ताओ उपनिषाद (भाग–4) प्रवचन–68

ताओ का स्वाद सादा है—(प्रवचन—अड़ष्‍ठवां)

अध्याय 35

 ताओ की शांति

 महान प्रतीक को धारण करो,

और समस्त संसार

अनुगमन करता है;

और बिना हानि उठाए

अनुगमन करता है;

और स्वास्थ्य, शांति और

व्यवस्था को उपलब्ध होता है।

अच्छी वस्तुएं खाने को दो,

और राही ठहर जाता है।

लेकिन ताओ का स्वाद

बिलकुल सादा है।

देखें, और यह अदृश्य है;

सुनें, और यह अश्राव्य है।

प्रयोग करने पर इसकी

आपूर्ति कभी चुकती नहीं है।

लाओत्से की दृष्टि में शिक्षक वही है जिसे शिक्षा देनी न पड़े, जिसकी मौजूदगी शिक्षा बन जाए; गुरु वही है जिसे आदर मांगना न पड़े, जिसे आदर वैसे ही सहज उपलब्ध हो जैसे नदियां सागर की तरफ बहती हैं। ऐसी सहजता ही जीवन में क्रांति ला सकती है। Continue reading

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ताओ उपनिषाद (भाग–4) प्रवचन–67

सारा जगत ताओ का प्रवाह है—(प्रवचन—सड़सठवां)

अध्याय 34

 महान ताओ सर्वत्र प्रवाहित है

महान ताओ सर्वत्र प्रवाहित है;

(बाढ़ की तरह) यह बाएं-दाएं सब ओर बह सकता है।

असंख्य वस्तुएं उसी से जीवन ग्रहण करती हैं;

और यह उन्हें अस्वीकार नहीं करता।

जब उसका काम पूरा होता है,

तब वह उन पर स्वामित्व नहीं करता।

असंख्य वस्तुओं को यह वस्त्र और भोजन देता है,

तो भी उन पर मालकियत का दावा नहीं करता।

प्रायः यह चित्त या वासना से रहित है,

इसलिए तुच्छ या छोटा समझा जा सकता है;

फिर सभी चीजों का,

उन पर बिना दावा किए, आश्रय होने के कारण,

वह महान भी समझा जा सकता है।

और चूंकि अंत तक वह महानता का दावा नहीं करता,

इसलिए उसकी महानता उपलब्ध है। Continue reading

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ध्‍यान–सूत्र (ओशो) प्रवचन-चौथा

विचार-शुद्धि के सूत्र—(प्रवचन—चौथा)

मेरे प्रिय आत्मन् ,

हले चरण की बात सुबह मैंने कही। शरीर की शुद्धि कैसे संभव है, उस पर थोड़ी-सी बातें आपको बतायीं। दूसरी पर्त मनुष्य के व्यक्तित्व की, उसके विचार की है। शरीर शुद्ध हो, विचार शुद्ध हो–तीसरी पर्त भाव की है–और भाव शुद्ध हो, तो साधना की परिधि तैयार होती है। ये तीन बातें भी सध जाएं, तो जीवन में बहुत अभिनव आनंद का, शांति का जन्म हो जाता है। ये तीन बातें भी सध जाएं, तो जीवन का नया जन्म हो जाता है। Continue reading

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ध्‍यान–सूत्र (ओशो) प्रवचन–तीसरा

चित्त-शघक्तयों का रूपांतरण—(प्रवचन—तीसरा)

मेरे प्रिय आत्मन्,

सबसे पहले एक प्रश्न पूछा है कि साधक को प्रकाश की किरण मिले, उसको सतत बनाए रखने के लिए क्या किया जाए?

 मैंने सुबह कहा, जो अनुभव हो आनंद का, जो शांति का, आनंद का अनुभव हो, उसे हम सतत चौबीस घंटे अपने भीतर बनाए रखें। कैसे बनाए रखेंगे?

दो रास्ते हैं। एक रास्ता तो है कि हम उस चित्त-स्थिति को, जो ध्यान में अनुभव हुई, उसका जब भी हमें अवसर मिले, पुनः स्मरण करें। जैसे ध्यान के समय शांत श्वास ली है। जब भी दिन में समय मिले, जब आप कोई विशेष काम में नहीं लगे हैं, उस समय श्वास को धीमा कर लें और नाक के पास जहां श्वास का कंपन हो, उसका थोड़ा-सा स्मरण करें। उस स्मरण के साथ ही उस भाव को फिर से आरोपित कर लें कि आप आनंदित हैं, प्रफुल्लित हैं, शांत हैं, स्वस्थ हैं। उस भाव को पुनः स्मरण कर लें। जब भी स्मरण आ जाए–सोते समय, उठते समय, रास्ते पर जाते समय–जहां भी स्मरण आ जाए, उस भाव को पुनः आवर्तित कर लें। Continue reading

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ध्‍यान–सूत्र (ओशो) प्रवचन–दूसरा

शरीर-शुद्धि के अंतरंग सूत्र—(प्रवचन—दूसरा)

 मेरे प्रिय आत्मन्,

रात्रि को साधना की प्रारंभिक भूमिका कैसे बने, उस संबंध में थोड़ी-सी बातें आपसे कही हैं। साधना की जो दृष्टि मेरे मन में है, वह किन्हीं शास्त्रों पर, किन्हीं ग्रंथों पर, किसी विशेष संप्रदाय पर आधारित नहीं है। जैसा मैंने अपने भीतर चलकर जाना है, उन रास्तों की बात भर आपसे कर रहा हूं। इसलिए मेरी बात कोई सैद्धांतिक बात नहीं है। उस पर जब मैं आपसे कह रहा हूं कि आप चलें और देखें, तो मुझे रत्तीभर भी ऐसा खयाल नहीं है कि आप चलेंगे, तो जो पाने की आपकी कल्पना है, उसे आप नहीं पा सकेंगे। इसलिए यह आश्वासन और विश्वास है कि जिन रास्तों पर मैंने प्रवेश करके देखा है, केवल उनकी ही आपसे बात कर रहा हूं।

एक बहुत पीड़ा और संताप के समय को मैंने गुजारा। बहुत चेष्टा के, बहुत प्रयत्न के समय को गुजारा। उस समय बहुत कोशिश, बहुत प्रयत्न करता था अंतस प्रवेश के। बहुत रास्तों से, बहुत पद्धतियों से उस तरफ जाने की बड़ी संलग्न चेष्टा की। Continue reading

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ध्‍यान–सूत्र (ओशो) प्रवचन–पहला

ध्‍यान—सूत्र

(ओशो द्वारा दिये गये नौ अमृत प्रवचनों एवं ध्‍यान निर्देशों का अप्रतिम संकलन।)

 कोई परमात्मा या कोई सत्य हमारे बाहर हमें उपलब्ध नहीं होगा, उसके बीज हमारे भीतर हैं और वे विकसित होंगे। लेकिन वे तभी विकसित होंगे जब प्यास की आग और प्यास की तपिश और प्यास की गर्मी हम पैदा कर सकें। मैं जितनी श्रेष्ठ की आकांक्षा करता हूं, उतना ही मेरे मन के भीतर छिपे हुए वे बीज, जो विराट और श्रेष्ठ बन सकते हैं, वे कंपित होने लगते हैं और उनमें अंकुर आने की संभावना पैदा हो जाती है। Continue reading

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अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग–2) प्रवचन–3

गौणी-भक्‍ति में लगो, पराभक्‍ति की प्रतीक्षा करो—तीसरा प्रवचन

प्रवचन तीसरा

13 मार्च 1978;

श्री रजनीश आश्रम, पूना।

 सूत्र :

भकत्‍या भजनोपसंहाराद्गौण्या परायैतद्धेतुत्वात्।।56।।

रागार्थे प्रकीर्त्तिसाहचर्याच्चेतरेषाम्।।57।।

अंतराले तू शेषा: स्युरुपास्यादौ च काण्डत्वात्।।58।।

ताभ्यः पाविन्दमुपक्रमात्।। 59।।

तासुप्रधान योगात् फलाऽधिक्यमेके।। 60।।

भक्ति की यात्रा को दो खंडों में बांटा जा सकता है। एक तो भक्त के हृदय में विरह की अवस्था है—वियोग की, रुदन की। और फिर दूसरी भक्त के हृदय में योग की अवस्था है—मिलन की, हर्ष—उन्माद की। Continue reading

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अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग–2) प्रवचन–7

विराट से मैत्री है भक्ति—सातवां प्रवचन

सातवां प्रवचन

17 मार्च 1978;

श्री रजनीश आश्रम, पूना।

 सूत्र :

तद्यजि पूजायामिरेषा नैवम!।।66।।

पादोदक तु पाद्यमव्याप्ते।।67।।

स्वयमर्पित ग्राह्यमविशेषातध।।68।।

निमित्तगुणानपेक्षपादपराधेषु व्यवस्था।।69।।

पत्रोदेर्दानमन्यथा हि वैशिष्टचम्।।70।।

कहा सबल तुम, कहा निर्बल मैं, प्यारे, मैं दोनों का ज्ञाता।

तप, संयम, साधन करने का

मुझको कम अभ्यास नहीं है,

पर इनकी सर्वत्र सफलता

पर मुझको विश्वास नहीं है,

धन्य पराजय मेरी जिससे

बचा लिया दंभी होने से

कहा सबल तुम, कहा निर्बल मैं, प्यारे, मैं दोनों का ज्ञाता। Continue reading

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अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग–2) प्रवचन–6

संसार जड़ है, अध्यात्म फूल है—छठवां प्रवचन

छठवां प्रवचन

16 मार्च 1978;

श्री रजनीश आश्रम पूना।

 प्रश्‍न सार :

1–उस फूल का रंग उड़ के सिर्फ बू रह जाए

सर जाए तो जाए आबरू रह जाए

साबित हो मेरी नफी से तेरा इकबाल

मैं इतना मिटू कि सिर्फ तू रह जाए

2–आवन कहि गये अजहूं न आए लीन्हीं न मोरी खबरिया’,

इतना कहने की इजाजत मांगता हूं।

3–रुदन और ध्यान का क्या संबंध है?

4–भक्ति को आप प्रेम की उपमा क्यों देते हैं? Continue reading

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अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग–2) प्रवचन–5

सब जागरण उसका है—पांचवां प्रवचन

पांचवां प्रवचन

15 मार्च 1978;

श्री रजनीश आश्रम पूना।

 सूत्र :

नामेति जैमिनि: सम्भवात्।। 61।।

अत्राड़;गप्रयोगाणां यथाकालसम्भवो गुहादिवत्।। 62।।

ईश्वर तुष्टेरेकोऽपि बली।। 63।।

अबन्धोऽर्पणस्य मुखम्।। 64।।

ध्यानवनियमस्तु दृष्टसौकर्यात्।। 65।।

भक्ति एक छलांग है। इसलिए साधन और साध्य का भेद केवल बौद्धिक भेद है। विचार के लिए अनिवार्य है। अनुभव में ऐसी कोई सीमा—साधन अलग, साध्य अलग, इस भांति नहीं है। बीज कब वृक्ष बनता है, कौन रेखा खींचेगा? गौणी— भक्ति कब पराभक्ति हो जाती है, कैसे निर्णय लोगे? कोई मापदंड़ नहीं है। Continue reading

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अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग–2) प्रवचन–4

प्रार्थना निरालंभ दशा है—चौथा प्रवचन :

चौथा प्रवचन

14 मार्च 1978;

श्री रजनीश आश्रम, पूना।

 प्रश्‍न सार:

1–मैं क्या करूं? कैसे प्रार्थना करूं? कैसे अर्चना करूं?

2–आपने कहा : ‘न मैं पूर्ण हूं और न संत’। इससे मुझे बड़ा सदमा लगा। मैं रातभर सो भी    न सका।

3–संन्यास लेने में अहंकार ही सबसे बड़ी बाधा है; तो इसको कैसे हटाया जा सकता है?

4–आप शास्त्र—शान का विरोध क्यों करते हैं?

5–गरीब जानके हमको न तुम भुला देना

तुम्हीं ने दर्द दिया है तुम्हीं दवा देना

6–आप सहित सभी महापुरुष जो जिंदा हैं, कभी इकट्ठे क्यों नहीं होते? प्रार्थना निरालंब दशा है Continue reading

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अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग–2) प्रवचन–2

परमात्मा के प्रति राग है भक्ति—दूसरा प्रवचन

दूसरा प्रवचन

12 मार्च 1978;

श्री रजनीश आश्रम पूना।

 प्रश्‍न सार :

1–मेरे प्रति लोगों की क्या धारणा होगी, इससे सदा भयभीत रहता हूं। अब संन्यास लेना है, लेकिन भय के कारण रुका हूं। क्या करूं?

2–गीता में कृष्‍ण द्वारा अपने बार—बार आने में निमित्त रूप बताए गये तीन कारणों को क्या आप पूरा कर रहे हैं? क्योंकि आप अपने को भगवान कहते हैं।

3–आप अपने को भगवान क्यों कहते हैं? क्या आप सबको पैदा कर रहे हैं?

4–क्या इस जगत में प्रेम का असफल होना अनिवार्य ही है? परमात्मा के प्रति राग है भक्ति Continue reading

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अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग–2) प्रवचन–1

भगवान को नहीं, भक्‍ति को खोजो—पहला प्रवचन

पहला प्रवचन

11मार्च 1978;

श्री रजनीश आश्रम पूना।

 सूत्र :

द्यूतराजसेवयो: प्रतिषेधाच्च।। 51 ।।

वासुदेवेऽपीति चेन्नाकारमात्रत्वात्।। 52 ।।

प्रत्यभिज्ञान्नाच्च।। 53 ।।

वृष्णिषु श्रेष्ठत्वमेतत्।। 54 ।।

एवं प्रसिद्धेषु च।। 55 ।।

अथातो भक्तिजिज्ञासा!

अब भक्ति की जिज्ञासा।

भक्ति की क्यों? भगवान की क्यों नहीं?

साधारणत: लोग भगवान की खोज में निकलते हैं। Continue reading

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अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग–2)

अथातो भक्ति जिज्ञासा—(भाग—२)

 (ऋषिविर शांडिल्‍य)

 ओशो

 प्रवेश से पूर्व

‘पूछा तुमने, कैसा धर्म इस पृथ्वी पर आप लाना चाहते हैं?

जीवन— स्वीकार का धर्म। परम स्वीकार का धर्म।

चूंकि जीवन— अस्वीकार की बातें बहुत प्रचलित रही हैं, इसलिये स्वभावत: लोग देह के विपरीत हो गए। अपने शरीर को ही सताने में संलग्न हो गए। और यह देह परमात्मा का मंदिर है। मैं इस देह की प्रतिष्ठा करना चाहता हूं। और चूंकि लोग संसार के विपरीत हो गए, देह के विपरीत हो गए, इसलिए देह के सारे सबंधों के विपरीत हो गए। भूल हो गई। Continue reading

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अष्‍टावक्र: महागीता (भाग–5) प्रवचन–15

मन का निस्तरण—(प्रवचन—पंद्रहवां)

दिनांक 25 जनवरी, 1977;

श्री ओशो आश्रम, कोरे गांव पार्क पूना।

 सूत्र:

सर्वारंभेषु निष्कामो यश्चरेद्बालवन्मुनि:।

न लेपस्तस्य शुद्धस्य क्रियमाणेऽपि कर्माणि।। 24०।।

स एव धन्य आत्मज्ञ: सर्वभावेषु यः सम:।

पश्यन् श्रृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन्नश्नन्निस्तर्षमानस:।। 241।।

क्य संसार: क्य चाभास: क्य साध्य क्य च साधनम्।

आकाशस्येव धीरस्य निर्विकल्पस्येव सर्वदा।। 242।।

स जयत्यर्थसंन्यासी पूर्णस्वरसविग्रह:।

अकृत्रिमोऽनवच्छिन्ने समाधिर्यस्य वर्तते।। 243।।

बहुनात्र किमुक्तेन ज्ञाततत्वो महाशय:।

भोगमोक्षनिराकाक्षी सदा सर्वत्र नीरस:।। 244।।

महदादि जगद्द्वैतं नाममात्रविजृम्भितम्।

विहाय शुद्धबोधस्य किं कृत्यमवशिष्यते।। 245।। Continue reading

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एक ओंकार सतनाम (नानक्) प्रवचन–9

आपे बीजि आपे ही खाहु—(प्रवचन—नौवां)

 पउड़ी: 20

भरीए हथु पैरु तनु देह। पाणी धोतै उतरसु खेह।।

मूत पलोती कपड़ होइ। दे साबूणु लईऐ ओहु धोइ।।

भरीऐ मति पापा के संगि। ओहु धोपै नावै कै रंगि।।

पुंनी पापी आखणु नाहि। करि करि करणा लिखि लै जाहु।।

आपे बीजि आपे ही खाहु। ‘नानक’ हुकमी आवहु जाहु।।

पउड़ी: 21

तीरथ तपु दइआ दतु दानु। जे को पावै तिलका मानु।।

सुणिआ मंनिया मनि कीता भाउ। अंतरगति तीरथि मलि नाउ।।

सभि गुणु तेरे मैं नाही कोई। विणु गुण कीते भगति न होइ।।

सुअसति आथि बाणी बरमाउ। सति सुहाणु सदा मनि चाउ।।

कवणु सुवेला वखतु कवणु। कवणु थिति कवणु वारु।।

कवणि सि रुती माहु। कवणु जितु होआ आकारु।।

वेल न पाईआ पंडती। जि होवै लेखु पुराणु।।

वखतु न पाइओ कादीआ। जि लिखनि लेखु कुराणु।।

थिति वारू ना जोगी जाणै। रुति माहु न कोई।।

जा करता सिरठी कउ साजै। आपे जाणै सोई।।

किव करि आखा किव सालाही। किउ वरनी किव जाणा।।

‘नानक’ आखणि सभु को आखै। इकदू इकु सिआणा।।

बडा साहिबु बडी नाई। कीता जा का होवै।।

‘नानक’ जे को आपौ जाणै। अगै गइया न सोहै।। Continue reading

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एक ओंकार सतनाम (नानक) प्रवचन–8

जो तुधु भावै साई भलीकार—(प्रवचन—आठवां)

 पउड़ी: 17

 असंख जप असंख भाउ। असंख पूजा असंख तप ताउ।।

असंख गरंथ मुखि वेद पाठ। असंख जोग मनि रहहि उदास।।

असंख भगत गुण गिआन वीचार। असंख सती असंख दातार।।

असंख सूर मुह भख सार। असंख मोनि लिव लाइ तार।।

कुदरति कवण कहा वीचारु। वारिआ न जावा एक बार।।

जो तुधु भावै साई भलीकार। तू सदा सलामति निरंकार।।

 पउड़ी: 18

असंख मूरख अंध घोर। असंख चोर हरामखोर।।

असंख अमर करि जाहि जोर। असंख गलबढ़ हतिआ कमाहि।।

असंख पापी पापु करि जाहि। असंख कुड़िआर कूड़े फिराहि।।

असंख मलेछ मलु भखि खाहि। असंख निंदक सिरि करहि भारू।।

‘नानक’ नीचु कहै वीचारु। वारिआ न जावा एक बार।।

जो तुधु भावै साई भलीकार। तू सदा सलामति निरंकार।।

 पउड़ी: 19

असंख नाव असंख थाव। अगंम अगंम असंख लोअ।।

असंख कहहि सिरि भारु होई।

अखरी नामु अखरी सालाह। अखरी गिआनु गीत गुण गाह।।

अखरी लिखणु बोलणु वाणि। अखरा सिरि संजोगु बखाणि।।

जिनि एहि लिखे तिसु सिर नाहि। जिव फुरमाए तिव तिव पाहि।।

जेता कीता तेता नाउ। विणु नावै नाही को थाउ।।

कुदरति कवण कहा वीचारु। वारिआ न जावा एक बार।।

जो तुधु भावै साई भलीकार। तू सदा सलामति निरंकार।। Continue reading

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महावीर वाणी (भाग–1) प्रवचन–23

ब्रह्मचर्य : कामवासना से मुक्‍ति—प्रवचन—तेईसवां

दिनांक 8 सितम्‍बर, 1972;

द्वितीय पर्युषण व्‍याख्‍यानमाला,

पाटकर हाल, बम्‍बई।

 ब्रह्मचर्य—सूत्र : 2

सद्दे रूवे य गंधे य, रसे फासे तहेव य।

पंचविहे कामगुणे, निच्चसो परिवज्जए।।

   कामाणुगिद्धिप्पभवं खु दुक्खं,

   सब्बस्स लोगस्स सदेवगस्स।

        जे काइयं माणसिय च किचि,

        तस्सऽन्तगं गच्छइ वीयरागो।।

देवदाणव गंधब्बा जक्सरक्ससकिन्नरा।

बंभयारि नमंसन्ति टुकरं जे करेलि तं।।

एस धम्मे धुवे निच्चे, सासए जिणदेसिए।

   सिद्धासिज्झन्ति चाणेण, सिाइस्कृस्सन्तितहाऽवरे।।

शब्द, रूप गंध, रस और स्पर्श इन पांच प्रकार के काम गुणों को भिक्षु सदा के लिए त्याग दें।

देवलोक सहित समस्त संसार के शारीरिक तथा मानसिक सभी प्रकार के दुख का मूल काम—भोगों की वासना ही है। जो साधक इस संबंध में वीतराग हो जाता है, वह शारीरिक तथा मानसिक सभी प्रकार के दुखों से छूट जाता है। Continue reading

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ताओ उपनिषाद (भाग–4) प्रवचन–66

स्वयं का ज्ञान ही ज्ञान है—(प्रवचन—छियाष्‍ठवां)

अध्याय 33

 आत्म-बोध

जो दूसरों को जानता है वह विद्वान है;

और जो स्वयं को जानता है वह ज्ञानी।

जो दूसरों को जीतता है वह पहलवान है;

और जो स्वयं को जीतता है वह शक्तिशाली।

जो संतुष्ट है वह धनवान है;

और जो दृढ़मति है वह संकल्पवान।

जो अपने केंद्र से जुड़ा रहता है वह मृत्युंजय है।

और जो मर कर जीवित है वह

चिर-जीवन को उपलब्ध होता है।

ताओ है सागर की भांति। नदियां सागर से पैदा होती हैं और सागर में पुनः खो जाती हैं। ताओ से अर्थ है उस मूल उदगम का, जहां से जीवन पैदा होता है; और उस अंतिम विश्राम का भी, जहां जीवन विलीन हो जाता है। ताओ आदि भी है और अंत भी। प्रारंभ भी वही है और समाप्ति भी वही। Continue reading

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ताओ उपनिषाद (भाग–4) प्रवचन–65

 ताओ उपनिषद—(भाग-4)

ओशो द्वारा लाओत्‍से के ‘ताओ तेह किंग’ पर दिए गए 127 प्रवचनों में से 21 ( पैंसठ से पचासी ) अमृत प्रवचनों का अपूर्व संकलन

जीवन में जो भी श्रेष्‍ठ है, अगर वह विनष्‍ट होने के करीब हो, तो पूरी प्रकृति भी उसे बचाने में साथ देती है। लाओत्‍सु की पूरी परंपरा नष्‍ट होने के करीब है। इसलिए दूनियां में बहुत तरह की कौशिश की जायेगी कि वह परंपरा नष्‍ट न हो। उसके बीज कहीं और अंकुरित हो जाये। और स्‍थापित हो जाये। मैं जो बोल रहा हूं वह भी उस बड़े प्रयास का एक हिस्‍सा है।

और लाओत्‍सु को अगर कहींभी स्‍थापित करना हो तो भारत के अतिरिक्‍तओर कहीं स्‍थापित करना बहुत मुश्‍किल है।

इसलिए लाओत्‍सु पर बोलना मैंने चुना है कि शायद कोई बीज आपके मन में पड़ जाए। शायद अंकुरित हो जाए। क्‍योंकि भारत समझ सकता है। निसर्ग की, स्‍वभाव की धारणा को भारत समझ सकता है। क्‍योंकि हमारी भी पूरी चेष्‍टा वही रही है हजारों वर्षों से।

ओशो

स्वर्ग और पृथ्वी का आलिंगन—(प्रवचन—पैंसठवां) Continue reading

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