जिनसूत्र–(भाग–1) प्रवचन–10

जिंदगी नाम है रवानी का—प्रवचन—दसवां

प्रश्‍नसार:

1—लोग आपको धर्म—भ्रष्‍ट करनेवाला कहते है, विरोध करते है।

उनके साथ कैसे जीया जाए?

2—जो कुछ मुझे मिला है, वह कम नहीं—

फिर भी आखिर क्‍या पाकर मुझे संतोष होगा?

3—कागा सब तन खाइयो, चुन—चुन खाइयो मांस।

दो नैना नहिं खाईयो, पिया मिलन की आस।।

4—आप न जाने गुरूदेव मेरे, मैं तुम्‍हें पुकारा करती हूं।

एक बार ह्रदय में छेद करो,वह क्षण मैं निहारा करती हूं।। Continue reading

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जिनसूत्र–(भाग–1) प्रवचन–9

अनुकरण नहीं—आत्‍म अनुसंधान—प्रवचन—नौवां

सारसूत्र:

अप्‍पा कत्‍ता विकत्‍ता य, दुहाण य सुहाण य।

अप्‍पा मित्‍तममित्‍तं च, दुप्‍पट्ठिय सुप्‍पट्ठिओ।। 22।।

एगप्‍पा सजिए सत्तू, कसाया इंदियाणि य।

ते जिणित्‍तु जहानायं, विहरामि अहं मुणी।। 23।।

एगओ विरइं कुज्‍जा, एगओ य पवत्‍तणं।

असंजमे जियत्‍तिं च, संजमे य पवत्‍तणं।। 24।।

रोगे दोसे य दो पावे, पावकम्‍म पवत्‍तणे।

ज भिक्‍खू रूंभई निच्‍चं, से न अच्‍छइ मंडले।। 25।। Continue reading

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अष्‍टावक्र: महागीता–(भाग–4) प्रवचन–9

साक्षी, ताओ और तथाता—प्रवचन—नौवां

दिनांक 4 दिसंबर, 1976;

श्री रजनीश आश्रम पूना।

प्रश्‍नसार:

पहला प्रश्न :

अष्टावक्र के साक्षी, लाओत्सु के ताओ और आपकी तथाता में समता क्या है और भेद क्या है?

समता बहुत है, भेद बहुत थोड़ा।

लाओत्सु ने जिसे ताओ कहा है वह ठीक वही है जिसे वेदों में ऋत कहा है—ऋतंभरा, या जिसे बुद्ध ने धम्म, धर्म कहा; जो जीवन को चलाने वाला परम सिद्धात है, जो सब सिद्धातो का सिद्धात है, जो इस विराट विश्व के अंतरतम में छिपा हुआ सूत्र है। जैसे माला के मनके हैं और उनमें धागा पिरोया हुआ है; एक ही धागा सारे मनकों को संभाले हुए है। हजार—हजार नियम हैं जगत में, इन सब नियमों को संभालने वाला एक परम नियम भी होना चाहिए; अन्यथा सब बिखर जायेगा, माला टूट जायेगी। मनके दिखाई पड़ते हैं; भीतर छिपा धागा दिखाई नहीं पड़ता। दिखाई पड़ना भी नहीं चाहिए; नहीं तो माला ठीक से बनायी नहीं गयी। Continue reading

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जिनसूत्र-(भाग–1) प्रवचन–8

सम्‍यक ज्ञान मुक्‍ति है—प्रवचन—आठवां

प्रश्‍नसार:

1—आपने कहा कि सत्‍य संज्ञा नहीं है, क्रिया है।

क्‍या प्रेम, आनंद, ध्‍यान, समाधि भी क्रिया ही है?

क्‍या क्रिया का समझ से कोई संबंध है?

2—तीर्थंकर चौबीस ही क्‍यों, ज्‍यादा क्‍यों नहीं?

3—क्‍या परंपरा की जरूरत नहीं है? क्‍या परंपरा से हानि ही हानि हुई है?

4—किसी सुंदर युवती को देख कर मन उसकी और आकर्षित हो जाता है। क्‍या वासना यह है, या प्रेम, या सुंदरता की स्‍तुति? Continue reading

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जिनसूत्र–(भाग–1) प्रवचन–7

जीवन एक सुअवसर है—प्रवचन—सातवां

सूत्र:

सच्‍चाम्‍म” विसदि तवो, सच्‍चाम्‍मि संजमो तह वसे तेसा वि गुणा।

सच्‍चं णिबंधणं हि य, गुणाणमदधीव मच्‍छाणं।। 17।।

सुबण्‍णरूप्‍पस्‍स उ पव्‍वया भवे, सिया हु केलाससमा असंखया।

नरस्‍स लुद्धस्‍स न तेहि कींचि, इच्‍छा हु आगाससमा अणन्‍तिया।। 18।।

जहा पोम्‍मं जले जायं, नोवलिप्‍पइ वारिणा।

एवं अलितं कामेहिं, तं वयं बूम माहणं।। 19।।

जीवो बंभ जीवम्‍मि, चेव चरिया हविज्‍ज जा जदिणो।

तं जाण बंभचेरं, विमुक्‍क परदेहनित्‍तिस्‍स।। 20।। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–2) प्रवचन–6

वर्ण-व्यवस्था का मनोविज्ञान—(अध्याय ४) प्रवचन—छठवां

किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः।

तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।। 16।।

कर्म क्या है और अकर्म क्या है, ऐसे इस विषय में बुद्धिमान पुरुष भी मोहित हैं, इसलिए मैं वह कर्म अर्थात कर्मों का तत्व तेरे लिए अच्छी प्रकार कहूंगा, जिसको जानकर तू अशुभ अर्थात संसार-बंधन से छूट जाएगा।

कर्म क्या है और अकर्म क्या है, बुद्धिमान व्यक्ति भी निर्णय नहीं कर पाते हैं। कृष्ण कहते हैं, वह गूढ़ तत्व मैं तुझसे कहूंगा, जिसे जानकर व्यक्ति मुक्त हो जाता है।

अजीब-सी लगेगी यह बात; क्योंकि कर्म क्या है और अकर्म क्या है, यह तो मूढ़जन भी जानते हैं। कृष्ण कहते हैं, कर्म क्या है और अकर्म क्या है, यह बुद्धिमानजन भी नहीं जानते हैं।

हम सभी को यह खयाल है कि हम जानते हैं, क्या है कर्म और क्या कर्म नहीं है। कर्म और अकर्म को हम सभी जानते हुए मालूम पड़ते हैं। लेकिन कृष्ण कहते हैं कि बुद्धिमानजन भी तय नहीं कर पाते हैं कि क्या कर्म है और क्या अकर्म है। गूढ़ है यह तत्व। तो फिर पुनर्विचार करना जरूरी है। हम जिसे कर्म समझते हैं, वह कर्म नहीं होगा; हम जिसे अकर्म समझते हैं, वह अकर्म नहीं होगा। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–2) प्रवचन–5

जीवन एक लीला— (अध्याय 4)—प्रवचन—पांचवां

प्रश्न:

भगवान श्री, कल के तेरहवें श्लोक की व्याख्या में आपने चार वर्णों की बात कही। कृष्ण इस श्लोक के दूसरे हिस्से में कहते हैं कि इन चारों वर्णों की गुण और कर्मों के अनुसार रचना करते हुए भी मैं अकर्ता ही रहता हूं।

कृपया इसे स्पष्ट करें कि वे कैसे अकर्ता रहे?

करते हुए भी मैं अकर्ता हूं, कृष्ण का ऐसा वचन गहरे में समझने योग्य है। पहली बात, कर्म से कर्ता का भाव पैदा नहीं होता। कर्म अपने आप में कर्ता का भाव पैदा करने वाला नहीं है। कर्ता का भाव भीतर मौजूद हो, तो कर्ता का भाव कर्म के ऊपर सवार हो जाता है। भीतर अहंकार हो, तो कर्म पर सवारी कर लेता है। ऐसे, कर्म अपने आप में, कर्ता के भाव का जन्मदाता नहीं है।

तो कृष्ण की बात तो छोड़ें एक क्षण को, हम भी चाहें, तो कर्म करते हुए अकर्ता हो सकते हैं। कर्म ही कर्ता का निर्माता नहीं है; कर्ता का निर्माता अहंकार का भाव है। और अहंकार का भाव इतना अदभुत है कि आप कुछ न करें, तो भी कुछ न करने का कर्ता भी बन जाता है। Continue reading

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एस धम्‍मो सनंतनो–(भाग–11) प्रवचन–112

मंजिल है स्वयं में—प्रवचन—112

प्रश्‍न सार:

पहला प्रश्‍न:

भगवान बुद्ध कहते हैं कि संतों का धर्म कभी जराजीर्ण नहीं होता है; फिर कृष्ण, महावीर, स्वयं बुद्ध और जीसस के धर्म इतने जराजीर्ण कैसे हो चले? इस प्रसंग पर कुछ प्रकाश डालने की अनकंपा करें।

संतो का धर्म निश्चित ही कभी जराजीर्ण नहीं होता है। और जो जराजीर्ण हो जाता है, वह संतों का धर्म नहीं है।

ईसाइयत का कोई संबंध ईसा से नहीं है। और बौद्धों का कोई संबंध बुद्ध से नहीं है। जैनों को महावीर से क्या लेना—देना है?

जो महावीर ने कहा था, वह तो अब भी उतना ही उज्ज्वल है। लेकिन जो सुनने वालों ने सुना था, वह जराजीर्ण हो गया।

जो कहा जाता है, वही थोड़े ही सुना जाता है। जब बुद्ध बोलते हैं, तो बुद्ध तो अपनी ही भावदशा से बोलते हैं। तुम जब सुनते हो, अपनी भावदशा से सुनते हो। इन दोनों के बीच में बड़ा अंतर है। बुद्ध पर्वत के शिखर पर खड़े हैं; तुम अपनी अंधेरी खाइयों में पड़े हो। बुद्ध प्रकाश के उच्चल शिखरों से बोल रहे हैं; तुम अपने गहन अंधेरे में सुन रहे हो। Continue reading

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जिनसूत्र–(भाग–1) प्रवचन–6

तुम मिटो तो मिलन हो—प्रवचन—छठवां

प्रश्‍नसार:

1—श्‍याम—श्‍याम रटते जीवन की सांझ हो गयी है, अभी तक मेरा श्‍याम नहीं आया। मुझे उसके दर्शन कराना है।

2—नककटे साधु की कहानी…….क्‍या आपके संन्‍यासियों की यही स्‍थिति नहीं है?

3—भीतर विचारों की भीड़ है और अहंकार से विक्षुब्‍ध हूं….. ?

4—बेमुरोबत बेवफा बेगाना—ए—दिल आप है।…….?

5—बहुत शुक्रिया बहुत मेहेरबानी।

मेरी जिंदगी में हुजूर आप आए।।….. Continue reading

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एस धम्‍मो सनंतनो–(भाग–11) प्रवचन–111

समाधि के सत्र: एकांत, मौन, ध्यान—प्रवचन—111

सूत्र:

भिक्‍खुवग्‍गो:

चक्‍खुना संवरो साधु साधु सोतेन संवरो।

घाणेन संवरो साधु साधु जिह्वाय संवरो ।।298।।

कायेन संवरो सा सा वाचाय संवरो।

मनसा संवरो सा सा सब्बत्थ संवरो।

सबत्थ संवुतो भिक्‍खु सब्‍बदुक्‍खा पमुच्‍चति ।।299।।

हत्‍थसज्‍जतोपादसज्‍जतो वाचाय सज्‍जतो सज्‍जतुत्‍तमो।

अज्‍झत्‍तरतो समाहितो एको संतुसितो तमाहु भिक्‍खुं ।।300।। Continue reading

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अष्‍टवक्र: महागीता–(भाग–4) प्रवचन–8

धर्म अर्थात सन्‍नाटे की साधना—प्रवचन—आठवां

3 दिसंबर, 1976;

श्री रजनीश आश्रम पूना।

सूत्र:

सानुरागां स्त्रियं दृष्ट्वां मृत्युं वा समुपस्थितम्।

अविह्वलमना स्वस्थो मुक्त एव महाशय:।। 170।।

सखे दुःखे नरे नार्यां संपत्सु च विपत्स च।

विशेषो नैव धीरस्थ सर्वत्र समदर्शिन:।। 171।।

न हिंसा नैव कारुण्य नौद्धत्यं न च दीनता।

नाश्चर्यं नैव च क्षोभ: क्षीणसंसरणे नरो। 172।।

न मुक्तो विषयद्वेष्टा न वा विषयलोलुप:।

असंसक्तमना नित्यं प्राप्ताप्राप्तमयाश्नते।। 173।।

समाधानासमाधानहिताहितविकल्यना:।

शून्यचित्तो न जानाति कैवल्यमिव संस्थित:।। 174।। Continue reading

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एस धम्‍मो सनंतनो–(भाग–11) प्रवचन–110

भीतर डूबो—प्रवचन—110

प्रश्‍न सार:

पहला प्रश्‍न:

हरमन हेस की प्रसिद्ध पुस्तक सिद्धार्थ में एक पात्र है वासुदेव। वासुदेव प्रमुख पात्र सिद्धार्थ से कहता है : मैंने नदी से सीखा है, तुम भी नदी से सीखो। नदी सब: सिखा देती है। वासुदेव का नदी से सीखने का क्या आशय है —कृपा करके हमें कहिए।

नदी प्रतीक है, और बुद्ध की परंपरा में महत्वपूर्ण प्रतीक है, क्योंकि बुद्ध ने कहा : संसार एक प्रवाह है। जैसे यूनान में हैराक्लतु ने कहा कि जीवन एक सरिता है और ऐसी सरिता कि इसमें कोई दुबारा नहीं उतर सकता।

एक ही नदी में दुबारा उतरने का उपाय नहीं है। क्योंकि जब तुम दुबारा उतरोगे, तब तक बहुत पानी बह चुका होगा। ऐसा हेराक्लतु ने कहा। बुद्ध एक कदम और आगे गए। Continue reading

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जिनसूत्र–(भाग–1) प्रवचन–5

परम औषधि: साक्षी—भाव—प्रवचन—पांचवां

सूत्र:

रागो य दोसो वि य कम्‍मवीयं, कम्‍मं च मोहप्‍पभवं वयंति।

कम्‍मं च जाईमरणस्‍य मूलं, दुक्‍खं च जाईमरणं वयंति।। 11।।

न य संसारीम्‍मि सुहं, जाइजरामरणदुक्‍खगहियस्‍स।

जीवस्‍स अत्‍थि जम्‍हा,तम्‍हा मुक्‍खो उवादेओ।। 12।।

तं जइ इच्‍छसि गंतुं,तीरं भवसायरस्‍स घोरस्‍स।

तो तव संजमभंडं, सुविहिय गिण्‍हाहि तूरंतो।। 13।।

जणे विरोगो जायइ, तं तं सव्‍वायरेण करणिज्‍जं।

मुच्‍चइ हु संसवेगी, अणतंवो होई असंवेगी।। 14।।

एवं ससंकप्‍पविकप्‍पणासुं, सजायई समयमुवट्ठियस्‍स।

अत्‍थे य संकप्‍पयओ तओ से, पहीयए कामगुणेसु तण्‍हा।। 15।। Continue reading

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एस धम्‍मों सनंतनो–(भाग–11) प्रवचन–109

धर्म का सार—बांटना—प्रवचन—109

सूत्र:

हन्‍नति भोगा दुम्‍मेधं नौ चे पारगवेसिनो।

भोगतण्‍हाय दुम्‍मेधो हन्‍ति अज्‍जे’व अत्‍तनं ।।293।।

तिणदोसानि खेत्‍तानि रागदोसा अयं पजा।

तस्‍मा हि वितरागेसु दिन्‍नं होति महप्फलं ।।294।।

तिणदोसानि खेत्‍तानि दोसदोसा अयं पजा।

तस्‍मा हि वीतदोसेसु दिन्‍नं होति महप्फलं ।।295।।

तिणदोसानि खेत्‍तानि मोहदोसा अयं पजा।

तस्‍मा हि वीतमोहेसु दिन्‍नं होति महप्फलं ।।296।। Continue reading

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एस धम्‍मों सनंतनो–(भाग–11) प्रवचन–108

दर्पण बनो—प्रवचन—108

प्रश्‍न सार:

पहला प्रश्‍न:

भगवान बुद्ध ने ज्ञानोपलब्धि के तुरंत बाद कहा : स्वयं ही जानकर किसको गुरु कहूं और किसको सिखाऊं, किसको शिष्य बनाऊं? और फिर उन्होंने चालीस वर्षों तक लाखों लोगों को दीक्षित भी किया और सिखाया भी। लेकिन महापरिनिर्वाण के पहले उनका अंतिम उपदेश था : आत्म दीपो भव! भगवान इस पर कुछ प्रकाश डालने की अनुकंपा करें।

जिसने भी जाना, सदा स्वयं से जाना।

गुरु हो, तो भी निमित्तमात्र है। गुरु न हो, तो भी चल जाएगा।

असली सवाल— ध्यान रखना—गुरु के होने, न होने का नहीं है। असली सवाल स्वयं में प्रवेश का है। कुछ साहसी लोग अकेले भी स्वयं में प्रविष्ट हो जाते हैं। कुछ को सहारे की जरूरत पड़ती है। जिनको सहारे की जरूरत पड़ती है, वे भी प्रविष्ट तो अकेले ही होते हैं। सहारा निमित्तमात्र है। Continue reading

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एस धम्‍मो सनंतनो–(भाग–11) प्रवचन–107

बोध से मार पर विजय—प्रवचन—107

सूत्र:

वितक्‍कपमथितस्‍स जंतुनो तिब्‍बरागस्‍स सुभानुपास्सिनो।

भिय्यो तण्‍हा पबड्ढति एसो खो दल्‍हं करोति बंधनं ।।287।।

वितक्‍कूपसमें च यो रत्‍तो असुभं भावयति सदा सतो।

एस खो व्‍यन्‍तिकाहिनी एसच्‍छेच्‍छति मारबंधनं ।।288।।

निट्ठंगतो संतासी वीततण्‍हो अनंगणो।

उच्‍छिज्‍ज भवसल्‍लानि अंतिमों’यं समुस्‍सयो ।।289।।

वीततणहो अनादानो निरूत्‍तिपदकोविदो।

अक्‍खरानं सन्‍निपातं जण्‍ण पुब्‍बापरानि च।

स वे अंतिमसारीरो महापज्‍जो’ति वुच्‍चति ।।290।। Continue reading

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अष्‍टावक्र: महागीता–(भाग–4) प्रवचन–7

तू स्‍वयं मंदिर है—प्रवचन—सातवां

दिनांक 2 दिसंबर, 1976;

श्री रजनीश आश्रम पूना।

प्रश्‍नसार:

पहला प्रश्न :

आपने कहा कि संसार के प्रति तृप्ति और परमात्मा के प्रति अतृप्ति होनी चाहिए। और आपने यह भी कहा कि कोई भी आकांक्षा न रहे; जो है उसका स्वीकार, उसका साक्षी—भाव रहे। इन दोनों वक्तव्यों के बीच जो विरोधाभास है, उसे स्पष्ट करने की अनकंपा करें।

विरोधाभास दिखता है, है नहीं। और दिखता इसलिए है कि तुम जो भाषा समझ सकते हो वह सत्य की भाषा नहीं। और सत्य की जो भाषा है वह तुम्हारी समझ में नहीं आती।

जैसे समझो.. जो तुम समझ सको वहीं से समझना ठीक होगा।

कहते हैं, प्रेम में हार, जीत है। दिखता है विरोधाभास है। क्योंकि हार कैसे जीत होगी? जीत में जीत होती है। और अगर प्रेम को न जाना हो तो तुम कहोगे, यह तो बात उलटबांसी हो गयी, यह तो पहेली हो गयी। हार में कैसे जीत होगी पृ लेकिन अगर प्रेम की एक बूंद भी तुम्हारे जीवन में आयी हो, जरा—सा झोंका भी प्रेम का आया हो, एक लहर भी उठी हो, तो तुम तत्क्षण पहचान लोगे विरोधाभास नहीं है। Continue reading

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जिनसूत्र–(भाग–1) प्रवचन–4

धर्म: निजी और वैयक्‍तिक—प्रवचन—चौथा

प्रश्‍न सार:

1—कोई आठ वर्षों से आपको सुनती—पढ़ती हूं: लेकिन सिर्फ आप ही है सामने।…….रोना ही रोना। यह क्‍या है?

2—शास्‍त्रीय परंपरा में संन्‍यासी काम—भोग से विमुख और प्रभु—प्राप्‍ति के लिए उन्‍मुख होता है; लेकिन आपके संन्‍यास में विरक्‍ति पर जोर क्‍यों नहीं?…….

3—क्‍या भक्‍ति–मार्ग में बुरे कर्मों का फल भोगना पड़ता है अथवा नहीं?

4—यदि इस पृथ्‍वी पर कहीं स्‍वर्ग है तो वह यहीं है, यहीं है यहीं है। ऐसा क्‍यों हुआ,कृप्‍या समझांए? Continue reading

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जिनसूत्र–(भाग–1) प्रवचन–3

बोध—गहन बोध—मुक्‍ति है—प्रवचन—तीसरा

सूत्र:

जाणिज्जइ चिन्तिज्जइ, जन्मजरामरणंसंभवं दुक्खं।

न य विसएसु विरज्जई, अहो सुबद्धो कवडगंठी।।6।।

जन्‍मं दुक्‍खं जरा दुक्‍खं, रोगा य मरणाणि य।

अहो दुक्‍खो हु संसारो, जत्‍थ कीसति जतंवो ।।7।।

हाँ जह मोहियमइणा, सुग्‍गइमग्‍गं अजाणमाणेणं।

भीमे भवकंतारे, सुचिरं भमियं भयकरम्‍मि।।8।।

“मिच्छत्तं वेदन्तो जीवो विवरीयदंसणो होइ।

न य धम्म रोचेदु हु, महुरं पि रसं जह जरिदो।।9।। Continue reading

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एस धम्‍मो सनंतनो–(भाग–11) प्रवचन–107

बोध से मार पर विजय—प्रवचन—107

सूत्र:

वितक्‍कपमथितस्‍स जंतुनो तिब्‍बरागस्‍स सुभानुपास्सिनो।

भिय्यो तण्‍हा पबड्ढति एसो खो दल्‍हं करोति बंधनं ।।287।।

वितक्‍कूपसमें च यो रत्‍तो असुभं भावयति सदा सतो।

एस खो व्‍यन्‍तिकाहिनी एसच्‍छेच्‍छति मारबंधनं ।।288।।

निट्ठंगतो संतासी वीततण्‍हो अनंगणो।

उच्‍छिज्‍ज भवसल्‍लानि अंतिमों’यं समुस्‍सयो ।।289।। Continue reading

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