यात्रा एक नये अायाम की……..

ओशो— एक परिचय

सत्य की व्यक्तिगत खोज से लेकर ज्वलंत सामाजिक व राजनैतिक प्रश्नों पर ओशो की दृष्टि उनको हर श्रेणी से अलग अपनी कोटि आप बना देती है। वे आंतरिक रूपांतरण के विज्ञान में क्रांतिकारी देशना के पर्याय हैं और ध्यान की ऐसी विधियों के प्रस्तोता हैं जो आज के गतिशील जीवन को ध्यान में रख कर बनाई गई हैं।DSC_1209
अनूठे ओशो सक्रिय ध्यान इस तरह बनाए गए हैं कि शरीर और मन में इकट्ठे तनावों का रेचन हो सके, जिससे सहज स्थिरता आए व ध्यान की विचार रहित दशा का अनुभव हो।
ओशो की देशना एक नये मनुष्य के जन्म के लिए है, जिसे उन्होंने ‘ज़ोरबा दि बुद्धा ‘ कहा है— जिसके पैर जमीन पर हों, मगर जिसके हाथ सितारों को, छू सकें। ओशो के हर आयाम में एक धारा की तरह बहता हुआ वह जीवन—दर्शन है जो पूर्व की समयातीत प्रज्ञा और पश्चिम के विज्ञान और तकनीक की उच्चतम संभावनाओं को समाहित करता है। ओशो के दर्शन को यदि समझा जाए और अपने जीवन में उतारा जाए तो मनुष्य—जाति में एक क्रांति की संभावना है। Continue reading

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गीता दर्शन–भाग–4–(प्रवचन–107

जीवन के ऐक्‍स का बोध—अ—मन में—(प्रवचन—आठवां)

अध्‍याय—9

सूत्र:

तपाम्यहमहं वर्ष निग्ष्टृणान्स्पृउजामि च।

अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चछमर्जुन ।। 19।।

त्रैविद्या मां सोमया: पूतपापा

यज्ञैरिष्टवा स्वग्रतिं प्रार्थयन्ते।

ते पुण्यमामाद्य सुरेन्द्रलस्केम्

अश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ।। 20।।

 मैं ही सूर्यरूप हुआ तपता हूं तथा वर्क को आकर्षित करता हूं और वर्षाता हूं। और हे अर्जुन? मैं ही अमृत और मृत्‍यु एवं सत और असत भी? सब कुछ मैं ही हूं। Continue reading

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अध्‍यात्‍म–उपनिषद–प्रवचन–14

आकाश के समान असंग है जीवन्‍मुक्‍त–चौदहवां प्रवचन

 सूत्र:

स्यमसंगमुदासीनं परिज्ञाय नत्रो यथा।

न श्लिष्यते यति: किंचित् कदाचिद्भाविकर्मभि:।। 51।।

न नभो घटोयोगेन सुरणन्धेन लिप्यते।

तथऽऽत्मोपाधियोगेन तद्धमैंनेव लिप्यते।। 52।।

ज्ञानोदयात् पुराऽऽरब्‍धं कर्म ज्ञानान्न नश्यति।

यदत्वा स्वफलं लक्ष्यमुद्दिश्योत्सृष्टवाणवत्।। 53।।

व्याघ्रबुद्धया विनिर्मुक्तो वाण: पश्चातु गोमतै।।

न तिष्ठति भिनत्येव लक्ष्मं वेगेन निर्भरम्।। 54।।

अजरोऽस्टयमरोऽध्स्मीति व आत्मानं प्रयद्यते।

तदात्मना तिष्ठतोध्स्य कुत: प्रारब्ध कल्पना।। 55।। Continue reading

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ताओ उपनिषद–(भाग–6) प्रवचन–115

मूर्च्छा रोग है और जागरण स्वास्थ्य—(प्रवचन—एकसौपंद्रहवां)

 अध्याय 71

 रुग्ण मानसिकता

जो जानता है कि मैं नहीं जानता हूं,

वह सर्वश्रेष्ठ है;

जो उसे भी जानने का ढोंग करता है

जो वह नहीं जानता,

वह मन से रुग्ण है।

और जो रुग्ण मानसिकता को रुग्ण

मानसिकता की तरह पहचानता है,

वह मन से रुग्ण नहीं है।

संत मन से रुग्ण नहीं हैं।

क्योंकि वे रुग्ण मानसिकता को रुग्ण

मानसिकता की तरह पहचानते हैं,

इसलिए वे मन से रुग्ण नहीं हैं। Continue reading

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बिन बाती बिन तेल–(सूफी कथा) प्रवचन–10

भक्त की पहचान: शिकायत-शून्य हृदय—(प्रवचन—दसवां)

 दिनांक 30 जून 1974(प्रातः),

श्री रजनीश आश्रम; पूना.

भगवान!

 एक बार मूसा ने भगवान से कहा, ‘मुझे आपके किसी भक्त को देखने की इच्छा है।’

इस पर एक आवाज आई कि फलां घाटी में चले जाओ, वहां तुम्हें वह मिलेगा

जो भगवान को प्यारा है, जो भगवान को प्रेम करता है और जो सत्पथ पर चलता है।

मूसा वहां गये और उन्होंने देखा कि वह आदमी तो चीथड़ों से लिपटा पड़ा है।

और तरहत्तरह के कीड़े-मकोड़े उसके शरीर पर रेंग रहे हैं।

मू्सा ने पूछा, ‘क्या मैं तुम्हारे लिये कुछ कर सकता हूं?’

उस आदमी ने कहा, ‘एक प्याला पानी ला दो, मैं बहुत प्यासा हूं।’

जब मूसा पानी लेकर वापस मुड़े तब उन्होंने देखा कि वह व्यक्ति मरा पड़ा है।

वे फिर गये कि उसके कफन के लिये कुछ कपड़े ले आएं, Continue reading

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पतंजलि: योगसूत्र–(भाग–2) प्रवचन–36

पश्‍चिम को जरूरत है बुद्धो की—प्रवचन—सौहलवां

प्रश्‍न—सार: 

1—जीवन की लिप्सा, जीवेषणा का कारण क्या है? और यह जीवन का आनंद मनाने में बाधा क्यों है?

 2—पश्चिम के अस्‍तित्‍ववादी विचारों ने जीवन की अर्थहीनता जान ली है। लेकिन वे आनंद की खोज क्‍यों नहीं करते?

 3—बुद्धपुरुषों में शारीरिक आवश्‍यकता, कामवासना क्‍यों कर तिरोहित हो जाती है?

4—फ्रायड, जुंग और जेनोव आदि लोग स्‍वयं पर प्रयोग क्‍यों नहीं करते? Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–4) प्रवचन–106

मैं ओंकार हूं—(प्रवचन—सातवां)

अध्‍याय—9 

सूत्र:

पिताहमस्य जगतो माता धाता पिताम्ह:।

वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च।। 17।।

गतिर्भर्ता प्रभु: साक्षी निवास: शरणं सुह्रत्।

प्रभव: प्रलय: स्थानं निधान बीजमध्ययम्।। 18।।

 और हे अर्जुन! मैं ही इस संपूर्ण जगत का धाता अर्थात धारण करने वाला, पिता, माता और पितामह हूं, और जानने योग्य पवित्र ओंकार तथा ऋग्वेदु सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूं। Continue reading

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बिन बाती बिन तेल (सूफी कहानी) प्रवचन–9

जहां वासना, वहां विवाद—(प्रवचन—नौवां)

 दिनांक 29 जून 1974 (प्रातः),

श्री रजनीश आश्रम; पूना.

 भगवान!

एक आदमी था, जो जानवरों की भाषा समझता था।

वह एक दिन किसी रास्ते से जा रहा था।

वहां एक गधा और एक कुत्ता आपस में बड़े जोर-जोर से झगड़ रहे थे।

कुत्ता कह रहा था, ‘बंद करो ये घास और चारागाह की बातें!

कुछ खरगोश या हड्डियों के संबंध में कहो। मैं तो उकता गया हूं।

उस आदमी से न रहा गया और वह बोला,

‘सूखी घास का उपयोग भी तो किया जा सकता है; जो गोश्त जैसा ही होगा।’

वे दोनों जानवर उसकी ओर मुड़े; उसके शब्द न सुनाई पड़े

इसलिये कुत्ता पूरी ताकत से भोंकने लगा, और गधे ने जोर से लात मारकर

उस आदमी को बेहोश कर दिया। और फिर वे अपने झगड़े में उलझ गये।

भगवान! मजनू कलंदर की इस बेबूझ कहानी का अर्थ क्या है? Continue reading

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अध्‍यात्‍म उपनिषद–प्रवचन–13

जीवन्‍मुक्‍त है संत—तेरहवां प्रवचन

 सूत्र :

 न प्रत्यग्ब्लणोभेदं कथधिद च्छसर्गयो:।

प्रज्ञथा यो विजानाति स जीवन्मुक्ल इष्यते।। 46।।

साधुभि: पूज्यमनेsस्मिन् पीड्यमानेऽपि दुर्जनै:।

सक्यावो भवेद्यस्य स जीवमुक्‍त इष्‍यते।। 47।।

विज्ञातब्रह्मतत्वस्य यथापूर्व न संसृति:।

अस्ति चेन्‍न स विज्ञातब्रह्माभावो बहिर्मुख:।। 48।।

सुखाद्यनुभवो यावत् तावत् प्रारख्यीमष्यते।

फलोदय: क्रियापूर्वो निकियो न हि कुत्रचित्।। 49।।

अहं ब्रह्मोति विज्ञानात् कल्पकोटिशतर्जितम्।

संचितं विलयं याति प्रबोधान् स्वप्नकर्मयत्।। 50।।

 जीवात्मा तथा ब्रह्म का भेद और ब्रह्म तथा सृष्टि का भेद बुद्धि द्वारा जो कभी नहीं जानता, वह जीवनमुक्‍त कहलाता है। Continue reading

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पतंजलि: योगसूत्र–(भाग–2) प्रवचन–35

प्रतिप्रसव: पुरातन प्राइमल थैरेपी——(प्रवचन—पद्रंहवां)

   योगसूत्र

(साधनापाद)

स्‍वस्‍सवाही विदुषोउपि तथारूढोउभिनिवेश:।। 9।।

जीवन में से गुजरते हुए मृत्यु— भय है, जीवन से चिपकाव है।

यह बात सभी में प्रबल है—विद्वानों में भी।

ते प्रतिप्रसवहेया: सूक्ष्‍मा:।। 10।।

पांचों क्लेशों के मूल कारण मिटाये जा सकते

है, उन्‍हें पीछे की और उनके उद्गम तक विसर्जित कर देने से।

ध्‍यानहेयास्‍तद्वृत्‍तय:।। 11।।

पांचों दुखों की बह्म अभिव्‍यक्‍तियां तिरोहित हो जाती है—ध्‍यान के द्वारा। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–4) प्रवचन–105

ज्ञान, भक्‍ति, कर्म—प्रवचन—छठवां

अध्‍याय—9

           सूत्र:

ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते।

एकत्‍वेन पृथक्‍त्‍वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ।। 12।।

अहं क्रतुरहं यज्ञ: स्वधाहमहमौषधम्

मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमीग्नरहं हुतम्।। 13।।

कोई तो मुझ विराट स्वरूय परमत्‍मा को ज्ञान— यज्ञ के द्वारा पूजन करते हुए एकत्व भाव से अर्थात जो कुछ है सब वासुदेव ही है, हम भाव से उपासते हैं और दूसरे पृथकत्व भाव से अर्थात स्वामी— सेवक भाव से और कोई—कोई अच्छे प्रकार से भी उपासते हैं। Continue reading

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पतंजलि: योगसूत्र–(भाग–2) प्रवचन–34

मन का मिटना और स्‍वभाव की पहचान—(प्रवचन—चौहदवां)

 प्रश्‍नसार:

1—पश्चिम में चल रहे मन और स्‍वप्‍नों के विश्‍लेषण—कार्य को

   आप ज्यादा महत्व क्यों नहीं देते?

 2—आपने कहा कि सब आरोपित प्रभावों से मुक्त हो जाना है।

   तो धार्मिक होने के लिए क्‍या सभ्‍यता और संस्‍कृति से भी मुक्‍त होना होगा?

3—आपके व्‍यक्‍तित्‍व और शब्‍दो से प्रभावित हुए बिना

   कोई खोजी आपका शिष्‍य कैसे हो सकता है?

 4—अहंकार के शिकार होने से बचकर कैसे अपने स्‍वभाव को पहचाने?

5—यदि शार्टकट की बात गलत है, तो फिर आप छलांग की बात क्‍यों करते है? Continue reading

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ताओ उपनिषद–(भाग–6) प्रवचन–113

मुझसे भी सावधान रहना—(प्रवचन—एकसौतैहरवां)

 प्रश्न-सार

1–क्या अनुकरण हीनता का लक्षण है?

 2–क्या जीवन मात्र दोहरता रहता है?

 3–यथार्थ को अभयपूर्वक कैसे देखा जाए?

 4–द्वंद्वात्मक जगत के हम बाहर हैं क्या? Continue reading

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बिन बाती बिन तेल–(झेन कथा) प्रवचन–8

बेईमानी : संसार के मालकियत की कुंजी—(प्रवचन—आठवां)

दिनांक 28 जून 1974 (प्रातः),

श्री रजनीश आश्रम; पूना.

 भगवान!

एक बदमाश था, जिसे गांव के लोगों ने पकड़ा और एक पेड़ से बांध लिया।

और उससे कहा कि तुम्हें आज शाम तक हम समुद्र में डुबो देंगे।

यह कहकर वे लोग अपने काम पर चले गये। इस बीच एक गड़रिया आया

और उसने बदमाश से पूछा कि क्यों यहां बंधे पड़े हो?

चालाक बदमाश ने कहा, ‘कुछ लोगों ने मुझे इसलिये बांध दिया कि

मैंने उनके रुपये लेने से इनकार कर दिया।

हैरत में आकर गड़रिये ने पूछा, ‘वे तुम्हें रुपये क्यों देना चाहते थे?

और तुमने रुपये लेने से इनकार क्यों किया?’

बदमाश बोला, ‘मैं धार्मिक आदमी हूं और वे लोग हैं अधार्मिक;

और वे मुझे पथ-भ्रष्ट करना चाहते हैं।

गड़रिये ने कहा कि ‘मैं तुम्हारी जगह यहां बैठता हूं; तुम मुक्त हुए।’

दोनों ने जगह बदल ली। शाम के समय गांव के लोग आये,

उन्होंने गड़रिये को बोरे में बंद किया और उसे जाकर समुद्र में डुबो दिया। Continue reading

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अध्‍यातम उपनिषद–प्रवचन–12

वैराग्‍य आनंद का द्वार है—बारहवां प्रवचन

 सूत्र :

वासनाsनुदयो भोग्ये वैरण्यस्य तदाsविधि:।

अहंभावावोदयभावो बोधक्य परमावधि:।। 41।।

लीनवृत्तेरनुत्पीत्तर्मर्यादोपरतेस्तु    सा।

स्थिऋज्ञो यतिरयं य: सदानन्दमश्नुते।। 42।।

ब्रह्मण्‍येव विलीनात्मा निर्विकारो विनिक्रिय:।

ब्रह्मात्‍मनो    शोधितयोरेकभावावगाहिनी।। 43।।

निर्विकल्पा व चिन्मात्रा वृत्तिःप्रज्ञेति कथ्यते।

सा सर्वदा भवेद्यस्य स जीवन्मुक्त इष्यते।। 44।।

देहेन्द्रियेच्छंभाव        इदंभावस्तदन्यके।

यस्य नो भवत: क्यापि स जींवन्मुक्त इष्‍यते।। 45।।

भोगने लायक पदार्थ के ऊपर वासना जाग्रत न हो, तब वैराग्य की अवधि जान लेनी; और अहं—भाव का उदय न हो, तब ज्ञान की परम अवधि समझना। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–4) प्रवचन–104

दैवी या आंसुरी धारा—(अध्‍याय—9) प्रवचन—पाँचवाँ (104)

सूत्र:

 महात्मानस्तु मां पार्थ दैवौं प्रकृतिमश्रिता:।

भजज्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्।। 13।।

सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः।

नमस्यन्तश्च मां भक्त्‍या नित्‍ययुक्‍ता उपासते ।। 141।

परंतु हे पार्थ दैवी प्रकृति के आश्रित हुए जो महात्माजन है, वे तो मेरे को अब भूतों का सनतन कारण और नाशरहित अक्षरस्वरूय जानकर अनन्य मन से युक्‍त हुए निरंतर भजते हैं।

और वे दृढ़ निश्चय वाले भक्तजन निरंतर मेरे नाम और गुणों का र्कीर्तन करते हुए तथा मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करते हुए, और मेरे को बारंबार नमस्कार करते हुए, सदा मेरे ध्यान में युक्त हुए अनन्य भक्‍ति से मुझे उपासते हैं। Continue reading

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अध्‍यात्‍म–उपनिषद–प्रवचन–11

धर्म—मेध समाधि—ग्‍यारहवां प्रवचन

 सूत्र :

वृत्तयस्तु तदानीमप्यज्ञाता आत्मगोचरह:।

स्मरणादनुम।ईयन्ते व्युइप्प्थतस्य समुइप्प्थता:।। 36।।

अनादाविह संसारे संचिता: कर्मकोटय:।

अनेन विलयं यान्‍ति शुद्धो धर्मोऽभिवर्धते।। 37।।

धर्ममेधमिमं प्राहु: समाधि यप्तोवित्तम।:।

वर्षत्येष यथा धमर्त्मृतधारा: सहसश:।। 38।।

अमुना वासनाजाले निःशेष प्रीवलायिते।

समूलोन्मूलिते. पुण्यपापाख्ये कर्मसंचये।। 39।।

वाक्यस्मृतिबद्धं सत् प्राक् परोक्षावमासते।

करामलकवद्बोधमपरोक्षं      प्रसूयते।। 40।। Continue reading

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ताओ उपनिषद–(भाग–6) प्रवचन–112

आक्रामक नहीं, आक्रांत होना श्रेयस्कर है—(प्रवचन—एकसौबारहवां)

 अध्याय 69

छद्मावरण

सैन्य रणनीतिज्ञों का यह सूत्र है:

मैं आक्रमण में आगे होने का साहस नहीं करता,

बल्कि आक्रांत होना पसंद करता हूं।

एक इंच आगे बढ़ने के बजाय

एक फुट पीछे हटना श्रेयस्कर है।

उसका अर्थ है: सैन्यदल के बिना कूच करना, आस्तीन नहीं समेटना,

सीधे हमलों से चोट नहीं करना, बिना हथियारों के हथियार-बंद रहना।

शत्रु की शक्ति को कम कर आंकने से बड़ा अनर्थ नहीं है;

शत्रु की शक्ति का अवमूल्यन मेरे खजाने नष्ट कर सकता है;

इसलिए जब दो समान बल की सेनाएं आमने-सामने होती हैं,

तब जो सदाशयी है, झुकता है, वह जयी होता है। Continue reading

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बिन बाती बिन तेल–(झेन कथा)प्रवचन–7

मनुष्य की जड़: परमात्मा—(प्रवचन—सातवां)

दिनांक 27 जून 1974(प्रातः),

श्री रजनीश आश्रम; पूना.

 भगवान!

किसी आदमी ने एक दिन एक पेड़ को काट लिया।

एक सूफी फकीर ने, जो यह सब देख रहे थे, कहा, ‘

इस ताजा डाल को तो देखो!

वह रस से भरा है और खुश है।

क्योंकि वह अभी नहीं जानता है कि काट डाला गया है।

हो सकता है यह इस भारी घाव से अनजान हो,

जो अभी-अभी इसे लगा है।

लेकिन थोड़े ही समय में वह जान जायेगा।

इस बीच तुम इसके साथ तर्क भी नहीं कर सकते। Continue reading

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बिन बाती बिन तेल–प्रवचन–6

प्रेम मृत्यु से महान है—(प्रवचन—छठवां)

दिनांक 26 जून 1974 (प्रातः),

श्री रजनीश आश्रम; पूना.

 भगवान!

किसी जमाने में एक शरीफ की बेटी थी–सौंदर्य में अप्रतिम।

रूप में ही नहीं, गुण-शील में भी उसका जोड़ नहीं था।

वह ब्याहने के योग्य हुई तब रूप-गुण में श्रेष्ठ

तीन युवकों ने उससे ब्याह का प्रस्ताव रखा।

यह देखकर कि तीनों युवक समान योग्यता के हैं,

पिता ने लड़की पर ही चुनाव का भार छोड़ दिया।

लेकिन महीनों तक लड़की कुछ तय नहीं कर पाई।

इस बीच वह अचानक बीमार पड़ी और मर गई।

बहुत शोकपूर्वक तीनों युवकों ने अपनी प्रेमिका को दफनाया। Continue reading

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अध्‍यात्‍म उपनिषद–प्रवचन–10

सत्‍य की यात्रा के चार चरण—(प्रवचन—दसवां)

 सूत्र :

इत्‍थं वाक्यैस्तदर्थानसंधानं श्रवणं भवेत।

युक्ता सभावितत्वा संधानं मननं तु तत्।। 33।।

ताभ्यां निर्विचिकित्‍सेकत्सेध्थें चेतस: स्थायितस्य तत्।

एकतानत्वमेतीद्ध निदिध्यासनमुच्यते।। 34।।

ध्यातृध्याने परित्यज्य क्रमाद्धयैयैकगे।चरम्।

निवातदीपवच्चितं समाधिरभिंधीयतै।। 35।।

 इस प्रकार’तत्त्वमसि‘ आदि वाक्यों द्वारा जीव—ब्रह्म की एकतारूप अर्थ का अनुसंधान करना, यह श्रवण है। और जो कुछ सुना गया है उसके अर्थ को युक्तिपूर्वक विचार करना, यह मनन है। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–4) प्रवचन–103

विराट की अभीप्‍सा—(अध्‍याय—9)—प्रवचन—चौथा

 सूत्र:

मयाध्‍यक्षेण प्रकृति: सूयतेसचाराचरम्।

हेतुनानेन कौन्तेय जगद्धइयीश्वर्त्से।। 10।।।

अवजानीन्त मां मूढ़ा मानुषी तनुमख्सिम् ।

परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्।। 11।।

मोघाशा मोघकर्माणो मोख्ताना विचेतस:।

राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मौहिनौं श्रिता:।। 12।।

और हे अर्जुन मुझ अधिष्ठता की उपस्थिति मात्र से यह मेरी प्रकृति अर्थात माया चराचर— सहित सर्व जगत को रचती है और इस ऊपर कहे हुए हेतु से ही यह जगत

बनता—बिखरता रहता है। Continue reading

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ताओ उपनिषद–(भाग–6) प्रवचन–111

असंघर्ष: सारा अस्तित्व सहोदर है—(प्रवचन—एकसौग्‍यहरवां)

 अध्याय 68

 असंघर्ष का सदगुण

वीर सैनिक हिंसक नहीं होता है;

अच्छा लड़ाका क्रोध नहीं करता है;

बड़ा विजेता छोटी बातों के लिए नहीं लड़ता है;

मनुष्यों का अच्छा प्रयोक्ता

अपने को दूसरों के नीचे रखता है।

– असंघर्ष का यही सदगुण है।

इसे ही मनुष्यों को प्रयोग करने की क्षमता कहते हैं; Continue reading

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अध्‍यात्‍म–उपनिषाद–प्रवचन–9

ब्रह्म की छाया संसार है—नौवां प्रवचन

 सूत्र :

 मायोपष्टिर्जगद्योंनि: सर्वज्ञत्वादिलक्षण:।

पारोक्ष्यशबल: सत्याद्यात्मकस्तत्पदत्मिधः।। 30।।

आलम्बतनया भाति योsस्मत्सत्ययशब्दये।:।

अंतःकरणसंत्मईन्नबा: एधः अ त्वपदत्मिधः।। 31।।

मायाऽविद्ये विहायैव उपाधी परजींवयो:।

अखंड सच्चिदानन्दं परं क्ल विलक्ष्मते।। 32।।

 मायारूप उपाधि वाला, जगत का उत्पत्ति स्थान, सर्वज्ञता आदि लक्षणों से युक्त, परोक्षपन से मिश्र और सत्य आदि स्वरूप वाला जो परमात्मा है, वही तत् शब्द से प्रसिद्ध है।

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बिन बाती बिन तेल–(ओशो) प्रवचन–5

जीवन एक वर्तुल है—(प्रवचन—पांचवां)

दिनांक 25 जून 1974 (प्रातः),

श्री रजनीश आश्रम; पूना.

भगवान!

आज एक लोककथा जैसी दिखने वाली सूफी कहानी का अर्थ

आप हमें समझाने की कृपा करें।

एक चोर चोरी के इरादे से खिड़की की राह, एक महल में घुस रहा था।

खिड़की की चौखट के टूटने से वह जमीन पर गिर पड़ा और उसकी टांग टूट गई।

चोर ने इसके लिए महल के मालिक पर अदालत में मुकदमा कर दिया।

गृहपति ने कहा, ‘इसके लिए तो चौखट बनाने वाले बढ़ई पर मुकदमा होना चाहिए।’

बढ़ई जब बुलाया गया, तब उसने कहा, ‘राज ने खिड़की का द्वार ठीक से नहीं बनाया Continue reading

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पतंजलि: योगसूत्र–(भाग–2) प्रवचन–33

दुःख का मूल : होश का अभाव और तादात्‍म्‍य—(प्रवचन—तैहरवां)

योगसूत्र

(साधनापाद)

अनित्याशुचिदु:खानात्‍मसु नित्यशुचिसुखात्मख्याति: अविद्या।। 5।।

अविद्या है—अनित्य को नित्य समझना, अशुद्ध को शुद्ध जानना, पीड़ा को सुख और

अनात्म को आत्म जानना।

दृग्‍दर्शनशक्‍त्योरेकात्‍मतेवास्सिता।। 6।।

अस्‍मिता है—दृष्‍टा का दृश्‍य के साथ तादात्‍म्‍य। Continue reading

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