को जरूर जानती है। और ठीक वही हुआ। मेरी तेज साँसे धीरे-धीरे शांत होने लगी। मेरी गुप्‍त इन्द्रियों पर तनाव तो उतना ही रहा। पर मेरे होश से लगा तर देखने के कारण। उस पर फैली जलन छोटी होने लगा। और अंदर की तरफ सुड़कने लगी। जलन जो पूरे अंग पर फैली थी। वह केन्द्रित और घनीभूत हो रही थी। और गुप्‍त अंग पर शीतला फेल रही थी।

धीरे-धीरे स्‍वास इतनी मध्यम हो गई की कभी तो ऐसा लगता की मैं मर गया हूं। शरीर से मेरी दूरी बहुत दूर हो रही थी। शरीर का हिलना डुलना बंद हो गया। मेरे हाथ पेर जैसे और जिस जगह रह वहीं के वहीं रह गये। मैंने कई बार उन्‍हें हिलाने की कोशिश की। पर मैं कामयाब नहीं हुआ। मैं कहीं गहरे में डूबता चला जा रहा था। एक गहरी खाई में…सच पहली बार शरीर से निरभार हिनता का अहसास किताना सुखद होता है महसुस हुआ। हमारी चेतना पर इस शरीर का बार जब पहली बार आपको महसुस होगा उस हलके पन की आप कल्‍पना भी नही कर सकते। ऐसे ही देख लिजिए जैसे आप बिमार नहीं है तब आप को अपने शरीर का भार नही मकसुस होता। ओर जब आप अस्‍वस्‍थ हो जाते है तब वहीं शरीर कितना भारी लगता है। जैसे आप उसे ढ़ो रहे है।…कभी-कभी मुझे भय भी लगता था। मेरी स्‍वास कहीं दूर चलती हुई महसूस हो रही थी। मुझे पहली बार शरीर के बिना भी ऐसा एहसास हुआ की मैं पूर्ण हूं। हमारी चेतना का शरीर से चिपकने के कारण कितना भारी पन लगता। एक हलके पन का एहसास हो रहा था। लगता था मुझे पंख लग गये। मैं उड़ सकता हूं। मैं डूबता चला गया। पर मैने एक अनुभव और पाया। जैसे ही मेरी सांस मंद होती है या कभी-कभी बंद होती है। तो विचार भी उसी गति में कम या बंद हो जाते है। मन पर सदा चलते विचारों का एक रेला ही जाना था जीवन में। पर आज में उस मन की सड़क को कभी-कभार भी सुनसान देख रहा था। कभी कोई विचार दूर सरक जाता लगता कोई मुसाफिर दूर चला गया। कभी लगता सामने सब खाली है। कैसा लगा, मुंह में एक मधुरता फैल गई। एक अजीब सी सुगंध जो इस लोक की नहीं थी। वो मेरे शरीर से फूटने लगी। जिसे में महसूस कर पर रहा था। ये मेरा भ्रम है नहीं था। एक हकीकत थी। उसी अवस्था में कितनी देर रहा कह नहीं सकता। शायद शांति और मधुरता में डूब कर मैं सो गया।

सुबह जब मेरी आँख खुली तब स्‍थिति का ज्ञान हुआ। अगर वह लड़की उठ कर चली जाती तो मैं शायद उसे स्‍वप्‍न ही समझता। पर वह थी। और इतनी गहरी सो रही थी। मैं उसके पास से इस तरह उठा, जैसे एक मां अपने सोते बच्‍चे के पास से उठती है। की कही उसकी नींद न खराब हो जाये। वो आनंद अब भी मेरे तन-मन, मस्‍तिष्‍क और आँखो, मुहँ मेरे फेल रहा था। मेरे अपना माथा। उसके चरणों पर रख दिया। उसके ठंडे बर्फ की तरह पैर मेरे माथे में अंदर उतरते से चले गये। मुझे लगा उसके पैर मेरे आज्ञा चक्र में समा रहे है। अच्‍छा भी लगा रहा था। एक शीतलता और जो नीलिमा लिए थी फैल रही थी।

सुबह मुझे पता चला की वह अपने पति से ही आज्ञा लेकर आई थी। की मैं स्‍वामी की पास सोने के लिए जाऊं। वह महान पुरूष-और उस महान महिला ने मुझे वो सब दिया में उन का ऋण उतार नहीं सकता। वही रात थी जो मेरे सेक्‍स के अंधेर को उजाले में परिवर्तित कर गई। शायद ये सब में अकेले नहीं कर सकता था। मेरा बोया हुआ बीज आज वृक्ष ही नहीं बना। उस पर फूल और फल भी लग गये। अब मैं समझ सकता हूं महात्‍मा गांधी के उस प्रयोग के विषय में हम जीवन को समझ नहीं सकते शब्‍दों के सहारे। हमें अनुभूति चाहिए। उसे जीना होगा और जानना होगा। वरना तो ये केवल शब्‍द ओर विचार ही रह जायेगे। आप उसे कभी नहीं समझ सकते। मेंने जाना तंत्र और सैक्स के पास। एक महान अनुभूति। जीवन एक अनुभव है, ओर जब तक हम उस से गुजर नही जाते उसक पार नहीं हो सकते। शब्‍द किताबी होते है। एक कागज की नाव…जो हमें कहीं भी नहीं ले जा सकते, ओर सही में हमें डूबो देते है। बाद में तो हमने बहुत गहरे प्रयोग किये ….जो मुझे परिपक्व कर गये। उन के विषय में आगे विस्‍तार से लिखने का सहास करूंगा। पर इस में कहीं कुछ ऐसा भी पहलु हो दूसरों सेजूड़ा है अगर कुछ गलत कह दिया हो तो कृप्‍या वो मुझे माफ कर दे्गें पर सही में किसी को छोटा या बड़ा दिखाना मेरा लक्ष्‍य नहीं है एक तथ्‍य को कहना है। जो शायद किसी भूले को या मुझे खुद मार्ग दे….

क्रमश: अगले पाठ में…………

स्‍वामी आनंद प्रसाद ‘’मनसा’’

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About sw anand prashad

ओशो की किरण जीवन में जिस दिन से प्रवेश किया, वहीं से जीवन का शुक्‍ल पक्ष शुरू हुआ, कितना धन्‍य भागी हूं ओशो को पा कर उस के लिए शब्‍द नहीं है मेरे पास.....अभी जीवन में पूर्णिमा का उदय तो नहीं हुआ है। परन्‍तु क्‍या दुज का चाँद कम सुदंर होता है। देखे कोई मेरे जीवन में झांक कर। आस्‍तित्‍व में सीधा कुछ भी नहीं है...सब वर्तुलाकार है , फिर जीवन उससे भिन्‍न कैसे हो सकता है। कुछ अंबर की बात करे, कुछ धरती का साथ धरे। कुछ तारों की गूंथे माला, नित जीवन का सिंगार करे।।
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17 Responses to सेक्‍स और तंत्र—I

  1. स्वामीजी,
    इस परमानंद को कोई देवता ही भोग सकता है…
    ………एक अजीब सी सुगंध जो इस लोक की नहीं थी………
    इसे मैंने भी कभी अपने नासाकेंद्र पर महसूस किया है… जब भरपूर इच्छा के बाद भी सेक्स नहीं किया तब…
    उफ वह स्वगिर्क गंध…

  2. MAI APNE JEEVAN ME BUDDHA & OSHO JI SE MILNA CHAHATA THA.
    LEKIN AB SAMBHAV NAHI HAI. OSHO JI DWARA DIYE GAYE PRAVACHAN “DHAMO SHANTANO” KAFI GYAN VARDHAK SIDDHA HUYE.
    MERA JIWAN BADAL GAYA.
    SEX KI BATO ME RAS ATA THA. AB MAI HAR CHIJ KO DHYAN KE DWARA DEKHA TA HU.
    THANX OSHO COMMUNITI
    MAI APKA TAHE DIL SE SHUKRIYA ADA KARTA HU.
    SUDHIR KUMAR SHENDE

  3. ABHI SHENDE says:

    MAI APNE JEEVAN ME BUDDHA & OSHO JI SE MILNA CHAHATA THA.
    kya esa nahi ho sakta ki mai bhi osho ji satsang me shamil ho jau.

    • प्रिय मित्र,
      आप आज भी ओशो गंगा में डूबकी लगा सकते हो, ओर आपको यह जान कर बड़ा आश्‍चर्य होगा की आज ओशो हमरे बीच पहले से अधिक है…….
      धर्म प्रेम की अंतिम पराकाष्ठाह है।
      प्रेम जैसे फूल है,
      धर्म प्रेम के फूल की सुवास है।
      काम है बीज, प्रेम है फूल,
      धर्म है फूल से उड़ गई सुगंध।
      इस लिए धर्म अदृश्य है।
      –ओशो

  4. SUNNY says:

    वहां स्वामी जी मजा आ गया क्रिप्या करके मुझे भी कुछ ज्ञान बांटिए

  5. amitabh sharma says:

    sex ko samjhne ke liye haqiqat me shayad bahut hi hausla chahiye………

  6. क्या बात है. बहुत खूब… मेरा मन प्रसन्न हो गया.

  7. shivaram kekare says:

    swamiji ‘ kya ham apnehi gharpar aisa prayog kar sakte hai ? aur dhyan kya hi ?krupaya DHYAN kaisa kare yaha bataiye ….DDhannyawad……

  8. Ravinder Kr. Saini says:

    Swami G….Hum be ye…dhyan yog sadna sikhna chahte hai…..

    • आप ध्‍यान शुरू करे…..पर जैसा कुदरत चाहेगी, उसके हाथ छोड़ कर ध्‍यान की गहराई में उतरा जा सकता है। ये कोई अर्जित करने की वस्‍तु नही है। मेरे अपने अनुभव के अनसार अगर हम ध्‍यान भी करते है, तो उसमें पूजा जितनी पवित्रता रहनी चाहिए। पर शायद हम ध्‍यान के पीछे अपने सेक्‍स की पूरती करते है तो वह वासना ही होगी फिर चाहे हम उसे ध्‍यान का सुनंदर चोगा ही क्‍यों न पहना ले। भगवान आपकी मनों कामना पूर्ण करे। लेकिन है बहुत कठिन डगर पनघट की….तंत्र देखने ओर सुनने में जितना मधुर ओर लुभावना होता है इतना होता नहीं

  9. amitabh sharma says:

    aapke jawabo_n ko parhkar dil ko bahut hi sukun milta hai……

    • प्रिय अमिताभ जी….नमस्‍कार, आपका ह्रदय बहुत किमती है, इसमें आप ध्‍यान को अंकुरित कर दो फिर देखना उस मे कैसे-कैसे पक्षी बैठकर गीत गाते, कितने मधुर रस झरते, कितने सुदंर आंनद के पुष्‍प खिलतें ओर एक दिन वह समाघि से सराबोर हो उठता….प्रेम

      स्‍वामी आनंद प्रसाद मनसा

  10. Varun Malhotra says:

    यह किस एल्बम में से लिया गया है???????

    धन्यवाद !!

  11. krishprud says:

    Great experiment, experience and revelation for those who love to Meditate and get liberated …

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