तंत्र-सूत्र—विधि-08

आठवीं श्‍वास विधि:

आत्‍यंतिक भक्‍ति पूर्वक श्‍वास के दो संधि-स्‍थलों पर केंद्रित होकर ज्ञाता को जान लो।

Lord Shiva  तंत्र-सूत्र--ओशो

Lord Shiva तंत्र-सूत्र–ओशो

इन विधियों के बीच जरा-जरा से है, तो भी तुम्‍हारे लिए वे भेद बहुत हो सकते है। एक अकेला शब्‍द बहुत फर्क पैदा करता है।

‘’आत्‍यंतिक भक्‍ति पूर्वक श्‍वास के दो संधि-स्‍थलों पर केंद्रित होकर…..।‘’

भीतर आने वाली श्‍वास को एक संधि स्‍थल है। जहां वह मुड़ती है। इन दो संधि-स्‍थलों—जिसकी चर्चा हम कर चुके है—के साथ यहां जरा सा भेद किया गया है। हालांकि यह भेद विधि में तो जरा सा ही है, लेकिन साधक के लिए बड़ा भेद हो सकता है। केवल एक शर्त जोड़ दी गई है—‘’आत्‍यंतिक भक्‍ति पूर्वक’’, और पूरी विधि बदल गयी।

इसके प्रथम रूप में भक्‍ति का सवाल नहीं था। वह मात्र वैज्ञानिक विधि थी। तुम प्रयोग करो और वह काम करेगी। लेकिन लोग है जो ऐसी शुष्‍क वैज्ञानिक विधियों पर काम नहीं करेंगे। इसलिए जो ह्रदय की और झुके है। जो भक्‍ति के जगत के है, उनके लिए जरा सा भेद किया गया है: आत्‍यंतिक भक्‍ति पूर्वक श्‍वास के दो संधि-स्‍थलों पर केंद्रित होकर ज्ञाता को जान लो।‘’

अगर तुम वैज्ञानिक रुझान के नहीं हो, अगर तुम्‍हारा मन वैज्ञानिक नहीं है, तो तुम इस विधि को प्रयोग में लाओ।

आत्‍यंतिक भक्‍ति पूर्वक—प्रेम श्रद्धा के साथ—श्‍वास के दो संधि स्‍थलों पर केंद्रित होकर ज्ञाता को जान लो।‘’

यह कैसे संभव होगा।

भक्‍ति तो किसी के प्रति होती है। चाहे वे कृष्‍ण हों या क्राइस्‍ट। लेकिन तुम्‍हारे स्‍वयं के प्रति, श्‍वास के दो संधि-स्‍थलों के प्रति भक्‍ति कैसी होगी। यह तत्‍व तो गैर भक्‍ति वाला है। लेकिन व्‍यक्‍ति-व्‍यक्‍ति पर निर्भर है।

तंत्र का कहना है कि शरीर मंदिर है। तुम्‍हारा शरीर परमात्‍मा का मंदिर है, उसका निवास स्‍थान है। इसलिए इसे मात्र अपना शरीर या एक वस्‍तु न मानो। यह पवित्र है, धार्मिक है। जब तुम एक श्‍वास भीतर ले रहे हो तब तुम ही श्‍वास नहीं ले रहे हो, तुम्‍हारे भीतर परमात्‍मा भी श्‍वास ले रहा है। तुम चलते फिरते हो—इसे इस तरह देखो—तुम नहीं, स्‍वयं परमात्‍मा तुममें चल रहा है। तब सब चीजें पूरी तरह भक्‍ति हो जाती है।

अनेक संतों के बारे में कहा जाता है कि वे अपने शरीर को प्रेम करते थे, वे उसके साथ ऐसा व्‍यवहार करते थे। मानो वे शरीर उनकी प्रेमिकाओं के रहे हों।

तुम भी अपने शरीर को यह व्‍यवहार दे सकते हो। उसके साथ यंत्रवत व्‍यवहार भी कर सकते हो। वह भी एक रूझान है, एक दृष्‍टि है। तुम इसे अपराधपूर्ण पाप भरा और गंदा भी मान सकते हो। और इसे चमत्‍कार भी समझ सकते हो, परमात्‍मा का घर भी समझ सकते है, यह तुम पर निर्भर है।

यदि तुम अपने शरीर को मंदिर मान सको तो यह विधि तुम्‍हारे काम आ सकती है, ‘’आत्‍यंतिक भक्‍ति पूर्वक….।‘’ इसका प्रयोग करो। जब तुम भोजन कर रहे हो तब इसका प्रयोग करो। यह न सोचो कि तुम भोजन कर रहे हो, सोचो कि परमात्‍मा तुममें भोजन कर रहा है। और तब परिवर्तन को देखो। तुम वही चीज खा रहे हो। लेकिन तुरंत सब कुछ बदल जाता है। अब तुम परमात्‍मा को भोजन दे रहे हो। तुम स्‍नान कर रहे हो। कितना मामूली सा काम है। लेकिन दृष्‍टि बदल दो, अनुभव करो कि तुम अपने में परमात्‍मा को स्‍नान करा रहे हो, तब यह विधि आसान होगी।

‘’आत्‍यंतिक भक्‍ति पूर्वक श्‍वास के दो संधि स्‍थलों पर केंद्रित होकर ज्ञाता को जान लो।

ओशो

विज्ञान भैरव तंत्र

(तंत्र-सूत्र—भाग-1)

प्रवचन-5

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तंत्र-सूत्र—विधि-07

सातवीं श्‍वास विधि:

shira तंत्र-सूत्र—विधि-07 --ओशो

shira तंत्र-सूत्र—विधि-07 –ओशो

ललाट के मध्‍य में सूक्ष्‍म श्‍वास (प्राण) को टिकाओ। जब वह सोने के क्षण में ह्रदय तक पहुंचेगा तब स्‍वप्‍न और स्‍वयं मृत्‍यु पर अधिकार हो जाएगा।

तुम अधिकारिक गहरी पर्तों में प्रवेश कर रहे हो।

‘’ललाट के मध्‍य में सूक्ष्‍म श्‍वास (प्राण) को टिकाओ।‘’

अगर तुम तीसरी आँख को जान गए हो तो तुम ललाट के मध्‍य में स्‍थिर सूक्ष्‍म श्‍वास को, अदृश्‍य प्राण को जान गए, और तुम यह भी जान गए कि वह उर्जा, वह प्रकाश बरसता है।

‘’जब वह सोन के क्षण में ह्रदय तक पहुंचेगा—जब वह वर्षा तुम्‍हारे ह्रदय तक पहुँचेगी—‘’तब स्‍वप्‍न और स्‍वयं मृत्‍यु पर अधिकार हो जाएगा।‘’ Continue reading

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तंत्र-सूत्र—विधि-06

सांसरिक कामों में लगे हुए, अवधान को दो श्‍वासों के बीच टिकाओ। इस अभ्‍यास से थोड़े ही दिन में नया जन्‍म होगा।

 विज्ञान भैरव तंत्र  (तंत्र-सूत्र—भाग-1)osho

विधि-6 विज्ञान भैरव तंत्र (तंत्र-सूत्र—भाग-1)osho

‘’सांसरिक कामों में लगे हुए, अवधान को दो श्‍वासों के बीच टिकाओ…।‘’

श्‍वासों को भूल जाओं और उनके बीच में अवधान को लगाओ। एक श्‍वास भी तर आती है। इसके पहले कि वह लौट जाए, उसे बाहर छोड़ा जाए, वहां एक अंतराल होता है।

‘’सांसारिक कामों में लगे हुए।‘’ यह छठी विधि निरंतर करने की है। इसलिए कहा गया है, ‘’सांसारिक कामों में लगे हुए….’’ जो भी तुम कर रहे हो, उसमे अवधान को दो श्‍वासों के अंतराल में थिर रखो। लेकिन काम-काज में लगे हुए ही इसे साधना है। Continue reading

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तंत्र-सूत्र—विधि-05

भृकुटियों के बीच अवधान को स्‍थिर कर विचार को मन के सामने करो। फिर सहस्‍त्रार तक रूप को श्‍वास-तत्‍व से, प्राण से भरने दो। वहां वह प्रकाश की तरह बरसेगा।

Shira तंत्र-सूत्र—विधि-05 (विज्ञान भैरव तंत्र--ओशो)

Shira तंत्र-सूत्र—विधि-05 (विज्ञान भैरव तंत्र–ओशो)

यह विधि पाइथागोरस को दी गई थी। पाइथागोरस इसे लेकर यूनान वापस गए। और वह पश्‍चिम के समस्‍त रहस्‍यवाद के आधार बन गए। पश्‍चिम में अध्‍यात्‍मवाद के वे पिता है। यह विधि बहुत गहरी विधियों में ऐ एक है। इसे समझने की कोशिश करो।

‘’भृकुटियों के बीच अवधान को स्‍थिर करो।‘’ Continue reading

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तंत्र-सूत्र—विधि—04

या जब श्‍वास पूरी तरह बाहर गई है और स्‍वय: ठहरी है, या पूरी तरह भीतर आई है और ठहरी है—ऐसे जागतिक विराम के क्षण में व्‍यक्‍ति का क्षुद्र अहंकार विसर्जित हो जाता है। केवल अशुद्ध के लिए यह कठिन है।

shiva-parvati-तंत्र-सूत्र—विधि—04 ओशो

shiva-parvati-तंत्र-सूत्र—विधि—04 ओशो

लेकिन तब तो यह विधि सब के लिए कठिन है, क्‍योंकि शिव कहते है कि ‘’केवल अशुद्ध के लिए कठिन है।‘’

लेकिन कौन शुद्ध है? तुम्‍हारे लिए यह कठिन है; तुम इसका अभ्‍यास नहीं कर सकते। लेकिन कभी अचानक इसका अनुभव तुम्‍हें हो सकता है। तुम कार चला रहे हो और अचानक तुम्‍हें लगता है कि दुर्धटना होने जा रही है। श्‍वास बंद हो जाएगी। अगर वह बाहर है तो बाहर ही रह जाएगी। और भी अगर वह भीतर है तो वह भीतर ही रह जायेगी। ऐसे संकट काल में तुम श्‍वास नहीं ले सकते: तुम्‍हारे बस में नहीं है। सब कुछ ठहर जाता है। विदा हो जाता है। Continue reading

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तंत्र-सूत्र—विधि—03

या जब कभी अंत: श्वास और बहिर्श्‍वास एक दूसरे में विलीन होती है, उस क्षण में ऊर्जारहित, ऊर्जापूरित केंद्र को स्‍पर्श करो।

विज्ञान भैरव तंत्र--ध्‍यान विधि--03--ओशो

विज्ञान भैरव तंत्र–ध्‍यान विधि–03–ओशो

हम केंद्र और परिधि में विभाजित है। शरीर परिधि है। हम शरीर को, परिधि को जानते है। लेकिन हम यह नहीं जानते कि कहां केंद्र है। जब बहिर्श्‍वास अंत:श्‍वास में विलीन होती है। जब वे एक हो जाती है। जब तुम यह नहीं कह सकते कि यह अंत:श्वास है कि बहिर्श्‍वास, जब यह बताना कठिन हो कि श्‍वास भीतर जा रही है कि बाहर जा रही है। जब श्‍वास भी तर प्रवेश कि बाहर की तरफ मुड़ने लगती है, तभी विलय का क्षण है। तब श्‍वास जाती है और न भीतर आती है। श्‍वास गतिहीन है। जब वह बहार जाती है, गतिमान है, जब वह भीतर आती है, गतिमान है। और जब वह दोनों में कुछ भी नहीं करती है। तब वह मौन है, अचल है। और तब तुम केंद्र के निकट हो। आने वाली और जाने वाली श्‍वासों का यह विलय विंदु तुम्‍हारा केंद्र है। Continue reading

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तंत्र-सूत्र—विधि—02

जब श्‍वास नीचे से ऊपर की और मुड़ती है, और फिर जब श्‍वास ऊपर से नीचे की और मुड़ती है—इन दो मोड़ों के द्वारा उपलब्‍ध हो।

तंत्र-सूत्र—विधि—02 ( ओशो)

विज्ञान भैरव तंत्र ;;;;तंत्र-सूत्र—विधि—02 ( ओशो)

थोड़े फर्क के साथ यह वही विधि है; और अब अंतराल पर न होकर मोड़ पर है। बाहर जाने वाली और अंदर जाने वाली श्‍वास एक वर्तुल बनाती है। याद रहे, वे समांतर रेखाओं की तरह नहीं है। हम सदा सोचते है कि आने वाली श्‍वास और जाने वाली श्‍वास दो समांतर रेखाओं की तरह है। मगर वे ऐसी है नहीं। भीतर आने वाली श्‍वास आधा वर्तुल बनाती है। और शेष आधा वर्तुल बाहर जाने वाली श्‍वास बनाती है। Continue reading

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तंत्र-सूत्र–विधि—01

शिव कहते है:

विज्ञान भैरव तंत्र--ओशो

विज्ञान भैरव तंत्र–ओशो
तंत्र-सूत्र, ध्‍यान विधि–

हे देवी, यह अनुभव दो श्‍वासों के बीच घटित हो सकता है।

श्‍वास के भीतर आने के पश्‍चात और बाहर लौटने के ठीक पूर्व–

श्रेयस् है, कल्‍याण है।

आरंभ की नौ विधियां श्‍वास-क्रिया से संबंध रखती है। इसलिए पहले हम श्‍वास-क्रिया के संबंध में थोड़ा समझ लें और विधियों में प्रवेश करेंगे।

हम जन्‍म से मृत्‍यु के क्षण तक निरंतर श्‍वास लेते रहते है। इन दो बिंदुओं के बीच सब कुछ बदल जाता है। सब चीज बदल जाती है। कुछ भी बदले बिना नहीं रहता। लेकिन जन्‍म और मृत्‍यु के बीच श्‍वास क्रिया अचल रहती है। बच्‍चा जवान होगा, जवान बूढ़ा होगा। वह। बीमार होगा। उसका शरीर रूग्‍ण और कुरूप होगा। सब कुछ बदल जायेगा। वह सुखी होगा, दुःखी होगा, पीड़ा में होगा, सब कुछ बदलता रहेगा। लेकिन इन दो बिंदुओं के बीच आदमी श्‍वास भर सतत लेता रहेगा। Continue reading

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विज्ञान भैरव तंत्र—ओशो

विज्ञान भैरव तंत्र—ओशो

विज्ञान भैरव तंत्र--ओशो

विज्ञान भैरव तंत्र—ओशो

विज्ञान भैरव तंत्र का जगत बौद्धिक नहीं है। वह दार्शनिक भी नहीं है। तंत्र शब्‍द का अर्थ है। विधि, उपाय, मार्ग। इस लिए यह एक वैज्ञानिक ग्रंथ है। विज्ञान ‘’क्‍यों‘’ की नहीं, ‘’कैसे’’ की फिक्र करता है। दर्शन और विज्ञान में यही बुनियादी भेद है। दर्शन पूछता है। यह अस्‍तित्‍व क्‍यों है? विज्ञान पूछता है, यह आस्‍तित्‍व कैसे है? जब तुम कैसे का प्रश्‍न पूछते हो, तब उपाय, विधि, महत्‍वपूर्ण हो जाती है। तब सिद्धांत व्‍यर्थ हो जाती है। अनुभव केंद्र बन जाता है।

विज्ञान का मतलब है चेतना है। और भैरव का विशेष शब्‍द है, तांत्रिक शब्‍द, जो पारगामी के लिए कहा जाता है। इसीलिए शिव को भैरव कहते है, और देवी को भैरवी—वे जो समस्‍त द्वैत के पार चले जाते है। Continue reading

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कूर्म-नाड़ी पर संयम संपन्‍न करने से योगी पूर्ण रूप से थिर हो जाता है—पतंजलि

कूर्मनाडयां स्‍थैर्यम्–

कूर्म-नाड़ी पर संयम संपन्‍न—पतंजलि

कूर्म-नाड़ी पर संयम संपन्‍न करने से योगी पूर्ण रूप से थिर हो जाता है—पतंजलि

कूर्म-नाड़ी प्राण की, श्‍वास की वाहिका है। अगर हम चुपचाप, शांतिपूर्वक अपने श्वसन पर ध्‍यान दें, किसी भी ढंग से श्‍वास की लय न बिगड़े, न तो स्‍वास तेज हो, और न ही धीमी हो, बस उसे स्‍वाभाविक और शिथिल रूप से चलने दें। तब अगर हम केवल श्‍वास को देखते रहे, तो हम धीरे-धीरे थिर होने लगेंगे। फिर भीतर किसी तरह की कोई हलन-चलन नहीं होगी। क्‍यों?

क्‍योंकि सभी हलन-चलन, गति श्‍वास के द्वारा ही होती है। श्‍वास से ही पूरी की पूरी गति होती है। श्‍वास ही सारी हलन-चलन और गतियों का संचरण करती है। जब श्‍वास रूक जाती है। तो व्‍यक्‍ति मर जाता है। फिर वह चल फिर नहीं सकता। हिल-डुल नहीं सकता। Continue reading

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कंठ पर संयम संपन्‍न करने से क्षुधानु पिपासा की अनुभूतियां क्षीण हो जाती है—पतंजलि

कण्ठ कूपे क्षुत्‍पिपासानिवृति:

कंठ पर संयम संपन—पतंजलि

कंठ पर संयम संपन्‍न करने से क्षुधानु पिपासा की अनुभूतियां क्षीण हो जाती है—पतंजलि

यह आंतरिक अन्‍वेषण है। योग जानता है कि अगर हमको भूख लगती है तो भूख पेट में ही अनुभव नहीं होती है। जब प्‍यास लगती है, तो वह ठीक-ठीक गले में ही अनुभव नहीं होती। पेट मस्‍तिष्‍क को भूख की सूचना देता है। और फिर मस्‍तिष्‍क हम तक इसकी सूचना पहुँचाता है। उसके पास कुछ अपने संकेत होते है। उदाहरण के लिए, जब हमें प्‍यास लगती है, तो मस्‍तिष्‍क ही गले में प्‍यास की अनुभूति को जगा देता है। जब शरीर को पानी चाहिए होता है, तो मस्‍तिष्‍क गले में प्‍यास के लक्षण जगा देता है। और हमको प्‍यास लगने लगती है। जब हमें भोजन चाहिए होता है, तो मस्‍तिष्‍क पेट में कुछ निर्मित करने लगता है। और भूख सतानें लगती हे। Continue reading

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मृत्‍यु की ठीक-ठीक भविष्‍य वाणी—पतंजलि

’सक्रिय व निष्‍क्रिय या लक्षणात्‍मक वह विलक्षणात्‍मक—इन दो प्रकार के कर्मों पर संयम पा लेने के बाद मृत्‍यु की ठीक-ठीक घड़ी की भविष्‍य सूचना पायी जा सकती है।‘’

मृत्‍यु की ठीक-ठीक भविष्‍य वाणी—पतंजलि

मृत्‍यु की ठीक-ठीक भविष्‍य वाणी—पतंजलि

सोपक्रमं निरूपक्रमं च कर्म तत्‍संयमादपारान्‍तज्ञानमरिष्‍टेभये वा।

तो इसे दो प्रकार से जाना जा सकता है। या तो प्रारब्‍ध को देखकर या फिर कुछ लक्षण और पूर्वाभास है जिन्‍हें देख कर जाना जा सकता है।

उदाहरण के लिए, जब कोई व्‍यक्‍ति मरता है तो मरने के ठीक नौ महीने पहले कुछ न कुछ होता है। साधारणतया हम जागरूक नहीं होते है। और वह घटना बहुत ही सूक्ष्‍म होती है। मैं नौ महीने कहता हूं—क्‍योंकि प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति में इसमे थोड़ी भिन्‍नता होती है। यह निर्भर करता है: समय का जो अंतराल गर्भधारण और जन्‍म के बीच मौजूद रहता है। उतना ही समय मृत्‍यु को जानने का रहेगा। अगर कोई व्‍यक्‍ति गर्भ में नौ महीने रहने बाद जन्‍म लेता है, तो उसे नौ महीने पहले मृत्‍यु का आभास होगा। अगर कोई दस महीने गर्भ में रहता है तो उसे दस महीने पहले मृत्‍यु का अहसास होगा, कोई सात महीने पेट में रहता है तो उसे सात महीने पहले उसे मृत्‍यु का एहसास होगा। यह इस बात पर निर्भर करता है कि गर्भधारण और जन्‍म के समय के बीच कितना समय रहा। Continue reading

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पोनी एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा-(अध्‍याय—15)

जंगल में गीदड़ों नं घेरा–

पोनी एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा--(15) स्‍वामी आनंद प्रसाद

पोनी एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा–(15) स्‍वामी आनंद प्रसाद

कल बच्‍चों के साथ जंगल में घूमने के लिए मैं गया तो मुझे इतना अच्‍छा लगा। पूरा दिन में उन्‍हें ख्‍यालों में खोया रहा। इसी से मुझे लगा की मुझे अगले दिन भी जंगल में ले जाये। मैं मन्‍नत और ज़िद्द दोनों एक साथ करने लगे। कि आज भी किसी तरह जंगल में ले जाये। जिस दिन भी हम जंगल में जाते है अक्सर उस दिन इतवार होता है। लेकिन ये भी अजीब बात होती थी…. उस दिन कोई न कोई व्‍यक्‍ति जरूर ध्‍यान करने के लिए आ ही जाता था। उस दिन खास कर मुझे किसी का भी आन फूटी आंखों नहीं सुहाता था। लगता कि न जाने ये लोग क्‍यों नाहक किसी को भी घर में आने देते है। और फिर यह देख कर तो और भी बूरा लगता की वह खाना भी खाता है। मुझे लगता इस को किस तरह से भगा दूँ। मैं भोंकता भी खुब उन्‍हें गुस्‍से में, पर मुझसे वे लोग डरते कम ही थे। शायद मेरे आकर के हिसाब से अभी में बच्‍चा था। मुझे ये भी पता था कि अगर मैंने किसी को काट लिया तो पापा जी गुस्‍सा करेंगें। पर मैं इस गुस्‍से को अपने मन में ही दबा कर रह जाता था। वरना तो मेरे दाँत तो कुलकुलाते थे बस एक बार उनके पैर में गाड दु। अब देखो हम कुत्तों में ये बीमारी कहां से आई, इतनी वफादारी क्‍यों? और इस बात को लेकर कि क्‍यों लोग हमारे घर में आते है, Continue reading

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अन्‍ना कैरेनिना: लियो टॉलस्टॉय (ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

जीवन के शाश्‍वत, अबूझ रहस्‍यों और विरोधाभासों को सुलझाने का एक ललित प्रयास—

अन्‍ना कैरेनिना : एक असाधारण किताब--ओशो

अन्‍ना कैरेनिना : एक असाधारण किताब–ओशो

अन्‍ना कैरेनिना रशियन समाज की एक संभ्रांत महिला की कहानी है। जो अनैतिक प्रेम संबंध जोड़कर अपने आपको बरबार कर लेती है। इस उपन्‍यास में टॉलस्‍टॉय कदम-कदम पर यह दिखाता है कि समाज कैसे स्‍त्री और पुरूष के विषय में दोहरे मापदंड रखता है। अन्‍ना के सगा भाई ऑब्‍लान्‍स्‍की के अनैतिक प्रेम संबंध होते है, और न केवल वह अपितु उसके स्‍तर के कितने ही पुरूष खुद तो पत्‍नी से धोखा करते है, लेकिन अपनी पत्‍नियों से वफादारी की मांग करते है। समाज चाहता है कि पत्‍नी अपने पति की बेवफाई को भूल जाये और उसे माफ कर दे। Continue reading

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स्‍वार्थ पर संयम संपन्न करने से अन्‍य ज्ञान से भिन्‍न पुरूष उपलब्‍ध होता है—पतंजलि

‘’स्‍वार्थसंयमात्‍पुरूश ज्ञानम्–

तत: प्रतिभश्रावणवेदनादर्शास्‍वादवार्ता जायन्‍ते।

पतंजलि का योग-सूत्र--भाग4 (ओशो)

‘’स्‍वार्थसंयमात्‍पुरूश ज्ञानम्–
तत: प्रतिभश्रावणवेदनादर्शास्‍वादवार्ता जायन्‍ते।

पतंजलि कहते है, ‘’स्‍वार्थ परम ज्ञान ले आता है।‘’

स्‍वार्थ। स्‍वार्थी हो जाओ, यही है धर्म का वास्‍तविक मर्म, यह जानने का प्रयास करो कि तुम्‍हारा वास्‍तविक स्‍वार्थ क्‍या है। स्‍वयं को दूसरों से अलग पहचानने का प्रयास करो—परार्थ, दूसरों से अलग। और यह मत सोचना कि जो लोग तुम से अलग है, बहार है, वहीं दूसरे है। वे तो दूसरे है ही। लेकिन तुम्‍हारा शरीर भी दूसरा है। एक दिन तुम्‍हारा शरीर भी मिट्टी में मिल जायेगा। शरीर भी इस पृथ्‍वी का अंश है। तुम्‍हारी श्‍वास भी तुम्‍हारी नहीं है। वह भी दूसरों के द्वारा दी हुई है; वह हवा में वापस लौट जायेगी। बस कुछ थोड़े समय के लिए ही तुम्‍हें श्‍वास दी गयी है। वह श्‍वास उधार मिली हुई है। तुम्‍हें उसे लौटाना ही होगा। तुम यहां नहीं रहोगे। लेकिन तुम्‍हारी श्‍वास यहीं हवाओं में रहेगी। तुम यहां नहीं रहोगे, लेकिन तुम्‍हारा शरीर पृथ्‍वी में रहेगा। मिट्टी-मिट्टी में मिल जाएगी। जिसे अभी तुम अपना रक्‍त समझते हो, वह नदियों में प्रवाहित हो रहा होगा। सभी कुछ यहीं समाहित हो जाएगा। Continue reading

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जरूथुस्‍त्र–

एक बार पर्शिया का राज विशतस्‍या,

जसथुस्‍त्र--zarathustra--ओशो

जसथुस्‍त्र–zarathustra–ओशो

जब युद्ध जीतकर लौट रहा था, तो वह जरथुस्त्र के निवास के निकट जा पहुंचा। उसने इस रहस्‍यदर्शी संत के दर्शन करने की सोची। राज ने जरथुस्त्र के पास जाकर कहा, ‘’मैं आपके पास इसलिए अया हूं कि शायद आप मुझे सृष्‍टि और प्रकृति के नियम के विषय में कुछ समझा सकें। मैं यहां पर अधिक समय तो नहीं रूक सकता हूं, क्‍योंकि मैं युद्ध स्‍थल से लौट रहा हूं। और मुझे जल्‍दी ही अपने राज्‍य में वापस पहुंचना है, क्‍योंकि राज्‍य के महत्वपूर्ण मसले महल में मेरी प्रतीक्षा कर रहे है।

जरथुस्‍त्र राजा की और देखकर मुस्‍कुराया और जमीन से गेहूँ का एक दाना उठा कर राजा को दे दिया और उस गेहूँ के दाने के माध्‍यम से यह बताया कि ‘’गेहूँ के इस छोटे से दाने से, सृष्‍टि के सारे नियम और प्रकृति की सारी शक्‍तियां समाई हुई है। Continue reading

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ध्रुवे तद्गतिज्ञानम्—पतंजलि योग सूत्र

ध्रुव-नक्षत्र पर संयम संपन्‍न करने से तारों-नक्षत्रों की गतिमयता का ज्ञान प्राप्‍त होता है।

पतंजलि का योग-सूत्र--ओशो

पतंजलि का योग-सूत्र–ओशो

और हमारे अंतर-अस्‍तित्‍व का ध्रुव तारा कौन सा है? ध्रुव तारा बहुत प्रतीकात्‍मक है। पौराणिक कथाओं के अनुसार यही समझा जाता है कि ध्रुव तारा ही एक मात्र ऐसा तारा है, जो पूर्णतया गति विहीन है, उसमें कोई गति नहीं है, वह थिर है। लेकिन यह बात सच नहीं है। उसमें गति है, लेकिन उसकी गति बहुत धीमी होती है। लेकिन फिर भी यह बहुत प्रतीकात्‍मक है: हमको अपने भीतर कुछ ऐसा खोज लेना है जो कि गति विहीन हो, जिसमे किसी प्रकार की गति न हो, पूरी तरह थिर हो। वहीं हमारा स्‍वभाव है, केवल वहीं हमारी वास्‍तविक अस्‍तित्‍व है। हमारा सच्‍चा स्‍वरूप है: ध्रुव तारे जैसा—गति विहीन, पूर्णरूपेण गति। क्‍योंकि जब भीतर कहीं गति नहीं होती है, तब शाश्‍वतता होती है। जब गति होती है, समय भी होता है। Continue reading

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शक्‍तियां है जो मन के बहार होने से प्राप्‍त होती है, लेकिन ये समाधि के मार्ग पर बाधाएं है—पतंजलि (योग-सूत्र)

ख्‍याल रहे वे भी शक्‍तियां है, अगर बाहर की और जाना हो तो—

शक्‍ति की खोज मन के बहार होने से प्राप्‍त होती है...पतंजलि

शक्‍ति की खोज मन के बहार होने से प्राप्‍त होती है…पतंजलि

लेकिन अगर भीतर जाना हो ता यहीं शक्‍तियां बाधाएं बन जाती है। अगर व्‍यक्‍ति स्वयं के भीतर जा रहा हो, तो यही शक्‍तियां बाधा बन जायेगी।

जो व्‍यक्‍ति बह्या संसार की और बढ़ रहा होता है, वह चंद्र से सूर्य की और से होता हुआ संसार में जा रहा होता है। और जो व्‍यक्‍ति स्‍वयं के भीतर जा रहा है, उसकी ऊर्जा सूर्य से चंद्र की और, और फिर चंद्र से भी पार की तरफ जा रही होती है। जो व्‍यक्‍ति अंतस की यात्रा पर जा रहा होता है। और एक वह व्‍यक्‍ति जो बह्या संसार की यात्रा पर जो रहा होता है उनके लक्ष्‍य और उद्देश्‍य एकदम अलग-अलग होते है, एकदम विपरीत होते है। Continue reading

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आइंस्‍टीन का सापेक्षवाद–

ऊर्जा बह्मांड़—

ऊर्जा का ब्रह्मांड--आइंस्‍टीन का सापेक्षवाद-अनिल सरस्‍वती

ऊर्जा का ब्रह्मांड–आइंस्‍टीन का सापेक्षवाद-अनिल सरस्‍वती

आइंस्‍टीन का प्रसिद्ध कथन है, ‘’ऐसा क्‍यों है कि मुझे कोई नहीं समझता लेकिन प्रेम सभी करते है?

इसका उत्‍तर भी आइंस्‍टीन को भली भांति ज्ञात था। कारण है उसका सापेक्षवाद का नियम। ई=एम सी2। उसके समकालीन सर्वाधिक प्रतिभाशाली वैज्ञानिक और गणितज्ञ भी इस नियम को समझने में असमर्थ थे।

सापेक्षवाद का यह नियम बताता है कि ऊर्जा क्‍या है। इसमे पहले ऊर्जा की व्‍याख्‍या करने के लिए बड़े विस्‍तृत और जटिल फ़ॉर्मूला उपयोग लिए जाते थे। पहली बार आइंस्‍टीन ने इसकी व्‍याख्‍या तीन वर्णों में कर डाली।

समस्‍या यह थी कि जटिलता से गणित और भौतिकी की समस्‍याओं को हल करने वाले वैज्ञानिकों के लिए आइंस्‍टीन का यह सरल नियम समझ के पार था। शायद एक जटिल मस्‍तिष्‍क के लिए सरलता ही जटिलतम समस्‍या है। Continue reading

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प्राण उर्जा के पाँच भिन्‍न-भिन्‍न रूप है— (ओशो)

योगियों ने कहा है, प्राण उर्जा के पाँच भिन्‍न-भिन्‍न रूप, क्रियाएं और उर्जा क्षेत्र होते है।

प्राण उर्जा के पाँच भिन्‍न-भिन्‍न रूप है— (ओशो)

प्राण उर्जा के पाँच भिन्‍न-भिन्‍न रूप है— (ओशो)

हम तो यहीं कहेंगे कि श्‍वास कहना पर्याप्‍त है। हम तो केवल रो ही बातें जानते है—श्‍वास को बाहर छोड़ना, श्‍वास को भी तर लेना—इतना ही। लेकिन योगी तो प्राण के संसार में जीते है। और वे इसके सूक्ष्‍म भेद को समझते है। इसलिए उन्‍होंने इसको पाँच भागों में विभक्‍त किया है। उन पांचों भागों को समझ लेना, वे बहुत महत्‍वपूर्ण है।

पहला है प्राण,

दूसरा है अपान,

तीसरा है समान,

चौथा उदान,

पाँचवाँ है व्‍यान।

यह व्‍यक्‍ति के भीतर के पाँच विस्‍तार है। और प्रत्‍येक भीतर अलग-अलग काम करता है। Continue reading

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