ताओ उपनिषाद (भाग–2) प्रवचन–24

शरीर व आत्मा की एकता, ताओ की प्राण-साधना व अविकारी स्थिति—(प्रवचन—चौबीसवां)

अध्याय 10 : सूत्र 1

अद्वय की स्वीकृति

यदि बौद्धिक और एंद्रिक आत्माओं को एक

ही आलिंगन में आबद्ध रखा जाए,

तो उन्हें पृथक होने से बचाया जा सकता है।

जब कोई अपनी प्राणवायु को अपनी ही एकाग्रता

द्वारा नमनीयता की चरम सीमा तक पहुंचा दे,

तो वह व्यक्ति शिशुवत कोमल हो जाता है।

जब वह कल्पना के अतिशय रहस्यमय दृश्यों

को झाड़-पोंछ कर साफ कर लेता है, तो वह निर्विकार हो जाता है।

द्वैत की हम बात सुनते हैं: एक ही है सत्य। लेकिन फिर भी, अद्वैत की भी जो बात करते हैं, वे भी शरीर और आत्मा को दो हिस्सों में बांट कर चलते हैं। जो अद्वैत का विचार रखते हैं, वे भी अपने शरीर और अपनी आत्मा के बीच पृथकता मानते हैं। और जब शरीर और आत्मा में भेद होगा, तो जगत और परमात्मा में भेद अनिवार्य हो जाता है। भेद की जरा सी स्वीकृति द्वैत को निर्मित कर देती है। Continue reading

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ताओ उपनिषाद (भाग–2) प्रवचन–23

 ताओ उपनिषद—(भाग-2)

ओशो

(ओशो द्वारा लाओत्‍से के ‘ताओ तेह किंग’ पर दिए गए 127 प्रवचनों में से 21 (तेईस से तैंतालीस) अमृत प्रवचनों का अपूर्व संकलन।)

 

लाओत्‍से ने जो भी कहा है, वह पच्‍चीस सौ साल पुराना जरूर है, लेकिन एक अर्थों में इतना ही नया है। जैसे सुबह की ओस की बूंद नई होती है। नया इसलिए है कि उस पर अब तक प्रयोग नहीं हुआ। नया इसलिए है कि मनुष्‍य की आत्‍मा उस रास्‍ते पर एक कदम भी अभी नहीं चली। रास्‍ता बिलकुल अछूता और कुवांरा है।

पुराना इसलिए है कि पच्‍चीस सौ साल पहले लाओत्‍से ने उसके संबंध में खबर दी। लेकिन नया इसलिए है कि उस खबर को अब तक सुना नहीं गया है। और आज उस खबर को सुनने की सर्वाधिक जरूरत आ गई है। जितनी कि कभी नहीं थी।

ओशो

सफलता के खतरे, अहंकार की पीड़ा और स्वर्ग का द्वार—(प्रवचन—तेईसवां)

अध्याय 9 : सूत्र 1 व 2

आशातीत सफलता के खतरे

  1. किसी भरे हुए पात्र को ढोने की कोशिश करने की

अपेक्षा उसे अधजल छोड़ना ही श्रेयस्कर है।

यदि आप तलवार की धार को बार-बार महसूस करते रहें,

तो दीर्घ अवधि तक उसकी तीक्ष्णता नहीं टिक सकती। Continue reading

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गीता दर्शन (भाग–4) प्रवचन–2

मृत्यु-क्षण में हार्दिक प्रभु-स्मरण—(प्रवचन—दूसरा)

 

अध्याय—8

 

अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्।

अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर।। 4।।

अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।

यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः।। 5।।

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।

तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः।। 6।।

उत्पत्ति-विनाश धर्म वाले सब पदार्थ अधिभूत हैं और हिरण्यमय पुरुष अधिदैव हैं और हे देहधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन, इस शरीर में मैं ही अधियज्ञ हूं।

और जो पुरुष अंतकाल में मेरे को ही स्मरण करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है, वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है।

कारण कि हे कुंतीपुत्र अर्जुन, यह मनुष्य अंतकाल में जिस-जिस भी भाव को स्मरण करता हुआ शरीर को त्यागता है, उस-उस को ही प्राप्त होता है।

परंतु सदा उस ही भाव को चिंतन करता हुआ, क्योंकि सदा जिस भाव का चिंतन करता है, अंतकाल में भी प्रायः उसी का स्मरण होता है। Continue reading

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गीता दर्शन (भाग-4) प्रवचन–1

 

गीता दर्शन (भाग—4)

ओशो

 

(ओशो द्वारा श्रीमद्भगवद्गीता के अध्‍याय आठ ‘अक्षर—ब्रह्म—योग’ एंव अध्‍याय नौ ‘राजविद्या—राजगुह्म—योग’ पर दिए गए चौबीस अमृत प्रवचनों का अपूर्व संकलन।)

 

कृष्‍ण ने यह गीता कही—इसलिए नहीं कि कह कर सत्‍य को कहा जा सकता है। कृष्‍ण से बेहतर यह कौन जानेगा कि सत्‍य को कहा नहीं जा सकता है। फिर भी कहा; करूणा से कहा।

सभी बुद्धपुरूषों ने इसलिए नहींबोला है कि बोल कर तुम्‍हें समझाया जा सकता है। बल्‍कि इसलिए बोला है कि बोलकर ही तुम्‍हें प्रतिबिंब दिखाया जा सकता है।

प्रतिबिंब ही सही—चाँद की थोड़ी खबर तो ले आयेगा। शायद प्रति बिंब से प्रेम पेदा हो जाए। और तुम असली की तलाश करनेलगो, असलीकी खोज करने लगो, असली की पूछताछ शुरू कर दो।

ओशो


स्वभाव अध्यात्म है—(प्रवचन—पहला)

 

अध्याय—8

 

श्रीमद्भगवद्गीता (अथ अष्टमोऽध्यायः)

अर्जुन उवाच

किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम।

अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते।। 1।।

अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन।

प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः।। 2।।

श्रीभगवानुवाच

अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते।

भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः।। 3।।

अर्जुन बोला, हे पुरुषोत्तम, जिसका आपने वर्णन किया, वह ब्रह्म क्या है, और अध्यात्म क्या है तथा कर्म क्या है, और अधिभूत नाम से क्या कहा गया है तथा अधिदैव नाम से क्या कहा जाता है?

और हे मधुसूदन, यहां अधियज्ञ कौन है, और वह इस शरीर में कैसे है, और युक्त चित्त वाले पुरुषों द्वारा अंत समय में आप किस प्रकार जानने में आते हो?

श्रीकृष्ण भगवान बोले, हे अर्जुन, परम अक्षर अर्थात जिसका कभी नाश नहीं हो, ऐसा सच्चिदानंदघन परमात्मा तो ब्रह्म है और अपना स्वरूप अर्थात स्वभाव अध्यात्म नाम से कहा जाता है तथा भूतों के भाव को उत्पन्न करने वाला जो विसर्ग अर्थात त्याग है, वह कर्म नाम से कहा गया है। Continue reading

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गीता–दर्शन (भाग–3) प्रवचन–31

धर्म का सार: शरणागति—(प्रवचन—इकतीसवां)

 अध्याय –7

 इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत।

सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परंतप।। 27।।

येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्।

ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः।। 28।।

 

हे भरतवंशी अर्जुन, संसार में इच्छा और द्वेष से उत्पन्न हुए सुख-दुख आदि द्वंद्व रूप मोह से संपूर्ण प्राणी अति अज्ञानता को प्राप्त हो रहे हैं। परंतु निष्काम भाव से श्रेष्ठ कर्मों का आचरण करने वाले जिन पुरुषों का पाप नष्ट हो हे गया है, वे रागद्वेषादि द्वंद्व रूप मोह से मुक्त हुए और दृढ़ निश्चय वाले पुरुष मेरे को सब प्रकार से भजते हैं।

 

प्रभु का स्मरण भी उन्हीं के मन में बीज बनता है, जो इच्छाओं, द्वेषों और रागों के घास-पात से मुक्त हो गए हैं। जैसे कोई माली नई जमीन को तैयार करे, तो बीज नहीं बो देता है सीधे ही। घास-पात को, व्यर्थ की जड़ों को उखाड़कर फेंकता है, भूमि को तैयार करता है, फिर बीज डालता है। Continue reading

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गीता दर्शन (भाग–3) प्रवचन–30

कामना और प्राथना—( प्रवचन—तीसवां)

 

अध्याय—7

अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्।

देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि।। 23।।

परंतु उन अल्पबुद्धि वालों का वह फल नाशवान है तथा वे देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त मेरे को ही प्राप्त होते हैं।

 

कामनाओं से प्रेरित होकर की गई प्रार्थनाएं जरूर ही फल लाती हैं। लेकिन वे फल क्षणिक ही होने वाले हैं; वे फल थोड़ी देर ही टिकने वाले हैं। कोई भी सुख सदा नहीं टिक सकता, न ही कोई दुख सदा टिकता है। सुख और दुख लहर की तरह आते हैं और चले जाते हैं। Continue reading

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ताओ उपनिषाद (भाग–1) प्रवचन–22

लाओत्से सर्वाधिक सार्थक–वर्तमान विश्व-स्थिति में—(प्रवचन—बाईसवां)

प्रश्न-सार

लाओत्से पर बोलने के पीछे प्रेरणा क्या है?

 

लाओत्से ऊर्ध्वगमन के विपरीत निम्नगमन की बात क्यों करते हैं?

 

अहंकार भी यदि प्राकृतिक है तो उसे हटाएं क्यों?

 

कोई स्त्री अब तक धर्म-प्रणेता क्यों नहीं हुई?

 

यदि ज्ञानी स्त्रैण-चित्त हैं तो मोहम्मद और कृष्ण युद्ध में क्यों गए?

 

क्या साधारण आदमी भी निरहंकार को प्राप्त हो सकता है? Continue reading

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ताओ उपनिषाद (भाग–1) प्रवचन–21

जल का स्वभाव ताओ के निकट है—(प्रवचन—इक्‍कीसवां)

 

अध्याय 8 : सूत्र 1, 2 व 3

जल

  1. सर्वोत्कृष्टता जल के सदृश होती है।

जल की महानता पर-हितैषणा में निहित होती है,

और उस विनम्रता में होती है,

जिसके कारण वह अनायास ही ऐसे

निम्नतम स्थान ग्रहण करती है,

जिनकी हम निंदा करते हैं।

इसीलिए तो जल का स्वभाव ताओ के निकट है।

 

  1. आवास की श्रेष्ठता स्थान की उपयुक्तता में होती है,

मन की श्रेष्ठता उसकी अतल निस्तब्धता में,

संसर्ग की श्रेष्ठता पुण्यात्माओं के साथ रहने में,

शासन की श्रेष्ठता अमन-चैन की स्थापना में,

कार्य-पद्धति की श्रेष्ठता कर्म की कुशलता में,

और किसी आंदोलन के सूत्रपात की श्रेष्ठता उसकी सामयिकता में है।

 

  1. और जब तक कोई श्रेष्ठ व्यक्ति अपनी निम्न

स्थिति के संबंध में कोई वितंडा खड़ा नहीं करता,

तब तक वह समादृत होता है। Continue reading

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ताओ उपनिषाद (भाग–1) प्रवचन–20

धन्य हैं वे जो अंतिम होने को राजी हैं—(प्रवचन—बीसवां)

अध्याय 7 : सूत्र 1 व 2

सर्व-मंगल हेतु जीना

 1. स्वर्ग और पृथ्वी दोनों ही नित्य हैं।

इनकी नित्यता का कारण है

कि ये स्वार्थ-सिद्धि के निमित्त नहीं जीते;

इसलिए इनका सातत्य संभव होता है।

 2. इसलिए तत्वविद (संत) अपने व्यक्तित्व

को पीछे रखते हैं;

फिर भी वे सबसे आगे पाए जाते हैं।

वे निज की सत्ता की उपेक्षा करते हैं,

फिर भी उनकी सत्ता सुरक्षित रहती है।

चूंकि उनका अपना कोई स्वार्थ नहीं होता,

इसलिए उनके लक्ष्यों की पूर्ति होती है।

जीवन दो प्रकार का हो सकता है। एक, इस भांति जीना, जैसे मैं ही सारे जगत का केंद्र हूं। इस भांति, जैसे सारा जगत मेरे निमित्त ही बनाया गया है। इस भांति कि जैसे मैं परमात्मा हूं और सारा जगत मेरा सेवक है। एक जीने का ढंग यह है। एक जीने का ढंग इससे बिलकुल विपरीत है। ऐसे जीना, जैसे मैं कभी भी जगत का केंद्र नहीं हूं, जगत की परिधि हूं। ऐसे जीना, जैसे जगत परमात्मा है और मैं केवल उसका एक सेवक हूं। Continue reading

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तंत्र–सूत्र (भाग–1) प्रवचन–10

केंद्रित, संतुलित और आप्‍तकाम होओ—(प्रवचन—दसवां)

प्रश्‍नसार:

1—क्‍या आत्‍मोपलब्‍धि बुनियादी आवश्‍यकता है?

 

2—मनन, एकाग्रता और ध्‍यान पर प्रकाश डालें।

 

3—नाभि—केंद्रके विकास के लिए जो प्रशिक्षण है

   वह ह्रदय और मस्‍तिक के केंद्रों के प्रशिक्षण

   से भिन्‍न कैसे है?

 

4—क्‍या सभी बुद्धपुरूष नाभि—केंद्रित है? Continue reading

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ताओ उपनिषाद (भाग–1) प्रवचन–19

स्त्रैण-चित्त के अन्य आयाम: श्रद्धा, स्वीकार और समर्पण—(प्रवचन—उन्‍नीसवां)

प्रश्न-सार

अस्तित्व के स्त्रैण रहस्य पर कुछ और विस्तार से प्रकाश डालने की कृपा करें।

 प्रश्न: भगवान श्री, कल आपने अस्तित्व के स्त्रैण रहस्य पर चर्चा की है। इस विषय में कुछ और विस्तार से प्रकाश डालने की कृपा करें।

स्तित्व के सभी आयाम स्त्रैण और पुरुष में बांटे जा सकते हैं।

स्त्री और पुरुष का विभाजन केवल यौन-विभाजन, सेक्स डिवीजन नहीं है। लाओत्से के हिसाब से स्त्री और पुरुष का विभाजन जीवन की डाइलेक्टिक्स है, जीवन का जो द्वंद्वात्मक विकास है, जो डाइलेक्टिकल एवोल्यूशन है, उसका अनिवार्य हिस्सा है। Continue reading

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ताओ उपनिषाद (भाग–1) प्रवचन–18

घाटी-सदृश, स्त्रैण व रहस्यमयी परम सत्ता—(प्रवचन—अठाहरवां)

अध्याय 6 : सूत्र 1 व 2

घाटी की आत्मा

  1. 1. घाटी की आत्मा कभी नहीं मरती, नित्य है।

इसे हम स्त्रैण रहस्य, ऐसा नाम देते हैं।

इस स्त्रैण रहस्यमयी का द्वार

स्वर्ग और पृथ्वी का मूल स्रोत है।

  1. 2. यह सर्वथा अविच्छिन्न है;

इसकी शक्ति अखंड है;

इसका उपयोग करो,

और इसकी सेवा सहज उपलब्ध होती है।

जिसका जन्म है, उसकी मृत्यु भी होगी। जो प्रारंभ होगा, वह अंत भी होगा। वही केवल मृत्यु के पार हो सकता है, जिसका जन्म न हो। और वही केवल अनंत हो सकता है, जो अनादि हो। Continue reading

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गीता–दर्शन (भाग–3) प्रवचन–29

श्रद्धा का सेतु—(प्रवचन—उन्‍नतीवां)

 अध्याय—7

 यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति।

तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्।। 21।।

स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते।

लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान्।। 22।।

 

जो-जो सकामी भक्त जिस-जिस देवता के स्वरूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, उस-उस भक्त की मैं उस ही देवता के प्रति श्रद्धा को स्थिर करता हूं। तथा वह पुरुष उस श्रद्धा से युक्त हुआ उस देवता के पूजन की चेष्टा करता है और उस देवता से मेरे द्वारा ही विधान किए हुए उन इच्छित भोगों को निःसंदेह प्राप्त होता है।

 प्रभु की खोज में किस नाम से यात्रा पर निकला कोई, यह महत्वपूर्ण नहीं है; और किस मंदिर से प्रवेश किया उसने, यह भी महत्वपूर्ण नहीं है। किस शास्त्र को माना, यह भी महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण सिर्फ इतना है कि उसका भाव श्रद्धा का था। वह राम को भजता है, कि कृष्ण को भजता है, कि जीसस को भजता है, इससे Continue reading

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गीता दर्शन (भाग–3) प्रवचन–28

मुखौटों से मुक्ति—(प्रवचन—अट्ठाईवां)

 अध्याय—7

 उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्।

आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्।। 18।।

बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।

वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः।। 19।।

यद्यपि ये सब ही उदार हैं अर्थात श्रद्धासहित मेरे भजन के लिए समय लगाने वाले होने से उत्तम हैं, परंतु ज्ञानी तो साक्षात मेरा स्वरूप ही है, ऐसा मेरा मत है, क्योंकि वह स्थिर बुद्धि ज्ञानी भक्त अति उत्तम गति-स्वरूप मेरे में ही अच्छी प्रकार स्थित है। और जो बहुत जन्मों के अंत के जन्म में तत्वज्ञान को प्राप्त हुआ ज्ञानी, सब कुछ वासुदेव ही है, इस प्रकार मेरे को भजता है, वह महात्मा अति दुर्लभ है।

 

प्रभु को जो जानता है, वह उस जानने में ही उसके साथ एक हो जाता है। सब दूरी अज्ञान की दूरी है। सब फासले अज्ञान के फासले हैं। परमात्मा को दूर से जानने का कोई भी उपाय नहीं है, परमात्मा होकर ही जाना जा सकता है। Continue reading

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तंत्र–सूत्र (भाग–1) प्रवचन–9

केंद्रीभूत होने की कुछ विधियां—प्रवचन—नौवां

सूत्र:

 13—या कल्‍पना करो कि मोर की पूंछ के पंचरंगें वर्तुल

निस्‍सीम अंतरिक्ष में तुम्‍हारी पाँच इंद्रियां है।

अब उनके सौंदर्य को भीतर ही धुलने दो।

उसी प्रकार शून्‍य में या दीवार पर किसी बिंदु के साथ

कल्‍पना करो, जब तक कि वह बिंदु विलीन न हो जाए।

 14—अपने पूरे अवधान को अपने मेरूदंड के मध्‍य में

कमल तुतु सी कोमल स्‍नायू में स्‍थित करो।

और उसमें रूपांतरित हो जाओ।

 नुष्‍य अपने केंद्र के साथ जन्म लेता है, लेकिन उसे उसकी जानकारी जरा भी नहीं रहती। मनुष्य अपने केंद्र को जाने बिना रह सकता है, लेकिन केंद्र के बिना वह हो नहीं सकता। और यह केंद्र मनुष्य और अस्तित्व के बीच की कड़ी है। यह मूल है, आधार है। Continue reading

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अष्‍टावक्र: महागीता (भाग–5) प्रवचन–7

दृश्य से द्रष्टा में छलांग—(प्रवचन—सातवां)

दिनांक 17 जनवरी, 1977;

श्री ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क, पूना।

सूत्र:

क्यात्मनो दर्शन तस्य यदृष्टमवलंबते।

धीरास्तं तं न पश्यति पश्यंत्यात्मानमव्ययम्।।216।।

क्य निरोधो विमूढ़स्य यो निर्बंध करोति वै।

स्वारामस्यैव धीरस्य सर्वदाऽसावकृत्रिम:।।217।।

भावस्य भावक: कश्चिन्न किचिद्भावकोऽपर:।

उभयाभावक: कश्चिदेवमेव निराकुल:।।218।।

शुद्धमद्वयमात्मान भावयति कुबुद्धय:।

न तु जानन्ति समोहाद्यावज्जीवमनिर्वृता।।219।।

मुमुक्षोर्बुद्धिरालबमतरेण न विद्यते।

निरालंबैव निष्कामा बुद्धिर्मुक्तस्य सर्वदा।।22०।।

क्यात्मनोदर्शनतस्ययद्दृष्टमवलबते।

धीरास्ततनपश्यंतिपश्यंत्यात्मानमव्ययम्।।

 

सको आत्मा का दर्शन कहा है, जो दृश्य का अवलंबन करता है? धीर पुरुष दृश्य को नहीं देखते हैं और अविनाशी आत्मा को देखते है।’ Continue reading

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गीता दर्शन (भाग–3) प्रवचन–27

जीवन अवसर है—(प्रवचन—सत्‍ताईवां)

 अध्याय -7

 न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः।

माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः।। 15।।

चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन।

आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ।। 16।।

माया द्वारा हरे हुए ज्ञान वाले और आसुरी स्वभाव को धारण किए हुए तथा मनुष्यों में नीच और दूषित कर्म करने वाले मूढ़ लोग तो मेरे को नहीं भजते हैं।

और हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन, उत्तम कर्म वाले अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी अर्थात निष्कामी, ऐसे चार प्रकार के भक्तजन मेरे को भजते हैं।

 

कौन करता है प्रभु का स्मरण, इस संबंध में कृष्ण ने कुछ बातें कही हैं।

मनुष्य जाति को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। और जब दुनिया से सारे वर्ग मिट जाएंगे, तब भी वही विभाजन अंतिम सिद्ध होगा। Continue reading

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गीता दर्शन (भाग–3) प्रवचन–26

प्रकृति और परमात्मा—(प्रवचन—छबीसवां)

 अध्याय-7

ये चैव सात्त्विा भावा राजसास्तामसाश्च ये।

मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि।। 12।।

और भी जो सत्व गुण से उत्पन्न होने वाले भाव हैं और जो रजोगुण से तथा तमोगुण से होने वाले भाव हैं, उन सबको तू मेरे से ही होते हैं ऐसा जान, परंतु वास्तव में उनमें मैं और वे मेरे में नहीं हैं।

 प्रकृति परमात्मा में है, लेकिन परमात्मा प्रकृति में नहीं है। यह विरोधाभासी, पैराडाक्सिकल सा दिखने वाला वक्तव्य अति गहन है। इसके अर्थ को ठीक से समझ लेना उपयोगी है।

कृष्ण कहते हैं, सत्व, रज, तम, तीनों गुणों से बनी जो प्रकृति है, वह मुझमें है। लेकिन मैं उसमें नहीं हूं।

ऐसा करें कि एक बड़ा वर्तुल खींचें अपने मन में, एक बड़ा सर्किल। उसमें एक छोटा वर्तुल भी खींचें। एक बड़ा वर्तुल खींचें, और उसके भीतर एक छोटा वर्तुल खींचें, तो छोटा वर्तुल तो बड़े वर्तुल में होगा, लेकिन बड़ा वर्तुल छोटे वर्तुल में नहीं होगा। Continue reading

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ताओ उपनिषाद (भाग–1) प्रवचन–17

विरोधों में एकता और शून्य में प्रतिष्ठा—(प्रवचन—स्‍तहरवां)

अध्याय 5 : सूत्र 2

स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का आकाश कैसा धौंकनी की तरह है!

इसे रिक्त कर दो, फिर भी इसकी शक्ति अखंडित रहती है;

इसे जितना ही चलाओ, उतनी ही हवा निकलती है।

शब्द-बाहुल्य से बुद्धि निःशेष होती है।

इसलिए अपने केंद्र में स्थापित होना ही श्रेयस्कर है।

जीवन बहुत से विरोधी आधारों पर निर्मित होता है। जैसा दिखाई पड़ता है, वैसा ही नहीं; दिखाई पड़ने वाले तत्वों के पीछे न दिखाई पड़ने वाले तत्व होते हैं, जो बिलकुल ही विपरीत होते हैं।

विपरीत का हमें स्मरण भी नहीं आता। यदि हम जन्म देखते हैं, तो मृत्यु की हमें कोई सूचना नहीं मिलती। और अगर जन्म के क्षण में कोई मृत्यु का खयाल करे, तो हम उसे पागल कहेंगे। लेकिन जन्म के पीछे मृत्यु छिपी रहती है। और जो जानता है, वह जन्म में मृत्यु को तत्क्षण देख लेता है। ऐसा ही जब कोई मर रहा हो, तो उसकी मरणशय्या के पास खड़े होकर हमें उसके जन्म का कोई भी खयाल नहीं आता। Continue reading

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ताओ उपनिषाद (भाग–1) प्रवचन–16

निष्पक्ष हैं तीनों–स्वर्ग, पृथ्वी और संत—(प्रवचन—सौहलवां)

 अध्याय 5 : सूत्र 1

प्रकृति

स्वर्ग और पृथ्वी को सदय होने की

कामना उत्प्रेरित नहीं करती;

वे सभी प्राणियों के साथ वैसा ही

व्यवहार करते हैं, जैसे कोई घास-निर्मित कुत्तों

से व्यवहार करता है।

तत्वविद (संत) भी सदय नहीं होते।

वे सभी मनुष्यों के साथ वैसा ही व्यवहार

करते हैं, जैसा घास-निर्मित कुत्तों से किया जाता है।

पृथ्वी पर जितने जानने वाले लोग हुए हैं, उन सब में लाओत्से बहुत अद्वितीय है।

कृष्ण की गीता में कोई साधारण बुद्धि का व्यक्ति भी कुछ जोड़ना चाहे तो जोड़ सकता है। महावीर के वचनों में या बुद्ध और क्राइस्ट के वक्तव्यों में कुछ भी मिश्रित किया जा सकता है। और पता लगाना बहुत कठिन होगा। क्योंकि उनके वक्तव्य ऐसे हैं कि साधारण मनुष्य की नीति और समझ के प्रतिकूल नहीं पड़ते। और इसलिए दुनिया के सभी शास्त्र प्रक्षिप्त हो जाते हैं; इंटरपोलेशन हो जाता है। दूसरी पीढ़ियां उनमें बहुत कुछ जोड़ देती हैं। उन शास्त्रों को शुद्ध रखना असंभव है। Continue reading

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