यात्रा एक नये अायाम की……..

ओशो— एक परिचय

सत्य की व्यक्तिगत खोज से लेकर ज्वलंत सामाजिक व राजनैतिक प्रश्नों पर ओशो की दृष्टि उनको हर श्रेणी से अलग अपनी कोटि आप बना देती है। वे आंतरिक रूपांतरण के विज्ञान में क्रांतिकारी देशना के पर्याय हैं और ध्यान की ऐसी विधियों के प्रस्तोता हैं जो आज के गतिशील जीवन को ध्यान में रख कर बनाई गई हैं।DSC_1209
अनूठे ओशो सक्रिय ध्यान इस तरह बनाए गए हैं कि शरीर और मन में इकट्ठे तनावों का रेचन हो सके, जिससे सहज स्थिरता आए व ध्यान की विचार रहित दशा का अनुभव हो।
ओशो की देशना एक नये मनुष्य के जन्म के लिए है, जिसे उन्होंने ‘ज़ोरबा दि बुद्धा ‘ कहा है— जिसके पैर जमीन पर हों, मगर जिसके हाथ सितारों को, छू सकें। ओशो के हर आयाम में एक धारा की तरह बहता हुआ वह जीवन—दर्शन है जो पूर्व की समयातीत प्रज्ञा और पश्चिम के विज्ञान और तकनीक की उच्चतम संभावनाओं को समाहित करता है। ओशो के दर्शन को यदि समझा जाए और अपने जीवन में उतारा जाए तो मनुष्य—जाति में एक क्रांति की संभावना है। Continue reading

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पतंजलि: योगसूत्र–(भाग–4) प्रवचन–75

अंतर—ब्रह्मांड के साक्षी हो जाओ—(प्रवचन—पंद्रहवां)

 योग—सूत्र:

मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम।। 33।।

सिर के शीर्ष भाग के नीचे की ज्योति पर संयम केंद्रित करने से समस्‍त सिद्धों के अस्तित्व से जुड्ने की क्षमता मिल जाती है।

प्रातिभाद्वा सर्वम्।। 34।।

प्रतिभा के द्वारा समस्‍त वस्‍तुओं का बोध मिल जाता है।

ह्रदये चित्‍तसंवित्।। 35।।

ह्रदय पर संयम संपन्‍न करने से मन की प्रकृति, उसके स्‍वभाव के प्रति जागरूकता आ बनती है। Continue reading

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पतंजलि: योगसूत्र–(भाग–4) प्रवचन–74

अहंकार अटकाने को खूँटा नहीं—(प्रवचन—चौदहवां)

प्रश्‍न–सार:

1—क्या संबुद्ध होना और साथ ही संबोधि के प्रति चैतन्‍य होना संभव है? क्या संबुद्ध का विचार स्वय में अहंकार उत्पन्न नहीं कर देता है?

 2—मैं अक्‍सर दो मन में रहता हूं—सूर्य और चंद्र मन में। कृपया कुछ कहें।

 3—आप कहते है कि बुद्ध पुरूष कभी स्‍वप्‍न नहीं देखते। फिर च्वांगत्‍सु ने कैसे स्‍वप्‍न देखा कि वह तितली है?

 4—स्व—निर्भर होने के लिए पतंजलि की विधि या आपकी विधि क्या है?

अध्‍यात्‍मिक व्‍यक्‍ति ठीक—ठीक वर्तमान के क्षणों में कैसे जी सकता है?

रोज के व्‍यावहारिक जीवन में क्षण—क्षण, वर्तमान में जीने की आदत कैसे बनायी जाए?

 5—क्‍या राम संबोधि को उपलब्‍ध हो गया है? Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–5) प्रवचन–135

बेशर्त स्‍वीकार—(प्रवचन—आठवां)

अध्‍याय—11

सूत्र—

सजय उवाच:

एतच्‍छुत्वा वचनं केशवस्थ कृताज्जलिर्वेयमान किरीटी।

नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीत प्रणम्य।। 35।।

अर्जुन उवाच:

स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्यहृष्यगुरज्यते च।

रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघा।। 36।।

कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोउध्यादिकर्त्रे।

अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्यरं यत्।। 37।।

त्वमादिदेव: पुरूष पुराणस्‍त्‍वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।

वेत्तामि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप।। 38।। Continue reading

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पतंजलि: योगसूत्र–(भाग–4) प्रवचन–73

अंतर—ब्रह्मांड के साक्षीहो जाओ—(प्रवचन—तेरहवां)

योग—सूत्र:

चंद्रे ताराव्‍यूहज्ञानम् ।। 28।।

चंद्र पर संयम संपन्न करने से तारों—नक्षत्रों की समेग्र व्‍यवस्‍था का ज्ञान प्राप्त होता है।

धुवे तद्गतिज्ञानम्।। 29।।

ध्रुव—नक्षत्र पर संयम संपन्न करने से तारों—नक्षत्रों की गतिमयता का ज्ञान प्राप्त होता है।

नाभिचक्रै कायव्‍यूहज्ञानम् ।। 30।।

नाभि चक्र पर संयम संपन्‍न करने से शरीर की संपूर्ण संरचना का ज्ञान प्राप्त होता है।

कण्‍ठकूपे क्षुत्‍पिपासानिवृति: ।। 31।।

कंठ पर संयम संपन्‍न करने से क्षुधानु पिपासा की अवभूतियां क्षीण हो जाती है। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–5) प्रवचन–134

साधना के चार चरण—(प्रवचन—सांतवां)

अध्‍याय—11

सूत्र—

श्रीभगवागुवाच:

कालोउस्थि लोकक्षयकृत्यवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्त:।

ऋतेउयि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येउवस्थिता प्राचनीकेषु ।। 32।।

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून्भुड्क्ष्‍व राज्यं समृद्धम्।

मयैवैते निहता: पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्।। 33।।

द्रोणं च भीष्म च जयद्रथ च कर्ण तथान्यानयि योधवीरान्।

मया हतांस्त्‍वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान्।। 34।।

इस प्रकार अर्जुन के क्रने पर श्रीकृष्ण भगवान बोले हे अर्जुन मैं लोकों का नाश करने वाला बडा हुआ महाकाल हूं। इस समय हन लोकों को नष्ट करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूं। इसलिए जो प्रतियक्षियों की सेना में स्थित हुए योद्धा लोग हैं वे सब तेरे बिना भी नहीं रहेंगे अर्थात तेरे युद्ध न करने मे भी सबका नाश हो जाएगा। Continue reading

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पतंजलि: योगसूत्र–(भाग–4) प्रवचन–72

मैं एक पूर्ण झूठ हूं—(प्रवचन—बारहवां)

प्रश्‍न—सार:

1—आपके शिष्य अचानक संबोधि को उपलब्ध होंगे, या चरण दर चरण विकास के द्वारा संबुद्ध होंगे?

 2—क्या अज्ञान के कारण किए कर्मों के लिए भी व्यक्ति उत्‍तरदायी होता है?

 3—रामकृष्ण ने भोजन का उपयोग शरीर में रहने के लिए खूंटी की भांति किया। आप शरीर में बने रहने के लिए किस खूंटी का उपयोग करते हैं?

 4—आपने कहा कि काम—वृत्‍ति पर एकाग्रता ले आने से व्‍यक्‍ति संबुद्ध हो सकता है। लेकिन क्‍या काम—वृति पर एकाग्रता ले आने से व्‍यक्‍ति का अहंकार नहीं बढ़ता?

 5—कृपा करके संयम और संबोधि के भेद को हमें समझाएं।

 6—एक शराबी की दूसरे से गुफ्तगू: आपकी शराब सबसे मधुर और मीठी है।

 7—क्‍या कभी आप झूठ बोलते है? Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–5) प्रवचन–133

पूरब और पश्‍चिम: नियति और पुरूषार्थ—(प्रवचन—छठवां)

अध्‍याय—11

सूत्र—

यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतंगा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः।

तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवायि वक्ताणि समृद्धवेगाः।। 29।।

लेलिह्यमे ग्रसमान: समन्ताल्लोकान्समग्रान्त्रदनैर्ज्वलदभि:।

तेजोभिरायर्य जगत्ममग्रं भासस्तवोग्रा: प्रतयन्ति विष्णो।। 3०।।

आख्याहि मे को भवागुग्ररूपो नमोउख ते देववर प्रसीद।

विज्ञखमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्।। 3।।

अथवा जैसे पतंग मोह के वश होकर नष्ट होने के लिए प्रज्वलित अग्नि में अति वेग से युक्त हुए प्रवेश करते हैं वैसे ही ये सब लोग भी अपने नाश के लिए आपके मुखों में अति वेग से युक्त हुए प्रवेश करते हैं।

और आप उन संपूर्ण लोकों को प्रज्वलित मुखों द्वारा ग्रसन करते हुए सब ओर से चाट रहे हैं। हे विष्णो आपका उग्र प्रकाश संपूर्ण जगत को तेज के द्वारा परिपूर्ण करके तपायमान करता है। Continue reading

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पतंजलि: योगसूत्र–(भाग–4) प्रवचन–71

मृत्‍यु और कर्म का रहस्‍य—(प्रवचन—ग्‍यारहवां)

योग—सूत्र:

सोपक्रमं निरूपक्रमं च कर्म तत्‍संयमादपरान्‍तज्ञानमरिष्‍टेभयो वा।। 23।।

सक्रिय व निष्किय या लक्षणात्मक व विलक्षणात्‍मक—इन दो प्रकार के कर्मों पर संयम पा लेने के बाद मृत्यु की ठीक—ठीक घड़ी की भविष्‍य सूचना पायी जा सकती है।

 मैत्र्यादिषु बलानि।। 24।।

मैत्री पर संयम संपन्‍न करने से या किसी अन्य सहज गुण पर संयम करने से उस गुणवत्‍ता विशेष में बड़ी सक्षमता आ मिलती है।

बलेषु हस्‍तिबलादीनि।। 25।।

हाथी के बल पर संयम निष्‍पादित करने से हाथी की सी शक्‍ति प्राप्‍त होती है।

प्रवृत्‍यालोकन्‍यासात्‍सूक्ष्‍मव्‍यवहितविप्रकृष्‍टज्ञानम्।। 26।।

पराभौतिक मनीषा के प्रकाश को प्रवर्तित करने से सूक्ष्‍म का बोध होता है। प्रच्‍छन्न का अोर दूरस्‍थ तत्‍वों का ज्ञान प्राप्‍त होता है।

भुवनज्ञानं सूर्ये संयमात्।। 27।।

सूर्य पर संयम संपन्‍न करने से संपूर्ण सौर—ज्ञान की उपलब्‍धि होती है। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–5) प्रवचन–132

अचुनाव अतिक्रमण है—(प्रवचन—पांचवां)

अध्‍याय—11

सूत्र:

रूपं महत्ते कवक्तनेत्रं महाबाहो बहुबाक्रयादम्।

बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं हूड़वा लोका: प्रव्यथितास्तथाहम्।। 23।।

नभ:स्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्।

दृष्ट्रवा हि त्वां प्रव्यखितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो।। 24।।

दंष्ट्राकरालानि व ते मुखानि दृष्ट्रवैव कालानलसब्रिभानि।

दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास।। 25।।

अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्थ युत्रा: सर्वे सहैवावनियालसंघै:।

भीष्मो द्रोण: सूतमुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरयि योधमुख्यै।। 26।।

वक्वाणि ते स्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि।

केचिद्विलग्ना दशनान्तरेपु संदृश्यन्ते चूर्णितेरुत्तमाङ्गै।। 27।।

यथा नदीनां बहवोउखुवेगा समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति।

तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्ताण्यभिविज्वलन्ति।। 28।। Continue reading

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पतंजलि: योगसूत्र–(भाग-4) प्रवचन–70

खतरे में जीओ—(प्रवचन—दसवां)

प्रश्‍न—सार:

 1—मेरी अधिक बैचेनी अपने महा— अहंकार को लेकर है,

जो इस झूठे अहंकार पर इतने वर्षों तक निगाह रखता रहा है।

  2—भगवान, मैं चाहता हूं कि आप एक—एक ही बार में सदा—सदा के लिए मिटा दें।

  3—जब मैं निर्णय लेने का प्रयत्‍न करता हूं तो चिंतित हो जाता हूं,

कि मैं कहीं गलत चुनाव न कर लूं। यह कैसा पागलपन है?

 4—ध्‍यान के दौरान मैं आपकी शून्‍यता को पुकारता हूं।

क्‍या इस विधि के द्वारा मैं आपके समग्र अस्‍तित्‍व को

आत्‍म सात कर सकता हूं? Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–5) प्रवचन–131

परमात्‍मा का भयावह रूप—(प्रवचन—चौथा)

अध्‍याय—11

सूत्र:

त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम।

त्वमध्यय: शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्ल पुरुषो मतो मे।।। 18।।

अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम्।

पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्तं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्।। 19।।

द्यावायृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्त स्वयैकेन दिशश्च सर्वा:।

दृष्ट्वाइभुतं रूयमुग्रं तवेदं लोकत्रय प्रव्यथितं महात्मन्।। 20।।

अमी हि त्वां सुरसंधा विशन्ति केचिद्रभीता प्राज्जत्नयो ग्दाणन्ति।

स्वस्तीत्युक्ता महर्षिसिद्धसंधा: स्तुवन्ति ना खतिभि पुष्कलाभि।। 21।।

रुद्रादित्या वसवो ये व साध्या विश्वेउश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च।

गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसंघा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे।। 22।।

इसलिए हे भगवन— आय ही जानने योग्य परम अक्षर हैं अर्थात परब्रह्म परमात्मा हैं और आय ही हल जगत के परम आश्रय हैं तथा आय ही अनादि धर्म के रक्षक हैं और आय ही अविनाशी सनातन पुरुष हैं, ऐसा मेरा मत है।

हे परमेश्वर मैं आपको आदि अंत और मध्य से रहित तथा अनंत सामर्थ्य से युक्त और अनंत हाथों वाला तथा चंद्र— सूर्य रूप नेत्रों वाला और प्रज्वलित अग्निरूप मुख वाला तथा अपने तेज से हम जगत को तपायमान करता हुआ देखता हूं। Continue reading

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पतंजलि: योगसूत्र–(भाग–4) प्रवचन–69

अनूठा अस्‍तित्‍व में—(प्रवचन—नौंवा)

योग—सूत्र :

प्रत्ययस्य परिचित्‍तज्ञानम्।। 19।।

जो प्रतिछवि दूसरों के मन को घेरे रहती है, उसे संयम द्वारा जाना जा सकता है।

न च तत्सालम्बनं तस्याविषयीभूतत्वात्।। 20।।

लेकिन संयम द्वारा आया बोध उन मानसिक तथ्यों का ज्ञान नहीं करवा सकता जो कि दूसरे के मन की छवि—प्रतिछवि को आधार देते है, क्‍योंकि वह बात संयम की विषय—वस्‍तु नहीं होती है। Continue reading

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दीया तले अंधेरा–(झेन–कथा) प्रवचन–20

‘मैं’ की मुक्ति नहीं, ‘मैं’ से मुक्ति—(प्रवचन—बीसवां)

दिनांक 10 अक्टूबर, 1974.

श्री ओशो आश्रम, पूना।

भगवान!

 सदगुरु तासोत्सु ने तीन रोधक (ईंततपमते) निर्मित किये। और उन्हें वे साधुओं से पार करवाते थे।

पहला रोधक: झेन का अध्ययन है। झेन के अध्ययन का उद्देश्य है, अपने ही सच्चे स्वभाव का दर्शन करना।

अब तुम्हारा सच्चा स्वभाव क्या है?

दूसरा: जब कोई अपने सच्चे स्वभाव को प्राप्त कर लेता है तब वह जन्म और मृत्यु से मुक्त हो जायेगा।

अब जब तुम प्रकाश को अपनी आंखों से छिपा लेते हो और एक लाश हो रहते हो, तब तुम अपने को कैसे मुक्त कर सकते हो?

तीसरा: यदि तुम अपने को जन्म और मृत्यु से मुक्त कर लेते हो, तो तुम्हें जानना चाहिये कि तुम कहां हो?

अब तुम्हारा शरीर चार तत्वों में अलग-अलग हो जाता है।

तुम कहां हो?

 भगवान! इन झेन रोधकों को हमारे लिए स्पष्ट करने की अनुकंपा करें। Continue reading

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दीया तले अंधेरा–(झेन–कथा) प्रवचन–19

परिधि के विसर्जन से केंद्र में प्रवेश—(प्रवचन—उन्नीसवां)

दिनांक 9 अक्टूबर, 1974.

श्री ओशो आश्रम, पूना।

भगवान!

 सदगुरु जोशु उस जगह पर गए जहां एक भिक्षु ध्यान कर रहा था। उन्होंने भिक्षु से पूछा, ‘जो है, सो क्या है?’ ‘What is, is what?’

भिक्षु ने अपनी मुट्ठी उठाई।

जोशु ने उत्तर दिया, ‘जहाज वहां नहीं रह सकते जहां पानी बहुत उथला हो।’ और वे चले गए।

कुछ दिनों के बाद सदगुरु जोशु फिर उस भिक्षु के पास गए, और उन्होंने वही प्रश्न पूछा। भिक्षु ने पुराने ढंग से ही उत्तर दिया।

जोशु ने कहा, ‘अच्छा दिया, अच्छा लिया, अच्छा मारा, अच्छा बचाया।’ ‘Well given, well taken, well Killed, well saved.’और उन्होंने भिक्षु को झुककर प्रणाम किया।

 भगवान! इस झेन बोध-कथा का अभिप्राय समझाने की कृपा करें। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–5) प्रवचन–130

धर्म है आश्‍चर्य की खोज—(प्रवचन—तीसरा)

अध्‍याय—11

सूत्र–

दिवि सूर्यसहसस्थ भवेह्यगफत्सिता।

यदि भा: सदृशी सा स्यादृभासस्तस्थ महात्मन:।। 12।।

तत्रैकस्थं जगकृत्‍स्‍नं प्रविभक्तमनेकधा।

अयश्यद्देवदेवस्थ शरीरे पाण्डवस्तदा।। 13।।

तत: छ विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनंजय:।

प्रणम्य शिरसा देवं कृताज्जलिरभाषत।। 14।।

अर्जुन उवाच:

पश्यामि देवास्तव देव देहे सर्वास्तंथा भूतविशेषसंघान्।

ब्रह्माणमीश कमलासनस्थमृषीश्च सर्वागुरगांश्ब दिव्यान्।। 15।।

अनेकबाहूदरवक्तनेत्र यश्यामि त्वां सर्वतोउनन्तरूपम्।

नान्तं न मध्यं न गुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूय।। 16।।

किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम्।

पश्यामि त्वां दुर्निरीक्य समन्ताद्दीप्तानलार्कह्यतिमप्रमेयम्।। 17।।

और हे राजन् आकाश में हजार सूर्यों के एक साथ उदय होने से उत्पन्‍न हुआ जो प्रकाश हो वह भी उस विश्वरूप परमात्मा के प्रकाश के सदृश कदाचित ही होवे।

ऐसे आश्चर्यमय रूय को देखते हुए पांडुपुत्र अर्जुन ने उस काल में अनेक प्रकार से विभक्त हुए अर्थात पृथक— पृथक हुए संपूर्ण जगत को उस देवों के देव श्रीकृष्ण भगवान के शरीर में एक जगह स्थित देखा।

और उसके अनंतर वह आश्चर्य से युक्त हुआ हर्षित रोमों वाला अर्जुन विश्वरूप परमात्मा को श्रद्धा— भक्ति सहित सिर से प्रणाम करके हाथ जोड़े हुए बोला। Continue reading

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दीया तले अंधेरा–(सूफी–कथा) प्रवचन–18

 समर्पित हृदय में ही सत्य का अवतरण—(प्रवचन—अठारहवां)

दिनांक 8 अक्टूबर, 1974.

श्री ओशो आश्रम, पूना।

भगवान!

 सूफी सत्य के खोजी माने जाते हैं–उस सत्य के जो विषयगत हकीकत ९ठइरमबजपअम तमंसपजल० का ज्ञान होता है।      

एक अज्ञानी, लालची और प्रजापीड़क राजा ने निश्चय किया कि मैं इस सत्य को भी अपने अधिकार में ला कर रहूंगा। स्पेन के मुर्सिया नामक स्थान का स्वामी था वह और नाम था उसका रोडरिक। उसने यह भी तय किया कि तरागोना के सूफी उमर-अल-अलावी को यह सत्य बताने के लिए मजबूर किया जाये।

फलतः उमर को गिरफ्तार कर राज-दरबार में हाजिर किया गया। रोडरिक ने उनसे कहा, ‘मैंने निर्णय किया है कि जो सत्य आप जानते हैं उसे आप मुझे उन शब्दों में बता देंगे जिन्हें मैं समझ सकूं। और यदि ऐसा नहीं हुआ तो आपको अपनी जिंदगी से हाथ धोना पड़ेगा।’ Continue reading

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पतंजलि: योगसूत्र–(भाग–4) प्रवचन–68

नहीं और हां के गहनतम तल—(प्रवचन—आठवां)

प्रश्‍नसार:

1—क्‍या सार्त्र में झेन—चेतना है?

 2–हरमन हेस के सिद्धार्थ ने बुद्ध से कहा : मुझे अपने ही ढंग से चलते जाना है—या मर जाना है। इस पर आप कुछ कहेंगे?

 3—अगर कहीं कोई व्‍यक्‍ति रूप परमात्‍मा नहीं है, तो आप हर सुबह मेरे मनोविचारों का उत्‍तर क्‍यों देते है?

 4—उस करीब—करीब योगी ह्रदय के विषय में आपके उत्‍तर न मुझे निम्‍नलिखित संवाद की याद दिला दी है:

पत्‍नी: प्रिय, जब से हमारा विवाह हुआ तुम मुझे ज्‍यादा प्‍यार करते हो या कम?

पति: ज्‍यादा या कम। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–5) प्रवचन–129

दिव्‍य—चक्षु की पूर्व—भूमिका—(प्रवचन—दूसरा)

अध्‍याय—11

सार—सूत्र

न तु मां शक्यसे द्रष्‍टुमनेनैव स्वच्रुषा।

दिव्यं ददामि ते चक्षु: पश्य मे योगमैश्वरम।। 8।।

 संजय उवाच:

श्वमुक्ला ततो राजन्यहायोगेश्वरो हरि:।

दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्।। 9।।

अनेकवक्तनयनमनेकादूभुतदर्शनम्।

अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतामुधम्।। 10।।

दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धागुलेयनम्।

सर्वाश्चर्यमय देवमनन्तं विश्वतोमुखम्।। 11।।

परंतु मेरे को इन अपने प्राकृत नेत्रों द्वारा देखने को तू निःसंदेह समर्थ नहीं है इसी से मैं तेरे लिए दिव्य अर्थात अलौकिक चक्षु देता हूं, उससे तू मेरे प्रभाव को और योगशक्ति को देख।

संजय बोले हे राजन— महायोगेश्वर और सब पापों के नाश करने वाले भगवान ने इस प्रकार कहकर उसके उपरांत अर्जुन के लिए परम ऐश्वर्ययुक्त दिव्य स्वरूय दिखाया। Continue reading

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पतंजलि: योगसूत्र–(भाग–4) प्रवचन–67

उदासीन ब्रह्मांड में—(प्रवचन—सातवां)

योग—सूत्र:

कमान्यत्वं परिणामन्‍यत्‍वे हेतु:।। 15।।

आधारभूत प्रक्रिया में छिपी अनेकरूपता द्वारा रूपांतरण में

कई रूपांतरण घटित होते हैं।

परिणामत्रयसंयमादतीतानागतज्ञानम्।। 16।।

निराध, समाधि, एकाग्रता—इन तीन प्रकार के रूपांतरणों में

संयम उपलब्‍ध करने से—अतीत और भविष्य का ज्ञान उपलब्‍ध, होता है।

शब्‍दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्‍यासात्।। 17।।

शब्द और अर्थ और उसमें अंतर्निहित विचार, ये सब उलझाव पूर्ण स्‍थिति में,

मन में एक साथ चले आते है। शब्‍द पर संयम पा लेने से पृथकता घटित होती है

और तब किसी भी जीव द्वारा नि:सृत ध्‍वनियों के अर्थ का व्‍यापक बोध घटित होता है। Continue reading

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दीया तले अंधेरा–(सूफी–कथा) प्रवचन–17

अतियों से बचकर मध्य में जीना प्रज्ञा है—(प्रवचन—सत्रहवां)

दिनांक 7 अक्टूबर, 1974.

श्री ओशो आश्रम, पूना।

भगवान !

 महान सुलतान महमूद एक दिन अपनी राजधानी गजनी की सड़कों पर घूम रहे थे। उन्होंने देखा कि एक गरीब भारिक पीठ पर भारी पत्थर का बोझ लिये दम तोड़ रहा है। उसकी हालत से द्रवीभूत होकर महमूद ने शाही ढंग से हुक्म दिया, ‘ओ भारिक, उस पत्थर को नीचे गिरा दे।’

तुरंत ही आज्ञा का पालन हुआ। पर पत्थर उस रास्ते पर राहगीरों की बाधा बन कर बहुत वर्षों पड़ा रहा। अंत में अनेक नागरिकों ने बादशाह से प्रार्थना की कि वे उस पत्थर के हटाये जाने का हुक्म निकालें। प्रशासकीय बुद्धि से विचार कर सुलतान ने कहा, ‘जो हुक्म के द्वारा किया गया है, वह वैसे ही समान हुक्म से रद्द नहीं किया जा सकता। क्योंकि उससे लोग यही सोचेंगे कि शाही फरमान झक से प्रेरित होते हैं। पत्थर जहां है, वहीं रहेगा।’

नतीजा हुआ कि सुलतान महमूद के जीते जी वह पत्थर वहीं रहा। और जब वे मरे, तब भी शाही हुक्म के आदर के लिए उसे नहीं हटाया गया। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–5) प्रवचन–128

विराट से साक्षात की तैयारी—(प्रवचन—पहला)

श्रीमद्रभगवद्रगीता

अथ एकादशोउध्‍याय:

अर्जुन उवाच:

मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम्।

यत्वयोक्तं वचस्तेन मोहोउयं विगतो मम।। 1।।

भवाध्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया।

त्वत: कमलयत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम्।। 2।।

एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर।

द्रष्ट्रमिच्छामि ते रूपमैश्वरं गुरुषोत्तम।। 3।।

मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रछमिति प्रभो।

योगेश्वर ततो मे त्‍वं दर्शयात्मानमव्ययम्।। 4।। Continue reading

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दीया तले अंधेरा–(झेन–कथा) प्रवचन–16

धर्म का मूल रहस्य स्वभाव में जीना है—(प्रवचन—सोलहवां)

दिनांक 6 अक्टूबर, 1974.

श्री ओशो आश्रम, पूना।

भगवान!

 सेहेई के शिष्य सुईबी ने एक दिन अपने गुरु से पूछा, ‘गुरुदेव, धर्म का मूल रहस्य क्या है?’

सदगुरु ने कहा, ‘प्रतीक्षा करो। और जब हम दोनों के अतिरिक्त यहां कोई भी नहीं होगा, तब मैं तुम्हें बताऊंगा।’

और फिर उस दिन बहुत बार ऐसे मौके आये जब कि वे दो ही झोपड़े में थे और हर बार सुईबी ने अपने प्रश्न भी दुहराये, लेकिन वह अपना प्रश्न पूरा भी नहीं कर पाता था, कि सेहेई अपने होठों पर उंगली रख कर उसे चुप होने को इशारा कर देते थे।

और फिर सांझ हो गई और सदगुरु का झोपड़ा बिलकुल खाली हो गया। शिष्य ने फिर पूछना चाहा, लेकिन फिर वही होठों पर रखी हुई उंगली उत्तर में मिली।

फिर रात उतर आयी और पूर्णिमा का चांद आकाश में ऊपर उठ आया।

सुईबी ने कहा, ‘अब मैं और कब तक प्रतीक्षा करूं?’

तब सेहेई उसे लेकर झोपड़े के बाहर आ गये और उसके कानों में उन्होंने फुसफुसा कर कहा, ‘बांसों के ये वृक्ष यहां लम्बे हैं और बांसों के ये वृक्ष यहां छोटे हैं। और जो जैसा है वैसा है–इसकी पूर्ण स्वीकृति ही स्वभाव में प्रतिष्ठा है। और स्वभाव धर्म है। और स्वभाव में जीना धर्म का मूल रहस्य है। शब्द में धर्म की अभिव्यक्ति है–तथाता ९एनबीदमे० और निःशब्द में उसकी अभिव्यक्ति है–शून्यता (विंपकदमे)।’

 भगवान! इस झेन बोध-कथा को हमें विस्तार से समझाने की अनुकंपा करें! Continue reading

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पतंजलि: योगसूत्र–(भाग–4) प्रवचन–66

तुम यहां से वहां नहीं पहुंच सकते—(प्रवचन—छठवां)

प्रश्‍नसार:

1—मैं हमेशा एक ही जैसे प्रश्‍न बार—बार क्यों पूछती हूं?

 2–मुझे आपके प्रवचनों में आज तक एक भी विरोधाभास नहीं मिला। क्या मुझमें कुछ गलत है?

 3—तुम यहां से वहां नहीं पहुंच सकते।

 4—क्‍या स्वच्छ होने की प्रक्रिया मन की झलकी को नए रूप देगी?

 5–मेरा शरीर रोगी है, मेरा मन भोगी है, और मेरा ह्रदय करीब—करीब योगी है। क्‍या मेरे इस जन्‍म में संबुद्ध होने की कोई संभावना है?

 6 जब आप शरीर छोड़ें, तो मैं भी आपके साथ मर जाना चाहता हूं।

 7—जब भी आपके निकट होता हूं तो तनाव महसूस करता हूं।

 8—अनुग्रह प्रकट करने के लिए मैं आपके लिए क्‍या कर सकता हूं?

 9—कृप्‍या संगीत और ध्‍यान के विषय में कुछ कहें।

 10—आप कुर्सी पर इतने आराम से बैठे होते है कि एकदम भारविहीन मालूम पड़ते है।

आप गुरूत्‍वाकर्षण के नियम के साथ क्‍या करते है? Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–5) प्रवचन–127

मंजिल है स्‍वयं में—(प्रवचन—पंद्रहवां)

अध्‍याय—10

सूत्र—

यच्चायि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन

तदस्ति विना यत्‍स्‍यान्मया भूतं चराचरम्।। 39।।

नान्तोउस्ति मम दिव्यानां विभूतीना परंतप

एक् तूद्देशत: प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया।। 40।।

यद्यद्विभूतिमत्सत्वं श्रीमदूर्जितमेव वा

तत्तदेवावगच्छ स्वं मम तेजोंउशसंभवम्।। 41।।

अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन

विष्टथ्याहमिदं कृत्नमेकांशेन स्थितो जगत।। 42।।

और हे अर्जुन जो सब भूतों की उत्पलि का कारण है वह भी मैं ही हूं क्योंकि ऐसा वह चर और अचर कोई भी भूत नहीं है कि जो मेरे से रहित होवे

हे परंतप मेरी दिव्य विभूतियों का अंत नहीं हैयह तो मैने अपनी विभूतियों का विस्तार तेरे लिए संक्षेप से कहा हैइसलिए हे अर्जुन जोजो भी विभूतियुक्त अर्थात

ऐश्वर्ययुक्त एवं कांतियुक्त और शक्तियुक्त वस्‍तु है, उसउस को तू मेरे तेज के अंश से ही उत्पन्‍न हुर्ड़ जान

अथवा हे अर्जुन हम बहुत जानने से तेरा क्या प्रयोजन है। मैं हस संपूर्ण जगत को अपनी योगमाया के एक अंशमात्र से धारण करके स्थित हूंइसलिए मेरे को ही तत्व से जानना चाहिए Continue reading

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पतंजलि: याेगसूत्र–(भाग–4) प्रवचन–65

अस्‍तित्‍व के शून्‍यों का एकात्रीकरण—(प्रवचन—पांचवां)

योग—सत्र:

सर्वार्थतैकाग्रतयो: क्षयोदयौ चित्‍तस्‍य समाधिपारिणाम:।। ।।।।

समाधि परिणाम वह आंतरिक रूपांतरण है, जहां चित को तोड्ने वाली अशांत वृत्तियों का क्रमिक ठहराव आ जाता है और साथ ही साथ एकाग्रता उदित होती है।

शांन्‍तोदितौ तुल्यप्रत्ययौ चित्तस्यैकाग्रतापरिणाम:।। 12।।

एकाग्रता परिणाम वह एकाग्र रूपांतरण है, चित्त की ऐसी अवस्‍था है,

जहां चित का विचार—विषय जो कि शांत हो रहा होता है,

वह अगले ही क्षण ठीक वैसे ही विचार विषय द्वारा प्रतिस्‍थापित हो जाता है।

एतेन भूतेन्‍दियेषु धर्मलक्षणावस्‍थापरिणामा व्‍याख्‍याता:।। 13।।

जो कुछ अंतिम चार सूत्रों में कहा गया है, उसके द्वारा मूल—तत्‍वों और इंद्रियों की

विशिष्‍टताओं, उनके गुण—धर्म और उनकी अवस्‍थाओं के

रूपांतरणों की व्‍याख्‍या भी हो जाती है। Continue reading

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