महावीर वाणी–(भाग–2) प्रवचन–15

पांच समितियां और तीन गुप्तियां—(प्रवचन—पंद्रहवां)

दिनांक 30 अगस्त, 1976;

तृतीय पर्युषण व्याख्यानमाला,

पाटकर हाल, बम्बई

लोकतत्व-सूत्र : 6

अट्ठ पवयणमायाओ, समिई गुत्ती तहेव य।

पंचेव य समिईओ, तओ गुत्तीओ आहिया ।।

इरियाभासेसणादाणे, उच्चारे समिई इय।

मणगुत्ती वयगुत्ती कायगुत्ती य अट्ठमा।।

एयाओ पंच समिईओ, चरणस्स य पवत्तणे।

गुत्ती नियत्तणे बुत्ता, असुभत्थेसु सव्वसो।।

एसा पवयणमाया, जे सम्मं आयरे मुणी।

से खिप्पं सव्वसंसारा, विप्पमुच्चइ पंडिए।।

पांच समिति और तीन गुप्ति–इस प्रकार आठ प्रवचन-माताएं कहलाती हैं।

ईर्या, भाषा, एषणा, आदान-निक्षेप और उच्चार या उत्सर्ग–ये पांच समितियां हैं। तथा मनोगुप्ति, वचनगुप्ति और कायगुप्ति–ये तीन गुप्तियां हैं। इस प्रकार दोनों मिलकर आठ प्रवचन-माताएं हैं।

पांच समितियां चारितरय की दया आदि प्रवृत्तियों में काम आती हैं, और तीन गुप्तियां सब प्रकार के अशुभ व्यापारों से निवृत्त होने में सहायक होती हैं।

जो विद्वान मुनि उक्त आठ प्रवचन-माताओं का अच्छी तरह आचरण करता है, वह शीघ्र ही अखिल संसार से सदा के लिए मुक्त हो जाता है। Continue reading

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महावीर वाणी–(भाग–2) प्रवचन–14

छह लेश्याएं : चेतना में उठी लहरे (प्रवचन—चौदहवां)

दिनांक 29 अगस्त, 1973;

तृतीय पर्युषण व्याख्यानमाला,

पाटकर हाल, बम्बई

 लोकतत्व-सूत्र : 5

किण्हा नीला य काऊ य, तेऊ पम्हा तहेव य।

   सुक्कलेसा य छट्ठा य, नामाइं तु जहक्कमं।।

किण्हा नीला काऊ, तिण्णि वि एयाओ अहम्मलेसाओ।

एयाहि तिहि वि जीवो, दुग्गइं उववज्जई।।

           तेऊ पम्हा सुक्का,

       तिन्नि वि एयाओ धम्मलेसाओ।

         एयाहि तिहि वि जीवो,

           सुग्गइं उववज्जई।।

कृष्ण, नील, कापोत, तेज, पदम और शुक्ल–ये लेश्याओं के क्रमशः छह नाम हैं।

कृष्ण, नील, कापोत–ये तीन अधर्म-लेश्याएं हैं। इन तीनों से युक्त जीव दुर्गति में उत्पन्न होता है।

तेज, पदम और शुक्ल–ये तीन धर्म-लेश्याएं हैं। इन तीनों से युक्त जीव सदगति में उत्पन्न होता है। Continue reading

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कहे कबीर दीवाना–प्रवचन–11

करो सत्संग गुरुदेव से—(प्रवचन—ग्‍यारहवां)

1 जून, 1975, प्रातः,

ओशो कम्यून इंटरनेशनल, पूना

सूत्र :

गुरुदेव बिन जीव की कल्पना ना मिटै।

गुरुदेव बिन जीव की भला नाहिं।।

गुरुदेव बिन जीव का तिमिर नासै नहिं।

समझि विचार लै मन माहि।।

रहा बारीक गुरुदेव तें पाइये।

जनम अनेक की अटक खोलै।।

कहै कबीर गुरुदेव पूरन मिलै।

जीव और सीव तब एक तोलै।।

करो सतसंग गुरुदेव से चरन गहि।

जासु के दरस तें भर्म भागै।।

सील औ सांच संतोष आवै दया।

काल की चोट फिर नाहिं लागै।।

काल के जाल में सकल जीव बांधिया।

बिन ज्ञान गुरुदेव घट अंधियारा।।

कहै कबीर बिन जन जनम आवै नहीं।

पारस परस पद होय न्यारा।।

अंधेरा नया नहीं, अति प्राचीन है। और ऐसा भी नहीं है कि प्रकाश तुमने खोजा न हो। वह खोज भी उतनी ही पुरानी है, जितना अंधेरा। क्योंकि यह असंभव ही है कि कोई अंधेरे में हो और प्रकाश की आकांक्षा न जगे। जैसे कोई भूखा हो और भोजन की आकांक्षा पैदा न हो। नहीं, यह संभव नहीं है। Continue reading

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महाबलवान हाथी का कीचड़ में फसना—(कथा—75)

एस धम्‍मो सनंतनो—(कथा—यात्रा)

 कौशल— नरेश के पास बद्धरेक नाम का एक महाबलवान हाथी था। उसके बल और पराक्रम की कहानियां दूर— दूर तक फैली थीं। लोग कहते थे कि युद्ध में उस जैसा कुशल हाथी कभी देखा ही नहीं गया था। बड़े— बड़े सम्राट उस हाथी को खरीदना चाहते थे पाना चाहते थे। बड़ों की नजरें लगी थीं उस हाथी पर। वह अपूर्व योद्धा था हाथी। युद्ध से कभी किसी ने उसको भागते नहीं देखा। कितना ही भयानक संघर्ष हो कितने ही तीर उस पर बरस रहे हो और भाले फेके जा रहे हो वह अडिग चट्टान की तरह खड़ा रहता था। उसकी चिंघाड़ भी ऐसी थी कि दुश्मनों के दिल बैठ जाते थे। उसने अपने मालिक कौशल के राजा की बड़ी सेवा की थी। अनेक युद्धों में जिताया था।

लेकिन फिर वह वृद्ध हुआ और एक दिन तालाब की कीचड़ में फंस गया। बुढ़ापे ने उसे इतना दुर्बल कर दिया था कि वह कीचड़ से अपने को निकाल न पाए। Continue reading

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विरोधी धर्म गुरूओं का बुद्ध पर कीचड़ उछालना—(कथा—74)

एस धम्‍मो सनंतनो—(कथा—यात्रा)

गवान् केर कौशांबी में विहरते समय की घटना है। बुद्ध—विरोधी धर्म गुरुओं ने गुंडों—बदमाशों को रुपए—पैसे खिला—पिलाकर भगवान का तथा भिक्षुसंघ का आक्रोशन? अपमान करके भगा देने के लिए तैयार कर लिया था। वे भिक्षुओं को देखकर भद्दी गालिया देते थे। नहीं लिखी जा सकें ऐसी शास्त्र कहते हैं। जो लिखी जा सके वे ये थी—भिक्षुनिकलते तो उनसे कहते तुम मूर्ख हो पागल हो झक्की हो, चोर—उचक्के हो बैल—गधे हो पशु हो पाशविक हो नारकीय हो पतित हो विकृत हो इस तरह के शब्द भिक्षुओं से कहते।

ये तो जो लिखी जा सकें। न लिखी जा सकें तुम समझ लेना।

वे भिक्षणिओं को भी अपमानजनक शब्द बोलते थे। वे भगवान पर तरह— तरह की कीचड़ उछालते थे। उन्होंने बड़ी अनूठी— अनूठी कहानियां गढ़ रखी थीं और उन कहानियों में उस कीचड़ में बहुत से धर्मगुरुओं का हाथ था। Continue reading

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बच्‍चों ने बुद्ध में चुम्‍बकीय आकर्षण देखा—(कथा—73)

एस धम्‍मो सनंतनो—(कथा—यात्रा)

 गौतम बुद्ध का नाम ही संकीर्ण सांप्रदायिक चित्त के लोगों को भयाक्रांत कर देता था। उस नाम में ही विद्रोह था। वह नाम आमूल क्रांति का ही पर्यायवाची था ऐसे भयभीत लोग स्वयं तो बुद्ध से दूर—दूर रहते ही थे अपने बच्चों को भी दूर—दूर रखते थे। बच्चों के लिए युवकों— युवतियों के लिए उनका भय स्वभावत: और भी ज्यादा था। ऐसे लोगों ने अपने बच्चों को कह रखा था कि वे कभी बुद्ध की हवा में भी न जाएं। उन्हें उन्होंने शपथें दिला रखी थीं कि वे कभी भी बुद्ध या बुद्ध के भिक्षुओं को प्रणाम न करेगे।

एक दिन कुछ बच्चे जेतवन के बाहर खेल रहे थे। खेलते—खेलते उन्हें प्यास लगी। वे भूल गए अपने माता—पिताओं और धर्मगुरुओं को दिए वचन और जेतवन में पानी की तलाश में प्रवेश कर गए। संयोग की बात कि भगवान से ही उनका मिलना हो गया। Continue reading

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कहे कबीर दीवाना–(प्रवचन–15)

आई ज्ञान की आंधी—(प्रवचन—पंद्रहवां)

दिनांक 5 जून, 1975, प्रातः,

ओशो कम्यून इंटरनेशनल, पूना

 सारसूत्र :

 संतों भाई आई ज्ञान की आंधी रे।

भ्रम की टाटी सबै उड़ानी, माया रहै न बांधी।।

हिति-चत की द्वै थूनी गिरानी, मोह बलींदा तूटा।

त्रिस्ना छानि परी घर ऊपरि, कुबुधि का भांडा फूटा।।

जोग जुगति करि संतौ बांधी निरचू चुवै न पानी।

कूड़ कपट काया का निकस्या, हरि की गति जब जानी।।

आंधी पीछे जो जल बूढ़ा, प्रेम हरी जन भीना।

कहै कबीर भान के प्रकटे उदित भया तम खीना।। Continue reading

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कहे कबीर दीवाना–प्रवचन–14

गुरु-शिष्य दो किनारे—(प्रवचन—चौदहावां)

दिनांक 4 जून, 1975, प्रातः,

ओशो कम्यून इंटरनेशनल, पूना

 प्रश्नसार :

1—सबके इतने सारे प्रश्न पाकर क्या आप धर्म-संकट में नहीं पड़ते?

 2—न संदेह को बढ़ा सकता हूं; न श्रद्धा को शुद्ध कर सकता हूं; ऐसे में क्या करूं?

 3—भाव और विचार में कब और कैसे सही-सही फर्क करें। मन में कई प्रश्न का उठना किंतु न पूछने का भाव।

4—जीवन में गहन पीड़ा का अनुभव। फिर भी वैराग्य का जन्म क्यों नहीं? Continue reading

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अष्‍टावक्र: महागीता–(भाग–6) प्रवचन–14

सिद्धि के भी पार सिद्धि है—(प्रवचन—चौहदवां)

दिनांक 8 फरवरी, 1977;

श्री ओशो आश्रम, पूना।

 जनमउवाच:

क्‍व भूतानि क्‍व देहो वा क्वेंद्रियाणि क्‍व वा मन:।

क्‍व शून्यं क्‍व व नैराश्यं मतस्वरूपे निरंजने।। 285।।

क्‍व शास्त्र क्यात्मविज्ञानं क्‍व वा निर्विषयं मन:।

क्‍व तृप्ति: क्‍व वितृष्णत्व गतद्वंद्वस्थ मे सदा।। 286।।

क्‍व विछा क्‍व न वाउविद्या क्याहं क्येदं मम क्‍व वा।

क्‍व बध: क्‍व च वा मोक्ष: स्वरूपस्थ क्‍व रूपिता।। 287।।

क्‍व प्रारब्‍धानि कर्माणि जीवनमक्तिरयि क्‍व जा।

क्‍व तद्विदेहकैवल्य निर्विशेषस्थ सर्वदा।। 288।।

क्‍व कर्ता क्‍व व वा भोक्ता निकियं स्करणं क्‍व वा।

क्यापरन्धें फलं वा क्‍व निस्वभावस्थ मे सदा।। 289।।

क्‍व लोक: क्‍व मुमुमुर्वा क्‍व योगी ज्ञानवान् क्‍व वा।

क्‍व बद्ध: क्‍व व वा मुक्त: स्वस्वरूयेध्हमद्वये।। 290।।

क्‍व सृष्टि: क्‍व व संहार: क्‍व साव्यं क्‍व च साधनम्।

क्‍व साधक: क्‍व सिद्धिर्वा स्वस्वरूयेऽहमद्वये।। 291।। Continue reading

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लव कुंठक भद्दीय स्‍थविर ने बुद्ध से विदा ली—(कथा—72)

एस धम्‍मो सनंतनो—(कथा—यात्रा)

यह बहुत अनूठा सूत्र है।

बुद्ध के अनूठे से अनूठे सूत्रों में एक। इसे खूब खयाल से समझ लेना।

प्रभातवेला आकाश में उठता सूर्य आम्रवन में पक्षियों का कलरव भगवान जेतवन में विहरते थे। उनके पास ही बहुत से आगंतुक भिक्षु भगवान की वंदना कर एक ओर बैठे थे। उसी समय लव कुंठक भद्दीय स्थविर भगवान से विदा ले कुछ समय के लिए भगवान से दूर जा रहे थे। उन्हें जाते देख भगवान ने उनकी ओर संकेत कर कहा— भिक्षुओ देखते हो इस भाग्यशाली भिक्षु को? वह माता— पिता को मारकर दुखरहित होकर जा रहा है।

माता—पिता को मारकर! वे भिक्षु भगवान की बात सुनकर चौके चौककर एक— दूसरे का मुंह देखने लगे कि भगवान ने यह क्या कहा? माता— पिता को मारकर दुखरहित होकर जा रहा है इस भाग्यशाली भिक्षु को देखो! उन्हें तो अपने कानों पर भरोसा नहीं हुआ! माता— पिता की हत्या से बड़ा तो कोई और पाप नहीं है। भगवान यह क्या कहते हैं? कहीं कुछ चूक है। या तो हम सुनने में चूक गए या भगवान कहने में चूक गए। माता— पिता के हत्यारे को भाग्यशाली कहना यह कैसी शिक्षा है? भगवान होश में हैं? Continue reading

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वैशाली में मृत्‍यु का तांडव नृत्‍य—(कथा—71)

एस धम्‍मो सनंतनो—(कथा—यात्रा)

क समय वैशाली में दुर्भिक्ष हुआ था और महामारी फैली थी। लोग कुत्तों की मौत पर रहे थे। मृत्यु का तांडव नृत्य हो रहा था। मृत्यु का ऐसा विकराल रूप तो लोगों ने कभी नहीं देखा था न सुना था। सब उपाय किए गए थे लेकिन सब उपाय हार गए थे। फिर कोई और मार्ग न देखकर लिच्छवी राजा राजगृह जाकर भगवान को वैशाली लाए। भगवान की उपस्थिति में मृत्यु का नंगा नृत्य धीरे— धीरे शांत हो गया था— मृत्यु पर तो अमृत की ही विजय हो सकती है। फिर जल भी बरसा था सूखे वृक्ष पुन: हरे हुए थे; फूल वर्षों से न लगे थे फिर से लगे थे फिर फल आने शुरू हुए थे। लोग अति प्रसन्न थे। Continue reading

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बुद्ध के परिनिर्वाण घोषणा और धम्‍माराम—(कथा—70)

एस धम्‍मो सनंतनो—(कथा—यात्रा)

 गवान के यह कहने पर कि चार माह के पश्चात मेरा परिनिर्वाण होगा भिक्षु अपने को रोक नहीं सके— जार— जार रोने लगे भिक्षुओं के आंसू बहने लगे। भिक्षुओं की तो क्या कही जाए बात अर्हतों के भी धर्मसंवेग का उदय हुआ। उनकी आंखें तो आंसुओ से नहीं भरी लेकिन हृदय उनका भी डांवाडोल हो गया

उस समय धम्माराम नाम के एक स्थविर ने यह सोचकर कि मैं अभी रागरहित नहीं हुआ और शास्ता का परिनिर्वाण होने जा रहा है इसलिए शास्ता के रहते ही मुझे अर्हत्व प्राप्त कर लेना चाहिए— ऐसा सोच एकांत में जाकर समग्र संकल्प से साधना में लग गया

धम्माराम उस दिन से एकांत में रहते मौन रखते ध्यान करते। भिक्षुओं के कुछ पूछने पर भी उत्तर नहीं देते थे स्वभावत; भिक्षुओं को इससे चोट लगी। धम्माराम अपने को समझता क्या है? पूछने पर उत्तर नहीं देता। उपेक्षा करता है। इस तरह चलता है जैसे अकेला है कोई यहां है ही नहीं। Continue reading

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ताओ उपनिषाद–(भाग–5) प्रवचन–90

पुनः अपने मूल स्रोत से जुड़ो—(प्रवचन—नब्‍बवां)

 अध्याय 52

 परम की चोरी

 ब्रह्मांड का एक आदि था,

जिसे ब्रह्मांड की माता माना जा सकता है।

माता से हम उसके पुत्रों को जान सकते हैं।

पुत्रों को जान कर, माता से जुड़े रहो;

इस प्रकार व्यक्ति का पूरा जीवन हानि से बचाया जा सकता है।

उसके छिद्रों को भर दो, उसके द्वारों को बंद करो,

और व्यक्ति का पूरा जीवन श्रम-मुक्त हो जाता है।

उसके छिद्रों को खुला छोड़ दो, उसके कारोबार में व्यस्त रहो,

और फिर आजीवन मुक्ति का कोई उपाय नहीं है।

जो लघु को देख सके, वह स्पष्ट दृष्टि वाला है;

जो कुलीनता के साथ जीता है, वह बलवान है।

प्रकाश को काम में लाओ, और स्पष्ट दृष्टि को पुनः प्राप्त करो।

इस प्रकार अपने को बाद में आने वाली पीड़ा से बचा सकते हो।

– इसे ही परम में विश्राम करना कहते हैं।

 लाओत्से को चोरी का प्रतीक बहुत प्रिय है। इस प्रतीक को थोड़ा हम समझ लें, फिर सूत्र में प्रवेश करें।

सूफी फकीर हुआ जुन्नैद। वह एक गांव से गुजरता था। और गांव के काजी ने एक चोर को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। गांव का काजी जुन्नैद का भक्त था। Continue reading

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ताओ उपनिषाद–(भाग–5) प्रवचन–89

ताओ या धर्म पारनैतिक है—(प्रवचन—नवासीवां)

 अध्याय 51

 रहस्यमय सदगुण

ताओ उन्हें जन्म देता है,

और तेह (चरित्र) उनका पालन करता है;

भौतिक संसार उन्हें रूपायित करता है;

और वर्तमान परिस्थितियां पूर्ण बनाती हैं।

इसलिए संसार की सभी चीजें ताओ की

पूजा करती हैं और तेह की प्रशंसा।

ताओ पूजित है और तेह प्रशंसित।

और ऐसा अपने आप है,

किसी के हुक्म से नहीं।

इसलिए ताओ उन्हें जन्म देता है,

तेह उनका पालन करता है,

उन्हें बड़ा करता है, विकास देता है,

उन्हें आश्रय देता है, शांति से रहने की जगह देता है।

यह उन्हें जन्म देता है, और उन पर स्वामित्व नहीं करता;

यह कर्म (सहायता) करता है, और उन्हें अधिकृत नहीं करता;

श्रेष्ठ है, और नियंत्रण नहीं करता।

– यही है रहस्यमय सदगुण।

 

शुभ को शुभ मानना साधारण सी बात है, कोई सदगुण नहीं। अशुभ को भी शुभ मानना सदगुण की महिमा है। साधु पर भरोसा तथ्यगत है, तुम्हारा कोई गौरव नहीं। असाधु पर भी भरोसा तुम्हारा गौरव है, सदगुण की श्रद्धा है। Continue reading

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कहे कबीर दीवान–प्रवचन–13

पिया मिलन की आस—(प्रवचन—तेरहवां)

3 जून, 1975, प्रातः,

ओशो कम्यून इंटरनेशनल, पूना

सूत्र :

आंखरिया झांई पड़ी, पंथ निहार निहार।

जीभड़िया छाला पड़ा, राम पुकारि पुकारि।।

इस तन का दीवा करौं, बाती मैल्यूं जीव। .

लोही सीचौं तेल ज्यूं, कब मुख देख्यौं पीव।।

सुखिया सब संसार है, खायै अरु सोवै।

दुखिया दास कबीर है, जागै अरु रोवै।।

नैन तो झरि लाइया, रहंट बहै निसुवार।

पपिहा ज्यों पिउ फिउ रटै, पिया मिलन की आस।।

कबीरा वैद बुलाइया, पकरि के देखो बांहि।

वैद न वेदन जानई, करक कलेजे मांहि।।

प्रभु की खोज बड़ी अनूठी है। क्योंकि जिसे हम खोजते हैं उसका कोई पता नहीं, कोई ठिकाना नहीं। वह है भी, यह भी पक्का नहीं। कोई मंजिल है, तब तो मार्ग पर चलना आसान हो जाता है। Continue reading

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कहे कबीर दीवान–प्रवचन–12

गुरु मृत्युप है—(प्रवचन—बारहवां)

दिनांक दिनांक 3 जून, 19?5, प्रातः,
ओशो कम्यून इंटरनेशनल, पूना

प्रश्न्सार :

1—सूत्रों की अपेक्षा हमारे प्रश्नों के उत्तर में आपके प्रवचन अधिक अच्छे लगते हैं। ऐसा क्यों?
2—झटका क्यों, हलाल क्यों नहीं?

3—शिक्षक देता है ज्ञान और गुरु देता है ध्यान। ध्यान देने का क्या अर्थ है?

4—आपके सतत बोलने में मिटाने की कौन सी प्रक्रिया छिपी है?

5—आपने कहा, शिष्य की जरूरत और स्थिति के अनुसार सदगुरु मार्गदर्शन करता है। आपके कथन में आस्था के बावजूद मार्गनिर्देशन के अभाव की प्रतीति।

6—आशा से आकाश टंगा है। क्या आशा छोड़ने से आकाश गिर न जाएगा?

7—क्या ब्राहमणों ने जातिगत पूर्वाग्रह के कारण कबीर को अस्वीकार कर दिया? Continue reading

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अष्‍टावक्र: महागीता–(भाग–6) प्रवचन–13

परमात्‍मा अनुमान नहीं, अनुभव है—प्रवचन—तैहरवां

दिनांक 7 फरवरी,1977;

श्री ओशो आश्रम, पूना।

पहला प्रश्न :

 मैं कभी जीवन के शिखर पर अनुभव करता हूं। ऐसा लगता है कि सब कुछ, जीवन का सब रहस्य पाया हुआ ही है। लेकिन फिर किन्हीं क्षणों में बहुत घनी उदासी और असहायता भी अनुभव करता हूं —मेरी वास्तविक समस्या क्या है, यह मेरी पकड़ में नहीं आता है।

शिखर जब तक है, तब तक घाटियां भी होंगी। शिखर की आकांक्षा जब तक है, तब तक घाटियों का विषाद भी झेलना होगा। सुख को जिसने मांगा, उसने दुख को भी साथ में ही मांग लिया। और सुख जब आया तो उसकी छाया की तरह दुख भी भीतर आ गया। Continue reading

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पंचेंद्रियों का संबर करने वाल पाँच बोद्ध—भिक्षुओं का विवाद—(कथा—69)

एस धम्‍मो सनंतनो—(कथा—यात्रा)

गवान के जेतवन में विहरते समय पांच ऐसे भिक्षु थे जो पंचेद्रिय में से एक— एक का संवर करते थे। कोई आंख का कोई कान का कोई जीभ का। एक दिन उन पांचों में बड़ा विवाद हो गया कि किसका संवर कठिन है। प्रत्येक अपने संवर को कठिन और फलत: श्रेष्ठ मानता था। विवाद की निष्पत्ति न होती देख अंतत: वे पांचों भगवान के चरणों में उपस्थित हुए और उन्होंने भगवान से पूछा : भंते! इन पांच इंद्रियों में से किसका संवर अति कठिन है?

भगवान हंसे और बोले भिक्षुओ! संवर दुष्कर है। संवर कठिन है। इसका संवर या उसका संवर नहीं— संवर ही कठिन है। भिक्षुओ। ऐसे व्यर्थ के विवादों में नहीं पड़ना चाहिए क्योंकि विवाद मात्र के मूल में अहंकार छिपा है। इसलिए विवाद की कोई निष्पत्ति नहीं हो सकती। विवादों में शक्ति व्यय न करके समग्र शक्ति संवर में लगाओ। सभी द्वारों का संवर करो। संवर में दुखमुक्ति का उपाय है। Continue reading

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स्‍थविर अंकूर का दान—(कथा—68)

एस धम्‍मो सनंतनो—(कथा—यात्रा)

गवान के तातविंस भवन में पांडुकमल शिलासन पर बैठे समय देवताओं में यह चर्चा चली— कि इंदक के अपने लिए लाए भोजन में से कलछीभर अनुरुद्ध स्थविर को दिया दान का फल अंकुर के दस हजार वर्ष तक बारह योजन तक चूल्हों की कतार बनवाकर दिए हुए दान से भी महाफल का हुआ। यह कैसा गणित है? इसके पीछे तर्क— सरणी क्या है?

इसे सुनकर शास्ता ने अंकुर से कहा : अंकुर! दान चुनकर देना चाहिए। ऐसा करने से वह अच्छे खेत में भली प्रकार बोए हुए बीज के सदृश्य महाफल होता है। किंतु तूने वैसा नहीं किया इसलिए तेरा दान महाफल नहीं हुआ। दान ही सब कुछ नहीं है; जिसे दिया वह भी अति महत्वपूर्ण है। और जिस भावदशा से दिया वह भी अति महत्वपूर्ण है। और तब उन्होंने ये गाथाएं कहीं. Continue reading

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कौशल नरेश का धन में उलझना—(कथा—67)

एस धम्‍मो सनंतनो—(कथा—यात्रा)

श्रावस्ती के एक अपुत्रक श्रेष्ठी के मर जाने के बाद कोशल नरेश ने सात दिन तक उसके धन को गाड़ियों में खुलवाकर राजमहल में मंगवाया। इन सात दिनों तक धन ढुलवाने में वह इस तरह उलझा कि भगवान के पास एक दिन भी न जा सका। वैसे साधारणत: वह नियम से प्रतिदिन प्रातःकाल भगवान के दर्शन और सत्संग के लिए आता था।

जिस दिन धन खुलवाने का कार्य पूरा हुआ उस दिन उसे भगवान की याद आयी सो वह भरी दुपहरी में ही भगवान के पास जा पहुंचा।

भगवान ने उससे दोपहर में आने का कारण पूछा। राजा ने सब समाचार बताए और फिर पूछा भंते। एक बात मेरे मन को मथे डालती है। उस अपुत्रक श्रेष्ठी के पास इतना धन था कि मुझे सात दिन लग गए गाडियों में ढुलवाते— ढुलवाते तब बामुश्किल उसके धन को राजमहल ला पाया हूं। फिर भी वह रूखा— सूखा खाता था! फटा— पुराना पहनता था! और टूटे हुए. जराजीर्ण रथों पर चलता था! Continue reading

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