मेरा स्‍वर्णिम भारत–(विविध उपनिषाद)

मेरा स्वर्णिम भारत

(ओशो)

(उपनिषाद—सूत्रों, संस्‍कृत सुभाषितों एवं वेद व ऋषि—वाक्‍यों पर ओशो से प्रश्‍नोत्‍तर—प्रवचनांश)

भारत केवल एक भूगोल या इतिहास का अंग ही नहीं है। यह सिर्फ एक देश, एक राष्‍ट्र, एक जमीन का टुकडा मात्र नहीं है। यह कुछ और भी है—एक प्रतीक,एक काव्‍य, कुछ अदृश्‍य सा—किंतु फिर भी जिसे छुआ जा सके। कुछ विशेष ऊर्जा—तरंगों से स्‍पंदित है यह जगह, जिसका दावा कोई और देश नहीं कर सकता।

……सदियों से, सारी दुनिया से साधक इस धरती पर आते रहे है। यह देश दरिद्र है, उसके पास भेज देनें को कुछ भी नहीं है, पर जो संवेदनशील है उनके लिए इससे अधिक समृद्ध कौम इस पृथ्‍वी पर कहीं और नहीं है। यह समृद्धि आंतरिक है।

रजनीश उपनिषाद से Continue reading

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तंत्र–सूत्र–(भाग–2) प्रवचन–23

शांति और मुक्‍ति के चार प्रयोग—(प्रवचन—तैइसवां)

सूत्र:

33—बादलों के पार नीलाकाश को देखने मात्र से शांति

को, सौम्‍यता को उपलब्‍ध होओ।

34—जब परम रहस्‍यमय उपदेश दिया जा रहा हो,

उसे श्रवण करो। अविचल, अपलक आंखों से;

अविलंब परम मुक्‍ति को उपलब्‍ध होओ।

35—किसी गहरे कुएं के किनारे खड़े होकर उसकी

उसकी गहराईयों में निरंतर देखते रहो—जब तक

विस्‍मय—विमुग्‍ध न हो जाओ।

36—किसी विषय को देखो, फिर धीरे—धीरे उससे

अपनी दृष्‍टि हटा लो, और फिर धीरे—धीरे

उससे अपने विचार अलग कर लो। तब! Continue reading

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साधना–सूत्र–(प्रवचन–2)

जीवन की तृष्‍णा—(प्रवचन—दूसरा)

सूत्र:

2—जीवन की तृष्‍णा को दूर करो।

 3—सुख—प्राप्ति की इच्छा को दूर करो।

किंतु जो महत्वाकांक्षी हैं,

उन्हीं के समान परिश्रम करो।

जिन्हें जीवन की तृष्णा है,

उन्हीं के समान प्राणिमात्र के जीवन का सम्मान करो।

जो सुख के लिए ही जीवन—यापन करते हैं,

उन्‍हीं के सामने सुखी रहो।

ह्रदय के भीतर पाप के अंकुर को

ढूंढ़कर उसे बाहर निकाल फेंको।

यह अंकुर श्रद्धालु शिष्‍य के ह्रदय

में भी उसी प्रकार बढ़ता और पनपता है,

जैसे कि वासनायुक्‍त मानव के ह्रदय में।

केवल सूरवीर ही उसे नष्‍ट कर डालने में सफल होते हैं।

दुर्बलों को तो उसके बढ़ने—पनपने,

फूलने—फलने और फिर नष्ट होने की राह देखनी होती है। Continue reading

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तंत्र–सूत्र–(भाग–2) प्रवचन–22

तीसरी आँख और सिद्धियां—(प्रवचन—बाईस्‍वां)

प्रश्‍न सार:

1—देखने की विधियां तीसरी आँख को कैसे

प्रभावित करती है?

      2—सम्‍मोहन विद्याओं में लगे लोगों की आंखें

            डरावनी क्‍यों होती है?

      3—आंखों की गति रोकने से मानसिक तनाव क्‍यों

            होता है?

 पहला प्रश्न :

कृपया तीसरी आंख के साथ दो सामान्य आंखों के संबंध को समझाएं। देखने की विधियां किस भांति तीसरी आँख को प्रभावित करती हैं।

हले तो दो बातें समझ लेने की हैं। एक, तीसरी आंख की ऊर्जा वही है जो ऊर्जा दो सामान्य आंखों को चलाती है। ऊर्जा वही है, सिर्फ वह नई दिशा में नए केंद्र की ओर गति करने लगती है। तीसरी आंख है; लेकिन निष्‍क्रिय है। और जब तक सामान्य आंखें देखना बंद नहीं करतीं, तीसरी आंख सक्रिय नहीं हो सकती, देख नहीं सकती। Continue reading

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साधना–सूत्र–(प्रवचन–1)

महत्‍वाकांक्षा—(प्रवचन—पहला)

सूत्र:

ये नियम शिष्यों के लिए हैं।

इन पर तुम ध्यान दो।

इसके पहले कि तुम्‍हारे नेत्र देख सकें,

उन्हें बहरे हो जाना चाहिए।

और इसके पहले कि तुम सदगुरुओं की उपस्थिति में बोल सकी,

तुम्हारी वाणी को चोट पहुंचाने की वृत्ति से मुक्त हो जाना चाहिए।

इसके पहले कि तुम्हारी आत्मा सदगुरुओं के समक्ष खड़ी हो सके,

उसके पैरों को हृदय के रक्त से धो लेना उचित है।

 

  1. महत्वाकांक्षा को दूर करो।

महत्वाकांक्षा पहला अभिशाप है।

जो कोई अपने सहयोगियों से आगे बढ़ रहा है,

उसे यह मोहित करके अपने पथ से विचलित कर देती है।

सत्कर्मों के फल की इच्छा का यह सबसे सरल रूप है।

बुद्धिमान और शक्तिशाली लोग इसके द्वारा

बराबर अपनी उच्च संभावनाओं से स्‍खलित होते रहते हैं।

फिर भी यह बड़ी आवश्यक शिक्षा का साधन है।

इसके फल चखते समय मुंह में राख और धूल बन जाते हैं।

मृत्यु और वियोग के समान इससे भी अंत में यही शिक्षा मिलती है

कि स्वार्थ के लिए अहं के विस्तार के लिए कार्य करने से

परिणाम में निराशा ही प्राप्त होती है। Continue reading

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का सोवै दिन रैन–(प्रवचन–11)

मूल में ही विश्राम है—(प्रवचन—ग्‍यारहवां)

दिनांक 10 अप्रैल,1978;

श्री रजनीश आश्रम, पूना।

सूत्र:

माया रंग कुसुम्म महा देखन को नीको।   

मीठो दिन दुई चार, अंत लागत है फीको

कोटिन जतन रह्यो नहीं, एक अंग निज मूल।

ज्यों पतंग उड़ि जायगो, ज्यों माया काफूर।।

नाम के रंग मजीठ, लगै छूटै नहिं भाई।

लचपच रह्यो समाय, सार ता में अधिकाई।।

केती बार धुलाइए, दे दे करड़ा धोए।

ज्यों ज्यों भट्ठी पर दिए, त्यों त्यों उज्ज्वल होय।।

सोवत हो केहि नींद, मूढ मूरख अग्यानी।

भोर भए परभात, अबहि तुम करो पयानी।।

अब हम सांची कहत हैं, उडियो पंख पसार।

छुटि जैहो या रुख ते, तन सरवर के पार।।

नाम झांझरी साजि, बाधि बैठो बैपारी।

बोझ लयो पाषान, मोहि हर लागै भारी।।

मांझ धार भव तखत में, आइ परैगी भीर।

एक नाम केवटिया करि ले, सोई लावै तीर।। Continue reading

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का सोवै दिन रैन–(प्रवचन–10)

अथक श्रम चाहिए—(प्रवचन—दसवां)

दिनांक 9 अप्रैल, 1978;

श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍नसार:

1—प्रवचन और दर्शन को छोड्कर आप सदा—सर्वदा अपने एकांत कमरे में रहते हैं। फिर भी आपको इतनी सारी सूचनाएं कहां से मिलती हैं? यू० जी० कृष्णमूर्ति से संबंधित प्रश्रों के उत्तर में आपने उनके बारे में उन सब खबरों की चर्चा की है, जो बहुचर्चित हैं। सी० आई० ए०, के० बी० जी० और सी० बी० आई० जैसी कोई गुह्य संस्था भी आपके पास है क्या?

2—आपने गायत्री मंत्र और नमोकार मंत्र के तोता—रटन की कहानी सुनायी। इस तोता—रटन को आप बंद करवाना चाहते हो। क्या यही गायत्री मंत्र है? क्या यही नमोकार मंत्र है?

3—आपका प्रवचन सुनते—सुनते कभी—कभी आंखें गीली हो जाती हैं और आंसू बह आते हैं। वैसा ही सक्रिय ध्यान में भी कभी—कभी होता है। दोनों स्थितियां आनंदपूर्ण लगती हैं। प्रार्थना और ध्यान, संकल्प और समर्पण दो अलग—अलग मार्ग में से कौन—सा मार्ग चितभंजन करेगा?

4—भगवान श्री, धन्यवाद!

5—जब मैं आपको आंखें बंद करके सुनती हूं, तब बहुत—सी तरंगें शरीर में प्रवेश करती हुई मालूम होती हैं। जब आपको बिना पलक झपके एकटक देखती हूं, तब आपके पास सफेद तेजो—वलय दिखायी पड़ता है।…… मैं आपको कैसे सुनूं?

6—मेरी पत्नी, मां आनंद कुमुद, अपने अंतस् में बारबार आपको देखती है। उसने बाहर जाना छोड़ दिया है और ध्यान करना भी।… क्या आध्यात्मिक दृष्टि से यह सही है?

7—आपकी शिष्या सब करत निछावर! तन, मन, धन प्रभु पर बलिहारी! Continue reading

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तंत्र–सूत्र–(भाग–2) प्रवचन–21

अंतर्यात्रा में आँख के उपयोग—(प्रवचन—इक्‍कीसवां)

     सूत्र:

30—आंखें बंद करके अपने अंतरस्‍थ अस्‍तित्‍व को

विस्‍तार से देखो। इस प्रकार अपने सच्‍चे

स्‍वभाव को देखो।

31—किसी कटोरेकेो उसके पार्श्‍व—भाग या पदार्थ को

देखे बिना देखो। थोड़ी ही क्षणों में बोध को

उपलब्‍ध हो जाओ।

32—किसी सुंदर व्‍यक्‍ति या सामान्‍य विषय को ऐसे

देखो जैसे उसे पहली बार देख रहे हो।

ज रात हम जिन विधियों की चर्चा करेंगे, वे दर्शन की, देखने की साधना से संबंध रखती हैं। इसलिए इन विधियों में प्रवेश के पहले आंख के संबंध में कुछ बातें समझ लेनी जरूरी हैं। क्योंकि ये सातों विधियां आंख पर ही निर्भर हैं। Continue reading

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साधना–सूत्र–(मैबलकॉलिन्‍स)

साधना—सूत्र (मैबल कॉलिन्‍स)

ओशो कि प्रिय सौ पूस्‍तको में से एक पूस्‍तक है मैबल कॉलिन्‍स की ये किताब….अदभुत है…जो खो गई थी..मैबल कॉलिनस का कहना है कि ये पूस्‍तक उसने लिखी नहीं है देखी है…उनका कहना है कि यह किसी संस्‍कृत की विलुप्‍त हो गई पूस्‍तक के ये  शब्‍द है।ये पूस्‍तक विलुप्‍त हो गई थी…खो गई थी…आदमी से इसका संबध टूट गया था। ओर मैबल कॉलिन्‍स ने इस पूस्‍तक को ध्‍यान की किसी गहराई में देखा। उसने उस पूस्‍तक  को वैसा–वैसा उतर दिया है। इस पूस्‍तक का एक–एक सूत्र बहुमूल्‍यवान है।  इस पूस्‍तक के सूत्र हजारों–हजारों सालों की हजारों–हजारों साधकों की साधना का निचोड़ हे।………….एक–एक शब्‍द को बड़े ध्‍यान पूर्वक सुनना।…..’ये नियम शिष्‍यों के लिए है’

ध्‍यान साधना शिविर, माउंट आबू में मैबल कॉलिन्‍स की पुस्‍तक ‘लाइट आन दि पाथ’ पर ओशो द्वारा दिए गए सत्रह अमृत प्रवचनों का अनुपन संकलन) Continue reading

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ज्‍यों कि त्‍यों रख दीन्‍हीं चदरियां–(पंच महाव्रत)–प्रवचन–13

अप्रमाद—(प्रवचन—तेरहवां)

दिनांक 17 नवंबर 1970,

क्रास मैदान, बंबई

 प्रश्नोत्तर :

आचार्य श्री, अचेतन, समष्टि अचेतन और ब्रह्म अचेतन में जागने की साधना से गुजरते समय साधक को क्या-क्या बाधाएं आ सकती हैं तथा उनके निवारण के लिए साधक क्या-क्या सावधानियां रखें? कृपया इस पर प्रकाश डालें।

जैसे कोई आदमी सागर की गहराइयों में उतरना चाहता हो और तट के किनारे बंधी हुई जंजीर को जोर से पकड़े हो और पूछता हो कि सागर की गहराई में मुझे जाना है, सागर की गहराई में जाने में क्या-क्या बाधाएं आ सकती हैं? तो उस आदमी को कहना पड़ेगा कि पहली बाधा तो यही है कि तुम तट पर बंधी हुई जंजीर को पकड़े हुए हो। Continue reading

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का सोवै दिन रैन–(प्रवचन–9)

सत्‍संग की मधुशाला—(प्रवचन—नौवां)

दिनांक 7 अप्रैल, 1978;

श्री रजनीश आश्रम, पूना।

 सूत्र:

कहंवा से जीव आइल, कहंवा समाइल हो।

कहंवा कइल मुकाम, कहां लपटाइल हो।।

निरगुन से जिव आइल, सरगुन समाइल हो।

कायागढ़ कइल मुकाम, माया लपटाइल हो।।

एक बूंद से काया—महल उठावल हो।

बूंद पड़े गलि जाय, पाछे पछतावल हो।।

हंस कहै, भाई सरवर, हम उड़ि जाइब हो।

मोर तोर एतन दिदार, बहुरि नहिं पाइब हो।।

इहवां कोइ नहिं आपन, केहि संग बोलै हो।

बिच तरवर मैदान, अकेला हंस डोलै हो।।

लख चौरासी भरनि, मनुषतन पाइल हो।

मानुष जनम अमोल, अपन सों खोइल हो।।

साहेब कबीर सोहर सुगावल, गाइ सुनावल हो।

सुनहु हो धरमदास, रही चित चेतहु हो।।

सतनामै जपु, जग लड़ने दे।। Continue reading

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ज्‍यों कि त्‍यों रख दीन्‍हीं चदरियां–(पंच महाव्रत)–प्रवचन–12

तंत्र—(प्रवचन—बारहवां)

 दिनांक 16 नवंबर 1970,

क्रास मैदान, बंबई

 प्रश्नोत्तर :

आचार्य श्री, काम-ऊर्जा को ध्यान और समाधि की दिशा में रूपांतरित करने की साधना में तंत्र का क्या योगदान है? कृपया इसकी रूप-रेखा प्रस्तुत करें।

 तंत्र अद्वैत दर्शन है। जीवन को उसकी समग्रता में तंत्र स्वीकार करता है–बुरे को भी, अशुभ को भी, अंधकार को भी। इसलिए नहीं कि अंधकार अंधकार रहे, इसलिए नहीं कि बुरा बुरा रहे, इसलिए नहीं कि अशुभ अशुभ रहे, बल्कि इसलिए कि अशुभ के भीतर भी रूपांतरित होकर शुभ होने की संभावना है। अंधकार भी निखर कर प्रकाश हो सकता है। और जिसे हम पदार्थ कहते हैं, वह भी अपनी परम गहराइयों में परमात्मा के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है।

तंत्र अद्वैत है। उस एक की ही स्वीकृति है। वह जो बुरा है, वह भी उस एक का ही रूप है। वह जो अशुभ है, वह भी उस एक का ही रूप है। तंत्र के मन में निंदा किसी की भी नहीं है। कंडेमनेशन है ही नहीं। Continue reading

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तंत्र–सूत्र–(भाग–2) प्रवचन–20

शरीर और तंत्र, आसक्‍ति और प्रेम—(प्रवचन—बीसवां)

प्रश्‍न—सार:

1—क्‍या प्रेम में सातत्‍य जरूरी है? और प्रेम कब

भक्‍ति बनता है?

2—तंत्र शरीर को इतना महत्‍व क्‍यों देता है?

3—कृपया हमें आसक्‍ति और स्‍वतंत्रता के संबंध में कुछ कहें।

 शरीर और तंत्र पहला प्रश्न :

किसी को दिन के चौबींसों घंटे प्रेम करना बहुत कठिन मालूम होता है। ऐसा क्‍यों होता है? क्या प्रेम में सातत्‍य जरूरी है? और प्रेम कब भक्‍ति बनता है?

 प्रेम कृत्य नहीं है; वह कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे तुम कर सको। अगर तुम इसे कर सकते हो तो यह प्रेम नहीं है। प्रेम किया नहीं जाता है, होता है। वह कृत्य नहीं, होने की अवस्था है। Continue reading

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का सोवै दिन रैन–(प्रवचन–8)

चित की आठ अवस्‍थाएं—(प्रवचन—आठवां)

दिनांक 6 अप्रैल, 1978;

श्री रजनीश आश्रम, पूना।

 प्रश्‍नसार:

1—श्री यू० जी० कृष्णमूर्ति समझाते हैं कि समस्त तीर्थएं——योग, ध्यान, संन्यास, गुरु—शिष्य संबंध और आध्यात्मिक विकास इत्यादि मनुष्य के मन के संगम हैं, मन के खेल मात्र हैं। और इन सब में खूब—खूब भटक कर अंत में आदमी के हाथ में एक पूर्ण असहाय दशा भर आती हौइन श्री थजी० कृष्णमूर्ति के संबंध में अनेकों के मन में तीर्थ के प्रति तीखी अनास्था का जन्म हुआ है। अनेक मित्रों ने मुझसे कहा है कि वे इस स्थिति पर आप से मार्ग—निर्देश चाहते हैं।

 2—संत कबीर का एक पद है——हीरा पायो गांठ गठियायो, बाको बारबार तू क्यों खोले। फिर अन्यत्र उनका दूसरा पद है——दोनों हाथ उलीचिए, यही सयानो काम। भगवान, ये विरोधाभासी लगनेवाले पद क्या तीर्थ और सिद्धि के भिन्न—भिन्न तलों पर लागू होते हैं। Continue reading

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ज्‍यों कि त्‍यों रख दीन्‍हीं चदरियां–(पंच महाव्रत)–प्रवचन–11

अकाम—(प्रवचन—ग्‍यारहवां)

 दिनांक 15 नवंबर 1970,

क्रास मैदान, बंबई

 प्रश्नोत्तर:

आचार्य श्री, मन की किन-किन स्थितियों के कारण यौन-ऊर्जा, सेक्स एनर्जी अधोगमित होती है, और मन की किन-किन स्थितियों के कारण यौन-ऊर्जा ऊर्ध्वगमित होती है? कृपया इस पर कुछ प्रकाश डालें।

जीवन को उसके सभी स्तरों पर दो भांति देखा जा सकता है। दो पहलू हैं जीवन के। एक उसका पौदगलिक, मैटीरियल, पदार्थगत पहलू है, दूसरा उसका आत्मगत, स्प्रिचुअल पहलू है। यौन को भी दो दिशाओं से देखना आवश्यक है। एक तो यौन का जैविक, बायोलाजिकल पहलू है, पौदगलिक, पदार्थगत, शरीर से जुड़ा हुआ, शरीर के अणुओं से जुड़ा हुआ। दूसरा यौन का शक्तिगत, आत्मिक पहलू है, मन से, चेतना से जुड़ा हुआ। Continue reading

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तंत्र–सूत्र (भाग–2)-प्रवचन–19

भक्‍ति मुक्‍त करती है—(प्रवचन—उन्‍नीसवां)

सूत्र:

1—कलपना करो कि तुम धीरे—धीरे शक्‍ति या ज्ञान से

वंचित किए जा रहे हो। वंचित किए जाने के क्षण

अतिक्रमण करो।

2—भक्‍ति मुक्‍त करती है।

तंत्र के लिए मनुष्य स्वयं ही रोग है। ऐसा नहीं है कि तुम्हारे मन में उपद्रव है, वस्तुत: तुम्हारा मन ही उपद्रव है। ऐसा नहीं है कि तुम तनावग्रस्त हो, बल्कि तुम स्वयं ही तनाव हो।

इस फर्क को ठीक से समझ लो। अगर चित्त रुग्ण है तो रुग्णता का इलाज हो सकता है। लेकिन अगर चित्त ही रुग्णता है तो इसका इलाज नहीं हो सकता, इसका अतिक्रमण हो सकता है। यही बुनियादी फर्क है पश्चिम के मनोविज्ञान में और पूरब के मनोविज्ञान में। पूरब का मनोविज्ञान तंत्र और योग पर आधारित है। Continue reading

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ज्‍यों कि त्‍यों रख दीन्‍हीं चदरियां–(पंच महाव्रत)–प्रवचन–10

संन्यास—(प्रवचन—दसवां)

दिनांक 14 नवंबर 1970,

क्रास मैदान, बंबई

 प्रश्नोत्तर :

आचार्य श्री, पंच महाव्रत: अहिंसा, अपरिग्रह, अचौर्य, अकाम और अप्रमाद की साधना फलीभूत हो सके तथा व्यक्ति और समाज का सर्वांगीण विकास हो सके, इसमें आपके द्वारा प्रस्तावित नयी संन्यास-दृष्टि का क्या अनुदान हो सकता है, कृपया इसे सविस्तार स्पष्ट करें।

 अहिंसा, अपरिग्रह, अचौर्य, अकाम और अप्रमाद संन्यास की कला के आधारभूत सूत्र हैं। और संन्यास एक कला है। समस्त जीवन की एक कला है। और केवल वे ही लोग संन्यास को उपलब्ध हो पाते हैं जो जीवन की कला में पारंगत हैं। संन्यास जीवन के पार जाने वाली कला है। जो जीवन को उसकी पूर्णता में अनुभव कर पाते हैं, वे अनायास ही संन्यास में प्रवेश कर जाते हैं। करना ही होगा। वह जीवन का ही अगला कदम है। परमात्मा संसार की सीढ़ी पर ही चढ़कर पहुंचा गया मंदिर है। Continue reading

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का सोवै दिन रैन–(प्रवचन–7)

प्रेम नाव है—(प्रवचन—सातवां)

दिनांक 6 अप्रैल, 1978;

श्री रजनीश आश्रम, पूना।

 सूत्र:

सतगुरु सरन में आइ, तो तामस त्यागिये।

ऊंच नीच कहि जाय, तो उठि नहिं लागिये।।

उठि बोलै रारै रार, सो जानो घींच है।

जेहि घट उपजै क्रोध, अधम अरु नीच है।।

माला वाके हाथ, कतरनी कांख में।

सूझै नाहिं आगि, दबी है राख में।।

अमृत वाके पास, रुचै नहिं रांड को।

स्वान को यही स्वभाव, गहै निज हाड़ को।।

का भे बात बनाए, परचै नहिं पीव सों।

अंतर की बदफैल, होइ का जीव सों।।

कहै कबीर पुकारि सुनो धरम आगरा।

बहुत हंस लै साथ, उतरो भव सागरा।।

सूतल रहलौं मैं सखियां, तो विष कर आगर हो।

सतगुरु दिहलै जगाइ, पायौं सुख सागर हो।।

जब रहली जननी के ओदर, परन सम्हारल हो।

जब लौं तन में प्रान, न तोहि बिसराइब हो।।

एक बुंद से साहेब मदिल बनावल हो।

बिना नेव के मदिल बहु कल लागल हो।।

इहवां गावं न ठांव, नहीं पुर पाटन हो।

नाहिन बाट बटोहि, नहीं हित आपन हो।। Continue reading

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ज्‍यों कि त्‍यों रख दीन्‍हीं चदरियां–(पंच महाव्रत) प्रवचन–9

अचौर्य—(प्रवचन—नौवां)

दिनांक 13 नवंबर 1970,

क्रास मैदान, बंबई

प्रश्नोत्तर :

 आचार्य श्री, अचौर्य पर आपने कहा है कि शरीर, भाव या मन के तल पर किसी दूसरे की नकल या किसी दूसरे का अनुगमन चोरी है। लेकिन जीवन अंतर्संबंधों का एक जाल है; यहां सब जुड़े हुए हैं। तब व्यक्ति अपनी शुद्धतम मौलिकता तथा बाहर से आने वाली सूक्ष्म तरंगों के प्रभाव अथवा आरोपण को किस प्रकार पृथक करे? और वह उससे कैसे बचे?

जीवन अंतर-संबंधों का जाल है, लेकिन जीवन सिर्फ अंतर-संबंध ही नहीं है। अंतर संबंधित होने के लिए भी व्यक्ति चाहिए, अंतर-संबंध भी दो व्यक्तियों के बीच संबंध है; लेकिन दो व्यक्ति भी चाहिए, जिनके बीच संबंध हो सके। तो जीवन, जो हमें बाहर दिखायी पड़ता है वह तो अंतर-संबंध है, लेकिन एक और भी जीवन है भीतर, जो अंतर-संबंधित होता है। वह व्यक्ति अगर न हो, तो अंतर-संबंध सब झूठ हो जाते हैं। जुड़ेगा कौन? Continue reading

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तंत्र–सूत्र-(भाग–2) प्रवचन–18

प्रामाणिक होना अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण है—(प्रवचन—अठ्ठाहरवां)

प्रश्‍न—सार:

1—क्‍या अभिव्‍यक्‍ति की उन्‍मुक्‍तता प्रामाणिक

होने की और एक कदम है?

            2—काम—क्रोध आदि पर ध्‍यान देने से बेचैनी सी

                  क्‍यों होती है?

            3—भाववेग में मूर्च्‍छा पकड़ती है, तो रूकें कैसे?

            4—क्‍या दीक्षा और गुरु—कृपा विधियों से अधिक

                  महत्‍वपूर्ण नहीं है? Continue reading

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ज्‍यों की त्‍यों धरि दीन्‍हीं चदरिया–(पंच महाव्रत) प्रवचन–8

अपरिग्रह—(प्रवचन—आठवां)

 दिनांक 12 नवंबर 1970,

क्रास मैदान, बंबई

प्रश्नोत्तर :

आचार्य श्री, आप बहुत बार कहते हैं कि भौतिक संपन्नता आध्यात्मिक विकास का आधार है; लेकिन अपरिग्रह पर हुए पिछले प्रवचन में आपने कहा कि कम चीजें हों तो व्यक्ति कम गुलाम होता है, और चीजें अधिक हों तो व्यक्ति अधिक गुलाम हो जाता है। कृपया संपन्नता व अपरिग्रह के इस मौलिक विरोधाभास को स्पष्ट करें, और साथ ही समझायें कि अधिक चीजें व्यक्ति को अधिक गुलाम कैसे बनाती हैं? और पजेसर कैसे पजेस्ड हो जाता है?

संपन्नता आध्यात्मिक जीवन का आधार है, लेकिन आधार से ही कोई भवन निर्मित नहीं हो जाता। आधार भी हो, और भवन न उठाया जाये, यह हो सकता है। भवन तो बिना आधार के कभी नहीं होता, लेकिन आधार बिना भवन के हो सकते हैं। कोई नींव को भरकर ही छोड़ दे तो भवन तो नहीं उठेगा, पर आधार जरूर होंगे। लेकिन भवन हो तो बिना आधार के नहीं होता है। Continue reading

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तंत्र–सूत्र–(भाग–2) प्रवचन–17

अचानक रूकने की कुछ विधियां—(प्रवचन—सत्रहवां)

सूत्र:

25—जैसे ही कुछ करने की वृति हो, रूक जाओ।

26—जब कोई कामना उठे, उस पर विमर्श करो।

फिर, अचानक, उसे छोड़ दो।

27—पूरी तरह थकने तक घूमते रहो,

और तब जमींन पर गिरकर,

इस गिरने में पूर्ण होओ।

जीवन के दो तल हैं, दो संतुलन हैं : एक होने का है, दूसरा करने का।

तुम्हारा होना तुम्हारा स्वभाव है। वह तुम हो, सदा हो, उसे पाने के लिए तुम्हें कुछ करना नहीं है। वह तुम हो ही, वही तुम हो। यह बात भी नहीं है कि वह कुछ है जो तुम्हारे पास है, तुम्हारे अधिकार में है। तुममें और उसमें इतनी दूरी भी नहीं है। तुम ही अपना होना हो, अस्तित्व हो। Continue reading

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का सोवै दिन रैन–(प्रवचन–6)

सत्‍संग की कला: संन्‍यास—(प्रवचन—छठवां)

दिनांक 5 अप्रैल, 1978;

श्री रजनीश आश्रम, पूना।

 प्रश्‍नसार:

1—क्या यह सच नहीं है कि ज्ञानोपलब्ध लोगों की अनुपस्थिति में—— और वे दुर्लभ लोग सदा नहीं होते——पंडित और पुरोहित ही धर्म की मशाल जलाए रखते हैं?

2—गुरु की निंदा सुनने का हमेशा निषेध किया गया है। ऐसा भी कहा गया है कि कोई गुरु की निंदा करे तो कान भी धो डालना चाहिए। भगवान, आपका प्रेमी तो कभी ही मिलता है; पर आपके निंदक तो हर जगह मिल जाते हैं। ऐसे मौकों पर हमें क्या करना चाहिए?

3—आपके सत्संग में रहकर बड़े ही आनंद का अनुभव हो रहा है और जीवन एक उत्सव नजर आ रहा है। लेकिन क्या इस क्षणभंगुर जीवन का आनंद भी क्षणभंगुर नहीं है?

4—तन्मयता से किया गया प्रत्येक कार्य साधना है। तो क्या जरूरी है कि परमात्मा की साधना के लिए संन्यास लिया जाए?

5—इस बार सांध्य— दर्शन में लगातार दो दिन प्रभु—पास का सुयोग मिला। पहले दिन कुछ देर आपको देखते रहने के बाद घबड़ाहट होने लगी, धड़कन तेज हो गयी, सिर में चक्कर, नशा जैसा और बेचैनी अनुभव हुई।… यह क्या है? Continue reading

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तंत्र–सूत्र (विज्ञान भैरव तंत्र)–भाग–2

तंत्र—सूत्र—(विज्ञान भैरव तंत्र)

(भाग—2)

 (ओशो द्वारा भगवान शिव के विज्ञान भैरव तंत्र पर दिए गए 80 प्रवचनों में से 17 से 32 प्रवचनों का संकलन।)

(भूमिका) तंत्र: ह्रदय की तीर्थयात्रा—

नुष्य जैसे-जैसे सुसंस्कृत होता चला गया, तंत्र की जीवन शैली से बिछुडता चला गया। उसने संस्कृति की विशाल प्रतिसृष्टि का सृजन तो किया लेकिन तंत्र की ओर मुख मोड़कर। धीरे- धीरे प्रतिष्ठित समाज से उखड़कर तंत्र, मेघदूत के अभिशप्त यक्ष की भांति अज्ञातवास में समय व्यतीत करने लगा। तंत्र और तांत्रिक, दोनों ही शब्द निंदा व्यंजक हो गये।

सुसंस्कृत मनुष्य के शब्दकोश में तंत्र शब्द कितना ही गर्हित क्यों न हो, वह भेष बदलकर, अन्य उपसर्गों का हाथ थामकर मनुष्य के जीवन में चुपचाप जीता चला आया है। हमें ‘तंत्र’ स्वीकार नहीं है लेकिन स्व-तंत्र या पर-तंत्र का हम खूब प्रयोग करते हैं। किसी के ध्यान में नहीं आता कि वही बहिष्कृत तंत्र ‘स्व’ या ‘पर’ की ओट में हमारे बीच पनप रहा है। Continue reading

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ज्‍यों की त्‍यों धरि दीन्‍हीं चदरिया–(पंच महाव्रत) प्रवचन–7

ब्रह्मचर्य—(प्रवचन—सातवां)

 दिनांक 11 नवंबर 1970,

क्रास मैदान, बंबई

प्रश्नोत्तर :

आचार्य श्री, आपने कहा है कि आत्म-अज्ञान ही हिंसा का स्रोत है और कल आपने कहा कि हिंसा-वृत्ति के लिए मनुष्य स्वयं जिम्मेदार है, तो क्या आत्म-अज्ञान के लिए भी मनुष्य स्वयं जिम्मेदार है? क्यों और कैसे, इसे स्पष्ट करें।

 अंधेरी रात हो अमावस की, और कोई अपनी गुहा में बैठा हो अंधकार में डूबा हुआ, तो आंखें बंद रखे या आंखें खुली रखे, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। आंखें बंद हों, तो भी अंधकार होगा; और आंखें खुली हों, तो भी अंधकार होगा। लेकिन फिर सुबह हो जाये, सूर्य निकल आये, सूर्य की किरणों का जाल उस गुहा के द्वार पर फैल जाये, पक्षी गीत गाने लगें; और फिर भी वह आदमी अपनी आंखें बंद किए बैठा रहे, तो फर्क पड़ता है। Continue reading

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