यात्रा एक नये अायाम की……..

मित्रो जीवन इतना सरल और सीधा नहीं होता है, जितना दिखाई देता है। इस तरह जीवन में ध्‍DSC_1209यान है। परंतु आदमी चलता रहे तो मार्ग में आने वाली कोई भी रूकावट उसे एक कदम और उंचाई पर ले जाती है। हां कोई डर कर या घबरा कर रूक जाये जो उसका दूर्भाग्‍य, लेकिन जिस मार्ग पर गुरु का संग साथ हो वहां तो जेठ की तपिस भी मधुमास की उसास ह्रदय में भर जाती है। और थकान और परेशानी तो न जाने कहां कफूर हो जाती है।

ठीक इस तरह से ओशो सत्‍संग लिखते हुए कुछ छोटी मोटी मुसिबते जब भी मार्ग में मिली तो मैंने हंस कर उन्‍हें स्‍वीकारा। और आप सच मानों उसके बाद चेतना में जो नया स्‍त्रोत परस्‍फूटित होता है। Continue reading

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अध्‍यात्‍म–उपनिषद–प्रवचन–11

धर्म—मेध समाधि—ग्‍यारहवां प्रवचन

 सूत्र :

वृत्तयस्तु तदानीमप्यज्ञाता आत्मगोचरह:।

स्मरणादनुम।ईयन्ते व्युइप्प्थतस्य समुइप्प्थता:।। 36।।

अनादाविह संसारे संचिता: कर्मकोटय:।

अनेन विलयं यान्‍ति शुद्धो धर्मोऽभिवर्धते।। 37।।

धर्ममेधमिमं प्राहु: समाधि यप्तोवित्तम।:।

वर्षत्येष यथा धमर्त्मृतधारा: सहसश:।। 38।।

अमुना वासनाजाले निःशेष प्रीवलायिते।

समूलोन्मूलिते. पुण्यपापाख्ये कर्मसंचये।। 39।।

वाक्यस्मृतिबद्धं सत् प्राक् परोक्षावमासते।

करामलकवद्बोधमपरोक्षं      प्रसूयते।। 40।। Continue reading

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ताओ उपनिषद–(भाग–6) प्रवचन–112

आक्रामक नहीं, आक्रांत होना श्रेयस्कर है—(प्रवचन—एकसौबारहवां)

 अध्याय 69

छद्मावरण

सैन्य रणनीतिज्ञों का यह सूत्र है:

मैं आक्रमण में आगे होने का साहस नहीं करता,

बल्कि आक्रांत होना पसंद करता हूं।

एक इंच आगे बढ़ने के बजाय

एक फुट पीछे हटना श्रेयस्कर है।

उसका अर्थ है: सैन्यदल के बिना कूच करना, आस्तीन नहीं समेटना,

सीधे हमलों से चोट नहीं करना, बिना हथियारों के हथियार-बंद रहना।

शत्रु की शक्ति को कम कर आंकने से बड़ा अनर्थ नहीं है;

शत्रु की शक्ति का अवमूल्यन मेरे खजाने नष्ट कर सकता है;

इसलिए जब दो समान बल की सेनाएं आमने-सामने होती हैं,

तब जो सदाशयी है, झुकता है, वह जयी होता है। Continue reading

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बिन बाती बिन तेल–(झेन कथा)प्रवचन–7

मनुष्य की जड़: परमात्मा—(प्रवचन—सातवां)

दिनांक 27 जून 1974(प्रातः),

श्री रजनीश आश्रम; पूना.

 भगवान!

किसी आदमी ने एक दिन एक पेड़ को काट लिया।

एक सूफी फकीर ने, जो यह सब देख रहे थे, कहा, ‘

इस ताजा डाल को तो देखो!

वह रस से भरा है और खुश है।

क्योंकि वह अभी नहीं जानता है कि काट डाला गया है।

हो सकता है यह इस भारी घाव से अनजान हो,

जो अभी-अभी इसे लगा है।

लेकिन थोड़े ही समय में वह जान जायेगा।

इस बीच तुम इसके साथ तर्क भी नहीं कर सकते। Continue reading

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बिन बाती बिन तेल–प्रवचन–6

प्रेम मृत्यु से महान है—(प्रवचन—छठवां)

दिनांक 26 जून 1974 (प्रातः),

श्री रजनीश आश्रम; पूना.

 भगवान!

किसी जमाने में एक शरीफ की बेटी थी–सौंदर्य में अप्रतिम।

रूप में ही नहीं, गुण-शील में भी उसका जोड़ नहीं था।

वह ब्याहने के योग्य हुई तब रूप-गुण में श्रेष्ठ

तीन युवकों ने उससे ब्याह का प्रस्ताव रखा।

यह देखकर कि तीनों युवक समान योग्यता के हैं,

पिता ने लड़की पर ही चुनाव का भार छोड़ दिया।

लेकिन महीनों तक लड़की कुछ तय नहीं कर पाई।

इस बीच वह अचानक बीमार पड़ी और मर गई।

बहुत शोकपूर्वक तीनों युवकों ने अपनी प्रेमिका को दफनाया। Continue reading

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अध्‍यात्‍म उपनिषद–प्रवचन–10

सत्‍य की यात्रा के चार चरण—(प्रवचन—दसवां)

 सूत्र :

इत्‍थं वाक्यैस्तदर्थानसंधानं श्रवणं भवेत।

युक्ता सभावितत्वा संधानं मननं तु तत्।। 33।।

ताभ्यां निर्विचिकित्‍सेकत्सेध्थें चेतस: स्थायितस्य तत्।

एकतानत्वमेतीद्ध निदिध्यासनमुच्यते।। 34।।

ध्यातृध्याने परित्यज्य क्रमाद्धयैयैकगे।चरम्।

निवातदीपवच्चितं समाधिरभिंधीयतै।। 35।।

 इस प्रकार’तत्त्वमसि‘ आदि वाक्यों द्वारा जीव—ब्रह्म की एकतारूप अर्थ का अनुसंधान करना, यह श्रवण है। और जो कुछ सुना गया है उसके अर्थ को युक्तिपूर्वक विचार करना, यह मनन है। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–4) प्रवचन–103

विराट की अभीप्‍सा—(अध्‍याय—9)—प्रवचन—चौथा

 सूत्र:

मयाध्‍यक्षेण प्रकृति: सूयतेसचाराचरम्।

हेतुनानेन कौन्तेय जगद्धइयीश्वर्त्से।। 10।।।

अवजानीन्त मां मूढ़ा मानुषी तनुमख्सिम् ।

परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्।। 11।।

मोघाशा मोघकर्माणो मोख्ताना विचेतस:।

राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मौहिनौं श्रिता:।। 12।।

और हे अर्जुन मुझ अधिष्ठता की उपस्थिति मात्र से यह मेरी प्रकृति अर्थात माया चराचर— सहित सर्व जगत को रचती है और इस ऊपर कहे हुए हेतु से ही यह जगत

बनता—बिखरता रहता है। Continue reading

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ताओ उपनिषद–(भाग–6) प्रवचन–111

असंघर्ष: सारा अस्तित्व सहोदर है—(प्रवचन—एकसौग्‍यहरवां)

 अध्याय 68

 असंघर्ष का सदगुण

वीर सैनिक हिंसक नहीं होता है;

अच्छा लड़ाका क्रोध नहीं करता है;

बड़ा विजेता छोटी बातों के लिए नहीं लड़ता है;

मनुष्यों का अच्छा प्रयोक्ता

अपने को दूसरों के नीचे रखता है।

– असंघर्ष का यही सदगुण है।

इसे ही मनुष्यों को प्रयोग करने की क्षमता कहते हैं; Continue reading

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अध्‍यात्‍म–उपनिषाद–प्रवचन–9

ब्रह्म की छाया संसार है—नौवां प्रवचन

 सूत्र :

 मायोपष्टिर्जगद्योंनि: सर्वज्ञत्वादिलक्षण:।

पारोक्ष्यशबल: सत्याद्यात्मकस्तत्पदत्मिधः।। 30।।

आलम्बतनया भाति योsस्मत्सत्ययशब्दये।:।

अंतःकरणसंत्मईन्नबा: एधः अ त्वपदत्मिधः।। 31।।

मायाऽविद्ये विहायैव उपाधी परजींवयो:।

अखंड सच्चिदानन्दं परं क्ल विलक्ष्मते।। 32।।

 मायारूप उपाधि वाला, जगत का उत्पत्ति स्थान, सर्वज्ञता आदि लक्षणों से युक्त, परोक्षपन से मिश्र और सत्य आदि स्वरूप वाला जो परमात्मा है, वही तत् शब्द से प्रसिद्ध है।

Continue reading

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बिन बाती बिन तेल–(ओशो) प्रवचन–5

जीवन एक वर्तुल है—(प्रवचन—पांचवां)

दिनांक 25 जून 1974 (प्रातः),

श्री रजनीश आश्रम; पूना.

भगवान!

आज एक लोककथा जैसी दिखने वाली सूफी कहानी का अर्थ

आप हमें समझाने की कृपा करें।

एक चोर चोरी के इरादे से खिड़की की राह, एक महल में घुस रहा था।

खिड़की की चौखट के टूटने से वह जमीन पर गिर पड़ा और उसकी टांग टूट गई।

चोर ने इसके लिए महल के मालिक पर अदालत में मुकदमा कर दिया।

गृहपति ने कहा, ‘इसके लिए तो चौखट बनाने वाले बढ़ई पर मुकदमा होना चाहिए।’

बढ़ई जब बुलाया गया, तब उसने कहा, ‘राज ने खिड़की का द्वार ठीक से नहीं बनाया Continue reading

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पतंजलि: योगसूत्र–(भाग–2) प्रवचन–33

दुःख का मूल : होश का अभाव और तादात्‍म्‍य—(प्रवचन—तैहरवां)

योगसूत्र

(साधनापाद)

अनित्याशुचिदु:खानात्‍मसु नित्यशुचिसुखात्मख्याति: अविद्या।। 5।।

अविद्या है—अनित्य को नित्य समझना, अशुद्ध को शुद्ध जानना, पीड़ा को सुख और

अनात्म को आत्म जानना।

दृग्‍दर्शनशक्‍त्योरेकात्‍मतेवास्सिता।। 6।।

अस्‍मिता है—दृष्‍टा का दृश्‍य के साथ तादात्‍म्‍य। Continue reading

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बिन बाती बिन तेल–(ओशो) प्रवचन–4

मृत शब्दों से जीवित सत्य की प्राप्ति असंभव—(प्रवचन—चौथा)

दिनांक २४ सितंबर, १९७४.

श्री ओशो आश्रम, पूना।

भगवान!

एक घुमक्कड़ साधु ने एक बूढ़ी स्त्री से तैजान का रास्ता पूछा। तैजान एक प्रसिद्ध मंदिर है और समझा जाता है कि वहां पूजा करने से विवेक की उपलब्धि होती है।

बूढ़ी स्त्री ने कहा: ‘सीधे आगे चले जाओ।’

जब साधु कुछ दूर गया था तो बुढ़िया ने स्वयं से कहा: ‘यह भी एक साधारण मंदिर जाने वाला है।’

किसी ने यह बात जोशू से कह दी।

जोशू ने कहा: ‘रुको, जब तक मैं जांच-पड़ताल न कर लूं।’

दूसरे दिन जोशू गया, उसने वही सवाल पूछा और बुढ़िया ने वही उत्तर दिया।

जोशू ने कहा: ‘मैंने उस बुढ़िया की जांच कर ली।’

 भगवान! इस पहेली जैसी झेन-कथा का अभिप्राय क्या है? Continue reading

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पतंजलि: योगसूत्र–(भाग–2) प्रवचन–32

संदेश्‍नशीलता, उत्‍सव और स्‍वीकार—प्रवचन—बाहरवां

प्रश्‍न—सार

1—अहंकार साथ है; कैसे समर्पण करूं?

 2—आप चेतना के शिखर है, इसलिए आप उत्‍सव मना सकते है, लेकिन एक साधारण आदमी कैसे उत्‍सव मना पायेगा?

 3—कई बार संवेदनशीलता के साथ नकारात्‍मक भाव क्‍यों उठते है?

4—संवेदनशीलता मुझे इंद्रिय—लोलुपता और भोगासक्‍ति में ले जाती है। Continue reading

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कौशल नरेश प्रसेनजित की हार और बुद्ध का उपदेश—(कथा—113)

एस धम्‍मो सनंतनो—(कथा—यात्रा)

 कौशलनरेश प्रसेनजित काशी के लिए अजातशत्रु से युद्ध करने में तीन बार हार गया। वह बहुत चिंतित रहने लगा। उसके पास कुछ कमी न थी बड़ा राज्य था उसके पास कौशल का पूरा राज्य उसके पास था लेकिन काशी खटकती थी। काशी पर किसी और का कब्जा यह खटकता था। उसके अपने कब्जे में बहुत था लेकिन जो दूसरे के कब्जे में था वह खटकता था। तीन बार उसने हमला किया काशी पर और तीनों बार हार गया। बहुत चिंतित रहने लगा। जब तीसरी बार भी हार हुई तो बात जरा सीमा के बाहर हो गयी उसके दर्प को बड़ा आघात पहुंचा। वह सोचने लगा मैं दुग्धमुख लड़के को भी न हरा सका ऐसे मेरे जीने से क्या! और अजातशत्रु अभी लड़का ही था अभी उसकी कोई खास उम्र भी न थी। और उस लड़के से बार— बार हार जाना पीड़ादायी हो गया Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–4) प्रवचन–102

जगत एक परिवार है(अध्‍याय—9)—प्रवचन—तीसरा

सूत्र:

सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृति यान्ति मामिकाम् ।

कल्पक्षये युनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्।। 7।।

प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य धिसृजामि पुन: पुन:।

भूतग्राममिमं कृल्लमवशं क्कृतैर्वशात्।। 8।।

न च मां तानि कमगॅण निबश्वन्ति धनंजय।

उदासीनवदासीनमसक्त तेषु कर्मसु।। 9।।

और हे अर्जुन कल्य के अंत में सब भूत मेरी प्रकृति की प्राप्त होते हैं अर्थात मेरी प्रकृति में लय होते हैं। और कल्य के आदि में उन्‍हें मैं फिर रचता हूं।

अपनी त्रिगुणमयी प्रकृति को अंगीकार करके स्वभाव के वश से परतंत्र हुए हम संपूर्ण भूत समुदाय को बारंबार उनके कर्मों के अनुसार रचता हूं। Continue reading

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बिन बाती बिन तेल–(ओशो) प्रवचन–3

ध्यान: एक अकथ कहानी—(प्रवचन—तीसरा)

दिनांक 23 जून 1974 (प्रातः),

श्री रजनीश आश्रम; पूना.

भगवान!

झेन संत, होजेन अपने शिष्यों से कहा करते थे, कि ध्यान उस आदमी की तरह है,

जो एक ऊंची चट्टान के किनारे खड़े वृक्ष को दांत से पकड़कर लटक रहा है।

न उसके हाथ किसी डाली को थामे हैं, और न उसके पांवों को ही कोई सहारा है।

और तभी चट्टान के किनारे खड़ा दूसरा आदमी उससे पूछता है,

‘बोधिधर्म भारत से चीन क्यों आये?’

यदि वह उत्तर नहीं देता है तो वह खो जायेगा और

अगर उत्तर देता है तो वह मर जायेगा।

वह क्या करे?

और भगवान! क्या ध्यान ऐसी असंभव साधना है

कि उपनिषद उसको छुरे की धार पर चलना कहते हैं? Continue reading

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पतंजलि–योगसूत्र–(भाग–2) प्रवचन–31

सहजता—स्‍वाध्‍याय—विसर्जन—(प्रवचन—ग्‍याहरवां)

योगसूत्र

(साधनपाद)

तप:स्वाध्यायेश्‍वरप्रणिधानानि क्रियायोग:।। 1।।

 क्रियायोग एक, प्रायोगिक, प्राथमिक योग है और वह संधटित हुआ है— सहज संयम (तप), स्वाध्याय और ईश्वर के प्रति समर्पण से।

‘समाधिभावनार्थ: क्लेउशतनूकरणार्थश्‍च।। 2।।

क्रियायोग का अभ्यास क्लेश (दुःख) को घटा देता है। और समाधि की ओर ले जाता है।

अविद्यास्‍मितारागद्वेषाभिनिवेशा: क्लेशा:।। 3।।

दु:ख उत्‍पन्‍न होने के कारण है: जागरूकता की कमी, अहंकार, मोह, घृणा, जीवन से चीपके रहना और मृत्‍यु भय।

 अविद्या क्षेत्रमुत्‍तरेषां प्रसुप्‍ततनुविच्‍छिन्‍नोदाराणाम।। 4।। Continue reading

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अध्‍यात्‍म–उपनिषाद–(प्रवचन–8)

वैराग्‍य का फल ज्ञान है—आठवां प्रवचन

 सूत्र :

चित्तमूलो विकल्येष्यं चित्तभावे न कश्चन।

अतश्चित्तं समोधोहि प्रत्‍यग्रूपे परत्श्मिनि। 26।।

अखडानंदमात्मनं विज्ञाय स्वस्वरूपत:।

बहिरंत: सदानंदरसास्यादनमात्मीन।। 27।।

वैरण्यस्य फलं बोधो बोधस्योपरीत: फलम्।

स्यानंदानुभवाच्छान्तिरेषैवोपरते: फलम्।। 28।।

यद्युत्तरोत्तरभावे पूर्वपूर्वं तु निष्फलम्।.

निवृफ्रि परमा तृप्‍तिरानन्द।एऽनुपम: स्वत:।। २९।।.

इस विकल्प (भेद) का मूल चित्त है, अगर चित्त न हो तो कोई भेद है ही नहीं, इसलिए प्रत्यक स्‍वरूप परमात्मा में तू चित्त को एकाग्र कर दे। Continue reading

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भगवान का पंचशाला में भिक्षाटन और शैतान का जाल—(कथा—112)

एस धम्‍मो सनंतनो—(कथा—यात्रा)

 क दिन भगवान पंचशाला नामक ब्राह्मणों के गांव में भिक्षाटन के लिए गए। मार ने— शैतान ने— पहले ही ग्रामवासियों में आवेश कर ऐसा किया कि भगवान को किसी ने कलछी मात्र भी भिक्षा न दी। फिर जब भगवान खाली पात्र गांव के बाहर आने लगे तब मार आया और बोला क्या श्रमण! कुछ भी भिक्षा नहीं मिली? बुद्ध ने कहा नहीं तू सफल रहा और मैं भी सफल हूं मार समझा नहीं। बोला यह कैसे? या तो मैं सफल या आप सफल। दोनों साथ— साथ कैसे सफल हो सकते हैं! यह तो आप बड़ी तर्कहीन बात कर रहे हैं। बुद्ध ने हंसकर कहा नहीं तर्कहीन नहीं है। तू सफल हुआ लोगों को भ्रष्ट करने में भ्रमित करने में मैं सफल हुआ अप्रभावित रहने में। और यह भोजन से भी ज्यादा पुष्टिदायी है। Continue reading

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रोहिणी नदी पर विवाद—(कथा—111)

एस धम्‍मो सनंतनो—(कथा—यात्रा)

 शाक्य और कोलीय राज्यों के बीच रोहिणी नामक नदी के पानी को रोककर दोनों जनपदवासी खेतों की सिंचाई करते थे। एक बार ज्येष्ठ मास में फसल के सूखने को देखकर दोनों जनपदवासी शाक्य और कोलियों के नौकर अपने—अपने खेतों की सिंचाई करने के लिए रोहिणी नदी पर आए। दोनों ही पहले अपने खेतों को सींचना चाहते हैं अत: दोनों में झगड़ा हो चला। यह समाचार उनके मालिक शाक्य और कोलियों को मिला। क्षत्रिय तो क्षत्रिय! तलवारें निकल गयीं। वे सेना को साथ लेकर तैयार होकर युद्ध करने के लिए निकल पड़े भगवान बुद्ध रोहिणी तट पर ही ध्यान करते थे। उन्हें यह खबर मिली। वे आकर युद्ध को तत्पर दोनों सेनाओं के मध्य मे खड़े हो गए। शाक्य और कोलियों ने भगवान को देखकर हथियार फेंक वंदना की। Continue reading

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अध्‍यात्‍म–उपनिषाद–प्रवचन–7

चैतन्‍य का दर्पण—(प्रवचन—सातवां)

 सूत्र :

स्वात्‍मन्यारोपितशेषाभासवस्तुनिरासित:।

स्वयमेव परब्रह्म पूर्णम्हयमीक्रयम्।। 21।।

असत्कल्पो विकल्पो यं विश्वीमत्येकवस्तुनि।

निर्विकारे निराकरे निर्विशेषेर्भिदा कुत:।। 22।।

द्रष्टा दर्शनदृश्याटिभावशन्ये निरामये।

कल्यार्णव इवात्यन्तं परिपूणें चिदात्‍मनि।। 23।।

तेजसींव तमो यत्र विलीनं भ्रांतिकारणम्।

अडइत।ईये परे तन्वे निर्विशेषेर्भिदा कुतः।। 24।।

एकतमके परे तन्वे भेदकर्ता कथं वमेत्।

सुषुप्तौ सुखमात्रायां भेद: केनावलोकित:।। 25।।

अपनी आत्मा में ही सब वस्तुओं का आभास केवल आरोपित है, उसको दूर करने से स्वयं ही पूर्ण अद्वैत और क्रिया—शून्य परब्रह्म बन सकता है। Continue reading

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पतंजलि: योगसूत्र–(भाग–2) प्रवचन–30

जीवन को बनाओ एक उत्‍सव—(प्रवचन—दसवां)

प्रश्‍न—सार

1—इक्कीस मार्च उन्नीस सौ तिरपन को आपको सबीज समाधि घटित हुई थी अथवा कि      निर्बीज?

 2—कृपया समझाइये कि निर्बीज समाधि में बीज कैसे जल जाता है?

 3—आपके पास कई गंभीर संन्यासी इकट्ठे हो गये हैं, आप उनके लिए क्या कहना चाहेंगे?

 4: मैं कभी सजग होता हूं और कभी असजग! ऐसा क्यों है?

 5— प्रेम और ध्यान पर बातें करते समय बहुत बार असंगत क्यों हो जाते हैं?

 6:’ क्या आप फिर से एक और जन्‍म ले सकते है? Continue reading

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बिन बाती बिन तेल–प्रवचन–2

मन की आंखें खोल—(प्रवचन—दूसरा)

दिनांक 22 जून 1974 (प्रातः),

श्री रजनीश आश्रम; पूना.

 भगवान!

एक अंधा आदमी अपने मित्र के घर से रात के समय विदा होने लगा तो

मित्र ने अपनी लालटेन उसके हाथ में थमा दी।

अंधे ने कहा,’मैं लालटेन लेकर क्या करूं? अंधेरा और रोशनी दोनों मेरे लिए बराबर हैं।’

मित्र ने कहा,’रास्ता खोजने के लिए तो आपको इसकी जरूरत नहीं है,

लेकिन अंधेरे में कोई दूसरा आपसे न टकरा जाये

इसके लिये यह लालटेन कृपा करके आप अपने साथ रखें।

अंधा आदमी लालटेन लेकर जो थोड़ी ही दूर गया था कि एक राही उससे टकरा गया।

अंधे ने क्रोध में आकर कहा, ‘देखकर चला करो। यह लालटेन नहीं दिखाई पड़ती है क्या?’

राही ने कहा, ‘भाई तुम्हारी बत्ती ही बुझी हुई है।’

भगवान! कृपापूर्वक इस कहानी का मर्म हमें समझायें। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–4) प्रवचन–101

अतर्क्‍य रहस्‍य में प्रवेश—(अध्‍याय—9) प्रवचन—दूसरा

सूत्र:

मया ततमिदं सर्व जगदस्थ्यमूर्तिना।

मत्‍स्‍थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्यवीस्थ्य:।। 4।।

न च मत्‍स्‍थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्।

भूतभृन्‍न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावन:।। 5।।

यथाकाशीस्थ्योनित्यं वायु: सर्वन्‍नगो महान्।

तथा सर्वाणि भूतानि मत्‍स्‍थानीत्युयधारय ।। 6।।

और हे अर्जुन मेरे अव्‍यक्‍त स्वरूय से यह सब जगत परिपूर्ण है और सब भूत मेरे में स्थित हैं। इसलिए वास्तव में मैं उनमें स्थित नही हूं।और वे सब भूत मेरे में स्थित नहीं है, मेरे

योग—सामथ्‍र्य को देख कि भूतों को धारण—पोषण करने वाला और भूतों को उत्पन्न करने वाला भी मेरा आत्‍मा वास्तव में भूतों में स्थित नहीं है। Continue reading

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बिन बाती बिन तेल–(ओशो) प्रवचन–1

 बिन बाती बिन तेल

सूफी, झेन एवं उपनिषाद की कहानियों एवं बोध—कथाओं पर ओशो के सुबोधगम्‍य 19 अमृत प्रवचनों की शृंखला (जून—जूलाई 1974)

 जो भी हम जानते है, जिन दियों से भी हमारा परिचयहै, वे सभी तेल से जलते है; उन सभी में बातीकी जरूरत होती है। अकारण हमारी जानकारी में कुछ भी नहीं।आग जलेगी तो ईंधन होगा। आदमी चलेगा तो भोजनजरूरी होगा। भोजन ईंधन है। जो भी हम जानते है, जो भी हमारा ज्ञान है। वह सभी कारण से बंधा है।…..

उस अगम अगोचर को जो दीया है, परमात्‍मा की जो ज्‍योति है, वह बिना बाती बिना तेल के जल रही है। जीवन का न कोई उदगमहै। न कोई अंत। न जीवन को कोई स्‍त्रोत न कोई समाप्‍ति। न तो जीवन का कोई प्रारंभ है। और न ही कोई पूर्णहुति, बस जीवन चलता चला जाता है। और यह दीया बाहर ही नहीं जल रहा है। यह दीया भीतर भी जल रहा है। यह दीया है सब तरफ। एक ही ज्‍योति जल रही है। हम सब एक ही ज्‍योति की अलग—अलग लपटें है। लपटें जलेंगी, बुझेंगी; जो स्‍त्रोत है अग्‍नि का, वह शाश्‍वत है।……..

ओशो Continue reading

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संसार में सुख क्‍या है, भिक्षुओं की चर्चा का विषय—(कथा—110)

एस धम्‍मो सनंतनो—(कथा—यात्रा)

 ‘बुद्धों का उत्पन्न होना सुखदायी है, सद्धर्म का उपदेश सुखदायी है, संघ में एकता सुखदायी है, एकतायुक्त तप सुखदायी है।’

 दूसरे सूत्र की परिस्थिति—कब बुद्ध ने यह गाथा कही?

एक दिन बहुत से भिक्षु बैठे बातें कर रहे थे। उनकी चर्चा का विषय था संसार में सुख क्या है? किसी ने कहा राज्य— सुख के समान दूसरा सुख नहीं। और किसी ने कहा कामसुख के सामने राजसुख में क्या रखा है! कामसुख की बड़ी प्रशंसा की। और किसी और ने यश की प्रशंसा की और किसी और ने पद की फिर कोई भोजनभट्ट था उसने भोजन की खूब चर्चा की। Continue reading

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