एस धम्‍मो सनंतनो–(भाग–12) प्रवचन–114

जीन की कला—प्रवचन—114

प्रश्‍न सार:

पहला प्रश्‍न

आत्मा और परमात्मा को अस्वीकार करने वाले गौतम बुद्ध धर्म-गंगा को पृथ्वी पर उतार लाने वाले विरले भगीरथों में गिने गए। और आपने अपने धम्मपद-प्रवचन को नाम दिया-एस धम्मो सनंतनो। धम्मपद-प्रवचन के इस समापन-पर्व में हमें संक्षेप में एक बार फिर इस धर्म को समझाने की अनुकंपा करें।

आत्‍मा और परमात्मा को मानना-वस्तुत: किसी भी चीज को मानना-कमजोरी और अज्ञान का लक्षण है। मानना ही अज्ञान का लक्षण है। जानने वाला मानता नहीं। जानता है, मानने की कोई जरूरत नहीं। मानने वाला जानता नहीं। जानता नहीं, इसीलिए मानता है।

मानने और जानने के फर्क को खूब गहरे से समझ लेना। मानने से जानने की भ्रांति पैदा हो जाती है। वह सस्ता उपाय है। वह झूठी दवा है।

मान लिया-ईश्वर है। इस मानने में बड़ी तरकीब है मन की। अब जानने की कोई जरूरत न रही। मानने से, जानने का भ्रम खड़ा कर लिया। मानते रहे वर्षों तक, दोहराते रहे कि ईश्वर है, दोहराते रहे कि ईश्वर है—मदिर और मस्जिद में, और गिरजे और गुरुद्वारे में—तो धीरे— धीरे भूल ही जाओगे कि मुझे पता नहीं है। बार—बार दोहराने से ऐसी प्रतीति होने लगेगी कि हा, ईश्वर है। Continue reading

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एस धम्‍मो सनंतनो–(भाग–12) प्रवचन–113

एस धम्‍मो सनंतनो

(भाग—12)

ओशो

इस देश ने एक ऐसी संपदा जानी है, जिसके सामने और सब संपदाएं फीकी हो जाती है।

इस देश को ऐसे हीरों का पता है। जिनके सामने तुम्‍हारे हीरे कंकड़—पत्‍थर है। इस देश ने ध्‍यान का धन जाना है। और जिसने ध्‍यान जान लिया, उसके लिए फिर और कोई धन नहीं है; सिर्फ ध्‍यान ही धन है। इस देश ने समाधि जानी है। और जिसने समाधि जानी है, वह सम्राट हुआ। उसे असली साम्राज्‍य मिला।

ओशो

एस धम्‍मो सनंतनो

भाग—12

संन्यास की मंगल—वेला—प्रवचन—113

सूत्र:

सब्‍बसो नाम—रूपस्‍मिं यस्स नत्‍थि ममयितं।

असता च न सोचति स वे भिक्‍खूति वुच्‍चति ।।303।।

सिज्‍च भिक्‍खु! इमं नावं सित्‍ता ते लहुमेस्‍सति।

छेत्‍वा रागज्‍च दोसज्‍च निब्‍बाणमेहिसि ।।304।। Continue reading

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जिनसूत्र–(भाग–1) प्रवचन–14

प्रेम से मुझे प्रेम है—प्रवचन—चौदहवां

प्रश्‍नसार:

1–परंपरा-भंजक महावीर ने स्वयं को चौबीसवां तीर्थकर क्‍यों स्‍वीकार किया?

2—महावीर का स्‍वयं सदगुरू, तीर्थंकर बनना व शिष्‍यों को दीक्षा देना—क्‍या उनके ही सिद्धांत के विपरीत नहीं है?

3—वर्तमान शताब्‍दि में आप हमें कौन—सा शब्‍द देना पसंद करेंगे?

4—आपके सामने दिन खोलूं कि नहीं खोलूं—मुझे घबराहट होती है। और क्‍या मैं कुछ भी नहीं कर पाती? मेरी हिम्‍मत अब टूटी जा रही है। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–2) प्रवचन–10

संन्यास की नई अवधारणा—(अध्याय ४) प्रवचन—दसवां

सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे।

आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते।। 27।।

और दूसरे योगीजन संपूर्ण इंद्रियों की चेष्टाओं को तथा प्राणों के व्यापार को ज्ञान से प्रकाशित हुई परमात्मा में स्थितिरूप योगाग्नि में हवन करते हैं।

अज्ञानी परमात्मा को भेंट भी करे, तो क्या भेंट करे? अज्ञानी न परमात्मा को जानता, न स्वयं को जानता। न उसे उसका पता है, जिसको भेंट करनी है; न उसका पता है, जिसे भेंट करनी है। स्वभावतः, उसे यह भी पता नहीं है कि क्या भेंट करना है। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–2) प्रवचन–9

यज्ञ का रहस्य (अध्याय ४) प्रवचन—नौवां

दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते।

ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति।। 25।।

और दूसरे योगीजन देवताओं के पूजनरूप यज्ञ को ही अच्छी प्रकार उपासते हैं अर्थात करते हैं और दूसरे ज्ञानीजन परब्रह्म परमात्मा रूप अग्नि में यज्ञ के द्वारा ही यज्ञ को हवन करते हैं।

यज्ञ के संबंध में थोड़ा-सा समझ लेना आवश्यक है।

धर्म अदृश्य से संबंधित है। धर्म आत्यंतिक से संबंधित है। पाल टिलिक ने कहा है, दि अल्टिमेट कंसर्न। आत्यंतिक, जो अंतिम है जीवन में–गहरे से गहरा, ऊंचे से ऊंचा–उससे संबंधित है। जीवन के अनुभव के जो शिखर हैं, अब्राहिम मैसलो जिन्हें पीक एक्सपीरिएंस कहता है, शिखर अनुभव, धर्म उनसे संबंधित है। Continue reading

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जिनसूत्र–(भाग–1) प्रवचन–13

वासना ढपोरशंख है—प्रवचन—तेरहवां

सारसूत्र:

जीववहो अप्‍पवहो, जीवदया अप्‍पणो दया होइ।

ता सव्‍वजीवहिंसा, परिचत्‍ता अत्‍त कामेहिं।। 32।।

तुमं सि नाम स चव, जं हंतव्‍वं ति मन्‍नसि।

तुमं सि नाम स चेव, जं अज्‍जावेयव्‍वं ति मन्‍नसि।। 33।।

रागादीणमणुप्‍पासो, अहिंसकत्‍तं त्ति देसियं समए।

तेसिं चे उप्‍पत्‍ती, हिंसेत्‍ति जिणेहि णिद्दिट्ठा।। 34।।

अज्‍झवसिएण बंधो, सत्‍ते मारेज्‍ज मा थ मारेज्‍ज।

एसो बंधसमासो, जीवाणं णिच्‍छयणयस्‍स।। 35।।

हिंसा दो अविरमणं, वहपरिणामो य होइ हिंसा हु।

तम्‍हा पमत्‍तजोग, पाणव्‍ववरोवओ णिच्‍चं।। 36।।

अत्‍ता चेव अहिंसा, अत्‍ता हिंसति णिच्‍छओ समए।

जो होदि अप्‍पमत्‍तो, अहिंसगो हिंसगो इदरो।। 37।। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–2) प्रवचन–8

मैं मिटा, तो ब्रह्म—(अध्याय ४) प्रवचन—आठवां

यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः।

समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते।। 22।।

और अपने आप जो कुछ आ प्राप्त हो, उसमें ही संतुष्ट रहने वाला और द्वंद्वों से अतीत हुआ तथा मत्सरता अर्थातर् ईष्या से रहित, सिद्धि और असिद्धि में समत्व भाव वाला पुरुष कर्मों को करके भी नहीं बंधता है।

जो प्राप्त हो उसमें संतुष्ट, द्वंद्वों के अतीत–इन दो बातों को ठीक से समझ लेना उपयोगी है।

जो मिले, उसमें संतुष्ट! जो मिले, उसमें संतुष्ट कौन हो सकता है? चित्त तो जो मिले, उसमें ही असंतुष्ट होता है। चित्त तो संतोष मानता है उसमें, जो नहीं मिला और मिल जाए। चित्त जीता है उसमें, जो नहीं मिला, उसके मिलने की आशा, आकांक्षा में। मिलते ही व्यर्थ हो जाता है। चित्त को जो मिलता है, वह व्यर्थ हो जाता है; जो नहीं मिलता है, वही सार्थक मालूम होता है। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–2) प्रवचन–7

कामना-शून्य चेतना—(अध्याय 4) प्रवचन—सातवां

यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः।

ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः।। 19।।

और हे अर्जुन, जिसके संपूर्ण कार्य कामना और संकल्प से रहित हैं, ऐसे उस ज्ञान-अग्नि द्वारा भस्म हुए कर्मों वाले पुरुष को ज्ञानीजन भी पंडित कहते हैं।

कामना और संकल्प से क्षीण हुए, कामना और संकल्प की मुक्तिरूपी अग्नि से भस्म हुए…। चेतना की ऐसी दशा में जो ज्ञान उपलब्ध होता है, ऐसे व्यक्ति को ज्ञानीजन भी पंडित कहते हैं। इसमें दोत्तीन बातें गहरे से देख लेने की हैं।

एक तो, ज्ञानीजन भी उसे पंडित कहते हैं।

अज्ञानीजन तो पंडित किसी को भी कहते हैं। अज्ञानीजन तो पंडित उसे कहते हैं, जो ज्यादा सूचनाएं संगृहीत किए हुए है। अज्ञानीजन तो पंडित उसे कहते हैं, जो शास्त्र का जानकार है। अज्ञानीजन तो पंडित उसे कहते हैं, जो तर्कयुक्त विचार करने में कुशल है। Continue reading

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अष्‍टावक्र: महागीता–(भाग–4) प्रवचन–10

परमात्‍मा हमारा स्‍वभावसिद्ध अधिकार है—प्रवचन–दसवां

दिनांक 5 दिसंबर, 1976;

श्री रजनीश आश्रम पूना।

सूत्रसार:

अष्‍टावक्र उवाच:

यस्य बोधोदये तावक्यम्नवद्भवति भ्रम:।

तस्मै सुखैकरूयाय नम: शांताय तेजसे।। 177।।

अर्जयित्वाउखिलानार्थान् भोगानाम्मोति पुष्कलान्।

नहि सर्वयरित्यागमतरेण सखी भवेत।। 178।।

कर्तव्यदु:खमार्तडब्बालादग्धांतरात्मनः।

कुतः प्रशमयीयूषधारा सारमृते सुखम्।। 179।।

भवोउयं भावनामात्रो न किंचित्यरमार्थत।

नात्‍स्‍यभाव: स्वभावानां भावाभार्वावभाविनाम्।। 180।।

न दूरं न च संकोचाल्लब्धमेवात्मन: पदम्।

निर्विकल्प निरायासं निर्विकार निरंजनम्।। 181।। Continue reading

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जिनसूत्र–(भाग–1) प्रवचन–12

संकल्‍प की अंतिम निष्‍पत्‍ति: समर्पण—प्रवचन—बारहवां

प्रश्‍नसार:

1—मुझसे न समर्पण होता है और न मुझमें संकल्‍प की शक्‍ति है।

और आपसे दूरी भी बरदाश्‍त नहीं होती। क्‍या करूं?

2—आपका कहना है कि प्‍यास है तो जल भी होगा ही, और प्‍यासा ही जल को नहीं खोजता, जल भी प्‍यासे को खोजता है…… ? मेरा मार्ग—निर्देश करें।

3—आश्‍चर्य है कि में आपके प्रति अनाप—शनाप बकता हूं कभी गाली भी देता हूं,

ये क्‍या है?

4—मेरी विचित्र धारणाओं के कारण आप मुझे भगवान जैसे नहीं लगते…. ?

5—मेरी दिनचर्या आनंदचर्या बन गयी है। अब पिधलूं और बहूं—बस यही कह दें। Continue reading

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जिनसूत्र–(भाग–1) प्रवचन–11

अध्‍यात्‍म प्रक्रिया है जागरण की—प्रवचन—ग्‍यारहवां

सूत्र:

अणथोवं वणथोवं, अग्‍गीथोवं कसायथोवं च।

न हु भे वीससियव्‍वं, थोवं पि हु तं बहु होई।। 26।।

कोहो पीइं पणसोइ, माणो विण्‍यनासणो।

माया मित्‍ताणि नासेइ, लोहो सव्वविणासणो।। 27।।

उवसमेण हणे कोहं, माणं मद्दवया जिणे।

मायं चउज्‍जवभावेण, लोभं संतोसओ जिणे।। 28।।

जहा कुम्‍मे सअंगाई, सए देहे समाहरे।

एवं पावाइं मेहावी, अज्‍झप्‍पेण समाहरे।। 29।। Continue reading

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जिनसूत्र–(भाग–1) प्रवचन–10

जिंदगी नाम है रवानी का—प्रवचन—दसवां

प्रश्‍नसार:

1—लोग आपको धर्म—भ्रष्‍ट करनेवाला कहते है, विरोध करते है।

उनके साथ कैसे जीया जाए?

2—जो कुछ मुझे मिला है, वह कम नहीं—

फिर भी आखिर क्‍या पाकर मुझे संतोष होगा?

3—कागा सब तन खाइयो, चुन—चुन खाइयो मांस।

दो नैना नहिं खाईयो, पिया मिलन की आस।।

4—आप न जाने गुरूदेव मेरे, मैं तुम्‍हें पुकारा करती हूं।

एक बार ह्रदय में छेद करो,वह क्षण मैं निहारा करती हूं।। Continue reading

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जिनसूत्र–(भाग–1) प्रवचन–9

अनुकरण नहीं—आत्‍म अनुसंधान—प्रवचन—नौवां

सारसूत्र:

अप्‍पा कत्‍ता विकत्‍ता य, दुहाण य सुहाण य।

अप्‍पा मित्‍तममित्‍तं च, दुप्‍पट्ठिय सुप्‍पट्ठिओ।। 22।।

एगप्‍पा सजिए सत्तू, कसाया इंदियाणि य।

ते जिणित्‍तु जहानायं, विहरामि अहं मुणी।। 23।।

एगओ विरइं कुज्‍जा, एगओ य पवत्‍तणं।

असंजमे जियत्‍तिं च, संजमे य पवत्‍तणं।। 24।।

रोगे दोसे य दो पावे, पावकम्‍म पवत्‍तणे।

ज भिक्‍खू रूंभई निच्‍चं, से न अच्‍छइ मंडले।। 25।। Continue reading

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अष्‍टावक्र: महागीता–(भाग–4) प्रवचन–9

साक्षी, ताओ और तथाता—प्रवचन—नौवां

दिनांक 4 दिसंबर, 1976;

श्री रजनीश आश्रम पूना।

प्रश्‍नसार:

पहला प्रश्न :

अष्टावक्र के साक्षी, लाओत्सु के ताओ और आपकी तथाता में समता क्या है और भेद क्या है?

समता बहुत है, भेद बहुत थोड़ा।

लाओत्सु ने जिसे ताओ कहा है वह ठीक वही है जिसे वेदों में ऋत कहा है—ऋतंभरा, या जिसे बुद्ध ने धम्म, धर्म कहा; जो जीवन को चलाने वाला परम सिद्धात है, जो सब सिद्धातो का सिद्धात है, जो इस विराट विश्व के अंतरतम में छिपा हुआ सूत्र है। जैसे माला के मनके हैं और उनमें धागा पिरोया हुआ है; एक ही धागा सारे मनकों को संभाले हुए है। हजार—हजार नियम हैं जगत में, इन सब नियमों को संभालने वाला एक परम नियम भी होना चाहिए; अन्यथा सब बिखर जायेगा, माला टूट जायेगी। मनके दिखाई पड़ते हैं; भीतर छिपा धागा दिखाई नहीं पड़ता। दिखाई पड़ना भी नहीं चाहिए; नहीं तो माला ठीक से बनायी नहीं गयी। Continue reading

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जिनसूत्र-(भाग–1) प्रवचन–8

सम्‍यक ज्ञान मुक्‍ति है—प्रवचन—आठवां

प्रश्‍नसार:

1—आपने कहा कि सत्‍य संज्ञा नहीं है, क्रिया है।

क्‍या प्रेम, आनंद, ध्‍यान, समाधि भी क्रिया ही है?

क्‍या क्रिया का समझ से कोई संबंध है?

2—तीर्थंकर चौबीस ही क्‍यों, ज्‍यादा क्‍यों नहीं?

3—क्‍या परंपरा की जरूरत नहीं है? क्‍या परंपरा से हानि ही हानि हुई है?

4—किसी सुंदर युवती को देख कर मन उसकी और आकर्षित हो जाता है। क्‍या वासना यह है, या प्रेम, या सुंदरता की स्‍तुति? Continue reading

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जिनसूत्र–(भाग–1) प्रवचन–7

जीवन एक सुअवसर है—प्रवचन—सातवां

सूत्र:

सच्‍चाम्‍म” विसदि तवो, सच्‍चाम्‍मि संजमो तह वसे तेसा वि गुणा।

सच्‍चं णिबंधणं हि य, गुणाणमदधीव मच्‍छाणं।। 17।।

सुबण्‍णरूप्‍पस्‍स उ पव्‍वया भवे, सिया हु केलाससमा असंखया।

नरस्‍स लुद्धस्‍स न तेहि कींचि, इच्‍छा हु आगाससमा अणन्‍तिया।। 18।।

जहा पोम्‍मं जले जायं, नोवलिप्‍पइ वारिणा।

एवं अलितं कामेहिं, तं वयं बूम माहणं।। 19।।

जीवो बंभ जीवम्‍मि, चेव चरिया हविज्‍ज जा जदिणो।

तं जाण बंभचेरं, विमुक्‍क परदेहनित्‍तिस्‍स।। 20।। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–2) प्रवचन–6

वर्ण-व्यवस्था का मनोविज्ञान—(अध्याय ४) प्रवचन—छठवां

किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः।

तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।। 16।।

कर्म क्या है और अकर्म क्या है, ऐसे इस विषय में बुद्धिमान पुरुष भी मोहित हैं, इसलिए मैं वह कर्म अर्थात कर्मों का तत्व तेरे लिए अच्छी प्रकार कहूंगा, जिसको जानकर तू अशुभ अर्थात संसार-बंधन से छूट जाएगा।

कर्म क्या है और अकर्म क्या है, बुद्धिमान व्यक्ति भी निर्णय नहीं कर पाते हैं। कृष्ण कहते हैं, वह गूढ़ तत्व मैं तुझसे कहूंगा, जिसे जानकर व्यक्ति मुक्त हो जाता है।

अजीब-सी लगेगी यह बात; क्योंकि कर्म क्या है और अकर्म क्या है, यह तो मूढ़जन भी जानते हैं। कृष्ण कहते हैं, कर्म क्या है और अकर्म क्या है, यह बुद्धिमानजन भी नहीं जानते हैं।

हम सभी को यह खयाल है कि हम जानते हैं, क्या है कर्म और क्या कर्म नहीं है। कर्म और अकर्म को हम सभी जानते हुए मालूम पड़ते हैं। लेकिन कृष्ण कहते हैं कि बुद्धिमानजन भी तय नहीं कर पाते हैं कि क्या कर्म है और क्या अकर्म है। गूढ़ है यह तत्व। तो फिर पुनर्विचार करना जरूरी है। हम जिसे कर्म समझते हैं, वह कर्म नहीं होगा; हम जिसे अकर्म समझते हैं, वह अकर्म नहीं होगा। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–2) प्रवचन–5

जीवन एक लीला— (अध्याय 4)—प्रवचन—पांचवां

प्रश्न:

भगवान श्री, कल के तेरहवें श्लोक की व्याख्या में आपने चार वर्णों की बात कही। कृष्ण इस श्लोक के दूसरे हिस्से में कहते हैं कि इन चारों वर्णों की गुण और कर्मों के अनुसार रचना करते हुए भी मैं अकर्ता ही रहता हूं।

कृपया इसे स्पष्ट करें कि वे कैसे अकर्ता रहे?

करते हुए भी मैं अकर्ता हूं, कृष्ण का ऐसा वचन गहरे में समझने योग्य है। पहली बात, कर्म से कर्ता का भाव पैदा नहीं होता। कर्म अपने आप में कर्ता का भाव पैदा करने वाला नहीं है। कर्ता का भाव भीतर मौजूद हो, तो कर्ता का भाव कर्म के ऊपर सवार हो जाता है। भीतर अहंकार हो, तो कर्म पर सवारी कर लेता है। ऐसे, कर्म अपने आप में, कर्ता के भाव का जन्मदाता नहीं है।

तो कृष्ण की बात तो छोड़ें एक क्षण को, हम भी चाहें, तो कर्म करते हुए अकर्ता हो सकते हैं। कर्म ही कर्ता का निर्माता नहीं है; कर्ता का निर्माता अहंकार का भाव है। और अहंकार का भाव इतना अदभुत है कि आप कुछ न करें, तो भी कुछ न करने का कर्ता भी बन जाता है। Continue reading

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एस धम्‍मो सनंतनो–(भाग–11) प्रवचन–112

मंजिल है स्वयं में—प्रवचन—112

प्रश्‍न सार:

पहला प्रश्‍न:

भगवान बुद्ध कहते हैं कि संतों का धर्म कभी जराजीर्ण नहीं होता है; फिर कृष्ण, महावीर, स्वयं बुद्ध और जीसस के धर्म इतने जराजीर्ण कैसे हो चले? इस प्रसंग पर कुछ प्रकाश डालने की अनकंपा करें।

संतो का धर्म निश्चित ही कभी जराजीर्ण नहीं होता है। और जो जराजीर्ण हो जाता है, वह संतों का धर्म नहीं है।

ईसाइयत का कोई संबंध ईसा से नहीं है। और बौद्धों का कोई संबंध बुद्ध से नहीं है। जैनों को महावीर से क्या लेना—देना है?

जो महावीर ने कहा था, वह तो अब भी उतना ही उज्ज्वल है। लेकिन जो सुनने वालों ने सुना था, वह जराजीर्ण हो गया।

जो कहा जाता है, वही थोड़े ही सुना जाता है। जब बुद्ध बोलते हैं, तो बुद्ध तो अपनी ही भावदशा से बोलते हैं। तुम जब सुनते हो, अपनी भावदशा से सुनते हो। इन दोनों के बीच में बड़ा अंतर है। बुद्ध पर्वत के शिखर पर खड़े हैं; तुम अपनी अंधेरी खाइयों में पड़े हो। बुद्ध प्रकाश के उच्चल शिखरों से बोल रहे हैं; तुम अपने गहन अंधेरे में सुन रहे हो। Continue reading

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जिनसूत्र–(भाग–1) प्रवचन–6

तुम मिटो तो मिलन हो—प्रवचन—छठवां

प्रश्‍नसार:

1—श्‍याम—श्‍याम रटते जीवन की सांझ हो गयी है, अभी तक मेरा श्‍याम नहीं आया। मुझे उसके दर्शन कराना है।

2—नककटे साधु की कहानी…….क्‍या आपके संन्‍यासियों की यही स्‍थिति नहीं है?

3—भीतर विचारों की भीड़ है और अहंकार से विक्षुब्‍ध हूं….. ?

4—बेमुरोबत बेवफा बेगाना—ए—दिल आप है।…….?

5—बहुत शुक्रिया बहुत मेहेरबानी।

मेरी जिंदगी में हुजूर आप आए।।….. Continue reading

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