महावीर वाणी (भाग–1) प्रवचन–14

प्रायश्र्चित : पहला अंतर तप—(प्रवचन—चौदहवां)

दिनांक 31 अगस्‍त, 1971,

प्रथम पर्युषण व्‍याख्‍यानमाला,

पाटकर हाल, बम्‍बई

 धम्म-सूत्र

धम्मो मंगलमुक्किट्ठं,

अहिंसा संजमो तवो।

देवा वि तं नमंसन्ति,

जस्स धम्मे सया मणो ।।

धर्म सर्वश्रेष्ठ मंगल है। (कौन सा धर्म?) अहिंसा, संयम और तपरूप धर्म। जिस मनुष्य का मन उक्त धर्म में सदा संलग्न रहता है, उसे देवता भी नमस्कार करते हैं।

 प के छह बाहय अंगों की हमने चर्चा की है, आज से अंतरत्तपों के संबंध में बात करेंगे। महावीर ने पहला अंतरत्तप कहा है — प्रायश्चित। पहले तो हम समझ लें कि प्रायश्चित क्या नहीं हैं तो आ सान होगा समझना कि प्रायश्चित क्या है? अब कठिनाई और भी बढ़ गयी है क्योंकि प्रायश्चित जो नहीं है वही हम समझते रहे हैं कि प्रायश्चित है। शब्दकोषों में खोजने जाएंगे तो लिखा है कि प्रायश्चित का अर्थ है — पश्चात्ताप, रिपेंटेंस। Continue reading

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ताओ उपनिषाद (भाग–3) प्रवचन–52

 वर्तुलाकार अस्तित्व में यात्रा प्रतियात्रा भी है—(प्रवचन—बावनवां)

अध्याय 25 : खंड 1

 चार शाश्वत आदर्श

 स्वर्ग और पृथ्वी के अस्तित्व में आने के पूर्व

सब कुछ कोहरे से भरा था:

मौन, पृथक,

एकाकी खड़ा और अपरिवर्तित,

नित्य व निरंतर घूमता हुआ,

सभी चीजों की जननी बनने योग्य!

मैं उसका नाम नहीं जानता हूं,

और उसे ताओ कह कर पुकारता हूं।

यदि मुझे नाम देना ही पड़े तो मैं उसे महान कहूंगा।

महान होने का अर्थ है अंतरिक्ष में फैलाव की क्षमता,

और अंतरिक्ष में फैलाव की क्षमता है दूरगामी,

यही दूरगामिता मूल बिंदु की ओर प्रतिगामिता भी है।

 लाओत्से, जीवन का जो परम रहस्य है, उसे नाम देने के पक्ष में नहीं। नाम देते ही हम उससे वंचित होना शुरू हो जाते हैं। नाम देना उससे बचने का उपाय है, उसे जानने का नहीं। लेकिन हम सब यही सोचते हैं कि नाम दे दिया उसे तो जान लिया। इसके कारणों को समझना जरूरी है। Continue reading

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ताओ उपनिषाद (भाग–3) प्रवचन–51

सदगुण के तलछट और फोड़े—(प्रवचन—इक्‍यावनवां)

 अध्याय 24

 सदगुण के तलछट और फोड़े

जो अपने पंजों के बल खड़ा होता है,

वह दृढ़ता से खड़ा नहीं होता;

जो अपने कदमों को तानता है,

वह ठीक से नहीं चलता;

जो अपने को दिखाता फिरता है,

वह वस्तुतः दीप्तिवान नहीं है;

जो स्वयं अपना औचित्य बताता है,

वह विख्यात नहीं है;

जो अपनी डींग हांकता है,

वह श्रेय से वंचित रह जाता है;

जो घमंड करता है,

वह लोगों का अग्रणी नहीं होता।

ताओ की दृष्टि में

उन्हें सदगुणों के तलछट और फोड़े कहते हैं।

वे जुगुप्सा पैदा करने वाली चीजें हैं।

इसलिए ताओ का प्रेमी उनसे दूर ही रहता है। Continue reading

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ताओ उपनिषाद (भाग–3) प्रवचन–50

 न नया, न पुराना; सत्य सनातन है—(प्रवचन–पचासवां)

 प्रश्न-सार:

1–ताओ की परिभाषा क्या है?

 2–आप तो इतना बोलते हैं!

 3–अस्तित्व में स्वतंत्रता का स्थान क्या है?

 4–प्रकृति सदा प्रसन्न है तो मेरी प्रसन्नता में फर्क क्यों?

 5–शैली और शब्द के अलावा अंतर क्या है?

 बहुत से प्रश्न हैं।

 

एक मित्र ने पूछा है, ताओ की परिभाषा क्या है?

सी की परिभाषा का हम प्रयास कर रहे हैं। और सारा प्रयास पूरा हो जाने पर भी परिभाषा उसकी समझ में आएगी नहीं। क्योंकि जब समझाने का सारा प्रयास भी पूरा हो जाता है, तब भी ताओ परिभाषा के बाहर छूट जाता है। वह तो जब आप उसका प्रयोग भी करेंगे, तभी समझ में आएगी। Continue reading

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महावीर वाणी (भाग–1) प्रवचन–13

संलीनता : अंतरत्तप का प्रवेश-द्वार—(प्रवचन—तेरहवां)

दिनांक 30 अगस्त, 1971;

प्रथम पर्युषण व्याख्यानमाला,

पाटकर हाल, बम्बई;

 धम्‍म—सूत्र

धम्‍मो मंगलमुक्‍किट्ठं,

अहिंसा संजमो तवो।

देवा वि तं नमंसन्‍ति,

जस्‍स धम्‍मे सया मणो।।

धर्म सर्वश्रेष्ठ मंगल है। (कौन सा धर्म?) अहिंसा, संयम और तपरूप धर्म। जिस मनुष्य का मन उक्त धर्म में सदा संलग्न रहता है, उसे देवता भी नमस्कार करते हैं।

 बाह्य तप का अन्तिम सूत्र, अन्तिम अंग है—संलीनता। संलीनता सेतु है, बाहयत्तप और अंतरत्तप के बीच। संलीनता के बिना कोई बाहयत्तप से अंतरत्तप की सीमा में प्रवेश नहीं कर सकता। इस लिए संलीनता को बहुत ध्यानपूर्वक समझ लेना जरूरी है। संलीनता सीमांत है; वहीं से बाहयत्तप समाप्त होते और अंतर- तप शुरू होते हैं। Continue reading

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अष्‍टावक्र: महागीता (भाग–5) प्रवचन–10

स्वातन्त्रात् परम पदम–(प्रवचन—नौवां)

दिनांक 19 जनवरी, 1977;

श्री ओशो आश्रम कोरगांव पार्क पूना,

 सूत्र:

विषयद्वीपिनो वीक्ष्य चकिता शरणार्थिन:।

विशंति झटिति क्रोड निरोधैकाग्न्यसिद्धये।। 22।।।

निर्वासन हरि दृष्टत्वा तूष्णीं विषयदतिन।

पलायंते न शक्तास्ते सेवते कृतचाटव।। 222।।

न मुक्तिकारिका धते निशको युक्तमानस:।

पश्यन्धृण्वन्स्पृशनजघ्रन्नश्नन्नास्ते यथासुखम्।। 223।।

वस्तु श्रवणमात्रेण शुद्धबुद्धिर्निराकु ल:।

नैवाचारमनाचारमौदास्य वा प्रपश्यति।। 224।।

यदा यत्कर्तुमायाति तदा तत्कुरुते ऋजु:।

शुभं वाप्यशुभं वापि तस्य चेष्टा हि बालवत्।। 225।।

स्वातब्यात् सुखमान्नोति स्वातंन्याल्लभते परम।

स्वातष्यान्निर्वृतिं गच्छेत् स्वातंव्वात् परमं पदम-।। 226।। Continue reading

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ताओ उपनिषाद (भाग–3) प्रवचन–49

ताओ है परम स्वतंत्रता—(प्रवचन—उन्‍नचासवां)

अध्याय 23

 ताओ से एकात्मता

निसर्ग है स्वल्पभाषी।

यही कारण है कि तूफान

सुबह भर भी नहीं चल पाता;

और आंधी-पानी पूरे दिन जारी नहीं रहता है।

वे कहां से आते हैं? निसर्ग से।

जब निसर्ग का स्वर भी दीर्घजीवी नहीं,

तो मनुष्य के स्वर का क्या पूछना?

इसलिए ऐसा कहा जाता है:

ताओ का जो करता है अनुगमन,

वह ताओ के साथ एकात्म हो जाता है।

आचार सूत्रों पर चलता है जो,

वह उनके साथ एकात्म हो जाता है।

और जो ताओ का परित्याग करता है,

वह ताओ के अभाव से एकात्म होता है।

जो ताओ से एकात्म है,

ताओ भी उसका स्वागत करने में प्रसन्न है।

जो नीति से एकात्म है, नीति भी

उसका स्वागत करने में प्रसन्न है।

और जो ताओ के परित्याग से एक होता है,

ताओ का अभाव भी उसका स्वागत

करने में प्रसन्न होता है।

जो स्वयं में श्रद्धावान नहीं है,

उसे दूसरों की श्रद्धा भी नहीं मिल सकेगी। Continue reading

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ताओ उपनिषाद (भाग–3) प्रवचन–48

समर्पण है सार ताओ का—(प्रवचन—अड़तालीस)

अध्याय 22 : खंड 2

 संघर्ष की व्यर्थता

वे अपने को प्रकट नहीं करते,

और इसलिए ही वे दीप्त बने रहते हैं।

वे अपना औचित्य सिद्ध नहीं करते,

इसलिए दूर-दिगंत उनकी ख्याति जाती है।

वे अपनी श्रेष्ठता का दावा नहीं करते,

इसलिए लोग उन्हें श्रेय देते हैं।

वे अभिमानी नहीं हैं,

और इसीलिए लोगों के बीच अग्रणी बने रहते हैं।

चूंकि वे किसी वाद की प्रस्तावना नहीं करते,

इसलिए दुनिया में कोई भी

उनसे विवाद नहीं कर सकता है।

और क्या यह सही नहीं है,

जैसा कि कहा है प्राचीनों ने:

“समर्पण में ही है संपूर्ण की सुरक्षा।’

और इस तरह संत सुरक्षित रहते हैं

और संसार उनको सम्मान देता है।

 मनुष्य की तीव्र आकांक्षा है कि दूसरे उसे जानें और दूसरे उसे पहचानें।

इस आकांक्षा का मौलिक कारण क्या है? Continue reading

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ताओ उपनिषाद (भाग–3) प्रवचन–47

ताओ है झुकने, खाली होने व मिटने की कला—(प्रवचन—सैंतालीसवां)

अध्याय 22 : खंड 1

 संघर्ष की व्यर्थता

झुकना है सुरक्षा।

और झुकना ही है

सीधा होने का मार्ग।

खाली होना है भरे जाना।

और टूटना, टुकड़े-टुकड़े हो

जाना ही है पुनरुज्जीवन।

अभाव है संपदा।

संपत्ति है विपत्ति और विभ्रम।

इसलिए संत उस एक का

ही आलिंगन करते हैं;

और बन जाते हैं संसार का आदर्श।

क अनूठी घटना दिखाई पड़ती है संसार में। सभी सफल होना चाहते हैं; और सभी असफल हो जाते हैं। नहीं है कोई जो सुख न चाहता हो; और ऐसा भी कोई नहीं है जो चाह-चाह कर भी सिवाय दुख के कुछ और पाता हो। जीना चाहते हैं सभी; और सभी मर जाते हैं। जरूर कहीं कोई जीवन का गहरा नियम अपरिचित रह जाता है; उसका यह दुष्परिणाम है। Continue reading

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अष्‍टावक्र महागीता (भाग–5) प्रवचन–8

मन तो मौसम-सा चंचल—(प्रवचन—आठवां)

।8 जनवरी, ।977,

श्री ओशो आश्रम, कोरेगांव, पूना

पहला प्रश्न :

 आपने कहा कि ज्ञानी स्पदरहित हो जाता है और आपने यह भी कहा कि जिस में स्पंदन नहीं है वह चीज मृत है। कृपापूर्वक समझाएं कि स्पंदनरहित होकर ज्ञानी पुरुष कैसे जीवित रहते हैं।

 एक और भी स्पंदन है, और एक और भी जीवन है, जहां अस्मिता तो नहीं है लेकिन अस्तित्व है; जहां मैं तो नहीं हूं परमात्मा है। जहां अहंकार तो मर गया, जा चुका, अतीत हो गया, लेकिन अहंकार के पार भी एक जीवन है, एक स्पंदन है। वस्तुत: तो वही जीवन है। Continue reading

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ताओ उपनिषाद (भाग–3) प्रवचन–44

 ताओ उपनिषद—(भाग-3)

ओशो

 ओशो द्वारा लाओत्‍से के ‘ताओ तेह किंग’ पर दिए गए 127 प्रवचनों में से 21 (44 से 64) (चव्‍वालीस से चौंसठ) अमृत प्रवचनों का अपूर्व संकलन।

 लाओत्‍से कहता है कि ताओ मंजिल नहीं है। इसलिए उसने नाम दिया है ताओ। ताओ का अर्थ है वे, मार्ग। ताओ कोई मंजिल नहीं है जहां पहुंचना है। मार्ग ही ताओ है। मार्ग ही परमात्‍मा है। प्रतिपल मंजिल है। और प्रतिपल का उपयोग जो साधन की तरह करेगा वह उपयोगितावादी है, और जो प्रतिपल का उपयोग साध्‍य की तरह करता है वह उत्‍सवादी है।

लाओत्‍से का मार्ग बिलकुल प्राकृतिक है। लाओत्‍से कहता है, निसर्ग के साथ एक हो जाओ, तोड़ो ही मत अपने को। इसलिए लाओत्‍से के मार्ग की शुरू से ही शांति आनी शुरू हो जाएगी। और शुरू से ही तथाता घटने लगेगी। और शुरू से ही मौन आने लगेगा, क्‍योंकि संघर्ष शुरू से छूट जाता है।

 ओशो Continue reading

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ताओ उपनिषाद (भाग–3) प्रवचन–46

क्षुद्र आचरण नीति है, परम आचरण धर्म—(प्रवचन—छियालीसवां)

 अध्याय 21

 ताओ का प्राकटय

परम आचार के जो सूत्र हैं, वे केवल ताओ से ही उदभूत होते हैं।

और जिस तत्व को हम कहते हैं ताओ, वह है पकड़ के बाहर और दुर्ग्राह्य।

दुर्ग्राह्य और पकड़ के बाहर, तथापि उसमें ही सब रूप छिपे हैं।

दुर्ग्राह्य और पकड़ के बाहर, तथापि उसमें ही समस्त विषय निहित हैं।

अंधेरा और धुंधला, फिर भी छिपी है जीवन-ऊर्जा उसी में।

जीवन-ऊर्जा है बहुत सत्य, इसके प्रमाण भी उसमें ही प्रच्छन्न हैं।

प्राचीन काल से आज तक

इसकी नाम-रूपात्मक अभिव्यक्तियों का अंत नहीं आया,

और हम उसमें देख सकते हैं सभी वस्तुओं के जनक को।

लेकिन सभी वस्तुओं के जनक के आकार को मैं कैसे जानता हूं?

इन्हीं के द्वारा, इन्हीं अभिव्यक्तियों के द्वारा। Continue reading

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ताओ उपनिषाद (भाग–3) प्रवचन–45

संत की वक्रोक्तियां: संत की विलक्षणताएं—(प्रवचन—पैंतालीस)

 अध्याय 20 : खंड 2

 संसार और मैं

दुनियावी लोग काफी संपन्न हैं,

इतने कि दूसरों को भी दे सकें,

परंतु एक अकेला मैं मानो इस परिधि के बाहर हूं,

मानो मेरा हृदय किसी मूर्ख के हृदय जैसा हो,

व्यवस्था-शून्य और कोहरे से भरा हुआ!

जो गंवार हैं, वे विज्ञ और तेजोमय दिखते हैं;

मैं ही केवल मंद और भ्रांत हूं।

जो गंवार हैं, वे चालाक और आश्वस्त हैं;

अकेला मैं उदास, अवनमित।

समुद्र की तरह धीर, इधर-उधर

बहता हुआ–मानो लक्ष्यहीन!

सप्रयोजन हैं दुनिया के सब लोग;

अकेला मैं दिखता हूं हठीला और अभद्र!

और अकेला मैं ही हूं भिन्न–अन्यों से,

क्योंकि देता हूं मूल्य उस पोषण को जो

मिलता है सीधा ही माता प्रकृति से। Continue reading

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महावीर वाणी (भाग–1) प्रवचन–12

रस—परित्‍याग ओर काया—क्लेश—(प्रवचन—बारहवां)

दिनांक 29 अगस्‍त, 1971;

प्रथम पर्युषण व्‍याख्‍यानमाला,

पाटकर हाल बम्‍बई।

धम्म-सूत्र:

धम्मो मंगलमुक्किट्ठं,

अहिंसा संजमो तवो।

देवा वि तं नमंसन्ति,

जस्स धम्मे सया मणो ।।

धर्म सर्वश्रेष्ठ मंगल है। (कौन सा धर्म?) अहिंसा, संयम और तपरूप धर्म। जिस मनुष्य का मन उक्त धर्म में सदा संलग्न रहता है, उसे देवता भी नमस्कार करते हैं।

बाह्य-तप का चौथा चरण है — रस-परित्याग। परंपरा रस-परित्याग से अर्थ लेती रही है। किन्हीं रसों का, किन्हीं स्वादों का निषेध, नियंत्रण। इतनी स्थूल बात रस-परित्याग नहीं है। वस्तुतः सधना के जगत में स्थूल से स्थूल दिखाई पड़ने वाली बात भी स्थूल नहीं होती। Continue reading

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अजहू चेत गवांर (संत पलटूदास) प्रवचन–19

शून्‍य की झील : शील के कमल—(प्रवचन—उन्‍नीसवां)

 

दिनांक 8 अगस्‍त, 1977;

श्री रजनीश आश्रम, पूना।

 सारसूत्र :

सील की अवध, सनेह का जनकपुर,

सत्त की जानकी, ब्याह कीता।

मनहिं दुलहा बने आप रघुनाथजी,  

ज्ञान के मौर सिर बांधि लीता।।

प्रेम-बारात जब चली है उमंगिकै,

छिमा बिछाय जनबांस दीता।

भूप अहंकार के मान को मर्दिक,

थीरता-धनुष को जाय जीता।।9।।

 बाम्हन तो भए जनेउ को पहिरि कै,

बाम्हनी के गले कछु नाहिं देखा।

आधी सुद्रिनि रहै घर के बीच में,

करै, तुम खाहु यह कौन लेखा।।

सेख की सुन्नति से मुसलमानी भई,

सेखानी को नाहिं तुम कहौ सेखा।

आधी हिंदुइन रहै घरै बीच में,

पलटू अब दुहुन के मारु मेखा।।10।। Continue reading

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अजहू चेत गवांर (संत पलटूदास) प्रवचन–6

जानिये तो देव, नहीं तो पत्‍थर—(प्रवचन—छठवां)

दिनांक 26 जुलाई, 1977;

श्री रजनीश आश्रम, पूना।

 प्रश्‍न सार:

 1—कहावत हैः”मानिए तो देव, नहीं तो पत्थर’। क्या सब मानने की ही बात है?

 2—आपके पास रहकर भी मुझे अपने को मिटाने में भय लगता है। मैं अपना यह भय कैसे दूर करूं?

 3—मन से मुक्त होना असंभव-सा लगता है। हमें पता भी नहीं चलता कि मन कई तरह की वासनाओं में भटकने लगता है। और बहुत सावधानी रखकर थोड़ा-सा होश संभालता है कि फिर-फिर मन कल्पनाओं में बहने लगता है। कृपया इसे समझाएं।

 4—जब आप अष्टावक्र, बुद्ध या लाओत्से पर बोलते हैं, तब आपकी वाणी में बुद्धि और तर्क का अपूर्व तेज प्रवाहित होता है। लेकिन जब वही आप भक्ति-मार्गी संतों पर बोलते हैं, तब बातें अटपटी होने लगती हैं। ऐसा क्यों? Continue reading

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अजहू चेत गवांर (संत पलटूदास) प्रवचन–21

पलटू भगवान की गति न्‍यारी—(प्रवचन—इक्‍कीसवां)

 दिनांक 10 अगस्‍त, 1977;

श्री रजनीश आश्रम, पूना।

 सारसूत्र :

सच्चे साहिब से मिलने को

मेरा मनु लिहा बैराग है, जी।

मोह निसा में सोइ गई,

चोंक परी उठि जाग है, जी।।

दोड नैन बने गिरि के झरना,

भूषन बसन किया त्याग है, जी।

पलटू जीयत तन त्याग दिया,

उठी विरह की आगि है, जी।।13।।

 साहिब के दास कहाय यारो,

जगत् की आस न राखिए, जी।

समरथ स्वामी को जब पाया,

जगत् से दीन न माखिए, जी।।

साहिब के घर में कौन कमी,

किस बात को अंते आखिए, जी।

पलटू जो दुःख सुख लाख पैरे,

वही नाम सुधा-रस चाखिए जी।।14।। Continue reading

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अजहू चेत गवांर (संत पलटू दास) प्रवचन–8

धर्म का जन्‍म–एकांत में—(प्रवचन—आठवां)

दिनांक 28 जूलाई, 1977;

श्री रजनीश आश्रम, पूना।

 प्रश्‍नसार:

 1—क्या ध्यान की तरह भक्ति भी एकाकीपन से ही शुरू होती है?

 2—पलटूदास जी कहते हैं : “लगन-महूरत झूठ सब, और बिगाड़ैं काम’। और नक्षत्र-विज्ञान कहता है कि लग्न-मुहूर्त से काम बनने की संभावना बढ़ जाती है।…….?

 3—काम पकने पर उसमें रुचि क्षीण होने लगती है। प्रेम पकने पर क्या होता है?

 4—सब कुछ दांव पर लगा देने का क्या अर्थ है?

 5—प्रबल जीवेषणा के होते हुए भी किस भांति भक्त को अपने हाथ से अपना सीस उतारना संभव होता है?

 6—संत पलटूदास उसे गंवार कहते हैं जो जगत् की झूठी माया में फंसा है और उसे बेवकूफ, जो प्रेम की ओर कदम बढ़ाता है। फिर बुद्धिमान कौन है? Continue reading

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अजहू चेत गवांर (संत पलटूदास) प्रवचन–20

जीवन का एक मात्र अभिशाप : अहंकार—(प्रवचन—बीसवां)

दिनांक 9 अगस्‍त, 1977;

श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍नसार :

 1—कहा है निर्बल के बल पर राम। क्या यह सच है?

 2—प्रश्नकर्ता दुकानदार है। उसे भलीभांति पता है कि सुंदर वस्तु की कीमत भी बड़ी होती है। दिक्कत यह है कि वह एक कंजूस मारवाड़ी भी है। यह जानते हुए भी कि संसार और मोक्ष एक साथ नहीं सधते, उसका रस दोनों में है। Continue reading

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अजहू चेत गवांर (संत पलटूदास) प्रवचन–18

प्रेम एक झोंका है अज्ञात का—(प्रवचन—अट्ठारहवां)

दिनांक 7 अगस्‍त, 1977;

श्री रजनीश आश्रम, पूना।

 प्रश्‍नसार:

1—उस परम तत्त्व से प्रेम या भक्ति कैसे की जाए जिसे हम जानते ही नहीं? क्या अज्ञात से भी प्रेम संभव है?

 2—तथाता और समर्पण मुझे विशेष रूप से प्रिय लगते हैं, लेकिन उनमें स्थित क्यों नहीं हो पाता?

 3—प्रभु-प्रेम के मार्ग पर सबसे बड़ी बाधा क्या है?

 4—प्रभु-प्रेम दीवाना क्यों बना देता है? Continue reading

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