यात्रा एक नये अायाम की……..

ओशो— एक परिचय

सत्य की व्यक्तिगत खोज से लेकर ज्वलंत सामाजिक व राजनैतिक प्रश्नों पर ओशो की दृष्टि उनको हर श्रेणी से अलग अपनी कोटि आप बना देती है। वे आंतरिक रूपांतरण के विज्ञान में क्रांतिकारी देशना के पर्याय हैं और ध्यान की ऐसी विधियों के प्रस्तोता हैं जो आज के गतिशील जीवन को ध्यान में रख कर बनाई गई हैं।DSC_1209
अनूठे ओशो सक्रिय ध्यान इस तरह बनाए गए हैं कि शरीर और मन में इकट्ठे तनावों का रेचन हो सके, जिससे सहज स्थिरता आए व ध्यान की विचार रहित दशा का अनुभव हो।
ओशो की देशना एक नये मनुष्य के जन्म के लिए है, जिसे उन्होंने ‘ज़ोरबा दि बुद्धा ‘ कहा है— जिसके पैर जमीन पर हों, मगर जिसके हाथ सितारों को, छू सकें। ओशो के हर आयाम में एक धारा की तरह बहता हुआ वह जीवन—दर्शन है जो पूर्व की समयातीत प्रज्ञा और पश्चिम के विज्ञान और तकनीक की उच्चतम संभावनाओं को समाहित करता है। ओशो के दर्शन को यदि समझा जाए और अपने जीवन में उतारा जाए तो मनुष्य—जाति में एक क्रांति की संभावना है। Continue reading

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मैं कहता आंखन देखी–(प्रवचन–30)

मृत्यु और परलोक—(प्रवचन—तीसवां)

‘अमृत—वाणी’ से संकलित

सुधा—बिंदु 1970—1971

स जगत में अज्ञान के अतिरिक्त और कोई मृत्यु नहीं है। अज्ञान ही मृत्यु है, ‘इग्रोरेन्स इज़ डेथ’। क्या अर्थ हुआ इसका कि अज्ञान ही मृत्यु है? अगर अज्ञान मृत्यु है, तो ही ज्ञान अमृत हो सकता है। अज्ञान मृत्यु है, इसका अर्थ हुआ कि मृत्यु कही है ही नही। हम नहीं जानते इसलिए मृत्यु मालूम पड़ती है। मृत्यु असम्भव है। मृत्यु इस पृथ्वी पर सर्वाधिक असम्भव घटना है जो हो ही नहीं सकती, जो कभी हुई नहीं, जो कभी होगी नहीं, लेकिन रोज मृत्यु मालूम पड़ती है। Continue reading

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मन ही पूजा मन ही धूप–(प्रवचन–1)

आग के फूल—(पहला प्रवचन)

सूत्र:

बिनु देखे उपजै नहि आसा। जो दीसै सो होई बिनासा।।

बरन सहित जो जापै नामु। सो जोगी केवस निहकामु।।

परचै राम रवै जो कोई। पारसु परसै ना दुबिधा होई।।

सो मुनि मन की दुबिधा खाइ। बिनु द्वारे त्रैलोक समाई।।

मन का सुभाव सब कोई करै। करता होई सु अनभे रहै।।

फल कारण फूली बनराइ। फलु लागा तब फूल बिलाई।।

ग्‍यानै कारन कर अभ्‍यासू। ग्‍यान भया तहं करमैं नासू।।

घृत कारन दधि मथै सयान जीवन मुकत सदा निरवान।।

कहि रविदास परम बैराग। रिदै राम को न जपसि अभाग।। Continue reading

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मैं कहता अांखन देखी–(प्रवचन–29)

जो बोएंगे बीज वही काटेंगे फसल—(प्रवचन—उन्नतीसवां)

‘अमृत वाणी’ से संकलित

सुधा—बिंदु 1970—71

किसे हम कहें कि अपना मित्र है और किसे हम कहें कि अपना शत्रु है। एक छोटी—सी परिभाषा निर्मित की जा सकती है। हम ऐसा कुछ भी करते हों, जिससे दुख फलित होता है तो हम अपने मित्र नहीं

कहे जा सकते। स्वयं के लिए दुख के बीज बोनेवाला व्यक्ति अपना शत्रु है। और हम सब स्वयं के लिए दुख का बीज बोते हैं। निश्‍चित ही बीज बोने में और फसल काटने में बहुत वक्त लग जाता है, इसलिए हमें याद भी नहीं रहता कि हम अपने ही बीजों के साथ की गई मेहनत की फसल काट रहे हैं। अकसर फासला इतना हो जाता है कि हम सोचते हैं, बीज तो हमने बोए थे अमृत के, न मालूम कैसा दुर्भाग्य—कि फल जहर के और विष के उपलब्ध हुए हैं! Continue reading

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मै कहता आंखन देखी–(प्रवचन–28)

यह मन क्‍या है?—(प्रवचन—अट्ठाईसवां)

‘अमृत वाणी’

से संकलित सुधा—बिन्दु 1970—71

क आकाश, एक स्पेस बाहर है, जिसमें हम चलते हैं, उठते हैं, बैठते हैं—जहां भवन निर्मित होते हैं और खंडहर हो जाते हैं। जहां पक्षी उड़ते, शून्य जन्मते और पृथ्‍वीयां विलुप्त होती है—यह आकाश हमारे बाहर है। किंतु यह आकाश जो बाहर फैला है, यही अकेला आकाश नहीं है— ‘दिस स्पेस इज नाट द ओनली स्पेस’ —एक और भी आकाश है, वह हमारे भीतर है। जो आकाश हमारे बाहर है वह असीम है। Continue reading

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मन ही पूजा मन ही धूप–(संत–रैदास)

मन ही पूजा मन ही धूप—(संत—रैदास)

ओशो

(रैदास वाणी पर प्रश्‍नोत्‍तर सहित पुणे में ओशो द्वारा दिए गए दस अमृत प्रवचनो का अनुपन संकलन)

आमुख:

दमी को क्या हो गया है? आदमी के इस बगीचे में फूल खिलने बंद हो गए! मधुमास जैसे अब आता नहीं! जैसे मनुष्य का हृदय एक रेगिस्तान हो गया है, मरूद्यान भी नहीं कोई। हरे वृक्षों की छाया भी न रही। दूर के पंछी बसेरा करें, ऐसे वृक्ष भी न रहे। आकाश को देखने वाली आखें भी नहीं। अनाहत को सुनने वाले कान भी नहीं। मनुष्य को क्या हो गया है? Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–6) प्रवचन–162

अकस्‍मात विस्‍फोट की पूर्व—तैयारी—(प्रवचन—बारहवां)

अध्‍याय—13

सूत्र—

यथा प्रकाशयत्‍येक: कृत्‍स्‍नं लोकमिमं रवि:।

क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्‍स्‍नं प्रकाशयति भारत।। 33।।

स्थ्यैज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचमुवा।

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्‍तरं च ये विदुर्यान्‍ति ते परम्।। 34।।

है अर्जुन, जिस प्रकार एक ही सूर्य इस संपूर्ण लोक को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार एक ही आत्‍मा संपूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करता है।

इस प्रकाश क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को तथा विकारयुक्‍त प्रकृति से छूटने के उपाय को जो पुरूष ज्ञान—नेत्रों के द्वारा तत्‍व से जानते है, वे महात्‍माजन परम ब्रह्म परमात्‍मा को प्राप्त होते हैं। Continue reading

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मैं कहता आंखन देखी–(प्रवचन–27)

मैं मृत्यु सिखाता हूं—(प्रवचन—सत्‍ताईसवा)

‘मै कौन हूं?’

से संकलित क्रांतिसूत्र 1966 — 67

मैं प्रकाश की बात नहीं करता है वह कोई प्रश्‍न ही नहीं है। प्रश्‍न वस्तुत: आंख का है। वह है, तो प्रकाश है। वह नहीं है, तो प्रकाश नहीं है। क्या है वह, हम नहीं जानते हैं। जो हम जान सकते है, वही हम जानते हैं। इसलिए विचारणीय सत्ता नहीं, विचारणीय ज्ञान की क्षमता है। सत्ता उतनी ही ज्ञात होती है, जितना ज्ञान जागृत होता है। Continue reading

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महावीर मेरी दृष्‍टी में–(प्रवचन–25)

महावीर: मेरी दृष्टि में—(प्रवचन—पच्‍चीसवां)

 हावीर पर इतने दिनों तक बात करनी अत्यंत आनंदपूर्ण थी। यह ऐसे ही था, जैसे मैं अपने संबंध में ही बात कर रहा हूं। पराए के संबंध में बात की भी नहीं जा सकती। दूसरे के संबंध में कुछ कहा भी कैसे जा सकता है? अपने संबंध में ही सत्य हुआ जा सकता है।

और महावीर पर इस भांति मैंने बात नहीं की, जैसे वे कोई दूसरे और पराए हैं। जैसे हम अपने आंतरिक जीवन के संबंध में ही बात कर रहे हों, ऐसी ही उन पर बात की है। उन्हें केवल निमित्त माना है, और उनके चारों ओर उन सारे प्रश्नों पर चर्चा की है, जो प्रत्येक साधक के मार्ग पर अनिवार्य रूप से खड़े हो जाते हैं। महत्वपूर्ण भी यही है। Continue reading

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मैं कहता आंखन देखी–(प्रवचन–26)

अहिंसा का अर्थ—(प्रवचन—छब्‍बीसवां)

‘मैं कौन हूं?’

से संकलित क्रांतिसूत्र 1966—67

मैं उन दिनों का स्मरण करता हूं जब चित्त पर घना अंधकार था और स्वयं के भीतर कोई मार्ग दिखाई नहीं पड़ता था। तब की एक बात खयाल में है। वह यह कि उन दिनों किसी के प्रति कोई प्रेम प्रतीत नहीं होता था। दूसरे तो दूर, स्वयं के प्रति भी कोई प्रेम नहीं था।

फिर, जब समाधि को जाना तो साथ ही यह भी जाना कि जैसे भीतर सोए हुए प्रेम से अनन्त झरने अनायास ही सहज और सक्रिय हो गए है। यह प्रेम विशेष रूप से किसी के प्रति नहीं था। यह तो बस था, और सहज ही प्रवाहित हो रहा था। जैसे दीये से प्रकाश बहता है और फूलों से सुगंध, ऐसे ही वह भी बह रहा था। बोध के उस अदभुत क्षण में जाना था कि वह तो स्वभाव का प्रकाश है। वह किसी के प्रति नहीं होता है। वह तो स्वयं की स्फुरित है! Continue reading

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मैं कहता हूं अांखन देखी–(प्रवचन–25)

नीति, भय और प्रेम—(प्रवचन—पच्‍चीसवां)

‘मैं कौन हूं?’

से संकलित क्रांतिसूत्र 1966—67

मैं सोचता हूं कि क्या बोलूं? मनुष्य के संबंध में विचार करते ही मुझे उन हजार आंखों का स्मरण आता है, जिन्हें देखने और जिनमें झांकने का मुझे मौका मिला है। उनकी स्मृति आते ही मैं दुखी हो जाता हूं। जो उनमें देखा है, वह हृदय में काटो की भांति चुभता है। क्या देखना चाहता था और क्या देखने को मिला! आनंद को खोजता था, पाया विषाद। आलोक को खोजता था, पाया अंधकार। प्रभु को खोजता था, पाया पाप। मनुष्य को यह क्या हो गया है? Continue reading

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महावीर मेरी दृष्‍टी में–(प्रवचन–24)

दुख, सुख और महावीर-आनंद—(प्रवचन—चौबीसवां)

दुख, सुख और आनंद,

इन तीन शब्दों को समझना बहुत उपयोगी है।

दुख और सुख भिन्न चीजें नहीं हैं, बल्कि उन दोनों के बीच जो भेद है, वह ज्यादा से ज्यादा मात्रा का, परिमाण का, डिग्री का है। और इसलिए सुख दुख बन सकता है और दुख सुख बन सकता है। जिसे हम सुख कहते हैं, वह भी दुख बन सकता है; और जिसे दुख कहते हैं, वह भी सुख बन सकता है। इन दोनों के बीच जो फासला है, जो भेद है, वह विरोधी का नहीं है। भेद मात्रा का है। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–6) प्रवचन–161

साधना और समझ—(प्रवचन—ग्‍यारहवां)

अध्‍याय—13

सूत्र—161

अनादित्वान्‍निर्गुणत्वात्परमात्मायमब्यय:।

शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करौति न लिप्‍यते।। 31।।

यथा सर्वगतं सौक्ष्‍म्यादास्काशं नोयलिप्‍यते।

सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्‍यते।। 32।।  

 है अर्जुन, अनादि होने से और गुणातीत होने से यह अविनाशी परमात्मा शरीर में स्थित हुआ थी वास्तव में न करता है और न लिपायमान होता है।

जिस कार सर्वत्र व्याप्त हुआ भी आकाश सूक्ष्म होने के कारण लिपायमान नहीं होता है, वैसे ही सर्वत्र देह में स्थित हुआ भी आत्मा गुणातींत होने के कारण देह के गुणों से लिपायमान नहीं होता है। Continue reading

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महावीर मेरी दृष्‍टी में–(प्रवचन–23)

महावीर: आत्यंतिक स्वतंत्रता के प्रतीक—(प्रवचन—तेईसवां)

प्रश्न:

 यह सच है कि आत्मा अमर है, ज्ञानस्वरूप है, फिर कैसे अज्ञान में गिरती है? कैसे बंधन में गिरती है? कैसे शरीर ग्रहण करती है–जब कि शरीर छोड़ना है, जब कि शरीर से मुक्त होना है? यह कैसे संभव हो पाता है?

 ह सवाल महत्वपूर्ण है और बहुत ऊपर से देखे जाने पर समझ में नहीं आ सकेगा। थोड़े भीतर गहरे झांकने से यह बात स्पष्ट हो सकेगी कि ऐसा क्यों होता है। जैसे, इस कमरे में आप हैं और आप इस कमरे के बाहर कभी भी नहीं गए हैं, कभी गए ही नहीं। इस कमरे में आप हैं, बड़े आनंद में हैं, बड़ी शांति में हैं, बड़े सुरक्षित। न कोई भय, न कोई अंधकार, न कोई दुख; लेकिन इस कमरे के बाहर आप कभी नहीं गए हैं। Continue reading

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मैं कहता आंखन देखी–(प्रवचन–24)

प्रेम ही प्रभु है—(प्रवचन—चौबीसवां)

‘मैं कौन हूं?’

से संकलित क्रांतिसूत्र 1966—67

मैं मनुष्य को रोज विकृति से विकृति की ओर जाते देख रहा हूं उसके भीतर कोई आधार टूट गया है। कोई बहुत अनिवार्य जीवन—स्नायु जैसे नष्ट हो गए हैं और हम संस्कृति में नहीं, विकृति में जी रहे हैं।

इस विकृति और विघटन के परिणाम व्यक्ति से समष्टि तक फैल गए हैं, परिवार से लेकर पृथ्वी की समग्र परिधि तक उसकी बेसुरी प्रतिध्वनियां सुनाई पड़ रही हैं। जिसे हम संस्कृति कहें, वह संगीत कहीं भी सुनाई नहीं पड़ता है। Continue reading

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मैं कहता आंखन देखी–(प्रवचन–23)

मांगो और मिलेगा—(प्रवचन—तेइसवां)

‘मैं कौन हूं?’

से संकलित क्रांतिसूत्र 1966 — 67

ह क्या देख रहा हूं? यह कैसी निराशा तुम्हारी आंखों में है? और क्या तुम्हें शात नहीं है कि जब आंखें निराश होती हैं, तब हृदय की वह अग्रि बुझ जाती है और वे सारी अभीप्साएं सो जाती हैं, जिनके कारण मनुष्य मनुष्य है।

निराशा पाप है, क्योंकि जीवन उसकी धारा में निश्‍चय ही ऊर्ध्वगमन खो देता है।

निराशा पाप ही नहीं, आत्मघात भी है क्योंकि जो श्रेष्ठतर जीवन को पाने में संलग्न नहीं है, उसके चरण अनायास ही मृत्यु की ओर बढ़ जाते हैं। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–6) प्रवचन–160

कौन है आँख वाला—(प्रवचन—दसवां)

अध्‍याय—13

सूत्र—

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।

विनश्यत्‍स्‍वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति।। 27।।

समं पश्यीन्ह सर्वत्र अमवीस्थतमीश्वरम्।

न हिनस्मात्मनात्मानं ततो याति पंरा गतिम् ।। 28।।

प्रकृत्यैव च कर्मीणि क्रियमाणानि सर्वशः।

यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं ग़ पश्यति।। 29।।

यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनयश्यति।

तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्यद्यते तदा।। 30।।

हम प्रकार जानकर जो पुरुष नष्ट होते हुl सब बराबर भूतों में नाशरीहत परमेश्वर को समभाव मे स्थित देखता है, वही देखता है।

क्योंकि वह पुरुष सब में समभाव से स्थित हुए परमेश्वर को समान देखता हुआ, अपने द्वारा आपको नष्ट नहीं करता है, इससे वह परम गति को प्राप्त होता है। Continue reading

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मैं कहता आंखन देखी–(प्रवचन–22)

आनंद की दिशा—(प्रवचन—बाईसवां)

‘मैं कौन हूं?’

से संकलित क्रांतिसूत्र, 1966—67

ह क्या हो गया है? मनुष्य को यह क्या हो गया है? मैं आश्रर्य में हूं कि इतनी आत्म विपन्नता, इतनी अर्थहीनता और इतनी घनी ऊब के बावजूद भी हम कैसे जी रहे हैं!

मैं मनुष्य की आत्मा को खोजता हूं तो केवल अंधकार ही हाथ आता है और मनुष्य के जीवन में झांकता हूं तो सिवाय मृत्यु के और कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता है।

जीवन है, लेकिन जीने का भाव नहीं। जीवन है, लेकिन एक बोझ की भांति। वह सौन्दर्य, समृद्धि और शांति नहीं है। और आनन्द न हो, आलोक न हो तो निश्‍चय ही जीवन नाम—मात्र को ही जीवन रह जाता है। Continue reading

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मैं कहता आंखन देखी–(प्रवचन–21)

अहिंसा क्या है?—(प्रवचन—इक्किसवां)

‘मैं कौन हूं?’

से संकलित क्रांतिसूत्र 1966—67

मैं अहिंसा पर बहुत विचार करता था। जो कुछ उस संबंध में सुनता था, उससे तृप्ति नहीं होती थी। वे बातें बहुत ऊपरी होती थीं। बुद्धि तो उनसे प्रभावित होती थी, पर अन्त: अछूता रह जाता था। धीरे—धीरे इसका कारण भी दिखा। जिस अहिंसा के संबंध में सुनता था, वह नकारात्मक थी। नकार बुद्धि से ज्यादा गहरे नहीं जा सकता है। जीवन को छूने के लिए कुछ विधायक चाहिए। अहिंसा, हिंसा का छोड़ना ही हो, तो वह जीवनस्पर्शी नहीं हो सकती है। वह किसी का छोड़ना नहीं, किसी की उपलब्धि होनी चाहिए। वह त्याग नहीं, प्राप्ति हो, तभी सार्थक है। Continue reading

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मैं कहता आंखन देखी–(प्रवचन–20)

जीवन की अदृश्य जड़ें—(प्रवचन—बीसवां)

‘मैं कौन हूं?’

से संकलित क्रांतिसूत्र 1966—67

किस संबंध में आपसे बातें करूं—जीवन के संबंध में? शायद यही उचित होगा, क्योंकि जीवित होते हुए भी जीवन से हमारा संबंध नहीं है। यह तथ्य कितना विरोधाभासी है? क्या जीवित होते हुए भी यह हो सकता है कि जीवन से हमारा संबंध न हो? यह हो सकता है! न केवल हो ही सकता है, बल्कि ऐसा ही है। जीवित होते हुए भी, जीवन भूला हुआ है। शायद हम जीने में इतने व्यस्त हैं कि जीवन का विस्मरण ही हो गया है। Continue reading

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महावीर मेरी दृष्‍टी में–(प्रवचन–22)

जागा सो महावीर: सोया सो अमहावीर—(प्रवचन—बाईसवां)

 प्रश्न:

अगर मन ही जागरण है, तो इसकी मूर्च्छा का क्या कारण है? यह मूर्च्छा कहां से पैदा हुई?

 हावीर से किसी ने पूछा, साधु कौन है?

स्वभावतः अपेक्षा रही होगी कि महावीर साधु की परिभाषा करेंगे। लेकिन महावीर ने जो किया, वह परिभाषा नहीं थी, इशारा था।

उन्होंने कहा, साधु वह है, जो जाग्रत है; और असाधु वह है, जो मूर्च्छित है।

सुत्ता, सो अमुनि: वह जो सोता है, वह असाधु है।

असुत्ता, मुनि: जो नहीं सोता है, जागा हुआ है, वह साधु है।

यह सवाल पूछने जैसा है कि अगर जागृति, चेतना हमारा स्वभाव है, स्वरूप है, तो फिर यह मूर्च्छा कहां से आ गई है? Continue reading

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महावीर मेरी दृष्‍टी में–(प्रवचन–21)

अनेकांत: महावीर का दर्शन-आकाश—(प्रवचन—इक्‍कीसवां)

प्रश्न:

 आपने पिछले दिनों भगवान महावीर के संबंध में एकांत वाली बात कही थी। वह क्या रियलाइजेशन जो भगवान महावीर का था–वह भी एकांत ही था? क्या वह संपूर्ण नहीं था? यह मेरा प्रश्न है।

इस संबंध में दो बातें समझनी चाहिए, दो शब्द समझने चाहिए। एक शब्द है दृष्टि और दूसरा शब्द है दर्शन।

दृष्टि होगी एकांगी, सदा ही एकांत होगी, अधूरी होगी, खंड होगी। दृष्टि का मतलब है, एक जगह मैं खड़ा हूं, वहां से जैसा दिखाई पड़ता है। जो दिखाई पड़ता है, वह भी उतना ही महत्वपूर्ण है। और जिस जगह मैं खड़ा हूं, वह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है–कहां से मैं देख रहा हूं! जहां से खड़े होकर मैं देख रहा हूं, वैसा मुझे दिखाई पड़ेगा, वह दृष्टि होगी। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–6) प्रवचन–159

पुरूष में थिरता के चार मार्ग—(प्रवचन—नौवां)

अध्‍याय—13

सूत्र—

ध्यानेनात्‍मनि पश्‍यान्ति केचिदात्‍मानमात्‍मना।

अन्ये सांख्‍येन योगेन कर्मयोगेन चापरे।। 24।।

अन्ये त्वेवमजानन्‍त: श्रुत्‍वान्‍येभ्‍य उपासते।

तउपि चातितरन्‍त्येव मृत्‍यु श्रुतिपरायणा:।। 25।।

यावत्‍संजायते किंचित्‍सत्‍वं स्‍थावरजड्गमम्।

क्षेत्रक्षत्रज्ञसंयोत्‍तद्विद्धि भरतर्षभ।। 26।।

और है अर्जुन उस परम पुरुष को कितने ही मनुष्य तो शुद्ध हुई सूक्ष्‍म बुद्धि से ध्यान के द्वारा हदय में देखते हैं तथा अन्य कितने ही ज्ञान— योग के द्वारा देखते हैं तथा अन्य कितने ही निष्काम कर्म— योग के द्वारा देखते हैं।

परंतु इनसे दूसरे अर्थात जो मंद बुद्धि वाले पुरूष है, वे स्वयं इस प्रकार न जानते न दूसरों से अर्थात तत्‍व के जानने वाले पुरूषों से सुनकर ही उपासना करते हैं और वे सुनने के यरायण हुए पुरुष भी मृत्‍युरूय संसार— सागर को निस्संदेह तर जाते हैं। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–6) प्रवचन–158

गीता में समस्‍त मार्ग है—(प्रवचन—आठवां)

अध्‍याय—13

सूत्र—

पुरूष प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजानुाणान्।

कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्यसु।। 21।।

उपदृष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता म्हेश्वर:।

परमात्‍मेति चाप्‍युक्‍तो देहेउस्‍मिन्‍पुरूष: यर:।। 22।।

य एवं वेत्ति पुरूष प्रकृति च गुणै सह।

सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते।। 23।।

परंतु प्रकृति में स्थित हुआ ही पुरूष प्रकृति मे उत्पन्न हुए त्रिगुणत्मक सब पदाथों की भोगता है। और इन गुणों का संग ही ड़सके अच्छी— बुरी योनियों में जन्म लेने में कारण है। वास्तव में तो यह पुरूष इस देह में स्थित हुआ भी पर ही है,

केवल साक्षी होने से उपदृष्टा और यथार्थ सम्मति देने वाला होने मे अनुमंता एवं सबको धारण करने वाला होने से भर्ता? जीवरूय से भोक्‍ता तथा बह्मादिकों का भी स्वामी होने से महेश्वर और शुद्ध सच्‍चिदानंदघन होने से परमत्मा, ऐसा कहा गया है। Continue reading

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मैं कहता आंखन देखी–(प्रवचन–19)

समाधि योग—(प्रवचन—उन्‍नीसवां)

‘मैं कौन हूं?’

से संकलित क्रांतिसूत्र 1966—67

त्य की खोज की दो दिशाएं हैं—एक विचार की, एक दर्शन की। विचार—मार्ग चक्रीय है। उसमें गति तो बहुत होती है, पर गन्तव्य कभी भी नहीं आता। वह दिशा भ्रामक और मिथ्या है। जो उसमें पड़ते हैं, वे मतों में ही उलझकर रह जाते है। मत और सत्य भिन्न बातें है। मत बौद्धिक धारणा है, जबकि सत्य समग्र प्राणों की अनुभूति में बदल जाते हैं। तार्किक हवाओं के रुख पर उनकी स्थिति निर्भर करती है, उनमें कोई थिरता नहीं होती। सत्य परिवर्तित नहीं होता है। उसकी उपलब्धि शाश्वत और सनातन में प्रतिष्ठा देती है। Continue reading

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मैं कहता आंखन देखी–(प्रवचन–18)

जीवन—संपदा का अधिकार—(प्रवचन—अठरहवां)

‘मैं कौन हूं?’

से संकलित क्रांतिसूत्र 1966—67

मैं क्या देखता हूं? देखता हूं कि मनुष्य सोया हुआ है। आप सोए हुए हैं। प्रत्येक मनुष्य सोया हुआ है। रात्रि ही नहीं, दिवस भी निद्रा में ही बीत रहे हैं। निद्रा तो निद्रा ही है, किन्तु यह तथाकथित जागरण भी निद्रा ही है। आंखों के खुल जाने मात्र से नींद नहीं टूटती। उसके लिए तो अंतस का खुलना आवश्यक है। वास्तविक जागरण का द्वार अंतस है। जिसका अंतस सोया हो, वह जाग कर भी जागा हुआ नहीं होता, और जिसका अंतस जागता है वह सोकर भी सोता नहीं है। Continue reading

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