गीता दर्शन–(भाग–2) प्रवचन–12

अंतर्वाणी-विद्या (अध्याय ४)—बारहवां प्रवचन

प्रश्न:

भगवान श्री, अट्ठाइसवें श्लोक में चार यज्ञों की बात कही गई है। दो यज्ञों पर चर्चा हो चुकी है, सेवारूपी यज्ञ और स्वाध्याय यज्ञ। तीसरे तप यज्ञ का क्या अर्थ है? उसे यहां स्वधर्म पालनरूपी यज्ञ क्यों कहा गया है? और चौथे योग यज्ञ का क्या अर्थ है? उसे यहां अष्टांग योगरूपी यज्ञ क्यों कहा गया है?

स्वधर्मरूपी यज्ञ। व्यक्ति यदि अपनी निजता को, अपनी इंडिविजुअलिटी को, उसके भीतर जो बीजरूप से छिपा है उसे, फूल की तरह खिला सके, तो भी वह खिला हुआ व्यक्तित्व का फूल परमात्मा के चरणों में समर्पित हो जाता है और स्वीकृत भी।

व्यक्ति की भी एक फ्लावरिंग है; व्यक्ति का भी फूल की भांति खिलना होता है। और जब भी कोई व्यक्ति पूरा खिल जाता है, तभी वह नैवेद्य बन जाता है। वह भी प्रभु के चरणों में समर्पित और स्वीकृत हो जाता है। Continue reading

Posted in गीता दर्शन--भाग--2 (ओशो) | Tagged , , , | Leave a comment

गीता दर्शन–(भाग–2) प्रवचन–11

स्वाध्याय-यज्ञ की कीमिया (अध्याय ४)—ग्यारहवां प्रवचन

प्रश्न:

भगवान श्री, अट्ठाइसवें श्लोक में स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च का अनुवाद दिया है, भगवान के नाम का जप तथा भगवतप्राप्ति विषयक शास्त्रों का अध्ययन रूप ज्ञान-यज्ञ के करने वाले। कृपया स्वाध्याय-यज्ञ को समझाएं।

स्वाध्याय-यज्ञ गहरे से गहरे आत्म-रूपांतरण की एक प्रक्रिया है। और कृष्ण ने जब कहा था यह सूत्र, तब शायद इतनी प्रचलित प्रक्रिया नहीं थी स्वाध्याय-यज्ञ, जितनी आज है। आज पृथ्वी पर सर्वाधिक प्रचलित जो प्रक्रिया आत्म-रूपांतरण की है, वह स्वाध्याय-यज्ञ है। इसलिए इसे ठीक से, थोड़ा ज्यादा ही ठीक से समझ लेना उचित है।

आधुनिक मनुष्य के मन के निकटतम जो प्रक्रिया है, वह स्वाध्याय-यज्ञ है। कृष्ण ने तो उसे चलते में ही उल्लेख किया है। उस समय बहुत महत्वपूर्ण वह नहीं थी, बहुत प्रचलित भी नहीं थी। कभी कोई साधक उसका प्रयोग करता था। लेकिन सिगमंड फ्रायड, गुस्ताव जुंग, अल्फ्रेड एडलर, सलीवान, फ्रोम और पश्चिम के सारे मनोवैज्ञानिकों ने स्वाध्याय-यज्ञ को बड़ी कीमत दे दी है। Continue reading

Posted in गीता दर्शन--भाग--2 (ओशो) | Tagged , , , | Leave a comment

एस धम्‍मो सनंतनो–(भाग-12) प्रवचन–117

बुद्धत्व का आलोक—प्रवचन—117

सूत्र:

छिंद सोतं परक्‍कम्‍म कामें पनुद ब्राह्मण।

संखारानं खयं जत्‍वा अकतज्‍जूसि ब्राह्मण ।।313।।

यदा द्वयंसु धम्मेसु पारगू होति ब्राह्मणो।

अथस्‍स सब्बे संयोगा अत्‍थं गच्‍छंति जानतो ।।314।।

यस्‍स पारं अपारं वा पारापारं न विज्‍जति।

वीतद्दरं विसज्‍जुत्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ।।315।। Continue reading

Posted in एस धम्‍मो सनंतनो--भाग-12 (ओशो) | Tagged , , , | Leave a comment

जिनसूत्र–(भाग–1 ) प्रवचन–16

उठो, जागो—सुबह करीब है—प्रवचन सोलहवां

प्रश्‍नसार:

1—जैसे महावीर के ‘अहिंसा’ शब्‍द का गलत अर्थ लिया गया,

ऐसे ही क्‍या आपका ‘प्रेम’ शब्‍द खतरे से नहीं भरा है?

2—जो दीया तूफान से बुझ गया, उसे फिर जला के क्‍या करूं?

जो परमात्‍मा घर से ही भटक गया, उसे घर वापस बुला के क्‍या करूं?

3—तेरे गुस्‍से से भी प्‍यार, तेरी मार भी स्‍वीकार। Continue reading

Posted in जिन सूत्र (महावीर) भाग--1 | Tagged , , , | Leave a comment

एस धम्‍मो सनंतनो–(भाग–12) प्रवचन–116

राजनीति और धर्म—प्रवचन—116

प्रश्‍न सार:

पहला प्रश्‍न:

आपने कबीर और मीरा की एक ही सभा में उपस्थित होने की कहानी कही। लेकिन यह ऐतिहासिक रूप से संभव नहीं है। क्योंकि दोनों समसामयिक नहीं थे।

इतिहास का मूल्य दो कौड़ी है। इतिहास से मुझे प्रयोजन भी नहीं है। कहानी अपने आप में मूल्यवान है, इतिहास में घटी हो या न घटी हो। घटने से मूल्य बढ़ेगा नहीं।

कहानी का मूल्य कहानी के भाव में है। और ऐतिहासिक रूप से भी घट सकती है, कोई बहुत कठिन बात नहीं है। अगर कबीर एक सौ बारह साल जिंदा रहे हों—जो कि संभव है—तो कबीर और मीरा का मिलन हो सकता है।

लोग एक सौ पचास साल तक भी जीते, हैं। रूस में हजारों लोग हैं, जो एक सौ पचास साल के करीब पहुंच गए हैं। Continue reading

Posted in एस धम्‍मो सनंतनो--भाग-12 (ओशो) | Tagged , , , | Leave a comment

एस धम्‍मो सनंतनो–(भाग–12) प्रवचन–115

विराट की अभीप्सा—प्रवचन—115

सूत्र:

सुज्‍जागारं पविट्ठस्‍स संतचित्‍तस्‍स भिक्‍खुनो।

अमानुसी रति होति सम्‍माधम्‍मं विपस्‍सतो ।।307।।

यतो यतो सम्मसति खन्‍धानं उदयव्ययं ।

लभती पीतिपामोज्जं अमतं नं विजानतं ।।308।।

पटिसन्‍थारवुत्‍तस्‍स आचारकुसलो सिया।

ततो पामोज्‍जबहुलो दुक्‍खस्‍सन्‍तं करिस्‍सति ।।309।।

विस्‍सिका विय पुप्‍फनि मद्दवानि पमुज्‍चति।

एवं रागज्‍च दोसज्‍च विप्‍पमुज्‍चेथ भिक्‍खवो ।।310।। Continue reading

Posted in एस धम्‍मो सनंतनो--भाग-12 (ओशो) | Tagged , , , | Leave a comment

जिनसूत्र–(भाग–1) प्रवचन–15

मनुष्‍यो सतत जाग्रत रहो—प्रवचन—पंद्रहवां

सूत्र:

सीतंति सुवंताणं, अत्‍था पुरिसाण लोगसारत्‍था।

तम्‍हा जागरमाणा, विधुणध पोराणयं कम्‍मं।। 39।।

जागरिया धम्‍मीणं, अहंम्‍मीणं च सुत्‍तया संया।

वच्‍छाहिवभगिणीए, अकहिंसु जिणो जयंतीए।। 40।।

पमायं कम्‍ममाहंसु, अप्‍पमायं तहाउवरं।

तब्‍भावादेसओ वावि, बालं पंडितमेव वा।। 41।।

न कम्‍मुणा कम्‍म खवेंति वाला, अकम्‍मुणा कम्‍म खवेंति धीरा।

मेधाविणो लोभमया ववीता, संतोसिणो नौ पकरेंति पावं।। 42।। Continue reading

Posted in जिन सूत्र (महावीर) भाग--1 | Tagged , , , | Leave a comment

एस धम्‍मो सनंतनो–(भाग–12) प्रवचन–114

जीन की कला—प्रवचन—114

प्रश्‍न सार:

पहला प्रश्‍न

आत्मा और परमात्मा को अस्वीकार करने वाले गौतम बुद्ध धर्म-गंगा को पृथ्वी पर उतार लाने वाले विरले भगीरथों में गिने गए। और आपने अपने धम्मपद-प्रवचन को नाम दिया-एस धम्मो सनंतनो। धम्मपद-प्रवचन के इस समापन-पर्व में हमें संक्षेप में एक बार फिर इस धर्म को समझाने की अनुकंपा करें।

आत्‍मा और परमात्मा को मानना-वस्तुत: किसी भी चीज को मानना-कमजोरी और अज्ञान का लक्षण है। मानना ही अज्ञान का लक्षण है। जानने वाला मानता नहीं। जानता है, मानने की कोई जरूरत नहीं। मानने वाला जानता नहीं। जानता नहीं, इसीलिए मानता है।

मानने और जानने के फर्क को खूब गहरे से समझ लेना। मानने से जानने की भ्रांति पैदा हो जाती है। वह सस्ता उपाय है। वह झूठी दवा है।

मान लिया-ईश्वर है। इस मानने में बड़ी तरकीब है मन की। अब जानने की कोई जरूरत न रही। मानने से, जानने का भ्रम खड़ा कर लिया। मानते रहे वर्षों तक, दोहराते रहे कि ईश्वर है, दोहराते रहे कि ईश्वर है—मदिर और मस्जिद में, और गिरजे और गुरुद्वारे में—तो धीरे— धीरे भूल ही जाओगे कि मुझे पता नहीं है। बार—बार दोहराने से ऐसी प्रतीति होने लगेगी कि हा, ईश्वर है। Continue reading

Posted in एस धम्‍मो सनंतनो--भाग-12 (ओशो) | Tagged , , , | Leave a comment

एस धम्‍मो सनंतनो–(भाग–12) प्रवचन–113

एस धम्‍मो सनंतनो

(भाग—12)

ओशो

इस देश ने एक ऐसी संपदा जानी है, जिसके सामने और सब संपदाएं फीकी हो जाती है।

इस देश को ऐसे हीरों का पता है। जिनके सामने तुम्‍हारे हीरे कंकड़—पत्‍थर है। इस देश ने ध्‍यान का धन जाना है। और जिसने ध्‍यान जान लिया, उसके लिए फिर और कोई धन नहीं है; सिर्फ ध्‍यान ही धन है। इस देश ने समाधि जानी है। और जिसने समाधि जानी है, वह सम्राट हुआ। उसे असली साम्राज्‍य मिला।

ओशो

एस धम्‍मो सनंतनो

भाग—12

संन्यास की मंगल—वेला—प्रवचन—113

सूत्र:

सब्‍बसो नाम—रूपस्‍मिं यस्स नत्‍थि ममयितं।

असता च न सोचति स वे भिक्‍खूति वुच्‍चति ।।303।।

सिज्‍च भिक्‍खु! इमं नावं सित्‍ता ते लहुमेस्‍सति।

छेत्‍वा रागज्‍च दोसज्‍च निब्‍बाणमेहिसि ।।304।। Continue reading

Posted in एस धम्‍मो सनंतनो--भाग-12 (ओशो) | Tagged , , , | Leave a comment

जिनसूत्र–(भाग–1) प्रवचन–14

प्रेम से मुझे प्रेम है—प्रवचन—चौदहवां

प्रश्‍नसार:

1–परंपरा-भंजक महावीर ने स्वयं को चौबीसवां तीर्थकर क्‍यों स्‍वीकार किया?

2—महावीर का स्‍वयं सदगुरू, तीर्थंकर बनना व शिष्‍यों को दीक्षा देना—क्‍या उनके ही सिद्धांत के विपरीत नहीं है?

3—वर्तमान शताब्‍दि में आप हमें कौन—सा शब्‍द देना पसंद करेंगे?

4—आपके सामने दिन खोलूं कि नहीं खोलूं—मुझे घबराहट होती है। और क्‍या मैं कुछ भी नहीं कर पाती? मेरी हिम्‍मत अब टूटी जा रही है। Continue reading

Posted in जिन सूत्र (महावीर) भाग--1 | Tagged , , , | Leave a comment

गीता दर्शन–(भाग–2) प्रवचन–10

संन्यास की नई अवधारणा—(अध्याय ४) प्रवचन—दसवां

सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे।

आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते।। 27।।

और दूसरे योगीजन संपूर्ण इंद्रियों की चेष्टाओं को तथा प्राणों के व्यापार को ज्ञान से प्रकाशित हुई परमात्मा में स्थितिरूप योगाग्नि में हवन करते हैं।

अज्ञानी परमात्मा को भेंट भी करे, तो क्या भेंट करे? अज्ञानी न परमात्मा को जानता, न स्वयं को जानता। न उसे उसका पता है, जिसको भेंट करनी है; न उसका पता है, जिसे भेंट करनी है। स्वभावतः, उसे यह भी पता नहीं है कि क्या भेंट करना है। Continue reading

Posted in गीता दर्शन--भाग--2 (ओशो) | Tagged , , , | Leave a comment

गीता दर्शन–(भाग–2) प्रवचन–9

यज्ञ का रहस्य (अध्याय ४) प्रवचन—नौवां

दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते।

ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति।। 25।।

और दूसरे योगीजन देवताओं के पूजनरूप यज्ञ को ही अच्छी प्रकार उपासते हैं अर्थात करते हैं और दूसरे ज्ञानीजन परब्रह्म परमात्मा रूप अग्नि में यज्ञ के द्वारा ही यज्ञ को हवन करते हैं।

यज्ञ के संबंध में थोड़ा-सा समझ लेना आवश्यक है।

धर्म अदृश्य से संबंधित है। धर्म आत्यंतिक से संबंधित है। पाल टिलिक ने कहा है, दि अल्टिमेट कंसर्न। आत्यंतिक, जो अंतिम है जीवन में–गहरे से गहरा, ऊंचे से ऊंचा–उससे संबंधित है। जीवन के अनुभव के जो शिखर हैं, अब्राहिम मैसलो जिन्हें पीक एक्सपीरिएंस कहता है, शिखर अनुभव, धर्म उनसे संबंधित है। Continue reading

Posted in गीता दर्शन--भाग--2 (ओशो) | Tagged , , , | Leave a comment

जिनसूत्र–(भाग–1) प्रवचन–13

वासना ढपोरशंख है—प्रवचन—तेरहवां

सारसूत्र:

जीववहो अप्‍पवहो, जीवदया अप्‍पणो दया होइ।

ता सव्‍वजीवहिंसा, परिचत्‍ता अत्‍त कामेहिं।। 32।।

तुमं सि नाम स चव, जं हंतव्‍वं ति मन्‍नसि।

तुमं सि नाम स चेव, जं अज्‍जावेयव्‍वं ति मन्‍नसि।। 33।।

रागादीणमणुप्‍पासो, अहिंसकत्‍तं त्ति देसियं समए।

तेसिं चे उप्‍पत्‍ती, हिंसेत्‍ति जिणेहि णिद्दिट्ठा।। 34।।

अज्‍झवसिएण बंधो, सत्‍ते मारेज्‍ज मा थ मारेज्‍ज।

एसो बंधसमासो, जीवाणं णिच्‍छयणयस्‍स।। 35।।

हिंसा दो अविरमणं, वहपरिणामो य होइ हिंसा हु।

तम्‍हा पमत्‍तजोग, पाणव्‍ववरोवओ णिच्‍चं।। 36।।

अत्‍ता चेव अहिंसा, अत्‍ता हिंसति णिच्‍छओ समए।

जो होदि अप्‍पमत्‍तो, अहिंसगो हिंसगो इदरो।। 37।। Continue reading

Posted in जिन सूत्र (महावीर) भाग--1 | Tagged , , , | Leave a comment

गीता दर्शन–(भाग–2) प्रवचन–8

मैं मिटा, तो ब्रह्म—(अध्याय ४) प्रवचन—आठवां

यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः।

समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते।। 22।।

और अपने आप जो कुछ आ प्राप्त हो, उसमें ही संतुष्ट रहने वाला और द्वंद्वों से अतीत हुआ तथा मत्सरता अर्थातर् ईष्या से रहित, सिद्धि और असिद्धि में समत्व भाव वाला पुरुष कर्मों को करके भी नहीं बंधता है।

जो प्राप्त हो उसमें संतुष्ट, द्वंद्वों के अतीत–इन दो बातों को ठीक से समझ लेना उपयोगी है।

जो मिले, उसमें संतुष्ट! जो मिले, उसमें संतुष्ट कौन हो सकता है? चित्त तो जो मिले, उसमें ही असंतुष्ट होता है। चित्त तो संतोष मानता है उसमें, जो नहीं मिला और मिल जाए। चित्त जीता है उसमें, जो नहीं मिला, उसके मिलने की आशा, आकांक्षा में। मिलते ही व्यर्थ हो जाता है। चित्त को जो मिलता है, वह व्यर्थ हो जाता है; जो नहीं मिलता है, वही सार्थक मालूम होता है। Continue reading

Posted in गीता दर्शन--भाग--2 (ओशो) | Tagged , , , | 2s टिप्पणियाँ

गीता दर्शन–(भाग–2) प्रवचन–7

कामना-शून्य चेतना—(अध्याय 4) प्रवचन—सातवां

यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः।

ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः।। 19।।

और हे अर्जुन, जिसके संपूर्ण कार्य कामना और संकल्प से रहित हैं, ऐसे उस ज्ञान-अग्नि द्वारा भस्म हुए कर्मों वाले पुरुष को ज्ञानीजन भी पंडित कहते हैं।

कामना और संकल्प से क्षीण हुए, कामना और संकल्प की मुक्तिरूपी अग्नि से भस्म हुए…। चेतना की ऐसी दशा में जो ज्ञान उपलब्ध होता है, ऐसे व्यक्ति को ज्ञानीजन भी पंडित कहते हैं। इसमें दोत्तीन बातें गहरे से देख लेने की हैं।

एक तो, ज्ञानीजन भी उसे पंडित कहते हैं।

अज्ञानीजन तो पंडित किसी को भी कहते हैं। अज्ञानीजन तो पंडित उसे कहते हैं, जो ज्यादा सूचनाएं संगृहीत किए हुए है। अज्ञानीजन तो पंडित उसे कहते हैं, जो शास्त्र का जानकार है। अज्ञानीजन तो पंडित उसे कहते हैं, जो तर्कयुक्त विचार करने में कुशल है। Continue reading

Posted in गीता दर्शन--भाग--2 (ओशो) | Tagged , , , | Leave a comment

अष्‍टावक्र: महागीता–(भाग–4) प्रवचन–10

परमात्‍मा हमारा स्‍वभावसिद्ध अधिकार है—प्रवचन–दसवां

दिनांक 5 दिसंबर, 1976;

श्री रजनीश आश्रम पूना।

सूत्रसार:

अष्‍टावक्र उवाच:

यस्य बोधोदये तावक्यम्नवद्भवति भ्रम:।

तस्मै सुखैकरूयाय नम: शांताय तेजसे।। 177।।

अर्जयित्वाउखिलानार्थान् भोगानाम्मोति पुष्कलान्।

नहि सर्वयरित्यागमतरेण सखी भवेत।। 178।।

कर्तव्यदु:खमार्तडब्बालादग्धांतरात्मनः।

कुतः प्रशमयीयूषधारा सारमृते सुखम्।। 179।।

भवोउयं भावनामात्रो न किंचित्यरमार्थत।

नात्‍स्‍यभाव: स्वभावानां भावाभार्वावभाविनाम्।। 180।।

न दूरं न च संकोचाल्लब्धमेवात्मन: पदम्।

निर्विकल्प निरायासं निर्विकार निरंजनम्।। 181।। Continue reading

Posted in अष्‍टावक्र: महागीता--(भाग--4) ओशो | Tagged , , , | Leave a comment

जिनसूत्र–(भाग–1) प्रवचन–12

संकल्‍प की अंतिम निष्‍पत्‍ति: समर्पण—प्रवचन—बारहवां

प्रश्‍नसार:

1—मुझसे न समर्पण होता है और न मुझमें संकल्‍प की शक्‍ति है।

और आपसे दूरी भी बरदाश्‍त नहीं होती। क्‍या करूं?

2—आपका कहना है कि प्‍यास है तो जल भी होगा ही, और प्‍यासा ही जल को नहीं खोजता, जल भी प्‍यासे को खोजता है…… ? मेरा मार्ग—निर्देश करें।

3—आश्‍चर्य है कि में आपके प्रति अनाप—शनाप बकता हूं कभी गाली भी देता हूं,

ये क्‍या है?

4—मेरी विचित्र धारणाओं के कारण आप मुझे भगवान जैसे नहीं लगते…. ?

5—मेरी दिनचर्या आनंदचर्या बन गयी है। अब पिधलूं और बहूं—बस यही कह दें। Continue reading

Posted in जिन सूत्र (महावीर) भाग--1 | Tagged , , , | Leave a comment

जिनसूत्र–(भाग–1) प्रवचन–11

अध्‍यात्‍म प्रक्रिया है जागरण की—प्रवचन—ग्‍यारहवां

सूत्र:

अणथोवं वणथोवं, अग्‍गीथोवं कसायथोवं च।

न हु भे वीससियव्‍वं, थोवं पि हु तं बहु होई।। 26।।

कोहो पीइं पणसोइ, माणो विण्‍यनासणो।

माया मित्‍ताणि नासेइ, लोहो सव्वविणासणो।। 27।।

उवसमेण हणे कोहं, माणं मद्दवया जिणे।

मायं चउज्‍जवभावेण, लोभं संतोसओ जिणे।। 28।।

जहा कुम्‍मे सअंगाई, सए देहे समाहरे।

एवं पावाइं मेहावी, अज्‍झप्‍पेण समाहरे।। 29।। Continue reading

Posted in जिन सूत्र (महावीर) भाग--1 | Tagged , , , | Leave a comment

जिनसूत्र–(भाग–1) प्रवचन–10

जिंदगी नाम है रवानी का—प्रवचन—दसवां

प्रश्‍नसार:

1—लोग आपको धर्म—भ्रष्‍ट करनेवाला कहते है, विरोध करते है।

उनके साथ कैसे जीया जाए?

2—जो कुछ मुझे मिला है, वह कम नहीं—

फिर भी आखिर क्‍या पाकर मुझे संतोष होगा?

3—कागा सब तन खाइयो, चुन—चुन खाइयो मांस।

दो नैना नहिं खाईयो, पिया मिलन की आस।।

4—आप न जाने गुरूदेव मेरे, मैं तुम्‍हें पुकारा करती हूं।

एक बार ह्रदय में छेद करो,वह क्षण मैं निहारा करती हूं।। Continue reading

Posted in जिन सूत्र (महावीर) भाग--1 | Tagged , , , | Leave a comment

जिनसूत्र–(भाग–1) प्रवचन–9

अनुकरण नहीं—आत्‍म अनुसंधान—प्रवचन—नौवां

सारसूत्र:

अप्‍पा कत्‍ता विकत्‍ता य, दुहाण य सुहाण य।

अप्‍पा मित्‍तममित्‍तं च, दुप्‍पट्ठिय सुप्‍पट्ठिओ।। 22।।

एगप्‍पा सजिए सत्तू, कसाया इंदियाणि य।

ते जिणित्‍तु जहानायं, विहरामि अहं मुणी।। 23।।

एगओ विरइं कुज्‍जा, एगओ य पवत्‍तणं।

असंजमे जियत्‍तिं च, संजमे य पवत्‍तणं।। 24।।

रोगे दोसे य दो पावे, पावकम्‍म पवत्‍तणे।

ज भिक्‍खू रूंभई निच्‍चं, से न अच्‍छइ मंडले।। 25।। Continue reading

Posted in जिन सूत्र (महावीर) भाग--1 | Tagged , , , | Leave a comment