यात्रा एक नये अायाम की……..

ओशो— एक परिचय

सत्य की व्यक्तिगत खोज से लेकर ज्वलंत सामाजिक व राजनैतिक प्रश्नों पर ओशो की दृष्टि उनको हर श्रेणी से अलग अपनी कोटि आप बना देती है। वे आंतरिक रूपांतरण के विज्ञान में क्रांतिकारी देशना के पर्याय हैं और ध्यान की ऐसी विधियों के प्रस्तोता हैं जो आज के गतिशील जीवन को ध्यान में रख कर बनाई गई हैं।DSC_1209
अनूठे ओशो सक्रिय ध्यान इस तरह बनाए गए हैं कि शरीर और मन में इकट्ठे तनावों का रेचन हो सके, जिससे सहज स्थिरता आए व ध्यान की विचार रहित दशा का अनुभव हो।
ओशो की देशना एक नये मनुष्य के जन्म के लिए है, जिसे उन्होंने ‘ज़ोरबा दि बुद्धा ‘ कहा है— जिसके पैर जमीन पर हों, मगर जिसके हाथ सितारों को, छू सकें। ओशो के हर आयाम में एक धारा की तरह बहता हुआ वह जीवन—दर्शन है जो पूर्व की समयातीत प्रज्ञा और पश्चिम के विज्ञान और तकनीक की उच्चतम संभावनाओं को समाहित करता है। ओशो के दर्शन को यदि समझा जाए और अपने जीवन में उतारा जाए तो मनुष्य—जाति में एक क्रांति की संभावना है। Continue reading

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कृष्‍ण–स्‍मृति–(प्रवचन–20)

राजपथरूप भव्य जीवनधारा के प्रतीक कृष्ण—(प्रवचन—बीसवां)

दिनांक 5 अक्‍टूबर, 1970;

प्रात:, मनाली (कुलू)

“भगवान श्री, महावीर की वीतरागता, क्राइस्ट की “होली इनडिफरेंस’, बुद्ध की उपेक्षा, कृष्ण की अनासक्ति, इनमें क्या सूक्ष्म समानता व भिन्नता है? इस पर प्रकाश डालें।’

 क्राइस्ट की तटस्थता, बुद्ध की उपेक्षा, महावीर की वीतरागता और कृष्ण की अनासक्ति, इनमें बहुत-सी समानताएं हैं, लेकिन बुनियादी भेद भी हैं। समानता अंत पर है, उपलब्धि पर है, भेद मार्ग में हैं। अंतिम क्षण में ये चारों बातें एक ही जगह पहुंचा देती हैं। लेकिन चारों के रास्ते बड़े अलग-अलग हैं।

जीसस जिसे तटस्थता कहते हैं, बुद्ध जिसे उपेक्षा कहते हैं, इनमें बड़ी गहरी समानता है। यह जगत जैसा है, इस जगत की धाराएं जैसी हैं, इस जगत के अंतर्द्वंद्व जैसे हैं, इस जगत के भेद और विरोध जैसे हैं, उनके प्रति कोई तटस्थ हो सकता है। लेकिन तटस्थता कभी भी प्रसन्नता नहीं हो सकती। Continue reading

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पतंजलि: योगसूत्र–(भाग–5) प्रवचन–99

कैवल्‍य–(प्रवचन—उन्‍नीसपवां)

योग—सूत्र—

(कैवल्‍यपाद)

विशेषदर्शिन आत्मभावभाबनाविनिवृत्तिः।।25।।

जब व्यक्ति विशेष को देख लेता है, तो उसकी आत्मभाव की भावना मिट जाती है।

 तदा विवेकनिम्नं कैबल्यप्राग्भारं चित्तम्।।28।।

तब विवेक उन्‍मुख चित्त कैबल्य की ओर आकर्षित हो जाता है।

तच्छिद्रेषु प्रत्‍ययान्‍तरणि संस्कारेंभ्‍य:।। 27।।

पूर्व के संस्कारों के बल के माध्यम से विवेक ज्ञान के अंतराल में अन्य प्रत्ययों, अवधारणाओं का उदय होता है। इनका निराकरण भी अन्य मनस्तापों की भांति किया जाना चाहिए।

हानमेषां क्लेशवदुक्तम्।।28।।

उन प्रत्ययों, अवधारणाओं से निवृत्त हो जाना क्लेशों से निवृत्ति के समान कहा गया है।

प्रसंख्यानेऽप्यकुसीदस्य सर्वथा विवेकख्यातेर्धर्ममेघ: समाधि:।। 129।।

वह जिसमें समाधि की सर्वोच्च अवस्थाओं के प्रति भी इच्छारहितता का सातत्य बना हुआ है और जो विवेक के चरम का प्रवर्तन करने में समर्थ है, उस अवस्था में प्रविष्ट हो जाता है जिसे धर्ममेध समाधि कहा जाता है।

तत: क्‍लेशकर्मनिवृत्ति:।। 130।।

तब क्लेशों एवं कर्मों से मुक्ति हो जाती हैं। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–6) प्रवचन–151

दुःख से मुक्‍ति का मार्ग: तादात्‍म’‍य का विसर्जन—(प्रवचन—पहला)

अध्‍याय—13

सार—सूत्र:

श्रीमद्भगवद्गीता अथ त्रयौदशोऽध्याय:

श्री भगवानुवाच:

ड़दं शरीर कौन्तेय क्षेत्रीमित्यीभधीयते।

एतद्यो वेत्ति तं पाहु: क्षेत्रज्ञ इति तद्धिद:।। 1।।

क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत।

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोज्ञनिं यतज्ज्ञानं मतं मम।। 2।।

तत्‍क्षेत्रं यच्च यादृक्‍च यद्विकारि यतश्च यत्।

स च यो यत्‍प्रभावश्च तत्‍समासेन मे श्रेृणु।। 3।।

उसके उपरांत श्रीकृष्‍ण भगवान बोले है अर्जुन, यह शरीर क्षेत्र है, ऐसे कहा जाता है। और इसको जो जानता है, उसको क्षेत्र ऐसा उनके तत्व को जानने वाले ज्ञानीजन कहते हैं। और हे अर्जुन तू अब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ भी मेरे को ही जान। Continue reading

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कृष्‍ण–स्‍मृति–(प्रवचन–19)

फलाकांक्षामुक्त कर्म के प्रतीक कृष्ण—(प्रवचन—उन्‍नीसवां)

दिनांक 4 अक्‍टूबर, 1970;

सांध्‍या, मनाली (कुलू)

“साधना-जगत में यज्ञों और “रिचुअल्स’ का बहुत उल्लेख है। यज्ञ की बहुत विधियां भी हैं। होमात्मक यज्ञ की बात आती है। लेकिन गीता में जपयज्ञ और ज्ञानयज्ञ को विशेष स्थान दिया गया है। साथ ही आपने जप पर बात करते हुए अजपा जप के बारे में कहा था। तो गीता के जपयज्ञ, ज्ञानयज्ञ और अजपा जप पर भी प्रकाश डालने की कृपा करें।’

 जीवन में “रिचुअल’ की, क्रियाकांड की अपनी जगह है। जिसे हम जीवन कहते हैं, वह नब्बे प्रतिशत “रिचुअल’ और क्रियाकांड से ज्यादा नहीं है। जीवन को जीने के लिए, जीवन से गुजरने के लिए बहुत कुछ जो अनावश्यक है आवश्यक मालूम होता है। आदमी का मन ऐसा है। Continue reading

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पतंजलि: योगसूत्र–(भाग–5) प्रवचन–98

श्रद्धा: किसी के प्रति नहीं होती—(प्रवचन—अट्ठारहवां)

प्रश्‍न—सार:

1—आपके प्रति श्रद्धा रखने और स्वयं में श्रद्धा रखने में क्या विरोधाभास है?

2—बुद्ध को क्या प्रेरित करता है?

3—बच्चे पैदा करने का उचित समय कौन सा है?

4—केवल सेक्स, प्रेम और रोमांस के बारे में सोचना क्या गलत है? Continue reading

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कृष्‍ण–स्‍मृति–(प्रवचन–18)

अभिनय-से जीवन के प्रतीक कृष्ण—(प्रवचन—अट्ठारहवां)

दिनांक 4 अक्‍टूबर, 1970;

प्रात:, मनाली (कुलू)

“भगवान श्री, श्रीकृष्ण कहते हैं कि निष्कामता और अनासक्ति से बंधनों का नाश होता है और परमपद की प्राप्ति होती है। कृपया इसका अर्थ स्पष्ट करते हुए समझाएं कि किस साधना या उपासना से यह उपलब्धि होगी? सामान्यजन के लिए सीधे निष्काम व अनासक्त होना तो संभव नहीं दिखता।’

 बसे पहले तो अनासक्ति का अर्थ समझ लेना चाहिए। अनासक्ति थोड़े-से अभागे शब्दों में से एक है जिसका अर्थ नहीं समझा जा सका है। अनासक्ति से लोग समझ लेते हैं–विरक्ति। अनासक्ति विरक्ति नहीं है। विरक्ति भी एक प्रकार की आसक्ति है। विरक्ति विपरीत आसक्ति का नाम है। कोई आदमी काम में आसक्त है, वासना में आसक्त है। कोई आदमी काम के विपरीत ब्रह्मचर्य में आसक्त है। कोई आदमी धन में आसक्त है। Continue reading

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पतंजलि: योगसूत्र–(भाग–5) प्रवचन–97

साक्षी स्‍वप्रकाशित है—(प्रवचन—सत्रहवां)

योग—सूत्र

(कैवल्‍यपाद)

सदा ज्ञाताश्चित्तवृत्तयस्तह्मभो: पुरुषस्यपिम्णामित्वात्।। 18।।

मन की वृत्तियों का ज्ञान सदैव इसके प्रभु, पुरुष, को शुद्ध चेतना के सातत्य के कारण होता है।

न तत्‍स्‍वाभासं दृश्यत्यात्।। 19।।

मन स्व प्रकाशित नहीं है, क्योंकि स्वयं इसका प्रत्यक्षीकरण हो जाता है।

एकसमये चोभयानवधारणमू।। 20।।

मन के लिए अपने आप को और किसी अन्य वस्तु को उसी समय में जानना असंभव है।

चित्तान्तरदृश्ये बुद्धिबुद्धेरतिप्रसङ्ग: स्मृतिसंकरश्च।। 21।।

यदि यह मान लिया जाए कि दूसरा मन पहले मन को प्रकाशित करता है, तो बोध के बोध की कल्पना करनी पड़ेगी, और इससे स्मृतियों का संशय उत्पन्न होगा। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–5) प्रवचन–150

आधुनिक मनुष्‍य की साधना—(प्रवचन—गयारहवां)

अध्‍याय—12

सूत्र—

तुल्यनिन्दास्तुतिमौंनी संतुष्‍टो थेन केनचित्।

अनिकेत: स्थिरमतिभक्‍तिमान्मे प्रियो नर:।। 19।।

ये त धर्म्‍यामृतमिदं यथोक्‍तं पर्युयासते।

श्रहधाना मत्यरमा भक्तास्‍तउतीव मे प्रिया:।। 20।।

तथा जो निंदा— स्तुति को समान समझने वाला और मननशील है, एवं जिस—किस प्रकार से भी शरीर का निर्वाह होने मैं सदा ही संतुष्ट है और रहने के स्थान में ममता से रहित ह्रै वह स्थिर बुद्धि वाला भक्‍तिमान पुरुष मेरे को प्रिय है।

और जो मेरे को परायण हुए श्रद्धायुक्‍त पुरुष इस ऊपर कहे हुए धर्ममय अमृत को निष्काम भाव से सेवन करते है, वे भक्त मेरे को अतिशय प्रिय हैं। Continue reading

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पतंजलि: योगसूत्र–(भाग–5) प्रवचन–96

बिना तुम्‍हारे किसी निजी चुनाव के—(प्रवचन—सौलहवां)

प्रश्‍नसार:

1—मैं आपके और रूडोल्फ स्टींनंरं के उपायों के बीच बंट गया हूं?

2—प्रकृति के सान्निध्य में ठीक लगता है, लोगों के साथ नहीं, यह विभाजन क्यों?

3—स्त्री के रूप मैं मेरे लिए संबोधि क्या है?

4—क्या हम वास्तव में अपने जीवन में घटित होने वाली चीजों को चुनते हैं? Continue reading

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कृष्‍ण–स्‍मृति–(प्रवचन–17)

स्वभाव की पूर्ण खिलावट के प्रतीक कृष्ण—(प्रवचन—सत्रहवां)

दिनांक 3 अक्‍टूबर, 1970;

संध्‍या, मनाली (कुलू)

“भगवान श्री, आपकी प्रवचन-धारा ज्यों-ज्यों बहने लगी है त्यों-त्यों आपके साथ, आपके वाक्-प्रवाह के साथ बहते-बहते हम दिक्कत में पड़ जाते हैं। तकलीफ यह है कि आपके द्वारा कथित उस तिनके की भांति हम लड़ते नहीं, बहने को हम भी हाथ-पांव पसारते हैं, मगर आपका जोश इतना है कि हम बह नहीं सकते।

सुबह आज श्री अरविंद के बारे में बातचीत हुई। “द वे आफ व्हाइट क्लॉउड‘ में एक जगह लिखा है–“समटाइम्स आइ टेक अवे द मैन, द सब्जेक्ट, बट डू नाट टेक अवे द सरकामस्टांसेज, दैट इज आब्जेक्ट। समटाइम्स आइ टेक अवे द सरकमस्टांसेज, बट डू नाट टेक अवे द मैन। समटाइम्स आइ टेक अवे बोथ, द मैन एंड द सरकमस्टांसेज, एंड समटाइम्स आइ टेक अवे नीदर द मैन नॉर द सरकमस्टांसेज।’ Continue reading

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पतंजलि: योगसूत्र–(भाग–5) प्रवचन–95

यही है यह—(प्रवचन—पंद्रहवां)

योग—सूत्र

(कैवल्‍यपाद)

हेतुफलाश्रयालम्बुत्रैं संगृहीत्‍त्‍वादेषमभावे तदभाक:।। 11।।

प्रभाव के कारण पर अवलंबित होने से, कारणों के मिटते ही प्रभाव तिरोहित हो जाते हैं।

अतीतानागतं स्वरूपतोऽख्यध्यभेदाद्धर्माणाम्।। 12।।

अतीत और भविष्य का अस्तित्व वर्तमान में है, किंतु वर्तमान में उनकी अनुभूति नहीं हो पाती है, क्योंकि वे विभिन्न तलों पर होते हैं।

ते व्यक्तसूक्ष्‍मा गुणात्मान:।। 13।।

वे व्यक्त हों या अव्यक्त अतीत, वर्तमान और भविष्‍य सत, रज और तम गुणों की प्रकृति हैं।

परिणामैकत्‍वाद्वस्‍तुतत्‍वम्।। 14।।

किसी वस्‍तु का सारतत्‍व, इन्‍हीं तीन गुणों के अनुपातों के अनूठेपन में निहित होता है। Continue reading

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कृष्‍ण–स्‍मृति–(प्रवचन–16)

सीखने की सहजता के प्रतीक कृष्ण—(प्रवचन—सोलहवां)

 दिनांक 3 अक्‍टूबर, 1970;

प्रात:, मनाली (कुलू)

“अरविंद को कृष्ण-दर्शन हुए। वे योगी लेले के संपर्क में भी तो आए थे। और पांडिचेरी को प्रयोग का निर्णय क्या भविष्य की पीढ़ियां ही नहीं करेंगी?

एलिसबेली के विषय में आपका क्या खयाल है, जब उसका कहना है कि उसे संदेश मिलते हैं। ये संदेश कौन देता है, कैसे देता है? क्या आपका भी ऐसे किसी मास्टर या गुरु से संबंध है?’ Continue reading

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कृष्‍ण–स्‍मृति–(प्रवचन–15)

अनंत सागर-रूप चेतना के प्रतीक कृष्ण—(प्रवचन—पंद्रहवां)

दिनांक 2 अक्‍टूबर, 1970;

सांध्‍या, मनाली (कुलू)

“भगवान श्री, श्री अरविंद के कृष्ण-दर्शन के बारे में कुछ कहने को बाकी रह गया था। आपने अहमदाबाद में बताया था कि वह बहुत हद तक मानसिक प्रक्षेपण हो सकता है। तो अरविंद का कृष्ण-दर्शन क्या मानसिक प्रक्षेपण है या “मिस्टिक’ अनुभूति है?

एक दूसरा प्रश्न भी है–अर्जुन यदि सिर्फ निमित्त मात्र हैं, तो वे यंत्रमात्र रह जाते हैं। उनकी “इंडिविजुअलिटी’ का क्या होगा?’

कृष्ण-दर्शन, या क्राइस्ट का दर्शन, या बुद्ध या महावीर का दो प्रकार से संभव है। एक, जिसको “मेंटल प्रोजेक्शन’ कहें, मानसिक प्रक्षेपण कहें; जबकि वस्तुतः कोई सामने नहीं होता लेकिन हमारे मन की वृत्ति ही आकार लेती है। जबकि वस्तुतः हमारा विचार ही आकर लेता है। जबकि वस्तुतः हम ही बाहर भी रूप के निर्माता होते हैं। मानसिक प्रक्षेपण, “मेंटल प्रोजेक्शन’ से मतलब यह है कि वस्तुतः उस प्रक्षेपण, उस रूप, उस आकृति के पीछे कोई भी नहीं होता। मन की यह भी क्षमता है। मन की यह भी शक्ति है। जैसे रात हम स्वप्न देखते हैं, ऐसे ही हम खुली आंख से भी सपने देख सकते हैं। तो एक तो यह संभावना है। Continue reading

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पतंजलि: योगसूत्र–(भाग–5)प्रवचन–94

सभी कुछ परस्‍पर निर्भर है—(प्रवचन—चौदहवां)

प्रश्‍न—सार:

1—आप कहते हैं, ‘पूरब में हम’ कृपया इसका अभिप्राय समझाएं?

 2—आप संसार में उपदेश देने क्यों नहीं जाते?

 3—कपटी घड़ियाल की चेतना के बारे में कुछ कहिए?

 4—परस्पर निर्भरता और पूर्ण स्वार्थ में क्या संबंध है?

 

5—समर्पण के लिए किस भांति कार्य करूं?

 6—क्या परम ज्ञान को उपलब्ध व्यक्ति भी बच्चों को जन्म देते हैं? Continue reading

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कृष्‍ण–स्‍मृति–(प्रवचन–14)

अकर्म के पूर्ण प्रतीक कृष्ण—(प्रवचन—चौदहवां)

दिनांक 2 अक्‍टूबर, 1970;

प्रात:, मनाली (कुलू)

“आपने कहा है कि श्रीकृष्ण के मार्ग में कोई साधना नहीं है। केवल “सेल्फ रिमेंबरिंग’, पुनरात्मस्मरण है। लेकिन, आप सात शरीरों की साधना की बात करते हैं। तो सात शरीरों के संदर्भ में कृष्ण की साधना की रूपरेखा क्या होगी, कृपया इसे स्पष्ट करें।’

 कृष्ण के विचार-दर्शन में साधना की कोई जगह ही नहीं है। इसलिए सात शरीरों का भी कोई उपाय नहीं है। साधना के मार्ग पर जो मील के पत्थर मिलते हैं, वे उपासना के मार्ग पर नहीं मिलते हैं। साधना मनुष्य को जिस भांति विभाजित करती है, उस तरह उपासना नहीं करती। साधना सीढ़ियां बनाती है, इसलिए आदमी के व्यक्तित्व को सात हिस्सों में तोड़ती है। फिर एक-एक सीढ़ी चढ़ने की व्यवस्था करती है। लेकिन उपासना आदमी के व्यक्तित्व को तोड़ती ही नहीं। कोई खंड नहीं बनाती। मनुष्य का जैसा अखंड व्यक्तित्व है, उस पूरे को ही उपासना में लीन कर देती है। Continue reading

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पतंजलि: योगसूत्र–(भाग–5) प्रवचन–93

मौलिक मन पर लौटना—(प्रवचन—तैरहवां)

योग—सूत्र:

(कैवल्‍यपाद)

तत्र ध्यानजमनाशयम्‍ ।। 6।।

केवल ध्यान से जन्मा मौलिक मन ही इच्छाओं से मुक्त होता है।

कंर्माशुल्काकृष्णं योगिनस्तिबिधमितरेषामू।। 7।।

योगी के कर्म न शुद्ध होते हैं, न अशुद्ध, लेकिन अन्य सभी कर्म त्रि—आयामी होते हैं—शुद्ध, अशुद्ध और मिश्रित।

ततस्तद्विपाकानुगुणानामेवाभिव्यक्तिर्बासनानामू।। 8।।

जब उनकी पूर्णता के लिए परिस्थियां सहायक होती हैं तो इन कर्मों से इच्छाएं उठती हैं।’’ Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–6) प्रवचन–149

सामूहिक शक्‍तिपात ध्‍यान—(प्रवचन—दसवां)

अध्याय—12

सूत्र:

जीवन उतना ही नहीं है, जितना आप उसे जानते हैं। आपको जीवन की सतह का भी पूरा पता नहीं है, उसकी गहराइयों का, अनंत गहराइयों का तो आपको स्वप्न भी नहीं आया है। लेकिन आपने मान रखा है कि आप जैसे हैं, वह होने का अंत है।

अगर ऐसा आपने मान रखा है कि आप जैसे हैं, वही होने का अंत है, तो फिर आपके जीवन में आनंद की कोई संभावना नहीं है। फिर आप नरक में ही जीएंगे और नरक में ही समाप्त होंगे। Continue reading

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पतंजलि: योगसूत्र–(भाग–5) प्रवचन–92

एकांत अंतिम उपलब्‍धि है—(प्रवचन—बारहवां)

प्रश्‍नसार:

1—क्या शिष्य अपने सदगुरु से कुछ चुराता है?

 2—क्या व्यक्ति जीवन का आनंद अकेले नहीं ले सकता है?

 3—जीवन क्या है? काम— भोग में संलग्न होना, धन कमाना, सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति करना, व्यक्ति को दूसरों पर निर्भर होना, और क्या यह सब खोजी की खोज को बहुत लंबा नहीं बना देगा?

 4—क्या कोई शिष्य हुए बिना आपकी आत्मा से अंतरंग हो सकता है? Continue reading

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कृष्‍ण–स्‍मृति–(प्रवचन–13)

अचिंत्य-धारा के प्रतीकबिंदु कृष्ण—(प्रवचन—तेरहवां)

दिनांक 2 अक्‍टूबर, 1970;

प्रात:, मनाली (कुलू)

“एक चर्चा में आपने कहा है कि श्रीकृष्ण की आत्मा का साक्षात्कार हो सकता है, क्योंकि कुछ मरता नहीं। तो कृष्ण-दर्शन को संभावितता की हद में लाने के लिए कौन-सी “प्रासेस’ से गुजरना पड़ेगा? और साथ ही यह बताएं कि कृष्ण-मूर्ति पर ध्यान, कृष्ण-नाम का जप और कृष्ण-नाम के संकीर्तन से क्या उपासना की पूर्णता की ओर जाया जा सकता है?’

विश्व अस्तित्व में कुछ भी एकदम मिट नहीं जाता। और विश्व अस्तित्व में कुछ भी एकदम नया पैदा भी नहीं होता है। रूप बदलते हैं, आकृतियां बदलती हैं, आकार बदलते हैं, लेकिन अस्तित्व गहनतम रहस्यों में जो है, वह सदा वैसा ही है। व्यक्ति आते हैं, खो जाते हैं, लहरें उठती हैं सागर पर, विलीन हो जाती हैं, लेकिन जो लहर में छिपा था, जो लहर में था, वह कभी विलीन नहीं होता। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–6) प्रवचन–146

परमात्‍मा का प्रिय कौन—(प्रवचन—सांतवां)

अध्‍याय—12

सूत्र—(146)

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्र:करुण एव च।

निर्ममो निरहंकार: समदुःखसुखः शमी।। 13।।

संतुष्ट: सततं योगी यतात्मा दृढीनश्चय:।

मय्यर्पितमनोबुद्धियों मद्भक्तः स मे प्रिय:।। 14।।

इस प्रकार शांति को प्राप्त हुआ जो पुरूष सब भूतों में द्वेषभाव से रहित एवं स्वार्थरहित सबका प्रेमी और हेतुरहित दयालु है तथा ममता से रहित एवं अहंकार से रहित और सुख— दुखों की प्राप्ति में सम और क्षमावान है अर्थात अपराध करने धर्मो को भी अभय देने वाला है।

तथा जो योग मैं युक्‍त हुआ योगी निरंतर लाभ—हानि में संतुष्ट है तथा मन और इंद्रियों सहित शरीर को वश मैं किए हुए मेरे में दृढ़ निश्चय वाला है, वह मेरे मैं अर्पण किए हुए मन— बुद्धि वाला मेरा भक्त मेरे को प्रिय है। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–6) प्रवचन–148

भक्‍ति और स्‍त्रैण गुण—(प्रवचन—नौवां)

अध्याय—12

सूत्र

वो ह्रष्यति द्वेष्टि शोचति कांक्षति।

शुभाशुभयीरत्यागी भक्तिमान्य: मे प्रिय:।। 17।।

सम: शत्रौ मित्रे तथा मानायमानयो:

शीतोष्णसुखदुःखेषु सम: संगविवर्जित:।। 18।।

और जो कभी हर्षित होता है, द्वेष करता है, सोच करता है, कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ संपूर्ण कर्मों के कम का त्यागी है, वह भक्तियुक्त पुरुष मेरे को प्रिय है।

और जो पुरूष शत्रुमित्र में और मानअपमान में सम तथा सर्दीगर्मी और सुखदुखादिक द्वंद्वों में सम है और सब संसार में आसक्ति से रहित है, वह मेरे को प्रिय है।

 पहले कुछ प्रश्न।

 एक मित्र ने पूछा है, परमात्मा के प्रेमी भक्त के जो बहुतसे गुण और लक्षण इस अध्याय में कहे गए हैं, वे सब के सब स्त्रैण गुण वाले हैं। इसका क्या कारण है? और समझाएं कि केवल स्त्रैण गुणों पर जोर देने में क्या जीवन का असंतुलन निहित नहीं है? जीवन के विराट संतुलन में स्त्रैण पौरुष गुणों के सम्यक योगदान का महत्व भक्तियोग के संदर्भ में क्या है? Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–6) प्रवचन–147

उद्वेगरहित अहंशून्‍य भक्‍ति—(प्रवचन—आठवां)

अध्‍याय—12

सूत्र—

यस्माब्रोद्धिजते लोको लोकान्‍नोद्वोजते च य:।

हषीमर्बभयोद्वेगैर्मुक्‍तो यः स च मे प्रिय:।। 15।।

अनयेक्ष: शू्चिर्दर्थ्य उदासीनो ग्लव्यथ:।

सर्वारम्भयश्त्यिगी यो मद्यक्त: स मे प्रिय:।। 16।।

तथा जिससे काई भी जीव उद्वेग को प्राप्त नहीं होता है और जो स्वयं भी किसी जीव से उद्वेग को प्राप्त नहीं होता है तथा जो हर्ष, अमर्ष, भय और उद्वेगादिकों से रहित है, वह भक्त मेरे को प्रिय है।

और जो पुरूष आकांक्षा से रहित तथा बहार— भीतर से शुद्ध और दक्ष है अर्थात जिस काम के लिए आया था, उसको पूरा कर चुका है एवं पक्षपात से रहित और दुखों से छूटा हुआ है? वह सर्व आरंभों का त्यागी मेरा भक्त मेरे को प्रिय है। Continue reading

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पतंजलि: योगसूत्र–(भाग-5) प्रवचन–91

कृत्रिम मन का परित्‍याग—(प्रवचन—ग्‍यारहवां)

योग—सूत्र:

(कैवल्‍यापाद)

जन्मौषधिमन्त्रतप समाषिजा: सिद्धंय:।। 1।।

सिद्धियां जन्म के समय प्रकट होतीं हैं, इन्हें औषधियों से, मंत्रों के जाप से, तपश्चर्याओं से या समाधि से भी अर्जित किया जा सकता है।

  जात्यन्तर परिणाम: प्रकृत्यापूरात्।। 2।।

एक वर्ग, प्रजाति, या वर्ण से अन्य में रूपातरण, प्राकृतिक प्रवृत्तियों या क्षमताओं के अतिरेक से होता है।

निमित्तम प्रयोजकं प्रकृतीनां वरणभेदस्‍तु तत: क्षेत्रिकवत्।। 3।।

आकस्मिक कारक प्राकृतिक प्रवृतियों को सक्रिय होने के लिए प्रेरित नहीं करता, यह तो बस अवरोधों को हटा देता है—जैसे खेत सींचता हुआ किसान; वह बाधाओं को हटा देता है और तब पानी स्वत: ही मुक्त होकर प्रवाहित होने लगता है। Continue reading

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कृष्‍ण–स्‍मृति–(प्रवचन–12

साधनारहित सिद्धि के परमप्रतीक कृष्ण—(प्रवचन—बारहवां)

दिनांक 1 अक्‍टूबर, 1970;

प्रात:, मनाली (कुलू)

“भगवान श्री, कृष्ण का व्यक्तित्व, कृष्ण की बांसुरी, कृष्ण की राधा, कृष्ण के रास से लेकर सुदर्शन चक्र तक हमें बहुत कुछ जानने का मौका मिला। आज एक नया स्वरूप कृष्ण का आपकी वाणी से, आपके मुख से सुनने के लिए हम सब उत्सुक हैं। हम चाहेंगे कि आप कृष्ण से संबंधित उनकी साधना, उनका दर्शन, उनसे संबंधित उपासना पर अपने विचार प्रस्तुत करें, ताकि हम कृष्ण के दूसरे स्वरूप को भी जान सकें। कृष्ण ने तो केवल एक अर्जुन का मोह भंग किया था, यहां पर हम सब अर्जुन बैठे हुए हैं और सब मोह से ग्रसित हैं, उन सबका मोह भंग करने के एकमात्र अधिकारी आप हैं। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–6) प्रवचन–145

कर्म—योग की कसौटी—(प्रवचन—छठवां)

अध्‍याय—12

सूत्र—

अथैतदष्यस्थ्योऽसि कर्तुं मद्योगमख्सि।

सर्क्कर्मकलत्यागं न: कुरु यतक्ष्मवान्।। 11।।

श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासत् ज्ञानद्धयानं विशिष्यते ।

ध्यानात्कर्मफलत्‍याग: त्यागाव्छान्तिरनन्तरम्।। 12।।

और यदि हमको भी करने के लिए असमर्थ है, तो जीते हुए मन वाला और मेरी प्राप्‍तिरूप योग के शरण हुआ सब कर्मों के कल का मेरे लिए त्याग कर।

क्योंकि मर्म को न जाकर किए हुए अभ्यास से परोक्ष ज्ञान श्रेष्ठ है और परोक्ष ज्ञान से मुझ परमेश्वर के स्वरूप का ध्यान श्रेष्ठ है तथा ध्यान से भी सब क्रमों के फल का मेरे लिए त्याग करना श्रेष्ठ है। और त्याग से तत्‍काल ही परम शांति होती है। Continue reading

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