अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग–1) प्रवचन–20

अद्वैत प्रीति की परमदशा है—बीसवां प्रवचन

दिनांक 30 जनवरी 1978;

श्री रजनीश आश्रम, पूना

 प्रश्‍न सार :

 1–भक्ति सहज, इसलिए वैज्ञानिक। सहज को वैज्ञानिक कहने का आपका आशय क्या है?

      प्रीति अद्वैत है तो अद्वैत के नाम पर जो कहा जाता रहा है, वह क्या है?

 2–भगवान बुद्ध और भगवान कृष्ण के दो परस्पर विरोधी लगने वाले वचनों पर प्रकाश डालने       के लिए भगवान से अनुरोध।

 3–प्रवचन के बाद आपको जाते हुए देखती हूं तो एक निःश्वास निकल जाती है कि एक दिन   और व्यर्थ गया! कि एक दिन यह दिव्यपुरुष ऐसे ही आंखों से ओझल हो जाएगा और ऐसे   ही खड़ी—खड़ी देखती रह जाऊंगी।

 4–मैं अपना प्रेम प्रकट नहीं कर पाया। न मालूम कौन से भय ने पंगु बना रखा है। यह अविकसित    प्रेम कैसे भक्ति बनेगा?

 5–अब हम करें क्या? Continue reading

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अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग–1) प्रवचन–19

सब हो रहा है—उन्‍नीसवां प्रवचन

दिनांक  27 जनवरी 1978;

श्री रजनीश आश्रम, पूना

 सूत्र :

तद्वाक्यशेषात् प्रादुर्भावेष्‍वपि सा।।46।

      जन्मकर्म्मविदश्चाजन्मशब्दात्।।47।।

      तच्च दिव्यं स्वशक्तिमात्रोद्भवात्।।48।।

      मुख्य तस्य हि कारुण्यम्।।49।।

      प्राणित्वान्न विभूतिषु।।50।।

      ‘युक्तौ च सम्परायात्।

प्रकृति और पुरुष दो नहीं हैं। आत्मा और परमात्मा दो नहीं हैं। दृश्य और दृश्या दो नहीं हैं। भक्ति की यह आधारशिला है कि एक होने का उपाय है। एक होने का उपाय तभी हो सकता है, जब वस्तुत: हम एक हों ही। यथार्थ से अन्यथा नहीं हो सकता। भक्त भगवान से मिल सकता है तभी, जब मिला ही हुआ हो। जब पूर्व से ही मिला हो, जब प्रथम से ही विरह न हुआ हो, बिछुडून न हुई हो। Continue reading

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अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग-1) प्रवचन–18

विरह की परिपूर्णता ही परमात्मा से मिलन—अठारहवां प्रवचन

दिनांक  28 जनवरी 1978;

श्री रजनीश आश्रम, पूना

 प्रश्‍न सार :

 1–आपने कहा जो सहज है वही भक्त है, वही भक्ति है। पर हमारे जीवन की सहजताएं किस भांति भक्ति कहे जा सकते हैं?

 2–भगवान का प्रवचन आंख बंद करके सुनना, या खुली आंख सुनना? एक साधिका की समस्या।

 3–यह मन—पंछी बहुत ऊंची उड़ाने भरता है, लेकिन पहुंचता कहीं नहीं। प्रभु, इस पर कुछ कहने की अनुकंपा करें।

 4–शीघ्र समाधि की चाह एक भयंकर तनाव बनी जा रही है। मैं क्या करूं?

 5–क्या ध्यान भक्ति और ज्ञान से परे तीसरा ही कोई मार्ग है?

 6–विरह क्या है? Continue reading

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अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग–1) प्रवचन–17

भक्ति अति स्वाभाविक है—सत्रहवां प्रवचन

दिनांक  27 जनवरी 1978;

श्री रजनीश आश्रम, पूना।

सूत्र :

युकतौ च सम्परायात्।।41।।

      शक्तित्वान्नानृत वेद्यम्।।42।।

      तत्परिशुद्धिश्च गम्यालोकवल्लिंगेभ्य:।।43।।

      सम्मान बहुमान प्रीति विरहेतर विचिकित्सा।

      महिमख्याति तदर्थ प्राण स्थान तदीयता सर्व तदभावा।

      प्रातिकूल्यादीनिच स्मरचेभ्यो बाहुल्यात्।।44।।

      द्वेषादयस्तु नैवम्।।45।।

       पूर्व—सूत्र—

‘चैत्याचितोर्नतितीयम्।

चैत्य और चित्त, शेय और ज्ञान, दृश्य और द्रष्टा से भिन्न कोई तीसरा पदार्थ जगत में नहीं है। ‘ जगत को दो में बांटा जा सकता है। जानने वाले मे और जो जाना जाता है। मैं और तू में। यह अंतिम विभाजन है। इसके भी भीतर गए तो विभाजन समाप्त हो जाते हैं, भेद गिर जाते है। यहा तक भेद की सीमा है, यहां तक भेद का लोक है। फिर द्रष्टा में और गहरे गए, या दृश्य मे गहरे गए तो दोनों के भीतर एक का ही आविर्भाव होता है। Continue reading

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अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग–1) प्रवचन–16

धर्म आमूल बगावत है—सोलहवां प्रवचन

दिनांक 26 जनवरी 1978;

श्री रजनीश आश्रम, पूना

 प्रश्‍न सार :

 1–क्या भक्ति और ज्ञान का भेद सतही है? क्या गहरे में दोनों एक हैं?

 2–क्या धर्म विद्रोह है?

 3–क्या संन्यास भक्ति की शुरुआत है?

 4–मैं तो प्रेम से बहुत पीड़ित हो चुका हूं; और आप कहते हैं—

      प्रेम का ऊर्ध्वगमन ही भक्ति है। अब उस कीचड़ में और नहीं पड़ना चाहता।

 5–भक्त, भक्ति और भगवान, इन तीनों शब्दों को समझाएं।

 6–आपके पास आना और बैठना अच्छा लगता है। प्रवचन सुनने के बाद लगता है कि कोई

      गहरा नशा किया हो; ध्यान वगैरह करने की भी इच्छा नहीं होती। पर संन्यास लेने की इच्छा होने लगी है। क्या इस योग्य हूं? Continue reading

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अष्‍टावक्र: महागीता (भाग–5) प्रवचन–12

सदगुरूओं के अनूठे ढंग—(प्रवचन—बारहवां)

दिनांक  22 जनवरी, 1977

श्री रजनीश आश्रम, पूना।

पहला प्रश्न :

 कृष्णमूर्ति परम ज्ञानी होकर भी अन्य सदगुरूओं के कार्यों की निंदा, आलोचना क्यों करते हैं?

 ब तक परम ज्ञानी न हो जाओ, न समझ सकोगे। अज्ञान के तल से जो निंदा और आलोचना मालूम होती है, ज्ञान के तल से वह केवल करुणा है। तुम भटक न जाओ इसलिए; तुम गलत में न पड़ जाओ इसलिए; जब श्रेष्ठ उपलब्ध हो तो तुम निकृष्ट न चुन लो इसलिए। Continue reading

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महावीर वाणी (भाग–1) प्रवचन–17

सामायिक : स्‍वभाव में ठहर जाना—(प्रवचन—सत्रहवां)

दिनांक 3 सितम्‍बर, 1971;

प्रथम पर्युषण व्‍याख्‍यानमाला,

पाटकर हाल; बम्‍बई

 धम्म—सूत्र:

धम्मो मंगलमुकिट्ठं,

अहिंसा संजमो तवों।

देवा वि तं नमंसन्ति,

जस्म धम्मे सया मणो।।

धर्म सर्वश्रेष्ठ मंगल है। (कौन सा धर्म?) अहिंसा, संयम और तपरूप धर्म। जिस मनुष्य का मन उक्त धर्म में सदा संलन्‍ग रहता है, उसे देवता भी नमस्कार करते हैं।

 ग्‍यारहवां तप या पांचवां अंतर—कर—तप है ध्यान। जो दस तपो से गुजरते है उन्हें तो ध्यान को समझना कठिन नहीं होता। लेकिन जो केवल दस तपो को समझ से समझते हैं, उन्हें ध्यान को समझना बहुत कठिन होता है। फिर भी कुछ संकेत ध्यान के संबंध में समझे जा सकते हैं। Continue reading

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ताओ उपनिषाद (भाग–3) प्रवचन–58

सनातन शक्ति, जो कभी भूल नहीं करती—(प्रवचन—अट्ठावनवां)

 अध्याय 28 : खंड 1

 स्त्रैण में वास

 जो पुरुष को तो जानता है,

लेकिन स्त्रैण में वास करता है,

वह संसार के लिए घाटी बन जाता है।

और संसार की घाटी होकर,

वह उस मूल स्वरूप में स्थित रहता है,

जो अखंड है।

और वह पुनः शिशुवत

निर्दोषता को उपलब्ध हो जाता है।

जो शुक्ल (प्रकाश) के प्रति होशपूर्ण है,

लेकिन कृष्ण (अंधेरे) के साथ जीता है,

वह संसार के लिए आदर्श बन जाता है।

और संसार का आदर्श होकर,

उसको वह सनातन शक्ति प्राप्त हो जाती है,

जो कभी भूल नहीं करती।

और वह पुनः अनादि अनस्तित्व में वापस लौट जाता है।

स सूत्र में प्रवेश के पूर्व कुछ बुनियादी बातें समझ लेनी जरूरी हैं। Continue reading

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ताओ उपनिषाद (भाग–3) प्रवचन–57

शुद्धा, संस्कार, पुनर्जन्म, कीर्तन व भगवत्ता—(प्रवचन—सत्‍तावनवां)

 प्रश्न-सार

1-श्रद्धा अंधविश्वास कैसे न बने?

 2-कोई गरीब क्यों, कोई अमीर क्यों?

 3-पुनर्जन्म का हिसाब कहां रहता है?

 4-प्रवचन के बाद कीर्तन क्यों?

 5-आप शिष्य किसके हैं?

 6-आप अपने को भगवान क्यों कहते हैं?

 7-बहुत से सवाल हैं।

 एक मित्र ने पूछा है, श्रद्धा अंधविश्वास न बने, इसके लिए क्या करें?

हली बात, श्रद्धा के परिणाम से निर्णीत होता है कि श्रद्धा श्रद्धा है या अंधविश्वास है। आप किसी पर श्रद्धा करते हैं। वह आदमी गलत भी हो सकता है। वह श्रद्धा का पात्र न भी हो, यह भी हो सकता है। Continue reading

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अष्‍टावक्र: महागीता (भाग–5) प्रवचन–11

निराकार ,निरामय साक्षित्व—(प्रवचन—ग्‍यारहवां)

दिनांक 21 जनवरी, 1977;

श्री रजनीश आश्रम, कोरेगांवपार्क पूना।

 अष्टावक्रउवाच।

अकर्तृत्वमभोक्तृत्व वात्मनो मन्यते यदा।

तदा क्षीणा भवंत्येव समस्ताश्चित्तवृत्तय:।।22?।।

उच्छृंखलाप्यकृतिका स्थितिर्धीरस्य सजते।

न तु संस्पृहचित्तस्य शांतिर्मूढुस्य कृत्रिमा।।228।।

विलसन्ति महाभोगैर्विशन्ति गिरिगह्वरान्।

निरस्तकल्पना धीरा अबद्धा मुकाबुद्धय:।।229।।

श्रोत्रिय देवता तीर्थमंगनां अति प्रियम्।

दृष्ट्वासम्पूज्य धीरस्यनकापिहृदिवासना।।23०।।

भृत्यै: पुत्रै: कलत्रैश्च दौहित्रैश्चापि गोत्रजै:।

विहस्यधिक्कृतोयोगीनयातिविकृतिमनाक्।।231।।

संतुष्टोऽपि न संतुष्ट: खिन्नोऽपि न च खिद्यते।

तस्याश्चर्यदशां तां तां तादृशा व जानन्ते।।232।।

कर्तव्यतैव संसारो न तां पश्यन्ति सूरय।

शून्याकारा निराकारा निर्विकारा निरामयाः।।233।। Continue reading

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एक ओंकार सतनाम –(प्रवचन–1)

 एक ओंकार सतनाम—(नानक)

ओशो

 नानक ने परमात्मा को गा-गा कर पाया। गीतों से पटा है मार्ग नानक का। इसलिए नानक की खोज बड़ी भिन्न है। पहली बात समझ लेनी जरूरी है कि नानक ने योग नहीं किया, तप नहीं किया, ध्यान नहीं किया। नानक ने सिर्फ गाया। और गा कर ही पा लिया। लेकिन गाया उन्होंने इतने पूरे प्राण से कि गीत ही ध्यान हो गया, गीत ही योग बन गया, गीत ही तप हो गया।

अहंकार तुम्हारी आंख में पड़ी हुई कंकड़ी है। उसके हटते ही परमात्मा प्रकट हो जाता है। परमात्मा प्रकट ही था, तुम मौजूद न थे। नानक मिटे, परमात्मा प्रकट हो गया। जैसे ही परमात्मा प्रकट हो जाता है, तुम भी परमात्मा हो गए। क्योंकि उसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है।

नानक लौटे; परमात्मा हो कर लौटे। फिर उन्होंने जो भी कहा है, एक-एक शब्द बहुमूल्य है। फिर उस एक-एक शब्द को हम कोई भी कीमत दें तो भी कीमत छोटी पड़ेगी। फिर एक-एक शब्द वेद-वचन हैं।

अब हम जपुजी को समझने की कोशिश करें।

इक ओंकार सतिनाम

करता पुरखु निरभउ निरवैर।

अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरु प्रसादि।।

ओशो

 आदि सचु जुगादि सचु—(प्रवचन—पहला)

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अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग–1) प्रवचन–15

भक्ति अंतिम सिद्धि है—पंद्रहवां प्रवचन

दिनांक 25 जनवरी 1978;

श्री रजनीश आश्रम, पूना

 सूत्र :

सर्वानृते किमितिवेन्नैव बुद्धधानत्त्वात्।।36।।

      प्रकृत्यन्तरालादवैकार्यचित्त्वेनानुवर्तमानत्वात्।।37।।

      तत्पष्ठिगृहपीठवत्।।38।।

      मिथेपेक्षणादुभयम्।।39।।

      चैत्याचितोर्नत्रितीयम्।।40।।

एक दृष्टि पूर्व—सूत्रों पर।

शांडिल्य ने कहा— भक्ति परम दशा है। परम दशा यानी भगवत्ता। जंहा भक्त और भगवान में भेद न रह जाए। जब तक भेद है, तब तक अज्ञान है। जब तक दूरी है, तब तक मिलने की प्यास, मिलने की पीड़ा कायम रहेगी। इंचभर भी दूरी हो, तो दुख मौजूद रहेगा। सारी दूरी मिट जाए, Continue reading

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अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग–1) प्रवचन–14

परमात्मा परमनिर्धारणा का नाम—चौदहवां प्रवचन

दिनांक 24 जनवरी 1978;

श्री रजनीश आश्रम, पूना

 प्रश्‍न सार :

1–हसीद फकीरों ने मैं —तू भाव से;सूफियो एवं भक्तो ने तू— भाव से; वेदांत, उपनिषद एवं जैन परंपरा ने मैं— भाव से; बुद्ध एवं झेन परंपरा ने न मैं—न तू— भाव से और शांडिल्य ऋषि ने उभयपरा—स्वयाद्— भाव—से ईश्वर को अभिव्यक्त किया। पर आप तो पिछले सभी उपायो से अभिव्यक्ति दे रहे हैं!

 2–आपने कहा, नेति—नेति ज्ञान का और इति—इति भक्ति का उदघोष है। भक्ति के इस उदघोष में तो अंधेरा, कल्मष, पाप, सब आ जाते हैं। क्या परमात्मा सब है?

 3–तथ्य और सत्य में क्या अंतर है?

 4–मैं असंतुष्ट हूं हर बात से असंतुष्ट। और कभी—कभी सोचता हूं कि आनंद मेरे भाग्य में ही नहीं। Continue reading

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अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग–1) प्रवचन–13

स्वभाव यानी परमात्मा—तेरहवां प्रवचन

दिनांक 23 जनवरी 1978;

श्री रजनीश आश्रम, पूना

 सूत्र :

अभयपरां शांडिल्य: शब्दोपपत्तिभ्याम्।।31।।

      वैषम्यादऽसिद्धमितिचेन्नाभिज्ञानवदवैशिष्ट्यात।।32।।

      न च क्लिष्ट: परस्मादनन्तरं विशेषात्।।33।।

      ऐश्वर्ये तथेति चेन्‍न स्वाभाव्यात्।।34।।

      अप्रतिषिद्धं परैश्वर्थ्य तद्भावाच्च नैवमितरेषाम्।।35।।

        प्रभु को पाना कठिन। लेकिन उसे पाकर उसे कहना और भी कठिन। पाना इतना कठिन नहीं है, क्योंकि वस्तुत: हम उससे क्षणभर को भी दूर नहीं हुए है। मछली सागर में ही है। सागर का विस्मरण हुआ है, जिस क्षण याद आ जाएगी उसी क्षण सागर मिल गया। सागर छूटा कभी न था। Continue reading

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अथातो भक्‍त्‍ि जिज्ञासा (भाग–1) प्रवचन–12

भक्ति एकमात्र धर्म—बारहवां प्रवचन

दिनांक  22 जनवरी 1978;

श्री रजनीश आश्रम, पूना

 प्रश्‍न सार :

 1–शुभ क्या है, अशुभ क्या है? फिर शुभाशुभ के पार क्या है?

 2–जीवन दुख है, फिर भी आदमी जागता नहीं। जीवन के नर्क के बावजूद आदमी जीए किस तरह चले जाता?

 3–जिसे चाहो वह ठुकराता क्यों है?

 4–ज्ञान, ध्यान और योग के मुकाबले में भक्ति अधिक परंपराग्रस्त और रूढ़िवादी क्यों?

 5–आपने अपने प्रेमी और प्रेयसी में भी परमात्मा ही देखने को कहा, यह मेरी समझ में नहीं आया। शरीर के नाते—रिश्ते व वासना के संबंधों में कहा परमात्मा! Continue reading

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अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग-1) प्रवचन–11

भक्ति आत्यंतिक क्रांति है—ग्‍यारहवां प्रवचन

दिनांक 21 जनवरी 1978;

श्री रजनीश आश्रम, पूना

 सूत्र :

ब्रह्मकांडं तु भक्तौ तस्यानुज्ञानाय सामान्यात्।।26।।

      बुद्धिहेतुप्रवृत्तिराविशुद्धेरवधातवत्।।27।।

      तदङगानाज्‍च।।28।।

      तामैंश्वर्थ्यपदा काश्यप: परत्वात्।।29।।

      आत्मैकपरां बादरायण:।।30।।

      मनुष्य का अस्तित्व तीन तलों में विभाजित है—शरीर, बुद्धि, हृदय। या दूसरी तरह से कहें तो कर्म, विचार और भाव। इन तीनों तलों से स्वयं की यात्रा हो सकती है। स्थूलतम यात्रा होगी कर्मवाद की। इसलिए धर्म के जगत में कर्मकांड स्थूलतम प्रक्रिया है। Continue reading

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अष्‍टावक्र: महागीता (भाग–5) प्रवचन–9

स्वातन्त्रात् परम पदम–(प्रवचन—नौवां)

दिनांक 19 जनवरी, ।977;

श्री ओशो आश्रम कोरगांव पार्क पूना,

 सूत्र:

विषयद्वीपिनो वीक्ष्य चकिता शरणार्थिन:।

विशंति झटिति क्रोड निरोधैकाग्न्यसिद्धये।। 22।।।

निर्वासन हरि दृष्टत्वा तूष्णीं विषयदतिन।

पलायंते न शक्तास्ते सेवते कृतचाटव।। 222।।

न मुक्तिकारिका धते निशको युक्तमानस:।

पश्यन्धृण्वन्स्पृशनजघ्रन्नश्नन्नास्ते यथासुखम्।। 223।।

वस्तु श्रवणमात्रेण शुद्धबुद्धिर्निराकु ल:।

नैवाचारमनाचारमौदास्य वा प्रपश्यति।। 224।।

यदा यत्कर्तुमायाति तदा तत्कुरुते ऋजु:।

शुभं वाप्यशुभं वापि तस्य चेष्टा हि बालवत्।। 225।।

स्वातब्यात् सुखमान्नोति स्वातंन्याल्लभते परम।

स्वातष्यान्निर्वृतिं गच्छेत् स्वातंव्वात् परमं पदम-।। 226।। Continue reading

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महावीर वाणी (भाग–1) प्रवचन–16

वैयावृत्य और स्वाध्याय—(प्रवचन—सोलहवां)

दिनांक 2 सितम्बर, 1971;

प्रथम पर्युषण व्याख्यानमाला,

पाटकर हाल, बम्बई

 धम्म-सूत्र:

धम्मो मंगलमुक्किट्ठं,

अहिंसा संजमो तवो।

देवा वि तं नमंसन्ति,

जस्स धम्मे सया मणो ।।

धर्म सर्वश्रेष्ठ मंगल है। (कौन सा धर्म?) अहिंसा, संयम और तपरूप धर्म। जिस मनुष्य का मन उक्त धर्म में सदा संलग्न रहता है, उसे देवता भी नमस्कार करते हैं।

 

तीसरा अंतरत्तप महावीर ने कहा है, वैयावृत्य। वैयावृत्य का अर्थ होता है–सेवा। लेकिन महावीर सेवा से बहुत दूसरे अर्थ लेते हैं। Continue reading

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ताओ उपनिषाद (भाग–3) प्रवचन–56

शिष्य होना बड़ी बात है—(प्रवचन—छप्‍पनवां)

अध्याय 27 : खंड 2

 प्रकाशोपलब्धि

 इसलिए सज्जन दुर्जन का गुरु है;

और दुर्जन सज्जन के लिए सबक है।

जो न अपने गुरु को मूल्य देता है,

और न जिसे अपना सबक पसंद है,

वह वही है जो दूर भटक गया है,

यद्यपि वह विद्वान हो सकता है।

यही सूक्ष्म व गुह्य रहस्य है।

 जीवन में ऐसा कुछ भी नहीं है जो उपयोगी न हो–वह चाहे अच्छा हो या बुरा। अच्छा और बुरा हमारी परिभाषाओं के कारण है। लेकिन अस्तित्व में उसकी अपनी अपरिहार्य जगह है। इसलिए जो जानते हैं, वे बुरे का भी उपयोग कर लेते हैं। Continue reading

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ताओ उपनिषाद (भाग–3) प्रवचन–55

 प्रकाश का चुराना ज्ञानोपलब्धि है–(प्रवचन–पचपनवां)

अध्याय 27 : खंड 1

 प्रकाशोपलब्धि

 एक कुशल धावक पदचिह्न नहीं छोड़ता है।

एक बढ़िया वक्तव्य प्रतिवाद के लिए दोषरहित होता है।

एक कुशल गणक को गणित्र की जरूरत नहीं होती।

ठीक से बंद हुए द्वार में

और किसी प्रकार का बोल्ट लगाना अनावश्यक है,

फिर भी उसे खोला नहीं जा सकता।

ठीक से बंधी गांठ के लिए रस्सी की कोई जरूरत नहीं है,

फिर भी उसे अनबंधा नहीं किया जा सकता।

संत लोगों का कल्याण करने में सक्षम हैं;

इसी कारण उनके लिए कोई परित्यक्त नहीं है।

संत सभी चीजों की परख रखते हैं;

इसी कारण उनके लिए कुछ भी त्याज्य नहीं है।

– इसे ही प्रकाश का चुराना या ज्ञानोपलब्धि कहते हैं। Continue reading

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