दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय–37)

(अध्‍याय—सेतीसवां)

शो खिड़की के पास वाली सीट पर बैठ जाते हैं और मैं उनके बाजू में बैठ जाती हूं। वे मुझे कहते हैं किए उन्हें आराम करना है और मैं इस बात का ध्यान रखूं कि कोई उन्हें परेशान न करे। मैं स्वीकृति में अपना सिर हिलाती हूं और वे अपनी आंखें बंद कर लेते हैं। पढना जारी रखे

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दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय–36)

(अध्‍याय—छत्‍तीसवां)

सुबह पूना से बंबई जाने वाली ‘गाड़ी डेकन क्वीन’ पर दो फर्स्ट क्लास की टिकटें बुक की गई हैं। मैं बहुत —उत्साहित हूं और गाड़ी में साढ़े—तीन घंटे तक ओशो के साथ बैठने की राह देख रही हूं। सोहन हमें गाड़ी में खाने के लिए कुछ नाश्ता बनाकर देना चाहती है, पर ओशो उसे कहते हैं कि वह इस सबकी चिंता में न पड़े।’ पढना जारी रखे

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दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय–35)

(अध्‍याय—पैतीसवां)

शो पूना में सोहन के घर ठहरे हुए हैं। दोपहर को कोई कहता है, ‘आज पूर्णिमा है।’ मैं जानती हूं कि ओशो पूर्णिमा को नौका—विहार के लिए जाना पसंद करते हैं, इस बारे में मैं उनसे पूछती हूं। वे सहमत हो जोत हैं और सोहन के पति, बाफना जी को, जो कि बोट क्लब के. सदस्य हैं, कहते हैं कि एक बड़ी नाव बुक कर लें और अन्य मित्रों को भी आमंत्रित कर लें, पढना जारी रखे

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सुन भई साधो–(प्रवचन–16)

अभीप्सा की आग: अमृत की वर्षा–(प्रवचन–सोहलवां)

सूत्र:

मो को कहां ढूंढ़ो रे बंदे, मैं तो तेरे पास में।

ना मैं बकरी ना मैं भेड़ी, ना मैं छुरी गंड़ास में।।

 

नहिं खाल में नहिं पोंछ में, ना हड्डी ना मांस में।

ना मैं देवल ना मैं मस्जिद, ना काबे कैलास में।। पढना जारी रखे

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सुन भई साधो–(प्रवचन–15)

धर्म और संप्रदाय में भेद—(प्रवचन—पंद्रहवां)

सूत्र:

साधो देखो जग बौराना।

सांची कहौं तो मारन धावै, झूठे जग पतियाना।।

हिंदू कहत है राम हमारा, मुसलमान रहमाना।

आपस में दोउ लड़े मरतु हैं, मरम कोई नहिं जाना।।

बहुत मिले मोहि नेमी धरमी, प्रात करै असनाना।

आतम छोड़ि पखाने पूजैं, तिनका थोथा ग्याना।।

आसन मारि डिम्भ धरि बैठे, मन में बहुत गुमाना। पढना जारी रखे

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दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय–34)

(अध्‍याय—चौतीसवां)

शो पूना मे सोहन के घर पर ठहरे हुए हैं और रात के भोजन के बाद एक एयरकंडीशंड कमरे में आराम कर रहे हैं। मैं उनके चरणों के पास बैठी हुई हूं और अचानक उनके पांव दबाने की मेरी बडी प्रबल इच्‍छा जागती है। मैं उनसे पूछती हूं और वे हामी भर देते हैं। जैसे ही मैं उनके दाएं पांव के तलुए को दबाने लगती हूं? वे कहते हैं, हर शिष्य पैर से शुरु करता है और’ अतत: गले तक पहुंच जाता है।’ पढना जारी रखे

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दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय–33)

(अध्‍याय—चौतीसवां)

मैं ओशो के साथ सोहन के घर ठहरी हुई हूं। ओशो हमारे साथ डाइनिंग टेबल पर बैठकर भोजन लेना पसंद करते हैं। सोहन सच ही बहुत बढ़िया खाना बनाती है। सुबह के प्रवचन के —बाद हम लोग 10—15 बजे के करीब घर पहुंचते हैं। एक ही घंटे में सोहन बहुत सारे स्वादिष्ट व्यंजनों के साथ भोजन तैयार कर लेती है। 11—30 बजे तक हम सभी लोग —बीच में फूलों से सजी बड़ी सी डाइनिंग टेबल के इर्द—गिर्द बैठ जाते हैं। पढना जारी रखे

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दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय–32)

(अध्‍याय—बत्‍तीसवां)

भारत—भर में भ्रमण करते हुए, ओशो जब भी पूना में होते हैं तो वे सोहन के घर रुकना पसंद करते हैं। मैं उनके साथ सोहन के घर पर रहने के सुअवसर को कभी खोना नहीं चाहती। सोहन, ओशो व उनके लोगों के प्रेम में दीवानी है। —जब ओशो. उसके घर में रुके होते हैं तो उसका घर तीर्थ बन जाता है। सैकड़ों लोग. रोज वहां आते हैं और वह सबका इतने प्रेम और स्नेह से स्वागत सत्कार करती है कि लोग अपने आनंद के आंसुओ को रोक नहीं पाते। पढना जारी रखे

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सुन भई साधो–(प्रवचन–14)

विराम है द्वार राम का—(प्रवचन—चौहदवां)

सूत्र:

घर घर दीपक बरै, लखै नहिं अंध है।

लखत लखत लखि परै, कटै जमफंद है।।

कहन सुनन कछु नाहिं, नहिं कछु करन है।

जीते—जी मरि रहै, बहुरि नहिं मरन है।।

जोगी पड़े वियोग, कहैं घर दूर है।

पासहि बसत हजूर, तू चढ़त खजूर है।।

बाह्मन दिच्छा देत सो, घर घर घालिहै। पढना जारी रखे

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दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्याय–31)

(अध्‍याय—इक्‍कतीसवां)

माउंट आबू का ध्यान शिविर पूर्णिमा की रात को पूरा हुआ। दोपहर को मैं कुछ मित्रों से रात को नौका—विहार के लिए चलने की बात करती हूं। हम सब यह सुझाव लेकर ओशो के पास पहुंचते हैं। जब हम उनसे पूछते हैं, तो वे कहते हैं, हम सभी नावें रिजर्व कर लें और रात्रि ध्यान के बाद सभी लोग नौका—विहार के लिए चल सकते हैं।’ पढना जारी रखे

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दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्याय–30)

अध्‍याय—तीसवां

माउंट आबू के एक शिविर के बाद, जहां ओशो ने पहली बार सक्रिय ध्‍यान विधि का प्रयोग करवाया, हम अहमदाबाद लौट आए हैं।

वे सक्रिय ध्यान के विषय में लोगों की राय जानने को उत्सुक हैं। मैं जब उन्हें यह बताती हूं कि कुछ मित्र कह रहे थे कि आप उनकें दिमाग के पेंच ढीले कर रहे हैं, तो वे हंसकर कहते हैं, ‘नहीं, पेंच ढीले करने में मेरा कोई रस नहीं है, उन्हें तो वे लोग फिर कस लेंगे। पढना जारी रखे

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दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्याय–29)

(अध्‍याय—उन्‍नतीसवां)

जिन मित्रों ने बड़ौदा में विभिन्न स्थानों पर उनकी मीटिंगों का आयोजन किया है, वे बड़े विचित्र लोग हैं। अन्न शाम ओशो कहीं बोलने वाले हैं लेकिन ये लोग हमें उस जगह का नाम बताने को तैयार नहीं हैं। वे लोग ओशो को अकेले ही एक कार में अपने साथ ले जाना चाहते हैं। मैं बहुत नाराज हूं। किसी भी कीमत पर मैं उनके प्रवचन से चूकना नहीं चाहती। पढना जारी रखे

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दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय–28)

(अध्‍याय—अट्ठाईसवां)

ज ओशो बड़ौदा यूनिवर्सिटी में कॉलेज के विद्यार्थियों को संबोधित कर रहे हैं। हजारों विद्यार्थी उनको सुनने के लिए इकट्ठे हुए तैं। हॉल खचाखच भरा हुआ है और उसके सब दरवाजे खुले हुए हैं।

मैं अपना छोटा सा कैसेट रिकार्डर लिए पोडियम पर उनके पीछे—पीछे जाती हूं। जैसे ही हम पोडियम पर. पहुंचते हैं हॉल तालियों की गड़गड़ाहट गज उठता है। वातावरण में बहुत उत्साह है। वे ”युवक और यौन’’ विषय पर बोलने वाले हैं। पढना जारी रखे

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दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय–27)

(अध्‍याय—सत्‍ताईस्‍वां)

ज, भोजन के बाद, मैं उनसे कहती हूं कि मैं अपना कमरा भीतर से बंद कर ले—क्योंकि मैं भी आराम करना चाहती हूं। ते कहते हैं, लोग आकर दरवाजा खटखटाने लगेंगे।’ मैं उनसे कहती हूं कि मैं अपार्टमेंट का मुख्य द्वार ही बंद कर रही हूं और साथ ही कॉल बेल भी बंद कर दूंगी। मैं उन्हें आश्वासन देती हूं कि उन्हें किसी तरह की तकलीफ नहीं होगी। मुझे अपने इरादे पर बिलकुल अड़ा हुआ देखकर वे कहते हैं, ठीक है, ठीक है, जो चाहे वह कर।’ पढना जारी रखे

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दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय–26)

(अध्‍याय—छब्‍बीस)

इस बार, मैं ओशो के साथ अहमदाबाद आई हूं जहां वे गीता पर प्रवचन दे रहे हैं।

सुबह प्रवचन के बाद वे 11 —3० बजे भोजन लेते हैं और फिर कुछ घंटे के लिए आराम करते हैं। मैं बाहर दरवाजे के पास स्टूल पर पहरेदारी करने के लिए बैठ जाती हूं। गर्मियों के दिन हैं और मुझे भी नींद आने लगती है। मैं वहीं स्टूल पर बैठे—बैठे ही ऊंघने लगती हूं। स्वयं को जगाए रखने के लिए मैं एक किताब पढ़ने लगती हूं। किसी तरह मैं वहां बैठी रहती हूं और इस बात का ख्याल रखती हूं कि कोई किसी भी तरह उनके आराम में बाधा न डाले। पढना जारी रखे

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सुन भई साधो–(प्रवचन–13)

मन के जाल हजार—(प्रवचन—तैरहवां)

सूत्र:

चलत कत टेढ़ौ रे।

नऊं दुवार नरक धरि मूंदै, तू दुरगंधि कौ बेढ़ौ रे।।

जे जारै तौ होइ भसम तन, रहित किरम उहिं खाई।

सूकर स्वान काग को भाखिन, तामै कहा भलाई।।

फूटै नैन हिरदै नाहिं सूझै, मति एकै नहिं जानी।

माया मोह ममता सूं बांध्यो, बूड़ि मुवौ बिन पानी।।

बारू के घरवा मैं बैठो, चेतत नहिं अयांना।

कहै कबीर एक राम भगति बिन, बूड़े बहुत सयांना।। पढना जारी रखे

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स्‍वर्णिम क्षणों की सुमधुर यादें–(अध्‍याय–62)

अतित से भविष्‍य की और—(अध्‍याय—बाष्‍ठवां)

आज हम ठहर कर देख सकते हैं कि कुछ वर्ष पूर्व ओशो जैसे मनीषी ने अपने कार्य की शुरुआत की, भारत भर में घूम—घूम कर प्रवचन दिये, नव—संन्यास आदोंलन से दुनिया को परिचित करवाया, आज के मानव के लिए बेहद उपयुक्त ध्यान विधियों का निर्माण किया, पूरी दुनिया के प्रतिभावान लोगों को अपने आसपास इकट्ठा किया, दुनिया के सर्वश्रेष्ठ शक्ति संपन्न देश अमरीका में जाकर सवा सौ एकड़ जमीन पर अपनी तरह के अनूठे शहर का निर्माण किया, पढना जारी रखे

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स्‍वर्णिम क्षणों की सुमधुर यादें–(अध्‍याय–61)

उसकी अनुकंपा अपार है……(अध्‍याय—इक्‍ष्‍ठवां)

मारे देश में गुटखा और तंबाखू का खूब चलन है। पान की लाली रचाकर, हर कहीं उस लाली के निशान छोडना आम बात है। जिन लोगों को यह लत नहीं होती शायद वे कभी भी नहीं समझ पाते हैं कि आखिर क्यों कोई इस गुटखे या तंबाखू का ऐसा आदी हो जाता है। लेकिन जिन लोगों को इसकी लत लग जाती है वे कितनी ही कोशिश कर ले यह लत या तो उन्हें मौत तक ले जाती है या मौत आने पर यह लत उन्हें छोड देती है। पढना जारी रखे

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दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय–25)

अध्‍याय—(पच्‍चीसवां)

आज रात मुझे छोड्कर बाकी सब लोग बाहर भोजन पर गए हैं। ओशो अपने कमरे में आराम कर रहे हैं और मैं बराबर के कमरे में ही अपने बिस्तर पर लेटी हुई हूं तथा कुछ अस्वस्थ हूं। मेरे बाएं स्तन में कोई गांठ सी बनने लगी है, और जब मैंने अपने डॉक्टर को दिखाया तो उसने सलाह दी कि टाटा हॉस्पिटल में चेक कराऊं। उसे शक है कि यह गांठ कैंसर ही न हो। मैं भयभीत हूं। पढना जारी रखे

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दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय–24)

(अध्‍याय—चौबीसवां)

ओशो बाथरूम में हैं। घर का रसोइया किसी हरे जूस से आधा भरा हुआ एक कप लेकर आता है। वह कहता है, यह नीम का जूस है और ओशो सुबह उठते ही यह पीते हैं।’ वह कप को मेज पर रखकर चला जाता है। पढना जारी रखे

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सुन भई साधो–(प्रवचन–12)

धर्म कला है—मृत्यु की, अमृत की—(प्रवचन—बारहवां)

दिनांक: 12 मार्च, 1974; श्री रजनीश आश्रम, पूना

सूत्र:

जग सूं प्रीत न कीजिए,समझि मन मेरा।

स्वाद हेत लपटाइए, को निकसै सूरा।।

एक कनक अरु कामिनी, जग में दोइ फंदा।

इन पै जो न बंधावई, ताका मैं बंदा।।

देह धरै इन मांहि बास, कहु कैसे छूटै।

सीव भए ते ऊबरे, जीवत ते लूटै।। पढना जारी रखे

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स्‍वर्णिम क्षणों की सुमधुर यादें–(अध्‍याय–60)

विरोधाभास का आभास क्‍यों?—(अध्‍याय—छाठवां)

शो के बारे में अक्सर यह भी कहा जाता है कि वे बहुत विरोधाभासी हैं। पहली तो बात यह समझने की है कि ओशो ने हर देश, हर जाति, हर विषय पर बोला है। शायद ही ऐसा कोई विषय होगा जिस पर ओशो नहीं बोले। धर्म, दर्शन, कला, विज्ञान, मनोविज्ञान, साहित्य, शिक्षा कुछ भी तो नहीं छोड़ा। एक ही व्यक्ति पूरब से लेकर पश्चिम तक, उत्तर से लेकर दक्षिण तक फैली सारी मानवता के हर आयाम पर लगातार बोलता है। पढना जारी रखे

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स्‍वर्णिम क्षणों की सुमधुर यादें–(अध्‍याय–59)

सेक्‍स पर ओशो का नजरिया—(अध्‍याय—उन्‍नष्‍ठवां)

सेक्स, सेक्स, सेक्स.. .इस शब्द में कैसा जादू है कि पढ़ते, सुनते कहीं न कहीं चोट जरूर पड़ती है। क्या कोई ऐसा व्यक्ति होता है जो इस शब्द को सिर्फ शब्द की तरह सुन ले या पढ़ ले? पश्चिम ने इस विषय पर फ्रायड के बाद विचार शुरू किया। और पूरब में भारत ने चेतना की इतनी ऊंचाइयां छुई हैं कि जीवन के हर आयाम को पूर्ण स्वीकार किया है। यहां पर चार्वाक भी महर्षि कहलाए। वात्सायन और कोक भी ऋषि तुल्य माने गये। शायद इस पृथ्वी पर सेक्स के बारे में विस्तार से चर्चा सबसे पहले भारत में ही हुई है.. .हजारों वर्ष पूर्व। पढना जारी रखे

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सुन भई साधो–(प्रवचन–11)

अंतयात्र्रा के मूल सूत्र—(अध्‍याय—ग्‍यारहवां)

दिनांक: 11 मार्च, 1974;

श्री रजनीश आश्रम, पूना

सूत्र:

तेरा जन एकाध है कोई।

काम क्रोध अरु लोभ विवर्जित, हरिपद चीन्है सोई।।

राजस तामस सातिग तीन्यू, ये सब तेरी माया

चौथे पद को जे जन चीन्हैं, तिनहि परमपद पाया।।

अस्तुति निंदा आसा छाड़ै, तजै मान अभिमाना।

लोहा कंचन सम करि देखै, ते मूरति भगवाना।।

च्यंतै तो माधो च्यंतामणि, हरिपद रमै उदासा।

त्रिस्ना अरु अभिमान रहित हवै, कहै कबीर सो दासा।। पढना जारी रखे

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स्‍वर्णिम क्षणों की सुमधुर यादें–(अध्‍याय–58)

ओशो मेरी नजर में—(अध्‍याय—अठावनवां)

शो के साथ एक युग जीया है, लौटकर देखूं तो यूं लगता है कि पता नहीं कितने सालों से, सदियों से, युगों से ओशो के साथ हूं। जिस पल ओशो मिले वहां से लेकर इस पल तक सिवाय ओशो के कुछ भी तो जीवन में नहीं हुआ है। हर पल, हर समय ओशो हर श्वास में बने रहे हैं। पढना जारी रखे

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