एनेलेक्‍टस ऑफ कन्फ्यूशियस—ओशो की प्रिय पुस्तकें

कन्फूशियस चीन के प्राचीन और प्रसिद्ध दार्शनिकों में से एक है। जैसा कि सभी प्राचीन पौर्वात्‍य व्‍यक्‍तियों के साथ हुआ है, इतिहास में उसके जन्‍म और मृत्‍यु की कोई सुनिश्‍चत तारीख दर्ज नहीं है। जो भी उपलब्‍ध है वह केवल अनुमान है। कन्‍फ्यूशियस का जीवन काल ईसा पूर्व 551-479 बताया जाता है। कुछ इतिहासविद् उससे सहमत है, कुछ नहीं। जो भी हो, उसके जैसे व्‍यक्‍तियों के वचन महत्‍वपूर्ण होते है, उनका इतिहास या भूगोल नहीं। उसके जीवन के संबंध में जो भी आंशिक जानकारी इधर-उधर उपलब्‍ध है उसे जोड़कर जो चित्र बनता है वह यह कि कन्‍फ्यूशियस सामान्‍य परिवार में पैदा हुआ, वह विवाहित था। जीते जी उसकी ख्‍याति एक विद्वान और सर्वज्ञ ऋषि के रूप में फैल चुकी थी। और वह लगातार उसका खंडन करता था। वह इसका इन्‍कार करता था कि वह उसके पास कोई विशेष ज्ञान है। उसके मुताबिक उसके पास जो असाधारण बात थी वह थी सत्तत सीखने की प्‍यास। सुदूर अतीत में जो दिव्‍य शास्‍ता थे उनके आगे वह स्‍वयं को नाकुछ मानता था। Continue reading

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पोनी एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा—(अध्‍याय—13)

जीवन की किरण उतरी

pony पोनी एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा--स्‍वामी आनंद प्रसाद

pony पोनी एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा--स्‍वामी आनंद प्रसाद

जीवन संघर्ष के वो दिन जीवन में कुछ ऐसे आयाम दे गये जिन आयामों को मैं बिना उनके अंदर से गूजरें हुए उन्‍हें वैसे कभी नहीं जान सकता था। उन्‍हीं दिनों मैंने जाना मनुष्‍य की उपलब्धि को, उसके प्रेम को, उसकी बौद्धिकता को, उसका स्‍नेह को, उसका अपनापन और लगाव मेरे अंतस के गहरे तक उतर गया। कैसे वो सामर्थ है अपने संगी साथी के सहयोग में। हम दूसरे प्राणी इस विषय में सोच भी नहीं सकते। वो पहली रात मेरे तन मन पर बहुत भारी गुजरी। मेरे पूरे शरीर मैं इतनी बेचैनी की में एक जगह बैठ ही नहीं सकता था। लगता था यहां से उठ कर कही दूर चला जाऊं। कितनी बार उठ-उठ कर में कमरे से बहार गया। एक अजीब सी बेचैनी थी मेरे शरीर में। डा0 ने तो मुझे देख कर ही कह दिया था कोई उम्‍मीद नहीं है। फिर भी मनुष्‍य उम्‍मीद नहीं छोड़ता। डा0 ने अपना जो अपना काम करना था वो कर दिया। शायद मेरे शरीर में पानी की कमी हो गई थी। ज्‍यादा उलटी और दस्‍त के कारण। उसको दूर करने के लिए उसने ग्लूकोज चढ़ाया। क्‍योंकि मेरा मुहँ तो खुलना ही बंद हो गया था। प्रकृति अपना काम पक्‍का करती है। मरने से पहले आपके मुहँ को बंद कर देगी। आपके जबड़े सख्‍त हो जायेगे। जिससे आप ठोस भोजन मुंह में डाल कर चबा नहीं सकते। क्‍योंकि वह तंत्र एक दम से बेजान हो जायेगा। बस आपके मुहर को सीधा खोल सकते है। प्रकृति अपना काम बड़ी सहजता और सरलता से करती है। आपके शरीर को मिटना है, अब उसमें ठोस जाना बंद होगा। दो या तीन दिन तक आपके मुख में तरल भी जाना बंद हो जायेगा। उस समय पूरा मुख अकड़ कर बंद हो जायेगा। दाँत जबरदस्‍ती बंद हो जायेगे उनके बीच से केवल आप पानी डाल सकते है। Continue reading

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दि बुक ऑफ ली तज़ु—(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

कन्‍फ्यूशियन दर्शन के बाद, ताओ वाद की बहुत बड़ी दार्शनिक परंपरा है। ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में ताओ दर्शन प्रौढ़ हुआ। और तभी से ताओ ग्रंथों में किसी ली तज़ु नाम के रहस्‍यदर्शी का उल्‍लेख पाया जाता है। जी तज़ु जो हवाओं पर सवार होकर यात्रा करता था। उसकी ऐतिहासिकता भी संदिग्‍ध है। पता नहीं उसका समय क्‍या था। कुछ सुत्रों के अनुसार वह ईसा पूर्व 600 में हुआ, और कुछ कहते है 400 में पैदा हुआ। ली तज़ु एक व्‍यक्‍ति भी है, और दर्शन भी। कहते है ली तज़ु पु-तिएन शहर में रहता था। और चालीस साल तक किसी ने उसकी दखल नहीं ली। और राज्‍य के उच्‍च पदस्‍थ और राजसी परिवार के लोग उसे सामान्‍य आदमी समझते थे। चेंग में सूखा पडा और ली तज़ु ने वेइ जाने का फैसला लिया। Continue reading

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प्रेम को रिश्‍ता मत बनाओ—उर्मिला मातोंडकर

‘’प्रेम संबंध ऐसी फैटेंसी है जहां आप जिस तरह भी जीना चाहें जी तो सकते है मगर खुश होने के बावजूद आप अंतत: दुःखी ही होते है।‘’

urmila ; उर्मिला मातोंडकर--ये क्‍या कहते है (ओशो)

urmila ; उर्मिला मातोंडकर--ये क्‍या कहते है (ओशो)

प्रसिद्ध फिल्‍म अभिनेत्री उर्मिला मातोंडकर

ओशो

‘’तथाकथित संबंध बहुत सुंदर और सतरंगी सपनों के साथ शुरू होते है। परंतु शीध्र ही वे अत्‍यंत दुःख और गहरे विषाद के साथ समाप्‍त होते है। इसीलिए नये मनुष्‍य के बारे में मेरी जो दृष्‍टि है उसमे बह दूसरों से जुड़ेगा तो सही परंतु किसी प्रकार का रिश्‍ता नहीं बनायेगा—भविष्‍य के लिए किसी तरह का वादा या कल के लिए कोई बंधन नहीं खड़ा करेगा। आज स्‍वयं में पूर्ण है, इसका भरपूर आनंद लो। यदि तुम कल भी एक दूसरे के साथ रहना चाहते हो तो बहुत अच्‍छा है। यदि तुम नहीं रहना चाहते हो तो एक दूसरे के प्रति अनुग्रह भाव के साथ अलग हो जाओ, क्‍योंकि एक दिन तुमने एक दूसरे को परम आनंद और ख़ुशियाँ दीं, और यह बढ़िया है कि इसके पहले कि चीजें कटु हों तुम्‍हें अलग हो जाना चाहिए। कम से कम तुम्‍हारी यादों में वे खुबसूरत क्षण हमेशा महकते जीवंत वह ताजा रहेगें।‘’

ओशो

दि गोल्डन फ़्यूचर

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ओशो के प्रवचन पेंटिंग्‍स है—एम एफ हुसैन

हर कोई ओशो के प्रवचनों में से कुछ चून लेता है। मुझे उनमें एक पेंटिंग्‍स बनती नजर आती है। बिना किसी बुश और कैनवास के।

ये क्‍या कहते है--ओशो

ये क्‍या कहते है--ओशो

कलाकार के लिए ओशो कहते है कि सारे तकनीक छोड़ दो और शुन्‍य चित दशा में कला का सृजन करो। इस बात से मैं सौ फीसदी सहमत हूं। इस स्‍थिति में ही कला में वह अनगढ़, शक्‍तिशाली तत्‍व आ सकेगा जो कि वास्‍तविक सृजन का स्‍त्रोत है।

इस बात को मैंने तब महसूस किया जब ओशो के प्रवचनों को चित्रित करने के लिए में बंबई गया था। सूफियों पर उनके प्रवचन चल रहे थे। अब सूफियों की रूहानी मोहब्‍बत पर ओशो जैसा आदमी बोल रहा हो तो यह मौका तो मैं छोड़ने वाला नहीं था। Continue reading

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मुल्‍ला नसरूद्दीन कौन था—(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

कई देश मुल्‍ला नसरूद्दीन को पैदा करने का दावा करते है। टिर्की में तो उसकी कब्र तक बनी हुई है। और हर साल वहां नसरूद्दीन उत्‍सव मनाया जाता है। उस उत्‍सव में मुल्‍ला जैसी पोशाक पहनकर लोग उसके क़िस्सों को अभिनीत करते है। एस्‍किशहर उसका जन्‍म गांव बताया जाता है।

ग्रीन लोग नसरूद्दीन के क़िस्सों को अपनी लोककथा का हिस्‍सा बनाते है। मध्‍ययुग में नसरूदीन के क़िस्सों का उपयोग तानाशाह अधिकारियों का मजाक उड़ाने के लिए किया जाता था। उसके बाद मुल्‍ला नसरूदीन सोवियत यूनियन का लोक नायक बना। एक फिल्‍म में उसे देश के दुष्‍ट पूंजीवादी शासकों के ऊपर बाजी मारते हुए दिखाया गया था।

मुल्‍ला मध्‍यपूर्व और उसके आसपास बसने वाली मनुष्‍य जाति के सामूहिक अवचेतन का हिस्‍सा बन गया। कभी वह बहुत बुद्धू बनकर सामने आता है तो कभी बहुत बुद्धिमान। उसके पास कई रहस्‍यों के भंडार है। सूफी दरवेश उसका उपयोग मनुष्‍य के मन के अजीबो गरीब पहलुओं को उजागर करने के लिए किया करते थे। Continue reading

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ट्रैक्‍टेटस लॉजिको—फिलोसफिकस (ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

विटगेंस्‍टीन ऑस्‍टिया के वियना शहर में एक रईस खानदान में पैदा हुआ। उसके पिता उद्योगपति थे उनके पास धन का अंबार था। अंत: विटगेंस्‍टीन को उसके सात भाई-बहनों के साथ उच्‍च कोटि की शिक्षा मिली। उसकी मां और पिता दोनों ही संगीतज्ञ थे और अत्‍यंत सुसंस्‍कृत थे।

इंजीनियरिंग तथा गणित को सीखने के लिए विटगेंस्‍टीन 1908 में इंग्‍लैड गया। वह बहुत ही मेधावी छात्र था और हर सिद्धांत का खुद प्रयोग करने में विश्‍वास रखता था। 1903 में बर्ट्रेंड रसेल की विख्‍यात किताब ‘’प्रिंसिपल ऑफ मैथेमेटिक्‍स’’ प्रकाशित हुई थी। तो विटगेंस्‍टीन सहज ही रसेल की और खिंचा चला आया। 1911 में वह केंब्रिज जाकर रहने लगा जो कि रसेल का ठिकाना था। विटगेंस्‍टीन रसेल का विद्यार्थी बन गया। सामान्‍यतया बर्ट्रेंड रसेल किसी विद्यार्थी से प्रभावित नहीं होता था—उसकी अपनी प्रतिभा इतनी बुलंद थी कि उसने सामने सभी बौने लगते थे। लेकिन विटगेंस्‍टीन के संबंध में उसने लिखा है, ‘’विटगेंस्‍टीन को पढ़ाना मेरे जीवन के सर्वाधिक रोमांचकारी बौद्धिक अभियानों में एक रहा है। इसकी आग, कुशाग्र बुद्धि और बुद्धि की निर्मलता असाधारण थी। मैं जो कुछ सिखा सकता था वह उसके शीध्र ही आत्‍मसात कर लिया।‘’ Continue reading

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