मैं मृत्‍यु सिखाता हूं–ओशो

मैं मृत्‍यु सिखाता हूं

(ओशो)

प्रसतावना:

जीवन के गर्भ में क्‍या छुपा है उसकी शुन्‍य अंधेरी तलहेटी की जड़े किस स्‍त्रोत की और बह रही है…..कहां से और किन छुपे रहस्‍यों से उनको पोषण मिल रहा है….ये कुदरत का एक अनुठाओर अनसुलझा रहस्‍य है। और यही तो है जीवन का आंनद….लेकिन न जाने क्‍या हम इस रहस्‍य को जानना चाहते है, कभी ज्‍योतिष के माध्‍यम से, कभी दिव्‍य दृष्‍टी या और तांत्रिक माध्‍यमों से परंतु सब नाकाम हो जाते है। और कुदरत अपने में अपनी कृति को छपाये ही चली आ रही है।

ठीक इसी तरह कभी नहीं सूलझाया जा सकता उस रहस्‍य का नाम परमात्‍मा है। परंतु कृति के परे प्रकृति और कही दूर अनछुआ सा कर्ता जो पास से भी पास और दूर से भी दूर। परंतु जब कृति जब प्रकृति में उतपति ओर लवलीन होती है, तब हम ठगे से सोचते है ये क्‍या इस बीज में कैसे हो सकता है इतना विशाल वृक्ष….कोई बुद्धि मानने को तैयार नहीं होती। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–8) प्रवचन–218

मनन और निदिध्‍यासन—(प्रवचन—बीसवां)

अध्‍याय—18

सूत्र–

कच्चिदेतव्छ्रुतं पार्थ त्‍वयैकाग्रेण चेतसा।

कच्चिमानसंमोह: मनष्टस्ते धनंजय।। 72।।

 अर्जन उवाच:

नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्‍धा त्‍वत्ससादान्मयाव्युत।

स्थितोऽस्मि गतसन्देह: करिष्‍ये वचनं तव।। 73।।

इस प्रकार गीता का माहात्म्य कहकर भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से पूछा, है पार्थ, क्या यह मेरा वचन तूने एकाग्र चित्त से श्रवण किया? और हे धनंजय, क्या तेरा स्नान से उत्पन्न हुआ मोह नष्ट हुआ?

इस प्रकार भगवान के पूछने पर अर्जुन बोला, हे अच्‍युत, आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है और मुझे स्मृति प्राप्त हुई है, इसलिए मैं संशयरहित हुआ स्थित हूं और आपकी आज्ञा पाल करूंगा। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–8) प्रवचन–217

गीता—ज्ञान—यज्ञ—(प्रवचन—उन्‍नीसवां)

अध्‍याय—18

सूत्र—

अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयो:।

ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्ट स्‍यामिति मे मति:।। 70।।

श्रद्धावाननसूयश्च श्रृणुयादीय यो नर:।

सोऽपि मुक्त: शुभाँल्लोकान्प्राम्नुयात्पुण्यकर्मणाम्।। 71।।

तथा हे अर्जुन, जो पुरूष इस धर्ममय हम दोनों के संवाद— रूप गीता को पढ़ेगा अर्थात नित्य पाठ करेगा, उसके द्वारा मैं ज्ञान— यज्ञ से पूजित होऊंगा, ऐसा मेरा मत है।

तथा जो पुरूष श्रद्धायुक्त और दोष— दृष्टि से रहित हुआ इस गीता का श्रवण— मात्र भी करेगा, वह भी पापों से मुक्‍त हुआ पुण्य करने वालों के श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त होवेगा। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–8) प्रवचन–216

आध्‍यात्‍मिक संप्रेषण संप्रेषण की गोपनीयता—(प्रवचन—अठारहवां)

अध्‍याय—18

सूत्र—

हदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन।

न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्‍यसूयीत।। 67।।

य इमं परमं गुह्मं मद्भक्तेम्बीभधास्यति।

भक्‍ति मयि परां कृत्या मामैवैष्यत्यसंशय:।। 68।।

न च तस्मान्मनुष्येधु कीश्चन्मे प्रियकृत्तम:।

भविता न च मे तस्मादन्य: प्रियतरो भुवि।। 69।।

है अर्जुन, हस कार तेरे खत के लिए कहे हुए इस गीतारूप परम रहस्य को किसी काल में भी न तो तपरहित मनुष्य के प्रति कहना चाहिए और न भक्तिरीहत के प्रति तथा न बिना सुनने की इच्छा वाले के प्रति ही कहना चलिए; एवं जो मेरी निंदा करता है उसके प्रति भी नहीं कहना चाहिए।

क्योंकि जो पुरुष मेरे में परम प्रेम करके इस परम गुह्म रहस्य गीता को मेरे भक्तों में कहेगा, वह निस्संदेह मेरे को ही प्राप्त होगा।

और न तो उससे बढ़कर मेरा अतिशय प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई है, और न उससे बढ़कर मेरा अत्यंत प्यारा पृथ्वी में दूसरा कोई होवेगा। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–8) प्रवचन–215

समर्पण का राज–(प्रवचन—सत्रहवां)

अध्‍याय—18

सूत्र—

सर्वगुह्मतमं भूय: श्रृणु मे परमं वचः।

हष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्।। 64।।

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।

मामैवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे।। 65।।

सर्वधर्मान्परित्‍यज्य मामेकं शरणं ब्रज।

अहं त्वा सर्वपापेध्यो मीक्षयिष्यामि मा शुचः।। 66।।

इतना कहने पर भी अर्जुन का कोई उत्तर नहीं मिलने के कारण श्रीस्कृष्ण भगवान फिर बोले कि है अर्जुन, संपूर्ण गोयनीयों से भी अति गोयनीय मेरे परम रहस्ययुक्त वचन को तू फिर भी सुन, क्योंकि तू मेरा अतिशय प्रिय है, हमसे यह परम हितकारक वचन मैं तेरे लिए कहूंगा।

है अर्जुन, तू केवल मुझ परमात्मा में ही अनन्य प्रेम से नित्य— निरंतर अचल मन वाला हो और मुझ पश्मेश्वर को ही अतिशय श्रद्धा— भक्‍ति सहित निरंतर भजने वाला हो तथा मन, वाणी और शरीर द्वारा सर्वस्व अर्पण करके मेरा पूजन करने वाला हो और सर्वगुण— संपन्‍न सके आश्रयरूप वासुदेव को नमस्कार कर; ऐसा करने से तू मेरे को ही प्राप्त होगा, यह मैं तेरे लिए सत्य प्रतिज्ञा करता हूं, क्योंकि तू मेरा अत्यंत प्रिय सखा है।

इसलिए सब धर्मों की अर्थात संपूर्ण कर्मो के आश्रय को त्यागकर केवल एक मुझ सव्चिदानंदघन वासुदेव परमात्मा की ही अनन्य शरण को प्राप्त हो? मैं तेरे को संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूंगा; तू शोक मत कर। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–8) प्रवचन–214

संसार ही मोक्ष बन जाए—(प्रवचन—सोलहवां)

अध्‍याय—18

सूत्र—

यदहंकारमाश्रित्य न योत्‍स्‍य इति मन्यसे।

मिथ्‍यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्थ्यां नियोक्ष्यति।। 59।।

स्वभावजेन कौन्तेय निबद्ध: स्वेन कर्मणा।

कर्तुं नेच्छीस यन्महात् कीरष्यवशेउपि तत्।। 60।।

र्इश्वर: सर्वभूतानां हद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।

भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।। 61।।

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।

तत्‍प्रसादात् परां शान्ति स्थानं प्राप्‍स्‍यसि शाश्वतम।। 62।।

इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्माशह्यतरं मया।

विमृश्यैतदशेषेण यथेच्‍छसि तथा कुरु।। 63।।

और जो तू अहंकार को अवलंबन करके ऐसे मानता है कि मैं युद्ध नहीं करूंगा, तो यह तेरा निश्चय मिथ्या है, क्योंकि क्षत्रियपन का स्वभाव तेरे को जबरदस्ती युद्ध में लगा देगा। और हे अर्जुन, जिस कर्म को तू मोह से नहीं करना चाहता है उसको भी अपने पूर्वकृत स्वाभाविक कर्म से बंधा हुआ परवश होकर करेगा।

क्योंकि है अर्जुन, शारीररूप यंत्र में आरूढ़ हुए, अंपूर्ण प्राणियों को परमेश्वर अपनी माया से, उनके कर्मों के अनुसार भ्रमाता हुआ, सब भूत—प्राणियों के ह्रदय में स्थित है।

इसलिए हे भारत, सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही अनन्य शरण को प्राप्त हो? उस परमात्मा कीं कृपा से ही परम शांति को और सनातन परम धाम को प्राप्त होगा।

इस प्रकार यह गोयनीय से भी अति गोपनीय ज्ञान मैने तेरे लिए कहा। इस रहस्ययुक्त ज्ञान को संपूर्णता से अच्छी प्रकार विचार करके, फिर तू जैसा चाहता है? वैसा ही कर। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–8) प्रवचन–213

गीता—पाठ और कृष्‍ण–पूजा—(प्रवचन—प्रंदहवां)

अध्‍याय—18

सूत्र—

ब्रह्मभूत: प्रसन्‍नत्‍मा न शोचिई न काङ्क्षति।

सम: सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते यराम्।। 54।।

भक्त्‍या मामीभजानाति यावान्यश्चास्मि तत्वत:।

ततो मां तत्‍वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्।। 55।।

सर्क्कर्माण्यीप सदा कुर्वाणो मद्व्ययाश्रय:।

मत्प्रसादादवानोति शाश्वतं पदमध्ययम्।। 56।।

चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्‍पर:।

बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्‍चित्त: सततं भव।। 57।।

मच्चित: सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तश्ष्यिसि।

अथ चेत्त्वमहंकारान्‍न श्रोष्यीस विनङ्क्ष्‍यसि।। 58।।

फिर वह सच्चिदानंदघन ब्रह्म में एकीभाव से स्थित हुआ प्रसन्नचित्त वाला पुरुष न तो किसी वस्तु के लिए शोक करता है और न किसी की आकांक्षा ही करता है एवं सब भूतों में समभाव हुआ मेरी परा— भक्‍ति को प्राप्त होता है।

और उस परा— भक्‍ति के द्वारा मेरे को तत्व से भली प्रकार जानता है कि मैं जो और जिस प्रभाव वाला हूं तथा उस भक्ति से मेरे को तत्व से जानकर तत्काल ही मेरे मैं प्रविष्ट हो जाता है।

और मेरे परायण हुआ निष्काम कर्मयोगी संपूर्ण कर्मों की सदा करता हुआ भी मेरी कृपा से सनातन अविनाशी परम पद को प्राप्त हो जाता है।

इसिलए है अर्जुन, तू सब कर्मों को मन से मेरे में अर्पण करके मेरे परायण हुआ समत्वबुद्धिरूप निष्काम कर्मयोग को आलंबन करके निरंतर मेरे में चित्त वाला हो।

इस प्रकार तू मेरे में निरंतर मन वाला हुआ, मेरी कृपा से जन्म—मृत्‍यु आदि सब सकंटों को अनायास ही तर जाएगा। और यदि अहंकार के कारण मेरे वचनों को नहीं सुनेगा, तो नष्ट हो जाएगा अर्थात परमार्थ से भ्रष्ट हो जाएगा। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–8) प्रवचन–212

पात्रता और प्रसाद—(प्रवचन—चौदहवां)

अध्‍याय—18

सूत्र—

अमक्तबुद्धि: सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः।

नैष्कर्म्यतिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगव्छीत।। 49।।

सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाम्नोति निबोध मे।

समामेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या पर।।। 50।।

बुद्धया विशुद्धया युक्‍तो धृत्यात्मानं नियम्य च।

शब्दादीन्त्रिषयांस्‍त्‍यक्‍त्‍वा राग्द्धेशै व्युदस्य च।। 51।।

विविक्तसेवी लथ्वाशी यतवाक्कायमानस।

ध्यानयोगयरो नित्यं वैराग्य समुपाश्रित:।। 52।।

अहंकार बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्।

विमुव्य निर्मम: शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते।। 53।।

तथा है अर्जुन, सर्वत्र आसक्तिरहित बुद्धिवाला, स्‍पृहारहित और जीते हुए अंतकरण वाला पुरुष संन्यास के द्वारा भी परम नैष्कर्म्य सिद्धि को प्राप्त होता है अर्थात क्रियारहित हुआ शुद्ध सच्चिदानंदघन परमात्मा की प्राप्ति रूप परम सिद्धि को प्राप्त होता है।

इसलिए हे कुंतीपुत्र, अंतःकरण की शुद्धिरूप सिद्धि को प्राप्त हुआ पुरुष जैसे सच्चिदानंदधन ब्रह्म को प्राप्त होता है तथा जो तत्वज्ञान की परा— निष्ठा है, उसको भी तू मेरे से संक्षेय में जान।

हे अर्जुन, विशुद्ध बुद्धि से युक्त, एकांत और शुद्ध देश का सेवन करने वाला तथा मिताहारी जीते हुए मन, वाणी व शरीर वाला और दृढ वैराग्य को भली प्रकार प्राप्त हुआ पुरुष निरंतर ध्यान— योग के परायण हुआ सात्‍विक धारणा से अंतःकरण को वश में करके तथा शब्दादिक विषयों को त्यागकर और राग—द्वेष की नष्ट करके तथा अहंकार, बल घमंड, काम, क्रोध और परिग्रह, को त्यागकर मम्‍तारहित और शांत हुआ सच्चिदानंदघन ब्रह्म में एकीभाव होने के लिए योग्य होता है। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–8) प्रवचन–211

स्‍वधर्म, स्‍वकर्म और वर्ण—(प्रवचन—तेरहवां)

अध्‍याय—18

सूत्र—

स्‍वे स्वे कर्मण्यभिरत: संसिद्धिं लभते नर:।

स्वकर्मनिरत: सिद्धिं यथा विन्दति तव्छृणु।। 45।।

यत: प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।

स्वकर्मणा तमथ्यर्ब्य सिद्धिं विन्दति मानव:।। 46।।

श्रेयाक्यधर्मा विगुणः परधर्माफ्लनुष्ठितात्।

स्वभावनिक्तं कर्म कुर्वब्रानोति किल्‍बिषम्।। 47।।

सहजं कर्म कौन्तेय सदोश्मीय न त्यजेत्।

सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृता:।। 48।।

एवं इस अपने—अपने स्वाभाविकि कर्म में लगा हुआ मनुष्य भगवत्प्राप्‍तिरूप परम सिद्धि को प्राप्त होता है। परंतु जिस प्रकार से अपने स्वाभाविक कर्म मैं लगा हुआ मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त होता है, उस विधि को तू मेरे से सुन। हे अर्जुन, जिस परमात्मा से सर्व भूतों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह सर्व जगत व्याप्त है, उस परमेश्वर को अपने स्वाभाक्कि कर्म द्वारा पूजकर मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त होता हे।

इसलिए अच्छी कार आचरण किए हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है क्योंकि स्वभाव से नियत किए हुए स्वधर्मरूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त होता।

अतएव है कुंतीपुत्र, दोषयुक्त भी स्वाभाविक कर्म को नहीं त्यागना चाहिए क्योंकि धुएं से अग्नि के सदृश सब ही कर्म किसी न किसी दोष से आवृत हैं। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–8) प्रवचन–210

गुणातीत है आनंद—(प्रवचन—बारहवां)

अध्‍याय—8

सुत्र—

ब्रह्यणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतय।

कर्माणि प्रीवभक्तानि स्वभाअभवैर्गुणै।। 41।।

शमो दमस्तप: शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।

ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ।। 42।।

शौर्य तेजी धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्‍यपलायनम्।

दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्।। 43।।

कृषिगौरमवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्।

परिचर्यात्क्कं कर्म शूद्रस्‍यापि स्वभावजम्।। 44।।

इसलिए हे परंतप, ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यों के तथा शूद्रों के भी कर्म स्वभाव से उत्पन्न हुए गुणों के आधार पर विभक्त किए गए हैं।

शम अर्थात अंतःकरण का निग्रह, दम अर्थात इंद्रियों का दमन, शौच अर्थात बाहर— भीतर की शुद्धि, तय अधर्म धर्म के लिए कष्ट सहन करना, क्षांति अर्थात क्षमा— भाव एवं आर्जव अर्थात मन, इंद्रिय और शरीर की सरलता, आस्तिक बुद्धि, ज्ञान और विज्ञान, ये तो ब्रह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं। और शौर्य, तेज, धृति अर्थात धैर्य, चतुरता और युद्ध में भी न भागने का स्वभाव एवं दान और स्वामी— भाव, ये सब क्षत्रिय के स्वाभाक्कि कर्म हैं।

तथा खेती, गौपालन और क्रय— विक्रय रूप सत्य व्‍यवहार, वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं। और सब वर्णो की सेवा करना, यह शूद्र का स्वाभाक्कि कर्म है। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–8) प्रवचन–209

तामस, राजस और सात्‍विक सुख—(प्रवचन—ग्‍यारहवां)

अध्‍याय—18

सूत्र—

सुखं त्विदानीं त्रिविधं मृणु मे भरतर्षभ।

अभ्यासद्रमते यत्र दुखान्तं च निगच्‍छति।। 36।।

यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतीयमम्।

तत्सुखं सात्‍विक प्रोक्तमात्मबुध्यिसादजम्।। 37।।

विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोयमम्।

परिणामे विषीमव तत्सुखं राजसं स्मृतम्।। 38।।

यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मन।

निद्रलस्थ्यमादोत्‍थं तत्‍तामसमुदाह्रतम्।। 39।।

न तदस्ति पृथ्‍विव्यां वा दिवि दैवेषु वा पुन:।

सत्वं प्रकृतिजैर्मुक्‍तं यदैभि:स्यत्मिभिर्गुणै।। 40।।

है अर्जुन, अब सुख भी तू तीन प्रकार का मेरे से सुन। हे भरतश्रेष्ठ, जिस सुख में साधक पुरूष ध्यान, उपासना और सेवादि के अभ्यास से रमण करता है और दुखों के अंत को प्राप्त होता है, वह सुख प्रथम साधन के आरंभ काल में यद्यपि विष के सदृश भासता है, परंतु परिणाम में अमृत के तुल्‍य है। इसलिए जो आत्‍मबुद्धि के प्रसाद से उत्पन्‍न हुआ सुख है वह सात्‍विक कहा गया है।

और जो सुख विषय और इंद्रियों के संयोग से होता है यद्यपि भोग काल के सदृश भासता है, परंतु परिणाम में विष काल अमृत सदृश भासता है, परंतु परिणाम में विष के सदृश है इसलिए वह सुख राजस कहा गया है।

तथा जो सुख भोग काल में और परिणाम में भी आत्मा को मोहने वाला है, वह निद्रा आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न हुआ सुख तामस कहा गया है।

और हे अर्जुन, पृथ्वी में या स्वर्ग में अथवा देवताओं में ऐसा वह कोई भी प्राणी नहीं है कि जो इन प्रकृति से उत्पन्न हुए तीनों गुणों मे रहित हो। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–8) प्रवचन–208

गुरु पहला स्‍वाद है–(प्रवचन—दसवां)

अध्‍याय—18

सूत्र—

धृत्या यया धारयते मनप्राणेन्द्रियक्रिया:।

योगेनाथ्यमिचारिण्या धृति: सा पार्थ सात्‍विकी।। 33।।

यया त धर्क्कामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जन।

प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृति: सा पार्थ राजसी।। 34।।

यया स्वप्‍नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।

न विमुज्‍चति दुमेंधा धृति: आ पार्थ तामसी।। 35।।

और है पार्थ, ध्यान— योग के द्वारा जिस अव्‍यभिचारिणी धृति अर्थात धारणा से मनुष्य मन, प्राण और इंद्रियों की क्रियाऔं को धारण करता है, वह धृति तो सात्‍विकी है।

और है पृथापुत्र अर्जुन, फल की इच्‍छा वाला मनुष्य अति आसक्ति से जिस धृति के द्वारा धर्म, अर्थ और कामों को धारण करता है, वह धृति राजसी है।

तथा हे पार्थ, दुष्ट बुद्धि वाला मनुष्य जिस धृति अर्थात धारणा के द्वारा निंद्रा, भय और दुख को एवं उन्मत्तता को भी नहीं छोड़ता है अर्थात धारण किए रहता है, वह धृति तामसी है। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–8) प्रवचन–207

तीन प्रकार की बुद्धि—(प्रवचन—नौवां)

अध्‍याय—18

सूत्र—

बुद्धेभेंदं धृतेश्चैव गुणतीस्त्रीवधं श्रृणु।

प्रौच्‍यमानमशेषेण पृथक्त्‍वेन धनंजय।। 29।।

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्यास्कीयें भयाभये।

बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धि: सा पार्थ सात्त्विकी।। 30।।

यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च।

अयथावत्प्रजानाति बुद्धि: सा पार्थ राजसी।। 31।।

अधर्म धर्ममिति या मन्यते तमसावृता।

सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धि: सा पार्थ तामसी।। 32।।

तथा हे अर्जुन, तू बुद्धि का और धारणा— शक्ति का भी गुणों के कारण तीन प्रकार का भेद संपूर्णता से विभागपूर्वक मेरे से कहा हुआ सुन।

हे पार्थ, प्रवृत्ति— मार्ग और निवृत्ति— मार्ग को तथा कर्तव्य और अकर्तव्य को एवं भय और अभय को तथा बंधन और मोक्ष को जो बुद्धि तत्व से जानती है, वह बुद्धि तो सात्‍विक है। और है पार्थ, जिस बुद्धि के द्वारा मनुष्य धर्म और अधर्म की तथा कर्तव्य और अकर्तव्य को भी यथार्थ नहीं जानता ह्रै वह बुद्धि राजसी है।

और है अर्जुन, जो तमोगुण से आवृत हुई बुद्धि अधर्म को धर्म ऐसा मानती है तथा और भी संपूर्ण अर्थों को विपरीत ही मानती है, वह बुद्धि तामसी है। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–8) प्रवचन–206

समाधान और समाधि—(प्रवचन—आठवां)

अध्‍याय—18

सूत्र—

मुक्ततङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वित:।

सिद्धयसिद्धयोर्निर्विकार: कर्ता सात्विक उच्यते।। 26।।

रागी कर्मफन्सेप्सुरर्लब्‍धो हिंसात्क्कोऽशुचि:

हर्षशक्रोन्वित: कर्ता राजस: परिर्कीर्तित:।। 27।।

अयुक्त: प्राकृत: स्तब्ध: शठो नैष्कृतिकोऽलस:।

विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्‍यते।। 28।।

तथा हे अर्जुन, जो कर्ता आसक्‍ति से रहित और अहंकार के वचन न बोलने वाला, धैर्य और उत्साह से युक्त एवं कार्य के सिद्ध होने और न होने में हर्ष— शोकादि विकारों से रहित है, वह कर्ता तो सात्‍विक कहा गया है।

और जो आसक्‍ति से युक्‍त कर्मों के कल को चाहने वाला और लोभी है तथा दूसरों को कष्ट देने के स्वभाव वाला, अशुद्धाचारी और हर्ष— शोक से लिपायमान है, वह कर्ता राजस कहा गया है।

तथा जो विक्षेपयुक्‍त चित्त वाला, शिक्षा से रहित, धमंडी, धूर्त और दूसरे की आजीतिका का नाशक एवं शौक करने के स्वभाव वाला, आलसी और दीर्घसूत्री है, वह कर्ता तामस कहा जाता है। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–8) प्रवचन–205

तीन प्रकार के कर्म—(प्रवचन—सातवां)

अध्‍याय—18

सूत्र—

नियतं सङ्गरहितमराग्डेषत: कृतम्।

अफत्नप्रेप्‍सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्‍यते।। 23।।

यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुन:।

क्रियते बहलायासं तद्राजममुदह्रतम्।। 24।।

अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरूषम्।

मोहादारभ्‍यते कर्म यत्तत्तामसमुव्यते।। 25।।

तथा हे अर्जुन, जो कर्म शास्त्र— विधि से नियत किया हुआ और कर्तापन के अभिमान से रहित, फल को न चाहने वाले पुरूष द्वारा बिना राग—द्वेष से किया हुआ ह्रै वह कर्म तो सात्विक कहा जाता है।

और जो कर्म बहुत परिश्रम से युक्त है तथा कल को चाहने वाले और अहंकारयुक्‍त पुरूष द्वारा किया जाता है, वह कर्म राजस कहा गया है।

तथा जो कर्म परिणाम, हानि हिंसा और सामर्थ्य को न विचारकर केवल अज्ञान से आरंभ किया जाता है, वह कर्म तामस कहा जाता है। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–8) प्रवचन–204

गुणातीत जागरण—(प्रवचन—छठवा

अध्‍याय—18

सूत्र—

ज्ञानं ज्ञेयं पीरज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना।

करणं कर्म कर्तेति त्रिविध: कर्मसंग ।। 18।।

ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदत:।

प्रोच्‍यते गुणसंख्याने यथावच्‍छृणु तान्ययि।। 19।।

सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते।

अविभक्तं विभक्तेषु तज्जानं विद्धि सात्‍विकम्।। 20।।

पृथक्त्‍वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृश्रश्विधान्।

वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ।। 21।।

यत्तु कृत्‍स्‍नवक्केस्मिन्क्रायें स्थ्यमहैक्कुम्।

अतल्छार्श्रवदल्पं च तत्तामसमुदहतम्।। 22।।

तथा है भारत, ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय, ये तीनों तो कर्म के प्रेरक हैं अर्थात इन तीनों के संयोग मे तो कर्म में प्रवृत्त होने की इच्‍छा उत्पन्न होती है। और कर्ता? करण और क्रिया, ये तीनों कर्म के अंग हैं अर्थात इन तीनों के संयोग से कर्म बनता है।

उन सब में ज्ञान और कर्म तथा कर्ता भी गुणों के भेद से सांख्य ने तीन प्रकार के कहे है, उनको भी तू मेरे से भली प्रकार सुन।

हे अर्जुन, जिस ज्ञान से मनुष्य पृथक—पृथक सब भूतों में एक अविनाशी परमात्मा को विभागरहित, समभाव से स्थित देखता ह्रै उस ज्ञान की तू सात्‍विक जान।

और जो ज्ञान अर्थात जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य संपूर्ण भूतों में अनेक भावों को न्यारा— न्यारा करके जानता है, उस ज्ञान को तू राजस जान।

और जो ज्ञान एक कार्यरूप शरीर में ही संपूर्णता के सदृश आसक्त है तथा जो बिना युक्ति वाला, तत्‍वअर्थ से रहित और तुच्‍छ है, वह ज्ञान तामस कहा गया है। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–8) प्रवचन–203

महासूत्र साक्षी—(प्रवचन—पांचवां)

अध्‍याय—18

सूत्र—

यञ्जैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।

सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्।। 13।।

अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथश्विधम्।

विविधाश्च यृथक्चैष्टा दैवं चैवात्र यञ्जयम्।। 14।।

शरीरवाक्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नर:।

न्याटयं वा विपरीतिं वा पज्जैते तस्य हेतवः ।। 15।।

तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु व: ।

पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्‍न स पश्यति दुमॅल: ।। 16।।

यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।

हत्वापि स हमाँल्लोकान्‍न हन्ति न निबध्यते ।। 17।।

और हे महाबाहो, संपूर्ण कर्मों की सिद्धि के लिए ये पांच हेतु सांख्य सिद्धांत में कहे गए है, उनको तू मेरे से भली प्रकार जान।

हे अर्जुन, हस विषय में आधार और कर्ता तथा न्यारे— न्यारे करण और नाना प्रकार की न्यारी— न्यारी चेष्टा एवं वैसे ही पांचवां हेतु दैव कहा गया है।

मनुष्य मनु वाणी और शरीर से शास्त्र के अनुसार अथवा विपरीत भी जो कुछ कर्म आरंभ करता है, उसके ये पांचों ही कारण हैं।

परंतु ऐसा होने पर भी जो पुरूष अशुद्ध बुद्धि होने के कारण उस विषय में केवल शुद्ध स्वरूप आत्मा को कर्ता देखता ह्रै वह दुर्मति यथार्थ नहीं देखता है।

और हे अर्जुन, जिस पुरुष के अंतःकरण में मैं कर्ता हूं ऐसा भाव नहीं है तथा जिसकी बुद्धि सांसारिक पदार्थों में और संपूर्ण कर्मों में लिपायमान नहीं होती? वह पुरूष इन सब लोगों को मारकर भीं वास्तव में न तो मारता है और न पाय से बंधता है। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–8) प्रवचन–202

सदगुरू की खोज—(प्रवचन—चौथा)

अध्‍याय—18

सूत्र—

न द्वेञ्चकुशलं कर्म कुशले नानुषज्‍जते।

त्यागी सत्‍वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशय:।। 10।।

न हि देहभृता शाक्‍यं त्यक्तुं कर्माण्यझेश्त:।

यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्‍यभिधीक्ते।। 11।।

अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मण: फलम्।

भवत्‍यत्‍यागिनां प्रेत्य न तु सन्यासिनां क्वचित्।। 12।।

और हे अर्जुन, जो पुरुष अकल्‍याणकारक कर्म से तो द्वेष नहीं करता है और कल्याणकारक कर्म में आस्क्‍त नहीं होता है, वह शुद्ध सत्वगुण से युक्‍त हुआ पुरुष संशयरहित मेधावी अर्थात ज्ञानवान और त्यागी है।

क्योंकि देहधारी पुरुष के द्वारा संपूर्णता से सब कर्म त्यागे जाना शक्य नहीं है। इससे जो पुरूष कर्मो के फल का त्यागी है, क ही त्यागी है, ऐसा कहा जाता है।

तथा सकामी पुरूषों के कर्म का ही अच्‍छा बुरा और मिश्रित, ऐसे तीन प्रकार का कल मरने के पश्‍चात भी होता है और त्यागी पुरुषों के क्रमों का फल किसी काल में भी नहीं होता है। Continue reading

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जिन खोजा तिन पाइयां–(प्रवचन–19)

अज्ञात अपरिचित गहराइयों में–(प्रवचन–उन्‍नीसवां)

 तेरहवीं प्रश्नोत्तर चर्चा:

शरीर : मन का अनुगामी:

प्रश्न: ओशो नारगोल शिविर में आपने कहा कि योग के आसन प्राणायाम मुद्रा और बंध का आविष्कार ध्यान की अवस्थाओं में हुआ तथा ध्यान की विभिन्न अवस्थाओं में विभित्र आसन व मुद्राएं बन जाती हैं जिन्हें देखकर साधक की स्थिति बताई जा सकती है। इसके उलटे यदि वे आसन व मुद्राएं सीधे की जाएं तो ध्यान की वही भावदशा बन सकती है। तब क्या आसन प्राणायाम मुद्रा और बंधों के अभ्यास से ध्यान उपलब्ध हो सकता है? ध्यान साधना में उनका क्या महत्व और उपयोग है?

 प्रारंभिक रूप से ध्यान ही उपलब्ध हुआ। लेकिन ध्यान के अनुभव से शात हुआ कि शरीर बहुत सी आकृतियां लेना शुरू करता है। असल में, जब भी मन की एक दशा होती है तो उसके अनुकूल शरीर भी एक आकृति लेता है। जैसे जब आप प्रेम में होते हैं तो आपका चेहरा और ढंग का हो जाता है, Continue reading

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जिन खोजा तिन पाइयां–(प्रवचन–18)

तंत्र के गुह्य आयामों में—(प्रवचन—अट्ठाहरवां)

बारहवीं प्रश्नोत्तर चर्चा:

भीतर के पुरुष अथवा स्त्री से मिलन:

प्रश्न: ओशो कल की चर्चा के अंतिम हिस्से में आपने कहा कि बुद्ध सातवें शरीर में महापरिनिर्वाण को उपलब्ध हुए। लेकिन अपने एक प्रवचन में आपने कहा है कि बुद्ध का एक और पुनर्जन्म मनुष्य शरीर में मैत्रेय के नाम से होनेवाला है। तो निर्वाण काया में चले जाने के बाद पुन मनुष्य शरीर लेना कैसे संभव होगा इसे संक्षिप्त में स्पष्ट करने की कृपा करें।

सको छोड़ो, पीछे लेना, तुम्हारे पूरे नहीं हो पाएंगे नहीं तो।

 प्रश्न: ओशो आपने कहा है कि पांचवें शरीर में छंचने पर साधक के लिए स्त्री और पुरुष का भेद समाप्त हो जाता है। यह उसके प्रथम चार शरीरों के पाजिटिव और निगेटिव विद्युत के किस समायोजन से घटित होता है?

स्त्री और पुरुष के शरीरों के संबंध में, पहला शरीर स्त्री का स्त्रैण है, लेकिन दूसरा उसका शरीर भी पुरुष का ही है। और ठीक इससे उलटा पुरुष के साथ है। तीसरा शरीर फिर स्त्री का है, चौथा शरीर फिर पुरुष का है। Continue reading

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जिन खोजा तिन पाइयां–(प्रवचन–17)

मनस से महाशून्य तक—(प्रवचन—सतहरवां)

(ग्यारहवीं प्रश्नोत्तर चर्चा)

कुंडलिनी जागरण के लिए प्रथम तीन शरीरों में सामंजस्य आवश्यक:

प्रश्न ओशो कल की चर्चा में आपने अविकसित प्रथम तीन शरीरों के ऊपर होनेवाले शक्तिपात या कुंडलिनी जागरण के प्रभाव की बात की। दूसरे और तीसरे शरीर के अविकसित होने पर कैसा प्रभाव होगा इस पर कुछ और प्रकाश डालने की कृपा करें भ्यसाथ हत्ती यह भी बताएं कि प्रथम तीन शरीर— फिजिकल ईथरिक और एस्ट्रल बॉडी को विकसित करने के लिए साधक इस संबंध में पहली बात तो यह समझने की है कि पहले, दूसरे और तीसरे शरीरों में सामंजस्य, हार्मनी होनी जरूरी है। ये तीनों शरीर अगर आपस में एक मैत्रीपूर्ण संबंध में नहीं हैं, तो कुंडलिनी जागरण हानिकर हो सकता है। और इन तीनों के सामंजस्य में, संगीत में होने के लिए दो—तीन बातें आवश्यक हैं। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–8) प्रवचन–201

फलाकांक्षा का त्‍याग—(प्रवचन—तीसरा)

अध्‍याय—18

सूत्र–

नियतस्य तु संन्यास: कर्मणो नोययद्यते।

मोहात्तस्य परित्यागस्तामम: यरिकीर्तित:।। 7।।

दु:खमित्येव यत्कर्म कायक्लेशमयाल्यजेत्।

स कृत्या राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ।। 8।।

कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेअर्जुन।

सङ्गं त्यक्त्‍वा फलं चैव स त्याग: सास्थ्यिाए मत:।। 9।।

और हे अर्जुन, नियत कर्म का त्याग करना योग्य नही है, इसलिए मोह से उसका त्याग करना तामस त्याग कहा गया है।

और यदि कोई मनुष्य, जो कुछ कर्म है वह सब ही दुखरूप है, ऐसा समझकर शाशीरिक क्लेश के भय से कर्मों का त्याग कर दे, तो वह पुरूष उस राजस त्याग को करके भी त्याग के फल को प्राप्त नहीं होता है।

और हे अर्जुन, करना कर्तव्य है, ऐसा समझकर ही जो शास्त्र— विधि से नियत किया हुआ कर्तव्य कर्म आसक्‍ति को और फल को त्याग कर किया जाता है, वह ही सात्‍विक कहा जाते है। Continue reading

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जिन खोजा तिन पाइयां–( प्रवचन–16)

ओम् साध्य है, साधन नहीं—(प्रवचन—सौहलवां)

(दसवीं प्रश्नोत्तर चर्चा)

प्रश्न: ओशो कल सातवें शरीर के संदर्भ में ओम् पर कुछ आपने बातें की। इसी संबंध में एक छोटा सा प्रश्न यह है कि अर ऊ और म के कंपन किन चक्रों को प्रभावित करते हैं और उनका साधक के लिए उपयोग क्या हो सकता है? इन चक्रों के प्रभाव से सातवें चक्र का क्या संबंध है?

ओम् के संबंध में थोड़ी सी बातें कल मैंने आपसे कहीं। उस संबंध में थोड़ी सी और बातें जानने जैसी हैं। एक तो यह कि ओम् सातवीं अवस्था का प्रतीक है, सूचक है, वह उसकी खबर देनेवाला है। ओम् प्रतीक है सातवीं अवस्था का। सातवीं अवस्था किसी भी शब्द से नहीं कही जा सकती। कोई सार्थक शब्द उस संबंध में उपयोग नहीं किया जा सकता। इसलिए एक निरर्थक शब्द खोजा गया, जिसमें कोई अर्थ नहीं है। यह मैंने कल आपसे कहा। इस शब्द की खोज भी चौथे शरीर के अनुभव पर हुई है। यह शब्द भी साधारण खोज नहीं है। Continue reading

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जिन खोजा तिन पाइयां–(प्रवचन–15)

धर्म के असीम रहस्य सागर में—(प्रवचन—पंद्रहवां)

  (नौवीं प्रश्नोत्तर चर्चा)

धर्म और विज्ञान के भिन्न दृष्टिकोण:

प्रश्न : ओशो कल की चर्चा में आपने कहा कि विज्ञान का प्रवेश पांचवें शरीर स्पूचुअल बॉडी तक संभव है। बाद में चौथे शरीर में विज्ञान की संभावनाओं पर चर्चा की। आज कृपया पांचवें शरीर में हो सकने वाली कुछ वैज्ञानिक संभावनाओं पर संक्षिप्त में प्रकाश डालें।

क तो जिसे हम शरीर कहते हैं और जिसे हम आत्मा कहते हैं, ये ऐसी दो चीजें नहीं हैं कि जिनके बीच सेतु न बनता हो, ब्रिज न बनता हो। इनके बीच कोई खाई नहीं है, इनके बीच जोड़ है। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–8) प्रवचन–200

सात्‍विक, राजस और तामस त्‍याग—(प्रवचन—दूसरा)

अध्‍याय—18

सूत्र—

निश्चय श्रृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम।

त्यागो हि पुरूषव्‍याघ्र त्रिविध: संप्रकीर्तित: ।। 4।।

यज्ञदानतय:कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।

यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्।। 5।।

एतान्ययि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्वा फलानि च ।

कर्तथ्यानीति मे पार्थ निशिचतं मतमुत्तमम्।। 6।।

परंतु हे अर्जुन, उस त्याग के विषय में तू मेरे निश्चय को सुन। हे पुरूषश्रेष्ठ, वह त्याग सात्‍विक राजस और तामस, ऐसे तीनों प्रकार का ही कहा गया है।

तथा यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्यागने के योग्य नही है, किंतु वह निःसंदेह करना कर्तव्य है, क्योंकि यज्ञ दान और तप, ये तीनों ही बुद्धिमान पुरुषों को पवित्र करने वाले हैं। इसलिए हे पार्थ, यह यज्ञ, दान और तपरूप कर्म तथा और भी संपूर्ण श्रेष्ठ कर्म आसक्‍ति को और फलों को त्याग कर अवश्य करने चाहिए, ऐसा मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है। Continue reading

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गीता दर्शन–(भाग–8) प्रवचन–199

अंतिम जिज्ञासा: क्‍या है मोक्ष, क्‍या है संन्‍यास—(प्रवचन—पहला)

अध्‍याय—18

सूत्र—

श्री मद्भगवद्गीता (अथ अष्‍टादशोउध्‍ण्‍याय)

अर्जुन उवाच:

संन्यामस्य महाबाहो तत्त्वीमच्छामि वेदितुम्।

त्यागस्य च हषीकेश पृथक्केशिनिषूदन।। 1।।

भगवानवाच:

काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः।

सर्व कर्मफलत्यागं प्राहुस्मागं विचक्षणा:।। 2।।

त्याज्यं दोश्वदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिण:।

यज्ञदानतयकर्म न त्याज्यमिति चापरे ।। 3।।

अर्जुन बोला, हे महाबाहो, हे हषीकेश, हे वासुदेव, मैं संन्यास और त्याग के तत्‍व को पृथक— पृथक जानना चाहता हूं।

इस प्रकार अर्जुन के पूछने पर श्री भगवान बोले, हे अर्जुन, कितने ही पंडितजन तो काम्य कर्मों के त्याग को संन्याम जानते हैं और कितने ही विचक्षण अर्थात विचार कुशल पुरुष सब क्रमों के फल के त्याग को त्याग कहते हैं।

तथा कई एक मनीषी ऐसा कहते हैं कि कर्म सभी दोषयुक्त है, इसलिए त्यागने के योग्य हैं। और दूसरे विद्वन ऐसा कहते हैं कई यज्ञ, दान और तप लय कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं। Continue reading

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