मैं मृत्‍यु सिखाता हूं–ओशो

मैं मृत्‍यु सिखाता हूं

(ओशो)

प्रसतावना:

जीवन के गर्भ में क्‍या छुपा है उसकी शुन्‍य अंधेरी तलहेटी की जड़े किस स्‍त्रोत की और बह रही है…..कहां से और किन छुपे रहस्‍यों से उनको पोषण मिल रहा है….ये कुदरत का एक अनुठाओर अनसुलझा रहस्‍य है। और यही तो है जीवन का आंनद….लेकिन न जाने क्‍या हम इस रहस्‍य को जानना चाहते है, कभी ज्‍योतिष के माध्‍यम से, कभी दिव्‍य दृष्‍टी या और तांत्रिक माध्‍यमों से परंतु सब नाकाम हो जाते है। और कुदरत अपने में अपनी कृति को छपाये ही चली आ रही है।

ठीक इसी तरह कभी नहीं सूलझाया जा सकता उस रहस्‍य का नाम परमात्‍मा है। परंतु कृति के परे प्रकृति और कही दूर अनछुआ सा कर्ता जो पास से भी पास और दूर से भी दूर। परंतु जब कृति जब प्रकृति में उतपति ओर लवलीन होती है, तब हम ठगे से सोचते है ये क्‍या इस बीज में कैसे हो सकता है इतना विशाल वृक्ष….कोई बुद्धि मानने को तैयार नहीं होती। Continue reading

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मैं मृत्‍यु सिखाता हूं–(प्रवचन–11)

संकल्यवान—हो जाता है आत्‍मवान—(प्रवचन—ग्‍याहरवां)

(वापस लौटना सदा आसान मालूम पड़ता है। क्यों? क्योंकि जहां हम लौट रहे हैं वह परिचित भूमि है। आगे बढ़ना हमेशा खतरनाक मालूम पड़ता है क्योंकि जहां हम जा रहे हैं वहां का हमें कोई भी पता नहीं है।)

भगवान श्री,

 द्वारका शिविर में आपने कहा है कि सब साधनाएं झूठी हैं क्योंकि परमात्मा से हम कभी बिछुड़े ही नहीं हैं तो क्या झूठी है? शरीर और मन का विकास झूठा है? संस्कारों की निर्झर? झूठी है? स्थूल से सूक्ष्म की ओर की साधना हठी है? प्रथम शरीर से सातवें शरीर की यात्रा का आयोजन झूठा है? क्या कुंडलिनी साधना की लंबी प्रक्रिया हठ है? इन बातों को समझाने की कृपा करें।

हली बात तो यह कि जिसे मैं असत्य कहता हूं, झूठ कहता हूं? उसका मतलब यह नहीं होता है कि वह नहीं है। असत्य भी होता तो है ही। अगर न हो तो असत्य भी नहीं हो सकता। झूठ का भी अपना अस्तित्व है, स्वप्न का भी अपना अस्तित्व है। जब हम कहते हैं, स्वप्न झूठ है, तो उसका यह मतलब नहीं होता है कि स्वप्न का अस्तित्व नहीं है। उसका केवल इतना ही मतलब होता है कि स्वप्न का अस्तित्व मानसिक है, वास्तविक नहीं है। मन की तरंग है, तथ्य नहीं है। Continue reading

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जिन खोजा तिन पाइयां–(प्रवचन–3)

ध्यान है महामृत्यु—(प्रवचन—तीसरा)

(कुंडलिनी—योग साधना शिविर)

नारगोल

महामृत्यु : द्वार अमृत का:

प्रश्‍न:

 एक मित्र पूछ रहे हैं कि ओशो कुंडलिनी जागरण में खतरा है तो कौन सा खतरा है? और यदि खतरा है तो फिर उसे जाग्रत ही क्यों किया जाए?

तरा तो बहुत है। असल में, जिसे हमने जीवन समझ रखा है, उस पूरे जीवन को ही खोने का खतरा है। जैसे हम हैं, वैसे ही हम कुंडलिनी जाग्रत होने पर न रह जाएंगे; सब कुछ बदलेगा—सब कुछ—हमारे संबंध, हमारी वृत्तियां, हमारा संसार; हमने कल तक जो जाना था वह सब बदलेगा। उस सबके बदलने का ही खतरा है।

लेकिन अगर कोयले को हीरा बनना हो, तो कोयले को कोयला होना तो मिटना ही पड़ता है। खतरा बहुत है। कोयले के लिए खतरा है। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–8) प्रवचन–189

भक्‍ति और भगवान—(प्रवचन—दूसरा)

अध्‍याय—17

सूत्र—

सत्‍वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।

श्रद्धामयोऽयं पुरुषो वो यव्छुद्ध: स एव सः।। 3।।

यजन्ते सात्‍विका देवान्यक्षरक्षांति राजसाः।

प्रेतान्धूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जना: ।। 4।।

है भारत सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके अंतःकरण के अनुरूप होती है तथा यह पुरुष श्रद्धामय है, इसलिए जो पुरूष जैसी श्रद्धा वाला है, वह स्वयं भी वही है।

उनमें सात्‍विक पुरूष तो देवों को पूजते हैं और राजस परुष यक्ष और राक्षसों को पूजते हैं तथा अन्य जो तामस मनुष्य है, वे ने और भूतगणों को पूजते हैं। Continue reading

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मैं मृत्‍यु सिखाता हूं–(प्रवचन–10)

अंधकार से आलोक और मूर्च्छा से परम जागरण की और—(प्रवचन—दसवां)

( ्यान मूल तत्व जिसकी तरलता जिसकी सघनता विरलता जिसका ठोसपन तय करता है कि आपको जाग्रत कहें या आपको सोया हुआ कहें। जागरण और मूर्च्छा के बीच जो तत्व यात्रा करता है, वह ध्‍यान है।)

 भगवान श्री सजग मृत्यु में प्रवेश की प्रक्रिया पर चर्चा करने के पहले मैं पूछना चाहूंगा कि और जागृति में क्या भेद है? बेहोशी चेतना की किस स्थिति को कहते हैं? अर्थात होश और बेहोशी में जीवात्मा की चेतना की कौन— सी स्थिति होती है?

मूर्च्छा और जागृति, इन दोनों को समझने के लिए पहली बात तो यह समझ लेनी जरूरी है कि ये दोनों विपरीत अवस्थाएं नहीं हैं। साधारणत: दोनों विपरीत अवस्थाएं समझी जाती हैं। असल में जीवन को हम द्वैत में तोड़कर ही देखते हैं। अंधकार और प्रकाश को बांट लेते हैं और सोचते हैं, अंधकार और प्रकाश दो चीजें हैं। जैसे ही हमने यह समझा कि अंधकार और प्रकाश दो चीजें हैं, बुनियादी भूल हो गई। Continue reading

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जिन खोजा तिन पाइयां–(प्रवचन–2)

बुंद समानी समुंद में—(प्रवचन—दूसरा)

(कुंडलिनी—योग साधना शिविर)

नारगोल

 मेरे प्रिय आत्मन्!

र्जा का विस्तार है जगत और ऊर्जा का सघन हो जाना ही जीवन है। जो हमें पदार्थ की भांति दिखाई पड़ता है, जो पत्थर की भांति भी दिखाई पड़ता है, वह भी ऊर्जा, शक्ति है। जो हमें जीवन की भांति दिखाई पड़ता है, जो विचार की भांति अनुभव होता है, जो चेतना की भांति प्रतीत होता है, वह भी उसी ऊर्जा, उसी शक्ति का रूपांतरण है। सारा जगत—चाहे सागर की लहरें, और चाहे सरू के वृक्ष, और चाहे रेत के कण, और चाहे आकाश के तारे, और चाहे हमारे भीतर जो है वह, वह सब एक ही शक्ति का अनंत—अनंत रूपों में प्रगटन है।

ऊर्जामय विराट जीवन:

हम कहां शुरू होते हैं और कहां समाप्त होते हैं, कहना मुश्किल है। Continue reading

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जिन खोजा तिन पाइयां–(प्रवचन–1)

यात्रा कुंडलिनी की (साधना शिविर)—(प्रवचन—पहला)

मेरे प्रिय आत्मन्,

मुझे पता नहीं कि आप किस लिए यहां आए हैं। शायद आपको भी ठीक से पता न हो, क्योंकि हम सारे लोग जिंदगी में इस भांति ही जीते हैं कि हमें यह भी पता नहीं होता कि क्यों जी रहे हैं, यह भी पता नहीं होता कि कहां जा रहे हैं, और यह भी पता नहीं होता कि क्यों जा रहे हैं।

मूर्च्छा और जागरण:

जिंदगी ही जब बिना पूछे बीत जाती हो तो आश्चर्य नहीं होगा कि आपमें से बहुत लोग बिना पूछे यहां आ गए हों कि क्यों जा रहे हैं। शायद कुछ लोग जानकर आए हों, संभावना बहुत कम है। हम सब ऐसी मूर्च्छा में चलते हैं, ऐसी मूर्च्छा में सुनते हैं, ऐसी मूर्च्छा में देखते हैं कि न तो हमें वह दिखाई पड़ता जो है, न वह सुनाई पड़ता जो कहा जाता है, और न उसका स्पर्श अनुभव हो पाता जो सब ओर से बाहर और भीतर हमें घेरे हुए है। Continue reading

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जिन खोजा तिन पाइयां–ओशो

जिन खोजा तिन पाइयां

ओशो

(कुंडलिनी—योग पर साधना—शिविर, नारगोल में ध्‍यान—प्रयोगों के साथ प्रवचन एवं मुंबई में प्रश्‍नोत्‍तर चर्चाओं सहित उन्‍नीस ओशो—प्रवचनों का अपूर्व संकलन।)

 भूमिका:

(मनुष्य का विज्ञान)

सुनता हूं कि मनुष्य का मार्ग खो गया है। यह सत्य है। मनुष्य का मार्ग उसी दिन खो गया, जिस दिन उसने स्वयं को खोजने से भी ज्यादा मूल्यवान किन्हीं और खोजों को मान लिया।

मनुष्य के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण और सार्थक वस्तु मनुष्य के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। उसकी पहली खोज वह स्वयं ही हो सकता है। खुद को जाने बिना उसका सारा जानना अंतत: घातक ही होगा। अज्ञान के हाथों में कोई भी शान सृजनात्मक नहीं हो सकता, और जान के हाथों में अज्ञान भी सृजनात्मक हो जाता है। Continue reading

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मैं मृत्‍यु सिखाता हूं–(प्रवचन–9)

मैं मृत्‍यु सिखाता हूं—(प्रवचन—नौवां)

आने वाले भविष्य में अगर मनुष्य को विक्षिप्त होने से पागल होने से बचाना हो तो पूरी जिंदगी को स्वीकार करना पड़ेगा। को के को। उसमें कोई खंड काटकर विरोध में खड़े नहीं करने पड़ेगे।

मेरे प्रिय आत्मन्।

 आज बहुत से सवाल जो बाकी रह गए हैं उन पर बात करनी है। एक मित्र ने पूछा है कि क्या मैं लोगों को मरने की बात सिखा रहा हूं? मृत्यु लिखा रहा हूं, सिखाना तो चाहिए जीवन।

उन्होंने ठीक ही पूछा है। मैं मृत्यु की बात ही सिखा रहा हूं। मैं मरने की कला है। सिखा रहा हूं। क्योंकि जो मरने की कला सीख लेता है, वह जीवन की कला में भी निष्णात हो जाता है। जो मरने के लिए राजी हो जाता है, वह परम जीवन का अधिकारी भी हो जाता है। सिर्फ वे ही जो मिटना जान लेते हैं, वे ही होना भी जान पाते है। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–8) प्रवचन–188

सत्‍य की खोज और त्रिगुण का गणित—(प्रवचन—पहला)

अध्‍याय—17

सूत्र—

(श्रीमद्भगवद्गीता अथ सप्तदशोऽध्याय)

अर्जन उवाच:

ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धायान्विता।

तेषां निष्ठा तु का कृष्ण तत्त्वमाहो रजस्तम:।। 1।।

श्रॉभगवानवाच:

त्रिविधा भवति आ देहिनां आ स्वभावजा।

सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां श्रृणु।। 2।।

इस प्रकार भगवान के वचनों को सुनकर अर्जुन बोला, हे कृष्ण, जो मनुष्य शास्त्र— विधि को त्यागकर केवल श्रृद्धा मे युक्त हुए देवादिकों का पूजन करते है, उनकी स्थिति फिर कौन—सी है? क्या सात्विकी है अथवा राजसी है या तामसी है?

इस प्रकार अर्जुन के पूछने पर श्री भगवान बोले हे अर्जुन, मनुष्यों की वह बिना शास्त्रीय संस्कारों से केवल स्वभाव से उत्पन्न हुई श्रृद्धा सात्विकी और राजसी तथा तामसी, ऐसे तीनों कार की ही होती ह्रै उसको तू मेरे ते सुन। Continue reading

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मैं मृत्‍यु सिखाता हूं–(प्रवचन–8)

विचार नहीं, वरन् मृत्‍यु के तथ्‍य का दर्शन—(प्रवचन—आठवां)

मृत्यु के तथ्य का दर्शन करना है विचार नहीं।

मृत्यु अज्ञान का अनुभव है अमरत्व ज्ञान का अनुभव है।

मेरे प्रिय आत्मन्!

एक मित्र ने पूछा है कि मृत्यु के संबंध में हम सोचें ही क्यों? जीवन मिला है उसे जीएं। वर्तमान में जो है उसमें रहें। मृत्यु के विचार को ही हम क्यों बीच में आने दें?

उन्होंने ठीक बात पूछी है। लेकिन अगर इतना भी सोचा कि मृत्यु के विचार को क्यों बीच में आने दें? तो भी मृत्यु का विचार आ ही गया। और अगर इतना भी सोचा कि हम जीएं ही, हम मरने के संबंध में सोचें ही न, तो भी सोचना शुरू हो गया। मृत्यु इतना बड़ा तथ्य है कि उससे आंखें नहीं चुराई जा सकतीं। यद्यपि हम जीवन भर यही कोशिश करते हैं कि मृत्यु के संबंध में न सोचें, इसलिए नहीं कि मृत्यु न सोचने जैसी चीज है, बल्कि इसलिए कि सोचने से भी भय लगता है। यह विचार भी प्राणों को कंपा जाता है कि मैं मरूंगा। जब मरूंगा, तब तो कंपाएगा ही। यह विचार भी, बिना मरे ही यह विचार भी यदि मन को पकड़े कि मैं मरूंगा, तो सारे प्राण जड़ों से कैप जाते हैं। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–8)

गीता दर्शन—(भाग—आठ)

ओशो

(ओशो द्वारा श्रीमदभगवद्गीता के अध्‍याय सत्रह ‘श्रद्धात्रय—विभाग—योग’ एवं अध्‍याय अठारह ‘मोक्ष—संन्‍यास—योग’ पर दिए गये बत्‍तीस अमृत प्रवचनों का अपूर्व संकलन।)

 भूमिका:

(ओशो कृष्‍ण चेतना)

गीता एक महावाक्य, एक महाश्लोक, एक महाकाव्य है—किन शब्दों, किस भाषा में इसे परिभाषित किया जाए! जैसे अमृतमय, अव्याख्येय, अनूठे—अनमोल बोल कृष्ण ने गीता में बोले हैं वैसे बोल अन्य किसी देश में न तो कभी बोले गए और न कभी सुने गए। इसमें कविता है, संगीत है, सुगंध है। न जाने किस—किस प्रकार के रस अपने में समाए है यह गीता! रागी के लिए इसमें जगह है तो विरागी के लिए भी इसमें स्थान है। संन्यासी भी इसमें रस ले सकता है तो गृहस्थ भी इसमें डूब सकता है। लगता है कि गीता में कोई व्यक्ति नहीं, कोई समाज नहीं, कोई देश विशेष नहीं, समस्त अस्तित्व ही बोल रहा है। यह किसी जाति, किसी संप्रदाय का ग्रंथ नहीं, यह सार्वभौम शाश्वत वाणी है। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–7) प्रवचन–187

नरक के द्वार: काम, क्रोध, लोभ—(प्रवचन—आठवां)

अध्‍याय—16

सूत्र—

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मन:।

काम: क्रोधस्तथा लौभस्तस्मादैतन्त्रयं त्यजेत्।। 21।।

एतैर्विमुक्त: कौन्तेय तमद्धोरैस्प्रिभिर्नर:।

आचरत्यक्ष्मन: श्रेयस्‍स्‍ततो यति परां गतिम्।। 22।।

यः शास्त्रविश्वैमुत्सृज्य वर्तते कामकारत:।

न स सिद्धिमावाप्‍नोतिप्त न सुखं न परां गतिम्।। 23।।

तस्माच्‍छात्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्‍यवस्थितौ।

ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्‍तं कर्म कर्तुमिहार्हसि।। 24।।

 और हे अर्जुन, काम, क्रोध तथा लोभ, ये तीन प्रकार के नरक के द्वार आत्‍मा का नाश करने वाले हैं अर्थात अधोगति में ले जाने वाले है, इससे इन तीनों को त्याग देना चाहिए। क्योंकि है अर्जुन, इन तीनों नरक के द्वारों से मुक्‍त हुआ पुरूष अपने कल्याण का आचरण करता है। इससे वह परम गति को जाता है अर्थात मेरे को प्राप्त होता है। Continue reading

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मैं मृत्‍यु सिखाता हूं–(प्रवचन–7)

मूर्च्छा में मृत्यु है—और जागृति में जीवन—(प्रवचन—सातवां)

बिना विचारे कुछ करने की प्रवृत्ति पहली चीज है जिसको तोड़ डालना है। विचार करने की प्रवृत्ति पैदा करनी है और बिना विचार किए मान लेने की प्रवृत्ति तोड़ देनी है।

मेरे प्रिय आत्मन्!

एक मित्र ने पूछा है कि मृत्यु से बड़ा कोई सत्य नहीं ऐसा मैने कभी कहा है; और फिर यह भी कभी कहा है कि मृत्यु जैसी कोई चीज ही नहीं है। इन दोनों में वे पूछते हैं कि कौन— सी बात सच है?

इन दोनों में ये दोनों ही बातें सच हैं। जब मैंने यह कहा कि मृत्यु से बड़ा कोई सत्य नहीं, तो मैं इस बात की तरफ ध्यान दिला रहा हूं कि इस जीवन में, जिसे हम जीवन कहते हैं, जिसे हम जीवन समझते हैं; और इस व्यक्तित्व में जिसे मैं ‘मैं’ कहता हू इस व्यक्तित्व में और इस जीवन में मरने की घटना बहुत बड़ा सत्य है। यह व्यक्तित्व भी मरेगा, यह जीवन, जिसे हम जीवन कहते हैं, यह जीवन भी मरेगा। मृत्यु, होगी ही। आप तो मरेंगे ही, मैं तो मरूंगा ही। और जिसे मैं जीवन कह रहा हूं वह भी मिटेगा, नष्ट होगा, धूल में गिरेगा। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–7) प्रवचन–186

जीवन की दिशा—(प्रवचन—सातवां)

अध्‍याय—16

सूत्र:

अत्मसंभाविता: स्तब्धा धनमानमदान्विता:।

यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्।। 17।।

अहंकारं बलं दर्प कामं क्रोध च संश्रता:।

मामत्‍मपरहेहेषु प्रद्धईषन्तोऽभ्यसूक्का:।। 18।।

तानहं द्विषत: क्रूरान्संसारेषु नराधमान्।

क्षियाम्यजस्रमशुभानासुरीष्येव योनिषु।। 19।।

आसुरी योनिमापन्‍ना मूढा जन्मनि जन्मनि।

मामाप्राप्‍यैव कौन्तेय ततो यान्‍त्‍यधमां गतिम्।। 29।।

 वे अपने आपको ही श्रेष्ठ मानने वाले घमंडी पुरुष बन और मान के मद से युक्‍त हुए, शास्त्र— विधि से रहित केबल नाममात्र के यज्ञों द्वारा पाखंड से यजन करते हैं।

तथा वे अहंकार, बल, धमंड, कामना और क्रोधादि के परायण हुए एंव दूसरों की निंदा करने वाले पुरुष अपने और दूसरों के शरीर में स्थित मुझ अंतर्यामी से द्वेष करने वाले हैं। ऐसे उन द्वेष करने वाले पापाचारी और क्रूरकर्मी नराधमों को मैं संसार में बारंबार आसुरी योनियों में ही गिरता हूं। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–7) प्रवचन–185

ऊर्ध्‍वगमन और अधोगमन—(प्रवचन—छठवां)

अध्‍याय—16

सूत्र

इदमद्य मया लब्‍धमिमं प्राप्‍स्‍ये मनोरथम् ।

इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्।। 13।।

असौ मया हत: शत्रुर्हनिष्‍ये चापरानपि।

ईश्वरोऽहम्हं भोगी सिद्धोsहं बलवान्तुखी।। 14।।

आढ्योऽभिजनवानस्मि कीऽन्योऽस्ति सदृशो मया।

यक्ष्‍ये दास्यामि मौदिष्य इत्‍याज्ञानविमीहिता:।। 15।।

अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृता:।

प्रसक्ता: कामभोगेषु पतन्ति नरकेsशुचौ।। 16।।

और उन आसुरी पुरूषों के विचार इस प्रकार के होते है, कि मैने आज यह तो पाया है और हस मनोरथ को प्राप्त होऊंगा तथा मेरे पास यह हतना धन है और फिर भी यह भविष्य में और अधिक होवेगा।

तथा वह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया और दूसरे शत्रुओं को भी मैं मारूंगा। मैं ईश्वर अर्थात ऐश्वर्यवान हूं और ऐश्वर्य को भोगने वाला हूं और मैं सब सिद्धियों से युक्त एवं बलवान और सुखी हूं। Continue reading

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मैं कहता हूं आंखन देखी–(प्रवचन–6)

निद्रा, स्‍वप्‍न, सम्‍मोहन और मूर्च्‍छा से जागृति की और—(प्रवचन—छठवां)

निद्रा में भी हम वहीं पहुंचते हैं जहां ध्यान में पहुंचते हैं लेकिन फर्क इतना ही है कि निद्रा में हम बेहोश होते हैं और ध्यान में हम जाग्रत होते हैं। अगर कोई निद्रा में भी जाग्रत होकर पहुंच जाए तो वही हो जाएगा जो ध्यान में होता है।

मेरे प्रिय आत्मन्!

 एक मित्र ने पूछा है कि ध्यान या साधना से मृत्यु पर विजय मिल सकती है तो क्या वही स्थिति निद्रा में नहीं होती है? और यदि होती है तो निद्रा से मृत्यु पर विजय क्यों नहीं मिल सकती?

हली बात तो यह समझ लेनी जरूरी है कि मृत्यु पर विजय मिल सकती है, इसका यह अर्थ नहीं है कि मृत्यु है और हम उसे जीत लेंगे। मृत्यु पर विजय मिल सकती है, इसका इतना ही अर्थ है कि मृत्यु नहीं है, ऐसा हम जान लेंगे। मृत्यु का न होना जान लेना ही मृत्यु पर विजय है। मृत्यु कोई है नहीं जिसे जीत लेना है। मृत्यु नहीं है, ऐसा जानते ही वह जो मृत्यु से हमारी हार चल रही है, बंद हो जाती है। कुछ तो ऐसे शत्रु हैं, जो हैं। और कुछ ऐसे शत्रु हैं, जो नहीं हैं, सिर्फ प्रतीत होते हैं। मृत्यु उन शत्रुओं में से है, जो नहीं है और प्रतीत होता है। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–7) प्रवचन–184

शोषण या साधना—(प्रवचन—पांचवां)

अध्‍याय—16

सूत्र—184

काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विता:।

मोहाङ्गाहींत्त्वीसद्ग्राहागर्क्तन्‍तेउशुचिव्रता:।। 10।।

चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुयश्रिता:।

कामोयभोगपरमा एतावदिति निश्चिता: ।। 11।।

आशापाशशातैर्बद्धा: कामक्रोधयरायणा ।

ईहन्‍ते कामभोगार्थमन्यायेनार्श्रसंचयान्।। 12।।

और वे मनुष्य दंभ, मान और मद से युक्त हुए किसी प्रकार भी न पूर्ण होने वाली कामनाओं का आसरा लेकर तथा मोह से मिथ्‍था सिद्धांतों को ग्रहण करके भ्रष्ट आचरणों से युक्‍त हुए संसार में बर्तते हैं।

तथा वे मरणपर्यत रहने वाली अनंत चिंताओं को आश्रय किए हुए और विषय— भोगों को भोगने के लिए तत्‍पर हुए, इतना मात्र ही आनंद है, ऐसा मानने वाले हैं। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–7)–प्रवचन–183

आसुरी व्‍यक्‍ति की रूग्‍णताएं—(प्रवचन—चौथा)

अध्‍याय—16

सूत्र—

प्रवृत्तिं च निवृत्ति च जना न विदरासरा:।

न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते।। 7।।

असत्यमप्रितष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्।

अपरस्थरसंभूतं किमन्यत्काकैक्कुम्।। 8।।

एंता दृष्टिमवष्टथ्य नष्टमानोऽल्पबुद्धय:।

प्रभवन्‍ज्युक्कर्माण: क्षयाय जगतीऽहिता:।। 9।।

और हे अर्जुन, आसुरी स्वभाव वाले मनुष्य कर्तव्य—कार्य में प्रवृत्त होने को और अकर्तव्य—कार्य से निवृत्त होने को भी नहीं जानते हैं। इसलिए उनमें न तो बाहर—भीतर की शुद्धि है, न श्रेष्ठ आचरण है और न सत्य भाषण ही है। Continue reading

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मैं मृत्‍यु सिखाता हूं–(प्रवचन–5)

स्‍व है द्वार—सर्व का—(प्रवचन—पांचवां)

जो अपने भीतर प्रवेश करता हे, वह भीतर पहुंचते ही पाता है कि वह सबके भीतर पहुंच गया है। क्‍योंकि बाहर से हम सब भिन्‍न–भिन्‍न नहीं है।

मेरे प्रिय आत्मन्।

 एक मित्र ने पूछा है कि मैने सत्य को या परमात्मा को पाने की जो विधि बताई है— सबका निषेध कर के और स्वयं को जानने की— क्या इससे उलटा नहीं हो सकता है कि हम सबमें ही परमात्मा को जानने का प्रयास करें? सर्व में वही है यह भाव करें?

से थोड़ा समझना उपयोगी होगा। जो व्यक्ति स्वयं में परमात्मा को नहीं जानता है, वह सर्व में उसे कभी भी नहीं जान सकता है। जो अभी स्वयं में भी उसे नहीं पहचान पाया, वह और किसी में उसे नहीं पहचान पा सकता है। स्वयं का मतलब है, जो मेरे निकटतम है। और फिर तो कोई भी होगा तो मुझसे थोड़ा दूर और दूर और दूर ही होगा। और निकटतम मैं हूं, उसमें भी मुझे परमात्मा दिखाई न पड़ता हो, तो:. मुझसे जो दूर हैं, उनमें तो कभी भी नहीं दिखाई पड सकता है। Continue reading

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मैं मृत्‍यु सिखाता हूं–(प्रवचन–4)

सजग मृत्‍यु और जाति—स्‍मरण के रहस्‍यहों में प्रवेश—(प्रवचन—चौथा)

जितनी घनी अंधेरी रात हो, तारे उतने ही चमकते दिखाई पड़ते है। और जितने काले बादल हों, बिजली की चमक चाँदी बन जाती है। जब मृत्‍यु पूरी तरह चारों तरफ खड़ी हो जाती है, तब वह जीवन का जो बिंदु है, वह पूरी चमक में प्रकट होता है, उसके पहले कभी प्रकट नहीं होता है।

 मेरे प्रिय आत्मन्। कल रात की चर्चा के संबंध में कुछ प्रश्न पूछे गए हैं। एक मित्र ने पूछा है, होश से मरा तो जा सकता है लेकिन होश मे जन्मा कैसे जा सकता है?

असल में मृत्यु और जन्म दो घटनाएं नहीं हैं, एक ही घटना के दो छोर हैं। इसलिए एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं। अगर सिक्के का एक पहलू हाथ मैं आ जाए, तो दूसरा पहलू अपने — आप हाथ में आ जाएगा। ऐसा नहीं होता कि सिक्के का एक पहलू मेरे हाथ में हो, तो दूसरे को कैसे हाथ में लूं। वह दूसरा अपने — आप हाथ में आ जाता है। मृत्यु और जन्म एक ही घटना के दो छोर हैं। मृत्यु अगर होशपूर्ण हो जाए, तो जन्म अनिवार्य रूप से होशपूर्ण हो जाता है। मृत्यु यदि बेहोश हो, तो जन्म भी बेहोश होता है। अगर कोई मरते क्षण में होश से भरा रहे, तो अपने नए जन्म के क्षण में भी पूरे होश से भरा रहता है। मरते क्षण में बेहोश हो, तो नये जन्म के क्षण में भी बेहोश होता है। Continue reading

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गीता दर्शन-(भाग–7) प्रवचन–182

आसुरी संपदा—(प्रवचन—तीसरा)

अध्‍याय—16

सूत्र:

दम्भो दयोंऽभिमानश्च क्रोध: पारूष्‍यमेव च।

अज्ञानं चाभिजातस्म पार्थ संपदमासुशँम्।। 4।।

दैवी संयद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता।

मा शुचः संपदं दैवीमीभजातोऽसि पाण्डव।। 5।।

द्वौ भूतसगौं लस्कैऽस्मिन्दैव आसुर एव च ।

दैवो विस्तरश: प्रोक्त आसुरं पार्थ मे मृणु।। 6।।

और है पार्थ, पाखंड, घमंड और अभिमान तथा क्रोध और कठोर वाणी एवं अज्ञान, ये सब आसुरी संपदा को प्राप्त हुए पुरुष के लक्षण हैं।

उन दोनों कार की संपदाओं में दैवी संपदा तो मुक्‍ति के लिए और आसुरी संपदा बांधने के मानी गई है। इसलिए है अर्जुन, तू शोक मत कर, क्योंकि तू दैवी संपदा को प्राप्त हुआ है। Continue reading

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मैं मृत्‍यु सिखाता हूं–(प्रवचन–3)

जीवन के मंदिर में द्वार है मृत्‍यु का—(प्रवचन—तीसरा)

 मृत्‍यु से न तो मुक्‍त होना है और न मृत्‍यु को जीतना है।

मृत्‍यु को जानना है। जानना ही मुक्‍ति बन जाता है। जानना ही जीत जाता है।

मरने से हम इतने डरे हुए लोग हैं कि मरते वक्त हम स्वेच्छा से ही बेहोश हो जाते हैं। मरने के थोड़ी देर पहले ही बेहोश हो जाते हैं। बेहोशी में ही मरते हैं, फिर बेहोशी में ही नया जन्म हो जाता है। न हम मृत्यु को देख पाते हैं, न जन्म को देख पाते हैं। और इसलिए हम कभी भी नहीं समझ पाते हैं कि जीवन शाश्वत है। मृत्यु और जन्म बीच में आए हुए पड़ाव से ज्यादा नहीं हैं, जहां हम वस्त्र बदल लेते हैं।

मेरे प्रिय आत्मन्!

जिसे हम जान लेते हैं, उससे हम मुक्त हो जाते हैं। और जिसे हम जान लेते हैं, उसे हम जीत भी लेते हैं। हमारी हार और पराजय हमारे अज्ञान के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। अंधकार है, इसलिए पराजय है। प्रकाश हो तो पराजय असंभव है। प्रकाश विजय बन जाएगा। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–7) प्रवचन–181

दैवीय लक्षण—(प्रवचन—दूसरा)

अध्‍याय—16

सूत्र—

अहिंसा सत्‍यमक्रोधस्‍त्‍याग: शान्‍तिरपैशुनम्।

दया भूतेष्‍वलोलुप्‍त्‍वं मार्दवं ह्ररिचापलम्।। 2।।

तेज: क्षमा धृति: शौचमद्रोहोनातिमानिता ।

भवन्ति संपदं दैवीमीभिजातस्य भारत।। 3।।

दैवी संयदायुक्‍त पुरुष के अन्य लक्षण हैं : अहिंसा, सत्य, अक्रोध, त्याग, शांति और किसी की भी निंदादि न करना तथा सब भूत प्राणियों में दया, अलोलुपता, कोमलता तथा लोक और शास्त्र के विरुद्ध आचरण में लज्जा और व्यर्थ चेष्टाओं का अभाव; तथा तेज, क्षमा, धैर्य और शौच अर्थात बाहर— भीतर की शुद्धि एवं अद्रोह अर्थात किसी में भी शत्रु— भाव का न होना और अपने में पूज्‍यता के अभिमान का अभाव— ये सब तो हे अर्जुन, दैवी संपदा को प्राप्त हुए पुरूष के लक्षण हैं। Continue reading

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मैं मृत्‍यु सिखाता हूं–(प्रवचन–2)

आध्यात्मिक विश्व आंदोलन—ताकि कुछ व्‍यक्‍ति प्रबुद्ध हो सकें—(प्रवचन—दूसरा)

जिनके भीतर भी पुकार है उनके ऊपर एक बड़ा दायित्व है आज जगत के लिए। आज तो जगत के कोने— कोने में जाकर कहने की यह बात है कि कुछ थोड़े से लोग बाहर निकल आएं और सारे जीवन को समर्पित कर दें ऊंचाइयां अनुभव करने के लिए।

मेरे प्रिय आत्मन्।

कल संध्या की चर्चा में कुछ बातें मैने कही हैं। उस संबंध में स्पष्टीकरण के लिए कुछ प्रश्न आए हैं। एक मित्र ने पूछा है कि यदि मां के पेट में पुरुष और स्त्री आत्मा के जन्मने के लिए अवसर पैदा करते हैं तो इसका अर्थ यह हुआ कि आत्माएं अलग— अलग हैं और सर्वव्यापी आत्मा नहीं है। उन्होने यह भी पूछा है कि मैने तो बहुत बार कहा है कि एक ही सत्य है एक ही परमात्मा है एक ही आत्मा है फिर ये दोनों बातें तो कंट्राडिक्टरी विरोधी मालूम होती हैं। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–7) प्रवचन–180

दैवी संपदा का अर्जन—(प्रवचन—पहला)

अध्‍याय—16

सूत्र–

(श्रीमद्भगवद्गीता)

 श्रीभगवानवाच:

अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थिति:।

दानं दमश्च यज्ञश्‍च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्।। 1।।

उसके उपरांत श्रीकृष्‍ण भगवान फिर बोले कि हे अर्जुन, दैवी संपदा जिन पुरूषों को प्राप्त है तथा जिनको आसुरी संपदा प्राप्त है, उनके लक्षण पृथक—पृथक कहता हूं। दैवी संपदा को प्राप्त हुए पुरूष के लक्षण हैं :

अभय, अंतःकरण की अच्छी प्रकार से शुद्धी, ज्ञान— योग में निरंतर दृढ़ स्थिति और दान तथा इंद्रियों का दमन, यज्ञ, स्वाध्याय तथा तय एवं शरीर और इंद्रियों के सहित अंतःकरण की सरलता। Continue reading

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