सुन भई साधो–(प्रवचन–20)

उपलब्धि के अंतिम चरण—(प्रवचन—बीसवां)

 सूत्र:

पारब्रह्म के तेज का, कैसा है उनमान।

कहिवे को सोभा नहीं, देखा ही परमान।।

 एक कहौं तो है नहीं, दोय कहौं तो गारि।

है जैसा तैसा रहे, कहै कबीर विचारि।। पढना जारी रखे

Posted in कबीर दास--सुन भई साधो | Tagged , , , , | टिप्पणी करे

भावना के भौज पत्र–04

”भावना के भोजपत्रों पर जन्‍म—जन्‍मान्‍तर के आनंद अक्षर’’

 मा आनंदमयी से एक भेंट वार्ता:

शरीर प्रवासी बना बस में हिचकोले भरता अपने गंतव्य पर पहुंचने को आतुर था। चांदा (चंद्रपुर) प्रवास मेरे लिए कोई नया नहीं था। किंतु जाने क्यों आज सब कुछ नया—नया लग रहा था। पिछले तीस वर्षों से जिस शहर के इतने करीब रहा हू वही आज मेरे लिए परीलोक का रहस्य बतलाता सा प्रतीत हो रहा था। जुलाई की आस भरी यात्रा थी, परंतु भीतर इतनी आनंदामृत की फुहारें झर रहीं थी कि वह आस भी रोमाचित सी करती प्रतीत हो रही थी। चांदा पहुंचते—पहुंचते एकाएक सारा आसमान कालिमा की छतरीनुमा सा बन गया था। आसमान के चारों किनारों पर प्रकाश की ‘पाईपिंग’ लगी सी प्रतीत हो रही थी। संध्या के घनी होते—होते पढना जारी रखे

Posted in भावना के भोज पत्र--(ओशो) | Tagged , , , , , | टिप्पणी करे

भावना के भोज पत्र–(03)

मां आनंदमयी एक परिचय—

नाभिव्यक्त संबंधों को अभिव्यक्त करने के लिए लेखनी को कितनी—कितनी अग्नि परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है यह आज अनुभूत हो रहा है मुझे। मां आनंदमयी से जाने कितनी बार मैं मिला हूं। जाने कितने जन्मों में मिले और बिछुड़े हैं हम। सुशीला (मां की छोटी पुत्री) के विवाह मैं आचार्य रजनीश आनेवाले हैं ऐसा सुन रखा था। मुझे सुशीला ने अपनी सहेली कला के पड़ोसी मित्र के रूप में कौतूहलवश ‘आमंत्रित कर रखा था। मां से मेरा परिचय सुशीला ने कराया…”मां सा. ये अपनी कला कपूर के पड़ोसी प्रोफेसर विकल गौतम हैं।’‘ पढना जारी रखे

Posted in भावना के भोज पत्र--(ओशो) | Tagged , , , , | 3 टिप्पणियाँ

सुन भई साधो–(प्रवचन–19)

प्रार्थना है उत्सव—(प्रवचन—उन्‍नीसवां)

सूत्र:

सुख में सुमिरन ना किया, दुख में कीया याद।

कह कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद।।

 सुमिरन सुरत लगाइके, मुख ते कछू न बोल।

बाहर के पट देइकै, अंतर के पट खोल।। पढना जारी रखे

Posted in कबीर दास--सुन भई साधो | Tagged , , , , | टिप्पणी करे

दस हजार बुद्धो की एक सौ गथाएं–(अध्‍याय–45)

अध्‍याय—(पैत्‍तालीसवां)

श्रीनगर में एक सप्ताह रुकने के बाद पहलगाम चलना निश्चित होता है। पहलगाम चारों ओर पर्वतों से घिरी, कश्मीर की सर्वाधिक सुंदर घाटी है। मैं कुछ मित्रों के साथ, पहाड़ी रास्ते से घोड़े पर बैठकर पहलगाम जाने का निश्चय करती हूं।

ओशो कार से वहां पहुंचेगे। घोड़े से वहां की बड़ी कठिन यात्रा है, (कसकर जब किसी को घुडसवारी न आती हो। किसी तरह, थककर चूर हम पहलगाम पहुंचते हैं। कुछ मित्र, जो पहले से ही वहाँ पहुंच गए हैं वे हमारा इंतजार कर रहे हैं। पढना जारी रखे

Posted in दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(मा धर्मज्‍योति) | Tagged , , , , | टिप्पणी करे

दस हजार बुद्धो की एक सौ गथाएं–(अध्‍याय–44)

अध्‍याय—(चव्‍वालीसवां)

ज लक्ष्मी ने डल झील में नौका—विहार के लिए इंतजाम किया है। ओशो, क्रांति, शीलू और मैं झील पर पहुंचते हैं। वहां पर लक्ष्मी हमारा इंतजार कर रही है। एक शिकार! लंबी—सी मोटी रस्सी के साथ एक मोटरबोट से बांधा गया है। लक्ष्मी, शीलू और मैं मोटरबोट में बैठ जाते हैं और ओशो क्रांति के साथ शिकारे में बैठते हैं। पढना जारी रखे

Posted in दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(मा धर्मज्‍योति) | Tagged , , , , | टिप्पणी करे

सुन भई साधो–(प्रवचन–18)

शिष्यत्व महान क्रांति है—(प्रवचन—अट्ठारहवां)

 सूत्र:

गूंगा हूवा बावला, बहरा हूवा कान।

पाऊं थैं पंगुल भया, सतगुरु मारया बान।।

 माया दीपक नर पतंग, भ्रमि भ्रमि इवैं परंत।

कहैं कबीर गुरु ग्यान थैं, एक आध उबरंत।। पढना जारी रखे

Posted in कबीर दास--सुन भई साधो | Tagged , , , , | 1 टिप्पणी

दस हजार बुद्धो की एक सौ गाथाएं–(अध्‍याय–43)

अध्‍याय—(तेरालीसवां)

बंबई के व दिल्ली के मित्रों की दो अलग—अलग रसोइया हैं। बंबई के मित्रों का रसोइया गुजराती भोजन तैयार करता है और दिल्ली के मित्र पंजाबी भोजन तैयार करवाते हैं, दोनों ही भोजन अलग—अलग किस्म के हैं। दोनों ही चाहते हैं कि ओशो उनका भोजन खाएं। तो अंतत: यह तय होता है कि ओशो सुबह का भोजन दिल्ली के मित्रों के साथ करेंगे और रात का भोजन बंबई के मित्रों के साथ। मुझे मित्रों की मूढ़ता व दुराग्रह पर बहुत गुस्सा आता है। पढना जारी रखे

Posted in दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(मा धर्मज्‍योति) | Tagged , , , , | टिप्पणी करे

दस हजार बुद्धो की एक सौ गाथाएं–(अध्‍याय–42)

अध्‍याय—(बयालीसवां)

शो रोज सुबह और शाम अपनी कॉटेज के लिविंगरूम में ही प्रवचन करने का निर्णय करते हैं। क्योंकि वहा एक ही बाथरूम है इसलिए मैं सुबह जल्दी उठकर नहा लेती हूं और फिर बाथरूम उनके लिए तैयार कर देती हूं। लिविंगरूम में मैंने फर्श पर एक गद्दा बिछा रखा है, जिस पर रात को मैं सो जाती हूं और सुबह उसे मोड़कर और एक सफेद चादर से ढककर उस पर कुछ तकिए रख देती हूं ताकि एक आरामदेह आसन बन जाए, जिस पर बैठकर ओशो प्रवचन दे सकें। प्रवचन के दौरान मैं अपना कैसेट रिकार्डर लेकर उनके पास ही बैठ जाती हूं। पढना जारी रखे

Posted in दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(मा धर्मज्‍योति) | Tagged , , , , | टिप्पणी करे

दस हजार बुद्धो की एक सौ गाथाएं–(अध्‍याय–41)

अध्‍याय—(इक्‍कतालीसवां)

ट्ठारह दिन के लिए कश्मीर में ”महावीर” पर एक प्रवचन माला आयोजित की गई है।

ओशो जबलपुर से दिल्ली गाड़ी में आएंगे और फिर दिल्ली से श्रीनगर प्लेन द्वारा। बंबई से हम कोई तीस मित्र हैं जो उन्हें वहां मिलेंगे इसके अलावा दिल्ली से बीस और मित्रों का ग्रुप श्रीनगर आ रहा है।

श्रीनगर में, डल झील के पास छोटी सी पहाड़ी पर बनी कॉटेजेज्ज चश्मे—शाही’ में पूरे ग्रुप के ठहरने की व्यवस्था की गई है। बंबई का ग्रुप वहां अपेक्षाकृत पहले पहूंच जाता है और हमें अपनी—अपनी कॉटेज का चुनाव करने का अवसर मिल जाता है। यह बहुत ही सुंदर स्थान है। पढना जारी रखे

Posted in दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(मा धर्मज्‍योति) | Tagged , , , , | 1 टिप्पणी

दस हजार बुद्धों की एक सौ गाथाएं–(अध्‍याय-40)

अध्‍याय—(चालीसवां)

शो माथेरान में एक ध्यान शिविर ले रहे हैं। लगभग पांच सौ लोग ध्यान शिविर में हिस्सा ले रहे हैं। वे रग्बी होटल में ठहरे हैं, जहां बीचों—बीच खुले मैदान में शिविर का आयोजन किया गया है।

एक कुत्ता रोज नियमित रूप से आकर पोडियम के पास बैठ जाता है, जहां से ओशो प्रवचन करते हैं। मैं रोज उसको देखती हूं। वह रोज थोड़ा जल्दी आकर पोडियम के पास ही अपनी जगह बना लेता है। यह किसी बड़े ध्यानी की तरह रोज एक ही जगह पर बैठता है और जब ओशो बोलते हैं तो एकदम चौकन्ना होकर वह उन्हें सुनता है। पढना जारी रखे

Posted in दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(मा धर्मज्‍योति) | Tagged , , , , | 2 टिप्पणियाँ

दस हजार बुद्धों की एक सौ गाथाएं–(अध्‍याय–39)

(अध्‍याय—उन्‍नतालीसवां)

गाड़ी अब कल्याण स्टेशन से गुजर रही है और वह व्‍यक्‍ति दोबारा आया है। मैं सीट से उठ खड़ी होती हूं, और उसे वहां बैठने को कहती हूं। वह मुझे अपना सीट नंबर देता है, जहां जाकर मैं बैठ सकती हूं।

मैं कुछ मिनट वहां खड़ी रहती हूं। ओशो आंखें खोलते हैं और उस व्यक्ति का हाथ अपने हाथों में लेकर उसका स्वागत करते हैं। मैं अपनी घड़ी की ओर देखकर समय नोट कर लेती हूं। मैं जैसे ही सीट से दूर जाने लगती हूं मुझे लगता है मैं एक अलग संसार में प्रवेश कर रही हूं। पूरी गाड़ी की तरंगें व ऊर्जा उस जगह से बिलकुल ही अलग हैं, जहां मैं बैठी हुई थी। यदि मैं सारा समय ओशो के पास बैठी रहती तो मुझे यह कभी पता ही न चल पाता। पढना जारी रखे

Posted in दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(मा धर्मज्‍योति) | Tagged , , , , | 1 टिप्पणी

दस हजार बुद्धो की एक सौ गाथाएं–(अध्‍याय–38)

(अध्‍याय—अड़तीसवां)

मैं खिड़की से बाहर देखती हूं गाड़ी खंडाला से गुजर रही है। बाहर पहाड़ियों से घिरे हरे—भरे खेतों का बड़ा सुंदर सा दृश्य है, और बादल नीचे घाटियों में तैर रहे हैँ। सारा दृश्य बड़ा जादुई लग रहा है। इस सबसे मेरा ध्यान एक आदमी की आवाज से भंग होता है जो मेरे पास ही खड़ा मुझे मेरे नाम से बुला रहा है। मुझे हैरान देखकर वह अपना परिचय देता है कि वह मुझे सोहन के घर पर मिल चुका है और इस गाड़ी से खासकर इसीलिए यात्रा कर रहा है कि वह ओशो से कुछ बात करना चाहता है। मैं उसे थोड़ी देर बाद आने को कहती हूं। पढना जारी रखे

Posted in दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(मा धर्मज्‍योति) | Tagged , , , , | टिप्पणी करे

सुन भई साधो–(प्रवचन–17)

मन रे जागत रहिये भाई—(प्रवचन—सतरहवां)

सूत्र:

मेरा तेरा मनुआ कैसे इक होइ रे।

मैं कहता हौं आंखन देखी, तू कागद की लेखी रे।।

 मैं कहता सुरझावनहारी, तू राख्यो अरुझाई रे।

मैं कहता तू जागत रहियो, तू रहता है सोई रे।।

 मैं कहता निरमोही रहियो, तू जाता है मोहि रे।

जुगन—जुगन समुझावत हारा, कहा न मानत कोई रे।। पढना जारी रखे

Posted in कबीर दास--सुन भई साधो | Tagged , , , , | टिप्पणी करे

भावना के भोज पत्र–(2)

ये आनंद अक्षर….

त्माभिव्यक्ति मानव की सहज प्रकृति है। स्वयं को प्रकट करने की पिपासा तब तक शांत नहीं होती, जब तक मानव अपने बंधु—बांधवों, मित्रों, स्वजन, परिजनों के सम्मुख अपनी भावना और विचारों को प्रस्तुत नहीं कर देता। अभिव्यक्ति की पिपासा साहित्य—सृजन की प्रेरणा बिन्दु मानी जाए तो अत्युक्ति नहीं होगी। पत्रों में सामान्य और विशेष दोनों ही परिस्थितियों में मानव मन की अभिव्यक्ति होती है। पत्रों को साहित्य की विधा मानने का मुद्दा अब बहस की बात नहीं रही है। पत्र लेखन नयी बात नहीं है। यह मानव सभ्यता के साथ—साथ विकसित प्राचीन कला है। किन्तु एक विधा के रूप में साहित्य से इस कला का संबंध मुख्यत: आधुनिक युग मैं ही स्थापित हुआ है। पढना जारी रखे

Posted in भावना के भोज पत्र--(ओशो) | Tagged , , , , | 1 टिप्पणी

भावना के भौज पत्र— (ओशो)

(ओशो के पत्र मा मदन कुवंर पारिख के नाम जो उनके पिछले जन्‍म की मां थी)

दो शब्द:

डॉ. विकल गौतम ने आग्रह किया है कि मैं ‘भावना के भोजपत्रों पर ओशो’ पुस्तक के संबंध में दौ शब्द लिखूं। मैं निरंतर टालता रहा हूं। इसलिए नहीं कि लिखने का भाव नहीं है। हृदय मैं बहुत भाव है, लेकिन जितना अधिक भाव होता है उतना ही कठिन हो जाता है उसे अभिव्यक्त करना। पहले भी मैंने काफी पुस्तकों की भूमिका लिखी है और उन्हें लिखना कभी इतना कठिन नहीं रहा है जितना कठिन है इस पुस्तक के संबंध में लिखना। मेरे लिए यह पुस्‍तक सर्वाधिक मुल्‍य की है—सवर्था बहुमुल्‍य है। यह एक उपनिषद है जो मां—बेटे के बीच घटित हुआ—परम सामीप्य में। समय और स्थान की दूरी इसमें कोई अर्थ नहीं रखती। बेटा हजारों मील दूर भी हो तो वह मां के— सर्वाधिक निकट होता है—उसके हृदय के भीतर होता है। उसके यह बेटा तो कोई सामान्य पुत्र नहीं है—बुद्ध है, संबुद्ध है। पढना जारी रखे

Posted in पोनी--एक आत्‍म कथा, भावना के भोज पत्र--(ओशो) | Tagged , , , , | 1 टिप्पणी

दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय–37)

(अध्‍याय—सेतीसवां)

शो खिड़की के पास वाली सीट पर बैठ जाते हैं और मैं उनके बाजू में बैठ जाती हूं। वे मुझे कहते हैं किए उन्हें आराम करना है और मैं इस बात का ध्यान रखूं कि कोई उन्हें परेशान न करे। मैं स्वीकृति में अपना सिर हिलाती हूं और वे अपनी आंखें बंद कर लेते हैं। पढना जारी रखे

Posted in दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(मा धर्मज्‍योति) | Tagged , , , ,

दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय–36)

(अध्‍याय—छत्‍तीसवां)

सुबह पूना से बंबई जाने वाली ‘गाड़ी डेकन क्वीन’ पर दो फर्स्ट क्लास की टिकटें बुक की गई हैं। मैं बहुत —उत्साहित हूं और गाड़ी में साढ़े—तीन घंटे तक ओशो के साथ बैठने की राह देख रही हूं। सोहन हमें गाड़ी में खाने के लिए कुछ नाश्ता बनाकर देना चाहती है, पर ओशो उसे कहते हैं कि वह इस सबकी चिंता में न पड़े।’ पढना जारी रखे

Posted in दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(मा धर्मज्‍योति) | Tagged , , , ,

दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय–35)

(अध्‍याय—पैतीसवां)

शो पूना में सोहन के घर ठहरे हुए हैं। दोपहर को कोई कहता है, ‘आज पूर्णिमा है।’ मैं जानती हूं कि ओशो पूर्णिमा को नौका—विहार के लिए जाना पसंद करते हैं, इस बारे में मैं उनसे पूछती हूं। वे सहमत हो जोत हैं और सोहन के पति, बाफना जी को, जो कि बोट क्लब के. सदस्य हैं, कहते हैं कि एक बड़ी नाव बुक कर लें और अन्य मित्रों को भी आमंत्रित कर लें, पढना जारी रखे

Posted in दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(मा धर्मज्‍योति) | Tagged , , , ,

सुन भई साधो–(प्रवचन–16)

अभीप्सा की आग: अमृत की वर्षा–(प्रवचन–सोहलवां)

सूत्र:

मो को कहां ढूंढ़ो रे बंदे, मैं तो तेरे पास में।

ना मैं बकरी ना मैं भेड़ी, ना मैं छुरी गंड़ास में।।

 

नहिं खाल में नहिं पोंछ में, ना हड्डी ना मांस में।

ना मैं देवल ना मैं मस्जिद, ना काबे कैलास में।। पढना जारी रखे

Posted in कबीर दास--सुन भई साधो | Tagged , , , ,

सुन भई साधो–(प्रवचन–15)

धर्म और संप्रदाय में भेद—(प्रवचन—पंद्रहवां)

सूत्र:

साधो देखो जग बौराना।

सांची कहौं तो मारन धावै, झूठे जग पतियाना।।

हिंदू कहत है राम हमारा, मुसलमान रहमाना।

आपस में दोउ लड़े मरतु हैं, मरम कोई नहिं जाना।।

बहुत मिले मोहि नेमी धरमी, प्रात करै असनाना।

आतम छोड़ि पखाने पूजैं, तिनका थोथा ग्याना।।

आसन मारि डिम्भ धरि बैठे, मन में बहुत गुमाना। पढना जारी रखे

Posted in कबीर दास--सुन भई साधो | Tagged , , , , | 1 टिप्पणी

दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय–34)

(अध्‍याय—चौतीसवां)

शो पूना मे सोहन के घर पर ठहरे हुए हैं और रात के भोजन के बाद एक एयरकंडीशंड कमरे में आराम कर रहे हैं। मैं उनके चरणों के पास बैठी हुई हूं और अचानक उनके पांव दबाने की मेरी बडी प्रबल इच्‍छा जागती है। मैं उनसे पूछती हूं और वे हामी भर देते हैं। जैसे ही मैं उनके दाएं पांव के तलुए को दबाने लगती हूं? वे कहते हैं, हर शिष्य पैर से शुरु करता है और’ अतत: गले तक पहुंच जाता है।’ पढना जारी रखे

Posted in दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(मा धर्मज्‍योति) | Tagged , , , , | 1 टिप्पणी

दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय–33)

(अध्‍याय—चौतीसवां)

मैं ओशो के साथ सोहन के घर ठहरी हुई हूं। ओशो हमारे साथ डाइनिंग टेबल पर बैठकर भोजन लेना पसंद करते हैं। सोहन सच ही बहुत बढ़िया खाना बनाती है। सुबह के प्रवचन के —बाद हम लोग 10—15 बजे के करीब घर पहुंचते हैं। एक ही घंटे में सोहन बहुत सारे स्वादिष्ट व्यंजनों के साथ भोजन तैयार कर लेती है। 11—30 बजे तक हम सभी लोग —बीच में फूलों से सजी बड़ी सी डाइनिंग टेबल के इर्द—गिर्द बैठ जाते हैं। पढना जारी रखे

Posted in दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(मा धर्मज्‍योति) | Tagged , , , , | 1 टिप्पणी

दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय–32)

(अध्‍याय—बत्‍तीसवां)

भारत—भर में भ्रमण करते हुए, ओशो जब भी पूना में होते हैं तो वे सोहन के घर रुकना पसंद करते हैं। मैं उनके साथ सोहन के घर पर रहने के सुअवसर को कभी खोना नहीं चाहती। सोहन, ओशो व उनके लोगों के प्रेम में दीवानी है। —जब ओशो. उसके घर में रुके होते हैं तो उसका घर तीर्थ बन जाता है। सैकड़ों लोग. रोज वहां आते हैं और वह सबका इतने प्रेम और स्नेह से स्वागत सत्कार करती है कि लोग अपने आनंद के आंसुओ को रोक नहीं पाते। पढना जारी रखे

Posted in दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(मा धर्मज्‍योति) | Tagged , , , , | 1 टिप्पणी

सुन भई साधो–(प्रवचन–14)

विराम है द्वार राम का—(प्रवचन—चौहदवां)

सूत्र:

घर घर दीपक बरै, लखै नहिं अंध है।

लखत लखत लखि परै, कटै जमफंद है।।

कहन सुनन कछु नाहिं, नहिं कछु करन है।

जीते—जी मरि रहै, बहुरि नहिं मरन है।।

जोगी पड़े वियोग, कहैं घर दूर है।

पासहि बसत हजूर, तू चढ़त खजूर है।।

बाह्मन दिच्छा देत सो, घर घर घालिहै। पढना जारी रखे

Posted in कबीर दास--सुन भई साधो | Tagged , , , , | 1 टिप्पणी