सुबह का घूमना प्रकृति का अनमोल खज़ाने में प्रवेश करने जैसा है। और में सालों से इस लालच से बच नहीं पाया हूं, ऐसा में करीब तब से कर रहा हूं तब से मैंने होश सम्हाला है। सूर्य निकलने से पहले जब प्रकृति कुछ अभी अलसाई सी होती है। और खास कर शादियों में तो पेड़ पौधों और पक्षी गण भी कुछ देर से उठते है। क्योंकि सूर्य भगवान भी आराम से 7बजे के बाद ही आते है। तब रात को चार बजे निपट सुनसान पगडंडी दूर तक कोई ध्वनि न हो। आपको अपने पैरो की आहट भी ऐसी लगेगी की आपके साथ कोई चल रहा है। पर आस पास के पेड़ पौधे इसने शांत खड़े रहते है कि आपके अंदर की शांति को आपके बहार तक निकालने में बहुत सहयोगी होते है। और उन पेड पौधों की शांति और उनकी साधुता उस कुहासे में देखते ही बनती है। कैसे अलसाये से नींद में खड़े एक मासूम बच्चे से दिखाई देते है। जब कोई हवा का झोंका उन्हें छू कर गुजरता है तब उनका हिलना-हिलना न हो कर ऊंघना सा लगता है। और वहीं हवा जब उन्हें सूर्य की रोशनी में छूती है तो कैसी चपलता और अल्हड़पन का अहसास करती है। उस सूनसान पगडंडी पर दोनों तरफ बबूल के पेड़ थे। इस बार दिल्ली में अधिक बरसात होने के कारण उनके चेहरे पर पहले तो कुछ उदासी थी। क्योंकि बबूल और गधा गर्मी के मौसम में बहुत खुश होता है। गधे की भी यही हालत है। जब चारों और अधिक हरी-हरी घास होगी, तो वह खाने के बाद पीछे मूड कर देखेगा। और उसके मन में विचार आयेगा सारी घास तो यूं ही हरी खड़ी है। तूने खाया ही क्या है। और गर्मी के मौसम में जब सूखी घास को चर कर पीछे देखता है तो फूल कर कुप्पा हो जाता है। की देखा पीछे एक घास का तिनका भी नहीं छोड़ा और उसे लगता है, अब आया मजा, आज खाया है। जी भर कर, आप देखना गधा गर्मी के मौसम में सूखी घास खा कर भी कितना तंदरूस्त हो जाता है। इसी तरह बबूल के पेड़ की हालत है। मई-जून की भीषण गर्मी में भी आप जब जंगल से गुजरेंगे तो चारों और पूरा जंगल उदास और तपीस से दुखी दिखाई देगा। छोटे-छोटे झाड़ भी झुलस रहे होते है गर्मी के कारण। पर बबूल की हरियाली देखते ही बनती है।
इस बार अधिक बरसात के कारण बबूल दो महीने तक काफ़ी उदास रही। पर अरावली की पहाड़ी पानी अपनी सतह पर ज्यादा देर रहने नहीं देती। अपने अंदर आत्मसात कर जाती है। सो जितना भी पानी पड़े इस अरावली को तृप्त नहीं कर पाता। आप एक सप्ताह में ही महसूस करेंगे की मानों यहां महीनों से पानी पडा ही नहीं। तो बबूल की प्यास भी मिट गई और जमीन खुश्क होने से वह प्रश्न भी हो गई। और तो और उसने अपनी कद काठी भी बढ़ा ली है। वह अधिक धनी और खूबसूरत हो गई थी। अभी तक जंगली खरपतवार, और जड़ी बुटिया खड़ी लहलहा रही थी। जंगल पूरे यौवन पर था। सालों बाद इतना घना और बीहड़ मैंने इस जंगल को देखा था। बचपन में जब बरसात के बाद झाड़ी बैर खाने के लिए जाते तब ऐसा लगता था। सब पगडंडियां खत्म हो चुकी होती थी। क्योंकि घास फूस ने अपना साम्राज्य उन पर फैला लिए होता था।
आस-पास के पेड़ पौधे भी इतने शांत और आनंदित खड़े महसूस हो रहे थे। हवा का एक झोंका भी जब उन्हें छू कर गुजरता है तब उसका झूमना दिन के झूमने से काफी भिन्न तरह का होता है। उनको झूमता हुआ देखने से ही आपको प्रतीत हो जायेगा कि अभी ये अलसाये हुए है। दिन में उनका हिलना एक अल्हड़ पन के साथ एक शरारत लिए हुआ होता है और सुबह वे ऐसे लग रहे होते है मानों आँख बंद किये कोई बच्चा जबरदस्ती बिस्तरे से उठा दिया जाये और उसकी चाल में मदहोशी एक डावा डोलता लिए हुए होगी। ऐसी ही मदहोशी इन पेड़-पौधों में दिखाई दे रही थी। सुबह प्रकृति के संग साथ होना एक अद्भुत चमत्कार से कम नहीं है जो आपके रोया -रोया में होश भर देता है। चारों और फैली शांति आपके अंतस के गहरे में छुपी शांति को भी बहार ला कर खड़ी कर देता है। यह ऐसा समझीये जैसे कि संक्रामकता हो, सुबह उस ताजगी और प्रफुलिता के लिए आपको जरा भी जतन करने की जरूरत नहीं होती। बस उस प्रवाह में आपने आप को छोड़ भर देना होता है। और उस पगडंडी के बीच से आता तारों का मध्यम प्रकाश, कैसी झीनी सा जैसे किसी ने पथ पर एक महीन चादर सी फैला दे हो। उस मुलायम रेत भर पगडंडी पर, अपने ही पैर की आहट, आपके मन में कैसा किसी के साथ होने का भ्रम भर देती है। और आपको बार-बार पीछे मुड़ कर देखने के लिए विवश कर देती है। और आपने जैसे ही पीछे मुड़कर देखा नहीं जैसे घूंघट में छिपी दुलहन, अपनी पूर्णता को दिखाने से झिझक रही हो। उस कुहासे में भी वह पथ सुंदर लग रहा था चाँद के बिना भी तारों की रोशनी में पास पड़ोस के पेड़ पौधों के तनों की मध्यम परछाई रास्ते पर पड़ रही थी। दोनों तरफ घने बबूल के पेड़, रास्ते को ढेक हुए थे। सुबह की वो एकाकीपन जिसने नहीं देखा, नहीं जाना, वह बहुत कुछ चुक गया इस जीवन में।
रोज इसी रास्ते से आता था, पर अचानक झाड़ियों में एक भयाक्रांत पक्षी का उड़ना मुझे अंदर तक डरा गया। मैं सहम कर इधर उधर देखने लगा। चारों और शांति दूर तक कोई परछाई भी नहीं। पक्षी भी अभी सोये हुए थे। अचानक एक पक्षी अनजाने क्यों डर कि..कि…कि..कर के उड़ गया शायद मेरी पद चापों से डर गया होगा। अचानक मेरे पूरे शरीर पर भय ने अपना अधिकार जमा लिया। मेरी समझ में नहीं आया सालों से रोज आता हूं आज इतना भयभीत क्यों मेरी परिचित जगह है। कोई अनजानी डगर नहीं है। लाख अपने को सम्हालने,बहलाने की कोशिश करता रहा पर भय ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा। आस पास जो पल भर पहले सौन्दर्य फैला हुआ था सब गया हो गया। भय ने उसे अपने आगोश में ले लिया।
तभी अचानक में मन में वह क्रोध का विचार आया। कही क्रोध के कारण तो भय रूपी जड़ों को आज भोजन तो नहीं मल गया। भय रूपी अंधेरे में दबी उन जड़ों को भोजन क्रोध और घृणा से पोषण मिलता है। क्रोधी आदमी कायर होता है। आपने भय को छुपने के लिए हिंसा करता है, ताकी उसे पता न चले की मैं कमजोर हूं। आपके ये हिटलर, मुसोलनी ,नादिर शाह….कायर है। बुद्ध महावीर प्रेम से भरे है उनके पास कोई हिंसा नहीं हे। ये सुत्र जब आज मैंने अपने जीवन में घटते देखा तब अंदर जाकर मेंने देखा प्रेम, स्नेह हमे अभय देता है। क्रोध, अहंकार हमारे भय को पोषित करता है।
–स्वामी आनंद प्रसाद ‘’मनसा’’







बहुत सुन्दर! आपके एक कथन को मैने अपनी पोस्ट क्रोध कमज़ोरी है, मन्यु शक्ति है में उद्धृत किया है, आशा है आप अन्यथा नहीं लेंगे।