माई डायमंड डे विद ओशो—मां प्रेम शुन्‍यों (अध्‍याय—16)

रिश्‍ते—(अध्‍याय—16)

मां प्रेम शुन्‍यों (माई डायमंड डे विद ओशो

माई डायमंड डे विद ओशो–मां प्रेम शून्‍यों

ओशो के भारत चले जाने के बाद मैंने लंदन में एक माह प्रतीक्षा की। फिर मुझे लगा कि भारत में प्रवेश करने का प्रयत्‍न सुरक्षित होगा। विवेक दो महीने पहले ही चली गई थी। उसने मुझे बताया कि जब मेरे भार आने की तिथि आई तो उसने ओशो से कहा कि मेरे बारे में कोई समाचार नहीं मिला और वह चिंतित थी कि मैं पहुंची हूं या नहीं। ओशो बस मुस्‍कुरा दिए। मैं पहले ही पहुंच चुकी थी।

ओशो सूरज प्रकाश के घर में ठहरे हुए थे। कई वर्ष पुराने संन्‍यासी है। वे रजनीशपुरम भी आए थे। ओशो के भारतीय संन्‍यासी, जो रजनीशपुरम में उनके साथ रह चुके है। कुछ इस तरह परिपक्‍व हो गए है कि वे भारतीयों से सर्वथा भिन्‍न लगते है। वे पूर्व और पश्‍चिम का एक आदर्श मेल है—नया मनुष्‍य जिसकी ओशो ने चर्चा कि है।

ओशो सायं लगभग सौ संन्यासियों के समूह को प्रवचन देते थे। लेकिन यह समूह बढ़ने लगा जैसे-जैसे पश्‍चिम से सन्‍यासी आने लगे। उनमें से बहुत से ऐसे थे जिन्‍होंने ओशो के अमरीका से चले जाने के बाद उन्‍हें नहीं देखा था। प्रवचनों को शीर्षक गया ‘बियॉंड इनलाइटमेंट’ (बुद्धत्‍व के पार) क्‍योंकि मुझे अभी तक भी समझ नहीं आया था कि बुद्धत्‍व क्‍या है। उसके पास की मुझे कल्‍पना भी नहीं थी। ये मेरे लिए एक ऐसा आयाम था जो मेरे मन को झकझोर रहा था उसको विक्षिप्‍त कर रहा था। मैं अपनी यात्रा के प्रारम्‍भ में ही थी। फिर ऐसा मुझे लगता था। इस समय मिलोरेपा के साथ मेरा प्रेम-सम्‍बंध मेरे मन परा हावी था। अत: बुद्धत्‍व के मार्ग से हटकर मैं ‘सम्‍बन्‍धों की घाटी में देर रही थी’ इस सब में मैं समझने की कोशिश कर रही थी कि ओशो ने मेरी कैसे सहायता की। इसमें ऐसा क्‍या है जो एक स्‍त्री और पुरूष को पागल कर रहा है इतना चलने के बाद भी ये आकर्षण मुझ पर हावी हो रहा था। मुझे क्‍यों अपने पागल पन में झकझोर जा रहा था। Continue reading

Posted in माई डायमंड डे विद ओशो--मां प्रेम शुन्‍यो | Tagged , | Leave a comment

माई डायमंड डे विद ओशो—मां प्रेम शुन्‍यों (अध्‍याय—15)

तुम मुझे छुपा नहीं सकते—(अध्‍याय-15)

मां प्रेम शुन्‍यों (माई डायमंड डे विद ओशो

माई डायमंड डे विद ओशो–मां प्रेम शून्‍यों

ओशो को संसार से छिपाए रखना उचित नहीं लग रहा था। एक हीरे के इन्द्रधनुष रंग प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति पर प्रतिबिम्‍बित होने चाहिए ताकि वह चकाचौंध हो जाए। इसी कारण उन्‍होंने भारत छोड़ा था। हम ओशो के लिए विश्‍व में एक ऐसा स्‍थान ढूंढ़ रहे थे जहां वे अपने लोगों से जो कहना चाहते है कह सकें। उन्‍हें कुछ ज्‍यादा नहीं चाहिए था—बस इतना ही कि वे अपने अनुभव को दूसरों के साथ बांट सकें।

मैंने ये सप्‍ताह बिस्‍तर में ही बिताए, क्‍योंकि मेरे पैरों में एक विचित्र-सी सूजन आ गई थी। उसका कारण कभी ढूंढा न जा सका। परंतु एक विषैले मकड़े के काटने से लेकिन हड्डियों के किसी रोग तक कुछ भी हो सकता था। मैं सारा दिन अपने बिस्‍तर में पड़ी खिड़की के बाहर सोने की भांति चमकते पुष्‍पित अखरोट के वृक्ष देखती रहती। और चीड़ के शंकुओं को निरंतर तड़-तड़ की ध्‍वनियों सुनती रहती। जो सूर्य की गर्मी से फट जाते और अपने बीजों को धरती पर बिखेरते रहते। Continue reading

Posted in माई डायमंड डे विद ओशो--मां प्रेम शुन्‍यो | Tagged , | 2s टिप्पणियाँ

माई डायमंड डे विद ओशो—मां प्रेम शुन्‍यों (अध्‍याय—14)

उरूग्‍वे—(अध्‍याय—14)

मां प्रेम शुन्‍यों (माई डायमंड डे विद ओशो

माई डायमंड डे विद ओशो–मां प्रेम शून्‍यों

चार अंगरक्षकों सहित मैं लंदन एयरपोर्ट से उरूग्‍वे रवाना हुई। हास्‍या तथा जयेश ने सुरक्षा कर्मियों का प्रबंध किया। जो प्रति-विद्रोह प्रति आतंकवाद के कार्य में निपुण थे तथा सूचना पहुंचाने, विध्‍वंस तथा गोलाबारी में प्रशिक्षित थे। प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति अपने-अपने विशेष कार्य में प्रवीण था। उरूग्‍वे में वे ओशो की सुरक्षा के लिए तैयार किए गए थे क्‍योंकि हमें मालूम नहीं था कि वहां कैसा रहेगा। वे मेरे आस-पास सिपाहियों की भांति खड़े थे और उनकी सूरतें धमकाने वाली रही थी। और मुझे लगा कि मेरी अच्‍छी देख भाल हो रही है।

ओशो मोर्ट विडियो के एक होटल में रुके हुए थे। जब में वहां पहुंची और उसी दिन मैं उनका कमरा सुव्‍यवस्‍थित करने गई। वे खिड़की के पास पड़ी एक कुर्सी पर बैठे थे और थके हुए लग रहे थे। देवराज ने मुझे बताया कि ओशो आयरलैंड में बहुत दुर्बल हो गए थे तथा अपने कमरे के बाहर के बरामदे तक का फासला भी तय नहीं कर सकते थे। मैंने उनके पैर छुए तथा मुस्कराती हुई वहां बैठ गई। मैंने उनसे पूछा कि वे कैसे है। उन्‍होंने हां में सिर हिला दिया। वे जानना चाहते थे कि मैं दुर्घटना से पूरी तरह ठीक हुई या नहीं। मैंने उन्‍हें बताया कि यद्यपि मोटर साईकिल पर जाना एक मूर्खता थी परंतु यह अनुभव बहुत मूल्‍यवान था। उन्‍होंने कुछ नहीं कहा, मेंने उन्‍हें पानी का गिलास दिया और उनका कमरा सुव्‍यवस्‍थित करने लगी। वे चुप चाप बैठे रहे। Continue reading

Posted in माई डायमंड डे विद ओशो--मां प्रेम शुन्‍यो | Tagged , | 1 टिप्पणी

सेवन पोर्टलस आफ़ समाधि: (ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

मैडम ब्‍लावट्स्‍की—

(हवा का एक झोंका है ब्‍लावट्स्‍की। और कोई उससे बहुत महानतर शक्‍ति उस पर आविष्‍ट हो गई है: और वह हवा का झोंका उस सुगंध को ले आया है।)

मैडम ब्‍लावट्स्‍की—समाधि  के सप्‍त  द्वारा

ओशो की प्रिय पुस्‍तकें…समाधि के सप्‍त द्वारा

इस जगत में जो भी जाना लिया जाता है। वह कभी खोता नहीं है। ज्ञान के खोने का कोई उपाय नहीं है। न केवल शास्‍त्रों में संरक्षित हो जाता है ज्ञान, वरन और भी गुह्म तलों पर ज्ञान की सुरक्षा और संहिता निमित होती है। शास्‍त्र तो खो सकते है। और अगर सत्‍य शास्‍त्रों में ही हो तो शाश्‍वत नहीं हो सकता। शास्‍त्र तो स्‍वयं भी क्षणभंगुर है। इसलिए शास्‍त्र संहिताएं नही है। इस बात को ठीक से समझ लेना जरूरी है। तभी ब्‍लावट्स्‍की की यह सूत्र पुस्‍तिका समझ में आ सकती है।

ऐसा बहुत पुराने समय में भारत ने भी माना था। हमने भी माना था कि वेद संहिताओं का नाम नहीं है। शास्‍त्रों का नाम नहीं है। वरन वेद उस ज्ञान का नाम है, जो अंतरिक्ष में , आकाश में संरक्षित हो जाता है। जो इस अस्‍तित्‍व के गहरे अंतस्‍तल में ही छिप जाता है। और होना भी ऐसा ही चाहिए। बुद्ध अगर बोले और वह केवल किताबों में लिखा जाए तो कितने दिन टिकेगा। और बुद्ध का बोला हुआ अगर अस्‍तित्‍व के प्राणों में ही न समा जाए तो अस्‍तित्‍व ने उसको स्‍वीकार ही नहीं किया। Continue reading

Posted in ओशो की प्रिय पूस्‍तके-- | Tagged , | Leave a comment

माई डायमंड डे विद ओशो—मां प्रेम शुन्‍यों (अध्‍याय—13)

मौन प्रतीक्षा—(अध्‍याय—13)

मां प्रेम शुन्‍यों (माई डायमंड डे विद ओशो

माई डायमंड डे विद ओशो–मां प्रेम शून्‍यों

6मार्च 1986, रात्रि 1.20बजे।

ओशो के साथ एक छोटे जैट विमान में विवेक देवराज,आनंदों, मुक्‍ति और जॉन सवार हुए। एथेंस से विमान ने एक अज्ञात लक्ष्‍य की और उड़ान भरी—जिसका पता पायलेटों को भी नहीं था। आकाश में उन्‍होंने जान से पूछा, ‘किधर।’ जॉन भी यह नहीं जानता था।

हास्‍या व जयेश ओशो के बीसा के लिए स्‍पेन में व्यस्त थे तथा जॉन के साथ उनका सम्‍पर्क टेलीफ़ोन द्वारा बना हुआ था। हास्‍या ने कहा अभी स्‍पेन तैयार नहीं हुआ और स्‍पेन कभी तैयार भी नहीं हुआ था। उन्‍हें तो न कहने के लिए भी दो महीने लग गये।

विमान ने एक ऊंची उड़ान ली तथा यह तीव्र गति से उड़ रहा था—दिशाहीन।

क्रेट के बंगले में मैं शांत खड़ी थी। सामान के तीस नगों के साथ चलने की तैयारी कर रही थी।

मैंने बंगले के चारों और नज़र दौड़ाई—टूटी हुई खिड़कियाँ, क़ब्ज़ों के साथ झूलते दरवाजे तथा पुलिस द्वारा बनाई इनकी दुर्गति—अन्‍याय व बर्बरता के प्रतीक।

कवीशा व डेविड, आविर्भावा तथा सर्वेश को इतना आघात लगा कि वे आगे यात्रा पर निकलने में कठिनाई महसूस कर रहे थे। इसके साथ वे कुछ थक भी गये थे। वे यूनान में नहीं रूकना चाहते थे। मा अमृतो, उसका पाँच वर्ष का बेटा सिंधु,मनीषा, केंद्रा तथा मुझे एक ग्रुप में निकलना था तथा लंदन पहुंचकर अगले समाचार की प्रतीक्षा करनी थी। Continue reading

Posted in पोनी--एक आत्‍म कथा, माई डायमंड डे विद ओशो--मां प्रेम शुन्‍यो | Tagged , | 2s टिप्पणियाँ

माई डायमंड डे विद ओशो—मां प्रेम शुन्‍यों (अध्‍याय—12)

क्रीट—(अध्‍याय—12)

मां प्रेम शुन्‍यों (माई डायमंड डे विद ओशो

माई डायमंड डे विद ओशो–मां प्रेम शून्‍यों

यह फरवरी का मध्‍य था और ‘’एजियन’’ समुंद का पानी ठंडा था, लेकिन चट्टानों के बीच बन गए गहरे और स्‍वच्‍छ ताल में, जहां समुंद चट्टानों के ऊपर से धीमे-धीमे बहकर आ रहा था, मुझे उसमे नग्‍न तैरना बहुत ही अच्‍छा लगता था। सूर्य चमक रहा था, और मैंने चट्टान में बने घर और उस तक जाती चट्टान में से कांट कर बनाई गई घुमावदार सीढ़ियों की और देखा। मकान के सबसे ऊपरवाले कमरों में ओशो रहते थे। और उनकी बैठक की गोलाकार खिड़की से समुद्र व खड़ी चट्टानें दिखाई देती थी। उनका शयनकक्ष मकान के पिछवाड़े में बना हुआ था। इसलिए वहां अँधेरा रहता था। और वह गुफा जैसा लगाता था। यह वह समय होता जब वे दोपहर को झपकी ले रहे होते। इन दोनों के मध्‍य में था स्‍नान गृह जिसका आधुनिकरण करने के लिए मां अमृतो ने बहुत कुछ करवाया था। मां अमृतो ने इस घर को अपने फिल्‍म निर्देशक मित्र निकोस कॉन्‍डोरोस सक एक महीने के लिए किराये पर लिया था।

जिस कमरे में मुझे रहना था और ओशो के कपड़े धोने का काम करना था, वह चट्टान की आधी चढ़ाई पर स्‍थित था। उसके बाहर एक मेहराबनुमा सफ़ेद छज्‍जा था। मेरे कमरे के ऊपर ते हॉलीवुड से आये हमारे मित्र कवीशा और डेविड जो पहले से ही एक दूसरे के प्रेमी थे। जॉन और उसकी मित्र केन्‍द्रा,सुनहरे बालों वाली एक अत्‍यंत सुंदर महिला थी। जो बचपन से ही ओशो की संन्‍यासिन थी। और आविर्भावा। आविर्भावा टैनिस की एक करोड़पति महिला है। जब उसने अपने चिंता व्‍यक्‍त की कि पुरूष उसे केवल उसके धन के लिए प्रेम करते है तो ओशो ने उससे कहा था कि उसका धन भी उसका ह एक हिस्‍सा है। उनहोंने उससे कहा कि वह एक सुंदर स्‍त्री ही नहीं बल्‍कि एक सुंदर धनी स्‍त्री है। उनहोंने कहा, ‘क्‍या तुम सोचती हो कि मैं चिंतित हूं कि तुम मुझे केवल मेरे बुद्धत्‍व के कारण प्रेम करती हो?’ Continue reading

Posted in माई डायमंड डे विद ओशो--मां प्रेम शुन्‍यो | Tagged , | Leave a comment

माई डायमंड डे विद ओशो—मां प्रेम शुन्‍यों (अध्‍याय—11)

नेपाल—(अध्‍याय—11)

मां प्रेम शुन्‍यों (माई डायमंड डे विद ओशो

माई डायमंड डे विद ओशो–मां प्रेम शून्‍यों

विमान के धरती को छूने से पहले ही में नेपाल के जादू को महसूस कर रही थी। मैं धीरे से फुसफुसाई, ‘मैं घर लौट रही हूं।’ एयरपोर्ट अधिकारी भद्र व्‍यक्‍ति थे। उनके चेहरे पर मुस्कराहट थी तथा सड़को पर आ जा रहे लोगों के चेहरे इतने सुंदर थे जो मैंने पूरे विश्‍व में कही नहीं देखे थे1 यद्यपि नेपाल भार से अधिक निर्धन है परंतु वहां के लोगों में एक गरिमा है। जो इस तथ्‍य का खंडन करती है।

पोखरा को जानेवाली घुमावदार सड़क पर हरे-भरे जंगल में से गुजरती थी। जब मैं लधु शंका के लिए बाहर निकली तो एक बनी की और सम्‍मोहित हो कर बढ़ती चली गई जहां एक जल प्रपात चट्टानों से घिरे एक ताल में गिर रहा था। आर्किड बड़े-बड़े मकड़ों की भांति पेड़ों से लिपटे हुए थे। एक छोटा सा नाला एक मोड़ लेकिर दृष्‍टि से ओझल एक रहस्मयी घाटी कीओर जा रहा था। ‘चेतना–चेतना।’ मेरा नाम पुकारा जा रहा था। अपना नाम की पुकार सुन कर मेरा जादू टूटा। जि गाड़ी में हम थे उसे दो संन्‍यासी जो हमें एअरपोर्ट पर मिले थे—उन पहाड़ों की चढ़ाई उतराई से होते हुए चले आ रहे थे। जहां से घान के परतदार खेत थे। बाँसों के झुरमुट और तीव्र गति से बहती नदियों वाली तंग घाटियाँ दिखाई दे रही थी। Continue reading

Posted in माई डायमंड डे विद ओशो--मां प्रेम शुन्‍यो | Tagged , | Leave a comment

माई डायमंड डे विद ओशो—मां प्रेम शुन्‍यों (अध्‍याय—10)

कूल्लू मनाली—(अध्‍याय–10)

मां प्रेम शुन्‍यों (माई डायमंड डे विद ओशो

माई डायमंड डे विद ओशो–मां प्रेम शून्‍यों

हवाई जहाज़ ने दिल्‍ली से प्रात: दस बजे कूल्‍लू मनाली के लिए उड़ान भरी। वह सुबह पहल ही बहुत व्‍यस्‍त रही थी क्‍योंकि सात बजे हयात रिजेंसी होटल में एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस बुलाई थी। जिसमें ओशो ने अमरीका के प्रति अपने विचारों को निर्भीकता पूर्वक व्‍यक्‍त किया था।

इससे पहले कि दिल्‍ली की सड़कों पर हमारी लारी की रोंगटे खड़ी कर देनेवाली अराजक दौड़ शुरू होती, मैंने कुछ घंटों की नींद चुरा ली थी। लारी में वे संदूक थे जिनका वर्णन करते हुए भारतीय समाचार पत्रों ने उन्हें रजत और रत्‍न-जड़ित कहा था। ये वही संदूक थे जिन्‍हें मैंने रेडनेक्स प्रदेश के एक हाई वेयर स्‍टोर से खरीदा था और दो रातों पहले ही पैक किया था।

ओशो की माता जी अपने परिवार के कुछ सदस्‍यों के साथ वहां हमारे पास पहुंच गई और पीछे-पीछे हरिदास भी आ गया जो रजनीशपुरम में हमारे साथ रहता था। आशु ओशो की दंत दर्श जिसके बालों का रंग लाल था। त्‍वचा चीनी मिट्टी जैसी थी और हंसी शरारत-भरी थी। मुक्‍ता और हरिदास के साथ वहां पहूंच गई। Continue reading

Posted in माई डायमंड डे विद ओशो--मां प्रेम शुन्‍यो | Tagged , | 2s टिप्पणियाँ

माई डायमंड डे विद ओशो—मां प्रेम शुन्‍यों (अध्‍याय—09)

सूली देने का अमेरिकी ढंग—(अध्‍याय—09)

मां प्रेम शुन्‍यों (माई डायमंड डे विद ओशो

माई डायमंड डे विद ओशो–मां प्रेम शून्‍यों

जब हम मध्‍य नवम्‍बर की एक शाम को बारिश से भीगी पोटलैंड़ की सड़कों पर ड्राइव कर रहे थे। प्रिसीडेंट के मोटर काफ़िले जितने एक दस्‍ते ने रोल्‍स रायस को घेर लिया। कम से कम पचास पुलिसवाले होंगे जो चमकते काले कपड़ों में दैत्‍यों जैसे लग रहे थे। उनके चेहरे ऐनक तथा हैल्मेट से ढँके हुए थे तथा वे शक्‍तिशाली हारले डेविडसन मोटर साइकिलों पर सवार थे। सभी सड़कों के प्रत्‍येक जंकशन पर घेरा डाल लिया गया था। मोटरसाइकल सवारों ने बड़ी नाटकीय ढंग अपनाया ऐसे कि अगले दो कार के दानों और खड़े दो लोगों का स्‍थान आसानी से ले सकते थे। वे ट्रैफिक के बीच में तथा उसके आस-पास कला बाजों के समान ड्राइव कर रहे थे।

इन भोंपुओं के तुरही नाद तथा दैत्या कार अंगरक्षकों के बीच ओशो कार से बाहर आए, सदा की भांति ‘बाहर’ जो भी घटित हो रहा है उससे अनछुए सादे वस्‍त्र पहने छह या आठ पुलिसकर्मियों के साथ न्‍यायालय के भीतर चुपचाप शांति से सरक गए प्रवेश कर गए। मैं कार की दूसरी और से उस भीड़ में उतर गई। धक्‍का-मुक्‍का करते लोगों का झुंड पत्रकार, टेलीविजन दल के लोग। मुझे‍ उसी दरवाजे से जाने की अनुमति न मिली जिससे ओशो गए थे तथा कूद पल मैंने उन्‍हें काले व सुरमई स्‍लेटी रंग के सूट वस्‍त्रों के उस समुद्र में विलीन होते देखा था। जिससे न्‍यायालय का पूरा बरामदा भरा हुआ था। मैं भीड़ को धकेलती हुए ऊपर प्रवेश करने में सफल हो गई तथा बहुत कठिनाई का सामना करने के पश्‍चात अंत में मैं न्‍यायलय के कमरे में ओशो के साथ बैठी थी। Continue reading

Posted in माई डायमंड डे विद ओशो--मां प्रेम शुन्‍यो | Tagged , | Leave a comment

माई डायमंड डे विद ओशो—मां प्रेम शुन्‍यों (अध्‍याय—08)

अमरीका—क़ैद—(अध्‍याय—08)

मां प्रेम शुन्‍यों (माई डायमंड डे विद ओशो

माई डायमंड डे विद ओशो–मां प्रेम शून्‍यों

अक्‍टूबर 28, 1985।

अलियर जैट शारटल उतरी कैरोलिया के हवाई-अड्डे पर उतरने वाला था और मैंने बाहर अंधेरे में देखा, हवाई अड्डा सूनसान पडा था। कुछ लम्‍बी, पतली झाड़ियां जैट द्वारा उड़ाई गई हवा में झूल रही थी। जैसे ही जैट ने ज़मीन को छुआ और इंजन बंद हुआ। निरूपा ने हान्‍या को देखा। हास्‍या,जिसके हाथ हम शारलट में रहनेवाले थे निरूपा की अत्‍यंत युवा सास थी। वह तारकोल की विमान पट्टी पर अपने मित्र प्रसाद के साथ खड़ी थी। निरूपा ने उत्‍साहपूर्वक हान्‍या को पुकारा और ठीक उसी समय कई दिशाओं से आई ‘हैंड्स आप’ की आवाज़ों ने मुझे किसी अन्‍या सच्‍चाई में पहुंचा दिया। एक पल के विचार थम गए। एक भयावह अंतराल और फिर मन ने कहा—‘नहीं, यह सत्‍य नहीं है। कुछ ही क्षणों में लगभग पंद्रह बंदूकधारी व्‍यक्‍तियों ने बंदूकों का निशाना हम पर साधे हुए विमान को चारों और से घेर लिया।’

यह वस्‍तुत: सत्‍य था—अँधेरा कौंधती बत्‍तियां, कर्कश ध्‍वनि करती ब्रेक्स, चीखें,आतंक, भय सब मेरे आस-पास बुना हुआ था। मैं खतरे के प्रति इतनी सजग थी की शांत रहने के अतिरिक्‍त और कुछ न कर सकती थी। ‘छींकना भी मत’ मैंने स्‍वयं से कहा। ये लोग गोली मार देंगे। वे लोग भयभीत दिखाई दे रहे थे। और होते भी क्‍यों न।

इस घटना के तीन वर्ष पश्‍चात जब एक स्‍वतंत्र पत्रकार ने अधिकारियों से साक्षात्‍कार किया तो उसे बताया गया और प्रमाण प्रस्‍तुत किए गए कि उन दो विमानों के यात्रियों को गिरफ्तार करने के आदेश दिए गये थे। और उन्‍हें कहा गया था कि हम लोग क़ानून से भागे हुए अपराधी और सब मशीनगनों से लैस आतंकवादी है।

वे लोग एक विशेष प्रकार की जैकेट और जींस पहने हुए थे। मैंने सोचा कि ऑरेगान के रेडनेक्स और हिलबिलीस है जो ओशो का अपहरण करने आए है। हमें न तो ये बताया गया कि हम हिरासत में थे और न यह कि वे एफ. बी. आई. एजेंट है।

मैं पेशेवर हत्‍यारों की और देख रही थी। वे विकृत और अमानुषिक लग रहे थे। उनकी आंखों में कोई भाव नहीं था। वे उनके चेहरों पर चमकते छिद्र मात्र थे। Continue reading

Posted in माई डायमंड डे विद ओशो--मां प्रेम शुन्‍यो | Tagged , | 2s टिप्पणियाँ

माई डायमंड डे विद ओशो—मां प्रेम शुन्‍यों (अध्‍याय—07–B)

रजनीशपुरम—02/B (अध्‍याय—07)

मां प्रेम शुन्‍यों (माई डायमंड डे विद ओशो

माई डायमंड डे विद ओशो–मां प्रेम शून्‍यों

एक बुद्ध पुरूष कैसे जीता है और किस प्रकार हम पर कार्य करता है….उस दिन की घटना द्वारा बताया जा सकता है। जब मैं उनके साथ कार में जा रही थी।

कार में एक मक्‍खी थी जो हमारे सिरों के ऊपर भिनभिना रही थी। मैं उसे पकड़ने के चक्‍कर में अपनी दोनों बांहें घूमा रही थी। हम एक चौराहे पर जाकर रुके और ट्रैफिक के चलने की प्रतीक्षा करने लगे। मैं खिड़कियों और सीटों पर हाथ मार रही थी। ओशो सामने देखते हुए शांत बैठे थे और मैं मक्‍खी को पकड़ने के लिए पसीना-पसीना हो रही थी। अपना सिर बिना घुमाएं, यहां तक कि बिना आंखें घुमाएं…..उन्‍होंने खिड़की पर लगा स्‍वचलित बटन बड़ी कोमलता से दबाया। उनकी और से खिड़की का शीशा नीचे हुआ और वे चुपचाप प्रतीक्षा करते रहे। जब मक्‍खी उन के पास से उड़ी तो उन्‍होंने धीरे से अपना हाथ हिलाया और मक्‍खी खिड़की से बाहर उड़ गई। फिर उन्‍होंने बटन को छुआ तथा खिड़की बंद हो गई। उन्‍होंने एक बार भी आंखें सड़क से नहीं हटाई। कितना ज़ेन, कितना गरिमापूर्ण।

शीला के साथ भी उनकी यहीं ढंग था। जब तक वह स्‍वयं निर्वासित नहीं हो गई उन्‍होंने गरिमापूर्ण ढंग से प्रतीक्षा की। वे अब भी उसके गुरु थे। उसे प्रेम करते थे और उसके भीतर बैठे बुद्ध में उनका विश्‍वास था।

मुझे मालूम है कि ओशो को शीला पर भरोसा था क्‍योंकि मैं उन्‍हें पिछले पंद्रह वर्षों से देख रही हूं। और वह साक्षात श्रद्धा है; आस्‍था है। जिस ढंग से उन्‍होंने अपना जीवन जीया वह आस्‍था था और जि ढंग से उन्‍होंने शरीर छोड़ा वह भी यही दर्शाता है। उनकी आस्‍था कितनी गहरी थी।

मैंने उनसे पूछा कि एक आस्‍थावान और भोले-भाले सीधे व्‍यक्‍ति में क्‍या अंतर है। तो उन्‍होंने कहा कि सीधा-साधा होने का अर्थ है बुद्धू और आस्‍थावान का अर्थ है बुद्धिमान। Continue reading

Posted in माई डायमंड डे विद ओशो--मां प्रेम शुन्‍यो | Tagged , | 1 टिप्पणी

माई डायमंड डे विद ओशो—मां प्रेम शुन्‍यों (अध्‍याय—07)

रजनीशपुरम—02 (अध्‍याय—07)

मां प्रेम शुन्‍यों (माई डायमंड डे विद ओशो

माई डायमंड डे विद ओशो–मां प्रेम शून्‍यों

जब तक न्‍यायालय हमारे पक्ष में कोई निर्णय न दे व्‍यावसायिक क्षेत्र (कमार्शियल-जोन) में न होने के कारण हम कोई व्‍यवसाय स्‍थापित नहीं कर सकते थे; पर्याप्‍त टेलीफ़ोन भी लगवा सकते थे। निकटतम क़सबा एंटिलोप था जिसके लगभग चालीस निवासी थे। यह क़सबा ऊंचे-ऊंचे पॉपलर (पहाड़ी पीपल) वृक्षों के बनों में बसा हुआ था। तथा रजनीशपुरम से अठारह मील की दूरी पर था। व्‍यापार के लिए हम वहां एक ट्रेलर ले गए थे। मात्र एक ट्रेलर और थोड़े से संन्‍यासी, और हम पर कस्बे पर अधिकार जमाने का आरोप लगा। भय के कारण स्‍थानीय निवासियों ने अपने नगर का ‘अनिवासी करण’ कर दिया। हमने उनके विरूद्ध न्‍यायालय में मुकदमा दायर कर दिया। जीत हमारी हुई। इस घटना ने ऐसे कुरूप नाटक का रूप ले लिया कि अमरीका वासियों में इसकी चर्चा उनके नवीनतम धारावाहिकों से भी अधिक होने लगी।

समाचार पत्र तथा टेलीविजन स्‍टेशन इसमे बहुत रूचि दिखाने लगे थे। समाचार-पत्रों और टेलीविज़न पर शीला एक बहुत बड़ी जादूगरनी सी प्रतीत होती थी। एंटिलोप के निवासियों ने अपना भय प्रकट करा शुरू किया और अपना घर बचाते गृह स्‍वामी का नाटक छेड़ दिया।

यह नाटक विकसित होता गया। अंत में और अधिक संन्‍यासी शहर में प्रविष्‍ट हो गए। उन्‍होंने अपना मेयर स्‍वयं निर्वाचित किया। घरों का पुनर्निर्माण किया और शहर को नया नाम दिया—‘रजनीश नगर’ यह सब करेन के पश्‍चात वे रजनीशपुरम घाटी की और लौट आए और सब छोड़ दिया। इस दौरान एंटिलोप के निवासी अभी वहां थे परंतु अब उनके जीवन का एक अर्थ था उनका महत्‍व बढ़ गया था। टेलीविज़न में उनका इंटरव्‍यू होता। लड़ाई अब भी जारी थी। Continue reading

Posted in माई डायमंड डे विद ओशो--मां प्रेम शुन्‍यो | Tagged , | 2s टिप्पणियाँ

माई डायमंड डे विद ओशो—मां प्रेम शुन्‍यों (अध्‍याय—06)

रजनीश पुरम—भाग-1 (अध्‍याय—06)

मां प्रेम शुन्‍यों (माई डायमंड डे विद ओशो

माई डायमंड डे विद ओशो–मां प्रेम शून्‍यों

रजनीशपुरम अमरीका में नहीं था। वह अपने में एक देश था—अमरीकी स्‍वप्‍नों से मुक्‍त। शायद यही कारण था कि अमरीका राजनीतिज्ञों ने उसके साथ युद्ध छेड़ दिया।

आशीष, अर्पिता, गायन और मैं हवाई जहाज़ से अमरीका के पार आ गए।

आशीष लकड़ी का जादूगर था। वह केवल एक उत्‍कृष्‍ट बढ़ई ही नहीं था जो ओशो के लिए कुर्सीया बनाता है। बल्‍कि और कोई भी तकनीकी या बिजली का काम हो तो वह उसे करने में सक्षम है। जब भी कहीं कुछ जोड़ना होता या लगाना होता, आशिष-आशिष, कहां है, आशिष? यही पूकार सुनाई देती। इटालियन होने के नाते उसके पास हाथों के माध्‍यम से बोलने की महान कला है।

अर्पिता ने हमेशा ओशो के लिए चप्‍पलें बनाई है। वह मनमौजी किस्‍म की महिला है। ज़ेन चित्र बनाती है। सनकी सा उसका व्‍यक्‍तित्‍व है। जब उसने ओशो के कपड़ों को डिजायन करने में सहायता की तो उकसा वह रूप प्रकट हुआ।

गायन तब न्यूजर्सी पहुंच गई थी। जब विवेक ने उसे जर्मनी में फोन किय और कहां, ‘तुम आ जाओं’ विवेक उसे हवाई अड्डे पर लेने गई और आते ही उससे कहा, ‘आशा है तुम सिलाई का काम कर सकती हो।’ उसने हामी भरी। ओशो के सभी विलक्षण कपड़ों की सिलाई का श्रेय उसी को जाता है। वह एक नर्तकी भी है। रैंच पर उत्‍सव के दिनों में तैयार की गई विडियो में आप उसे मेडिटेशन हॉल, रजनीश मंदिर के मंच पर ओशो के इर्द-गिर्द अपने लम्‍बे बालों को लहराते हुए आनन्‍दपूर्वक नाचते हुए देख सकत है। Continue reading

Posted in माई डायमंड डे विद ओशो--मां प्रेम शुन्‍यो | Tagged , | 2s टिप्पणियाँ

माई डायमंड डे विद ओशो—मां प्रेम शुन्‍यों (अध्‍याय—05)

न्‍यूजर्सी—दुर्ग (अध्‍याय—05)

मां प्रेम शुन्‍यों (माई डायमंड डे विद ओशो

माई डायमंड डे विद ओशो–मां प्रेम शून्‍यों

ओशो ने लगभग बीस शिष्‍यों के साथ भारत छोड़ दिया। अलविदा कहते हुए उनके संन्‍यासी हाथ जोड़े उनके द्वार के बाहर रास्‍ते, कार पोर्च में तथा आश्रम की सड़क के दोनों और कतार में खड़े थे। विवेक और निजी चिकित्‍सक देवराज के साथ उन्‍होंने मरसीडीज़ से प्रस्‍थान किया।

विवेक, जिसमें बच्‍चों जैसी सुकुमार चंचलता थी जो उसके चारित्र्य बल और किसी भी परिस्‍थिति को संभालने की उसकी योग्‍यता को छिपाए रखती और देवराज जो एक लम्‍बा उँचा चाँदी जैसे बालों वाला सुशिष्‍ट-सुरुचिपूर्ण युवक था-दोनों एक सुंदर जोड़ी बना रहे थे।

मैंने एक घंटे के उपरांत प्रस्‍थान किया, मुझे लगा कि आश्रम का अंत हो जाएगा और एक प्रकार से हो ही चुका था; क्‍योंकि वह पुन: कभी वैसा न हो पाया। हो भी कैसे सकता था। कम्‍यून एक उर्जा एक देह की भांति था; हम सब उर्जा दर्शनों और ध्‍यान के माध्‍यम से एक दूसरे से जुड़े हुए थे। और यह सोचकर कि अब हम विश्‍व भर में बिखर जाएंगे। मैं उदास हो गई। अब मेरा मार्ग—शेष जगत में क्‍या हो रहा है उससे बेखबर और बेपरवाह—लम्‍बे चोगे पहने एक जादुई तराशा जा रहा था और यह तराशना किसी शल्‍य चिकित्‍सा की भांति हो रहा था। मेरे अंतर्जगत का हीरा तराशा जा रहा था और यह तराशना किसी शल्‍यचिकित्‍सा की भांति हो रहा था।

पैन एम विमान में ओशो देवराज और विवेक, ओशो के लिए खाना पकाने वाले और उनके कमरे की सफाई करने वाली निरूपा सभी प्रथम दर्जे में बैठ गए। ओशो पूना के जीवाणु-मुक्‍त परिवेश से पहली बार बाहर आए थे। हमने केबिन को अच्‍छी तरह साफ करने का प्रयत्‍न किया था पिछली उड़ान के यात्रियों की इत्र या सिगरेट की गंध को कम करने के लिए हमने सब सीटों पर श्‍वेत स्‍वच्‍छ चादरें बिछा दी गई थी। Continue reading

Posted in माई डायमंड डे विद ओशो--मां प्रेम शुन्‍यो | Tagged , | 2s टिप्पणियाँ

माई डायमंड डे विद ओशो—मां प्रेम शुन्‍यों (अध्‍याय—04)

ऊर्जा दर्शन—(अध्‍याय—04)

मां प्रेम शुन्‍यों (माई डायमंड डे विद ओशो

माई डायमंड डे विद ओशो–मां प्रेम शून्‍यों

ओशो 21 मार्च 1953 में बुद्धत्‍व को उपलब्‍ध हुए। उसी दिन से वे उन लोगों की खोज में है जो उन्‍हें समझ सकें। और बुद्धत्‍व को उपलब्‍ध हो सकें। उन्‍होंने उन सैंकड़ों सशस्त्रों की सहायता की है जो आत्‍म-बोध के मार्ग पर है।

मैंने उन्‍हें कहते सूना है :

‘मनुष्‍य की सत्‍य के लिए प्‍यास जन्‍मों-जन्‍मों तक चलती है। कई जन्‍मों के पश्‍चात वह उसे पाने में समर्थ होता है। और जो इसकी खोज करते है सोचते है कि इसकी प्राप्‍ति के बाद वे शान्ति का अनुभव करेंगे। लेकिन जो इसे पाने में सफल हो जाते है, पाते है उन्‍हें पता चलता है कि उनकी सफलता एक नई प्रसव-पीड़ा की शुरूआत है, बिना किसी पीड़ा-मुक्‍ति के। सत्‍य जब एक बार मिल जाता है, एक नई प्रसव-पीड़ा को जन्‍म देती है।’

वे फूल की बात करते है जिसे अपनी सुगन्‍ध बिखेरनी ही है—वे नीर भरे बादल की बात करते है जिसे बरसना ही है।

न निरंतर बीस वर्षों तक भारत में घूमते रहे। बदले में उन्‍हें मिले पत्‍थर, जूते और चाकू जो उन पर फेंके गए। भारतीय रेलगाड़ियों में यात्रा करने के फलस्‍वरूप उनका स्‍वास्‍थ्य बिगड़ गया। क्‍योंकि वे बहुत ही अस्‍वच्‍छ तथा रोगकारक थी। कुछ रेल यात्राएं जो अड़तालीस घंटे लम्‍बी होती। इन तीस वर्षों का एक तिहाई भाग उन्‍होंने रेल गाड़ियों में ही बिताया। वे भारत के प्रत्‍येक नगर व प्रत्‍येक गांव में गए, लोगों से बात की, और बाद में ध्‍यान शिविरों का आयोजन किया। इन शिवरों में उन्‍होंने स्‍वयं ध्‍यान करवाया और जो कुछ वे कह रहे थे उसकी अनुभव करने के लिए लोगों को प्रयास करने की प्ररेणा दी। Continue reading

Posted in माई डायमंड डे विद ओशो--मां प्रेम शुन्‍यो | Tagged , | 3s टिप्पणियाँ

माई डायमंड डे विद ओशो–मां प्रेम शून्‍यों (अध्‍याय–03)

प्रेम मुख विहीन आता है—(अध्‍याय—03)

मां प्रेम शुन्‍यों (माई डायमंड डे विद ओशो

माई डायमंड डे विद ओशो–मां प्रेम शून्‍यों

लाओत्से हाउस (ओशो-गृह) एक महाराजा की सम्‍पति था। जिसका चुनाव इसके बीच खड़े बादाम के उस विशाल पेड़ के कारण किया गया था। जिसके रंग गिरगिट की भांति लाल से केसरी पीले फिर हरे रंग में बदल जाते है। इसके मौसम कुछ सप्‍ताह उपरान्‍त बदलते रहते है। और फिर भी मैंने इसकी शाखाओं को कभी पत्र-विहीन नहीं देखा। उधर एक पत्‍ता गिरा कि नया चमकीला हरा पत्‍ता उसका स्‍थान लेने को आतुर होता है। पेड़ के पत्‍तों की छाया के नीचे एक छोटा सा झरना है और एक रॉक गार्डन है। जिसका निर्माण एक सनकी दीवाने इटालियन ने किया था। जो उसके बाद कभी दिखाई नहीं दिया।

कुछ ही वर्षों में यह उद्यान ओशो के जादुई स्‍पर्श से एक जंगल बन गया है—यहां बांस के उपवन है, हंस-सरोवर है। एक श्‍वेत संगमरमर का जल प्रपात है जो रात्रि में नीले प्रकाश से जगमगा उठता है और जैसे ही जल छोटे-छोटे कुंडों में से गुजरता है, वे कुंड सुनहरे पीले प्रकाश से चमकने लगते है। राजस्‍थान की खदानों से लाई गई विशाल चट्टानें, लाइब्रेरी की ग्रेनाइट पत्‍थर से बनी काली दीवारों की पृष्‍ठभूमि में सुर्य की रोशनी में जगमगा उठती है। यहां एक जल मार्ग और जापानी ढंग का पूल है। एक गुलाब वाटिका है जहां(बिना मौसम के) गुलाब खिलते है। और रात्रि के समय इसमे रोशनी की जाती है ताकि विदूषक की भांति यथार्थ वादी चकाचौंध करने वाले रंगों को लिये ये गुलाब, जरा ठहरकर,खड़े होकर ओशो के भोजन कक्ष की और निहार सकें। Continue reading

Posted in माई डायमंड डे विद ओशो--मां प्रेम शुन्‍यो | Tagged , | 3s टिप्पणियाँ

माई डायमंड डे विद ओशो–मां प्रेम शून्‍यों (अध्‍याय–02)

ज्‍योतिर्मय अंधकार—(अध्‍याय—02)

मां प्रेम शुन्‍यों (माई डायमंड डे विद ओशो

माई डायमंड डे विद ओशो–मां प्रेम शून्‍यों

भारत में पूना के एक होटल में प्रथम रात्रि व्‍यतीत करने के बाद मैंने सत्‍य की खोज का परित्‍याग करने का निश्‍चय किया। यह होटल बाहर से देखने में अच्‍छा लग रहा था। मैं भारतीय हवाई-अड्डे और रेलवे स्‍टेशन के अपने प्रथम अनुभव के उपरान्‍त थकी-घबराई, कुछ डांवाडोल सी यहां पहुंची थी। स्‍टेशन किसी शरणार्थी शिविर जैसा लग रहा था। वहां प्‍लेटफार्म के ठीक मध्‍य में लोग अपने पूरे परिवार के साथ गठरियों पर सोये हुए थे। और दूसरे यात्री उनके उपर से; उनके आसपास से आ-जा रहे थे। लंगड़े-लूले व भूखे से पीड़ित लोग मेरी और टूट पड़े। भीख मांगने लगे और मुझे यूं घूरकर देखने लगे जैसे मुझे ही खा जाएंगे। कुली और टैक्‍सी ड्राइवर एक दूसरे पर चिल्‍ला रहे थे। हाथापाई कर रहे थे। एक दूसरे के मुंह पर घूंसे मार रहे थे। और सवारी लेने के लिए एक दूसरे का लगभग गला ही घोंट रहे थे। चारों और हजारों लोग-लोग, जनसंख्‍या विस्‍फोट। Continue reading

Posted in माई डायमंड डे विद ओशो--मां प्रेम शुन्‍यो | Tagged , | 4s टिप्पणियाँ

महसाना एक परिक्रमा-(भाग 2)

स्‍वामी देवातीत शास्‍ता–

महसाना एक परिक्रमा—भाग--02

स्‍वामी देवातीत शास्‍ता–एक परिचय

स्‍वामी देवातीत शास्‍ता का असली नाम ईश्‍वर लाल प्रजापति है। वह गुजरात के एक गांव रुद्रा बीजा पूर में गरीब घर में पैदा हुए। किसी तरह से पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्‍हें एक सरकारी स्‍कूल में अध्‍यापक की नौकरी मिल गई। नौकरी के बाद परिवार ने उनकी शादी कर दी। परन्‍तु कुदरत को तो शायद कुछ और ही मंजूर था। पत्‍नी का स्‍वभाव बहुत दुष्ट था। वह बात-बात में लड़ने मरने के लिए तैयार हो जाती थी। लेकिन जिस तरह से स्‍वामी का स्वभाव आज है उसी तरह से वह बचपन से ही शांत प्रकृति के थे। समय गुजरता चला गया। लेकिन घर में कोई औलाद नहीं हुई। स्‍वामी देवातीत ने तो इसे भगवान का वरदान मान कर स्‍वीकार कर लिया परंतु पत्‍नी और-और हिंसक होती चली गई। और बात इतनी बढ़ी की एक दिन घर छोड़ कर मायके चली गई इस के बाद कभी नहीं लोटी। मिलने के लिए जितनी ही बार गये तो केवल स्‍वामी जी। ताकी उन्‍हें आर्थिक रूप से तंगी न हो। लेकिन वहां भी वह अपनी आदत नहीं छोड़ पाई। और वहां पर भी वह अपनी परिवार के साथ लड़ती झगड़ती रही। तंग आकर परिवार ने उसे अलग रहने की जगह दे दी। स्‍वामी जब भी अपनी ससुराल जाते तो ससुराल वाले उनका सम्मान करते। वह वहां जाकर सब का हाल चाल पुछते। अपनी पत्‍नी के पास भी जाते परंतु वह सीधे मुहं बात भी नहीं करती। कई बार तो उनके दिये हुए पैसे उठा कर बहार फेंक देती और कहती की यहां कोई भिखारी नहीं बसते। मत आया करो यहां। हम जलील करने के लिए। शायद परिवार के लोग जानते थे कि इसमें स्‍वामी जी का कोई कसूर नहीं है ये सब हमारी अपनी लड़की की कारस्तानी है। लेकिन इस विषय में कोई कुछ नहीं कर सकता था। आदमी अपने को बदल सकता है। दूसरे के स्‍वभाव पर उसका कोई अधिकार नहीं है। धीरे-धीर स्‍वामी जी का वहां जाना कम से कम हो गया। Continue reading

Posted in मार्ग की मधुर अनुभूतियां— | Tagged , , | 4s टिप्पणियाँ

माई डायमंड डे विद ओशो–मां प्रेम शून्‍यों (अध्‍याय-01)

मैं यहीं हूं (अध्‍याय—1 )

कुछ कहना है?

एक आवाज भीतर पुकार-पुकार कर कहती है। ‘मैं यहीं हूं, मैं यहीं हूं।’ मैं अवाक हूं। और तभी वे आंखें।

मां प्रेम शुन्‍यों  (माई डायमंड डे विद ओशो

माई डायमंड डे विद ओशो( हीरा पायो गांठ गठियायो)

जब गुरु शिष्‍य की आंखों में देखता है, यह देखता है, और वह देखता है। वह पूरी कहा कहानी देख रहा है अतीत वर्तमान और भविष्‍य—सभी कुछ। गुरु के सामने शिष्‍य पारदर्शी है। और यह उसमें छिपे अप्रकट बुद्ध को देख सकता है। मैं वहां बैठी ही रह सकती थी ताकि ‘वे मेरे भीतर तक पहुंच जाएं…..क्‍योंकि हीरे को पाने का बस यही एकमात्र उपाय है। भीतर एक भय है कि कहीं वे मेरे अचेतन में पड़ी उन बातों को ने देख लें। जिन्‍हें मैं छिपाए रखना चाहती थी। परंतु वह मेरी ओर ऐसी प्रेम पूर्ण दृष्‍टि से देखते है कि मैं केवल इतना ही कह पाती हूं, ‘हां।’

कभी-कभी ऐसी दृष्‍टि-स्‍मृति पटल पर कोई चिन्‍ह छोड़ सकती बस एक हर्षोल्‍लास की अनुभूति, एक आनन्‍द पूर्ण ऊर्जा का ज्‍वार मुझे अश्रु धारा में बह जाने के लिए छोड़ जाता है।

बुद्ध पुरूष ओशो से यह मेरी प्रथम भेंट थी। यह सन 1976 की बात है। भारत में यह बसंत का मौसम था। Continue reading

Posted in माई डायमंड डे विद ओशो--मां प्रेम शुन्‍यो | Tagged , | 6s टिप्पणियाँ

मनन नीयो–कम्‍युन महसाना गुजरात (एक परिक्रमा) भाग–1

ओशो मनन नियो-संन्‍यास कम्‍यून महसाना गुजरात। महसाना-अहमदाबाद मार्ग पर रेलवे ओवर ब्रिज के पास पलावासना में एक सुंदर रमणीक एकांत में बना है।

 मनन नीयो--कम्‍युन (एक परिक्रमा) भाग--1

ओशो मनन नियो-संन्‍यास कम्‍यून महसाना गुजरात।

ओशो इसी मार्ग से अनेक बार माऊँ टाबू शिविर लेने के लिए जाते थे। एक दिन अचानक कार को रूकवाया और उसे पीछे ले जाने के लिए कहा। और आज जहां कम्‍यून बना है उस और इशारा कर के कहां। देखो उसे वह कितनी सुंदर जगह ध्‍यान और मौन लिए खड़ी है। वहां जगह केवल ध्‍यान के लिए बनी है। वहां कुछ करो, साधकों के लिए यहां पर एक आश्रम बनाओ। और ठीक कुछ दिनों बाद वहां की जमीन खरीद ली गई और वहां पर आश्रम का काम चलने लगा। ओशो के अमेरिका से आने के बाद यहां के ट्रस्‍टी ओशो से मिलने मनाली गए और चाहा की यह आश्रम की जमीन बेच कर ओशो के लिए धन एकत्रित किया जाये। बाद में ओशो से भेट होने के बाद जब उन्‍हें यह स्थान बेचने को कहां तो ओशो हंस दिये। और कहां की नहीं तुम नहीं जानते यह जगह भारतीय संन्यासियों के काम आयेगी। इसे बेचना नहीं है। वक्‍त के गर्भ में क्‍या छुपा है। यह केवल प्रकृति और बुद्ध पुरूष ही जानते है। हम तो केवल अनुसरण करता मात्र है। Continue reading

Posted in मार्ग की मधुर अनुभूतियां— | Tagged , , , | 2s टिप्पणियाँ