गीता दर्शन (भाग–3) प्रवचन–25

आध्यात्मिक बल—(प्रवचन—पच्‍चीस)

 अध्याय –7

बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्।

बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्।। 10।।

बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्।

धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ।। 11।।

हे अर्जुन, तू संपूर्ण भूतों का सनातन कारण मेरे को ही जान। मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का तेज हूं।

और हे भरत श्रेष्ठ, मैं बलवानों का आसक्ति और कामनाओं से रहित बल अर्थात सामर्थ्य हूं, और सब भूतों में धर्म के अनुकूल अर्थात शास्त्र के अनुकूल काम हूं।

 

रमात्मा स्वयं अपना परिचय देना चाहे, तो निश्चित ही बड़ी कठिन बात है। आदमी भी अपना परिचय देना चाहे, तो कठिन हो जाती है बात। और परमात्मा अपना देना चाहे, तो और भी कठिन हो जाती है। Continue reading

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ताओ उपनिषाद (भाग–1) प्रवचन–15

समझ, शून्यता, समर्पण व पुरुषार्थ—(प्रवचन—प्रंदहवां)

 प्रश्न-सार:

समझ के बाद भी क्रांति क्यों घटती नहीं?

 

अक्रिया साधेंगे तो पुरुषार्थ का क्या होगा?

 

शून्य की पूर्णता कैसे मिलेगी?

 

घड़ा शून्य होगा तो घड़ा भी मिट जाएगा न?

 

मन को खाली कैसे किया जाए?

प्रश्न:

 

लाओत्से कहते हैं कि समझ, अंडरस्टैंडिंग, काफी है; समझ के साथ ही क्रांति घटित हो जाती है। हमें ऐसा लगता है कि कोई बात पूरी समझ में आती तो है, लेकिन कोई क्रांति उससे घटित नहीं होती। इसका कारण क्या है, कृपया समझाइए!

 

लाओत्से कहता है, बात समझ में आ जाए, तो करने को कुछ बाकी नहीं रह जाता। समझ ही फिर करवा देती है, जो करने योग्य है। और जो करने योग्य नहीं है, वह गिर जाता है, झड़ जाता है, जैसे सूखे पत्ते वृक्ष से गिर जाएं। जो न करने योग्य है, उसे रोकने के लिए कुछ नहीं करना पड़ता; जो करने योग्य है, उसे करने के लिए कुछ नहीं करना पड़ता। जो करने योग्य है, वह होने लगता है; जो न करने योग्य है, वह नहीं होना शुरू हो जाता है। Continue reading

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गीता दर्शन (भाग–3) प्रवचन–24

अदृश्य की खोज—(प्रवचन—चौबीसवां)

अध्याय-7

एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय।

अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा।। 6।।

मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति धनंजय।

मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव।। 7।।

और हे अर्जुन, तू ऐसा समझ कि संपूर्ण भूत इन दोनों प्रकृतियों से ही उत्पत्ति वाले हैं और मैं संपूर्ण जगत का उत्पत्ति तथा प्रलयरूप हूं, अर्थात संपूर्ण जगत का मूल कारण हूं।

हे धनंजय, मेरे सिवाय किंचितमात्र भी दूसरी वस्तु नहीं है। यह संपूर्ण जगत सूत्र में सूत्र के मणियों के सदृश मेरे में गुंथा हुआ है।

 

गत प्रकट है, ऐसे ही जैसे माला के मनके प्रकट होते हैं। परमात्मा अप्रकट है, वैसे ही जैसे मनकों में पिरोया हुआ धागा अप्रकट होता है। पर जो अप्रकट है, उसी पर प्रकट सम्हला हुआ है। जो नहीं दिखाई पड़ता उसी पर, जो दिखाई पड़ता है, आधारित है।

जीवन के आधारों में सदा ही अदृश्य छिपा होता है। वृक्ष दिखाई पड़ता है, जड़ें दिखाई नहीं पड़ती हैं। फूल दिखाई पड़ते हैं, पत्ते दिखाई पड़ते हैं, जड़ें पृथ्वी के गर्भ में छिपी रहती हैं–अंधकार में, अदृश्य में। पर उन अदृश्य में छिपी जड़ों पर ही प्रकट वृक्ष की जीवन की सारी लीला निर्भर है। Continue reading

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ताओ उपनिषाद–(भाग–1) प्रवचन–14

प्रतिबिंब उसका, जो कि परमात्मा के भी पहले था—(प्रवचन—चौहदवां)

अध्याय 4 : सूत्र 3

नहीं जानता मैं कि किसका पुत्र है यह,

शायद यह प्रतिबिंब है उसका,

जो कि परमात्मा के भी पहले था।

शून्य हो जाने पर, घड़े की भांति रिक्त हो जाने पर–चित्त की सारी नोकें झड़ जाएं, सारी ग्रंथियां सुलझ जाएं, व्यक्ति स्वयं को पूरा उघाड़ ले और जान ले–फिर भी, जो आधारभूत है, आत्यंतिक है, अल्टिमेट है, वह अनजाना ही रह जाता है। वह रहस्य में ही छिपा रह जाता है।

इस अंतिम सूत्र में लाओत्से उसकी तरफ इशारा करता है और कहता है, “नहीं जानता मैं, किसका पुत्र है यह।’

यह जो सब जान लेने पर भी अनजाना ही रह जाता है, यह जो सब उघड़ जाने पर भी अनउघड़ा ही रह जाता है, यह जो सब आवरण हट जाने पर भी आवृत ही रह जाता है, ढंका हुआ ही रह जाता है, ज्ञान भी जिसके रहस्य को नष्ट नहीं कर पाता, यह कौन है? Continue reading

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ताओ उपनिषाद (भाग–1) प्रवचन–13

अहंकार—विसर्जन और रहस्य में प्रवेश—(प्रवचन—तैरहवां)

अध्याय 4 : सूत्र 2

इसकी तेज नोकों को घिस दें;

इसकी ग्रंथियों को सुलझा दें;

इसकी जगमगाहट मृदु हो जाए;

इसकी उद्वेलित तरंगें जलमग्न हो जाएं;

फिर भी यह अथाह जल की तरह तमोवृत्त सा रहता है।

र्म है रिक्त चेतना की अवस्था, खाली घड़े की भांति।

लेकिन कोई खाली घड़ा कैसे हो पाए? शून्य कोई होना भी चाहे तो कैसे शून्य हो? मिटना कोई चाहे भी तो मिटने की प्रक्रिया क्या है?

कल हमने समझने की कोशिश की कि पूर्ण होने की चेष्टा से ज्यादा कोई नासमझी की बात नहीं। लेकिन पूर्ण होने का विज्ञान उपलब्ध है। एक-एक कदम पूर्ण होने की सीढ़ियां उपलब्ध हैं। पूर्ण होने का शास्त्र है। और जिन्हें पूर्ण होना है, उनके लिए विद्यापीठ हैं, जहां वे शिक्षित हो सकते हैं कि किसी दिशा में पूर्ण कैसे हों। लेकिन शून्य होने का क्या शास्त्र है? और शून्य होने का विद्यापीठ कहां? और शून्य होने के लिए शिक्षक कहां मिलेगा? और कौन सा अनुशासन है जिससे व्यक्ति शून्य हो? Continue reading

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गीता दर्शन (भाग–3) प्रवचन–23

परमात्मा की खोज—(प्रवचन—तेइसवां)

अध्याय-7

मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये।

यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः।। 3।।

 

परंतु हजारों मनुष्यों में कोई ही मनुष्य मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करता है, और उन यत्न करने वाले योगियों में भी कोई ही पुरुष मेरे परायण हुआ मेरे को तत्व से जानता है अर्थात यथार्थ मर्म से जानता है।

 प्रभु की यात्रा सरल भी है और सर्वाधिक कठिन भी। सरल इसलिए कि जिसे पाना है, उसे हमने सदा से पाया ही हुआ है। जिसे खोजना है, उसे हमने वस्तुतः कभी खोया नहीं है। वह निरंतर ही हमारे भीतर मौजूद है, हमारी प्रत्येक श्वास में और हमारे हृदय की प्रत्येक धड़कन में। इसलिए सरल है प्रभु को पाना, क्योंकि प्रभु की तरफ से उसमें कोई भी बाधा नहीं है। इसे ठीक से ध्यान में ले लेंगे।

प्रभु को पाना सरल है, क्योंकि प्रभु सदा ही अवेलेबल है, सदा ही उपलब्ध है। लेकिन प्रभु को पाना कठिन बहुत है, क्योंकि आदमी सदा ही प्रभु की तरफ पीठ किए हुए खड़ा है। आदमी की तरफ से सारी कठिनाइयां हैं, प्रभु की तरफ से कोई भी कठिनाई नहीं है। उसके मंदिर के द्वार सदा ही खुले हैं, लेकिन हम उन मंदिर के द्वारों की तरफ पीठ किए हैं। पीठ ही नहीं किए हैं, पीठ करके भाग भी रहे हैं। भाग ही नहीं रहे हैं, अपना पूरा जीवन, अपनी पूरी शक्ति, अपनी पूरी सामर्थ्य, किस भांति उस मंदिर से दूर निकल जाएं, इसमें लगा रहे हैं। Continue reading

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गीता दर्शन (भाग–3) प्रवचन–22

अनन्य निष्ठा (अध्याय—7) प्रवचन—बाईसवां

 श्रीमद्भगवद्गीता

अथ सप्तमोऽध्यायः

 

श्रीभगवानुवाच

मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युग्जन्मदाश्रयः।

असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु।। 1।।

श्रीकृष्ण भगवान बोले, हे पार्थ, तू मेरे में अनन्य प्रेम से आसक्त हुए मन वाला और अनन्य भाव से मेरे परायण योग में लगा हुआ मुझको संपूर्ण विभूति, बल, ऐश्वर्यादि गुणों से युक्त सबका आत्मरूप जिस प्रकार संशयरहित जानेगा, उसको सुन।

 

र्म मौलिक रूप से जीवन के प्रति एक प्रेमपूर्ण निष्ठा का नाम है।

जीवन के प्रति दो दृष्टियां हो सकती हैं। एक–नकार की, इनकार की, अस्वीकार की। दूसरी–स्वीकार की, निष्ठा की, प्रीति की। जितना अहंकार होगा भीतर, उतना जीवन के प्रति अस्वीकार और विरोध होता है। जितनी विनम्रता होगी, उतना स्वीकार। जैसा है जीवन, उसके प्रति एक भरोसा और ट्रस्ट। और जीवन जहां ले जाए, उसका हाथ पकड़कर जाने की संशयहीन अवस्था होती है।

कृष्ण इस सूत्र में अर्जुन से कह रहे हैं कि जो अनन्य भाव से मेरे प्रति प्रेम और श्रद्धा से भरा है!

अनन्य भाव को ठीक से समझ लेना जरूरी है। Continue reading

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तंत्र–सूत्र (भाग–1) प्रवचन–8

तांत्रिक शुद्धि का आधार अभेद है—प्रवचन—आठवां

प्रश्‍नसार:

1—शुद्धि से तंत्र का अभिप्राय क्‍या है?

एक बात अक्सर पूछी जाती है :

 

तांत्रिक शुद्धि का तंत्र का क्या मतलब है जब वह कहता है की प्रगति के लिए मन का शुद्धिकरण, की शुद्धि बुनियादी शर्त है?

 

सामान्‍यत: शुद्धि का जो अर्थ लिया जाता है वही तंत्र का अर्थ नहीं है। सामान्यत: हम हर चीज को शुभ और अशुभ में, भले और बुरे में बांटते हैं। यह विभाजन किसी भी कारण से हो सकता है, यह स्वास्थ्य—विज्ञान की दृष्टि से भी हो सकता है, नैतिक दृष्टि से भी हो सकता है, या किसी भी तरह हो सकता है। लेकिन हम जीवन को शुभ और अशुभ में बांट देते हैं। और जब भी हम शुद्धि का नाम लेते हैं तो उससे शुभ का ही मतलब निकालते हैं। हम चाहते हैं कि अच्छे गुणों को तो रहना चाहिए और बुरे गुणों को जाना चाहिए। Continue reading

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अष्‍टावक्र: महागीता (भाग–5) प्रवचन–6

अपनी बानी प्रेम की बानी—प्रवचन—छठवां

दिनांक 16 जनवरी, 1977;

श्री ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क, पूना।

प्रश्‍नसार:

पहला प्रश्न :

 चार—पांच वर्षों से आपको सुन रहा हूं। कभी—कभी संन्यास लेने की इच्छा प्रगाढ़ हो जाती है, इसलिए इस बार आपके पास संन्यास लेने के लिए आया हूं। लेकिन जब से घर से निकला हूं तब से शरीर में कंपन और मन में कुछ घबड़ाहट का अनुभव हो रहा है। और मन संन्यास के लिए राजी नहीं मालूम होता। यह क्या है और अब क्या करूं?

 

न कैसे राजी होगा संन्यास के लिए? संन्यास तो मन की मृत्यु है। संन्यास तो मन का आत्मघात है। तो मन तो बेचैन हो, यह स्वाभाविक है। मन तो डरे, कंपे, यह स्वाभाविक है। मन तो हजार बाधाएं खड़ी करे, यह स्वाभाविक है। मन चुपचाप राजी हो जाए तो चमत्कार है। मन तो छोटी—मोटी बातों में भी राजी नहीं होता, दुविधा—द्वंद्व खड़ा करता है। छोटी—मोटी बातों में, जहां कुछ भी दांव पर नहीं है—यह कपड़ा पहनूं या यह पहनम मन वहां भी द्वंद्वग्रस्त हो जाता है। यह करूं या वह करूं, वहां मन डांवाडोल होने लगता है। Continue reading

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कितना भागे जग से आगे (कविता)

कितना भागे जग से आगे।
टूटे पल—छल जीवन धागे।
किसको पकड़े किसको छोड़े।
कदम—कदम पर आग बीछी है।
राह—राह में शूल सजी है।
पथ है नीरव, न दिखता आगे।
लाशों का अंबार लगा है।
पल पल मरना,
पल—पल जलना।
किसे पता है, कौन है आगे।
अपना होना ढूंढ—ढूंढ कर
जग में उलझ—उलझ हम जाते Continue reading

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ताओ उपनिषाद (भाग–1) प्रवचन–12

वह परम शून्य, परम उदगम, परम आधार—ताओ—(प्रवचन—बाहरवां)

अध्याय 4 : सूत्र 1

 

ताओ का स्वरूप

 

ताओ घड़े की रिक्तता की भांति है।

इसके उपयोग में सभी प्रकार की पूर्णताओं से

सावधान रहना अपेक्षित है। यह कितना

गंभीर है, कितना अथाह, मानो यह सभी

पदार्थों का उदगम या उनका सम्मानित पूर्वज हो!

ताओ है शून्य, रिक्तता; घड़े की रिक्तता की भांति।

कुछ भी भरा हुआ न हो, तो ही ताओ उपलब्ध होता है। शून्य हो चित्त, तो ही धर्म की प्रतीति होती है। व्यक्ति मिट जाए इतना, कि कह पाए कि मैं नहीं हूं, तो ही जान पाता है परमात्मा को। ऐसा समझें। व्यक्ति होगा जितना पूर्ण, परमात्मा होगा उतना शून्य; व्यक्ति होगा जितना शून्य, परमात्मा अपनी पूर्णता में प्रकट होता है। Continue reading

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ताओ उपनिषाद (भाग–1) प्रवचन–11

कोरे ज्ञान से इच्छा-मुक्ति व अक्रिय व्यवस्था की और—(ग्‍यहरवां—प्रवचन)

अध्याय 3 : सूत्र 3

वे उन्हें कोरे ज्ञान और इच्छादि से

मुक्त रखने का प्रयास करते हैं।

और जहां ऐसे लोग हैं, जो

निपट जानकारी से भरे हैं,

उन्हें ऐसी जानकारी के उपयोग से

बचाने की यथाशक्य चेष्टा करते हैं।

जब अक्रियता की ऐसी अवस्था उपलब्ध हो जाए,

तब जो सुव्यवस्था बनती है, वह सार्वभौम होती है।

जो जानते हैं, वे लोगों को कोरे ज्ञान से मुक्त रखने का प्रयास करते हैं।

साधारणतः हम सोचते हैं कि अज्ञान बुरा है, अशुभ है; और ज्ञान अपने आप में शुभ है। लाओत्से ऐसा नहीं सोचता। न ही उपनिषद के ऋषि ऐसा सोचते हैं। और न ही पृथ्वी पर जिन लोगों ने भी परम ज्ञान को पाया है, उनकी ऐसी धारणा है। Continue reading

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तंत्र–सूत्र (भाग–1) प्रवचन–7

प्रेम करते हुए प्रेम ही हो जाओ—प्रवचन—सातवां

सूत्र:

10—   प्रिय देवी, प्रेम किए जाने के क्षण में प्रेम में ऐसे

प्रवेश करो जैसे कि वह नित्‍य जीवन हो।

     

11—   जब चींटी के रेंगने की अनुभूति हो तो इंद्रियों के

            सब द्वार बंद कर दो। तब!

     

12—   जब किसी बिस्‍तर या आसन पर हो तो अपने को

            वजनशून्‍य हो जाने दो—मन के पार।

नुष्‍य का अपना एक केंद्र है, लेकिन वह उस केंद्र से बाहर—बाहर, दूर—दूर जीता है। और इसी से आंतरिक तनाव, सतत अशांति और संताप पैदा होते हैं। तुम वहा नहीं होते हो जहां होना चाहिए; तुम अपने सम्यकत्व में, सही संतुलन में नहीं होते, तुम संतुलन से दूर जा पड़ते हो। और यह संतुलन से, केंद्र से दूर जा पड़ना सब मानसिक तनावों का आधार है, कारण है। Continue reading

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अष्‍टावक्र: महागीता (भाग–5) प्रवचन–5

जानो और जागो!—प्रवचन—पांचवां

दिनांक 15 जनवरी, 1977;

श्री ओशो आश्रम, कोरेगांवपार्क, पूना।

सारसूत्र:

अप्रयत्नात् प्रयत्नाद्वा मूनको नाप्पोति निर्वृतिम्।

तत्वनिश्चयमात्रेण प्राज्ञो भवति निर्वृत।।21०।।

शुद्धं बुद्धं प्रियं पूर्णं निष्प्रपंचं निरामयम्।

आत्मानं तं न जानन्ति तत्राभ्यासपरा जना:।।211।।

नान्नोति कर्मणा मोक्ष विमूढ़ोऽभ्यासरूपिणा।

धन्यो विज्ञानमात्रेण मुक्तस्तिष्ठत्यविक्रिय:।।212।।

मूढ़ो नाप्‍नेति तद्ब्रह्म यतो भवितुमिच्छति।

अनिच्छन्नपि धीरो हि परब्रह्मस्वरूपभाक्।।213।।

निराधारा ग्रहव्यग्रा मूढा: संसारपोषका:।

एतस्यानर्थमूलस्य मूलच्छेद: कृतो बुधै:।।214।।

न शांतिं लभते मूढ़ो यत: शमितुमिच्छति।

धीरस्तत्वं विनिश्चित्य सर्वदा शांतमानस:।।215।। Continue reading

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ताओ उपनिषाद (भाग–1) प्रवचन–10

भरे पेट और खाली मन का राज—ताओ—(प्रवचन—दसवां)

 अध्याय 3 : सूत्र 2

इसलिए संत और प्रबुद्ध अपनी

शासन व्यवस्था में उनके

उदरों को भरते हैं, किंतु

उनके मनों को शून्य करते हैं।

वे उनकी हड्डियों को दृढ़तर बनाते हैं, परंतु उनकी

इच्छा-शक्ति को निर्बल करते हैं।

लाओत्से की सभी बातें उलटी हैं। उलटी हमें दिखाई पड़ती हैं। और कारण ऐसा नहीं है कि लाओत्से की बात उलटी है, कारण ऐसा है कि हम सब उलटे खड़े हैं।

लाओत्से का एक शिष्य च्वांगत्से मरने के करीब था। अंतिम क्षणों में उसके मित्रों ने पूछा, तुम्हारी कोई इच्छा है? तो उसने कहा, एक ही इच्छा है मेरी कि इस पृथ्वी पर मैं पैरों के बल खड़ा था, उस परलोक में मैं सिर के बल खड़ा होना चाहता हूं। शिष्य बहुत परेशान हुए। और उन्होंने कहा, हमारी कुछ समझ में नहीं आता। क्या आप परलोक में उलटे खड़े होना चाहते हैं? तो च्वांगत्से ने कहा, जिसे तुम सीधा खड़ा होना कहते हो, उसे इतना उलटा पाया कि आने वाले जीवन में उलटा खड़े होकर प्रयोग करना चाहता हूं, शायद वही सीधा हो। Continue reading

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ताओ उपनिषाद (भाग-1) प्रवचन–9

महत्वाकांक्षा का जहर व जीवन की व्यवस्था—प्रवचन—नौवां

अध्याय 3 : सूत्र 1

निष्क्रिय कर्म

यदि योग्यता को पद-मर्यादा न मिले, तो न तो विग्रह हो

और न संघर्ष। यदि दुर्लभ पदार्थों को महत्व नहीं दिया जाए,

तो लोग दस्यु-वृत्ति से भी मुक्त रहें।

यदि उसकी ओर, जो स्पृहणीय है, उनका ध्यान आकर्षित

न किया जाए, तो उनके हृदय अनुद्विग्न रहें।

नुष्य की चिंता क्या है? मनुष्य की पीड़ा क्या है? मनुष्य का संताप क्या है?

एक मनुष्य चिंतित हो, थोड़े से लोग परेशान हों, तो समझा जा सकता है, उनकी भूल होगी। लेकिन होता उलटा है। कभी कोई एक मनुष्य निश्चिंत होता है, कभी कोई एक मनुष्य स्वस्थ होता है; बाकी सारे लोग अस्वस्थ, अशांत और पीड़ित होते हैं। बीमारी नियम मालूम पड़ती है; स्वास्थ्य अपवाद मालूम पड़ता है। अज्ञान जीवन की आत्मा मालूम पड़ती है; ज्ञान कोई आकस्मिक घटना, कोई सांयोगिक घटना मालूम पड़ती है। ऐसा लगता है कि मनुष्य होना ही बीमार होना है, चिंतित, परेशान होना है। कभी कोई, न मालूम कैसे, हमारे बीच निश्चिंतता को उपलब्ध हो जाता है। या तो प्रकृति की कोई भूल-चूक है, या परमात्मा का कोई वरदान है। लेकिन नियम यही मालूम पड़ता है जो हम हैं: रुग्ण, पीड़ित, परेशान। Continue reading

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ताओ उपनिषाद (भाग–1) प्रवचन–8

स्वामित्व और श्रेय की आकांक्षा से मुक्त कर्म–प्रवचन—आठवां

अध्याय 2: सूत्र 4

सभी बातें अपने आप घटित होती हैं,

परंतु वे उनसे विमुख नहीं होते;

उन्हें वे जीवन प्रदान करते हैं,

किंतु अधिकृत नहीं करते।

वे इन समस्त प्रक्रियाओं से गुजरते हैं,

परंतु इनके स्वामी नहीं बनते;

कर्तव्य निभाते हैं, पर श्रेय नहीं लेते।

चूंकि वे श्रेय का दावा नहीं करते,

इसलिए उन्हें श्रेय से वंचित नहीं किया जा सकता।

सलिए ज्ञानी निष्क्रिय भाव से अपने कार्यों की व्यवस्था तथा निःशब्द द्वारा अपने सिद्धांतों का संप्रेषण करते हैं। इसके बाद के सूत्र में लाओत्से कहता है, “सभी बातें अपने आप घटित होती हैं।’

ताओ के आधारभूत सिद्धांतों में एक यह है: सभी बातें अपने आप घटित होती हैं। ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसे घटित करने के लिए हमारी जरूरत होती हो; हमारे बिना ही सब कुछ घटित होता है। नींद आती है, भूख लगती है, जन्म होता है, मृत्यु होती है, वह सब अपने आप घटित होता है। Continue reading

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अष्‍टावक्र: महागीता (भाग–5) प्रवचन–4

एकाकी रमता जोगी—प्रवचन—चौथा

दिनांक 14 जनवरी, 1977;

श्री ओशो आश्रम, कोरेगांवपार्क, पूना।

प्रश्‍नसार:

पहला प्रश्न :

 

भीड़ में मन नहीं रमता है और निपट एकाकीपन से भी जी घबड़ाता है। क्या यह विक्षिप्तता का लक्षण है? समझाने की अनुकंपा करें।

कांत के संबंध में कुछ बातें समझ लेनी चाहिए। एकांत के तीन रूप हैं। पहला : जिसे हम अकेलापन कहते हैं, एकाकीपन। दूसरा. एकांत। और तीसरा : कैवल्य।

अकेलापन नकारात्मक है। अकेलापन वास्तविक अकेलापन नहीं है; दूसरे की याद सता रही है; दूसरा होता तो अच्छा होता; दूसरे की गैर—मौजूदगी खलती है, काटा चुभता है, दूसरे में मन उलझा है। देखने को अकेले हो, भीतर नहीं; भीतर भीड़ मौजूद है। कोई आएगा तो पाएगा अकेले बैठै हो’। लेकिन तुम जानते हो कि तुम अकेले नहीं हो; किसी की याद आती है, किसी में मन लगा है। किसी को बुलावा भेज रहे हो; किसी का स्वप्न संजो रहे हो; किसी की पुकार चल रही है—कोई होता, अकेले न होते! अकेलेपन से राजी नहीं हो। Continue reading

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अष्‍टावक्र: महागीता (भाग–5) प्रवचन–3

महाशय को कैसा मोक्ष!—प्रवचन—तीसरा
13 जनवरी, 1977

श्री ओशो आश्रम, कोरेगांवपार्क, पूना।

सारसूत्र:

असमाधेरविक्षेपान्न मुमुक्षुर्न चेतर:।

निश्चित्यकल्पितपश्यन्ब्रह्मैवास्तेमहाशय।।2०4।।

यस्यांत: स्यादहंकारो न करोति करोति सः।

निरहंकारधीरेण न किचिद्धि कृतं कृतम्।।2०5।।

नोद्विग्न न च संतुष्टमकर्तृस्पदवर्जितम्।

निराश गतसंदेह चित्तं मुक्तस्य सजते।।2०6।।

निर्ध्यातुं चेष्टितुं वापि यच्चित्तं न प्रवर्तते।

निर्निमित्तमिद किंतु निर्ध्यायति विचेष्टते।।2०7।।

तत्व यथार्थमाकर्ण्य मंद: प्राम्मोति मूढ़ताम्।

अथवाऽऽयाति संकोचममूढ़: कोउपि मूढ़वत्।।2०8।।

एकाग्रता निरोधो वा मूढैरभ्यस्यते भृशम्।

धीरा:कृत्यंनपश्यन्तिसुप्तवत्स्वपदेस्थिता:।।2०9।। Continue reading

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तंत्र–सूत्र (भाग–1) प्रवचन–7

स्‍वप्‍न का अतिक्रमण कैसे हो—प्रवचन—छठवां
प्रश्‍नसार:

1—स्‍वप्‍न देखते हुए बोधपूर्ण कैसे हुआ जाए?

 

2—प्रयत्‍न क्‍यों करें अगर नाटक के पात्र भर है?

 

एक मित्र ने पूछा है :

 

क्या समझाने की कृप्‍या करेंगे की स्वप्न देखते हुए बोधयूर्ण होने के अन्य उपाय क्या हैं?

 

ह प्रश्न उन सबके लिए महत्वपूर्ण है जो ध्यान में उत्सुक हैं। क्योंकि सचाई यह है कि स्‍वप्‍न देखने की प्रक्रिया का अतिक्रमण ही ध्यान है।

तुम सतत सपना देखते हो। रात में ही नहीं, पूरा दिन भी सपना देखते रहते हो। यह समझने की पहली बात है कि जागते हुए भी तुम सपना देखते हो। दिन के किसी समय आंखें बंद करो, शरीर को थोड़ा शिथिल करो, और पाओगे कि सपना चल रहा है। वह कभी बंद ही नहीं होता, हमारे दैनंदिन कामकाज के चलते वह सिर्फ दबा रहता है। यह दिन के तारों जैसा है। रात में तुम तारों को देखते हो, दिन में उन्हें नहीं देखते, लेकिन तारे सदा होते हैं। 1इदन में सूर्य की रोशनी में बस छिप जाते हैं। Continue reading

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