धूल का कण–कविता (08)

धुल का कण सरक कर परों के तले,

उसका इस धिरता से सिमटना, नाचना।

झूम कर करना अट्टहास,

क्‍यों नहीं आता उसको अहं से उठना?

लगता है वो कितन सुकोमल ओर मरमरी सा

फिर भी कैसे हवा के नाजुक पंखों पर बैठ कर,

बना देता है रेत के ऊंचें-ऊंचें पहाड़।

गर्म तपती हुई धूप में,

रात की सीतलता का करता है इंतजार।।

डूबते सूरज की सपाट, सिमटती धूप में,

धुल का कण--कविता

धुल का कण--कविता


वो सोने सा गर्वित लगता है।

बसन्‍त की सुकोमल शान्ति में वो,

सीने पर कांटे उगा कर हंसता है।।

अषाढ़, के गरजते घन-घौर मेघों में,

रिम-झिम टपकती बूँदों में।।

कैसा खिल-खिला के हंसता है,

आती जब सुबकियां की छूआन से,
कुछ डरता और सकपकाता है।।

हाए! मनुष्‍य न जाने तुझे क्‍या हो गया है,

कहां खो गई है तेरी वो मासुम सुरमई हंसी।।

कहां है तेरी आंखों मैं बहता हुआ उल्‍लास,

कहां छुट गया तेरा आनंद और उन्माद।।

देख रोक ले अपने कदम को फिर से,

क्‍या वो तुझे चला रहे है।

या तू उसके पीछे खिचा चहला जा रह है…।।

ठहर जा, ठिठक जा झांक ले आपने अंतस में एक बार।

सब कुछ एक पल में बदल जाएगा।

बस देख तुझे रूकना भर है,

परन्‍तु तू शायद रूकना भूल गया है,

बस अब एक कदम भी और आगे ,

बस यहीं है इति है।

नहीं देख सकेगा तू पीछे चाहकर,

क्‍या समय देखता है कभी मुड़कर, फिर से,

और एक काली छाया निगल चूकि होगी इस धरा को,

इन सुरम्‍य गर्वित जीवन को,

केबल बचा होगा अन्‍धकार,

एक काल अन्‍धकार, एक प्रलय,विभीषीका…….

दूर मनु ओर इति फिर बैठे होगे……छंबित से ।।

स्‍वामी आनंद प्रसाद ”मानस”

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About Mansa Anand

ओशो की किरण जीवन में जिस दिन से प्रवेश किया, वहीं से जीवन का शुक्‍ल पक्ष शुरू हुआ, कितना धन्‍य भागी हूं ओशो को पा कर उस के लिए शब्‍द नहीं है मेरे पास.....अभी जीवन में पूर्णिमा का उदय तो नहीं हुआ है। परन्‍तु क्‍या दुज का चाँद कम सुदंर होता है। देखे कोई मेरे जीवन में झांक कर। आस्‍तित्‍व में सीधा कुछ भी नहीं है...सब वर्तुलाकार है , फिर जीवन उससे भिन्‍न कैसे हो सकता है। कुछ अंबर की बात करे, कुछ धरती का साथ धरे। कुछ तारों की गूंथे माला, नित जीवन का सिंगार करे।।
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21 Responses to धूल का कण–कविता (08)

  1. पिगबैक: Tweets that mention धूल का कण—(कविता) « Osho Satsang -- Topsy.com

  2. शिवेन्द्र तांडे says:

    मुझे आपकी अधिकांश कविताएं बहुत पसंद आयी खासतौर से धूल की कव‍िता

  3. Utkarsh says:

    thnx..
    it realy wrkd fr me n u will also nt beleav dat i gt A1 while ritin dis poem in d project……
    so THNX ALOT…. MAY GOD BLESS U… :) :)

  4. khushi says:

    HEY I M REALLY IMPRESSED BY THE WRITTING SKILLS…….
    I REALY ENJOYED READDING THE AWOSOME BLOSOM POEM…….
    THANKS…….
    [:)]
    [:D]

  5. पिगबैक: 2010 in review | Osho Satsang.org/ओशो सत्‍संग

  6. nishit sharma says:

    whats in your mind…..how you pic the words and from where…..

  7. arzoo says:

    i love ur writting skills…………………………………………………………..

  8. Sushma says:

    Hi,

    Please suggest me some slogans on Dhool or Mitti but in Hindi please.

    • प्रिय शुशमा जी,

      मिट्टी धूल का समुह है, जो एक संगठन है, एक बंधन है। धूल एक स्‍वछंदता है। आजादी है, उमंग है। जैसे समाज ओर व्‍यक्‍ति….समाज बंधन है…एक व्‍यक्‍ति जब तक उस से बंधा है। उस के अंदर व्‍यक्‍तित्‍व पैदा नहीं हो सकता। उसके अंदर कोई आत्‍मा पैदा नहीं हो सकत।

      धूल का कण देखने में जीतना कमजोर लगता है इतना है नहीं। क्‍योंकि कमजोर में ही जीवन है। कोमता ही जीवित है।…..

      स्‍वामी आनंद प्रसाद

  9. Sushma says:

    Great Ideas you have. I think God’s gift to you like writing skill and feelings about nature. Kindly suggest me some slogans on “dhool or Mitti for my daughter who is in 9th standard now, but please in hindi only.

  10. Soumyadeep Mondal says:

    please can u give me some slogans on dhool or mitti in hindi only please

  11. Savi Gupta says:

    yaaa i really like this poem………………..!

  12. sanjoy kr biswas says:

    i want to know 5 slogan on mitti . plz send me the ans to my email address.

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