OshoSatsang.org–(ओशो सत्‍संग)

किसी कारण  अगर कुछ मित्र ओशो सत्‍संग न खोल पा रहे हो तो कृपा नीचे दिये लिंक का उपयोग करे….या ओशो सत्‍संग ओ आर जी खोलने से ओशो अमृत खूल रहा हो तो भी आप ओशो सत्‍संग पर इस लिंक से जा सकते है। इस खेद के लिए सभी  मित्र से क्षमा चहता हू……ये तो रूकावटे आती रहेगी….परंतु हम तो चलना है हर हाल में ओशो के संग…..ओर ओशो हमारे साथ है….जय ओशो…..https://oshosatsang.wordpress.com/

स्‍वामी आनंद प्रसाद ‘मनसा’

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गीता दर्शन–(भाग–7) प्रवचन–179

प्‍यास और धैर्य—(प्रवचन—सातवां)

अध्‍याय—15

सूत्र—

यो मामैवमसंमूढो जानति पुरुषोत्तमम्।

स सर्वोविद्भजति मां सर्वभावेन भारत।। 19।।

इति गुह्यतमं शास्त्रीमदमुक्‍तं मयानघ।

एतदबद्ध्वा बुद्धिमान्‍स्‍यत्‍कृतकृत्‍यश्‍च भारत।। 20।।

है भारत, हस प्रकार तत्व से जो ज्ञानी पुरुष मेरे को पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ पुरुष सब प्रकार मे निरंतर मुझ परमेश्वर को ही भजता है।

है निष्पाप अर्जुन, ऐसे यह अति रहस्ययुक्‍त गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया, हमको तत्व से जानकर मनुष्य ज्ञानवान और कृतार्थ हो जाता है। Continue reading

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पोनी एक कुत्‍ते की अात्‍मकथा–

इस कथा को लिखने के लिए अगर मुझे किसी ने प्रेरित किया तो वह था पोनी। जब वह अंतिम बिदाई ले रहा था, अपनी मृत्‍यु के कुछ ही मिनट पहले। तब उसने मेरे हाथ में अपना सर रख कर किसी अंजान सी ध्‍वनि में मुझसे कुछ कहने की कोशिश की। मुझे पता था उसके चला चली का समय है। इस लिए दुकान पर जाने से पहले मैं हमेशा उससे मिल कर आता था उसने अपने अंतिम दिन छत के उस खुबसूरत प्रागांण में गुजारे….परंतु यह उसकी मजबूरी थी क्‍यों कि उसकी आंखें इतनी कमजोर हो गई थी की वह दूर का देख नहीं पाती थी। शरीर इतना जरजर चार कदम भी नहीं चल पाता था। इस लिए हमने उसका बिसतरा छत वाले उस कम लगा दिया उसके लिए कूलर था और पास ही एक टेपरिकार्ड…क्‍यों उसे ओशो के प्रवचन बहुत प्रिय थे। Continue reading

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पोनी एक कुत्‍ते की आत्‍मकथा–(अध्‍याय–2)

मनुष्‍य का पहला स्‍पर्श

मेरा जन्म दिल्ली कि अरावली पर्वत श्रृंखला के घने जंगल मैं हुआ, जो तड़पती दिल्ली के फेफडों ताजा हवा दे कर उसे जीवित रखे हुऐ है। कैसे आज भी अपने को पर्यावरण के उन भूखे भेडीयों से घूंघट की ओट मे एक छुई—मुई सी दुल्हन बन कर करवह अपने आप को बचाए हुऐ है। यहीं नहीं सजाने संवारने के साथ—साथ इठलाती मस्त मुस्कराती सी प्रतीत होती है। ये भी एक चमत्कार से कम नहीं है, वरना उसके अस्तित्व को खत्म करने के लिए लोग बेचैन, बेताब, इंतजार कर रहे है। आज भी इसके अंदर गहरे बरसाती नाले, सेमल, रोझ, कीकर, बकाण, अमलतास, ढाँक और अनेक जंगली नसल के पेड़ों की भरमार है। कितने पशु पक्षी आज भी इसकी शरण में विचरण करते ही नहीं इठलाते से दिखते है, गिदड़..खरगोश, जंगली गाय, निलगाय, मोर…तीतर…उदबिलाव, सांप…बिच्‍छू…ओर न जाने कितने ही। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–7) प्रवचन–178

पुरूषोत्‍तम की खोज—(प्रवचन—छठवां)

अध्‍याय—15

सूत्र—

द्वाविमौ पुरूषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।

क्षर: सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्‍यते।। 16।।

उत्तम: पुरूषस्‍त्‍वन्य: परमात्मेत्युदाह्वत:।

यो लस्केत्रयमाविश्य बिभर्त्सव्यय ईश्वर:।। 17।।

यस्मात्‍क्षरमर्तोतोऽहमक्षरादीप चोत्तम:।

अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथित: पुरुषोत्तम:।। 18।।

हे अर्जुन, हम संसार में क्षर अर्थात नाशवान और अक्षर अर्थात अविनाशी, ये दो प्रकार के पुरुष हैं। उनमें संपूर्ण भूत प्राणियों के शरीर तो क्षर अर्थात नाशवान और कूटस्थ जीवात्‍मा अक्षर अर्थात अविनाशी कहा जाता है। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–7) प्रवचन–177

एकाग्रता और ह्रदय—शुद्धि—(प्रवचन—पांचवां)

अध्‍याय—15

सूत्र—

यदादित्यगतं तेजो जगद्यासयतेऽखिलम्।

यच्‍चन्द्रमलि यचाग्नौ तत्तेजो विद्धि मांक्कम्।। 12।।

गामांविश्य च भूतानि धारयाथ्यमोजसा।

पुष्णामि चौषधी: सर्वा: सोमो भूत्वा रसात्मक:।। 13।।

अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमांश्रित:।

प्राणायानसमांयुक्त: पचाम्यन्‍नं चतुर्विधम्।। 14।।

सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत: स्मृतिज्ञनिमयहेनं च।

वेदैश्च सवैंरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदीवदेव चाहम्।। 15।।

 और हे अर्जुन, जो तेज सूर्य में स्थ्ति हुआ संपूर्ण जगत को प्रकाशित करता है तथा जो तेज चंद्रमा में स्थ्ति है और जो तेज अग्नि में स्थित है, उसको तू मेरा ही तेज जान।

और मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्‍ति से सब भतों को धारण करता हूं और रस—स्वरूप अर्थात अमृतमय सोम होकर संपूर्ण औषधियों को अर्थात वनस्पतियों को पुष्ट करता हूं। Continue reading

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मन ही पूजा मन ही धूप–(संत रैदास) प्रवचन–10

आओ और डूबो—(प्रवचन—दसवां)

प्रश्न—सार:

1—ओशो, संन्‍यास लेने के बाद वह याद आती है—

जू—जू दयारे—इश्‍क में बढ़ता गया।

तोमतें मिलती गई, रूसवाइयां मिलती गई।

 2—ओशो, आज तक दो प्रकार के खोजी हुए है। जो अंतर्यात्रा पर गए उन्‍होंने बाह्म जगत से अपने संबंध न्‍यूनतम कर लिए। जो बहार की विजय—यात्राओं पर निकले उन्‍हें अंतर्जगत का कोई बोध ही नहीं रहा। आपने हमें जीनें का नया आयाम दिया है। दोनों दिशाओं में हम अपनी यात्रा पूरी करनी है। ध्‍यान और सत्‍संग से जो मौन और शांति के अंकुर निकलते है, बाहर की भागा—भागी में वे कुचल जाते है। फिर बाहर के संघर्षों में जिस रूगणता और राजनीति का हमें अभ्‍यास हो जाता है, अंतर्यात्रा में वे ही कड़ियां बन जाती है।

प्रभु, दिशा—बोध देने की अनुकंपा करे।

 

      3—ओशो, साक्षीभाव और लीनता परस्‍पर—विरोधी दिखाई देती है। क्‍या वे सचमुच विरोधी है?

 

      4—ओशो,आपका मूल संदेश? Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–7) प्रवचन–176

समर्पण की छलांग—(प्रवचन—चौथा)

अध्‍याय—15

सूत्र—

उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुज्‍जानं वा गुणान्यितम्।

विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचमुष:।। 10।।

यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यज्यात्मन्यवस्थितम्।

यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यक्यधेतस:।। 11।।

परंतु शरीर छोड़कर जाते हुए को अथवा शरीर में स्थित हुए को और विषयों को भोगते हुए को अथवा तीनों गुणों से युक्त हुए को भी ज्ञानीजन नहीं जानते है केवल ज्ञानरूप नेत्रों वाले ज्ञानीजन ही तत्व से जानते हैं।

क्योंकि योगीजन भी अपने हृदय में स्थित हुए हस आत्मा को यत्न करते हुए ही तत्व से जानते हैं और जिन्होंने अपने अंतःकरण को शुद्ध नहीं किया है ऐसे अज्ञानीजन तो यत्न करते हुए भी हम आत्मा को नहीं जानते हैं। Continue reading

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